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सोमवार, 8 अगस्त 2016

'वेदान्त परम्परा में मनुष्य-निर्माण की प्रशिक्षण प्रणाली ' [एक नया आन्दोलन -14.'The Plan of Work ']

'पाठचक्र, मनःसंयोग, प्रार्थना और समाज सेवा'- चारो योगों की चार धारायें'

महामण्डल का मुख्य कार्य है, नवयुवकों के मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना- जिससे उन्हें एक नई जीवन-दृष्टि  (life-view) प्राप्त हो, और वे स्वयं अपने जीवन के चरम लक्ष्य को निश्चित करने में सक्षम हो सकें। जीवन क्या है ?  मनुष्य-जीवन को देव-दुर्लभ क्यों कहा जाता है? मैं कौन हूँ, यहाँ क्यों आया हूँ, मेरी ज़िन्दगी का असली मकसद क्या है ?  आत्मविकास करने और चरित्र-निर्माण की व्यवहारिक पद्धति क्या है?
ये सभी बातें युवाओं को सरल भाषा में समझा देना ही महामण्डल की मुख्य कार्य-योजना है। ताकि हमारे युवा ऐसे 'कान्शीएन्शस सिटीजन्स' (conscientious citizens) अर्थात  "अन्तर्विवेकशील नागरिक' बन सकें, जो अपने परिवार, समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के साथ-साथ अपने व्यक्ति-जीवन में उच्चतर परिपूर्णता को प्राप्त कर उसे सार्थक करने में सफल हो सकें! महामण्डल की समस्त कार्य-योजनायें इसी उद्देश्य को प्राप्त करने की दिशा में निर्देशित हैं।प्रत्येक मनुष्य के व्यक्ति-जीवन और चरित्र को उन्नततर बनाकर, एक उन्नततर समाज का निर्माण करना ही महामण्डल  का उद्देश्य है। स्वामी विवेकानन्द के प्रसिद्द मुहावरा में कहें तो 'मैन -मेकिंग एंड करैक्टर-बिल्डिंग,' -'मनुष्य निर्माण और चरित्र-निर्माण' ही  महामण्डल का उद्देश्य है।
'मनुष्य निर्माण' का अर्थ होता है,उसके तीनों प्रमुख अवयव -'3H' हैण्ड, हेड, हार्ट का संतुलित विकास! यहाँ हैण्ड -बाहुबल या मनुष्य की शारीरिक शक्ति या कर्म करने की शक्ति का प्रतीक है; पौष्टिक आहार और व्यायाम के द्वारा शरीर को स्वस्थ और सबल रखना। हेड के विकास का अर्थ है-मनुष्य की इच्छाशक्ति, विवेक-प्रयोग करने की शक्ति और संकल्प लेने की शक्ति को विकसित करने के लिये मनःसंयोग का अभ्यास करना। हर्ट को विकसित करने का अर्थ है -दूसरों के सुख-दुःख को अपने हृदय में अनुभव करने की शक्ति को विकसित करना।जब,समाज का प्रत्येक व्यक्ति, सामूहिक रूप से और व्यापक पैमाने पर इसी एकमात्र उद्देश्य - '3H' का संतुलित विकास को प्राप्त करने के लिये प्रयास करने लगेगा, तो निश्चित रूप समाज के ऊपर इसका प्रभाव पड़ेगा, जिसके फलस्वरूप के समाज की अवस्था में भी धीरे धीरे उन्नति दिखने लगेगी। 
किन्तु इस  'मनुष्य-निर्माण योजना'  को पंच-वर्षीय, दस-वर्षीय या पच्चीस वर्षीय योजना में सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता । क्योंकि एक पीढ़ी के बाद,  दूसरी पीढ़ी आती रहती हो, इसीलिये हमें इस 'कार्य-योजना' को निरन्तर जारी रखना पड़ेगा। और हमारे जीवन में ऐसा कोई क्षण नहीं आयेगा, जब हम उच्च स्वर से घोषणा करेंगे, " फ़िनिश ! हमारा कार्य समाप्त हुआ, हमने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है-  देखो यह रहा, पूर्ण विकसित मनुष्यों का परिपूर्ण समाज!" - यह एक अवास्तविक कल्पना है, अयथार्थवादी कथन है -  ऐसा समय कभी नहीं आने वाला है। जो लोग इस कार्य-योजना को  अपने जीवन का एक मिशन समझकर, इसके साथ जुड़ना चाहते हैं, उन्हें 'लाइफलॉन्ग स्ट्रगल' या आजीवन परिश्रम  (जिद्दोजहद) करते रहने के लिये अवश्य तत्पर रहना होगा, तथा आजीवन-परिश्रम करते रहने की- (विवेकानन्द से विरासत में प्राप्त)  इस थाती को उन भावी नेताओं के हाथों में सौंप देना होगा, जो हमारे बाद इस आन्दोलन से आकर जुड़ने वाले हैं ! 
महामण्डल युवाओं का संगठन है, जिनमें से सभी युवा प्रचलित धार्मिक अनुष्ठानों को नहीं भी पसन्द कर सकते हैं।  किन्तु वे एक योग्य नागरिक बनने में रूचि रख सकते हैं। ऐसा देशभक्त नागरिक जो अपने जीवन को देशवासियों एवं मातृभूमि के कल्याण में समर्पित कर देने में सक्षम हो;  निश्चित रूप से यह आध्यात्मिकता का एक सुन्दर उदाहरण है, और इसी के माध्यम से वे पूर्ण मनुष्यत्व भी अर्जित कर सकते हैं।
एक बड़ी संख्या में निष्कपट,  ईमानदार,  मेहनती, देशभक्त, निःस्वार्थपर, विनम्र-शिक्षणीय, त्यागी-बलिदानी , उत्साही, और साहसी युवक- देश में हर जगह हैं, जो मातृभूमि के उत्थान के लिए खुद को समर्पित कर देने को उत्सुक हैं।  वैसे युवाओं को संगठित एवं उत्साहित किया जा सकता है। 
दी रियल नीड मस्ट बी अन्डरस्टूड :  किन्तु उन्हें देशसेवा के लिये इस मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन 'BE AND MAKE' में कूद पड़ने के पहले, यह अच्छी तरह से अवश्य समझ लेना चाहिये कि देश के 'समग्र विकास और समृद्धि के सर्वाधिक आवश्यक वस्तु क्या है, उस आवश्यकता को पूर्ण करने की पद्धति क्या है? और उस पद्धति का प्रयोग अपने साथ-साथ दूसरों पर भी बहुत सही ढंग से प्रयोग करके उसके
परिणाम (महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यासों का परिणाम) पर भी दृष्टि रखनी होगी, जहाँ कमी हो उसे दुरुस्त करते जाना होगा। 
यदि भारत को उत्कृष्टतर राष्ट्र बनाने के लिये, हम उसमें महान परिवर्तन लाना चाहते हैं - तो उसका यही उपाय है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं  - " व्हेन यू डील विथ रूट्स एंड फॉउंडेशन्स,ऑल रीयल प्रोग्रेस मस्ट बी स्लो" - अर्थात 'जब आप जड़ों और ठोस बुनियाद पर कुछ करना चाहते हैं, तो समस्त वास्तविक प्रगति मन्द ही होगी।' ४/२३३]  [अर्थात महामण्डल की कार्य-योजना श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में अपने अन्तर्निहित सत्य या ईश्वरत्व को जानने की पद्धति को सीखकर स्वयं एक-सत्यद्रष्टा या  'ब्रह्मवेत्ता मनुष्य' या मानवजाति का मार्गदर्शक नेता बनना है, और दूसरों को भी अपने अन्तर्निहित सत्य को खोजने की पद्धति का प्रशिक्षण - या नेतृत्व का प्रशिक्षण प्राप्त करने में सहायता करना है।]
[किन्तु प्रत्येक समाज में कुछ न कुछ 'कैंची-श्रेणी के मनुष्य'  भी होते हैं, जो हर बात को काटने के लिये ही प्रश्न उठाते हैं; वैसे] कुछ लोग पूछते सकते हैं  - " क्या सभी मनुष्यों को उन्नत किया जा सकता है ? " ठीक है, यदि नहीं ही किया जा सकता है, तो आप बताइये - आपके पास क्या विकल्प है ? यही न, कि यथा-स्थिति को बने रहने दिया जाय ? देश को उसके हाल पर छोड़ दिया जाय, क्या ऐसा सोंचने से किसी भी समस्या का हल निकलेगा ? किन्तु यदि इस 'BE AND MAKE' की कोशिश को जारी रखा गया तो कम से कम कुछ लोगों के चरित्र में तो अवश्य सुधार होगा; और क्रमशः इनकी संख्या में वृद्धि होते होते क्रमशः परिस्थितियाँ बदलने को बाध्य हो जायेंगी।
स्वामी विवेकानन्द इसी बात की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं - " और जब हम विश्व-इतिहास का मनन करते हैं, तो पाते हैं कि जब जब किसी राष्ट्र में ऐसे लोगों (सत्य या ब्रह्म के खोजी)  की संख्या में वृद्धि हुई है, तब तब उस राष्ट्र का अभ्युदय हुआ है; तथा जब ससीम में असीम और अविनाशी आत्मा  खोज - उसे उपयोगितावादी कितना भी अर्थहीन प्रमाणित करने की चेष्टा क्यों न करें, --समाप्त हो जाती है, तो उस राष्ट्र का पतन होने लगता है। " २/१९८ और हमें (महामण्डल के प्रत्येक सदस्य को ) इसी के लिये कार्य करना है !
अब कुछ लोग पूछ सकते हैं, और जैसा हमें अक्सर सुनने के लिये मिलता है, " ठीक है, आप लोगों का उद्देश्य तो महान है, योजनायें भी प्रशंसनीय हैं, किन्तु इस कार्य-योजना को साकार करने के लिये आपका मार्ग क्या है ? "
इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि, 'मनुष्य-निर्माण एवं चरित्र-निर्माण' की जिस पद्धति का अविष्कार हमारे पूर्वज ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही कर लिया था, स्वामी विवेकानन्द ने उसी पद्धति को वनो के
आश्रमों और मठों के चहारदीवारियों से बाहर निकाल कर जन-सामान्य के घरों तक पहुँचा दिया है। और चरित्र-निर्माण की यह पद्धति आधुनिक मनोविज्ञान की (वर्बाटिम) शब्दशः या शब्द प्रति शब्द
प्रतिध्वनि है, और पूर्णतः विज्ञान सम्मत भी है। 
[श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में आधारित] 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण'  की इस मनो-वैज्ञानिक प्रणाली के विषय बहुत संक्षेप में कहें तो, " इस पद्धति में चारित्रिक-गुणों के सिद्धान्तों का पहले श्रवण करना, फिर उसके ऊपर गहराई से चिंतन- मनन करने के बाद उसकी स्पष्ट अवधारणा को-विवेक-प्रयोग और मनःसंयोग का अभ्यास करते हुए, अपने अवचेतन मन (सबकॉन्शस माइन्ड ) में अंतःस्थापित (एम्बेडिड) कर लेना पड़ता है। तत्पश्चात विवेक की पहरेदारी और मार्गदर्शन में उपरोक्त प्रक्रिया का पुनः पुनः अभ्यास इतनि तत्परता के साथ करना है कि वे सिद्धान्त-  " हमारे अवचेतन मन में स्थायी रूप से 
(indelibly) मुद्रित हो (impressed) जायें, या हमारे हृदय में उन सिद्धान्तों (चार महावाक्यों) की मुहर लग जाये। [स्वामी विवेकानन्द को इसी मुहर के लगे होने का लिखित चपरास भी अपने पथप्रदर्शक नेता से प्राप्त हुआ था ?] इसीलिये इस प्रशिक्षण पद्धति में अपने भावावेग (इमोशन्स) को नियंत्रित और लक्ष्य की दिशा में निर्देशित रखने में हृदय (पथप्रदर्शक) की भूमिका द्वारा सदैव सरस बनाये रखना होगा। 
इस प्रकार यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण' की यह प्रक्रिया, "विवेक-प्रयोग (ज्ञानयोग ), मानसिक नियमन (चित्तवृत्ति का नियंत्रण या राजयोग), हृदय के आवेग का नियंत्रण (भक्तियोग) और निःस्वार्थ समाज-सेवा के कार्य (कर्मयोग); चारों योगों का एक सामंजस्यपूर्ण संयोजन है। 
महामण्डल के सभी कार्यकलाप इतने सुनियोजित हैं कि इसमें सम्मिलित होने वाले प्रत्येक सदस्य को उपरोक्त चारों योगों के सामंजस्यपूर्ण संयोजन से होकर गुजरना ही पड़ता है। 'पाठचक्र, मनःसंयोग, प्रार्थना और समाज सेवा' चरित्र-निर्माण प्रक्रिया में  चारो योगों को क्रमशः चार धाराओं में निरूपित करती है। समाज
सेवा महामण्डल का लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह चरित्र-निर्माण का एक उपाय मात्र है। इसीलिये महामण्डल कार्य-योजना की सफलता का पैमाना - भवनों, अस्पतालों, स्कूलों या भवनों की संख्या से करना ठीक नहीं होगा। बल्कि समाज सेवा के कार्यों को करते समय सेवाकर्मियों का दृष्टि-कोण, एवम इस प्रकार के कार्यों को करते समय उनकी विवेक-प्रयोग करने की क्षमता में वृद्धि, [दृष्टि को ज्ञानमयी बनाकर जगत को ब्रह्ममय देखने की क्षमता में वृद्धि] खुली आँखों से 'ध्यान और सेवा'  करते समय हृदय को सरस बनाये रखते हुए भावावेग पर नियंत्रण, और मनःसंयम का सामंजस्यपूर्ण संयोजन कितना है - इत्यादि बातें ही विचारणीय हैं।

महामण्डल युवाओं के लिये इस प्रकार का एक परिवेश उपस्थित कराता है, जिसमें शामिल होकर वे महामण्डल की कार्य-योजना के अनुरूप अपने चरित्र का निर्माण कर सकते हैं। महामण्डल के केन्द्र (जिनकी संख्या विभिन्न राज्यों में ३१५ से  अधिक हैं) शहर या गाँव कहीं भी स्थापित किये जा सकते हैं। इसे किसी कमरे, बरामदे या वृक्ष की छाया में, या खेल के मैदान अथवा पार्क में -जहाँ नवयुवक इकट्ठा होते हों, वहीं स्थापित किया जा सकता है।
 महामण्डल के सभी सदस्य अपने शरीर को स्वस्थ और सबल रखने के लिये व्यायाम करते हैं, ज्ञान अर्जित करने के लिये अध्यन और सामूहिक विचार गोष्ठी -स्टडी-सर्कल में अपनी बुद्धि को सतेज करते हैं। इसके साथ साथ स्वामी विवेकानन्द के उपदेशनुसार मानवता की सेवा मूलक कार्यों में अपना योगदान देकर अपने ह्रदय को समुद्र जितना विशाल बनाने का प्रयास भी करते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा निर्देशित यह चरित्र-निर्माणकारी पद्धति कितनी व्यावहारिक है, इस पर कोई तब तक विश्वास नहीं कर सकता जब तक वह इन चारों प्रक्रियाओं से गुजरने के फलस्वरूप अपने हृदय के विस्तार को देखकर स्वयं ही आश्चर्य से चकित न हो जाये !
बच्चों के लिये भी इसीके अनुरूप किन्तु अधिक सरल ढंग से अभ्यास (exercises) करने की व्यवस्था की जाती है। मनुष्य-मात्र में जो देवत्व अन्तर्निहित है, उसकी पूजा करते हुए, उसे हर कदम पर अभिव्यक्त करने के उद्देश्य से बाह्य सेवा की पद्धति का लाभ उठाने के लिये, महामण्डल केन्द्रों के द्वारा चैरिटेबल- डिस्पेन्सरी, कोचिंग क्लास, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, छात्रावास, शिशु पाठशाला, पुस्तकालय इत्यादि चलाये जाते हैं। इसके अलावा प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों के लिये राहत कार्य, कृषि-प्रशिक्षण, ग्रामोन्नयन के कार्य, गरीबछात्रों तथा अभावग्रस्त लोगों की सहायता के लिये अन्य गतिविधियाँ भी चलायी जाती है। अवसर मिलने पर निर्धन रोगियों के लिये वे अक्सर रक्तदान भी किया जाता  है।
वे उस प्रकार के समस्त कार्यों का अभ्यास करते हैं, जो उनकी मांस-पेशियाँ को पुष्ट, मस्तिष्क तेज, और हृदय विस्तृत या उदार बना देती है। आत्म सुधार और चरित्र-निर्माण की पद्धति में प्रशिक्षित होने के लिये तथा चरित्र-निर्माणकारी आन्दोलन की सम्पूर्ण योजना को हृदयंगम कराने के लिये, अक्सर जिला-स्तरीय से लेकर अखिल भारतीय स्तर पर  युवा प्रशिक्षण शिविर आयोजित होते रहते हैं। 
जो युवा उस प्रक्रिया में अन्तर्निहित तात्विक सिद्धान्तों और मनोवैज्ञानिक पद्धति को सीखने में रूचि रखते हैं, उन्हें विशिष्ट पद्धतियों की विस्तृत जानकारी दी जाती है तथा उन्हें अपनी क्रमागत उन्नति का रिकॉर्ड रखने का परामर्श भी दिया जाता है। चारित्रिक -गुणों के मनांक के रिकॉर्ड्स का फॉलो-अप स्ट्डी (आत्ममुल्यांकन तालिका ) सभी सदस्यों के  चारित्रिक-गुणों में क्रमशः सुधार की बहुत उत्साहजनक परिणामों को इंगित करते हैं ।देश के विभिन्न राज्यों से आये विभिन्न मतावलम्बी और भाषा-भाषी युवा जब एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये, एक जगह पर सम्मिलित होकर विभिन्न आयोजनों  में हिस्सा लेते हैं, सामूहिक चर्चाओं में भाग लेते हैं, साथ साथ रहते हैं, तो उनमें परधर्म सहिष्णुता, सहयोग की भावना, एकात्म-बोध एवं राष्ट्रीय एकता की भावना जागृत होती है। 
प्रशिक्षण शिविर के समस्त  कार्यक्रम युवाओं को - कर्तव्यपारायण, देशभक्त, निःस्वार्थी एवं मनुष्योचित समस्त गुणों से विभूषित, त्याग और सेवा में उद्बुद्ध, तथा उदार जीवन-दृष्टि से सम्पन्न -एक आदर्श अन्तर्विवेकशील नागरिक बनने के लिये अनुप्रेरित करते हैं ।
युवाओं के लिये यह समझ लेना अत्यन्त आवश्यक है कि जब तक हमारा अपना चरित्र सुन्दर ढंग से गठित नहीं हो जाता, तब तक हम राष्ट्र की सेवा करने, समाजिक समस्याओं  समाधान करने तथा समाज के अनिष्ट को रोकने में  समर्थ नहीं हो सकते हैं। सही ढंग से देश की सेवा करने के लिये, सर्वप्रथम उन्हें अपने को उसके योग्य बना लेना अनिवार्य है। यथार्थ मनुष्य बनने और बनाने की यह प्रक्रिया ही समाज में दृष्टिगोचर होने वाली समस्त बुराइयों- ( जुवनाइल क्राईम, भ्रष्टाचार, जे.एन.यू के कुछ छात्रों का राष्ट्रद्रोही आचरण आदि) को उत्पन्न होने से रोकने में समर्थ एक प्रिवेन्टिव प्रोसेस है। 
अतः समाज के अन्य सभी वरिष्ठ विचारशील लोगों के लिये यह  स्वाभाविक कर्तव्य हो जाता है कि वे युवाओं को अपना जीवन सही ढंग से गठित करने में गंभीरता पूर्वक सहायता करें। तथा - वास्तव में यही वह कार्य-क्षेत्र है, जिसमें अपनी समस्त ऊर्जा लगा देने का निर्णय महामण्डल ने ले लिया है। ('दिस इज एक्जैक्टली दी फील्ड दी महामण्डल हैज चोजेन टु वर्क')। 
इसीलिये  सर्वाधिक जरुरी कार्य है -युवाओं को 'रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' में पूर्ण मनुष्य बनने और बनाने के लिये सही ढंग से प्रशिक्षित करना। इस  प्रशिक्षण की पूरी पद्धति इस प्रकार सुनियोजित होना चाहिये कि उससे युवाओं का सर्वांगीण विकास सम्भव हो सके। ' ए 'टोटल मैन' आउट ऑफ़ एव्री युथ शुड बी दी एम'- प्रत्येक युवा को एक 'पूर्ण मनुष्य ' (ब्रह्मवेत्ता मनुष्य) के रूप में निर्मित कर देना ही इस प्रशिक्षण का लक्ष्य होना चाहिये। प्रचलित संस्थागत शिक्षा प्रणाली समग्र-शिक्षा के इस अत्यावश्यक तत्व को प्रदान नहीं कर पाती , जिसे प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक के लिये अनिवार्य है। इस दृष्टि से देखें तो महामण्डल का कार्य एक प्रकार से प्रचलित शिक्षा प्रणाली की न्यूनता का परिपूरक है। 
इस प्रशिक्षण पद्धति के साथ समाज-सेवा का कार्य भी घनिष्ट रूप से जुड़ा हुआ है, इसलिये जिन क्षेत्रों में महामण्डल के केन्द्र क्रियाशील हैं, वहाँ का समाज भी इन केन्द्रों द्वारा गयी की सेवा से लाभान्वित होता है। तथा जो लोग महामण्डल के सदस्य बन जाते हैं, उन्हें जो सेवा दी जाती है शायद वही सर्वोत्कृष्ट  समाज सेवा है, क्योंकि यही एक मात्र ऐसी सेवा है जो समाज में वास्तविक परिवर्तन ला सकती है।
अतएव, महामण्डल जीवन-गठन करने के लिये धीर-गति का एक ऐसा विशिष्ट आन्दोलन है, जिसके साथ यदि  देश के युवा पर्याप्त संख्या में जुड़ जायें तो यह आन्दोलन आगे चलकर निश्चित रूप से पूरे समाज को उन्नति के रास्ते पर आगे बढ़ा सकता है। विगत ४९ वर्षों से इस कार्य की प्रगति तथा कार्य-पद्धति की सफलता के प्रत्यक्ष प्रमाण को देखकर यह आशा  लगातार बढ़ती जा रही है, और जो लोग इस आन्दोलन के कार्यकर्ता हैं, उनके मन की आशा अब दृढ़ विश्वास में परिणत हो चुकी है। 
चरित्रवान मनुष्यों का निर्माण करने, तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में उनकी आपूर्ति करने के इस धन्यवाद विहीन कार्य को महामण्डल यदि  सालों -साल तक केवल सफलतापूर्वक संचालित रखने में भी सक्षम हो जाता है -तो यह उतने से ही - पूर्ण सन्तुष्ट होगा। क्योंकि महामण्डल का उद्देश्य कभी युवाओं को अपने नियंत्रण में लेना, और छात्र - राजनीति के माध्यम से सत्ता की कुर्सी प्राप्त करना नहीं है; बल्कि वह इसलिये करना चाहता है कि इस कार्य - को किये बिना अन्य किसी भी उपाय से समाज की जटिल समस्याओं का निदान होना कभी सम्भव नहीं है। स्वामी विवेकानन्द के कथन, " अतएव पहले मनुष्य का निर्माण करो" ('ऎण्ड देयरफॉर मेक मेन फर्स्ट.') - का तात्पर्य भी यही है। हमलोगों ने अभी तक उनके इस परामर्श के ऊपर समुचित ध्यान नहीं दिया है, किन्तु उनके इसी प्रस्ताव के भीतर एक क्रन्तिकारी परिवर्तन के बीज निहित हैं ।
अतएव आधुनिक भारत के सच्चे नेता स्वामी विवेकानन्द को ख़ारिज करने या इनके महत्व को कम करने के षडयन्त्र के तहत  इनके नाम के आगे- 'हिन्दू मोंक ऑफ़ इंडिया ' लिखकर या  'भारत का हिन्दू संन्यासी'  का लेबल (विशेषण) चिपका कर उनकी शिक्षाओं की उपेक्षित रखने का प्रयास करना छोड़ देना चाहिये। हमें  सत्ता और सम्पत्ति जमा करने के लोभी  स्वप्नों को त्याग देना चाहिये और इस  इस 'मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन '- को भारत के कोने-कोने तक पहुँचा देना चाहिये।
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[ जो लोग मैटर में इनर्जी को खोज लेते हैं, (आइंस्टिन आदि) उन्हें भौतिक विज्ञानी या साइंटिस्ट कहा जाता है, और जो लोग इस नश्वर शरीर में अविनाशी आत्मा को (अपने सच्चे-स्वरूप) जान लेते हैं उन्हें ' ऋषि ' (या आध्यात्मिक वैज्ञानिक-स्वामी विवेकानन्द ) कहा जाता है।]  


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