कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा के अनुसार सच्ची शिक्षा और सच्चा धर्म क्या है ?[एक नया युवा आन्दोलन -15'The Idea and the Method ]

महामण्डल के पाँच अभ्यास क्या हैं और क्यों ? 
(रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में मनुष्य बनने और बनाने की पद्धति !)   
महामण्डल किस प्रकार की संस्था है, इसका स्वरूप क्या है ? क्या यह एक धार्मिक संगठन है ? या फिर यह सांस्कृतिक, समाजसेवी या कोई शैक्षणिक संस्थान है ? क्योंकि इस संस्था के साथ स्वामी विवेकानन्द का नाम जुड़ा हुआ है, वे एक संन्यासी थे और उन्होंने धर्म का प्रचार किया था,अतः लोग आसानी से यह धारणा बना लेते हैं, कि शायद यह भी एक प्रकार का धार्मिक संगठन हो होगा। किन्तु ऐसे आकलन के आधार पर पूछे कि -क्या महामण्डल कोई धार्मिक संगठन है ? तो उत्तर होगा - नहीं।  किन्तु धर्म का जो सार तत्व है, आध्यात्म का जो वास्तविक अर्थ होता है, उसकी ओर यदि किसी का संकेत हो - तो कहना पड़ेगा, निस्सन्देह महामण्डल एक धार्मिक संस्था है। 
किन्तु, यहाँ 'धर्म' का अर्थ कोई संकीर्ण दायरे वाला 'मतवाद' नहीं हो सकतामहामण्डल की आस्था जिस धर्म में है, वह हिन्दुओं का धर्म तो बिल्कुल नहीं है, हिन्दुओं में भी न तो यह वैष्णव है,न शाक्त है, और न शैव-पन्थ को ही मानने वाला है। क्योंकि हमलोग श्रीरामकृष्ण देव या स्वामी विवेकानन्द को किसी एक 
धर्म-विशेष से जुड़ा हुआ व्यक्ति नहीं कह सकते। क्योंकि वे दोनों 'सर्वधर्म समन्वय' (हार्मनी ऑफ़ आल रीलिजन्स ) या सभी धर्मों में परस्पर सद्भाव के संस्थापक (Founders) रहे हैं। इन दोनों के आविर्भूत होने से पहले तक,- धर्म के क्षेत्र में परमत-सहिष्णुता पूर्णतया अनुपस्थित थी- 'टॉलरेंस वाज ऑलटुगेदर  एबसेंट  फ्रॉम द डोमेन ऑफ़ रिलिजन'।  और आज भी- ऐसा है या नहीं इस बात में खुला सन्देह है। 'इंटॉलरेन्स' की बुराई के विरुद्ध  विश्व की आँखों को खोलने वाले प्रथम व्यक्ति श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द ही हैं। 
मनुष्य समाज में विभिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न समय में देश-काल की विविधता केआधार पर पृथक पृथक नाम वाले मत या सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव होता रहा है। इसीलिये परमत सहिष्णु होना बहुत महत्वपूर्ण है। किन्तु, सभी मनुष्यों के जीवन में एक 'धर्म', कर्तव्य, कोई न कोई अत्यन्त ज्वलन्त आकांक्षा या कामनायें (परमसत्य को जानने की इच्छा ?) होती हैं। और इन आकांक्षाओं या अभिलाषाओं को पूर्ण करने का जो पथ है, उसी को 'धर्म का मार्ग' कहा जाता है।  जिन लोगों को इस धर्म की उपलब्धि हो जाती है, उनके लिये हिन्दू, मुस्लिम या ईसाईयों के बीच कोई अन्तर नहीं रह जाता। 
स्वामी विवेकानन्द ने इस तथ्य को बहुत गहराई से और विस्तारपूर्वक समझाया है। उनकी दृष्टि में जब कोई व्यक्ति बाह्य-प्रकृति और अन्तःप्रकृति (पाशविक वृत्ति) दोनों के ऊपर विजय प्राप्त कर लेता है, केवल तभी उसे धर्म की प्राप्ति होती है। इसी के द्वारा मनुष्य को यथार्थ शक्ति प्राप्त होती है, इसीलिये वास्तव में यही सच्चा धर्म है। इसीलिये स्वामी जी धर्म की परिभाषा देते हुए कहते है, " धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है। " 
इस कसौटी से कसने पर विभिन्न धर्मों के बीच भेद-भाव करने के लिये कोई स्थान ही नहीं रह जाता। हर धर्म के लिये यह पैमाना एक समान है, और जो कुछ इसके प्रतिकूल होगा उसे धर्म नहीं कहा जा सकता। 
विश्व में प्रचलित प्रत्येक धर्म मनुष्य को पाशविकता पर अंकुश रखने, और अंत में उसे पूरी तरह त्याग कर मानवोचित गुणों को विकसित करने (या अभिव्यक्त करने?) की सीख देता है। जो व्यक्ति इस प्रकार , (यम-नियम का अनवरत पालन करके ) अन्तःप्रकृति या पाशविक-वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेगा, वह  सच्चा धार्मिक मनुष्य बन जायेगा। और उसे देखने से ऐसा प्रतीत होगा, मानो वह भी भगवान का ही प्रकट रूप है, काल्पनिक भगवान जैसा (यविष्ठ) प्रतीत होगा।
इसीलिये मनुष्य जब अपनी कल्पना के अनुसार भगवान का चित्र या मूर्ति गढ़ता है,तो वह उनके मुखड़े को पवित्रता, तेजस्विता, आदि नायकोचित उत्कृष्टतम चारित्रिक गुणों से विभूषित करते हुए देवोपम ओजस-प्रभामण्डल*** के साथ ही गढ़ता है। क्योंकि दिन-प्रतिदिन की व्यावहारिक दुनिया में ऐसा ओजसप्रभा-मण्डल से युक्त देवोपम मुखमण्डल ढूँढ पाना लगभग मुश्किल ही लगता है।
[***'राजयोग -शिक्षा' में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं," ओजस- प्रभामंडल ही मानव-जाति के किसी सच्चे मार्गदर्शक “नेता” (आध्यात्मिक शिक्षक) की पवित्र पहचान होती है। ओजस उन पवित्र व्यक्तित्व-सम्पन्न महापुरुषों का असंदिग्ध संकेत-चिन्ह (signpost) है जिनकी मिठास हमें बरबस ही अपनी ओर बिना किसी स्पष्ट कारण के ही आकर्षित कर लेती है। "

