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सोमवार, 11 जुलाई 2016

2. ' उन्नततर मनुष्यों का उन्नततर समाज' (Tend individuals,Tend Society !)

'व्यक्ति-निर्माण द्वारा समाज-निर्माण'
डेमोग्राफिक नॉर्म्स या जनसांख्यिकीय मानदंडों के अनुसार, आम तौर पर १५-३५ वर्ष तक आयुवर्ग को युवा माना जाता है । आंकड़ों के अनुसार भारत की ६५ प्रतिशत जनसंख्या ३५ वर्ष आयु तक के युवकों की और २५ साल उम्र के नौजवानों की संख्या ५० प्रतिशत से भी अधिक है। वर्तमान समय में भारत की युवा आबादी लगभग ८० करोड़ है, और हम सभी जानते हैं तथा दुनिया भी जानती है कि मानव समाज की समस्त शक्तियाँ सदा से युवाओं में ही निहित रहती आई हैं।
स्वामी विवेकानन्द को भारत के युवाओं पर अटूट विश्वास था। उनकी उक्तियों में कहीं भी युवाओं के प्रति  किसी भी कटु-शब्द को खोजने में असफल रह जाते हैं। किन्तु तब बड़ा आश्चर्य होता है, जब देखते हैं कि सुकरात और अरस्तु जैसे प्राचीन पाश्चात्य दिग्गज भी उनके अपने समय के युवाओं से बहुत ज्यादा खुश नहीं रहते थे। वे हमेशा युवाओं के दोष ही गिनवाते रहते थे,और हर समय उन्हें बुरा-भला कहते रहते थे। यहाँ तक कि हम यदि अपने समय के बुजुर्ग लोगों पर गौर करें, तो पायेंगे कि आम तौर से बड़े-बुजुर्ग लोग युवाओं को पसंद नहीं करते हैं; वे किसी तरह उन्हें केवल बर्दास्त भर कर लेते हैं।  किन्तु स्वामी विवेकानन्द को हम कभी किसी युवा के प्रति असहज होते नहीं देखते हैं; इसका कारण क्या है ? 
 स्वामी विवेकानन्द ने मनुष्य के अस्तित्व को केवल ऊपर ऊपर से नहीं, बल्कि उसकी गहराई में जाकर देखा था। स्वामीजी यह देख सकते थे कि समस्त युवाओं के हृदय में एक ही परम वास्तविकता, सत्ता, निरपेक्ष सत्य या ब्रह्म हैं, या एक ही सर्वशक्तिमान आत्मा हैं (चाहे वह उन्हें राम,कृष्ण,बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, गुरु नानक या आधुनिक युग के अवतार भगवान श्रीरामकृष्ण देव आदि नामों में से किसी भी नाम से क्यों न पुकारता हो !) - जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं ! इसीलिये स्वामीजी ने कहा था," मनुष्यदेह में स्थित मानव -आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है। पशु का शरीर भी भगवान के मन्दिर हैं, किन्तु मानव-शरीर ही सर्वश्रेष्ठ मन्दिर है- ताजमहल जैसा। यदि मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी मन्दिर से कुछ भी उपकार नहीं होगा।" परिणामतः प्रत्येक जीव, विशेष रूप से प्रत्येक मनुष्य ही उनकी आराधना का पात्र था।
यदि हम भारतवर्ष के उज्ज्वल अतीत की ओर देखें और वेदों के पन्नों को उल्टें तो वहाँ ब्रह्म के लिये एक सुन्दर और सर्वोत्कृष्ट विशेषण प्राप्त होता है - 'यविष्ठ' ! 
अर्थात जो सबसे युवा हैं ! इसीलिये इसीलिये हमारे समस्त देव-सेनापति (कार्तिक,अग्नि,वायु,इन्द्र आदि) का व्यक्तित्व शारीरिक सौष्ठव और मानसिक तेज की दृष्टि से किसी प्रतिभावान-नायक या हीरो की तरह ही दीखता है ! और युग-नायक, हमारे युवा-नेता स्वामी विवेकानन्द युवाओं को मोहनिद्रा से जाग्रत करते हुए कहते हैं - " दिस इज द टाईम टु डिसाइड योर फ्यूचर-ह्वाइल यू पॉजेज दी एनर्जी ऑफ़ यूथ !" अर्थात निर्णय लेने का यही सबसे उपयुक्त समय है !
