युवा महामण्डल के साथ विवेकानन्द नाम क्यों जुड़ा है: बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि इस 'युवा संगठन' के साथ स्वामी विवेकानन्द के नाम को क्यों जोड़ा गया ? कुछ लोग यह भी जानना चाहते हैं कि " जब स्वयं स्वामी विवेकानन्द जी के द्वारा स्थापित 'रामकृष्ण मिशन' पहले से ही है, तथा उन्हीं के आदर्शों के अनुरूप समाज-सेवा आदि विभिन्न कार्यक्रमों को आयोजित करने में लगा हुआ है, तो फिर और एक दूसरा संगठन बनाने की आवश्यकता क्या थी?"
आज तो कई स्थानों पर कितने ही आश्रम हैं, जिनमें से कुछ मिशन के द्वारा अनुमोदित हैं, तो कुछ आश्रम ऐसे भी हैं जो मिशन के द्वारा अनुमोदित नहीं हैं। किन्तु वहाँ भी नित्य ही ठाकुर, माँ और स्वामी जी पूजा अर्चना होती ही रहती है। जहाँ से उनके भावों प्रचारित करने के लिये नाना प्रकार के प्रयास होते ही रहते हैं, एवं इसके साथ ही साथ वहाँ पर समाज सेवा के कार्य भी चलते ही रहते हैं। उन आश्रमों के साथ कई स्थानों पर बहुत से व्यस्क लोग जुड़े हुए हैं। युवा लोग वहाँ नहीं हैं, ऐसी बात भी नहीं है। इतना सब कुछ होने के बाद भी महामण्डल को गठित करने की आवश्यकता ही क्या थी ?
१९६७ में महामण्डल के स्थापित होने से पहले,स्वामी विवेकानन्द के भावादर्श के अनुरूप, युवाओं के जीवन को गठित करने, विशेष तौर पर उनके चरित्र का निर्माण करने के उद्देश्य से, यदि सम्पूर्ण भारतवर्ष में कोई दूसरा संगठन कहीं और बना हो, तो उसकी जानकारी हमें नहीं है। हमें तो ऐसा प्रतीत होता है, कि एक ऐतिहासिक अनिवार्यता थी, जिसके कारण महामण्डल को आविर्भूत होना पड़ा!
हमारे देश के इतिहास में प्राचीन काल से ही, इस प्रकार की ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्वीकार किया जाता रहा है। यदि हम अपनी स्मरण शक्ति पर थोड़ा जोर डालें तो गीता ४/७ से यही ध्वनि निकलती हुई सुनाई देगी-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।4.7।।
(यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत,अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानम् सृजामि अहम् )-- हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। ठीक इसी तरह की बात श्री दुर्गा सप्तशती में भी कही गयी है। इसी को कहते हैं, ऐतिहासिक अनिवार्यता! भारतवासी यह जानते हैं कि इतिहास की यात्रा में, समय-चक्र के घूर्णन-पथ में इस तरह की अनिवार्यता बार-बार दृष्टिगोचर हुई है। इस आधुनिक युग में श्रीरामकृष्ण परमहंस के भीतर वही साम्य-भाव मूर्तमान हुआ है। गीता ५/१९ में कहा गया है -
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।5.19।।
[- इह एव तैः जितः सर्गः येषाम् साम्ये स्थितम् मनः / निर्दोषम् हि समम् ब्रह्म तस्मात् ब्रह्मणि ते स्थिताः) भगवान् कहते हैं कि जिनका मन समत्व भाव में स्थित है वे ब्रह्म में ही स्थित हैं। मन (अहं की गाँठ) ही वह उपाधि है जिसमें व्यक्त चैतन्य जीव या अहंकार के रूप में प्रकट होकर स्वयं को सम्पूर्ण जगत् से भिन्न मानता है।]
-अर्थात जिनका मन समत्व भाव में स्थित हो गया है, उन्होंने इस जीवित अवस्था में ही स्वर्ग को जीत लिया है, क्योंकि (समत्वभाव का नाम ही भगवान है, इसीलिये श्री ठाकुर=) ब्रह्म, पवित्र (निर्दोष) हैं और सबके लिये, समान (सम) हैं, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित कहे जाते हैं।
महामण्डल की दृष्टि में श्रीरामकृष्ण परमहंस प्रथम युवा नेता हैं, जिनके जीवन में साम्य-भाव सम्पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हुआ है ! इसी लिये वे समस्त मानव-जाति, समस्त जीवों, यहाँ तक की जड़ वस्तुओं के साथ भी अभिन्नता का साक्षात्कार करते हैं! वे ऐसे जन-नेता हैं, जो मानवमात्र को, सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों को अपने हृदय के अन्तस्तल से प्रेम करते हैं। उनके जीवन में प्रतिष्ठित वह साम्य-भाव पोलिटिकल पार्टीज के द्वारा मंच पर खड़े होकर, भाषण में कहने वाला साम्य नहीं है, अपितु उन्होंने इसे अपने आचरण में उतार कर दिखा दिया है। (देवघर का उदाहरण, दो माँझी के झगड़े का उदाहरण, दूब पर चलने से छाती लाल)
इसीलिये भगवान श्रीरामकृष्ण देव दीन-दुःखीयों के दारुण दुःख से द्रवित होकर, उनके समस्त प्रकार के दुःखों को दूर करने का उपाय बताने के लिये, या कहें तो सम्पूर्ण विश्व और भारत का कल्याण करने के उद्देश्य से, युवाओं को संगठित कर के, भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा में -'BE AND MAKE ' में, अर्थात मानवजाति का भावी मार्गदर्शक नेता बनने और बनाने प्रशिक्षण देने के लिए, निवृत्ति मार्ग के ऋषि स्वामी विवेकानन्द को अपने साथ लेकर अवतरित हुए थे !
