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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

'साइंस ऑफ़ इंटरनल वर्ल्ड' या 'परा-विद्या'! [एक नया युवा आन्दोलन -16-Speaking to Ourselves ]

'चारो योग-मार्गों में समन्वय प्राप्त करने की एक प्रणाली'
साधारण अर्थों से देखने पर महामण्डल एक धार्मिक संगठन नहीं है। उसी प्रकार सामान्यतौर से यह एक सामाज-सेवी  संगठन भी नहीं है। और साधारण अर्थ में यह कोई शैक्षिक संस्थान भी नहीं है। किन्तु यह एक ऐसा संगठन है जो प्रत्येक युवा तक, जो स्वयं को किसी भी प्रचलित धर्म का अनुयायी न मानता हो, या उसका जन्मजात धर्म चाहे कुछ भी क्यों न हो-इन सब बातों की परवाह किये बिना, सच्चे धर्म को पहुँचा देना चाहता है ! इसीलिए जब कोई युवा ऐसा कहे कि- मैं दुनिया के किसी भी " सेक्टेरीअन-रीलिजन " या कट्टरपंथी-धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं रखता ! तो हमें उससे यह अवश्य कहना चाहिये - ' बन्धु, तुम ठीक कहते हो ! वास्तव में तुम्हारी आवश्यकता तो एक भिन्न प्रकार के धर्म की है; उस धर्म की है-  जो अविवेकी मनुष्य को यथार्थ 'मनुष्य' में (आदमी को इन्सान में) परिणत कर देता है।' ऐसे धर्म (५ अभ्यास का कर्तव्य) का पालन करने में किसी व्यक्ति को क्या ऐतराज हो सकता है ? 
उसी प्रकार - महामण्डल एक समाज-सेवी संगठन भी है, किन्तु गूढ़ अर्थ में । यह उच्च आसन में बैठकर दान करने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि यथातथ्य समझ, वेदान्त के युक्तितर्क- 'जीव ही शिव है', की एक पूर्व निर्धारित सही समझ से अनुप्रेरित होकर विनम्रता-पूर्ण तरीके से की जाने वाली समाजसेवा का उपयोग अपने हृदय को विकसित करने में करता है। 
वास्तव में धर्म एक ऐसी वस्तु है जो - पशु को (भावशून्य मनुष्य या अ-विवेकी मनुष्य को) मनुष्य में और मनुष्य (विवेकी मनुष्य) को परमात्मा में उन्नत कर देता है! और मनुष्य के सर्वांगीन विकास के लिये ऐसा होना अपरिहार्य है। एवं प्रत्येक मनुष्य के तीन पहलू  '3H ' होते हैं- उसका शरीर, उसका मन और उसका हृदय ।
 किसी व्यक्ति के लिये व्यायाम और पौष्टिक आहार आदि के माध्यम से अपने शरीर को विकसित कर लेना किंचित सरल कार्य है। उसी प्रकार अपने मन और बुद्धि को विकसित कर लेना, किसी मनुष्य के लिये थोड़ा कठिन तो अवश्य है, किन्तु असम्भव नहीं है। प्रयत्न करने से कोई भी मनुष्य अपने मन पर विजय प्राप्त कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति के पास एक बहुत शक्तिशाली शरीर है और बहुत ही अच्छी तरह से विकसित मस्तिष्क या बुद्धि भी है, तो क्या इतने से उसे सन्तुष्ट हो जाना चाहिये ? क्या उसे ऐसा यथार्थ मनुष्य कहा जा सकता है, जिसे कोई मानव-समाज अपनी परिसम्पत्ति (ऐसेट) समझ कर गर्व का अनुभव करे ? नहीं ! क्योंकि वह अपनी मांसपेशियों की शक्ति (मसल्स पॉवर) और मस्तिष्क की शक्ति (ब्रेन पॉवर) का यथोचित उपयोग नहीं कर सकेगा। क्योंकि जब तक किसी