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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

'समग्र-शिक्षा का 'सिने क्वा नोन' है युवाओं का चरित्र-निर्माण' [एक नया युवा आन्दोलन -11. 'The Way Further Explained ']

'महामण्डल का युवा-प्रशिक्षण पद्धति: श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित है '
महामण्डल आन्दोलन ने अपने ४९ वर्ष पूरे कर लिये हैं, इस बीच महामण्डल के केन्द्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। यद्यपि इसने तीव्र उत्साह एवं इसके अभाव दोनों को देखा है; तथापि विभिन्न प्रान्तों में इसके नये-नये केन्द्र खुलते ही जा रहे हैं। इसका भौतिक विस्तार तो स्वागत योग्य है, किन्तु इसके साथ ही साथ प्रयास की गंभीरता में वृद्धि होना भी अनिवार्य है। और यह गंभीरता तभी आ सकेगी, जब वे सभी लोग जो इस कार्य में लगे हैं, और जो लोग आगे इसके साथ जुड़ना चाहते हैं, वे महामण्डल के 'आदर्श, उद्देश्य और 
कार्यपद्धति' के सम्बन्ध में पहले स्वयं अटल विश्वास और आस्था अर्जित करें फिर इसे कार्यरूप देने का दृढ़ संकल्प लें।
जब तक महामण्डल के 'आदर्श, उद्देश्य और कार्यपद्धति' के विषय में हमारा विश्वास दृढ़ नहीं हो जाता, तब तक इसे कार्यान्वित करने के लिये जैसी प्रचण्ड इच्छाशक्ति चाहिये उसका अभाव दिखाई देगा। महामण्डल के आदर्श, उद्देश्य और कार्यपद्धति को समझने के लिये विभिन्न भाषाओँ - हिन्दी,अंग्रेजी, बंगला, उड़िया, गुजराती, तेलगु, और कन्नड़ आदि में महामण्डल की पुस्तिकायें उपलब्ध हैं। महामण्डल का द्विभाषी मुखपत्र 'विवेक-जीवन' है, हिन्दी-त्रैमासिक पत्रिका 'विवेक-अंजन' है, विभिन्न भाषाओं में लिफलेट्स हैं।  
संचालकों के लिये 'त्रैमासिक विशेष प्रशिक्षण शिविर' आयोजित होते रहते हैं। अखिल भारतीय स्तर पर
'वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर' से लेकर, राज्य-स्तरीय, अन्तर्राज्य राज्य-स्तरीय,और जिला-स्तरीय युवा प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित होते रहते हैं। महामण्डल के 'वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर' में इस चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करने के प्रति आग्रही युवाओं को-गीता उपनिषद एवं श्रीरामकृष्ण-
विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित लीडरशिप ट्रेनिंग भी दी जाती है।
इस विशिष्ट प्रकार के लीडरशिप ट्रेनिंग को महामण्डल के रजिस्टर्ड ऑफिस से समय तय होने के बाद 'पर्सनल इन्टरव्यू' या व्यक्तिगत साक्षात्कार के द्वारा विचारों का आदान-प्रदान करके, अथवा पत्राचार के माध्यम से भी समझने की संभावना हो सकती है। जो लोग सामाजिक-परिवर्तन लाने में युवाओं के
समन्वित इच्छाशक्ति की भूमिका के बारे में जानना चाहते हों, और देश के पुनर्निर्माण में जिनकी अभिरुचि हो, वे इन पद्धतियों को स्वयं प्रयोग करके देख सकते हैं।  
जब तक महामण्डल के (गीता, उपनिषद एवं श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित) 
'आदर्श, उद्देश्य और कार्य-पद्धति' को, उसके सही स्वरूप में हृदयंगम नहीं कर लेते,तब तक भले ही हम इस बात पर सहमत हों कि 'देश के समग्र विकास और समृद्धि' के लिये हमें भी कुछ न कुछ अवश्य करना चाहिये; किन्तु हमारे असमन्वित कार्यकलाप, देश के कल्याण के लिये किये गए प्रयासों को, एक रचनात्मक आन्दोलन का रूप नहीं दे सकते
तोड़-फोड़ करने, धरणा-प्रदर्शन करने या अश्लील साहित्य को जला देने से कुछ भी हासिल नहीं होगा, आज एक रचनात्मक आन्दोलन की आवश्यकता है। एवं  "ब्रॉड फ्लो ऑफ़ कोऑर्डिनेटेड विल "- अर्थात 
समन्वित इच्छाशक्ति के व्यापक प्रवाह को ही आन्दोलन कहते हैं। और जनसाधारण के समन्वित इच्छाशक्ति के प्रयोग द्वारा संचालित महामण्डल  का चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन ही, बेस्ट इन्स्ट्रूमेन्ट फॉर 'सोशल इंजीनियरिंग' है। अथवा विशिष्ट प्रकार की समस्त सामाजिक समस्याओं को हल करने का यही सर्वोत्तम