इस बात को समझने के लिए हमें स्वामी विवेकानन्द के द्वारा उनके गुरुदेव के सम्बन्ध में व्यक्त किये गए उद्गारों का, विशेष रूप से अध्यन करना पड़ेगा। स्वामी जी ने कहा था, कि श्रीरामकृष्ण देव आज भी सभी लोगों को मनुष्य बनने के लिए अनुप्रेरित कर रहे हैं, किन्तु युवाओं को अधिक संख्या में आकर्षित कर रहे हैं। इस तथ्य को, महामण्डल द्वारा आयोजित 'रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा' में आधारित चरित्र-निर्माणकारी युवा प्रशिक्षण शिविरों में प्रतिवर्ष युवाओं की बढ़ती हुई संख्या को देखकर, हमलोग भी समझ सकते हैं।
श्रीरामकृष्ण का लक्ष्य विशेष रूप से युवाओं को ही आकर्षित करना था, इसीलिये वे दक्षिणेश्वर में छत पर चढ़ कर युवाओं के पुकारते थे; स्वामी विवेकानन्द स्वयं इस बात के प्रमाण हैं। श्रीरामकृष्ण देव ने स्पष्ट रूप से यह अनुभव कर लिया था, कि मेरे अति अल्प जीवन काल में मैं जितना कर सकता था उतना कर दिया; किन्तु उसके बाद जो वास्तविक कार्य है - वह यही है कि बहुत अल्प समय के भीतर कुछ युवाओं के जीवन को इस प्रकार गठित कर देना होगा कि वे इस वेदान्त को (अफीम के नशे से मुक्त धर्म के चार महावाक्यों को) थोड़े समय में ही दावानल की तरह सारे जगत में फैला देने में समर्थ हो जाएँ। और वैसा करने के बाद उन्होंने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया था । उसके बाद स्वामी जी ने भी उनके द्वारा सौंपे गए कार्य को पूरा कर दिखाया।
सच्चे से सच्चा धर्म भी समय के प्रवाह में, दूषित हो ही जाता है। क्योंकि समय-चक्र के घूर्णन-पथ से चलते हुए, धर्म के साथ जब अफीम के नशे की तरह -अतिशय भावुकता (অহিফেন, शराबियों जैसी भावुकता या मॉड्लिन maudlin) भी संयुक्त हो जाती है, तो वह उन्मत्त भावुकता हमारी बुद्धि को कई बार मोहग्रस्त भी कर देती है,और हम अपने कर्तव्य पथ से भटक जाते हैं। और तब उस धर्म के अनुयायियों के व्यवहार या चरित्र में धर्म का शुद्ध रूप व्यक्त होता हुआ दिखाई नहीं देता है। इसीलिये जब समय के प्रवाह में, भिन्न भिन्न नाम (ब्राण्ड) वाले धर्म, केवल अफीम की तरह का नशा उत्पन्न करने लगते हैं; उस समय धर्म को इस अतिशय भावुकता (इमोशनैलिटी) रूपी नशे की मिलावट से परिशोधित करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि धर्म ही सत्य है, अफीम (धर्म का नशा) सत्य नहीं है !