मनुष्य के पास सच्ची सहानुभूति और दूसरों के सुख-दुःख को अनुभव करने वाला हृदय नहीं होगा; उसकी शारीरिक और मानसिक शक्ति (प्रबल इच्छाशक्ति ) का वैसा सर्वोत्तम लाभ - जैसा मिलना चाहिये था, नहीं दे सकेगी। हमारा शरीर एक स्थूल जड़ पदार्थ है, और मन भी एक सूक्ष्म जड़ पदार्थ ही है। इसीलिये शरीर को विकसित करना आसान है, किन्तु मन को विकसित करना थोड़ा कठिन है। तथापि ये दोनों ही जड़ पदार्थ हैं; इसीलिये उचित कौशल या तकनीकी जानकारी की सहायता से प्रयत्न करके  हमलोग उनपर नियंत्रण रख सकते हैं। 
 किन्तु, हृदय कोई अन्य चीज है, जो उन सबसे सूक्ष्मतर है; और किसी भी तरह से उसे भौतिक पदार्थ (ऐन्द्रिक वस्तु) तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है। हम हृदय को, किसी भी बाह्य उपकरण के जैसा आसानी से नहीं समझ सकते हैं। 
हम जानते हैं कि हमारा मन एक ऐसा उपकरण (इंस्ट्रुमेंट) या साधन है,जिसका उपयोग हम स्वयं मन को भी देखने (या पकड़ने) के लिये कर सकते हैं। लेकिन, हृदय का उपयोग या व्यवहार करने के लिये, ठीक उसी के सामान कोई दूसरा साधन या उपकरण हमारे पास नहीं है।  "हार्ट कैन ओनली रेस्पॉन्ड टु हार्ट फ्रॉम अ डिस्टेंस."  एक हृदय केवल दूर से ही, दूसरे हृदय को प्रत्युत्तर दे सकता है। इट इज  समथिंग लाइक रेजोनेंस.--यह कुछ अनुकम्पन (शब्द की गूँज)  जैसी वस्तु है। जैसे एक निश्चित मेगाहर्ट्ज़ फ्रीक्वेंसीज के रेडियो तरंगों को एक स्थान से भेजा जाता है।  (यहाँ मेगाहर्ट्ज़, रेडियो प्रसारण की आवृत्ति, फ्रीक्वेन्सी या बारम्बारता का मापक है) किसी दूरस्थ स्थान पर एक इलेक्ट्रॉनिक रिसीवर होता है जो प्रेषित ध्वनि तरंगों को डिटेक्ट कर लेता है या पकड़ लेता है, और उसे ऐम्प्लीफाइ करता है,आवाज को बढ़ा देता है। और हमलोग घर बैठे रेडिओ प्रसारण केन्द्र से प्रसारित होने वाले भाषण या विविध संगीत को  सुन सकते हैं। हमारा हृदय भी ठीक उसी प्रकार से कार्य करता है। 
हमलोग फिजिक्स में 'फिनामनान ऑफ़ रेजोनेन्स ' या 'अनुकम्पन  (अनुनाद ) की अद्भुत घटना'  के विषय में पढ़ते हैं। किसी स्ट्रिंग वाले (तार वाले) वाद्य यंत्र जैसे गिटार-  के एक तार को एक विशेष फ्रिक्वेंसी या आवृत्ति, मानलें २४०- मेगाहर्ट्ज़ माप के कम्पन के लिये ट्यून कर दो । और गिटार के एक अन्य तार को भी उसी समान आवृत्ति २४० मेगाहर्ट्ज़ पर स्थिर या सेट कर दो । और बस एक तार को छेड़ दो । यदि तुम इस परीक्षण को करते हो, तो तुम देखेंगे कि दूसरा तार भी स्वतः कंपन करना शुरू देता है, और वही स्वर (ध्वनि) उत्पन्न कर 
रहा है, जो स्वर पहले वाले तार से बहार निकल रहा है। ठीक इसी प्रकार- ' यू कैन अट्यून योर हार्ट टू दी  हार्ट बीट्स आर दी  फीलिंग्स ऑफ अदर्स ! तुम अपने हृदय  को दूसरों के हृदय की धड़कन या फीलींग्स (सुख-दुःख के कम्पन)  के साथ अट्यून करके, उस हृदय के सुर के साथ अपने हृदय के सुर को मिला सकते हो  ! (मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा !) 
