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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

मनुष्य जीवन को सार्थक कैसे किया जाता है? [ एक नया युवा आंदोलन-7' For Total Development ']

'मनुष्य' कहते किसे हैं ?
['BE AND MAKE ' के निहितार्थ को समझ लेने के बाद अब यदि हम -अथातो 'मनुष्य' जिज्ञासा !] 
यदि हम मनुष्यों का निर्माण करना 'Make' चाहते हों, या स्वयं 'मनुष्य' बनना चाहते हों, तो हमें यह अवश्य समझना चाहिये कि 'मनुष्य' कहते किसे हैं ? स्वामी विवेकानन्द इसी बात (गूढ़ रहस्य ) को आसानी से समझने के लिए हमें एक फॉर्मूला (सिद्धान्त ) देते हुए कहते हैं - 'मैन इज थ्री H'स, उन्होंने कहा- " हैण्ड, हेड ऐंड दी हर्ट पुट टुगेदर मेक अ मैन। " 
अर्थात मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव हैं, 'हैण्ड-हेड-हार्ट =3H' ; इसमें से हाथ हमारे शरीर (बाहुबल) का प्रतिनधित्व करता है, सिर हमारे मन (बुद्धिबल) का प्रतिनिधित्व करता है, और हृदय जिसके माध्यम से हमारी आत्मा की सहानुभूति-शक्ति अभिव्यक्त होती है। इन तीनों के सम्मिलित आकृति को मनुष्य कहते हैं। इसलिये यदि हम मनुष्यों का निर्माण करना चाहते हों, और स्वयं मनुष्य बनना चाहते हों, तो हमें मनुष्य के  इन तीनों शक्तियों का सुसमन्वित विकास करना होगा, और उसके तीनों अवयवों को उन्नत करना होगा। शरीर की शक्ति को नियमित व्यायाम और पौष्टिक आहार के माध्यम से स्वस्थ और बलशाली बनाना होगा।  ' मेंटल कॉन्सनट्रेशन' या मनःसंयोग के अभ्यास द्वारा हम अपने मन को नियंत्रण में रखने का प्रयास कर सकते हैं, ताकि बुद्धि को उचित ढंग से विकसित किया जा सके। फिर हृदय का कार्य (function) है -दूसरों के सुख-दुःख का अनुभव करना; अतः जिन महापुरुषों का हृदय अत्यन्त सहानुभूति-सम्पन्न था, जैसे 'ठाकुर-माँ-स्वामीजी;' -उनके जीवन का अध्यन और परिचर्चा के माध्यम से हम अपने हृदय को भी विकसित कर सकते हैं, अर्थात उसे सहानुभूति शक्ति से सम्पन्न कर सकते हैं। 