 " ओजस् उसे कहते हैं, जो एक मनुष्य को दूसरे से भिन्न बनाता है। जिस मनुष्य में विपुल ओजस् होता है, वह जननेता होता है। ओजस् प्रबल आकर्षण-शक्ति प्रदान करता है। ओजस् का निर्माण नाड़ीय प्रवाहों से होता है। इसकी विचित्रता यह है कि उसका निर्माण उस शक्ति द्वारा बड़ी सरलता से होता है, जिसकी अभिव्यक्ति यौन शक्ति में होती है। यदि यौन केन्द्रों की शक्तियों का व्यर्थ में क्षय और अपव्यय न हो, (भाव की स्थूलतर अवस्था ही क्रिया है) तो उनको ओज में परिणत किया जा सकता है।"]
सामान्यतः हम समाज में मनुष्यों का जैसा सौन्दर्य, शारीरक-शौष्ठव और स्वभाव आदि देखते हैं, उससे हमारी कल्पना को तृप्ति नहीं मिलती। इसीलिये जब हम भगवान के मुखड़े को चित्र या मूर्ति में उकेरने की चेष्टा करते हैं, तो हम उसमें मानवोचित समस्त उत्तम को अनन्त गुना विकसित रूप से गढ़ने की चेष्टा करते हैं।' ऐंड सो वी वांट टू मेक ए  गॉड आउट ऑफ़ मैन'- और इसीलिये हमलोग मनुष्य को भी भगवान या किसी अवतार के साँचे में डाल कर गढ़ना चाहते चाहते हैं। 
और विश्व के प्रत्येक धर्म में यह बात एक समान पायी जाती है। इस दृष्टि से विचार करने पर निस्सन्देह महामण्डल भी धर्म (पाँच दैनन्दिन अभ्यासों ) का पालन कर रहा है। किन्तु महामण्डल अपने किसी सदस्य को मन्दिर,मस्जिद,चर्च या गुरुद्वारा जाने, कर्मकाण्डीय अनुष्ठान करने या प्रचलित रीति से पूजा-पाठ  करने का निर्देश नहीं देता, इस दृष्टि से देखने पर महामण्डल धार्मिक संस्था नहीं है।  
वर्तमान समय में बहुत से लोग 'संस्कृति'  का अर्थ डांस-कम्पीटीशन, नाट्य-गायन कम्पटीशन, साधारण रोचक किस्से-कहानियाँ, उपन्यास, कुछ दुर्बोध चित्र या अर्थहीन कवितायें समझते हैं। किन्तु महामण्डल 'संस्कृति' की ऐसी व्याख्या को व्यर्थ और बौद्धिक शक्ति की बर्बादी समझकर इस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस दृष्टि से देखने पर महामण्डल कोई सांस्कृतिक संस्था भी नहीं है। "इफ़  ए मैन इज रियली कल्चर्ड , ही ड्ज नॉट लुक ऐट दी वर्ल्ड दी वे एनिमल्स डू ":यदि कोई मनुष्य सही अर्थों में सुसंस्कृत बन जाता है, तब वह बाह्य जगत को उस दृष्टि से नहीं देखता जिस दृष्टि कोई पशु देखता है। 'मनुष्यत्व' का उन्मेष होने के साथ-साथ (ज्ञानमयी दृष्टि प्राप्त होते ही) उसके भीतर सौन्दर्य की प्रशंसा करने के लिये एक कोमल आंतरिक शक्ति भी पुष्पित हो जाती है। और अब उसे किसी वस्तु (फूल-फल) की व्यावहारिक उपयोगिता क्या है, उस दृष्टि से देखने पर सन्तुष्टि प्राप्त नहीं होती। वह प्रत्येक वस्तु के आन्तरिक सौन्दर्य का अन्वेषण भी करने लगता है।
इस प्रकार जगत को ज्ञानमयी दृष्टि से देखने का अभ्यास करते करते उसका मन-दर्पण स्वच्छ हो जाता है (अब वहाँ ब्रह्म-रूपी जगत का कोई विकृत चित्र नहीं बनता ), और जिसके फलस्वरूप वह चिंतन में, शब्दों में, प्रकृति में, जगत के समस्त सजीव प्राणियों में सौन्दर्य उपलब्ध करने की क्षमता या 'सौन्दर्यबोध ' को अर्जित कर लेता है। यह निश्चित रूप से एक आध्यात्मिक गुण है। इस दृष्टि से देखने पर महामण्डल अवश्य एक सांस्कृतिक संगठन है; किन्तु तथाकथित 'सांस्कृतिक-कार्क्रम' वाले उपरोक्त सामान्य लक्ष्यार्थ की दृष्टि से देखें तो यह कोई सांस्कृतिक संगठन भी नहीं है। 
इसी प्रकार से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जायेगा कि प्रचलित अर्थों में महामण्डल एक समाजसेवी संगठन भी नहीं है। क्यों ? आमतौर से कोई भी समाज-सेवी संस्था समाज के लिए कुछ न कुछ कल्याण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है, वह विभिन्न समाजोपयोगी कार्यों के द्वारा लोगों को सहायता प्रदान करता है। आजकल 'रूरल डेवलपमेन्ट' (ग्रामीण-विकास) समाजसेवा के लिये एक विशेष आइटम बन गया है। इसके अन्तर्गत अन्नहीन को अन्न और वस्त्र-हीन को वस्त्र, रोगियों के लिये औषधि आदि का वितरण कर समाजसेवा प्रदान की जाती है। ये सभी अच्छे कार्य हैं, शुभ कर्म हैं - तथापि महामण्डल का आविर्भाव केवल इसी प्रकार की समाजसेवा प्रदान करने के लिये नहीं हुआ है। क्योंकि  इस तरह की सेवायें प्रदान करने के लिये तो पहले ही से स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर  देश-दुनिया में असंख्य संस्थायें कार्यरत हैं। तथा राष्ट्रीय सरकार, विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संगठन एवं आम धनाड्य लोगों का संरक्षण भी उन्हें प्राप्त है। तब फिर उसी तरह के एक और संगठन के आविर्भूत होने की अनिवार्यता या विशेष औचित्य क्या हो सकता है ? 
