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शनिवार, 6 अगस्त 2016

'मोस्ट एसेंशियल' समाज-सेवा क्या है? [एक नया आन्दोलन -12.'What is Essential ']

रामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में प्रशिक्षित नेता बनना और बनाना ! 

दूसरों के कल्याण के लिये कोई अकेला व्यक्ति कुछ  कार्य कर सकता है। या कोई संगठन भी जनसाधारण की भलाई के लिये, कुछ अच्छे कार्यों को करने का जिम्मा ले सकता है। वे सभी कार्य बहुत लाभदायक भी हो सकते हैं। इस तरह के कार्यों से बहुत सारे लोगों को कुछ न कुछ लाभ जरूर उठा सकते हैं। किन्तु कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जो उतने प्रकट रूप से दिखाई नहीं देते, निःशब्द तरीके से किये जाते हैं - इसीलिये उस प्रकार के कार्यों से मिलने वाले लाभ पर भी सबों की दृष्टि नहीं जाती।
 तथापि उसका प्रभाव बहुत दूरगामी हो सकता है; और यह भी सम्भव है कि इस प्रकार के कार्यों को पहले सम्पन्न किये बिना, दूसरे हितकारी कार्य भी अन्ततोगत्वा कोई स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ पायें।  बहुत से लोग तो यह जानने की चेष्टा भी नहीं करते कि क्या ऐसा कोई निःशब्द कार्य हो सकता है ? यदि जानते भी हों, तो बहुत से लोग उसके लिये परिश्रम नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि उनका प्रभाव उसी समय दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिये ऐसे किसी कार्य को-जिसे करने से लोगों के द्वारा तत्काल न तो कोई प्रशंसा प्राप्त होती हो और न अख़बारों में उनका नाम ही छपता हो वे करना नहीं चाहते।
किन्तु अपने नाम-यश की कोई परवाह किये बिना महामण्डल ने अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को कुछ ऐसे ही मौलिक कार्य में उत्सर्ग कर देने का निर्णय कर लिया है, जो अन्ततोगत्वा अन्य समस्त अच्छे सामाजिक प्रयासों की सफलता को सुनिश्चित बना देगी।  क्योंकि 'मनुष्य' समाज का मूल है, इसलिये 'मनुष्य-निर्माण' करना ही सबसे मौलिक कार्य है ! 
समाज सेवा का कोई भी कार्य चाहे सरकार के द्वारा हो या स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से हो - वास्तव में उन कार्यों का सम्पादन तो मनुष्यों के द्वारा ही होता है। किन्तु यदि समाज-सेवा के कार्य से जुड़े मनुष्यों में भारत के राष्ट्रीय आदर्श- 'त्याग और सेवा ' के विषय में सही समझ न हो, जिनकी सेवा करनी है- उनके विषय में सही दृष्टिकोण न हो, उचित अभिप्रेरणा और निःस्वार्थपरता का भाव न हो, तो ऐसे मनुष्यों द्वारा सम्पन्न कोई भी सेवा-कार्य यथार्थ फल-प्रसू नहीं हो सकेगी।
 इसीलिये युवाओं के भीतर इन गुणों को विकसित करना ही समाज-सेवा का मौलिक कार्य है। ये सभी गुण वास्तव में मनुष्य के चरित्र में ही सन्निहित रहती हैं। इसीलिये चरित्र-निर्माण ही मनुष्य-निर्माण का दूसरा नाम है। कोई व्यक्ति मनुष्य-निर्माण का प्रयास अपने आप को मनुष्य बनाने से प्रारम्भ कर सकता है, या दूसरों से भी। किन्तु इस कार्य को यदि कुछ थोड़े से व्यक्तियों के आकस्मिक प्रयास जैसा न करके, पूरी गम्भीरता के साथ राष्ट्र-व्यापी स्तर पर,या भारत के प्रत्येक राज्य में मनुष्य-निर्माण का अभियान चलाना चाहते हों, तो एक संगठित प्रयास अनिवार्य हो जाता है। 