किसी भी (सचेतन) प्राणी के हृदय पर कार्य करने की यही एकमात्र पद्धति है। और यह कार्य हमलोग उचित अभिप्रेरणा से समाज-सेवा करते समय कर सकते हैं। यही कारण है कि महामण्डल के कर्मियों को,समाज में अपने हृदय का विकास करने के उद्देश्य ही  दूसरों की सहायता और सेवा करने के लिये जाना चाहिये। 
और भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, " सच्चा योगी ***वही है, जो दूसरों के दुःख-संताप को अपने हृदय में महसूस करता है, और समान रूप से शोकाकुल हो जाता है, और दूसरों के आनंदित होने से, उसके आनन्द को भी ठीक उसी के समान महसूस करके, उसके आनन्द में सहभागी बन सकता  है।" इस दृष्टि से देखने पर
स्वामी विवेकानन्द भी एक महान योगी थे, किन्तु हमलोगों को भी कम से कम छोटा योगी तो अवश्य बनना चाहिये। हमें भी दूसरे के दुःख-कष्ट को अपने हृदय में थोड़ा बहुत अवश्य महसूस करने की चेष्टा करनी चाहिये, और उस दृश्य का उपयोग अपने हृदय को विकसित करने में करना चाहिये।
[सच्चा योगी ****गीता ६/३२: 
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।6.32।।
आत्मा-उपम्येन सर्वत्र समं पश्यति यः अर्जुन/सुखं वा यदि वा दुःखं -सः योगी परमः मतः ।  
।।6.32।।हे अर्जुन जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है वह परम योगी माना गया है।
सम्पूर्ण विश्व के साथ एकात्मता का बोध होना - दुर्लभ अवस्था है। दूसरे के पैर में काँटा गड़ गया हो, तो उसकी पीड़ा का अनुभव अपने हृदय में करते हैं। यही विश्व-प्रेम अर्थात आत्मस्वरूप ब्रह्म का सभी प्राणियों में दर्शन को ही- अहं ब्रह्मास्मि कहा जाता है, खुली आँखों से ध्यान करते समय दैनन्दिन जीवन में ऐसी अनुभूति ही योगी को विश्वप्रेमिक बना देती है। ब्रह्म-स्वरुप अहं या 'पक्का मैं' की सीमा उस समय विश्वमय हो जाती है; उस अवस्था में योगी भुवनमंगल रूप होकर विराजमान रहते हैं। उनका प्रेम दिखावे वाला बाहरी विश्व-भ्रातृत्व नहीं बल्कि यह प्रेम योगी को आत्मज्ञान से विश्व-सेवा, जीव-सेवा या समाज-सेवा करने के लिये अभिप्रेरित करता है।
काशी के मार्ग में जाते हुए, बैद्यनाथ धाम में आकाल-पीड़ित सैकड़ों नर-नारियों के कंकाल समान चेहरे और प्रायः नग्न शरीर को देखकर श्रीरामकृष्ण रो पड़े थे। रानी रासमणि के बड़े दामाद मथुरानाथ विश्वास से उन्होंने रोते हुए कहा -" इन्हें भरपेट खिलाओ, नये वस्त्र दो, सिर पर तेल दो ।" मथुर बाबु कुछ आपत्ति जताकर बोले -" बाबा, तीर्थ में अनेक खर्चे हैं, ये तो बहुत से आदमी हैं, इन्हें खिलाने-पहनाने में रूपये घट जायेंगे।" श्रीरामकृष्ण देव ने रोते हुए कहा - " तुमलोग जाओ, मैं काशी नहीं जाऊँगा, मैं इन्हीं के पास रहूँगा" -इतना कहकर वे दरिद्रों के साथ जाकर बैठ गये। लाचार होकर मथुर बाबु ने उन सबको भरपेट खिलाया, सिर में तेल दिया और हरेक एक-एक नया वस्त्र दिया। इससे उन दरिद्रों के मुख पर हँसी देखकर ठाकुर वहाँ से उठ आये। यही है विश्व को आत्मवत देखना, तथा दूसरों के दुःख से द्रवित होकर  दुःख का अनुभव करना।