इसके बावजूद भी महामण्डल  में समाज-सेवा के लिए एक स्थान है। यह एक विशेष प्रकार की समाज-सेवा है,और यदि इसे हम 'उत्कृष्ट समाज सेवा ' का नाम भी दें, तो वह अत्ययुक्ति नहीं होगी !  क्योंकि इस प्रकार के समाजसेवा की परिकल्पना स्वयं स्वामी विवेकानन्द जी के द्वारा ही की गयी थी। उन्होंने
 'सर्विस टू दी  इग्नोरैंट एंड द पुअर' - अर्थात अविद्याग्रस्त और दरिद्र (पूअर)' लोगों को साक्षात नारायण मानकर उनकी सेवा करने का उपदेश दिया था। निस्सन्देह भूखों को भोजन कराना, वस्त्रहीनों को वस्त्र देना, बीमारों के लिये चिकत्सा की व्यवस्था करना, आदि कार्य भी  स्वामी विवेकानन्द  द्वारा निर्देशित समाज-सेवा का ही हिस्सा है।
फिर भी जिस प्रकार की समाज-सेवा पर विवेकानन्द ने विशेष बल दिया था, वह है मनुष्य में उत्कृष्ट विचारों को प्राप्त करने के प्रति उत्कंठा जाग्रत कर देना, उन्हें वैसे विचारों और भावों से परिपूर्ण कर देना, जो किसी व्यक्ति को उन्नततर मनुष्य (जिसकी पूजा करने की इच्छा हो) बनने के लिये निरंतर प्रेरित करती रहती हैं। हमारे अपने ही परिवार और समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जो जीवन को उन्नततर बना देने वाले विचारों से वंचित रह गए हैं ! वास्तव में गरीब -'पूअर' तो वैसे ही लोग हैं। स्वामी जी के अनुसार केवल उन्हीं को दरिद्र नहीं समझना चाहिये जिनके पास धन का इतना अभाव है कि वे अपने लिये दो जून की रोटी का भी प्रबंध नहीं कर सकते। बल्कि स्वामी जी के मतानुसार सबसे अधिक गरीब तो वे लोग हैं, जिनके पास स्वयं को उत्कृष्टतर मनुष्य में परिणत करने वाले उच्च विचारों का अभाव होता है। स्वामी जी के मतानुसार इस प्रकार के 'उच्च-विचारों से वंचित-शोषित-दलित' लोगों में उच्च भावों की कमी को दूर करने के लिये उत्कृष्ट विचारों (वेदान्त) को जन-जन तक पहुँचा देना सर्वश्रेष्ठ समाज-सेवा का कार्य है। और 
महामण्डल स्वामी विवेकानन्द द्वारा निर्देशित इसी सर्वश्रेष्ठ समाजसेवा को भारत के गाँव-गाँव तक पहुँचा देने के लिये प्रयत्नशील है। 
आमतौर से प्रचलित समाज-सेवा जो किसी व्यक्ति,वर्ग, जाति,दल अथवा धर्म-विशेष के 'अमुक युवामंच' या क्लब के नाम पर की जाती है, उसके पीछे बहुधा अपने अहंकार को तुष्ट करने, नाम-यश पाने या दानशील कहे जाने, अथवा अपने निजी जीवन के गोरखधन्धों को छिपाने की कामना होती है।  उसी प्रकार का  एक दूसरा  समाज -सेवी संगठन बनाने के उद्देश्य से महामण्डल का आविर्भाव नहीं हुआ है। वर्तमान काल में, बहुधा विविध प्रकार के सामाज-सेवी संगठन या युवा-क्लब इसी तरह की मानसिकता के कारण एक ही झटके में खुल जाते हैं। "मेरे पास कितिनी धन-सम्पत्ति या जमीन- जायदाद है' उसमें से थोड़ा-बहुत  मैं गरीबों  या बिरहोर आदिवासियों को कुछ दान कर सकता हूँ", वे लोग भी क्या याद करेंगे कि कोई इतना दानी व्यक्ति भी है !"-यही वह मानसिकता है जो 'आत्मतुष्टी-करण एवं अहंकार का पोषण' करती है। 
इसीलिये तो इन दिनों सभी प्रकार की समाज-सेवा के कार्यों का, जिसमें 'डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ़ रग्स' (कम्बल-वितरण) आदि शामिल हैं का -  इतना अधिक प्रचार -समाचारपत्र, रेडियो,टेलीविजन आदि में दिखाई देता है!  विविध क्लबों या संगठनों द्वारा कंबल-वितरण, या सड़क पर झाड़ू लगाने  जैसे सेवा कार्यों का प्रारम्भ किया जाता है तो टी. वी. पेपर में अपना नाम- फोटो छपवाने के लिये - पहले से ही प्रिन्ट मिडिया एवं एल्क्ट्रॉनिक मिडिया को बुलवा लिया जाता है । किन्तु स्वामी विवेकानन्द ने कभी इस प्रकार की समाज-सेवा करना नहीं सिखाया है। यदि विवेकानन्द ने भी इसी प्रकार की दिखावटी समाज-सेवा करने का उपदेश दिया होता, तो लोगों ने उन्हें अपनी स्मृति में इतना अम्लान या तरो-ताजा  नहीं रखा होता। आज सामान्य का मनुष्य उनको इतनी श्रद्धा, विश्वास और प्रेम के साथ स्मरण नहीं करता, या लोग उनकी पूजा भी नहीं कर रहे होते। 
तथापि, इस धरती पर कई ऐसे भी लोग का जन्म हुआ है, जिन्होंने उपरोक्त विवरण के अनुसार ही समाज सेवा करने के लिये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समाज-सेवी क्लबों को स्थापित करने की योजना बनाई थी, और उन्हें इस कार्य में सफलता भी प्राप्त हुई थी! किन्तु मानव-स्मृति में इतने दीर्घकाल तक बने रहने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त नहीं हो सका है। इस जगत में अब तक जितने भी " पायनियर्स एमंग मेन" - राम, कृष्ण ,बुद्ध, ईसा,मोहम्मद, श्चैतन्य, रामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द आदि श्रेणी के मार्गदर्शक नेता, जननायक या पूजनीय विभूतियाँ हुई हैं; उन्हें सम्पूर्ण मानवता आज भी इसीलिये याद करती है कि उनमें से प्रत्येक ने समाज को ऐसे अमूल्य विचार दिये हैं, जो मानवजाति के लिये सर्वाधिक उपयोगी हैं, तथा युग-युगान्तर से मनुष्य उसका सच्चा लाभ उठाता आ रहा है। 
ये ही उन्नत मनुष्य के उदाहरण हैं, जिनकी पूजा करने लिये हम बाध्य हो जाते हैं ! तथापि (अवतार, नेता या योगेश्वर होने के बावजूद भी) उनमें से कइयों ने (धर्म-प्रवर्तक बन कर) स्वयं अपने नाम से, 
कोई नया सम्प्रदाय या धर्म खड़ा नहीं किया है। फिर भी जो मनुष्य जीवनदायी विचारों की गरीबी से त्रस्त हैं, वे उन महान विभूतियों के जीवन और सन्देशों से आज भी प्रेरणा प्राप्त करके उनके सकारात्मक विचारों द्वारा अपने समस्त अभाव को सदा के लिये समाप्त कर देने का उत्साह प्राप्त करते हैं। जीवन में पूर्णत्व प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। 
महामण्डल ऐसा कोई दावा नहीं करता कि वह समाज की समस्त आवश्यकताओं पूर्ण कर देगा। किन्तु 
