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सोमवार, 15 अगस्त 2016

'आध्यात्मिकता ही लॉ ऑफ सक्सेस है ' 'वर्क मोर देन पेड फॉर ' [एक नया युवा आन्दोलन -18.What is Wanted ]

'देश के युवाओं से क्या अपेक्षा की जाती है ? '
इस 'बात' को उच्च स्वर में और पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है- कि महामण्डल का उद्देश्य और कार्यक्रम' स्वयं स्वामी विवेकानन्द के द्वारा ही निर्धारित किया गया है। ['श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द व्यावहारिक वेदान्त परम्परा या अचिन्त्य-भेदाभेद' में आधारित] महामण्डल का यह 'नया युवा आन्दोलन' - किसी एक चतुरसुजान व्यक्ति या कुछ अत्यन्त बुद्धिमान व्यक्तियों की कल्पना से उपजा हुआ संगठन नहीं है ! महामण्डल केवल एक ऐसी कार्यकारी युक्ति (वर्किंग पॉलिसी) है जो न केवल भारत की पतनोन्मुखी गति को रोकने, बल्कि उसे सम्यक रूप से पुनरुज्जीवित करने में सक्षम- स्वामी विवेकानन्द के विचारों को धरातल पर उतारने के कार्य में लगा हुआ है।  
स्वामी विवेकानन्द ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था- " लाखों स्त्री-पुरुष पवित्रता के अग्निमन्त्र से दीक्षित होकर, भगवान (श्रीरामकृष्ण परमहंस) के प्रति अटल विश्वास से शक्तिमान बनकर और गरीबों, पतितों तथा पददलितों के प्रति सहानुभूति से सिंह के समान साहसी बनकर, इस सम्पूर्ण भारत देश के एक छोर से दूसरे छोर तक सर्वत्र उद्धार के सन्देश, सेवा के सन्देश, सामाजिक उत्थान के सन्देश और समानता के सन्देश का प्रचार करते हुए विचरण करेंगे।"  
इसीलिये स्वामी जी की यह तीव्र इच्छा (बर्निग डिज़ायर) थी,  कि भारत के सभी युवा - गहरी निद्रा (मोह-निद्रा) को त्यागकर - उठ खड़े हों ! वैसे प्रत्येक विचारों को जो उन्हें आत्मश्रद्धा से नीचे गिरा देती हो, वैसे कार्य, जिन्हें करने के बाद उनके मन में आलस्य, निराशा और अवसाद से भर जाता हो, जो उनके शरीर के अंग-प्रत्यंग को शक्ति-विहीन बना देती है, जो उनके कद को छोटा और आत्मा को उत्साह-हीन कर देती है - वैसे समस्त विचारों और कार्यों को पीछे छोड़कर, पूर्ण मनुष्यत्व (पवित्रता) अर्जित करने की दिशा में आगे बढे! 
हमारे देश में बहुत लम्बे समय से, विशेषकर विगत लगभग एक हजार वर्षों से ऐसा (श्रद्धा का ह्रास) होता ही चला आ रहा था। तब भारत के युवाओं को जागरण-मन्त्र सुनाकर, उन्हें अनुप्रेरित करने, उनकी आत्मा में (शक्तिदायी विचारों की) अमृत बूँदों को टपकाने, मन में  नयी चेतना को बैठा देने और राष्ट्रिय जीवन में एक नई शक्ति संचारित करने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानन्द को (श्रीठाकुर को विवेकानन्द के साथ ?) आविर्भूत होना पड़ा था। ताकि हमारी मातृभूमि एक बार फिर - श्रेष्ठता की उस ऊँचाई को छू ले, जिसके चकाचौंध कर देने वाली रौशनी के आगे इसके अतीत का गौरवशाली इतिहास भी मंद टिमटिमाते तारे जैसा प्रतीत होंगे। 
ऐसे महिमामण्डित भारत को बनते हुए देखना स्वामी विवेकानन्द का स्वप्न था। लेकिन यह सपना, स्वामी विवेकानन्द के लिये जागते हुए -खुली आँखों से स्वप्न देखने जैसा था; उन स्वप्नों की तरह नहीं था जैसा हमलोग अपनी नींद में देखा करते हैं। स्वामी विवेकानन्द (भारत को विश्वगुरु के आसन पर बैठाने के प्रति) हमेशा जागते ही रहते थे। वे कभी सोये नहीं थे। यह सपना ( vivid dream) बिल्कुल जीवन्त और सुस्पष्ट था, और इसीलिये, वास्तव में यह सपना नहीं था -बल्कि एक 'विजन' था -एक दूरदर्शिता थी। स्वामी विवेकानन्द अपनी ऋषि-दृष्टि से पूर्वकालिक इतिहास को, बनते हुए इतिहास को और उस इतिहास को भी देखने में सक्षम थे - जो अभी भविष्य के गर्भ में है, जिसे बनना अभी बाकी है! 
जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था, वेअभी से १५०० वर्ष बाद घटित होते हुए इतिहास को भी (एकाग्रता की शक्ति से फ़ास्ट-फॉरवर्ड करके) देख सकने में सक्षम थे! सम्पूर्ण मानवजाति को पूर्ण मनुष्यत्व प्राप्ति के पथ पर अग्रसर होते हुए देख सकते थे।  और उन्होंने देखा था कि भारत विश्व मंच पर श्रेष्ठ आसान प्राप्त करने के लिये उन्नत हो रहा है। और ये भारत के युवा ही हैं, जो उसे फिर से विश्वगुरु के आसन तक उठा रहे हैं। उन्होंने कहा था - " मेरी यह जन्म-भूमि अपने यशोपुरित लक्ष्य- " पशु-मानव को देव-मानव में रूपांतरित करने" की सिद्धि  के लिये अपने सहज महिमामय पदक्षेप के साथ निरंतर प्रगतिशील है !"