दक्षिणेश्वर कालीबाड़ी के बाग के नयी दूब के ऊपर से एक व्यक्ति पैदल चला जा रहा था, देखकर श्रीठाकुर असहनीय यन्त्रणा का अनुभव कर एकदम विकल हो पड़े।  बाद में उन्होंने कहा था -" छाती पर से कोई मनुष्य चला जाये तो जैसी वेदना का अनुभव होता है, उस समय मैंने वैसी ही वेदना का अनुभव किया था। " वह अनुभूति दो घन्टे तक थी।    
कालीबाड़ी के गंगा किनारे एक नाव पर दो माँझी झगड़ा कर रहे थे, उनमें से जो बलवान था, उसने दुर्बल मांझी की पीठ पर जोर से थप्पड़ मारा। उसे देखते ही ठाकुर चिल्लाकर रो पड़े। हृदयराम मामाजी की रुलाई सुनकर वहां दौड़ कर आ गये, उनकी पीठ पर बाम उखड़ आया था, उनकी पीठ लाल होकर फूल उठी है देखकर घबड़ाने लगे।  मांझी के पीठ के आघात का चिन्ह श्रीठाकुर के पीठ पर देखकर हृदयराम आश्चर्यचकित हुए।
श्रीठाकुर एकदिन पूजा के लिये दूब और बेलपत्र चुनने गए थे। दूब चुनते हुए उन्हें अनुभव होने लगा सर्वत्र चैतन्य है, दूर्वादल भी छिन्न होकर कष्ट का अनुभव कर रहे हैं! बेलपत्र चुनते समय पत्ती के साथ उस वृक्ष की थोड़ी छाल निकल आयी, उसमें वृक्ष को जो वेदना का अनुभव हो रहा था उसे समझकर वे फिर बेलपत्र नहीं चुन सके। ]

किन्तु श्रीठाकुर देव की तरह सर्वत्र चैतन्य ही हैं - ऐसा महसूस करने के बाद भी , हमें केवल हाथ पर हाथ रखे बैठे नहीं रहना चाहिये। (मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेता का निर्माण करने का आन्दोलन-BE AND MAKE से जुड़ जाना चाहिये ! ) 
बल्कि उसकी सहायता और सेवा के लिये अपने हाथों को आगे बढ़ा देना चाहिये। तुम तत्काल उसके दुःख को कम करने का प्रयत्न करो, और वैसा करने के बाद तुम्हें जो ज्ञान प्राप्त होगा वह स्थाई बन जायेगा, तुम्हारे हृदय में बस जायेगा, और तुम्हारे साथ सदैव बना रहेगा (तुम अपने ईश्वरत्व को कभी भूल नहीं पाओगे।)। महामण्डल में समाज-सेवा का यही सर्वोत्कृष्ट स्थान है, तथा आत्मविकास  के भिन्न-भिन्न मार्गों  एवं कार्यप्रणालियों में समन्वय लाने की युक्ति भी यही है।
स्वामी जी कहते हैं , " धर्म वह वस्तु है जो पशु को मनुष्य बना देता है " उसी प्रकार वे कहते हैं, " तुम अपने शरीर, मन और हृदय को विकसित करने का प्रयास करते रहो, और यदि तुम  इन्हें पूर्ण रूप से विकसित कर सके, तो तुम एक सम्पूर्ण मनुष्य बन जाओगे। " और उसके बाद वे कहते हैं, " जो व्यक्ति अपनी अन्तःप्रकृति और बाह्य-प्रकृति पर भी विजय प्राप्त कर लेता है, उसे वशीभूत कर लेता है, और उसका स्वामी बन जाता है, वही सच्चा धार्मिक मनुष्य है। "