आज के युवाओं के पास जीवन को सुन्दर रूप से गठित करने के लिये जिस उच्च आदर्श और चारित्रिक गुणों की आवश्यकता होती है,उन गुणों का घोर अभाव दिखाई देता है। वर्तमान में प्रचलित शिक्षा पद्धति से देश के युवाओं को अक्सर वैसे बहुमूल्य विचार प्राप्त नहीं होते, जो जीवन-गठन के लिये या मनुष्य बनने के लिये अत्यन्त आवश्यक हैं।  
हाँ, देश के सौभाग्य से आज भी कुछ शिक्षक ऐसे हैं, जो टेक्स्टबुक के घेरे से बाहर जाकर अपने स्वयं के जीवन की उपलब्धियों और अनुभवों से प्राप्त कुछ अनुकरणीय शिक्षाओं को अपने छात्रों के समक्ष प्रस्तुत   
करते हैं। वे ऐसा इसीलिये करते हैं, ताकि छात्र भी वैसे जीवन-मूल्यों से उत्प्रेरित होकर अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गठित करने के आग्रही बन सकें। वर्तमान समय में भी ऐसे कुछ शिक्षकों का अस्तित्व है
जिनका अपना जीवन 'रीनन्सिएशन ऐंड सर्विस' अर्थात 'त्याग और सेवा' के द्वारा गठित है, जिसके कारण आज भी कुछ युवा देश की सच्ची संपत्ति के रूप में विकसित हो पा रहे हैं। किन्तु, जब राजनितिक यूनियनबाजी के भँवर में फंस कर, ये थोड़े से आदर्श शिक्षक भी अपने घुटने टेक देंगे, और आदर्शों के साथ समझौता करना शुरू करने पर मजबूर कर दिये जायेंगे, वही दिन अपने देश के लिये सचमुच अत्यन्त दुर्भाग्य का दिन होगा। 
इन दिनों अपने बच्चों के चरित्र-निर्माण के प्रति जागरूक अभिभावकों की संख्या में भी तेजी से गिरावट आ रही है। वस्तुस्थिति की गंभीरता को देखते हुए महामण्डल ने गार्जियन्स की कर्तव्यनिष्ठता के अभाव की पूर्ति का दृढ़ निश्चय कर लिया है। इसीलिये महामण्डल के नाम के साथ यदि कोई विशेषण जोड़ना ही हो तो इसे धार्मिक,सांस्कृतिक अथवा समाज-सेवी संगठन न कहकर इसे एक 'शैक्षणिक संगठन' कहना चाहिये। 
अब यदि कोई यह प्रश्न पूछे, कि आदर्श शिक्षा के प्रचार- प्रसार के लिये; क्या महामण्डल भी किसी विशेष मॉडल पर आधारित शिक्षा यारामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित शिक्षा" प्रदान करने के लिये कुछ विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना करना चाहता है ? तो पुनः इस प्रश्न का उत्तर होगा - 'नहीं !' 
आजकल बहुत से ऐसे धार्मिक संगठन हैं जो शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बड़े बड़े भवनों में विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना कर रहे हैं, किन्तु वे भी विफल मनोरथ ही सिद्ध हो रहे हैं। और यदि इस प्रचलित शिक्षा प्रणाली के कन्टेन्ट या विषयवस्तु का चयन बहुत सोच-विचार कर किया जाय; यदि वैसा करना कभी सम्भव हुआ-तो भी; इस तरह की आदर्श शिक्षा प्रदान करने के लिए कोई बनाई गयी कोई भी योजना, विफल होने को बाध्य होगी। क्यों ?
क्योंकि उस आदर्श शिक्षा को पढ़ाने वाले शिक्षकों की नियुक्ति तो एम्प्लॉइमेन्ट एक्सचेंज (रोजगार दफ्तर), से या किसी राजनितिक दल द्वारा की गयी अनुषंसा के आधार पर ही होगी। और इस प्रकार आदर्श शिक्षा (गीता-उपनिषद की गुरु-शिष्य परम्परा में आधारित शिक्षा, या " रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित शिक्षा") प्रदान करने की यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह कागज पर ही धरी की धरी रह जायेगी! इसीलिये,आज 'सेक्यूलर शिक्षा-प्रणाली ' की जो अवस्था है, उसमें शासकीय अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थओं, या विद्यालयों और महाविद्यालयों (जेएनयू, एएमयू, जैसे विश्वविद्यालयों) का विस्तार करते जाने से इसमें लगा हुआ समस्त श्रम और धन कोई वांछित लाभ पहुँचाये बिना व्यर्थ में ही नष्ट हो जायेगा।
इसीलिये महामण्डल सही ढंग की शिक्षा ['रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' की शिक्षा ] प्रदान करने का वैसा ही कार्य करना तो चाहता है, किन्तु जनता के टैक्स के पैसों से (शासकीय अनुदान से) भवन आदि बनाते हुए ऐसे शिक्षण शिक्षण संस्थानों की संख्या में वृद्धि करने की इच्छा नहीं रखता। बल्कि इस नीति के अनुसार शिक्षा दान करना चाहता है कि- 'इफ दी बॉय डज नॉट कम टू एजुकेशन, एजुकेशन मस्ट गो टू दी बॉय !- "यदि बालक शिक्षा के पास नहीं आ सकता तो शिक्षा को ही बालक के पास ले जाना होगा।"
इसीलिये महामण्डल का कार्य गाँवों में शहरों में, हर जगह अपने केन्द्रों को प्रसारित करते जाना है। यदि 
कहीं कोई लड़का है जो उनमें से किसी केन्द्र तक भी नहीं पहुँच सकता, तो महामण्डल उनके घरों में उन विचारों की आपूर्ति करने के लिये जायेगा; जिसकी उन्हें बड़ी आवश्यकता है। जिसके बिना वह सही ढंग से विकसित नहीं हो सकता, जिसके अभाव में वह मन से जड़, और शारीरिक, नैतिक दृष्टि से दुर्बल हो गया है। जब उसे इस प्रकार के मनुष्य-निर्माणकारी विचार उपलब्ध करवा दिये जायेंगे, तो वह भी हर दृष्टि से विकसित हो जायेगा। और ये शक्तिदायी विचार उसको स्वस्थ और सबल बना देंगे। इन्हीं विचारों को स्पष्ट करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " प्रत्येक मनुष्य में त्रिविध शक्तियों का उत्स है -शरीर, मन और ह्रदय। इन तीनों तत्वों, 'बाहुबल-बुद्धिबल और आत्मबल'-के सुसमन्वित विकास से कोई भी व्यक्ति यथार्थ मनुष्य बन सकता है। "
 यही वह कार्य है जिसे पूरा करने का बीड़ा महामण्डल ने उठाया है। शरीर को स्वस्थ और सबल बनाने के लिये शारीरिक व्यायाम, मन पर नियंत्रण प्राप्त कर उसे एकाग्र और सतेज बनाने के लिये मनःसंयोग का नियमित अभ्यास करना महामंडल युवाओं के दैनिक दिनचर्या में शामिल किए गए हैं। किन्तु यदि हम अपने बाहुबल और बुद्धिबल को ही अपना एकमात्र सम्बल मान लें, तो मानव- कल्याण और समाजसेवा की दिशा में हम विशेष प्रगति नहीं कर सकते। उसके लिये अन्य शक्तियों -शारीरिक शक्ति और मानसिक शक्ति के साथ 'हृदय की शक्ति' को भी जोड़ना अनिवार्य होगा। हृदय की जो सहनुभूतिशीलता है, उसे और अधिक विकसित करना होगा। लेकिन कैसे ? ह्रदय को विस्तृत करने की पद्धति क्या है ? 