जिस प्रकार, छोटी-छोटी गिलहरीयों ने भी 'मुख्य भूमि' से श्रीलंका तक पहुँचने के लिये पुल का निर्माण करने में श्रीरामचन्द्र जी की सहायता की थी। ठीक उसी प्रकार महामण्डल को भी, " भारत के अस्तित्व का एकमात्र हेतु, उसके यशोपुरित लक्ष्य, 'पशु-मानव को देव-मानव में रूपान्तरित करने', या मानवजाति का आध्यात्मीकरण करने के कार्य' -  में थोड़ी सी सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से आविर्भूत होना पड़ा है !" (दी महामण्डल केम इन्टु बीइंग टु डू अ लिटिल लाइक दी/स्क्वरिल्स हू हेलप्ड श्री रामचन्द्र टू बिल्ड दी ब्रिज टू लंका फ्रॉम दी मेन लैण्ड।)

जैसा स्वामी विवेकानन्द कहते थे, " हम भारत के (अस्सी करोड़) युवा अत्यन्त विनम्र (हम्बल) लोग हैं; ' वी आर नोबडीज़ '- हम बड़े नाचीज़ लोग हैं। किन्तु आज हम नाचीज़-लोग ही विश्व की सबसे अधिक शक्ति-शाली समूह है ! " क्योंकि हम अपनी अन्तर्निहित शक्ति में विश्वास करते हैं, हमलोग अपनी अनन्त संभावनाओं में विश्वास करते हैं, और हम उस आतंरिक टेक्नॉलजी (मनःसंयोग) को भी जानते हैं कि कैसे सभी प्रकार के भय (मृत्यु-भय) पर, विजय प्राप्त किया जा सकता है ! हमलोग चरित्र-निर्माण की उस प्रणाली को भी जानते हैं कि मानवजाति के युवा नेता स्वामी विवेकानन्द के आह्वान पर (पवित्र-मनुष्य बनने के लिए) कैसे आगे बढ़ा जाता है? और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये कैसे- (पाँच अभ्यासों का पालन से) तेजी से कूच किया जाता है। 
स्वामी विवेकानन्द चाहते थे कि भारत के युवा मनुष्य बन जायें, और हम भारत के युवा 'मनुष्य' बनना चाहते हैं। [हम युवा लोग स्वयं पवित्रता के अग्निमन्त्र में दीक्षित - अर्थात रामकृष्ण-विवेकानन्द व्यावहारिक-वेदान्त परम्परा में आधारित महामण्डल के पाँच अभ्यासों में प्रशिक्षित होकर, पूरे भारत में उस प्रशिक्षण पद्धति का प्रचार-प्रसार करके- वी वांट दी रिजेनरेशनऑफ़ इंडिया.] यदि हमलोग भी भारतवर्ष को पुनरुज्जीवित करना चाहते हैं। तो हमें उन समस्त कारणों को अवश्य दूर करना चाहिये, जो हमारे वर्तमान अधःपतन के लिये उत्तरदायी है। और वे कारण क्या हैं ? 
कई कारणों में से एक  है, 'गंभीरता का आभाव '। स्वामी जी कहते हैं, "हमलोगों में आजकल यह प्रवृत्ति घर कर गयी है कि हमलोग हर बात को मजाक में उड़ा देना चाहते हैं, और किसी भी बात के महत्व को समझना नहीं चाहते।" हम लोग उस प्रत्येक सुझाव को हम बड़े हल्के ढंग से लेते हैं, जिसके आधार पर हमारे राष्ट्र का भविष्य निर्मित होने वाला है। हमलोग अपने व्यवहार, शिक्षा और विचारों को परिष्कृत करने जैसी प्रत्येक अन्य जरुरी बातों को भी हल्के ढंग से ही लेते हैं। यही वह मुख्य या पहला कारण है जिसने देश को पतनोन्मुख बना दिया है।इसलिये हमे अब थोड़ी गंभीरता और विचारशीलता का परिचय देना चाहिये। किन्तु गंभीर होने का अर्थ यह नहीं है कि हमें हर समय अपना मुखड़ा लटकाये रखना होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -' हर समय तुमलोग अपने चेहरे पर उदासी की चादर मत चढ़ाये रहो, चेहरे को वैसा (बिप्पत गोप जैसा) खिन्न मत बनाये रखो, क्यों ? क्योंकि वास्तव में तुम कभी निन्दनीय या अधम हो ही नहीं सकते ! तुम में से प्रत्येक एक बड़े दिग्गज हो, बलवान हो, तुम तो 'हीरो' हो, जन-नायक हो, तुम 'अभिः' हो भय-मुक्त हो!
तुम दूसरों के कल्याण के लिये सब कुछ का त्याग कर सकते हो। तुम लोगों की सेवा कर सकते हो। तुम अपने इन्द्रियों की तृष्णा (longings) पर विजय प्राप्त कर सकते हो। तुम अपने शरीर और मन की चहारदीवारी के परे जा सकते हो। यही तो है आध्यात्मिकता ! स्वामी विवेकानन्द यही आध्यात्मिकता भारतवर्ष के सभी युवाओं में विकसित होता हुआ देखना चाहते थे। क्योंकि केवल आध्यात्मिक व्यक्ति ही भारत का कल्याण करने के लिये सुयोग्य और तत्पर हो सकते हैं (तथाकथित धार्मिक नहीं)। इसीलिये तो उन्होंने कहा था, 'सबसे पहले इस देश को आध्यात्मिक विचारों से आप्लावित कर दो !' किन्तु (स्वाधीनता प्राप्ति के बाद) हमलोगों ने, सबसे पहले ठीक इसका उल्टा किया है। 
हमलोगों ने आध्यात्मिक सिद्धान्तों (चार महावाक्यों) और आध्यात्मिकता विकसित करने की प्रणाली-(चरित्रनिर्माण की पद्धति) को ही अलमारी में बन्द करके उस पर ताला लगा दिया है।[ भारत को आध्यात्मिक विचारों से आप्लावित करने के लिये चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने की योजना बनाने के बदले] हमलोगों ने समाज के कल्याण के लिये बहुत सारे योजनाओं और कार्य-क्रमों (फ़ूड-सेक्युरिटी बिल और मनरेगा आदि ) को तैयार किया है। और हमें अपने इन सामाजिक कल्याण की योजनाओं और कार्यक्रमों पर बहुत गर्व भी है, इसीलिए हम विगत सत्तर वर्षों से वैसा करते आ रहे हैं। हम इन योजनाओं पर सैकड़ों और हजारों करोड़ रूपये प्रतिवर्ष खर्च करते हैं, फिर भी हम देखते हैं कि उसका लाभ भारत के करोड़ों निर्धन-गरीबों और दबे-कुचले आबादी तक नहीं पहुँच पाता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व० राजीव गाँधी ने पार्लियामेन्ट के अंदर और बाहर भी कहा था कि सरकारी खजाने से यदि १०० रुपया चलता है, तो उसका मात्र १५ % ही जरुरतमंदों तक पहुँच पाता है । वे भूख से मर जाते हैं,या उन्हें असह्य तकलीफ झेलनी पड़ती है। हमें धोखा दिया जा रहा है, और हम लोगों ने जो स्वयं को शिक्षित तथा बुद्धिमान समझते हैं, उन्हें धोखा देने की अनुमति दे रखी है। 