 यदि युवा अवस्था में ही तुम अपने भविष्य के बारे में - सही निर्णय लेने में विफल हो गये, तो तुम अपने सबसे बड़े धन - अपने जीवन-धन का सही रूप से उपयोग करने में सक्षम नहीं हो सकोगे। यदि हम अपनी इन्द्रियों को, हमारी प्रॉपेनसिटीज को, हमारी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को यदि बाह्य-विषयों में खींच लेने की अनुमति दे देंगे,  या अपने मन को नियंत्रण में न रखकर उसे मनमानी करने की छूट दे देंगे, बहिर्मुखी बने रहने की अनुमति देंगे, तो हमारा यह बहुमूल्य मनुष्य-जीवन यूँ ही व्यर्थ में नष्ट हो जायेगा । [ 'अली-मृग-मीन-पतंग-गज जरै एक ही आँच तुलसी वे कैसे जियें जिन्हें जरावे पाँच ?' इसीलिये ठाकुर देव कहते थे -" पंच भूतेर फांदे ब्रह्म पड़े कांदे !"] 
इसलिए, युवाओं में कई दोषों के रहने के बावजूद, स्वामीजी ने कभी उनकी भर्तस्ना नहीं की, लाख दोष रहने से भी कभी उनके प्रति कोई दुर्वचन नहीं कहे ! उन्होंने  केवल उन्हें प्यार किया, और  खुद आगे आकर उनके समक्ष कुछ महान आदर्शों को उनके विचारार्थ प्रस्तुत किया।  " ही सेड, लुक ऐट द वर्ल्ड "- उन्होंने कहा, " जगत की ओर देखो, यह जगत (कितने प्रकार की व्याधियों -भ्रष्टाचार, नारी-अपमान आदि से ग्रस्त होकर ) दुःख से जल रहा है, क्या तुम सो सकते हो ? संसार के धर्म प्राणहीन और उपहास की वस्तु हो गये हैं, जगत को जिस वस्तु की आवश्यकता है, वह है चरित्र ! " और जैसा कि कम से कम एक बात जो वेदान्त की दृष्टि से, हमें सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट दिखाई देती है - वह यह कि "  अज्ञान (अविद्या या Ignorance) ही हमारे सभी दुःखों का मूल कारण है, और कुछ नहीं।" 'सो, डिस्पेल दिस इग्नोरेन्स' - अतः इस अविद्या के अंधकार को दूर करने का प्रयत्न करो। " तुम पहले स्वयं इस अविद्या के अंधकार को दूर करने वाले प्रकाश (आत्मज्ञान) या बुद्धत्व को प्राप्त करने की चेष्टा करो, और यदि उस आत्मज्योति की एक झलक भी प्राप्त हो गई, तो तुम देख सकोगे कि तुम्हारा भविष्य कितना महान बनने वाला है ! 