उसी पद्धति का एक अंग है, समाज-सेवा। किन्तु यदि हृदय को विकसित करने का एक उपाय मानकर समाज-सेवा करनी हो, तो वह कभी दानी होने के अहंकार अथवा अपनी दान- शीलता का प्रदर्शन करने के मनोभाव को रखते हुए नहीं की जा सकती। अतः हमें अपनी समाज-सेवा मानव-मात्र के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव रखते हुए करना होगा।  ऐसा सोचना होगा, मानो प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक मनुष्य का शरीर सच्चे अर्थों में एक मंदिर (प्रभु-निवास) है। उस देह-मंदिर में विराजित देवता बड़े कष्ट में हैं, दुःख भोग रहे हैं- "ब्रह्म पंचभूतों के फंदे में पड़ कर रो रहे हैं !"  क्योंकि उनकी वास्तविक दिव्यता (ब्रह्मत्व)अभिव्यक्त नहीं हो पा रही है। 
इसीलिए, हम एक शिवालय को जैसे धो-पोंछ कर स्वच्छ और पवित्र बनाते हैं, चन्दन घिसकर लेप तैयार करते हैं, फूल तोड़ते हैं, एवं साक्षात शिवजी की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने के लिये, उनके विग्रह और मंदिर को सुगन्धित पुष्प और धुप-चन्दन आदि से सजा कर मनोहारी बना देते हैं। समाज-सेवा भी ठीक उसी तरह की एक प्रकार का भय-मिश्रित सम्मान और पवित्रता की अनुभूति करते हुए करनी होगी, कि सेवा में कहीं कोई त्रुटि तो नहीं हो गयी? प्रत्येक मनुष्य के भीतर पहले से ही जो दिव्यता अन्तर्निहित है, उसे अभिव्यक्त करने में सहायता पहुँचाने की चेष्टा भी, ठीक वैसी ही श्रद्धा,आदर-सत्कार, पवित्रता, और प्रेम, के मनोभाव के साथ करनी होगी, जैसी आमतौर से हमलोग  शिवालय और शिवजी के प्रति रखते हैं।   
इसीलिये महामण्डल के विभिन्न केन्द्रों में जो सेवा कार्य चलाये जा रहे हैं, उनका मूल्यांकन केवल सेवा कार्य की मात्रा, आर्थिक व्यय एवं बाहरी तड़क-भड़क या दिखावा के आधार पर करना उचित नहीं होगा। इस प्रकार के कार्यों का उचित मूल्यांकन तो केवल, महामण्डल के कार्य-कर्ताओं के उद्देश्य, अनुभूति की गहराई- जो उन्हें क्रमशः आध्यात्मिक रूप उन्नत बना देगी, उस कार्य में संलग्न ऐसे कर्मियों की संख्या से ही निर्धारित की जा सकती है। महामण्डल द्वारा निर्धारित पाँच दैनन्दिन अभ्यासों का लगातार अनुशीलन करते जाने से जब कोई व्यक्ति अपने शरीर, मन और हृदय को 'सर्वोच्च उत्कृष्टता' (हाईएस्ट एक्सेलेंस) तक विकसित कर लेता है - तो उसके व्यक्तित्व में इच्छाशक्ति का जो 'ऑल-राउंड डेवलपमेन्ट ऐंड अनफोल्डमेन्ट' बहुमुखी विकास और प्रकाश घटित होता है, उसी को 'सच्ची शिक्षा का सार' कहते हैं। और उसी को सच्चा धर्म या आध्यात्मिकता भी कहते हैं।

इस आध्यात्मिकता का सम्बन्ध हमारी दुनिया से भिन्न कोई दूसरी दुनिया, या केवल मृत्यु के बाद की दुनिया से नहीं होता। बल्कि जिस वास्तविक धर्म (पाँच कार्यों या यम-नियम) का गंभीरता और ईमानदारी के साथ अभ्यास करने पर, प्रत्येक युग में कुछ सत्य के खोजी मनुष्य परम् सत्य तक पहुँचने के कुछ सुपष्ट-मार्गों को आविष्कृत कर ही लेते हैं। आगे चलकर वे सुस्पष्ट और महिमा-मण्डित मार्ग ही परम्परागत 
(ट्रेडिशनल) प्रशिक्षण-पद्धति का रूप धारण कर लेते हैं, (जैसे रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में मनुष्य बनने की प्रशिक्षण पद्धति) उन्हें ही धर्म मार्ग या 'पाथ्स ऑफ़ रिलिजन' कहते हैं। इन्हीं मार्गों को योग की संज्ञा भी दी गयी है। सामान्यतः शास्त्रों में चार महत् योगों का उल्लेख किया गया है, ये हैं- ज्ञान-योग, राज-योग, भक्ति-योग और कर्म-योग।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "धर्म का अर्थ है-  इन चारों में से कोई एक या एकाधिक अथवा सभी योग मार्गों का अवलम्बन करके अपनी अन्तःप्रकृति (आदत-प्रोपेन्सिटीज पर) और बाह्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर लेना।" विवेकानन्द यह भी कहते थे कि जब हमारे भीतर की शक्ति या अन्तःप्रकृति (पाशविक-प्रोपेन्सिटीज) पूर्णतया हमारे नियंत्रण में आ जाती हैं, तो बाह्य प्रकृति (जगत-व्यवहार) के ऊपर नियंत्रण पाना सहज हो जाता है। 