क्योंकि हम देश की समस्याओं को उसके सही कारणों के परिप्रेक्ष्य में रख कर देखना नहीं जानते। हमें तो इसका एहसास भी नहीं होता, कि जिन आपदाओं को, दुःख-कष्टों को हम झेल रहे हैं, वह हमारी ही लापरवाही, हमलोगों की गंभीरता में कमी, जनसामान्य के लिये हमारे प्रेम में कमी, सर्वसाधारण के लिये हमारी त्याग की भावना में कमी, हमारे चरित्र में सेवापरायणता आदि के गुणों का अभाव, एवं हमारी घोर स्वार्थपरता के कारण है । सीधे शब्दों में कहें, तो हम लोग अपने मन, शरीर और इन्द्रियों के गुलाम बन गए हैं।स्वामी विवेकानन्द ने हमलोगों को इस निम्न स्तर की तृष्णाओं से ऊपर उठ जाने का निर्देश दिया है। और केवल आध्यात्मिकता ही इन सबसे ऊपर उठने का उपाय है। वे चाहते थे कि इस आध्यात्मिकता को भारतवर्ष में फिर से पुनरुज्जीवित कर दिया जाय। वे चाहते थे कि हम अपने दैनन्दिन जीवन में इस आध्यात्मिकता का अभ्यास करें। वे गीता-उपनिषद के वेदान्त परम्परा से प्राप्त  महान विचारों को समाज के प्रत्येक मनुष्य तक, एक हलवाहे तक, गृहस्थों के घर तक, शिक्षकों, श्रमिकों और वकीलों तक पहुँचा देना चाहते थे। यही उनका उद्देश्य था और महामण्डल उसी उद्देश्य को कार्यरूप देने के क्षेत्र में कार्य करना चाहता है। 
यह एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी का है, एक बहुत बड़ा कार्य है, और हमें इस कार्य को अवश्य पूरा करना है।इस कार्य को पूरा करने के लिये भारत के सभी युवाओं को कमर कस कर खड़े हो जाना चाहिये। इस जिम्मेवारी को पूरा करने में और कौन समर्थ हो सकता है ? बड़े-बुजुर्ग लोग, दुर्बल और कमजोर लोग भी इस कार्य को अंजाम नहीं दे सकते। या जिनका मन अभी तक सोया हुआ है, वे भी इस कार्य को नहीं कर सकते। भारत को पुनरुज्जीवित करने के इस महान कार्य को सिर्फ वैसे भारतीय -युवा ही पूर्ण कर सकते हैं, जिनके पास बलवान शरीर, उन्नत मन और एक विशाल हृदय है, जो ऊर्जा से भरपूर हैं, किन्तु साथ-साथ अनुशासित भी हैं। और जो गंभीर प्रेम कर सकते हैं (प्रेम के गहरे अर्थ में) -प्रेमास्पद के लिये त्याग और बलिदान को समझने वाले प्रेमी ही कर सकते हैं। युवाओं के करने योग्य यही सबसे महान कार्य है ! (इसीलिये इस कार्य को पूरा करने की जिम्मेवारी भारत के ८० करोड़ युवाओं के ऊपर है)  
 किसी भी कार्य को करने के - दो तरीके हैं। एक है- किसी कार्य को बड़े ताम-झाम के साथ आडम्बर-पूर्ण तरीके से, बड़ी-बड़ी योजनाओं के साथ धन की एक बहुत बड़ी राशि आदि खर्च करके नाम-यश पाने की इच्छा से करना। और दूसरा तरीका है किसी कार्य को इतने सादगीपूर्ण तरीके से करना कि, शायद उस कार्य की तरफ प्रिंट-मिडिया और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया की दृष्टि भी न जा सके, कहीं से कोई शाबासी या और कुछ पाने की अपेक्षा रखे बिना करना। हमलोग किसी बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के कार्य को, अपने दैनन्दिन जीवन के कार्यों को करते हुए, किसी छोटे संगठन के माध्यम से बहुत सादगी के साथ भी सम्पन्न कर सकते हैं । और महामण्डल की कार्य-पद्धति भी यही है। भारत को पुनरुज्जीवित करने में समर्थ स्वामी विवेकानन्द के विचारों को अपने व्यावहारिक जीवन के अभ्यास में रूपान्तरित कर लेना ही महामण्डल का उद्देश्य है। 
महामण्डल अपने लिए नाम-यश पाने की कामना नहीं करता, जमीन-जायदाद भी अर्जित नहीं करना चाहता, किसी के भी द्वारा सराहे जाने या शाबाशी प्राप्त करने की कामना नहीं करता, और न चन्दा मांग कर एक बहुत बड़ा बैंक बैलेन्स खड़ा करना चाहता है । हाँ, किन्तु महामण्डल में केवल एक विशेषता (merit) है, वह है- हमारे कुछ युवा कर्मियों के दृढ़ संकल्पों का संचित भण्डार। वे कोई गणमान्य व्यक्ति नहीं हैं, उनके पास बहुत बड़ी बड़ी डिग्रियाँ भी नहीं हैं, वास्तव में वे बिल्कुल नाचीज (मामूली आदमी) हैं । किन्तु उनके पास सिर्फ एक दृढ़ संकल्प है, उनके मन में अदम्य इच्छा और दृढ़ विश्वास है कि - " हमलोग स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यवहार और आचरण में रूपान्तरित करके ही दम लेंगे; हमलोग पूरे देश का सम्पूर्ण रूप से पुनरुत्थान करेंगे! [ " वी विल ट्रांसलेट स्वामी विवेकानन्दा'ज आइडियाज इन्टु प्रैक्टिस; वी विल रीजेनरेट दी होल नेशन थौरोली " ]
हम लोग पहले स्वयं महामण्डल द्वारा निर्देशित पाँच दैन्दिन्दिन अभ्यासों का पालन करके पवित्र (pure=
विचार, वाणी और कर्म से यथासम्भव पवित्र) बनेंगे, हमारी समस्त कोशिशें पवित्र बनने  के लिये होंगी, हमारी कल्पनाओं में केवल पवित्र विचारों को ही स्थान मिलेगा, हमारी योजनायें पवित्र होंगी, हमारा उद्देश्य पवित्र होगा, हमारी कार्य-पद्धति पवित्र होगी। इसी 'पवित्रता' (ब्रह्मचर्य) को अपना सम्बल बना कर स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को व्यवहार में रूपान्तरित करके सम्पूर्ण भारतवर्ष को पुनरुज्जीवित करेंगे !