 किन्तु अन्तःप्रकृति के ऊपर  प्रभुत्व पाया कैसे जाता है ? स्वामी जी इसकी युक्ति बतलाते हुए कहते हैं, " इस प्रयोजन के लिये तुम आत्म-विकास के चार सनातन मार्गों  में से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा ले सकते हो।" और फिर वे उन चारों महिमामण्डित मार्गों का उल्लेख करते हुए कहते हैं,  ' इन सनातन मार्गों का एक सामन्य नाम है - और वह है योग। ' वे चार मार्ग हैं, 'ज्ञानयोग' -अर्थात ज्ञान का मार्ग; 'राजयोग' - मन पर नियंत्रण करने का मार्ग, फिर 'भक्तियोग'- उपासना का मार्ग, और 'कर्मयोग'-कर्म का मार्ग। ये ही वे चार सनातन मार्ग हैं जिसका अनुसरण करने से हम अपना विकास कर सकते हैं, और सम्पूर्ण मनुष्य बन सकते हैं। वैसा मनुष्य जो अपने शरीर, मन और हृदय को विकसित करके अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लिया है, जो अपनी पाशविक-दुर्बलताओं या प्रोपेन्सिटीज पर विजय प्राप्त करके देवोपम दिव्यता या ओजस प्रभा-वलय से युक्त मनुष्य बन गया हो।
ऐसा सम्पूर्ण मनुष्य या ओजस-प्रभा वलय से युक्त मनुष्य (योगी)  बनने का जो चार मार्ग है, उसीको योग कहते हैं! ज्ञान का मार्ग का पथिक या ज्ञानयोगी भले और बुरे, शाश्वत और नश्वर के बीच विवेक-प्रयोग करता है, और निरन्तर परिवर्तनशील, क्षणस्थायी, अनित्य वस्तुओं में आसक्ति को त्यागता जाता है, एवं चिरस्थायी, शास्वत, नित्य या सत्य वस्तु के साथ लगातार जुड़ा रहता है, और धीरे धीरे अपने यथार्थ स्वरूप की अनुभूति प्राप्त कर लेता है।
राजयोगी कहता है, इसी जीवन में परिपूर्णता प्राप्त करने के लिये, पूर्णतः विकसित होने के लिये, या अपनी अन्तर्निहित समस्त सम्भावनाओं को साकार करने के लिये,हमें केवल एक काम करना है- और वह है, अपने मन को पूर्णतया अपने वश में कर लेना। तुम इस कार्य को अष्टांग-योग की पद्धति-  यम (शम), नियम (दम), आसान, प्राणायाम,प्रत्याहार, धारणा, और समाधि की सहायता से पूरा कर सकते हैं। अतएव हमलोगों इस साधन-मार्ग से थोड़ा परिचित तो अवश्य होना चाहिये। [छात्रों को कम से कम पांच चरणों -यम,नियम, आसान,प्रत्याहार और धारणा के अभ्यास की पद्धति -मनःसंयोग तो अवश्य सीख लेनी चाहिये।]
क्योंकि महामण्डल इन चारो योग-मार्गों के आवश्यक अंशों का उपयोग करना चाहता है। और स्वामी जी कहते
थे कि समाज का लगभग प्रत्येक मनुष्य, अपने व्यक्तिगत विकास के लिए इनमें से कम से कम एक मार्ग का चयन तो अवश्य करता है। विवेकानन्द कहते थे, ' मेरा आदर्श मनुष्य वही है जिसके चरित्र में सभी सच्चे गुण सामान रूप से और पूर्ण मात्रा में उपस्थित हो। मेरी दृष्टि में आदर्श मनुष्य तो वही है, जो अपनी साधना में इन चारो योग-मार्गों का सम्मिश्रण करने में सक्षम हो, अपने दैनन्दिन जीवन में उसका अभ्यास करके स्वयं को पूर्णतः विकसित कर सके। वही वास्तव में एक पूर्ण विकसित मनुष्य है, और हमलोग भी ऐसा ही पूर्ण मनुष्य बनना चाहते हैं। 