जिस समय सनातन-धर्म के क्षेत्र में भी ऐसी अवस्था उत्पन्न हो जाती है, उस समय धर्म को फिर से नये रूप में सज्जित करके, तथा समस्त प्रकार के मनुष्यों के लिये ग्राह्य बनाकर, मानव-जाति के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है। तथा उसका प्रचार-प्रसार भी करना पड़ता है। उस समय धर्म से इस भावेश या इमोशनैलिटी रूपी अफीम के गन्ध की मिलावट से परिशोधित करने, एवम धर्म को पुनः स्थापित करने के लिये एक महान आविर्भाव अनिवार्यता बन जाती है। वह चाहे अवतार के द्वारा हो या जिस रूप में हो, एक विशिष्ट भाव (समत्व का भाव) मूर्तमान होता अवश्य है। जिस समय देश का धर्म अर्थात चरित्र अपने स्थान से च्युत हो जाता है, उस समय इसी प्रकार के एक आविर्भाव की आवश्यकता होती है।
इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -'जब तक सम्पूर्ण जगत यह नहीं जान लेता कि वह और ईश्वर एक है, तब तक मैं हर जगह के मनुष्यों को अनुप्रेरित करता ही रहूँगा !' अपने इसी वचन को प्रमाणित करते हुए, हम जैसे गृहस्थ या प्रवृत्ति मार्गी पुरुषों या कर्म -योगियों के लिये उनकी ही प्रेरणा से १९६७ ई० में 'अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' नामक संगठन को आविर्भूत होना पड़ा!
इस सृष्ट-जगत में विविधताएँ रहती ही हैं, (कोई जन्मजात रूप से कर्मयोगी होगा कोई कोई ज्ञानमार्गी होगा कोई भक्त तो कोई राजयोगी होगा) क्योंकि विभिन्नता ही सृष्टि का आधार है। सृष्ट जगत का तात्पर्य ही है विविधताओं से परिपूर्ण जगत, विविधताओं से रहित कोई भी सृजन नहीं हो सकता। हमलोगों की पुरातन संस्कृति एवं परम्परा के अनुसार, या हमारे अपने प्राचीन ऋषि-मुनियों के तत्त्व-ज्ञान के अनुसार- सृष्टि का मूल उपादान केवल एक ही है-' चैतन्यात् सर्वं उत्पन्नम'-और उसी मूल उपादान (ईश्वर,अल्ला या गॉड) से यह सारी सृष्टि अस्तित्व में आयी है। हमारे ऋषिओं ने हजारों वर्ष पहले ही आविष्कृत कर लिया था - 'एकं सत विप्राः बहुधा वदन्ति!
इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टि प्रारंभ होने से पूर्व इसके उपादान तत्त्व सन्तुलन में थे तथा बिल्कुल साम्यावस्था थी। उस ' साम्य -अवस्था ' में अर्थात जब ' एकमेवाद्वितीय ' (ब्रह्म) को छोड़ कर दूसरी कोई वस्तु थी ही नहीं, तब नैसर्गिक रूप से सभी एक समान थे। किन्तु जैसे ही उस आद्य सन्तुलन (साम्यावस्था) में विक्षोभ उत्पन्न हुआ, कि सृष्टि का विस्तार होने लगा। सृष्टि में वैषम्य तो रहेगा ही, तभी उससे इस ईश्वर के सृष्टि रूपी फुलवारी की शोभा-सुषमा बढ़ती है,और मनुष्य की नेतृत्व क्षमता को उभर कर सामने आने का अवसर मिलता है। यह एक व्यायामशाला है जिसमें अचेतन को अधिक चेतन बनने का—अविकसित को अधिक विकसित, स्वार्थी को निःस्वार्थी मनुष्य बन जाने का अवसर मिलता है। यह संसार ईश्वर के द्वारा निर्मित है। वे ही इसके अधिपति है। वेदान्त के अनुसार तो ईश्वर ही स्वयं को विभिन्न पदार्थों एवं प्राणियों के रूप में अभिव्यक्त कर रहे हैं।
श्री ई.टी स्टर्डी को ही, १३ फरवरी १८९६ को लिखित एक दूसरे पत्र में स्वामीजी कहते हैं - " श्री टेस्ला वैदान्तिक प्राण-आकाश और कल्प के सिद्धान्त को सुनकर बिल्कुल मुग्ध हो गए। उनके कथनानुसार आधुनिक विज्ञान केवल धर्म इन्हीं सिद्धान्तों को ग्रहण कर सकता है। जबकि आकाश और प्राण -दोनों जगत व्यापी महत -समष्टि-मन, या ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं । श्री टेस्ला यह समझते हैं कि गणितशास्त्र की सहायता से वे प्रमाणित कर सकते हैं कि जड़ और शक्ति, दोनों ही अव्यक्त शक्ति या पोटेन्शियल एनर्जी (स्थितिक ऊर्जा) में रूपांतरित हो सकते हैं। "मिस्टर टेस्ला थिंक्स ही कैन डिमोन्सट्रेट मैथेमेटिकली दैट फ़ोर्स ऐंड मैटर आर रिड्यूसिबल टु पोटेन्शियल एनर्जी."