इस महान कार्य को हमलोग करेंगे कैसे? 
इस कार्य को पूरा करने के लिये हमें किसी बड़ी सरकारी-योजना के इंतजार में बैठे नहीं रहना है । और
न अपने सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिये हमें कोई विशाल 'प्रचार-तंत्र' ही खड़ा करना है, इन दिनों
जिसके ऊपर लोग अधिक यकीन करते हैं, और झट से आकर्षित हो जाते हैं । बल्कि,यह कार्य अपने देशवासियों के प्रति अटूट प्रेम, आदर्श और उद्देश्य के प्रति दृढ़ विश्वास और उसे कार्य में रूपायित करने का दृढ़-संकल्प के द्वारा ही सम्पन्न हो सकता है। और महामण्डल विगत ४९ वर्षों से यही करने का प्रयास कर रहा है।  
'हमारा यह महान देश कई प्रकार के विषयों में अधःपतन की राह पर है।' 'ऑवर ग्रेट कंट्री इज ऑन दी रोड टु डिजेनरेशन इन वेरियस रेस्पेक्ट्स'। क्या हम लोग इसको सहन कर सकते हैं ? क्या भारत के युवा ऐसा होने दे सकते हैं ? हम इस अधोपतन के चक्र को रोक सकते हैं, और कुछ ऐसा कर सकते हैं कि इस चक्र की गति उल्टी दिशा में- अधोपतन की दिशा से पुनरुत्थान की दिशा में घूमने लगे। ऐसा हमलोग किस प्रकार कर सकते हैं ?
इस कार्य को हमलोग केवल अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गठित करके,केवल अपने चरित्र का निर्माण करके-ही कर सकते हैं ! क्योंकि राष्ट्र का उत्थान केवल चरित्रवान मनुष्यों के द्वारा ही हो सकता है। यदि हमारे भीतर चरित्र की शक्ति (पॉवर ऑफ़ कैरेक्टर) है, तो हमारी जो भी इच्छा हो, उसे हम अवश्य प्राप्त कर सकते हैं। (जब निरन्तर विवेक-प्रयोग करते हुए हमलोग परम् सत्य का दर्शन प्राप्त कर लेते हैं, और) 'चरित्र' निर्मित हो जाता है, और उससे जो शक्ति प्राप्त होती वह क्या है ? 
चारित्रिक-शक्ति वह दृढ़ इच्छा-शक्ति है, जो हमें  पशु-मानव के जैसा केवल अपने क्षुद्र-स्वार्थ को पूरा करने के लोभ-लालच से वशीभूत होकर कर्म करने की क्षमता नहीं, 'नॉट दी कपैसिटी टु विल फॉर अ सेल्फिश एन्ड,' बल्कि जो हमें अपने यथार्थ स्वरूप को भूलने नहीं देती, और हर परिस्थिति में अपने 'सत्य-संकल्प' में अटल रहने की क्षमता (हरिश्चन्द्रत्व) - 'दी कपैसिटी टु वील राइट्ली'- प्रदान करती है! "इट इज टु विल फॉर दी गुड ऑफ़ ऑल !" - चारित्रिक-शक्ति वह शक्ति है, जो हमें संसार के सभी मनुष्यों की मंगल-कामना में विभोर रखती है।  
 जब किसी मनुष्य को ऐसी क्षमता प्राप्त हो जाती है, उसी को चरित्रवान मनुष्य (शिक्षित या दीक्षित)कहा जा सकता है ![जिस संयम (पाँच -अभ्यास) के द्वारा मनुष्य अपनी इच्छशक्ति के प्रवाह और विकास को वश में लाया जाता है, और वह फलदायक होता है -अर्थात जो इच्छाशक्ति हमें हमारा ईश्वरत्व कभी भूलने ही नहीं दे, उस सर्वसमर्थ इच्छाशक्ति से सम्पन्न मनुष्य ही शिक्षित, दीक्षित या प्रशिक्षित मनुष्य कहलाता है!] चरित्र (या हरिश्चंद्रत्व ?) वह वस्तु है जो हमें इन्द्रिय विषयों का सुख-भोग करने की इच्छा, इन्द्रिय-तुष्टिकरण की इच्छा और  कामना-वासना के आवेग पर विजय प्राप्त के लेने की क्षमता प्रदान करती है। यह है चरित्र!