और महामण्डल का आविर्भाव इसी कार्य को करने के लिए हुआ है। भारत को समृद्ध और खुशहाल बनाने के लिये क्या-क्या करना जरुरी है, उन सब बातों पर चर्चा करने के बाद स्वामी विवेकानन्द अत्यावश्यक बिन्दु पर आते हैं, और कहते हैं, " मान भी लें कि अंग्रेज सरकार तुम्हें स्वतंत्रता प्रदान करने को राजी हो गयी है, पर प्राप्त होने पर उन्हें सुरक्षित और सँभालकर रखने वाले मनुष्य कहाँ हैं ? इसीलिये, " पहले 'मनुष्य' का निर्माण करो। जब देश में ऐसे मनुष्य तैयार हो जायेंगे, जो अपना सब कुछ देश के लिये होम कर देने को तैयार हों, जिनकी अस्थियाँ तक निष्ठा के द्वारा गठित हों, जब ऐसे मनुष्य जाग उठेंगे, तो भारत प्रत्येक अर्थ में महान हो जायेगा। भारत तभी जागेगा जब विशाल हृदयवाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मनसा- वाचा- कर्मणा उन करोड़ों भारतियों के कल्याण के लिये प्राण-पण से प्रयास करेंगे, जो भूख और गरीबी तथा शिक्षा के अभाव में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं।"
इसीलिये उन्होंने युवाओं का आह्वान किया था - " जो सच्चे ह्रदय से भारतवासियों के कल्याण का व्रत ले सकें तथा उसे ही जो अपना एकमात्र कर्तव्य समझें-ऐसे युवकों के साथ कार्य करते रहो। उन्हें जाग्रत करो, संगठित करो तथा उनमें 'त्याग और सेवा' का मन्त्र फूँक दो। भारतीय युवकों पर ही यह कार्य सम्पूर्ण रूप से निर्भर है। "  रुपया-पैसा या कुछ दान- सामग्री इकट्ठा कर अभावग्रस्त लोगों के बीच उनका वितरण करना, या जन-साधारण की आर्थिक उन्नति के लिए कुछ विशेष प्रकार के प्रोजैक्ट संचालि करना, आदि-ये सभी अच्छे कार्य हैं। बहुत सारे संगठन ऐसे कार्य कर सकते हैं, और कर भी रहे हैं। किन्तु ऐसे युवाओं के चरित्र का निर्माण कर देना, जो अपने देशवासियों के कल्याण के लिये निःस्वार्थ भाव से सब कुछ करने को तत्पर रहेंगे, इन सब समाज-सेवा के कार्यों से उत्कृष्टतर हैं तथा अधिक महत्वपूर्ण हैं। 
[मानवजाति के मार्गदर्शक नेता श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को इसी वेदान्त परम्परा में नेतृत्व का प्रशिक्षण देकर, (जगतजननी माँ काली की इच्छा के साथ- 'विश्व का कल्याण'  के उद्देश्य से अपनी इच्छाशक्ति को समन्वित का प्रशिक्षण देकर) उन्हें तुच्छ सांसारिक भोगों के त्याग की तो बात ही क्या, निर्विकल्प समाधि के भूमा-आनन्द तक का त्याग करने में समर्थ जन-नेता स्वामी विवेकानन्द में रूपान्तरित कर दिया था!]             
इसी तरह के 'सच्चे मनुष्य' (या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता) जीवन के हर क्षेत्र में चाहिये, प्रत्येक व्यवसाय में चाहिये, समाज में चाहिये, हर घर में चाहिये। ऐसे मनुष्य (ब्रह्मवेत्ता-मनुष्य) ही ' सस्टेन्ड सोशल वेल-बीइंग' निरन्तर और सुनिश्चित सामाजिक कल्याण को आश्वस्त करते हैं, इसीलिये  -यही कार्य (श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द परम्परा में युवाओं को नेतृत्व प्रशिक्षण देने का कार्य) सर्वाधिक आवश्यक 'मोस्ट एसेंशियल' कार्य है! 
लिहाजा कुछ ऐसे ही मनुष्य (नेताओं) का निर्माण करना सर्वाधिक आवश्यक समाज-सेवा या 'मोस्ट एसेंशियल सोशल सर्विस ' है।अतः 'सर्वाधिक आवश्यक समाज-सेवा' के विषय में हमारी धारणा बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिये। और हमारे समस्त कार्यकलापों को इसी 'एक लक्ष्य' को प्राप्त करने की दिशा में संचालित करना चाहिये। और महामण्डल विगत ४९ वर्षों से यही करने का प्रयास कर रहा है। और हमलोग यह देखकर आश्वस्त हैं कि ऐसे निःस्वार्थपर मनुष्य (नेता या लोक-शिक्षक) निर्मित भी हो रहे हैं।ऐसे मनुष्यों को निर्मित करने का पूर्णतः स्पष्ट प्रशिक्षण-पद्धति है।  