और यदि हम अपने व्यक्तिगत जीवन में आत्मसाक्षात्कार करके (ठाकुर देव ही आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार हैं यह बात समझकर) ब्रह्मविद या ब्रह्मवेत्ता मनुष्य बन जाते हैं, और यदि हमलोगों में से और कई लोग भी उस प्रकाश की एक झलक को प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं; तो सम्पूर्ण मानवजाति का भविष्य ही उज्ज्वल हो जायेगा। अज्ञान (अविद्या) के अंधकार की जिस मोटी चादर ने सम्पूर्ण मानवता को ढांक रखा है, वह तड़तड़ाकर फट जायेगा, छिन्न-भिन्न हो जायेगा, और तब भारत (विश्व-गुरु की महिमा में ) उठ खड़ा होगा, और तब हमारी वास्तविक उन्नति होगी ! इसीलिये मानवजाति के मार्गदर्शक नेता स्वामी विवेकानन्द, भारत के ८० करोड़ युवाओं में से कम से कम कुछ हजार युवाओं, मानवजाति के 'वुड बी लीडर्स ' को एक महान चुनौती देते हुए कहते हैं -" जगत को प्रकाश कौन देगा ? बलिदान भूतकाल से नियम रहा है और हाय ! युगों तक इसे रहना है। संसार के वीरों को और सर्वश्रेष्ठों (यविष्ठों) को 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' अपना बलिदान करना होगा। असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैंकड़ों 'बुद्धों' की आवश्यकता है। संसार को ऐसे लोग चाहिये जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलन्त प्रेम का उदाहरण हो। वह प्रेम एक-एक शब्द को वज्र के समान प्रभावशाली बना देगा।"  
आज की दुनिया में हमलोग स्पष्ट रूप से कुछ विरोधाभासी द्विविधता को देख सकते हैं; एक ओर दरिद्रता है तो दूसरी तरफ समृद्धि है। विज्ञान के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रगति हुई है, किन्तु मनुष्यों के अपने जीवन में सच्ची मनीषा, सच्चे आनन्द और हृदय की उदारता में घोर कमी हो गयी है। सभी देशों में सहानुभूति की कमी है, अधिक से अधिक धनी बनने के स्वार्थवश या लालच के कारण, विकसित राष्ट्रों के बीच हर प्रकार की स्पर्धा, कलह और नफरत है; जिसके कारण विश्व पर आतंकवाद और युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। हमलोग अँधा भौतिकवाद और सच्ची आध्यात्मिकता या परमसत्य को जानने की तीव्र उत्कंठा के स्थान पर धन की कामना और वासना का नंगा नृत्य देख रहे हैं। अपने अपने धर्म को महान और दूसरों के धर्म को नीची दृष्टि से देखने के कारण, 'वसुधैव कुटुंबकम' वाले प्रेम के बजाय हर जगह घृणा, ही देख रहे हैं । ये वैसे कारण हैं जो हमारे मन में युद्ध छेड़ने के उन्माद को या आतंकवाद को भड़काते रहते हैं। 
किन्तु  हमारे देश में  हजारों साल पहले ही हमारे ऋषि-मुनि पूर्वजों ने इस ब्रह्मविद्या (पराविद्या या विजडम)
को खोज निकालने की चेष्टा की थी,और उसे अर्जित करने की एक वैज्ञानिक पद्धति (पातंजल -योगसूत्र) का आविष्कार भी कर लिया था। वे बाह्य जगत के विज्ञान - अपराविद्या (अविद्या) और आंतरिक जगत के विज्ञान - पराविद्या (विद्या) के बीच समन्वय स्थापित करना चाहते थे, तथा हमारे देश में दोनों के बीच एक आदर्श-समन्वय स्थापित भी था। किन्तु कुछ अपरिहार्य कारणों से हजार वर्षों की गुलामी के दौरान हमारे 'नेता' या (लोक-शिक्षक) लोग इन दोनों विज्ञानों- " विद्या और अविद्या " के बीच संतुलन और समन्वय बनाये रखने की ट्रिक (या चतुराई ?) को भूल गए। 
किन्तु हमारे अपने समय में, आधुनिक युग में या कहा जाय तो केवल विगत शताब्दी में ही 'श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' में लीडरशिप-ट्रेनिंग में प्रशिक्षित नेता 'युग-नायक विवेकानन्द' एक बार फिर इन दोनों  बाह्य और अन्तः के विज्ञानों (विद्या और अविद्या) के बीच के समन्वय को सम्भव कर दिखाने के लिए उठ खड़े हुए। और जिनके पास वर्तमान अवधि में घटित होने वाली वैश्विक -घटनाओं