दूसरों के कल्याण के लिये स्वयं कष्ट उठाने की क्षमता को चरित्र कहते हैं । 'कैरेक्टर इज दी कैपेसिटी टू सफर फॉर दी गुड ऑफ़ अदर्स !' सभी प्रकार की विपत्तियों (की जड़ अहं) पर विजय प्राप्त कर लेने की क्षमता को चरित्र कहते हैं! 'कैरेक्टर इज दी कैपेसिटी टू ओवरकम ऑल मिज़री'। 
ये कुछ ऐसी क्षमतायें हैं, जिन्हें  एक साथ मिलाकर किसी व्यक्ति के चरित्र के रूप में जाना जाता है,और जो उसके आचार-व्यवहार से परिलक्षित होता है। चरित्रवान मनुष्य बनने का यही अर्थ होता है। जब तक हम स्वयं इस तरह के चरित्रवान-मनुष्य नहीं बन जाते, तब तक क्या हम किसी भी समस्या को हल कर सकते हैं? क्या हम सचमुच दूसरों की मदद कर सकते हैं, क्या हम सचमुच समाज की सेवा कर सकते हैं ? नहीं, हम नहीं कर सकते। इसीलिये यदि हमलोग केवल राष्ट्र के कल्याण के लिये जीना चाहते हों, उसे पुनरुज्जीवित के लिये कार्य करना चाहते हों, तो सबसे पहले हमें अपने चरित्र का निर्माण अवश्य करना चाहिये।
यदि हम अपना सुंदर चरित्र गढ़े बिना ही समाज-सेवा करने, गरीबों और अशिक्षितों की मदद करने जायेंगे, तो हमारे सभी प्रयास अन्ततोगत्वा व्यर्थ सिद्ध होंगे। क्योंकि 'चरित्र-हीन मनुष्य' यदि समाज-सेवा करेंगे 
तो उसका परिणाम क्या होगा ? हो सकता है कि जिन अभावग्रस्त लोगों की सेवा करने वे गए हैं, उनका अभाव कुछ समय के लिए दूर हो जाये, या कुछ दिनों के लिये उनकी क्षुधा शांत हो जाये, या हो सकता है कि उस गाँव के लोग समाचार-पत्र और पुस्तक पढ़ने में सक्षम हो जायें, या सामान्य पत्राचार करना भी सीख लें, किन्तु अन्ततः उन्हीं चरित्रहीन समाज-सेवकों की भाँति- वे लोग स्वयं भी 'चरित्र-हीन मनुष्य' ही बने रहेंगे। अपनी पशुता को हटाये बिना और स्वयं उन्नततर मनुष्य बने बिना, यदि किसी अन्य गाँव में जाकर लोकसेवा के कार्य -टीचर आदि कार्य करेंगे, तो हो सकता है कि वे इस प्रकार के कामों में लिप्त हो जायें, जो समाज की भलाई के अनुकूल तो नहीं ही हों, बल्कि अशोभनीय भी हों। वे वहाँ ऐसी चीजों को उत्पन्न कर देंगे, जो समाज के लिए हानिकारक होगा।
राज्य-कोष में जमा धन तो जनसाधारण के गाढ़े पसीने की कमाई है, किन्तु तथाकथित 'कैरेक्टर सर्टिफिकेट' दिखलाकर 'ग्राम-सेवक' के पद पर कार्यरत ब्लॉक् कर्मचारी कहलाने को तो 'पब्लिक सर्वेन्ट' हैं, किन्तु स्वयं को 'राज कर्मचारी' कहते हैं और जनता के कोष को सुखाने में लगे रहते हैं। रिश्वतखोरी बड़े पैमाने पर चल रही है। अधिकांश लोग यही  चाहते हैं, कि उसे काम कम करना पड़े, उसके ऊपर कोई उत्तरदायित्व न हो पर वेतन के आलावा ऊपरी कमाई इतनी अधिक हो कि वह आराम से सुख-भोग करता रहे। उच्च पदासीन लोग हों, या वयोवृद्ध लोगों के उदहारण  देखें, घर के लोगों को देखें या बड़े-बड़े संस्थानों में काम करने वाले लोगों को देखें,भले ही वे जनसंवाद-माध्यम (मास मीडिया) के कर्मचारी हों, कि साहित्य या शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हों सभी लोग,अपनी अपनी निम्न वासनाओं को ही संतुष्ट करने में व्यस्त दिखाई देते हैं। समाज के नामी-गिरामी कहे जाने वाले व्यक्तियों के जीवन में लालच और लोभ को बढ़ता देखकर किशोरों, युवाओं में भी स्वार्थपरता की भावना बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति केवल हमारे देश में ही नहीं है। हर जगह की स्थिति ऐसी ही है।
लेकिन, इस संधि-वेला में जब हमें अवश्यमेव एक उन्नत-राष्ट्र बनना है (इक्कीसवीं सदी में-जब भारत विश्व का केन्द्र बनने जा रहा है), हमलोग इस सर्वनाशी भोग-विलास को सहन नहीं कर सकते। जन-साधारण के चिरकालीन अज्ञान और दरिद्रता दूर करने के लिये, हमें भारत का पुनर्निर्माण युवा चरित्र-निर्माण की चट्टानी बुनियाद पर ही करना पड़ेगा। हजार वर्ष की गुलामी के कारण, हमलोगों ने अपनी आत्मश्रद्धा को ही खो दिया है, इसीलिये अभी हमारे पास सही ढंग से सोच-विचार करने या विवेक-प्रयोग करने की क्षमता नहीं है - 'वी डू नॉट हैव दी कैपेसिटी फॉर राईट थिंकिंग'! हमने मनुष्य की गरिमा -अर्थात विवेक-प्रयोग की  क्षमता को ही खो दिया है। इसी देवदुर्लभ मानवक्षमता - ' श्रद्धा और विवेक ' को खोकर हमलोग एक भेड़ों का झुण्ड -'हर्ड ऑफ़ शीप' बनकर में-में करते हुए घूम रहे हैं, जिसका उल्लेख स्वामी विवेकानन्द ने अपनी सिंह -शावक की कथा में बार-बार किया था। 