( **"Mr. Tesla thinks he can demonstrate mathematically that Force and Matter are reducible to potential energy.) गणितशास्त्र के इस नवीन प्रमाण को समझने के लिये मैं आगामी सप्ताह में उनसे मिलने जाने वाला हूँ। ऐसा होने से वेदान्तिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान और आधुनिक विज्ञान का सामंजस्य हो जायेगा। जिसमें दिखलाया जा सकेगा -एब्सॉल्यूट ट्रूथ = ब्रह्म -> महत या ईश्वर प्राइमल क्रिएटिव एनर्जी-आदि सृष्टि शक्ति >प्राण और आकाश = फ़ोर्स ऐंड मैटर (एनर्जी ऐंड मैटर E=Mc2)
श्री नवनी दा कहते थे -" क्योंकि 'मैटर ऐंड एनर्जी ' या 'शक्ति और पदार्थ' की समतुल्यता E=Mc2 एक अविवादित सत्य है, इसीलिये मैटर (लस्ट ऐंड लूकर) को अपना अच्छा सेवक बना लेने के प्रयास में, मनुष्य खुद को ही मैटर का एक बुरा गुलाम (भेंड़) बनाता रहता है।"
(In his attempt to make of Matter and Energy (their equivalence accepted) a good servant, he is making of himself a bad-slave of matter. महामण्डल पुस्तिका - In Store for the Twenty-First Century)
[वेदान्त (अर्थात हाईएस्ट सोर्स ऑफ नॉलेज) में
ब्रह्म की अव्यक्त शक्ति (पोटेन्शियल एनर्जी) को
माया अर्थात 'इल्यूजन या मैटर' कहा जाता है
; और ब्रह्म की वही दैवी शक्ति स्वयं को जगत-संसार के रूप में अभिव्यक्त करती है ! (शायद इसीलिये जन्म लेते ही, ब्रह्म के अवतार श्री ठाकुर को छोड़कर; सभी जीव ईश्वर की माया-शक्ति से सम्मोहित, दिग्भ्रमित या हिप्नोटाइज्ड हो जाते हैं !) किन्तु सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसकी 'मानव-चेतना'
(HUMAN consciousness) में ईश्वर ने एक विशेष शक्ति -
'विवेचक-शक्ति' अथवा 'पर्यवेक्षक की शक्ति'
(THE POWER OF THE OBSERVER ) प्रदान की है। जिसके कारण
अभ्यास करके, प्रत्येक मनुष्य अपने मन (मानस) को दो भागों में - 'द्रष्टा और दृश्य ' मन, या सब्जेक्टिव माइंड और ऑब्जेक्टिव मांइड में विभक्त कर सकता है! जिसे १० वीं कक्षा के विज्ञान में 'डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट' (The Quantum Double Slit Experiment) के द्वारा समझाया जाता है!
[मनःसंयोग के विषय में ] निकोला टेस्ला ने कहा था कि " मानव-समाज के लिये सबसे अच्छा दिन वह दिन होगा, जिस दिन विज्ञान भी 'नॉन-फिजिकल फिनामिना' (गैर भौतिक घटनाओं या आध्यात्मिकता) का अध्ययन करने, या ब्रह्मांड (मैटर या मास) की वास्तविक प्रकृति को समझने के लिए,
उसका चिंतन
एनर्जी, फ्रीक्वेंसी एंड वाइब्रैशन ( ऊर्जा, आवृत्ति और कंपन) के
रूप में करना शुरू कर देगा । उस दिन के बाद
विज्ञान केवल एक दशक में ही इतनी अधिक
प्रगति कर लेगा, जितना उसने अपने अस्तित्व
की सम्पूर्ण पिछली सदियों में भी नहीं किया है !"