यदि हम मनुष्य को- 'हैण्ड,हेड ऐंड हार्ट' की ' ट्रिनिटी' अर्थात यदि हम प्रत्येक मनुष्य को 'शरीर-मन-हृदय' रूपी त्रिदेव का मूर्त रूप समझ सकें, केवल तभी हमलोग अपने जीवन के लक्ष्य के विषय में विचार कर सकते हैं। यदि हमलोग (असुर लोगों की तरह) यह सोचें हम तो केवल शरीर (मेल-फीमेल बॉडी) मात्र हैं, तो हमारी स्वाभाविक वृत्ति यही होगी कि इसका भरण-पोषण किया जाय, इसे मौज-मस्ती मिले, इससे केवल आमोद-प्रमोद किया जाय, या लुत्फ़ उठाया जाय; और मात्र इतना ही से हमारा यह बहुमूल्य मानव जीवन समाप्त हो जायेगा। 
यदि हमलोग अपने को केवल 'बॉडी-माइन्ड कम्प्लेक्स' अर्थात 'शरीर-मन मिश्रित' संरचना सोंचे, तो उस स्थिति में भी हमलोग अपनी इन्द्रियों का तुष्टिकरण करने, एवम विभिन्न प्रकार के ख्वाबों और कामनाओं को पूर्ण करने में संलिप्त हो जायेंगे, या यदि बहुत हुआ तो थोड़ी-बहुत 'इंटेलेक्चुअल एक्रोबेटिक्स' बौद्धिक कसरत भी कर लेंगे, और बस यहाँ भी सब कुछ खत्म हो जायेगा। किन्तु यदि हम यह जान लें कि हमारा सच्चा स्वरूप तो अजर-अमर-अविनाशी आत्मा है, और यह नश्वर शरीर और मन तो केवल उसकी ही एक नगण्य सी अभिव्यक्ति है, एवम उस अविनाशी तक पहुँचने का एक साधन है; तब उस अवस्था में हमारे जीवन का लक्ष्य बिल्कुल अलग प्रकार का होगा। 
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -'रिलिजन इज मेनिफ़ेस्टेशन ऑफ़ डिविनिटी ऑलरेडी इन मैन'- अर्थात 'प्रत्येक मनुष्य पहले से विद्यमान ईश्वरत्व को अभिव्यक्त करना ही धर्म है। ' हमें इसी ईश्वरत्व को अभिव्यक्त करने का प्रयत्न करना चाहिये - और ऐसा वास्तविक धर्म ही हमें अपने जीवन का एक सच्चा और सही लक्ष्य प्रदान करता है।

 यदि हमलोग यह जान लें कि हमारे भीतर एक आत्मा, स्व या खुद, या ब्रह्म निवास करते हैं (या भगवान श्रीरामकृष्ण देव हमारे हृदय में ही बसते हैं, तब हमारी दृष्टि ज्ञानमयी हो जायेगी), तब हम स्पष्ट रूप से देख पायेंगे कि वे सिर्फ मेरे हृदय में ही नहीं बैठे हैं, वे प्रत्येक व्यक्ति में हैं, हर वस्तु में हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, तथा इसके परे भी हैं ; वे इस व्यक्त या दृष्टिगोचर जगत प्रपंच (टाइम-स्पेस-कॉजेशन) से परे भी हैं। (जो कोई मनुष्य भगवान को चाहे जिस नाम से भी क्यों न पुकार रहा हो-'प्रेमस्वरूप- श्रीरामकृष्ण' जानते हैं कि वह मुझे ही पुकार रहा है। आप अपने अपने मतानुसार अल्ला,गॉड या नानक-मोहम्मद-ईसा  किसी का भी नाम ले सकते हैं।) केवल ऐसा विश्वास (ज्ञानमयी दृष्टि) ही जगत को एकता के सूत्र में बाँध सकता है। यह ज्ञानमयी दृष्टि ही हमें जगत को ब्रह्ममय देखने की बुद्धिमत्ता  (सच्चा विजडम) प्रदान करती है, और केवल यह ज्ञान ही प्रत्येक व्यक्ति को परस्पर जोड़ सकती है। इससे यह पता चल जाता है कि मेरा शरीर और मन  दूसरों के शरीर और मन से अलग नहीं है, बल्कि एक ही मूलवस्तु (ब्रह्म श्रीरामकृष्ण) की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। यही विजडम या समझ ही हमें प्रत्येक व्यक्ति से प्रेम करने, और किसी भी व्यक्ति से घृणा नहीं करने का साहस और उत्साह प्रदान करती है। यही सच्चा ज्ञान हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति सम्पन्न बनने की क्षमता प्रदान करता है। यही विज्डम या 'सच्ची -बुद्धिमत्ता, या हृदय-वत्ता ?' हमें दूसरों के कल्याण के लिये,निजी सुख,निजी ख़ुशी,अपना सबकुछ -यहाँ तक कि अपना जीवन भी न्योछावर कर देने के लिये अनुप्रेरित करती है। यही समझ दूसरों के सुख-दुःख को भी अपने ही जैसा समझने की क्षमता प्रदान करती है। इसी  सहानुभूति और इसी ज्ञान के बल पर हमलोग दूसरों के दुःख-कष्टों को दूर हटाने का प्रयत्न करते हैं। 