बेशर्म लोग (Unscrupulous, अन्स्क्रूप्यूलस या निर्लज्ज - चारा-चोर, २जी-३जी चोर नेता और विजय माल्या  जैसे तथा- कथित बड़े-बड़े लोग) बड़ी चालाकी से बैंक-रॉबरी कर रहे हैं, और कम विशेषाधिकार प्राप्त साधारण जनता की कीमत पर अपने क्षुद्र-इन्द्रियों स्वार्थों, को पूरा करने में लगे हुए हैं। किन्तु साधारण जनता, जिनके पास सही शिक्षा और समझ की कमी हैं, वे सोचते हैं- ये जाति-सम्प्रदाय के नाम जनता को बाँट कर सत्ता की कुर्सी से चिपके रहने वाले पोलिटिशियंस लोग जन-सेवक हैं, और उनकी सेवा कर रहे हैं। कुछ तथाकथित छात्र-नेता लोग अक्सर उनका अनुसरण भी करने लगते हैं, और क्रमशः अपने चरित्र को खोकर भ्रष्ट हो जाते हैं।  यहाँ तक कि वे लोग अपनी सामान्य कार्यक्षमता को खो देते हैं, और वे भी एक
निठल्ले नेता या तथाकथित समाज-सेवी बन जाते हैं।  
हमारा देश तो कठोर परिश्रम करना ही भूल गया है। जबकि दूसरे देशों के लोग क्या कर रहे हैं ? यहाँ हमलोग सिर्फ दूसरे देशों के लोगों की प्रशंसा करने नहीं जा रहे हैं,  किन्तु लगभग हर जगह के लोग कर्मशील (hardworking) लोग हैं। यह परिश्रमशीलता या कर्मठता हमें भी सीखनी होगी। हमलोगों को ' वर्क मोर देन पेड फॉर ' -अर्थात ' भुगतान की तुलना में अधिक कार्य करने की आध्यात्मिक शक्ति' को 
अपने जीवन में अवश्य धारण करना होगा।  
जैसे मानलो कि मैं किसी सरकारी फैक्ट्री में आठ घंटे काम करता हूँ, और प्रति दिन किसी आइटम या उत्पाद के सात पीस निकाल देता हूँ, तो मुझे एक निश्चित राशि भुगतान के रूप में प्राप्त होती है। लेकिन यदि मैं अपनी मिहनत से प्रतिदिन उस आइटम का बारह पीस निकाल देता हूँ, तो मुझे बड़ा सन्तोष मिलता है। यदि मैं बारह पीस निकालने बजाय चौदह पीस निकाल देता हूँ, तो मुझे एक इन्सेंटिव -बोनस (उत्पादन -प्रोत्साहन) अलग से प्राप्त होता है। किन्तु मुझे स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिये कि " क्या मैं पंद्रह या सोलह पीस नहीं निकाल सकता ? और मासिक भुगतान के रूप में जो निश्चित राशि मुझे मिलती है, उससे कुछ अतिरिक्त राशि बोनस के रूप में पाने के अपने दावे को क्या मैं नहीं छोड़ सकता ? हाँ, मैं यह कर सकता हूँ, और अवश्य करूंगा; क्योंकि मैं जो भी उत्पादन कर रहा हूँ, उस के द्वारा मैं अपने देश के कल्याण के लिये भी कुछ अपना योगदान कर पाउँगा ! यह ठीक है कि मैं इस फैक्ट्री में काम करता हूँ, किन्तु जिन वस्तुओं का उत्पादन मैं करता हूँ, उससे मेरा देश भी तो समृद्ध बनता है। इस काम को करने से मेरी जितनी कमाई हो जाती है, उतना मेरे  परिवार के भरण-पोषण के लिए काफी है। और अपने वेतन से मैं संतुष्ट हो जाता हूँ। 
किन्तु, यदि मैं अपनी मिहनत से प्रतिदिन पंद्रह पीस का उत्पादन करने में सक्षम हूँ, तो मुझे केवल दस पीस बनाने के बाद ही उत्पादन-कार्य को रोक क्यों देना चाहिये ? क्या केवल इंसेन्टिव बोनस पाने की लालच में अपने कार्य को रोक देना उचित है ? क्या मैं अपने श्रम के माध्यम से, भले ही मेरे परिश्र्म के एक अंश के श्रम के लिये मुझे अतिरिक्त राशि नहीं मिले, फिर भी अपने राष्ट्र के लिए मैं कुछ योगदान क्या मैं सहर्ष नहीं कर सकता ? मेरे देश के कई लोग बेरोजगार हैं, उन्हें भी पैसों की जरुरत है। मेरे द्वारा अतिरिक्त उत्पादन किये जाने से राष्ट्रिय सकल उत्पाद में कुछ वृद्धि अवश्य होगी, जो वापस उन्हें नौकरी देने या 'प्रधानमंत्री मुद्रा बैंक योजना' के माध्यम से उन्हें रोजगार करने के लिये ऋण देने में व्यय की जा सकेगी।" क्या मैं अपनी परिस्थिति के साथ, उन शिक्षित बेरोजगार युवकों की तुलना नहीं कर सकता ? इसीको आध्यात्मिक क्षमता कहते हैं ! और हर जगह यह काम करती है ! 
[नेपोलियन हिल की पुस्तक प्रसिद्द पुस्तक 'लॉ ऑफ़ सक्सेस' के अनुसार यह ' वर्क मोर देन पेड फॉर' 'लॉ ऑफ़ सक्सेस' ' सफलता प्राप्त करने का विज्ञान-सम्मत नियम' है जो वेदान्त के आध्यात्मिक पहलु (चार महावाक्यों) पर आधारित है, तथा यह नियम भी 'न्यूटंस लॉ ऑफ़ मोशन' या 'लॉ ऑफ़  ग्रेविटेशन' के जैसा व्यावहारिक जीवन के हर क्षेत्र में कार्य करती  है!]