साधन है। क्योंकि, अलग अलग व्यक्तियों की बिखरी हुई इच्छाशक्ति जब किसी एक उद्देश्य- 'भारत का समग्र विकास और समृद्धि ' के लिये संयुक्त होकर समन्वित इच्छाशक्ति में रूपान्तरित हो जाती है -तब वह अमोघ शक्ति बन जाती है। 
इस आन्दोलन में चमत्कारिक-उत्साह भरने के लिए, हमने एक ऐसे 'आदर्श' का चयन किया है, जो इस आन्दोलन को बिना किसी सम्भावित पथभ्रष्टता के, निरन्तर लक्ष्य की दिशा में गतिशील बनाये रखने में समर्थ हैं ! वे एक ऐसे आदर्श हैं, जो जनसाधारण के कल्याण के लिये पूरे समाज को ही स्वामी विवेकानन्द में रूपान्तरित कर देने में समर्थ हैं !  इस महान जन-नायक और भविष्य के 'पाथ-फाइंडर' -ग्रेट हीरो एंड दी पाथफाइंडर ऑफ़ द फ्यूचर' - जो हमारी दृष्टि से अब तक अज्ञात उपायों का अन्वेषण करते हुए हमारा सशक्त मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं, सिर्फ उनके नाम पर कुछ न कुछ करते रहना ही पर्याप्त नहीं है। यदि हमलोग कुछ ठोस (tangible या इन्द्रियगोचर) परिणाम हासिल करना चाहते हों, तो हमें अपने -'लक्ष्य और कार्यपद्धति' या  हमारे आदर्श और उनके द्वारा निर्धारित कार्य-प्रणाली में समायोजन भी अवश्य करना होगा। अतः हमें इन तीन विषयों को - 'उद्देश्य, आदर्श और कार्य-पद्धति'( श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित महामण्डल के युवा-प्रशिक्षण प्रणाली) को बहुत अच्छी तरह से आत्मसात कर लेना होगा !   
जिस प्रकार किसी भी तरह की राजनीति से महामण्डल का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है, ठीक उसी प्रकार यह साधारण अर्थों में कोई धार्मिक या समाज-सेवी संगठन भी नहीं है ! जिस प्रकार महामण्डल का कोई सदस्य किसी भी राजनितिक दल या संगठन के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता; उसी प्रकार साधारण धार्मिक-संस्कार या धार्मिक-आचार अनुष्ठान का आयोजन करना या प्रचलित ढंग से होने वाले तथाकथित समाज-सेवा के  क्रिया-कलापों का महामण्डल की कार्यसूची में कोई स्थान नहीं है। अतः इस चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन की सफलता का निर्णय करने का मापदण्ड यह नहीं हो सकता कि अब तक इसके कितने भवन बने हैं, कितने विद्यालय या दातव्य चिकित्सालय आदि इसके द्वारा चलाये जा रहे हैं? 
महामण्डल का मूल उद्देश्य है- " युवाओं के चरित्र-निर्माण के माध्यम से देश में एक उन्नततर समाज
की स्थापना करना।"
महामण्डल द्वारा आयोजित विविध क्रिया-कलाप, सामाजिक सम्मेलन, शिक्षण-संसथान, समाज-सेवा आदि कार्य केवल युवाओं के चरित्र का निर्माण करने, या उनके हृदय को विस्तृत करने में  सहायक साधन हैं,और साध्य है युवाओं का जीवन गठन ! अतः महामण्डल आन्दोलन की सफलता का मूल्यांकन  इस तरह के कार्यों की मात्रा से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होगा कि ये सभी कार्य युवाओं को चारित्रिक गुणों को अर्जित करने में कितने सहायक सिद्ध हो रहे हैं ?  चूँकि इस प्रकार से मूल्यांकन करना कठिन होता है, और इसके सदस्यों के चारित्रिक गुणों का संवर्धन और उन्नति सतही दृष्टि से देखने पर दिखाई नहीं देती।
 इसीलिये  बिगिनर्स लोग ( महामण्डल के साथ नये-नये जुड़े लोग या नया -नया सदस्य बनने वाले लोग) युवाओं के मन पर हुए कार्य में उन्नति को पहचानने में अक्सर विफल रह जाते हैं, और श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द (नरेन्द्रनाथ दत्त) वेदान्त परम्परा में आधारित युवा-प्रशिक्षण को ग्रहण करने के प्रति आसानी से उत्साहित भी नहीं होते ! किन्तु इस प्रकार की  निःशब्द-साधना या नीरव कार्य-प्रणाली की सफलता के प्रति दृढ़ विश्वास को अपनी व्यक्तिगत अभिज्ञता या सामूहिक अभिज्ञता के द्वारा  प्राप्त करना चाहिये, एवं [" मनःसंयोग का अभ्यास तथा खुली आँखों से ध्यान करने की पद्धति"  को सीखने के लिये]  निरन्तर उत्साहित बने रहना चहिये !    
