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शनिवार, 6 अगस्त 2016

$$$ नेता सर्वदा दाता की भूमिका में रहता है ! [एक नया आन्दोलन -13.'The Role of the Mahamandal ']

 'हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड' से हमें क्या सीखना है: अहंब्रह्मास्मि ! 
एक प्रसिद्द लोकोक्ति ह,'आप एक ही नदी में दो बार डुबकी नहीं लगा सकते।' किन्तु यह सूत्रवाक्य, एक अन्य सिद्धान्त -"इतिहास अपने आप को पुनः पुनः दोहराता है" के बिल्कुल बिपरीत प्रतीत होता है। जगत को भी एक सतत प्रवाहमान नदी के रूप में देखा जाता है। समय के साथ साथ यह जगत्प्रवाह भी किसी 
नदी की तरह भी प्रवाहित रहता है। और जिस प्रकार कोई नदी अपने रास्ते पर फिर से वापस नहीं लौट सकती, उसी प्रकार एक ही नदी में कोई दो बार डुबकी नहीं लगा सकता, क्योंकि उसी बीच वह समय के साथ पहले ही एक लम्बा रास्ता तय कर चुकी होती है। तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, कि तब फिर
इतिहास अपने आप को पुनः पुनः दोहराता कैसे है?

किन्तु यदि हम गुजरे हुए जमाने को,जिसे हम गलत या सही तरीके से इतिहास कहते हैं, या व्यतीत समय समझते हैं, उस समय की ओर पीछे मुड़कर देखें,तो पाते हैं कि परिस्थितियाँ बिल्कुल भिन्न रहने पर भी, 
वास्तव में वह परिवर्तनशील समय के प्रवाह में एक ही प्रकार की घटनाओं की ही पुनरावृत्ति होती है। और इस प्रकार हमारे समक्ष मानो एक 'लॉ ऑफ़ हिस्ट्री' - 'इतिहास का नियम' ही उद्घाटित हो जाता है कि,
'समय के प्रवाह में घटनाओं का पुनः पुनः दोहराव (अवतार-ग्रहण ?) यद्यपि बिल्कुल एक जैसी दिखने पर भी वे  केवल पूर्व घटनाओं की प्रतिलिपि या कॉर्बन-कॉपी ही नहीं होतीं!' फिर भी, तथ्य की अनदेखी करते हुए हमलोग अपने मन से सोच लेते हैं कि -" हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ" - इतिहास खुद को दोहराता है! 
[धोना था मन भूल गया तू, धोता रहा तन मलमल की। घर का ईश्वर भूल गया तू तीर्थ करता चल चल के।  अवध तहाँ जहाँ राम निवासु,जिस मन में बसते श्री राम वह तन है अयोध्या। प्रातकाल उठके रघुनाथा मातपिता-गुरु नाव ही माथा!] 
इन दोनों विरोधाभासी सिद्धान्तों का समाधान इस तथ्य में निहित है कि दोनों में से कोई भी उक्ति न तो पूरी तरह से गलत है, और न पूरी तरह से सही है। जब कोई घटना स्वयं को दोहराती हुई सी प्रतीत होती हैं, तब तक सम्पूर्ण परिस्थितियाँ पूरी तरह से बदल चुकी होती हैं, और सचमुच एक ही नदी में दो बार डुबकी नहीं लगाई जा सकती। किन्तु यदि हम बहती हुई नदी के यथार्थ अणु-परमाणुओं (H2O) के विषयों से अधिक मतलब नहीं रखें, तो पाते हैं कि अपनी 'विवेकविषय-निम्ना तली' के साथ तथा अपने दोनों किनारों आदि अन्य वस्तुओं के साथ नदी तो बिल्कुल वैसे ही है। उसी प्रकार जिस घटना को हम अभी देख रहे हैं, उसमें बहुत सी बातें ऐसी हैं, जो किसी पहले घटित घटना में भी उभयनिष्ठ थीं। जैसे किसी भाटा में एक खास बिन्दु पर एक शिखर भी प्रतीत होता है, इसकी प्रकृति भी बिल्कुल उसी घटना की तरह होती है, जिसका हमने पहले किसी सम
स्थान
य पर अवलोकन किया था।