स्वामी विवेकानन्द ने ही निकोला टेस्ला को पहली बार वेदान्त के 'आकाश ' तत्व को २ परमाणु कणों के बीच के स्पेस (अंतरिक्ष) या ZPF (zero point field, जीरो पॉइन्ट फिल्ड या शून्य दशमलव क्षेत्र) के रूप से परिचित करवाया था। और निकोला टेस्ला जैसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिक ने संस्कृत शब्द प्राण और आकाश को अंग्रेजी शब्द 'Energy and Mass.' के रूप में ही ग्रहण किया था, तथा इस तथ्य को भी समझ लिया था कि उस आकाश की अनन्त ऊर्जा का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जा सकता है। यहाँ
ध्यान देने योग्य बात यह है कि -
स्वामी जी ने संस्कृत शब्द
'प्राण और आकाश' के लिए अंग्रेजी शब्द 'फ़ोर्स ऐंड मैटर' (Force and Matter ) का प्रयोग किया था, जबकि संस्कृत शब्द 'प्राण' का उचित अनुवाद होगा -
Energy। पाश्चात्य विज्ञान में
'माइंड, मैटर तथा एनर्जी' (Mind, Matter and Energy
) आदि जिन शब्दों का उपयोग किया जाता है, वे आध्यात्मिक जगत से या 'ज्ञान के उच्चतम स्रोत'
- वेदान्त से ही संशोधित करके लिए गए शब्द हैं! ]
"विश्व का कल्याण करना ही भारत की नियति है !" इसीलिये महामण्डल का उद्देश्य है -'भारत का कल्याण!' और भारत का कल्याण केवल चरित्रवान तथा साम्यभाव में प्रतिष्ठित युवाओं के द्वारा ही सम्भव है। केवल साम्यभाव में प्रतिष्ठित, पूर्ण निःस्वार्थपर, ब्रह्मविद् मनुष्य ही जगत को ब्रह्मरूप में देखकर -अपने पराये का भेदभाव छोड़ कर, शिवज्ञान से जीव सेवा कर सकता है। और यही चुनौती-ब्रह्मविद मनुष्य बनो और बनाओ आंदोलन का नेतृत्व नवनी दा के क्रमानुयियों के समक्ष - हमारे युवाओं के समक्ष, (भारत के भावी मार्गदर्शक नेताओं के समक्ष) है।
१८९४ में स्वामी ब्रह्मानन्द जी को लिखित एक पत्र में स्वामीजी कहते हैं - " एक बात याद रखो: विश्व के महान शिक्षक- केवल शिक्षा देने के लिये ही अवतरित होते हैं। नाम-यश के लिये नहीं; परन्तु उनके चेले उनके उपदेशों को पानी में बहाकर, नाम-यश के लिये हाथा-पाई करने लग जाते हैं --बस यही संसार का इतिहास है।"
'बनो और बनाओ' आन्दोलन को यदि भारत के गाँव गाँव तक ले जा सको तो समझूँगा, तुम सब 'मनुष्य' हो और काम के योग्य हो। जो इस समय पूजा के महासन्धि-मुहूर्त (this great spiritual juncture) में कमर कस कर खड़ा हो जायेगा, गाँव गाँव में, घर घर में, उनका संवाद देता फिरेगा वही मेरा भाई है --वही ठाकुर का पुत्र है। श्रीरामकृष्ण का चरित्र, उनकी शिक्षा इस समय चारों ओर फैलाते जाओ--यही साधन है, यही भजन है, यही साधना है, यही सिद्धि है।
उठो, उठो, बड़े जोरों की तरंग (tidal wave) आ रही है- 'Onward! Onward!'; आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, स्त्री-पुरुष आचाण्डाल (Pariah) सब उनके निकट पवित्र हैं। पोथी-पत्रों का काम नहीं-जबानी शिक्षा दो। फिर धीरे धीरे अपने केन्द्र बढ़ाते जाओ--क्या यह कर सकते हो ? --या सिर्फ घड़ी-घण्ट बजाना ही आता है? घण्टी हिलाना, भोगी-संसारी लोगों का काम है। किन्तु गृहस्थ होकर भी स्वामीजी के सैनिक बनने की चाह रखने वाले युवाओं का काम है-'distribution and propagation of thought-currents.' अर्थात 'मनुष्य बनो और बनाओ' आन्दोलन का प्रचार-प्रसार करना।
श्रीरामकृष्ण का चरित्र, उनकी शिक्षा इस समय चारों ओर फैलाते जाओ--यही साधन है, यही भजन है, यही साधना है, यही सिद्धि है। Onward! Onward! आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! नाम का समय नहीं है, यश का समय नहीं है, मुक्ति का समय नहीं है, भक्ति का समय नहीं है, इनके बारे में फिर कभी देखा जायगा। अभी इस जन्म में श्रीरामकृष्ण-माँ सारदा के महान चरित्र का, उनके महान जीवन का, उनकी महान आत्मा का प्रचार करना होगा। 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत ' बनाने के लिए बस इतना ही करना है; इसको छोड़ कर अन्य कुछ योजना लेने की जरुरत नहीं है। संसार के सभी राष्ट्रों में अपने शास्त्रों का सत्य प्रचार ही भारत की सनातन वैदेशिक नीति होनी चाहिए, यह हमें एक अखण्ड राष्ट्र के रूप में संगठित करेगी। क्या हम लोग सदा ही पाश्चात्य देशों के कदमों में बैठकर ही सब बातें, यहाँ तक कि धर्म भी सीखेंगे ?