इसी बात को स्वामीजी संक्षेप में इस प्रकार कहते हैं - " त्याग और सेवा ही भारत के जुड़वा राष्ट्रीय  आदर्श हैं, आप इन दो धाराओं में तीव्रता उत्पन्न कीजिये, शेष सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा।"  ये विचार हमारे सामने जीवन के बारे में एक सही दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। यह विचार हमें अपने जीवन के लिये एक दर्शन देते हैं। उनके ऐसे विचार ही हमें अपने जीवन को सही ढंग से निर्मित करने के लिये अनुप्रेरित करते रहते हैं। इसीलिये, हमलोगों को इसी जीवन-दृष्टि या जीवन-दर्शन के आलोक में अपने जीवन को सही ढंग से गठित करने का संकल्प लेना चाहिये। यदि हमलोग अन्य लोगों से बिल्कुल अलग नहीं हैं, तो उन्हें जब दुःख होता हो, वे रोते और विलाप करते हों,तब उनके दुःख-कष्टों को दूर करने के लिये हमें अवश्य आगे आना चाहिये, और इसकी खातिर (उनकी अविद्या को दूर करने के लिये) हमें किसी भी तरह के त्याग या कष्ट को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। श्रीमद्भागवत में एक बहुत सुन्दर उपदेश-वाक्य है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है। यह श्लोक हमें मनुष्य जीवन का लक्ष्य, इसका सही उद्देश्य, इस जीवन का सही अर्थ प्रदान करता है, और इस जीवन सार्थक बनाने का उपाय भी प्रदान करता है।

एतावत् जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु । 
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयं आचरणं सदा ॥ 
इसी शरीर में रहते हुए जन्म-साफल्य या मानवजीवन की परिपूर्णता यह है इससे बढ़कर और कोई सौभाग्य की बात नहीं है। यही है मनुष्य जीवन का चरम उद्देश्य या लक्ष्य ! वह क्या है ? मनुष्य जीवन की सार्थकता कैसे प्राप्त होती है ? ' श्रेयं आचरणं सदा'-  हमेशा विवेक-प्रयोग करके 'प्रेय' (pleasant या रोचक वस्तु) का त्याग और 'श्रेय' (अच्छा, good या लाभकारी) कार्य करने की आदत को अपनी प्रोपेन्सिटी बना लेने से प्राप्त होता है। किस प्रकार से होता है ? 'प्राणैः अर्थैः धिया वाचा' अपने शब्दों के माध्यम से, अपनी धी या बुद्धि से, या अपने मन के द्वारा, और यदि आवश्यक हो तो प्राणैः - अपने जीवन का बलिदान या अर्थ का त्याग करके भी केवल सद्कर्म ही करना चाहिये। यदि तुम्हारे पास धन है, तो अपने धन का व्यवहार करके, अपनी बुद्धि का, अपनी वाणी का,यदि जरुरी हो तो अपने सम्पूर्ण जीवन के द्वारा भी दूसरों का कल्याण करो। यही मानवजीवन की सार्थकता है।  
जीवन को सार्थक बनाने के विषय में स्वामी विवेकानन्द भी हमें ठीक ऐसी ही सलाह देते हैं । वे कहते हैं- "यह जीवन क्षणस्थायी है, संसार के भोग-विलास की सामग्रियाँ भी क्षणभंगुर हैं। वे ही यथार्थ में जीवित हैं, जो दूसरों के लिये जीवन धारण करते हैं। बाकि लोगों का जीना तो मुर्दों की तरह जीने जैसा है। " अतः इन्हीं विचारों या उपदेश वाक्यों के आलोक में हमें जीवन को सही ढंग से निर्मित करना चाहिये। 
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" This life is short, the vanities of the world are transient, they alone live who live for others; the rest are more dead than alive. So with these ideas we should resolve to build ourselves properly."

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