यदि हम ध्यान से देखें, तो पायेंगे कि कई बड़े बड़े ऐतिहासिक उछलकूद में बहुत सी बातें एक समान बातें घटित होती रही हैं, और हम उससे बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। ऐतिहासिक प्रवाह की लम्बी श्रृंखला में मनुष्य ने कई बार अपनी आत्मश्रद्धा को खोया है,  और उसे पुनः प्राप्त भी कर लिया है, इसके परिणाम स्वरूप 'हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड' या संसार का इतिहास भी अलग अलग रूप धारण करता रहा है। और यहाँ तक कि इसी आत्मश्रद्धा-सम्पन्न और आत्मविश्वासी जनमानस की शक्ति के अनुसार, एक ही युग में, अलग अलग कई राष्ट्रों ने इतिहास के पन्नों पर भिन्न-भिन्न छाप छोड़ा है। 
स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, " संसार का इतिहास उन थोड़े से व्यक्तियों का इतिहास है, जिनमें आत्मविश्वास था। (जो अपना ईश्वरत्व कभी भूल ही नहीं पाते थे ?) यह विश्वास अन्तःस्थित देवत्व को ललकार कर प्रकट कर देता है। जिस क्षण व्यक्ति या राष्ट्र आत्म-विश्वास खो देता है, उसी क्षण उसकी मृत्यु आ जाती है।
और हमलोग भी इस समय, एक ऐसे कालखण्ड से गुजर रहे हैं जब हमारे देशवासियों ने अपनी आत्मश्रद्धा को खो दिया है,अपने आत्मविश्वास को लगभग सम्पूर्ण रूप से खो दिया है। एक हजार वर्षों की गुलामी ने हमें एक ऐसे राष्ट्र में परिणत कर दिया है, जिसके पास रीढ़ की हड्डी ही नहीं बची है। आज जबकि गुलामी के जुए को हमारे कन्धों से उठा दिया गया है, तब भी क्यों हमलोग अपना सिर उठाकर और सीना तान कर नहीं चल सकते ? कंधों से जुआ उठा दिए जाने के बाद भी हमारे कन्धे क्यों झुके हुए हैं? क्योंकि गोरे साहबों के चले जाने के बाद किसी, किसी दूसरे साहेब के आदेशरूपी जुए को अपने कन्धों पर शीघ्रातिशीघ्र रखे जाने की प्रतीक्षा में, 'आदतन गुलाम' (बैल) की भाँति, अपने कन्धों को झुकाये रखना ही अधिक सुविधाजनक प्रतीत होता है। किन्तु हम कभी स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होने, अपने भविष्य का  निर्माता (नेता) स्वयं बनने की बात तो सोच भी नहीं सकते। क्यों नौकरी दो-नौकरी दो करते हैं? स्वयं कोई व्यापर क्यों नहीं शुरू कर सकते, हमभी दूसरों को रोजगार दे सकते हैं, यह बात हमारे समझ में क्यों नहीं आती? (जबकि मोदी सरकार ने 'स्टैण्डअप इंडिया स्टार्टअप इंडिया' में १० लाख तक बिना गारंटी ऋण देने की सुविधा भी दे दी है।)    
क्योंकि हमने अभी तक 'अपने आप में विश्वास ' करने का सबक नहीं सीखा है। स्वामी विवेकानन्द चाहते थे कि हमलोग अन्य कोई शिक्षा ग्रहण करने से पहले, इसी सबक को सीखने का प्रशिक्षण प्राप्त कर लें!  इसीलिये  'वेदान्त का उद्देश्य ' नामक भाषण में उन्होंने कहा था - " विश्वास - विश्वास! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा के ऊपर विश्वास -यही उन्नति करने का एकमात्र उपाय है। यदि पुराणों में कहे गये तैंतीस करोड़ देवताओं के ऊपर , और विदेशियों ने बीच बीच में जिन देवताओं (साईं बाबा आदि ) को तुम्हारे बीच घुसा दिया है, उन सब पर भी तुम्हारा विश्वास हो, और अपने आप पर विश्वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नहीं हो सकते। अपने आप पर श्रद्धा करना सीखो! और इसी आत्मश्रद्धा के बल से अपने पैरों आप खड़े हो जाओ !"