उनके मतानुसार सबसे प्रभावी और उत्तम मार्ग, इन चारो योगों का सुसंगत सामंजस्य कर उन्हें संघटित कर लेने से प्राप्त होता है। जो व्यक्ति आत्मविकास के इस चारो योगों की सम्मिलित प्रणाली को अपनाता है, उसे चारों योगों के अलग-अलग फल एक साथ प्राप्त हो जाते हैं। तथा उस व्यक्ति की इच्छाशक्ति का विकास का हर दिशा में एक साथ साधित हो जाता है। 
[दूसरे शब्दों में लगातार प्रयास (पाँच कार्यों का अभ्यास) के द्वारा जिस इच्छाशक्ति का विकास और प्रकाश वश में लाया जाता है, और वह फलदायक होती है -अर्थात अब वह सत्यार्थी अपना " ईश्वरत्व कभी विस्मृत ही नहीं कर पाता  है"-- और इसी को शिक्षा कहते हैं।]
संक्षेप में कहा जाय तो 'ज्ञानयोग' विवेक-विचार करने का मार्ग है। यह पथ मनुष्य को निरंतर विवेक-प्रयोग करते हुए बुराई से अच्छाई को, अनित्य से नित्य वस्तु को, नश्वर से शाश्वत को पृथक करते रहने का आदेश देता है। और इस प्रकार स्व-विवेक का प्रयोग करके जो वस्तु नश्वर,परिवर्तनशील या मिथ्या प्रतीत होते हों, उनसे अपनी आसक्ति को त्याग कर जो वस्तु अविनाशी और परम सत्य (निरपेक्ष-सत्य) जान पड़ती हो, उसे प्राप्त कर लेने के मार्ग को ज्ञानमार्ग या 'ज्ञानयोग' कहते हैं। 
एक 'राजयोगी' मानसिक शक्ति को बढ़ाने के ऊपर सर्वाधिक जोर देता है। उसके लिये मन ही सब कुछ है, उसका दावा है कि मन की अतिरिक्त चंचलता को शांत कर मन की शक्ति को पूर्णतया आत्म-नियंत्रण में रखने से, सत्य स्वयं को उद्घाटित कर देता है। सत्य का साक्षात्कार करने के लिये यही उसकी साधना का पथ है।
एक 'भक्ति-मार्गी' को यही ठीक लगता है कि ज्ञान-वैराग्य के पचड़े में पड़ने, आसन लगाकर शरीर को कष्ट देने, नाक दबाकर प्राणायाम आदि का अभ्यास करने, या मन-बुद्धि को वशीभूत करने की कोई जरूरत नहीं है।वह कहता है, यदि कोई व्यायाम करना ही हो, तो मैं ह्रदय का व्यायाम करना अधिक पसंद करूँगा। मैं अपने अपने हृदय को, अपने इष्टदेव या प्रेमस्वरूप प्रियतम-"आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस" के लिये पूर्णतः उन्मुक्त कर दूंगा। उसके मन में यह दृढ़विश्वास होता है कि, यहाँ- मेरे 'हृदय' में कोई अविनाशी या परम सत्य वस्तु (ठाकुर देव) अवश्य है, उन्हें चाहे जिस नाम से या जिस भाव से क्यों न पुकारूँ, वे तो प्रेमस्वरूप ही हैं ! 
यदि वहाँ, मेरे हृदय में उस प्रकार के कोई 'प्रेमस्वरूप भगवान' नहीं होते, तो उस हृदय में प्रेम की एक छोटी सी कली भी कैसे अंकुरित हो सकती थी ? यदि वहाँ ऐसी कोई सत्ता- जो प्रेम से भरी हुई हो, और जिसकी प्रकृति (स्वाभाव) ही प्रेम है- नहीं होते; तो मेरे भीतर प्रेम का वह सागर कैसे उमड़ने लगता है, जो किसी अपने-पराये के बंधन द्वारा अवरुद्ध होने से इन्कार कर देता है, जो उन्मुक्त होकर सर्वत्र सबको अपने आलिंगन में बाँध लेना चाहता है ? 
वही परम प्रेमस्वरूप परमात्मा-जो आधुनिक युग में स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण बनकर आये हैं; उन्हीं को कोई अल्ला, कोई भगवान, कोई शिव या काली कहता है। कुछ लोग अपनी कल्पना में उन्हीं को भगवान मानकर स्वर्ग में सिंहासन पर आसीन देखते हैं। "जिस प्रकार एक ही जल को कोई 'वारि' कहता है और कोई 'पानी', कोई 'वाटर' कहता है तो कोई 'एक्वा', उसी प्रकार एक ही सच्चिदानन्द को देश-भेद के अनुसार कोई 'हरि' कहता है तो कोई 'अल्लाह', कोई 'गॉड' कहता है तो कोई 'ब्रह्म'। "  
जो व्यक्ति भक्तियोग का अभ्यास करता है, वह कहता है- " विवेक-विचार के द्वारा, मनोनिग्रह या कठोर तपस्या के द्वारा सत्य का साक्षात्कार करने के बजाय, मैं प्रेम के माध्यम से सत्य की खोज करूँगा। मैं अपने परिसीमित प्रेम को पूर्णतया उनमें ही लीन कर दूँगा-जो प्रेमस्वरूप हैं ! और इस प्रकार मैं सम्पूर्ण विश्व के साथ एकात्मता की अनुभूति कर लूँगा। सम्पूर्ण जगत को अपना प्रेम समर्पित करके, मैं स्वयं ही जगत-स्वरूप बन जाऊँगा ! " 