के तह में छुपी सच्चाई को देखने योग्य ऑंखें हैं, (रसिया में कम्युनिज्म का पतन, ब्रिटेन के यूरो जोन से निकलने के साथ अमेरिका में भौतिकवाद के अतिशीघ्र संभावित पतन एवं अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस के साथ विश्व रंगमंच पर भारत का उत्थान आदि) वे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि इन दोनों विज्ञानों के बीच का यह समन्वय अतिनिकट भविष्य में सम्पूर्ण विश्व में अपनी पहचान बनाने जा रहा है। महामण्डल के द्वारा हाल में प्रकाशित पुस्तिकाइन स्टोर फॉर दी ट्वेन्टी-फर्स्ट सेंचुरी " (२१ वीं सदी के गर्भ में) इस सम्भावना की एक झलक देख भी सकते हैं।  
आज के भारत में हमलोग क्या देख रहे हैं ? हम पाते हैं कि केवल कुछ ही  घराने ऐसे हैं, जो यहाँ बहुत अमीर हैं। उन अमीर घरानों में शिक्षित लोग हैं, यहाँ वैसे लोग हैं, जिन्हें हम विशेषाधिकार प्राप्त लोगों में गिनती कर सकते हैं। किन्तु दूसरी ओर यू.एन.ओ. के एक अध्यन के अनुसार हम देखते हैं कि  भारत की ७४.५ % जनसंख्या आज भी वंचित वर्ग के लोगों की है। क्या हम इसे बर्दास्त कर सकते हैं ? अब भी हमारी ६५ % जनसंख्या अशिक्षित है। जिन ३५ % लोगों को हम शिक्षित कहते हैं, उन्हें अक्षरों की पहचान तो है किन्तु निश्चित रूप से उन्हें शिक्षित तो कदापि नहीं कह सकते। भारत की जनसंख्या का लगभग ५०% लोग अब भी जीवन यापन की स्तर से नीचे का जीवन जीते हैं। 
हालाँकि ये आँकड़े यह भी बतलाते हैं कि अब यह अन्तर बहुत तेजी के साथ घट रहा है, और इस सदी का अन्त होते होते, लगभग समाप्त भी हो जायेगा। दो वर्ष पूर्व किये गए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किये एक अध्यन के अनुसार आज भारत में केवल गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या ही तैंतीस करोड़ दिखलाई गई थी। बहुत से लोग शिक्षा से वंचित हैं। बहुत से लोगों को स्वास्थ्य संबंधी कोई देखभाल नहीं मिलती। यहाँ तक कि बहुत से लोगों को सही न्याय भी नहीं मिल पाता है। समानता या 'इक्वालिटी' मात्र एक चुनावी नारा बन कर रह गया है । इस परिस्थिति में भी क्या हमें केवल अपने कल्याण के लिये प्रयास करके ही संतुष्ट हो जाना चाहिये?   
'समाज' की बहुत सरल परिभाषा स्वामी विवेकानन्द ने हमें दी है। उन्होंने कहा था, " सोसाइटी इज कम्पोज्ड ऑफ़ इंडिविजुअल्स" अर्थात ' व्यक्तियों के समूह को ही समाज कहते हैं ' -  इस परिभाषा के आधार पर स्वामीजी ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि आप ' उन्नततर समाज का निर्माण करना चाहते हों, तो आपको उन्नततर मनुष्यों का निर्माण' करना होगा। पूर्ण विकसित मनुष्यों का निर्माण करने से समाज स्वतः विकसित हो जायेगा। 
स्वामीजी के लिये, " रीजेनरैशन ऑफ़ दी नेशन मेन्ट इन्विगरैटिंग दी इंडिविजुअल।" अर्थात " राष्ट्र को पुरुज्जीवित करने का अर्थ है, उसके युवाओं  को निर्भीक और श्रद्धा सम्पन्न 'मनुष्य' में रूपान्तरित कर देना।" इसीलिये उन्होंने कहा था - ' मैन-मेकिंग इज माई लाइफ'स मीसन.' अर्थात " मनुष्य-निर्माण ही मेरे जीवन का उद्देश्य है !" और भारत को पुरुज्जीवित करने का यही एकमात्र उपाय है ! 
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स्वामी जी की कार्य-योजना और प्रणाली: भारत का भविष्य: " अच्छा, तो वह योजना -वह प्रणाली क्या है? उस आदर्श का एक छोर ब्राह्मण (देव-मानव) है और दूसरा छोर चांडाल (पशु-मानव) है, और जातिप्रथा की सम्पूर्ण योजना चांडाल को उठाकर ब्राह्मण बनाना है। "५/१८८  जो व्यक्ति " बाह्य जगत का विज्ञान (अविद्या) और अंतःजगत का विज्ञान (विद्या)  के बीच समन्वय बनाये रखने की ट्रिक (वेदान्ती चतुराई ?)  को जान लेता है वही एक आदर्श 'नेता' या (लोक-शिक्षक) बन सकता है! 


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