" जहाँ जहाँ श्रीरामकृष्ण का नाम जायेगा, वहाँ के कीट-पतंग तक देवता हो जायेंगे, हो भी रहे हैं, देखकर भी नहीं देखते ? जो जो उनकी सेवा के लिये --उनकी सेवा नहीं वरन उनके पुत्र दीन-दरिद्रों, पापी-तापियों, कीट-पतंगों तक की सेवा के लिये तैयार होंगे, उन्हीं के भीतर उनका आविर्भाव होगा (वे ब्रह्म को जान लेंगे ! 'ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम।') उनके मुख पर सरस्वती बैठेंगी, उनके हृदय में महामाया महाशक्ति आकर विराजित होंगी।
ह्रदय को विस्तृत करते जाना ही जीवन है, और संकोच ही मृत्यु। जो अपना ही स्वार्थ देखता है, आराम-तलब है, आलसी है, उसके लिये नरक में भी जगह नहीं है। सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिये जिसमें इतनी करुणा होती है कि खुद उसके लिये नरक में भी जाने को तैयार रहता है--उनके लिये कुछ कसर उठा नहीं रखता, वही श्रीरामकृष्ण का पुत्र है, --इतरे कृपणाः -दूसरों को हीनबुद्धि वाले समझना। जो इस समय पूजा के महासन्धि-मुहूर्त (this great spiritual juncture) में कमर कस कर खड़ा हो जायेगा, गाँव गाँव में, घर घर में, उनका संवाद देता फिरेगा वही मेरा भाई है --वही ठाकुर का पुत्र है। यही रामकृष्ण के सन्तानों को परखने का तरीका है --वे अपना भला नहीं चाहते, प्राण निकल जाने पर भी दूसरों की भलाई चाहते हैं। जिन्हें अपने ही आराम की सूझ रही है, जो आलसी हैं, जो अपनी जिद के सामने सब का सिर झुक हुआ देखना चाहते हैं, वे हमारे कोई नहीं, वे हमसे राजी-ख़ुशी से पहले ही अलग हो जायें।
श्रीरामकृष्ण की जितनी स्त्री-भक्त हैं, क्या वे विधवाओं को शिष्या नहीं बना सकतीं ? और तुम लोग उनके मस्तिष्क में कुछ विद्या नहीं भर सकते ? आओ ! उठकर काम में लग जाओ तो सही। अजी, गप्पें लड़ाने और घण्टी हिलाने का जमाना गया, समझे? अब काम करना होगा। जरा देखूं भी, बंगाली के धर्म की दौड़ कहाँ तक होती है ! शिकागो में श्री हेल का घर मेरा केन्द्र है; उनकी पत्नी को मैं माँ कहता हूँ; उनकी कन्यायें मुझे भैया जी कहती हैं। ऐसा महापवित्र और दयालु परिवार मैं तो दूसरा नहीं देखता।
[अर्थात हमें यह बात सदैव याद रखनी चाहिये कि 'विश्व के महान शिक्षक' [अवतार या पैग़म्बर, श्रीकृष्ण और बचपन में श्रीकृष्ण के भक्त नवनी दा जैसा सत्यद्रष्टा ऋषि या मानवजाति के मार्गदर्शक नेता भारत के स्त्री-पुरुषों को प्राचीन भारतीय गुरु-शिष्य वेदान्त परम्परा में (श्रीरामकृष्ण-माँ सारदा जैसा जीवन के साँचे में युवाओं को ढालकर) ब्रह्मविद मनुष्य या पूर्ण निःस्वार्थी मनुष्य 'बनो और बनाओ' की शिक्षा देने के लिये-अर्थात लीडरशिप ट्रेनिंग देने के लिये ही, पुनः शरीर में लौट आते हैं।]
मानवजाति के मार्गदर्शक नेता - आदिगुरु श्री शंकराचार्य स्वयं निवृत्ति मार्गी या संन्यासी थे;किन्तु उन्होंने गीता भाष्य के आरंभ में ही वैदिक धर्म के दो भेद – 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' बतलाए हैं।
“द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः, प्रवृत्ति लक्षणो निवृत्ति लक्षणश्च,
जगतः स्थितिकारणम्, प्राणिनां साक्षादभ्युदयनिश्रेयशहेतुः।”
जैसे याता-यात करने के लिये 'डाउन-लाइन और अप-लाइन' दोनों रहते हैं, दोनों टर्मिनल (अंतिम-स्टेशन) पर मिलते हैं। उसी प्रकार जीवन के ये दो प्रकार हैं, जो दोनों ही वेदों द्वारा समर्थित हैं- एक है प्रवृत्तिमूलक मार्ग और दूसरा निवृत्तिमूलक मार्ग। श्रुति भगवती बहुत दयालु है, ऐसा करके आचार्य और शास्त्र हमें असत कर्म करने लिये प्रोत्साहित नहीं करते, बल्कि इस प्रकार वे सामान्य मनुष्यों के भोग-प्रवण मन को क्रमशः शास्त्रोमुखी बनाने की ही चेष्टा करते हैं.