यही वह सबक है , जिसे हमलोगों को व्यक्तिगत तौर पर (अहंब्रह्मास्मि) और एक राष्ट्र के रूप में (सर्वं खलु इदं ब्रह्म) भी सीखना बाकी है। जब तक हम मदद के लिये दूसरों के पास हाथ पसारते रहेंगे, भीख माँगते रहेंगे, तब तक हमलोगों को न तो व्यक्तिगत स्तर पर न राष्ट्र के स्तर पर मोक्ष के अधिकारी हो सकेंगे। हम लोग जीवन के हर क्षेत्र में, व्यक्तिगत स्तर एवं राष्ट्र के स्तर पर भी दाता की भूमिका ग्रहण करना भूल चुके हैं। हमलोगों को कभी इस बात की शिक्षा ही नहीं मिली कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति जीवन के किसी न किसी क्षेत्र में दाता की भूमिका ग्रहण कर सकता है। उसी प्रकार एक राष्ट्र के रूप में भी अन्य राष्ट्रों को देने के लिये हमारे पास बहुत कुछ है। 

स्वामीजी कहते थे - " संसार में सर्वदा दाता की भूमिका ग्रहण करो। सर्वस्व दे दो, पर बदले में कुछ न चाहो।" इस कार्य में हमारी सहायता वे ही कर सकते हैं जो अपने ईश्वरत्व को कभी नहीं भूलते। ये सभी अवतार (श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण,श्रीरामकृष्ण, बुद्ध,ईसा,) उन अभिनेताओं के समान हैं, जिनका अपना अभिनय समाप्त हो चुका है, जिनका निजी अन्य कोई प्रयोजन नहीं है तो भी दूसरों आनन्द देने के लिये रंगमंच पर बारम्बार लौट आते हैं। वे हमें कुछ काल तक शिक्षा देने भर के लिये हमारा रूप और सीमायें धारण करके आते हैं, वे ऐसा अभिनय करते हैं, मानो वे हमारे ही समान बद्ध हैं, किन्तु वे वास्तव में सीमित नहीं होते, वे सर्वदा मुक्तस्वभाव ही रहते हैं ।"(देववाणी- बुधवार,१९ जून, १८९५)]  
यदि हम एक सार्वभौम राष्ट्र के रूप जीना चाहते हों, और हमारी राष्ट्रिय मृत्यु को रोकने के लिये, यदि हम अपने खोये हुए आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त करना चाहते हों, तो ये ही वे सरल बातें हैं, जिन्हें हमें स्वयं को सिखाना पड़ेगा। समाज-सेवा के साधारण एवं छोटे-छोटे कार्य करते समय इसके वास्तविक उद्देश्य -अपने आत्मविश्वास का संवर्धन -पर अपनी दृष्टि को स्थिर रखते हुए, हम यह सीख सकते हैं कि बदले में कुछ भी पाने की आशा किये बिना ही दाता की भूमिका को कैसे ग्रहण किया जाता है और साथ ही साथ भरपूर आत्मविश्वास भी कैसे अर्जित होता है। 
इसी प्रयत्न में जुट जाने के लिये अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल, अपने सभी युवा मित्रों को अनुप्रेरित करता आ रहा है। वास्तव में महामण्डल यह नहीं जानता कि आगे चलकर व्यापक सन्दर्भ में इसे कौन सी भूमिका निभानी होगी। इसका कोई बहुत विस्तृत मैनिफेस्टो या घोषणा पत्र नहीं है। यह बहुत ही छोटे रूप में गठित होकर, छोटे से बड़ा होता जा रहा है। धीरे धीरे यह युवाओं के मन को जीत रहा है, ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को तो विशेष रूप से अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। ये युवा स्वयं को एक दुर्भेद्य-दुर्ग के रूप में गठित कर रहे हैं, जहाँ स्वार्थपरता को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, जहाँ सेवापरायणता कभी आत्म-श्लाघा के बोझ तले दब नहीं जाती, तथा भौतिवाद और भोग-विलास की उत्ताल तरंगे उनके चट्टानी चरित्र रूपी परकोटे से टकराकर वापस लौट जाती हैं !