महामण्डल के सभी सदस्यों को 'मोस्ट एसेंशियल' समाज-सेवा क्या है-इसे ठीक से समझ लेना चाहिये, इसकी प्रणाली को जान लेना चाहिये, तत्पश्चात 'श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में नेतृत्व-प्रशिक्षण पद्धति' का प्रयोग, उसके परिणाम को देखने के लिए करना चाहिये। केवल कुछ निबन्धों को पढ़ लेने, या भाषणों को सुनने भर से ही काम नहीं चलेगा। महामण्डल के रजिस्टर्ड ऑफिस से संपर्क करे और प्रतिवर्ष २५-३० दिसम्बर तक आयोजित होने वाले इसके वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में भाग लेकर स्वयं अनुभव कीजिये कि, हजारों युवा कैसे क्रमशः उन्नततर मनुष्य में रूपान्तरित होते जा रहे हैं ! यदि हम भारत को पुनः महान भारतवर्ष में परिवर्तित करना चाहते हैं, तो यही उपाय है। हमें यथार्थ मनुष्य (मार्गदर्शक नेता के) चरित्र के गुणों को अपने भीतर आत्मसात कर लेना चाहिये, उनमें निहित भावों को 'चियू और डाइजेस्ट' करके अपनी नसों में के भीतर दौड़ने वाले खून में मिश्रित कर लेना चाहिये। इसीको सच्ची शिक्षा कहते हैं।   'मोस्ट एसेंशियल वर्क' या सर्वाधिक आवश्यक कार्य यदि कुछ है तो वह- मूलतः यह 'मनुष्य' (नेता) बनाने वाली शिक्षा ही है। 
और यह स्वाभाविक है कि इस शिक्षा को ग्रहण करने में समय लगेगा। किसी भी महान लक्ष्य को रातों-रात या निरंतर कठोर श्रम किये बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है। कुछ लोग पूछ सकते हैं कि - क्या सभी मनुष्यों को सुधारा जा सकता है ? अगर नहीं ही किया जा सकता है, तो उसका विकल्प क्या है ? यही न कि 'यथा पूर्वं तथा परं'; यथास्थित में पड़े रहना ? क्या ऐसा करने से किसी एक समस्या को भी हल किया जा सकता है ? किन्तु यदि इस प्रयास को निरन्तर जारी रखा जाय, महामण्डल द्वारा निर्देशित पाँच कार्यों का नियमित अभ्यास करते रहा जाय, तो कुछ युवाओं के चरित्र में निश्चित रूप से सुधार आएगा। और क्रमशः उनकी संख्या में वृद्धि भी होती रहेगी, और भले ही पच्चीस वर्ष के बदले पचास वर्ष लग जाये (१९६७-२०१६ तक कई नेता निर्मित हो जायेंगे और) परिस्थितियाँ अवश्य बदलेंगी ! जो लोग आलसी और घोर निराशावादी हैं, उनको सोये रहने दो। किन्तु जो युवा आशावादी और परिश्रमी हैं, जिन्हें अपने आप पर और मानवमात्र पर अटूट श्रद्धा है; उन्हें कमर-कसकर खड़े हो जाना चाहिये। और इस मनुष्य-निर्माणकारी अभियान-चक्र के पहिये पर अपने कंधों को भिड़ा देना चाहिये । 
 विवेकानन्द बिल्कुल सही निष्कर्ष पर पहुँचकर कहते हैं - " इसलिये हमें उस समय तक 'ठहरना होगा', जब तक कि लोग शिक्षित न हो जायें, जब तक वे अपनी आवश्यकताओं को सही ढंग से समझने न लगें। तथा अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिये तैयार न हो जायें और ऐसा करने की क्षमता न प्राप्त कर लें।" यहाँ 'ठहरना होगा ' का अर्थ यह नहीं है कि - जब तक सभी लोग शिक्षित नहीं हो जाते, तब तक भगवान की कृपा के भरोसे हमें यूँही - बेकार बैठे रहना चाहिये ? 
उनके कहने का तात्पर्य है कि जब तक सभी युवा शिक्षित नहीं हो जाते, हमें - " उन्हें शिक्षित  करने और स्वयं शिक्षित मनुष्य बनने'  के लिए कठोर परिश्रम करना चाहिये।वे कहते हैं," जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र-बल, पर-हित भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? वास्तव में जिस प्रशिक्षण (मनःसंयोग) के द्वारा इच्छाशक्ति के प्रवाह और भावाभिव्यक्ति को वश में लाया जाता है, और वह फलदायक बन जाती है, को शिक्षा कहा जाता है ! (और भावुक हुए बिना खुली आँखों से ध्यान और सेवा - करने में सक्षम नेता को ही शिक्षित मनुष्य कहा जाता है!) 