'भक्तियोगी', जो उपासना के मार्ग को ग्रहण करता है, का कहना है, " मैंने ढूंढ़ निकाला है कि प्रेम मेरे भीतर है, और ऐसा प्रतीत होता कि, यह कोई ऐसी वस्तु है जो विस्तारशील है। मानो यह नित्य विस्तार-शील ब्रह्माण्ड हो।' यह प्रतिपल विस्तारित होने का प्रयास करता है। यदि यह एकाकी हो जाय, तो परितृप्त नहीं होता। यह उमड़ता हुआ प्रेम दूसरों का स्पर्श करना चाहता है, उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है, और सम्पूर्ण विश्व को आत्मसात कर  लेना चाहता है। 
वह 'प्रेम' जिसका अनुभव मैं अपने हृदय में करता हूँ, मुझे बतलाता है कि इस ब्रह्माण्ड में या इस ब्रह्माण्ड से परे कोई वस्तु ऐसी है जिसका स्वभाव ही विशुद्ध प्रेम है; जो प्रेमस्वरूप है। और मेरी तीव्र इच्छा (hankering, चाह ,लालसा) है कि मेरा यह बून्द भर प्रेम, उस प्रेम के सागर से संयुक्त हो जाये।" और वह उसी पथ में आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है। वह अश्रु बहता है, वह मिलने की तड़प का अनुभव करता है। वह मंदिर जाता है, जब मूर्तियों को चंदन लगाता है,तो उसे उसी प्रेम का अनुभव होता है। कड़े पत्थर या सख्त लकड़ी से बनी मूर्तियों में भी वह प्रेम का ही दर्शन करता  है। वह अनुभव करता है कि  मूर्तियों की उस कठोर स्तब्धता के पीछे, कोई सबसे कोमल, प्रेम-स्वरूप वस्तु छुपी हुई है ! वह ऐसा अनुभव करता है, और उसीका दर्शन करने की चेष्टा करता है। वाह, ये तो बड़ी अच्छी बात है। हर मनुष्य से यही तो अपेक्षित है। किन्तु वैसा अनुभव करने की भावना मेरे हृदय में उठे,  उससे पहले यह बिल्कुल अनिवार्य है कि मेरे हृदय में दूसरों के प्रति गहरी सहानुभूति हो। केवल इसी की सहायता से हम अपने ह्रदय को विकसित कर सकते हैं। 
लेकिन, हम देख सकते हैं कि भले ही हम पूरे तौर से ज्ञान का इस्तमाल कर सकते हैं, भले ही हम अपने मन पर हमारे नियंत्रण का इस्तेमाल कर सकते हैं, और उसके साथ-साथ दूसरों के प्रति गहरी सहानुभूति का अनुभव भी करते हैं; -- पर इतना सब रहने से भी होता क्या है ? कुछ भी नहीं !
भले ही मैं यह जानता हूँ कि धर्म क्या है, मैं जानता हूँ कि दूसरों के सुख-दुःख का अनुभव अपने हृदय में कैसे किया जाता है, मैं जानता हूँ कि मैं अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण कैसे रख सकता हूँ, किन्तु अगर मैं साथ-साथ यह भी स्वीकार करता हूँ -कि मैं किसी के लिये कुछ भी नहीं करता!  तो मेरे ज्ञानी-ध्यानी होने से समाज को क्या लाभ हुआ  ? 