जीवन की इन दोनों पद्धतियों का मूल्य समान है। गृहस्थाश्रम में रहकर भी मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है!' यदि सभी मनुष्यों के उपर एक ही मार्ग को -केवल निवृत्ति मार्ग को अपनाने बाध्यता थोप दी जाये तो वैसा करना ठीक नहीं होगा।
इसीलिये श्रुति या शास्त्र प्रवृत्ति से होकर निवृत्ति तक आने में बाधा नहीं देते। मनु महाराज तो कहते हैं- विवाह करो, थोड़ा खा पहन लो; किन्तु यह सदा स्मरण रहे कि -निवृत्तिअस्तु महाफला! चारे में जब मछली फंसती है, तो वह डोर को खींचने लगती है, उस समय डोर को ढील देनी पड़ती है; डोर को ढील देते हुए मछली को थोड़ी देर तक खाने देना पड़ता है, बाद में मछली को खींच लिया जाता है. पहले ही खींचने से डोरी टूट जाएगी। इसीलिये श्रीरामकृष्ण जिस व्यक्ति में लस्ट और लूकर के प्रति अधिक आसक्ति देखते थे, उन्हें थोड़ा भोग कर लेने के लिये कहते थे, किन्तु अन्त में यह भी जोड़ देते थे -" लेकिन यह जान लेना कि इसमें कुछ रखा नहीं है ! "
"केवल धर्म (शिक्षा) के द्वारा ही अर्थ और काम को (लस्ट ऐंड लूकर में आसक्ति को) नियंत्रण में रखा जा सकता है।" धर्म का आश्रय लेकर, अर्थ और काम का भोग करो। और जब यह बात समझ में आ जाये कि भोगों में ही सबकुछ नहीं है। जब यह दिखाई देने लगे कि भोगों से यथार्थ शान्ति, आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता है, तब उस अवस्था में मनुष्य के चौथे पुरुषार्थ-मोक्ष को प्राप्त करने की आकांक्षा करनी चाहिये, और उसके लिये प्रयत्न करना चाहिये। किन्तु उन चार पुरुषार्थों में से किसी एक में ही आसक्त नहीं होना चाहिये। षड्जगीता ३८ में कहा गया है-
धर्मार्थकामाः सममेव सेव्या
यस्त्वेकसेवी स नरो जघन्यः ।
द्वयोस्तु दक्षं प्रवदन्ति मध्यं
स उत्तमो यो निरतिस्त्रिवर्गे ॥ ३८॥
यह जो 'धर्म-अर्थ-काम ' का त्रिवर्ग है, उसकी तुलना चतुर्थ वर्ग -मोक्ष के साथ नहीं हो सकती है। इसलिये इन तीनों में -किसी भी एक प्रति आसक्त नहीं होना चाहिये, या किसी एक में ही अटके नहीं रहना चाहिये। जो किसी एक में ही आसक्त हो जाता है, उसको घृणित या निन्दनीय माना जाता है। इसी तरह धर्म, अर्थ और काम में परस्पर संतुलन बने रहना मानसिक स्वास्थय एवं सुखी जीवन के लिए परमावश्यक है। इन तीनों में संतुलन बनाए रखने के लिए ही वैदिक ऋषियों ने गृहस्थाश्रम का महत्व प्रतिपादित किया है। इन तीनों में सुसामन्जस्य या तालमेल बनाये रखना ही मानसिक और शारीरिक स्वास्थय का मूल रहस्य है। हमारे पूर्वजों ने यह भी कभी नहीं कहा है, कि काम की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने केवल इतना कहा है कि काम या कामना को नियंत्रित रखना या परिमित (restrained) रखना आवश्यक है।
"निवृत्त रागस्य गृहम् तपोवनम्"
जिस सद गृहस्थ के हृदय से 'लस्ट ऐंड लूकर' में आसक्ति, अर्थात सांसारिक भोगों की लालसा, राग, आसक्ति समाप्त हो जाती है, उनका घर ही तपोवन बन जाता है।
वह अपने शिष्य को सांसारिक विषयों में दोष - दर्शन का मार्ग (सत्य-मिथ्या विवेक) दिखाता है जिससे वह पुरुष पहले तो विरक्त हो जाता है । फिर उसको वह सत्पुरुष समझाता है –