किन्तु 'कर्म-योगी' को उपरोक्त कोई भी मार्ग पसंद नहीं है। उसके मतानुसार, निरन्तर विवेक-प्रयोग करते रहने या भावुकता के आवेग से अभिभूत होकर हृदय को खोल कर भगवान के आगमन की प्रतीक्षा में बैठे रहना बिल्कुल आवश्यक नहीं है। उसके मत के अनुसार कभी भी अकर्मण्य होकर बैठे रहना सर्वथा अनुचित है। तथ्य यह है कि मानव-मात्र में कर्म करने की शक्ति है, उसमें जो स्वतः संचालित होने (self-start) की क्षमता है उसका एक अलग तात्पर्य है। इस कर्मशक्ति का उपयोग करके हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं, तथा जीवन की परिपूर्णता भी अर्जित कर सकते हैं।
कर्मयोगी जब पूर्णता प्राप्त करने के लिये अपनी पद्धति के अनुसार प्रयास करता रहता है, तब उसे यह उपलब्धि होती है कि सच्चा आनन्द तो केवल तभी प्राप्त होता है, जब वह किसी कार्य को वह अपने आमोद-प्रमोद या अपने भोग-विलास की इच्छा से प्रेरित होकर नहीं कर रहा होता है। भगवान (ठाकुर देव ही अपने कृष्ण-अवतार में) श्रीकृष्ण गीता में कर्म-योग (निष्काम कर्म) के फल का स्मरण कराते हुए कहते हैं- "दूसरों के कल्याण की इच्छा से किया गया निःस्वार्थ कर्म,सतर्क कर्मयोगी को ज्ञान के
राज्य में प्रतिष्ठित करा देता है। "
कर्मयोगी जब अपने क्षुद्र स्वार्थ को त्याग कर, दूसरों के कल्याण के लिये अपना सब कुछ न्योछावर कर देने को तत्पर हो जाता है, तब उसे भी उसी सत्य की अनुभूति होती है, जिस सत्य की अनुभूति एक ज्ञानयोगी को विवेक-प्रयोग (मैं नश्वर शरीर नहीं अविनाशी आत्मा हूँ !) के द्वारा होती है। क्योंकि, वह भी यही अनुभव करता है कि 'वह' और 'दूसरे लोग' भिन्न-भिन्न (अलग) नहीं हैं। अपने इस 'नूतन पहचान' की अनुभूति (यथार्थ स्वरूप की यह अनुभूति) पूर्णतया उसी 'सत्य' के अनुरूप होती है,  जिस सत्य की उपलब्धि किसी प्रेमी (भक्तिमार्गी) को प्रेमास्पद भगवान श्रीरामकृष्ण के प्रति प्रेम रखने से प्राप्त होती है, या जिस सत्य की उपलब्धि किसी राज-योगी को मन पर नियंत्रण कर लेने से प्राप्त होती है। 
स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार सबसे 'आदर्श मनुष्य' वही है जो सत्य की खोज और उसकी उपलब्धि करने के चारों प्रमुख मार्गों का समान रूप से और सही तरीके से प्रयोग करने में समर्थ होता है, और हर सम्भव तरीके से परम सत्य का आस्वादन कर लेता है। श्रीरामकृष्ण देव भी यही कहते थे कि-" किसी खाद्य पदार्थ का स्वाद मुझे केवल एक ही तरीके से क्यों लेना चाहिये ? एक ही मछली को तो कितने ही प्रकार से तैयार किया जा सकता है। "
 महामण्डल के सीमित कार्यक्षेत्र में अपनी सीमित क्षमता के साथ, हमलोग केवल 'रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' के विचारों और निर्देशों के अनुसार, चारों योगों- ज्ञानयोग अर्थात विवेक प्रयोग, राजयोग अर्थात मन पर नियंत्रण,भक्तियोग या  अपने-पराय के बीच भेदरहित प्रेम, और कर्मयोग अर्थात निष्काम कर्म के बीच समन्वय स्थापित करने के लिये सदा प्रयत्नशील रहेंगे। केवल तभी हमारा बहुमुखी और पूर्ण विकास साधित होगा।
 यदि मनुष्य के तीनों प्रमुख अवयव - '3H' के सुसामंजस्यपूर्ण विकास में से एक भी पहलु के दुर्बल रह गया तो हमलोग यथार्थ मनुष्य नहीं बन सकते हैं। जैसे, हो सकता है कि हमलोगों के ह्रदय (Heart) में बिना किसी भेदभाव के सभी देशवासियों के लिये प्रेम अंकुरित हो जाये, हो सकता है कि सहानुभूति भी जाग्रत हो जाये, किन्तु हमलोग यदि शरीर (Hand) को व्यायाम और पौष्टिक आहार के द्वारा सबल स्वस्थ नहीं बनाये हैं, तो हम सेवा करने सक्षम कर्मी नहीं बन सकेंगे। और हम उनके दुःख-कष्टों दूर करने के लिये 'परिश्रम की पराकाष्ठा ' भी नहीं कर पायेंगे! उसी प्रकार यदि हमने मनःसंयोग का अभ्यास करके मन (Head) की एकाग्रता को अर्जित नहीं किया हो, और जब  जब हम सेवा के माध्यम से दूसरों के कष्ट निवारण में संलग्न हों, उस समय यदि मन अशांत हो जाये तो हम पूरे मनोयोग से सेवा भी नहीं कर पायेंगे और अन्ततोगत्वा वह सेवा फलदायी नहीं होगी। 
उसी प्रकार सोचने, बोलने और कुछ भी करने के पहले विवेक-प्रयोग करके अवश्य देख लेना चाहिये कि वह अच्छा है या बुरा, श्रेय है या प्रेय है ?