मुझे तो स्वयं आगे बढ़कर दूसरों के दुःख-कष्ट को कम करने के कार्य में जुट जाना चाहिये। मुझे प्रेम और सहनुभूति से अनुप्रेरित होकर, किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिये,अपने उस ज्ञान का उपयोग करने, उस मन को एकाग्र करने की आवश्यक मानसिक क्षमता के साथ, और  अपनी विवेक-शक्ति का प्रयोग करते हुए, दूसरों के दुःख-कष्ट को कम करने के लिये क्या करना होगा; यह जानने के बाद अवश्य आगे बढ़ कर कार्य में जुट जाना चाहिये। यदि तुम  ऐसी अभिप्रेरणा लेकर समाज-सेवा के कार्य में अपना योगदान करोगे तो तुम्हें उस समाज सेवा  से महान आनन्द की अनुभूति होगी। यही कर्म तुम्हें उस सत्य तक पहुँचा देगा, जहाँ तुम  शाश्वत-नश्वर का विवेक-प्रयोग करते हुए पहुँच सकते हो, मन पर नियंत्रण करने के माध्यम से, या भगवान को प्रेम करते हुए पहुँच सकते हो। अतएव, यदि तुम स्वयं को सम्पूर्ण मनुष्य तक विकसित करने की चेष्टा में किसी भी तरह से इन चारों मार्गों का समन्वय कर सको तो तुम आदर्श मनुष्य बन जाओगे।
 स्वामी विवेकानन्द कहते हैं , " एक मनुष्य ज्ञानमार्गी, भक्तिमार्गी, योगमार्गी अथवा कर्ममार्गी हो सकता है। विभिन्न धर्मों में इन्हीं भावों में से किसी एक भाव का प्रधान्य देखा जाता है। परन्तु यह भी सम्भव हो सकता है कि इन चारों भावों का समन्वय  एक ही व्यक्ति में किया जाय। भावी मानव जाति यही करेगी भी। यही मेरे गुरुदेव की धारणा थी। " ७/२५९ 
स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त 'मनुष्य' का यही आदर्श महामण्डल देश के युवाओं के समक्ष  प्रस्तुत करता है, एवं इन चारो योग मार्गों में समन्वय प्राप्त करने की एक प्रणाली - भी प्रस्तावित करता है। महामण्डल भी इन सभी चारों मार्गों के प्रमुख अंशों  का अपने ढंग से उपयोग करना चाहता है। यह अपने युवा भाइयों से यह कहना चाहता है, कि हमलोगों को किसी प्राचीन कट्टर वेदान्ती की तरह शुष्क ढंग का विवेक-प्रयोग नहीं करना चाहिये;  यह अत्यन्त कठिन भी है। बल्कि हमें " रामकृष्ण-विवेकानन्द प्रैक्टिकल वेदान्ता ट्रेडिशन "  के अनुसार   केवल 'व्यावहारिक वेदान्त'  अभ्यास करना चाहिये, क्योंकि व्यावहारिक जीवन में 'गंगा के जल और नाले के पानी' का उपयोग एक समान नहीं किया जा सकता।  
यहाँ तक कि  पूरी-सम्प्रदाय के कट्टर अद्वैत वेदान्ती 'श्रीमत् स्वामी तोतापुरी जी महाराज,'  जिन्होंने (आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार) भगवान श्रीरामकृष्ण देव को वेदान्त-मत में दीक्षित किया था, क्या वे स्वयं  प्रत्येक वस्तु में यह समानता (अभेद) को सर्वदा देखने में समर्थ हो सके थे ? जब किसी दलित व्यक्ति ने उनके धूनी की आग को केवल छू लिया था, तब क्या वे क्रोध से नहीं भर गये थे ? और यह देख कर श्रीरामकृष्ण देव जब हँसना शुरू कर दिये, और लोट-पोट होने लगे; तो तोतापुरी जी गुस्सा हो गए, और उनसे पूछा, ' यह क्या है, इतना हँस क्यों रहे हो ?' भगवान श्रीरामकृष्ण देव ने कहा,' मुझे तो आपके अद्वैत-वेदान्त के अभेद-ज्ञान को देखकर हँसी आ गयी !  यह मनुष्य जिसने एक निम्न -जाति में जन्म लिया है, आया और आपकी पवित्र अग्नि को छू दिया, और इतने से आप उत्तेजित होकर आगबबूला हो गए !' इसीलिये हमलोग भी कहीं उसी  प्रकार के वेदान्ती तो नहीं बनने जा रहे हैं?  