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- 'आइ  नेवर मेक प्लान्स, प्लान्स ग्रोज ऐंड वर्क देमसेलव्स आइ ओनली से- अवेक, अवेक!' " मैं कभी योजना नहीं बनाता, कार्य में लगे रहने से ही मुझे भेद-प्रभेद सहित सब बातें ज्ञात हो जाती हैं। कार्य-संकलप का उदय स्वतः होता है और वह निज बल से ही पुष्ट होता है। मैं केवल कहता हूँ -जागो, जागो !" (७ जून १८९६ को लिखित एक पत्र) 
आज,जब  हमलोग किसी के ऊपर भरोसा नहीं रख पाते हैं, यहाँ तक कि 'स्वयं के ऊपर' भी  विश्वास नहीं कर पा रहे  हैं, महामण्डल सभी युवाओं से केवल यही अनुरोध करना चाहता है कि वे स्वामी विवेकानन्द के आह्वान -"उठो, जागो !" को ध्यान देकर सुनने (hearken ) और समझने का प्रयास करें, और उस संकट की स्थितियों के प्रति जाग उठें, जिन  विषम परिस्थितियों में हमारी चिर गौरवमयी भारतमाता घिरी हुई है। सन्देह या अविश्वास कभी राष्ट्र-निर्माण के लिये प्रेरक-बल (Motive Power) नहीं बन सकता। 
केवल आत्मविश्वास ही व्यक्ति को दाता की भूमिका ग्रहण करने के लिये अनुप्रेरित कर सकता है ! हमें यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिये कि हमारा एकमात्र धर्म-मत या सिद्धान्त (creed) है, राष्ट्र-निर्माण ! और उस भविष्य के भारत का निर्माण हमें अपनी महान राष्ट्रिय-प्रतिभा के अनुरूप ही करना चाहिये, जो यह शिक्षा देती है कि राष्ट्र-निर्माण भीख माँगने से नहीं , केवल दाता की भूमिका ग्रहण करने से ही सम्भव होता है !  
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -" इस संसार में ईश्वर से साक्षात्कार का प्रयास करते रहना ही, जीवन है ! यदि एक क्षण के लिये भी तुमने यह सोचा कि तुम स्वयं ईश्वर नहीं हो , तो तुम्हें महाभय ग्रास कर लेगा। और जैसे ही तुम सोचोगे, 'सोSहम --मैं वही हूँ,' वैसे ही तुम्हें महान आनन्द और शान्ति की उपलब्धि होगी। " ( ज्ञान और कर्म ९/१९२ ) 
यदि अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल को भविष्य का नया -भारत गढ़ने में  कोई भूमिका अदा करनी है या कोई महत्वपूर्ण कार्य-भाग ग्रहण करना है, तो वह है देश के नवयुवकों में इस खोये हुए आत्मविश्वास को वापस लौटा देने में सहायता करना । 
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" मनुष्य को नैतिक और पवित्र क्यों होना चाहिये ? क्योंकि इससे उसकी इच्छाशक्ति बलवती होती है। वह सब जो मनुष्य की अन्तर्निहित दिव्यता को उद्भासित करते हुए उसकी इच्छाशक्ति को सबल बनाये, नैतिक है। और वह सब, जो इसके विपरीत करे, इम्मोरल या अनैतिक है। 
" समग्र संसार हमसे इस धर्मसहिष्णुता की शिक्षा ग्रहण करने के इन्तजार में बैठा हुआ है। हाँ, तुमलोग शायद नहीं जानते कि विदेशों में कितना परधर्म-विद्वेष है। धर्म के लिए किसी मनुष्य की हत्या कर डालना पाश्चात्य देशवासियों के लिये इतनी मामूली बात है कि आज नहीं तो कल गर्वित पाश्चात्य सभ्यता के केन्द्रस्थल (पेरिस ?) में ऐसी घटना हो सकती है!" (वेदान्त का उद्देश्य ५/८३ -८६) ]





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