इस बात को हमें निश्चित रूप से समझ लेना होगा, कि व्यक्ति-चरित्र का निर्माण किये बिना , हमलोग अपने करोड़ो देशवासियों के दुःख-कष्ट को कभी दूर नहीं कर सकते, तथा उनके लिये  शिक्षा, आवास, भोजन आदि मुलभूत सुविधायें  नहीं जुटा सकते। इसके साथ-साथ इस युवा चरित्र-निर्माण आन्दोलन को देशव्यापी स्तर तक फैलाय बिना समाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार  को भी हम जड़ से नहीं उखाड़ सकते। और इसीलिये हमारा लक्ष्य भी यही है। 
जब तक हमारा समाज पूरी तरह से निरोग और स्वस्थ नहीं हो जाता, मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास या मनुष्यों की सम्पूर्ण शिक्षा (जो, कि यथार्थ धर्म या आध्यात्मिकता का ही दूसरा नाम है) सम्भव नहीं है। क्योंकि युवाओं का चरित्र-निर्माण ही समग्र-शिक्षा का 'सिने क्वा नोन' (sine qua non) अर्थात अनिवार्य शर्त है। तथा महामण्डल का यह सुविचारित चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन, देश के समग्र विकास और समृद्धि के उद्देश्य से एक नये समाज का निर्माण करने दिशा में ही कार्यरत है।  
ऐसा महान उद्देश्य कुछ मुट्ठी भर लोगों के द्वारा या यहाँ-वहाँ कार्यरत समूहों के द्वारा भी सम्पादित नहीं किया जा सकता। देश के सभी लोग पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक, एक बहुत बड़ी संख्या में जब एक ही उद्देश्य को प्राप्त करने इच्छा से, अपनी कार्य-योजना में अटल विश्वासी होकर, एक साथ संघबद्ध होकर, आगे बढ़ेंगे तो इस बात में कोई सन्देह नहीं कि परिवर्तन होकर रहेगा। 
इन्हीं विचारों से अनुप्रेरित होकर महामण्डल का आविर्भाव हुआ था। अब यदि हम सभी लोग एक साथ मिल- जुल कर काम नहीं करते, और जो सुविचारित कार्य-पद्धति है उसे कार्य-रूप देने के लिये कठिन परिश्रम नहीं करते, तो स्वामी विवेकानन्द ने भारत में आमूल-चूल परिवर्तन लाने का जो स्वप्न देखा था, उसे धरातल पर कैसे उतारा जा सकेगा ? हमलोगों ने बातें बहुत कर ली हैं, बहुत आहें भर चुके हैं, बहुत दिनों तक तन्द्रा में सोये रहे हैं। 
तूने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, 
अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना !   

बस, यह सब बहुत हो चुका, आइये हमलोग एकजुट होकर कार्य में जुट जाएँ । मनुष्य और समाज को हमलोग जिस रूप में ढालना चाहते हैं, उसके लिए हमारे पास पर्याप्त शक्ति भी है। 
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समन्वित इच्छाशक्ति: अमोघ शक्ति कैसे और क्यों बन जाती है ?  
" निस्सन्देह जगत जननी ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये ही श्री रामकृष्ण के शरीर का निर्माण किया था। देखो, मैं बिना यह विश्वास किये नहीं रह सकता कि कहीं कोई ऐसी शक्ति है, जो अपने को नारी मानती है और काली अथवा माँ जगत-जननी कही जाती है.... और मैं ब्रह्म में भी विश्वास करता हूँ" (क्या माँ के यन्त्र की इच्छाशक्ति अपनी नहीं माँ की ही होती है ? )   
" जो आन्दोलन वस्तुओं को, जैसी वे स्वरूपतः हैं- उस रूप में सुधारने का प्रयास नहीं करते, व्यर्थ हैं। " 


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