सही निर्णय या 'विवेक-पूर्ण निर्णय' लेने की शक्ति को उद्दीप्त करने के लिये; या 'विवेक-बत्ती को उकसाते रहने' के लिये पाठचक्र के माध्यम से ज्ञान-मार्ग का संवर्धन करते रहना भी अनिवार्य है। 
किन्तु पाठचक्र में होने वाली ज्ञान-चर्चा इतनी विशद या दुरूह भी नहीं हो जानी चाहिये, हमलोग किसी सच्चे वेदान्ती के जैसा विवेक-प्रयोग की पराकाष्ठा करते हुए यह तर्क द्वारा यह सिद्ध करने की चेष्टा करने लगें कि इस दृष्टि से तो 'गंगाजल और नाले के जल' में भी कोई अंतर नहीं है! इस तरह की चर्चा करने की कोई जरूरत नहीं है। हमलोग अपने विवेक-प्रयोग की क्षमता को सरल तरीके से भी विकसित करने का प्रयास कर सकते हैं। 
'रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा ' में विवेक-प्रयोग की क्षमता को बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है- 'स्वाध्याय' अर्थात श्रीरामकृष्ण देव, स्वामी विवेकानन्द और माँ श्रीश्री सारदा देवी के जीवन और शिक्षाओं  का अध्यन करना तथा उन पर चिंतन-मनन करना। उनके जीवन और सन्देश पर चर्चा करते रहने से विवेक-प्रयोग करने की शक्ति तथा सही और गलत, सत्य और मिथ्या, अच्छा और बुरा के बीच निर्णय करने की क्षमता स्वतः जाग्रत हो जाती है। यदि सर्वमंगल की प्रार्थना और मनःसंयोग का नियमित अभ्यास हम नहीं करें तो वह प्रेम जो हमारे हृदय में उमड़ता है कभी क्रियाशीलता में रूपान्तरित नहीं हो सकता, क्योंकि मानसिक संतुलन और प्रशांति के अभाव में हमलोग अक्सर गलत निर्णय कर बैठते हैं ।


और अपने हृदय को विकसित करने के लिए दूसरों के दुःख-कष्ट को अपने हृदय में अनुभव करने की क्षमता को बढ़ाना चाहिये, अर्थात हृदय की सहानुभूति शक्ति को प्रदीप्त करना आवश्यक है। इसके लिये अपने हृदय की भक्ति-भावना का संवर्धन  करना जरुरी है- ' व्हिच इज नथिंग बट लव एक्सटेंडेड यूनिवर्सली' - जो कि अपने प्रेम के सीमित दायरे को सर्वत्र, सब दिशाओं में, सम्पूर्ण मानवता के लिये प्रसारित कर लेने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हृदय के प्रसार के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये लगातार प्रयत्न करते रहना आवश्यक है। 
तथा हृदय को विकसित करने में भी वही सुझाव -'स्वाध्याय' सब से अधिक कारगर सिद्ध होगा, जो विवेक-प्रयोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिये दिया गया था। ठाकुर, माँ और स्वामी जी के जीवन और शिक्षाओं पर चिंतन-मनन करने से विवेक-प्रयोग करने की क्षमता में वृद्धि होने के साथ -साथ, हृदय को विकसित करने में भी सहायता प्राप्त होती है। होली ट्रिनिटी का अनुसरण करने का अर्थ है, जो "ब्रह्म पंचभूतों के फन्दे में पड़कर रो रहे हैं"  उनके वास्तविक दुःख के कारण को खोज कर उसे दूर हटाने के लिये उनकी सच्ची सेवा करना। 
जब कोई व्यक्ति अपने देशवासियों के यथार्थ कल्याण में अपने जीवन को समर्पित कर देने की भावना से उद्बुद्ध होकर, 'हृदय और बुद्धि' (हार्ट एंड इंटेलेक्ट-भक्तियोग और ज्ञानयोग ), 'मन की शक्ति और व्यावहारिक कार्य-क्षमता' (राजयोग और कर्मयोग); चारों योगों के सुसमन्वित संयोजन द्वारा स्वयं को सज्जित करके, सामाज-सेवा करने को उठ खड़ा होता है, तो उसके द्वारा की गयी समाज-सेवा की गुणवत्ता, साधारण समाज-सेवियों द्वारा की गयी समाज-सेवा से थोड़ी अलग हटकर तो होती ही है!
महामण्डल विगत ४९ वर्षों से अपने विभिन्न केन्द्रों (३१५ से अधिक) के द्वारा इसी प्रकार के सुयोग्य, स्वस्थ, बलवान, अन्तर्विचारशील और सहानुभूति सम्पन्न मनुष्यों का निर्माण करने के कार्य में लगा हुआ है। स्वामी विवेकानन्द के जीवनप्रद और शक्तिदायी शिक्षाओं को, भारत के विभिन्न गाँवों और शहरों में स्थापित महामण्डल के प्रत्येक केन्द्र, अलग अलग और परस्पर मिल-जुल कर, व्यवहारिक रूप देने के कार्य में जी-जान से लगे हुए हैं। 
[और प्रतिवर्ष इनकी संख्या में धीमी लेकिन स्थिर गति से बढ़ोत्तरी भी होती जा रही है। और सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि महामण्डल के केन्द्रीय मुख्यालय ने स्वयं किसी गाँव या कस्बे में जाकर इन केन्द्रों की  बुनियाद नहीं डाली है, बल्कि जो युवा महामण्डल द्वारा आयोजित  छह दिवसीय वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में, या राज्य-स्तरीय शिविरों में भाग लेते हैं, वे लौटने के बाद स्वतः प्रेरित होकर अपने अपने गांवों या शहरों में महामण्डल की शाखा स्थापित करते हैं। और इस कार्य में महामण्डल का केन्द्रीय मुख्यालय उन्हें हर सम्भव  की सहायता प्रदान करता है, तथा उचित मार्गदर्शन भी करता है। ] 
महामण्डल की दृष्टि में,चारों योगों को समन्वित करके- मानव को उसकी पशु-प्रकृति (एनिमल-प्रोपेनसिटी) से ऊँचा उठाने (को ट्रैन्सेन्ड करने), तथा पूर्ण मनुष्यत्व अर्जित करने के मार्ग पर छलाँग लगाते हुए आगे बढ़ने का यही (एकमात्र??) उपाय है।
यही वह मार्ग है जिस पर चलते हुए महामण्डल - साधारण प्रचलित अर्थों में धार्मिक, सांस्कृतिक, समाज-सेवी या शैक्षणिक संस्थान बने बिना, उन्नततर मनुष्यों का उन्नततर समाज बनाने का दृढ़ संकल्प लेकर, सच्चा धर्म, सच्ची संस्कृति, सच्चा समाज-कल्याण और सच्ची शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कार्य में, विगत ४९ वर्षों से लगा हुआ है। 'रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' में आधारित यही सच्ची शिक्षा और सच्चा धर्म है जिसे 'एक नया युवा आन्दोलन' का रूप देकर सम्पूर्ण भारत में फैला देना अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल का कार्य है! स्वामी विवेकानन्द कहते हैं,"हम मनुष्यजाति को उस स्थान पर पहुँचाना चाहते हैं जहाँ न वेद है,न बाइबिल है,न कुरान है; परन्तु वेद, बाइबिल और कुरान के समन्वय से ही ऐसा हो सकता है। मनुष्यजाति को यह शिक्षा देनी चाहिये कि सब धर्म उस एकमेवाद्वितीय धर्म के भिन्न भिन्न रूप हैं, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति उन धर्मों में से अपना मनोनुकूल मार्ग चुन सकता है। " 



=============================

[*इलिप्सिस (ellipsis) = पद-न्यूनता : An ellipsis of "If the mountain won't come to Muhammad then Muhammad must go to the mountain." --' If one cannot get one's own way, one must bow to the inevitable.'coined by Francis Bacon, perhaps from a Turkish proverb. Mahomet made the people believe that he would call a hill to him, and from the top of it offer up his prayers, for the observers of his law. The people assembled; Mahomet called the hill to come to him, again and again; and when the hill stood still, he was never a whit abashed, but said, If the hill will not come to Mahomet, Mahomet will go to the hill.]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें