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बुधवार, 3 अगस्त 2016

" हमारी सीमा" [एक नया युवा आंदोलन-9'Our Limitation]

निःस्वार्थ समाज सेवा हृदय को विकसित करने का साधन है !

हमें हमारी सीमा का पता है। किन्तु इससे हमारे उत्साह में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने जा रही है। क्योंकि ये सीमायें हमें उसके अतिक्रमण का उपाय ढूँढ़ने में सहायता भी करती हैं। 'मैन इज  आउट्वर्ड्ली
 लिमिटेड'  बाह्य रूप से देखने पर मनुष्य सीमित है। किन्तु जब कोई मनुष्य यह जान लेता है कि वह तो स्वरूपतः ब्रह्म है-(अत्यन्त महान, बृहद या आत्मा है--जिससे सब निकला है, जिसमें सब स्थित है, और जिसमें सब लीन हो जाता है !), तब वह स्वयं को अपनी असीम महानता तक विकसित करने की चेष्टा करता है।
कोई कार्य केवल इसलिये महान और अच्छा नहीं हो जाता कि उसका प्रिंट मिडिया या इलेक्टॉनिक मिडिया में बड़ी धूमधाम के साथ प्रचार किया जाता है। हमलोग जिस वेदान्त (उपनिषदों के महावाक्यों ) की बातों का प्रचार करते  हैं, हो सकता है कि बहुत थोड़े से लोग ही उसे सुनने के लिये  तैयार हों। फिर भी एक बड़ी संख्या में, भारत के कुछ प्रबुद्ध युवा ऐसे हैं, जो इन विचारों को विगत उनचास वर्षों से सुनते आ रहे हैं। इसीसे हमें अपने उद्देश्य और कार्य-पद्धति पर भरोसा और बढ़ता ही जा रहा है। 
यदि किसी जुलुस में थोड़े से विदेशी स्त्री-पुरुषों को शामिल कर लिया जाय, तो उस खबर को एक फोटो के साथ अख़बार के मुखपृष्ठ पर जगह मिलती है। किन्तु जब कुछ हजार युवा , " भगवान श्रीरामकृष्ण देव श्री श्री माँ सारदा देवी और स्वामी विवेकानन्द " (ठाकुर-माँ-स्वामीजी ) की तस्वीर के साथ - ' माँ मुझे मनुष्य बना दो ! ' हम 'मनुष्य' बनना चाहते हैं !' का नारा लगाते हुए शहर के राजमार्ग पर शोभा-यात्रा निकालते हैं, तो यह समाचार किसी इलेक्ट्रॉनिक मिडिया या प्रिंट मिडिया रिपोर्टर्स के ध्यान को आकर्षित क्यों नहीं करता? 
क्योंकि जो लोग 'मनुष्य' की महानता के विषय में कुछ नहीं जानते, ( कि ब्रह्म को भी जान लेने की क्षमता उसके पास है !)  जो लोग अपनी नाक से अधिक दूर तक नहीं देख सकते, जो संकीर्ण दृष्टिकोण रखने वाले लोग हैं, घोर स्वार्थ-परता के नमूना हैं, विचार-शून्य हैं, वैसे संसारी लोगों का चलन ही वैसा है। हमें ऐसी बातों के लिए किसी पत्रकार, राजनेता या मीडियाकर्मी से  शिकवा-शिकायत करने में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहिये,बल्कि कृतसंकल्प होकर जी-जान लगाकर अपना कार्य करते रहना चाहिए।
हमारे देश के लोगों की दशा और बहुत बड़ी संख्या में उनकी  समस्याओं के विषय में लोग अच्छी तरह जानते हैं। और इन्हें काबू में रखने के लिये सरकारी तंत्र, लोकतंत्र, ढेरों गैरसरकारी योजनायें भी हैं। तथा 
उनके परिणाम भी लोगों को ज्ञात हैं। वस्तुस्थिति की सच्ची मीमांसा करने पर यही अनुभव होता है कि कुछ ऐसा रह गया है, जिसे किया जाना बाकी है और जो अन्य किसी भी संगठन की कार्यसूची में नहीं है। उस छूटे हुए कार्य को महामण्डल ने स्वयं आगे आकर चुन लिया है। और सभी की नजरों से वह छूटा हुआ 
कार्य है, अपने-आप को मनुष्य जैसा 'मनुष्य' बनाने का कार्य। 
देशवासियों के दुःख-कष्टों को दूर करने और देश को खुशहाल बनाने, जिस पर हमें गर्व हो ऐसा एक महान राष्ट्र बनाने-  के लिए  किये जाने वाले सभी प्रयास, अन्ततोगत्वा केवल इसी एकमात्र कमी के कारण असफल हो जाते हैं। यह कार्य बिना किसी तत्काल पुरष्कार प्राप्त करने की अपेक्षा किये, हमसे  दूर दृष्टि और दृढ़ संकल्प के साथ निरंतर कठोर परिश्रम करते जाने,और किसी भी तरह के बलिदान देने के लिए मानसिक और नैतिक रूप से तैयार रहने की मांग करता है । नैतिकता की दृष्टि से सर्वाधिक उचित कार्य को, सामान्य लोगों के तात्कालिक विचारों का परवाह किये बिना,  दीर्घ काल तक करते रहना- निश्चित रूप से सबसे बड़ी जिम्मेदारी का कार्य है। और यह स्वाभाविक है कि इस प्रकार के विचार का अनुसरण करने वालों की संख्या कभी  बहुत अधिक नहीं हो सकती।  
यदि 'आत्म-सुधार ' के कार्य को तह तक स्कैन करके देखा जाय, या बहुत बारीकी से देखा जाय तो यह पता चलेगा कि यह कार्य भौतिक कार्य से अधिक आध्यात्मिक कार्य है। क्योंकि यह मनुष्य के अन्तस्तल या भीतरी भाग ( गरी= हृदय) का उपचार करना चाहता है, उसके बाहरी आवरण  (खोपड़ा या  shells) का नहीं। जैसे ही उस आध्यात्मिक वस्तु (निरपेक्ष सत्य)  का पता लग जायेगा, कई लोग तो भाग जायेंगे ( भीड़ से अलग हो जायेंगे?) और अन्य लोग, अलग-अलग मामलों में जिसकी जैसी अभिरुचि हो प्रचलित एवं सामान्य  क्षेत्र के आध्यात्मिक पक्षों पर ध्यान देंगे। इसीलिये यह संगठन अपने किसी सदस्य को मंदिर-मस्जिद या गिरजा में जाने के लिये बाध्य नहीं करता। किन्तु यह संगठन कहीं से अधार्मिक संगठन भी नहीं है, बल्कि यह स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में अपने युवा मित्रों से कहता है - 'दी सीक्रेट ऑफ़ रिलिजन लाइज नॉट इन थेओरीज़ बट इन प्रैक्टिस ' -" धर्म का रहस्य हमारे आचरण या व्यवहार से जाना जाता है, सिद्धान्त बघारने से नहीं ! अच्छा बनना और अच्छा बर्ताव करना - इसमें ही समग्र धर्म निहित है !" कोई मनुष्य इस जन्म इसी लिये दुःखी रहे, कि उसे अगले जन्म में सुख मिलेगा - ऐसा सोचना बुद्धिमानी का चिन्ह तो बिल्कुल भी नहीं है। किसी भी मनुष्य को अभी, इसी शरीर और जीवन में रहते हुए हुए ही अवश्य प्रसन्न रहना चाहिये।
महामण्डल साधारण तौर से प्रचलित धार्मिक अनुष्ठानों के बजाय वेदान्त के विचारों को अधिक महत्वपूर्ण मानता है।'एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है -' मनुष्य को उसके सच्चे स्वरूप में जानना !' इसीलिये यदि महामण्डल किसी विशेष प्रकार का ध्यान की अनुशंसा करना चाहता है, तो वह है - "ओपेन-आइड मैडिटेशन"  अर्थात " खुली आँखों से किया जाने वाला ध्यान " और वह है 'मनुष्य ' का ध्यान ! [अर्थात स्वामीजी की भाषा में ' ताजमहल का ध्यान ' ८/ २९] क्योंकि " यदि तुम अपने भाई, -- मनुष्य की , व्यक्त ईश्वर की ; उपासना नहीं  सकते; तो तुम उस ईश्वर की उपासना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है ? " [८/३४ ] 
और महामण्डल ख़ुशी से ऐसी सीमाओं को स्वीकार करता है; क्योंकि यह संगठन युवाओं का संगठन है,  
और उनमें से सभी युवा समाज में (टीवी चैनल पर) आमतौर से प्रचलित धार्मिक कर्मकाण्डों में अभिरुचि नहीं भी रख सकते हैं। लेकिन अधिकांश  युवा एक 'प्रबुद्ध नागरिक' बनने में अवश्य दिलचस्पी रख सकते हैं, तथा अपने सम्पूर्ण जीवन को अपनी मातृभूमि और अपने सहयोगियों (कॉमरेड्स ) की भलाई के लिये समर्पित भी कर सकते हैं ।
यह कार्य भी अपने आप में एक अच्छी आध्यात्मिकता है। इसी माध्यम से वे पूर्ण मनुष्यत्व भी अर्जित कर सकेंगे, क्योंकि जब वे - " मनुष्य को उसके सच्चे स्वरूप जान लेंगे" तो क्या देखेंगे ? यही कि " मनुष्य एक अनंत वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है, किन्तु केन्द्र एक स्थान में स्थित है। केन्द्र वह स्वयं है, लेकिन परिधि उसके चारों ओर विस्तृत है। मनुष्य इसी प्रकार विकसित होता जाता है, अपने घेरे (मण्डल) को फैलाता जाता है, और बृहद (ब्रह्म) होकर एक सच्चा मनुष्य बन जाता है। यह कार्य भी निश्चित रूप से  ईश्वरत्व  तक पहुँचने की एक यात्रा है ! किन्तु ऐसा देवत्व -स्वार्थ, ईर्ष्या, लालच, अनुशासनहीनता, अहंकार, आदि पाशविक संस्कारों में लिप्त रहते हुए -एकदम सीधे प्राप्त नहीं हो सकता। जिस  'पौरुष' की शक्ति से इन्हें  वशीभूत किया जा सकता है, उस विवेक-प्रयोग की क्षमता को हासिल करना हमारा प्रथम सोपान है। अभी हमने केवल प्रथम सोपान पर कदम रखा है, और यही हमारे लिये  सीमा हो सकती है।   देश में वर्तमान स्थिति को बदलने के लिए , कुछ लोग मौजूदा सरकार को, या प्रजातंत्र के स्वरूप को , या मौजूदा संविधान को ही बदल देने का प्रस्ताव दे सकते हैं। किन्तु इस कार्य को करने का बीड़ा केवल पूर्ण रूप से पवित्र और निःस्वार्थी  लोग ही  उठा सकते हैं। पर वैसे मनुष्य हैं कहाँ, और वैसे मनुष्य हमें प्राप्त कैसे होंगे ?
जो लोग देश की व्यवस्था में लोकतान्त्रिक और क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की बातें करते हैं, उन सभी ने इस मूलभूत कार्य को ही अपने एजेन्डे से बाहर कर रखा है। और इसी- छोड़ दिये गये कार्य को पूरा करने का प्रयास महामण्डल कर रहा है, तथा  जब तक यह कार्य सम्पूर्ण नहीं होता, तब तक  इस अवस्था को बदलने में वह भी सक्षम नहीं हो सकता।  यह हमारी सीमा है, और हमलोग इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार भी करते हैं। इसीलिये महामण्डल को राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं है, क्योंकि 'राजनीती'  हमेशा गाड़ी को घोड़े के आगे रखती है।
महामण्डल के पास न तो ज्यादा धन-बल है, और न इसके पास बहुत अधिक जन-बल है। किन्तु, जब तक उसके पास थोड़ी संख्या में ही सही कुछ ऐसे युवा हैं, जिन्होंने यह अनुभव कर लिया है कि देश के सच्चे कल्याण के लिये क्या करना आवश्यक है, और जब तक उनकी  दृष्टि के सामने यह आदर्श बिल्कुल स्पष्ट है, तब तक महामण्डल इन बातों को लेकर चिंतित भी नहीं है। क्योंकि इन ४९ वर्षों के कार्यकाल में हमने देखा है कि देश भर में सर्वत्र, सच्चे देशभक्त, निःस्वार्थपर, विनम्र, त्यागी, उत्साही,  ईमानदार, निष्ठावान, मेहनती और साहसी युवकों की  एक ऐसी  बड़ी संख्या मौजूद है, जो इस महान राष्ट्र को पुनरुज्जीवित करने में अपने जीवन को समर्पित करने के लिये उत्सुक हैं ।
किन्तु महामण्डल, कुछ ऐसे जीवनदानी या चुने हुए लोगों का संगठन भी नहीं है, जिनके पास ऑंखें मूँदकर इस संगठन के आदर्श और उद्देश्य या रोजमर्रा के कार्यों को आगे बढ़ाते रहने के आलावा और कोई दूसरा पारिवारिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती हो। यह संगठन उन समस्त युवाओं के लिये है, जो अपने देश और देशवासियों से, और अपने आप से भी प्यार करते हैं,और  एक गौरवशाली और महिमावान राष्ट्रीय-जीवन के निर्माण में अपना भरपूर योगदान देने के इच्छुक होने  के साथ ही साथ जो  स्वयं भी एक पूर्ण व्यवसायिक और कर्मठ जीवन जीने के इच्छुक हैं।
जो युवा अभी जहाँ हैं और जैसे है, (चाहे विद्यार्थी हैं , या गृहस्थ हैं, या नौकरी करते हैं, या निजी व्यापार करते हैं) यह संगठन  उन सभी युवाओं के लिये है। न तो उन्हें अपना घर छोड़ना है, न पढाई छोड़नी है, न अपनी नौकरी या व्यवसाय छोड़ना है, उन्हें अपना कार्य और अध्यन करते हुए भारत के कल्याण के उद्देश्य से केवल अपना चरित्र सुन्दर ढंग से गठित करना है। और इसके साथ- साथ केवल अपना अतिरिक्त समय और ऊर्जा देनी है, यदि सम्भव हुआ तो कार्य के लिये थोड़ा धन भी दे सकते हैं । महामंडल जीवन को पूर्ण बनाने वाले समस्त संभाव्य उपायों का प्रचार नहीं करता, बल्कि साधन के रूप में केवल कर्म करते रहने का प्रचार करता है, जो कि उपरोक्त स्वभाव वाले अधिकांश युवाओं के लिये उपयुक्त है। यदि यह हमारी एक सीमा भी हो , तो भी इसके लिये हमें  कोई शिकायत या असंतोष नहीं है। महामण्डल जात-पात, धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर मनुष्य मनुष्य  में कोई भेद नहीं करता।
अपने देश  और देशवासियों का कल्याण करने के उद्देश्य से , इस मनुष्य निर्माणकारी आंदोलन में अपनी
सर्वतोकृष्ट सेवा समर्पित करने की क्षमता, किसी महामण्डल- कर्मी के निजी आध्यात्मिक-उपलब्धि पर निर्भर करती है। और इस उद्देश्य के लिये कार्य करने की क्षमता , केवल वैसे ही कार्यों को सम्पादित करने से अर्जित की जा सकती है, जिन्हें किसी निजी स्वार्थ को पूर्ण करने की इच्छा से नहीं किया जाता। समाज सेवा का कार्य भी, इसी तरह का एक कार्य है।
इसीलिये महामण्डल समाज सेवा (एक दिवसीय युवा प्रशिक्षण शिविर आदि कार्य भी ) को साध्य के रूप में नहीं, केवल एक साधन (अपने ह्रदय का विकास करने का साधन ) के रूप में करने वालों के पक्ष का समर्थन करता है। अब यह युवाओं पर निर्भर करता है, उन्हें ही यह तय करना है,  कि क्या वे केवल  इस महान उद्देश्य को पूरा करने के लिये, किसी निजी स्वार्थ को पूर्ण करने की अपेक्षा किये बिना आगे आयेंगे ?  या मात्र निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपने जीवन को बिता देना चाहेंगे ? जिसमें फंसकर अन्ततोगत्वा उनका व्यक्तिगत अमानवीकरण तो होगा ही राष्ट्र भी और अधिक रसातल में जाने को बाध्य होगा।
महामण्डल के उपरोक्त बताये गए या शायद उससे भी अधिक सीमाओं के होते हुए भी, युवाओं का कल्याण और देश का कल्याण करने के एक रचनात्मक उद्देश्य से  - "गैल्वनाइज़िंग दी युथ फ़ोर्स", युवा शक्ति को चरित्र के गुणों से आभूषित करने में सफल हो जाने में ही- युवाओं और  देश के कल्याण की असीमित संभावनायें निहित हैं।  
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