जैसे मान लो कि- मैं एक शिक्षक हूँ, और किसी स्कूल में चार घन्टे पढ़ाता हूँ, तो मुझे वेतन के रूप में एक निश्चित राशि प्राप्त होती है। अब यदि स्कूल में पढ़ाये जाने वाले विषय को सिलेबस के अनुसार चार घन्टे तक पढ़ा देने के बाद, यदि मैं छात्रों के साथ क्लास में एक घन्टा अधिक बैठकर जीवन-गठन और चरित्र-निर्माण की पद्धति के विषय में इस प्रकार बतलाने की चेष्टा करूँ, कि उन्हें अपने जीवन और चरित्र को सुन्दर ढंग से गढ़ने की प्रेरणा मिल सके, तो ऐसा करके मैं सचमुच अपने देश की सेवा में बहुत बड़ा योगदान दूँगा। 
या मान लो कि मैं किसी अस्पताल में डॉक्टर हूँ, मैं जब अस्पताल जाता हूँ, तो मेरे काम के निश्चित घन्टे होते हैं। उतने निर्धारित काम के घन्टे के भीतर, जिसके लिये मुझे वेतन मिलता है - मान लो कि मैं प्रतिदिन एक सौ व्यक्तियों का इलाज करता हूँ। क्या मैं एक घन्टा अतिरिक्त काम करके दस और गरीब लोगों का इलाज नहीं कर सकता ? किन्तु हम लोग वैसा करते नहीं हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -  " जब तक करोड़ों अशिक्षित रहेंगे और भूखों मरते रहेंगे, तब तक मैं उस प्रत्येक आदमी को देशद्रोही (traitor) समझूंगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, किन्तु उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता। "३/३४५     
['सो लौंग ऐज मिलियंस डाई इन हंगर ऐंड इग्नोरेंस ई कॉल एव्री मैन अ ट्रैटर , हू हैव बीन एज्यूकेटेड  ऐट देयर कॉस्ट डज नॉट पे दी लीस्ट हीड टु देम!'] आज हमारे देश के अधिकांश शिक्षित लोग क्या इसी श्रेणी में नहीं आते ? क्या वर्तमान समय का युवा भी एज्यूकेटेड होकर एक ट्रैटर बनना चाहेगा ? या लिख-पढ़ कर भी विश्वासघाती कहलाना पसन्द करेगा ? स्वामी विवेकानन्द चाहते थे की इस विश्वास- घातक निर्माणकारी शिक्षा पर रोक लगे। 
महामण्डल भी 'विश्वासघातक -निर्माणकारी शिक्षा' पर अंकुश लगाना, और 'चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा'
का प्रचार-प्रसार करना चाहता है! थोड़ा सा किताबी ज्ञान प्राप्त करते ही, हम लोग सोचने लगते हैं, कि 'मैं तो सचमुच में सुशिक्षित मनुष्य बन गया हूँ, मुझे असली शिक्षा प्राप्त हो चुकी है।' किन्तु सच्ची शिक्षा की पहचान यह कि वह तुम्हारे ह्रदय को प्रसारित करेगी, तुम्हारे शरीर और मन को शक्तिशाली बना देगी! 
अपने देश से प्यार करो, अपने देशवासियों को प्यार करो। अपने भाइयों से प्यार करो, अपने खून से प्रेम करो जो तुम्हारे देशवासियों की रगों में बह रहा है। स्पष्ट रूप से विवेक-विचार करो, कठोर परिश्रम करो। मनुष्य बनो और दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता करो ! अपने मन को नियंत्रित करने की तकनीक  (trick) को सीख लो। 
अपने मन को देश की समस्या पर एकाग्र करो,और तुम्हारे अपने जीवन की छोटी छोटी समस्याओं पर अपने मन को एकाग्र करो। उन समस्याओं के मूल कारण (चरित्र का अभाव) को ढूंढ़ निकालो, और दृढ़ निश्चय तथा दृढ़ संकल्प के साथ उसका समाधान निकालो, और गंभीर तथा परिश्रमी और एक सरल-सच्चा (heart-whole) हार्दिक मनुष्य बन जाओ ! देशवासियों के विषय में सोचो और अपने देश को उन्नत करो। स्वामी विवेकानन्द भारत के युवकों से यही चाहते थे, और विवेकानन्द युवा महामण्डल भी यही अपेक्षा रखता है।
स्वामी विवेकानन्द का जो आदर्श और उद्देश्य था, विवेकानन्द युवा महामण्डल का भी वही आदर्श और उद्देश्य है। "दी आइडियाज ऐंड आइडियल्स् ऑफ़ विवेकानन्द युवा महामण्डल' आर स्वामी विवेकानन्दा'ज आइडियाज ऐंड आइडियल्स्" हमलोग उसी आदर्श और उद्देश्य को व्यवहार में रूपान्तरित करना चाहते हैं, और हमें इस कार्य को अवश्य करना चाहिये। किन्तु भाषण देकर नहीं, बल्कि महामण्डल द्वारा निर्देशित पाँच कार्यों के दैनन्दिन अभ्यास द्वारा अपने जीवन को ही उदाहरण स्वरूप बनाकर ! युवाओं से यही अपेक्षित है ! 
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 वे २० अगस्त १८९३ को अलासिंगा को लिखे अपने पत्र में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " जाड़े का मौसम आ रहा है। मैं इस देश में भूख या जाड़े से भले ही मर जाऊँ, परन्तु, युवकों ! मैं गरीबों, मूर्खों और उत्पीड़ितों के लिये इस सहानुभूति और प्राणपण प्रयत्न को थाती के तौर पर तुम्हें अर्पित करता हूँ! जाओ, इसी क्षण जाओ उस पार्थसारथी के मंदिर में , जो गोकुल के दिन-हीन ग्वालों के सखा थे, जो गुहक चाण्डाल को भी गले लगाने से नहीं हिचके, जिन्होंने अपने बुद्धावतार-काल में अमीरों का निमंत्रण अस्वीकार कर एक वारांगना के भोजन का निमंत्रण स्वीकार किया और उसे उबारा। जाओ उनके पास, जाकर साष्टांग प्रणाम करो और उनके सम्मुख एक महा बलि दो, अपने जीवन की बलि दो -उन दीन-हीनों और उत्पीड़ितों के लिये, जिनके लिये भगवान युग युग में अवतार लिया करते हैं, और जिन्हें वे सबसे अधिक प्यार करते हैं। 