नहीं, हमलोग उनके जैसा कट्टर वेदान्ती नहीं बनने जा रहे हैं। हमलोग उस प्रकार का शुष्क विवेक-प्रयोग  नहीं करने जा रहे हैं।  बल्कि, हम अपनी विवेक-प्रयोग की शक्ति को एक सरल विधि - विवेकानन्द साहित्य का अध्यन करके विकसित करना चाहते हैं। " थिंग्स ऑफ़ परमानेंट नेचर एवं थिंग्स ऑफ़ ट्रांसिएंट नेचर" या 'अविनाशी और नश्वर' के बीच, अच्छे और बुरे के बीच, सही और गलत की समझ का विकास, हमलोग साप्ताहिक पाठचक्र में शामिल होकर परस्पर चर्चा के माध्यम से करना चाहते हैं। पाठचक्र ही हमलोगों का ज्ञानयोग या ज्ञान का मार्ग है।  इसी तरह अष्टांग-योग के केवल पाँच सोपान - प्रतिदिन दो बार एकाग्रता (आसन -प्रत्याहार-धारणा) का अभ्यास (और अनवरत यम-नियम का पालन) करके हमलोग यह सीख लेंगे कि मन को अपने नियंत्रण में कैसे रखा जाता है। छात्रों-युवाओं के लिये राजयोग केवल इतना ही है। 
उसी प्रकार, भगवान (श्रीरामकृष्ण) के प्रति भक्ति और प्रेम को विकसित करने का  प्रयास हमलोग केवल मंदिरों, मस्जिदों या गिरजाघरों में जाकर नहीं करेंगे। बल्कि हमलोग खेल के मैदान में, सड़क पर गली मुहल्ले में, गरीब लोगों की झोपड़ियों में जायेंगे, और उन सबों में अपने प्रियतम (श्रीठाकुरदेव) की उपस्थित (विद्यमानता) को अनुभव करने की चेष्टा करेंगे। अब हमलोग अपनी अनभिज्ञतावश (ignorantly, मूर्खतावश) जन-साधारण को 'मनुष्य' नहीं कहेंगे, बल्कि आगे से उनको 'हरि' के रूप में पहचानने की चेष्टा करेंगे। [आशिक है तो माशूक को हर रूप में पहचान]   
स्वामी जी ने भवगवान को मनुष्य के भीतर देखने का निर्देश हमें दिया है। वे कहते हैं, ' मैं ने ईश्वर की खोज में सारा जीवन लगा दिया है, उन्हें ढूँढ़ने की कोशिश मैंने हर जगह की है, किन्तु मैंने भगवान को केवल मनुष्यों में ही पाया है।' हमलोग समाज के लाखों दुःखीत-पीड़ित साधारण जनों के पास जायेंगे और अपनी सम्पूर्ण भक्ति उनके चरणों में अर्पित कर देंगे। हमलोग इसी प्रकार भक्तियोग  का अभ्यास करेंगे।  और हमलोग केवल अपने हृदय को विकसित करने के लिये ही जनसाधारण की सेवा, या समाज-सेवा अर्थात कर्मयोग का अभ्यास भी  करते जायेंगे ।
अपनी अन्तर्निहित सर्वोच्च संभावना को साकार करने के लिये,  हमलोग अपने शरीर, मन और हृदय को विस्तृत करने के लिये , इस प्रकार चारों महिमामण्डित  मार्गों का समन्वय करेंगे। और अभी हममें जितनी भी पाशविक वृत्तियाँ है, अपनी उन समस्त अमानुषिक गुणों पर विजय प्राप्त कर लेंगे, और सचमुच में हमलोग ही --'धरती पर देवता' या 'डिविनिटीज अपॉन अर्थ ' बन जायेंगे! 

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[ प्रतिध्वनि क्या है? इसकी व्याख्या में कहा गया कि जैसे पानी या दर्पण में चित्र दिखता है, वह प्रतिबिम्ब है। इसी प्रकार ध्वनि टकराकर पुन: सुनाई देती है, वह प्रतिध्वनि है। [resonance= एक ही आवृत्ति वाले एक समरूप (देखने में हूबहू) कंपनकारी स्रोत से एक ही स्वाभाविक माप के कंपन के उत्प्रेरण को अनुनाद (गूंज) कहते हैं । The inducing of vibrations of a natural rate by a vibrating source having the same frequency. 'हर शय में जलवा तेरा हूबहू है !']  










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