किन्तु ऐसी शिक्षा (या प्रशिक्षण) नामी-गिरामी या सुविख्यात (well-known) विश्वविद्यालयों और स्कूली-शिक्षा बोर्ड के अन्तर्गत आने वाले ९८ % कटऑफ मार्क वाले कॉलेजों और स्कूलों के माध्यम से प्रदान नहीं की जा सकती है। हमारे देश में तो उस प्रकार के असंख्य शिक्षण-संस्थान पहले से खुले हुए हैं, और प्रतिदिन नये नये शिक्षण-संस्थान खुलते भी जा रहे हैं।किन्तु " जन-साधारण के कल्याण के लिये, 'त्याग ' की भावना का विकास हमारे राष्ट्र में अभी तक नहीं हुआ है।" इसीलिये स्वामी विवेकानन्द आगे कहते हैं - "मैं इन विचारों को देश के हर युवक के दरवाजे तक पहुँचा देना चाहता हूँ।" इसीलिये वे कहते हैं -" मैं पहले थोड़े से युवकों को धर्म-प्रचारक (मानवजाति का मार्गदर्शक नेता)  के रूप में प्रशिक्षित करना चाहता हूँ,मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमें से आएंगे। सिंहों की भाँति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे।"
[ऐसी शिक्षा कोई ऐसा (ब्रह्मवेत्ता-नेता ) युवा  ही दे सकता है-जिसका अपना चरित्र श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित नेतृत्व-प्रशिक्षण के माध्यम से गठित हो चुका हो। स्वामीजी ने युवाओं को चुनौती देते हुए कहा है - " यदि तुम अपने भाई, -- मनुष्य की , व्यक्त ईश्वर की ; उपासना नहीं  सकते; तो तुम उस ईश्वर की उपासना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है ? "इन वन वर्ड, दी आइडियल ऑफ़ वेदान्त इज टू नो मैन ऐज ही रियली इज'- एक शब्द में  वेदान्त का आदर्श है-'मनुष्य को उसके सच्चे स्वरूप में जानना !' (जीवो ब्रह्नैव नापर:)अतः महामण्डल के नेता का पहला कार्य है - अपने सच्चे स्वरूप को 'डिटेक्ट' कर लेना। 
 किन्तु महामण्डल छात्रों का संगठन है, इसीलिये महामण्डल में मनुष्य के सच्चे स्वरूप को डिटेक्ट करने लिये, यहाँ केवल मन को एकाग्र करने की पद्धति -प्रत्याहार और धारणा तक ही सिखाया जाता है, ध्यान-समाधी नहीं सिखाई जाती है। किन्तु महामण्डल युवाओं के लिये यदि किसी विशेष प्रकार के ध्यान की अनुशंसा करना चाहता है, तो वह है - "ओपेन-आइड मैडिटेशन"  अर्थात " खुली आँखों से किया जाने वाला ध्यान "। और वह है- 'मनुष्य' का ध्यान, स्वामीजी की भाषा में कहें तो ' मनुष्यरूपी- ताजमहल' का ध्यान ' ८/ २९] इस युवा महामंडल का वास्तविक कार्य भी यही है। और तुम इसे कर सकते हो, यदि तुम यह विश्वास करो कि हाँ तुम इसे अवश्य कर सकते हो !

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स्वामीजी कहते थे," वेदान्त सब धर्मों का बौद्धिक सार है, वेदान्त के बिना सब धर्म अन्धविश्वास है। इसके साथ मिलकर प्रत्येक वस्तु धर्म बन जाती है! धर्म का रहस्य सिद्धान्त में नहीं, व्यवहार में है। मैं यहां मनुष्य-जाति में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न करूंगा, जो ईश्वर में (इस व्यक्त ईश्वर- या 'इंसान' रूपी अल्ला में ) अन्तःकरण से विश्वास करेगा, और संसार की परवाह नहीं करेगा। यह कार्य मन्द, अति मन्द, गति से होगा। " [८/३४ ] 
" यदि हम भारत को पुनर्जीवित करना चाहते हैं, तो हमें उनके लिये काम करना होगा। तुम्हारे सामने है जनसमुदाय को उसका अधिकार (आत्मश्रद्धा) लौटा देने की समस्या। इसके लिये तुम्हारे पास संसार का महानतम धर्म -वेदान्त है, और तुम जनसमुदाय को गंदी नाली का पानी (आरक्षण और साम्प्रदायिकता का जहर ) पिलाते हो ? मैंने अपना आदर्श- (त्याग और सेवा ) निर्धारित कर लिया है और उसके लिये अपना समस्त जीवन दे दिया है। यदि मुझे सफलता नहीं मिलती, तो मेरे बाद कोई अधिक उपयुक्त व्यक्ति आयेगा और इस काम को सँभाल लेगा, और मैं आमरण प्रयत्न करते जाने में ही अपना संतोष मानूँगा। मैं पहले थोड़े से युवकों को 'नेता ' (धर्म-प्रचारक) के रूप में प्रशिक्षित करना चाहता हूँ, फिर उन्हीं के माध्यम से इन विचारों को देश के हर युवक के दरवाजे तक पहुँचा देना चाहता हूँ। मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में ,नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमें से आएंगे। सिंहों की भाँति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे।"
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