और तब शपथ लो - कि तुम अपना सारा जीवन इन तीस करोड़ (आज सवा-सौ करोड़) लोगों के उद्धार-कार्य में लगा दोगे, जो दिनोंदिन अवनति के गर्त में गिरते जा रहे हैं। यह एक दिन का काम नहीं, और रास्ता भी अत्यन्त भयंकर कंटकों से आकीर्ण है। परन्तु पार्थसारथी हमारे भी सारथी होने के लिये तैयार हैं - और  हम यह जानते हैं। 
उनका नाम लेकर और उनपर अनन्त विश्वास रख कर (किनका नाम ? जो पहले राम बने थे, फिर कृष्ण बने थे और अभी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण बने हैं; किन्तु उनके वेदान्त की दृष्टि से नहीं-साक्षात्!)   भारत के युगों से संचित (विगत हजार वर्षों से संचित) पर्वताकाय अनन्त दुःख राशि में आग लगा दो --वह जलकर राख हो ही जायेगी। तो आओ भाइयों, साहस पूर्वक इसका सामना करो। कार्य गुरुतर है और हमलोग साधनहीन हैं। तो भी हम अमृतपुत्र और ईश्वर की सन्तान हैं। प्रभु की जय हो, हम अवश्य सफल होंगे। इस संग्राम में सैंकड़ों खेत रहेंगे, पर सैंकड़ों पुनः उनकी जगह खड़े हो जायेंगे। सम्भव है कि मैं यहाँ विफल होकर मर जाऊँ, पर कोई और यह काम जारी रखेगा। तुम लोगों ने रोग जान लिया है और दवा भी, अब बस, विश्वास रखो। 
लाखों स्त्री-पुरुष पवित्रता के अग्निमन्त्र (???) से दीक्षित होकर, भगवान के प्रति अटल विश्वास से शक्तिमान बनकर और गरीबों, पतितों तथा पददलितों के प्रति सहानुभूति से सिंह के समान साहसी बनकर इस सम्पूर्ण भारत देश के एक छोर से दूसरे छोर तक सर्वत्र उद्धार के सन्देश, सेवा के सन्देश, सामाजिक उत्थान के सन्देश और समानता के सन्देश का प्रचार करते हुए विचरण करेंगे। "
" भगवान की इच्छा है कि भारत में हमसे बड़े बड़े कार्य सम्पन्न होंगे। विश्वास करो, हमीं बड़े बड़े काम करेंगे। हम गरीब लोग -जिनसे लोग घृणा करते हैं, पर जिन्होंने मनुष्य का दुःख सचमुच दिल से अनुभव किया है। राजे-रजवाड़ों से बड़े बड़े काम बनने की आशा बहुत कम है।" (" वी आर पुअर, मायी ब्रदर्स , वी आर नोबॉडीज, बट सच हैव बीन ऑलवेज दी इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ़ दी मोस्ट हाई.")
 इसीलिये उन्होंने कहा था -" आर्यों के हे पावन देश ! तू कभी पतित नहीं हुआ।  राजदण्ड टूटते रहे और फेंक दिए जाते रहे हैं, शक्ति का कंदुक एक हाथ से दूसरे हाथ में उछलता रहा है, पर भारत में राजदरबारों और राजाओं का प्रभाव सर्वदा थोड़े से लोगों को (लालबत्ती गाड़ियों की चाटुकारिता करने वाले थोड़े से छुटभइये नेताओं को ) ही छू सका है।  
उच्चतम से निम्नतम तक जनता की विशाल राशि अपनी अनिवार्य जीवनधारा का अनुगमन करने के लिए मुक्त रही है, और राष्ट्रिय जीवनधारा कभी मन्द और अर्धचेतन गति से और कभी प्रबल और प्रबुद्ध गति से प्रवाहित होती रही है। उन बीसों ज्योतिर्मय शताब्दियों की अटूट शृंखला के सम्मुख मैं तो विस्मयाकुल -खड़ा हूँ; जिनके बीच यहाँ- वहां एकाध धूमिल कड़ी है, जो अगली कड़ी को और भी अधिक ज्योतिर्मय बना देती है।  मेरी यह जन्म-भूमि अपने यशोपुरित लक्ष्य- " पशु-मानव को देव-मानव में रूपांतरित करने की सिद्धि" के लिये अपने सहज महिमामय पदक्षेप के साथ निरंतर प्रगतिशील है !
हाँ, मेरे बन्धुओं , यही गौरवमय भाग्य हमारे देश का है ! क्योंकि हमने उपनिषद-युगीन सुदूर अतीत में , हमने इस संसार को चुनौती दी थी - " न प्रजया न धनेन त्यागेनैके अमृतत्वं आनशुः। " --न तो संतति द्वारा और न सम्पत्ति द्वारा, वरन केवल त्याग द्वारा ही अमृतत्व की उपलब्धि होती है।  एक के बाद दूसरी जाति ने इस चुनौती को स्वीकार किया। ....  संसार की इस पहेली को कामनाओं के स्तर पर सुलझाने का प्रयत्न किया। वे सबकी सब अतीत में तो असफल रही हैं -पुरानी जातियां तो शक्ति और स्वर्ण की लोलुपता से उद्भूत पापाचार और दैन्य के बोझ से दबकर पीस-मिट गयी, और नयी जातियां गर्त में गिरने को डगमगा रही हैं।
इस प्रश्न का हल करने के लिए अभी शेष ही है कि शान्ति की जय होगी युद्ध की ? सहिष्णुता (टॉलरेन्स) की विजय होगी या असहिष्णुता (इनटॉलरेन्स)  की ? शुभ की विजय होगी अशुभ की ? शरीर की विजय होगी या बुद्धि की ? सांसारिकता की विजय होगी या आध्यात्मिकता की ? हमने तो युगों पहले इस प्रश्न का अपना हल ढूँढ लिया था, और हमारा समाधान है - असंसारिकता, त्याग ! " त्याग और सेवा " ही भारत के राष्ट्रिय आदर्श हैं -भारतीय जीवन-रचना का यही प्रतिपाद्य विषय है, उसके अस्तित्व का यही मेरुदण्ड है, उसके जीवन की यही आधारशिला है,  भारत के अस्तित्व का एकमात्र हेतु है - मानवजाति का आध्यात्मीकरण ! 
अपने इस लम्बे जीवन -प्रवाह में ( जीवन नदी के हर मोड़ पर ) भारत अपने इस मार्ग से कभी कभी भी विचलित नहीं हुआ , चाहे ततारों का शासन रहा हो चाहे तुर्कों का, चाहे मुगलों ने राज्य किया हो और चाहे अंग्रेजों ने!   (विश्व को भारत का सन्देश - ९/२९९) 
  
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[note: Two more chapters may be included in this book from ' Swami Vivekananda aur hmari sambhavna'  SV-HS  [73] भविष्य का भारत और श्रीरामकृष्ण/' & " प्रलय या गहरी समाधि "/ [ ***22 परिप्रश्नेन] लेख पर आधारित. 
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