" नासि त्वं संसारि अमुष्य पुत्रत्वादि धर्मवान्। सद् यत् त्वमसि ।"
सद् यत-अरे तू संसारी नहीं है और न किसीके पुत्रत्वादि धर्म वाला है, जो सत् है वही तू है । इस प्रकार के उपदेश से , आदेश से अविद्यामय मोह - पट जो उसकी बुद्धि पर पड़ा हुआ था वह हट जाता है और वह क्रम - क्रमसे ज्ञान की भूमिकाओं को पार करता हुआ अपने सद् - रूप (गांधार देश) इन्द्रियातीत अवस्था पहुँचकर अपने सदात्माको प्राप्त होकर अपने गुरुजी (नेता) के समान सुखी और शान्त (नेता) हो जाता है। अर्थात दूसरों को मनःसंयोग का प्रशिक्षण देने में समर्थ शिक्षक बन जाता है। अतः श्रुतिभगवती ने ठीक ही कहा है कि " आचार्यवान् पुरुषो वेद "- आचार्यवान पुरुष ही सत्य को जान पाता है। जनक का उदाहरण दिया है।
जनक के दिखलाए हुए मार्ग का नाम 'योग' है। अर्थात योग का अर्थ प्रवृत्ति–मार्ग और ज्ञान का अर्थ सन्यास या निवृत्ति–मार्ग है। इन्हीं दो मार्गों को गीता में संन्यास और कर्मयोग कहा है। इसलिए राजा जनक क्षत्रीय होकर भी ब्राह्मणों के आचार्य बने क्योंकि वे प्रवृत्ति मार्गी (सद्गृहस्थ) होकर भी निवृत्ति मार्गी (संन्यासी) के जैसा मृत्यु से भी प्रेम करने के अधिकारी थे । शंकराचार्य ने भी कहा है कि जनक आदि ने इसलिए कर्म किए कि जिससे साधारण लोग मार्ग से न भटक जाएं। वे लोग यह समझ कर काम करते थे कि उनकी इन्द्रिया-भर कार्यों में लगी हुई हैं, गुणा गुणेषु वर्तन्ते। हमारे जैसे जिन लोगों ने सत्य को नहीं जाना है, उन्हें आत्मशुद्धि के लिए 'BE AND MAKE' का कर्म अनवरत करते रहना चाहिये, दादा कहते थे जो इस चरित्र-निर्माण आंदोलन से जुड़ जायेगा, उसे 'मुक्ति-भक्ति' सब कुछ प्राप्त हो जायेगा, अलग से कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी !
रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त प्रशिक्षण परम्परा में-आधारित 'लीडरशिप ट्रेनिंग' : इसे महामण्डल के मोटो 'BE AND MAKE ' के द्वारा दर्शाया गया है। यहां मनुष्य जीवन के दुहरे उद्देश्य, व्यक्तिगत पूर्णता (ब्रह्म तेज) तथा सामाजिक कार्यक्षमता (क्षात्रवीर्य) का संकेत किया गया है।
इसीलिये महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में वेदान्त केसरी बनने और बनाने - 'BE AND MAKE का प्रशिक्षण चुने हुए युवाओं को दी जाती है ! क्योंकि गृहस्थ गुरु श्रीरामकृष्ण (जो नवनीदा जैसे गृहस्थ और त्यागी एक ही आधार में थे) निवृत्ति मार्ग के सप्त ऋषियों में से एक स्वामी विवेकानन्द को सम्पूर्ण जगत को (प्रवृत्ति-निवृत्ति) सभी प्रकार के मनुष्यों को शिक्षा देने का चपरास दिया था। इसीलिये स्वामीजी कहते हैं -' जब तक सम्पूर्ण जगत यह नहीं जान लेता कि वह और ईश्वर एक है, तब तक मैं हर जगह के मनुष्यों को अनुप्रेरित करता ही रहूँगा।"
जब हमलोग महामण्डल के संस्थापक और मानवजाति के मार्गदर्शक नेता नवनीदा के जीवन और संदेशों को देखते हैं को देखते हैं तो पाते हैं कि उनका जीवन प्रत्येक युवा के लिए एक पथप्रदर्शक ज्योति या लाईटहॉउस की तरह था। वे भी अवतार-वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण देव की तरह एक ही आधार में गृहस्थ और त्यागी दोनों थे ! वे एक ओर जहाँ साधारण गृहस्थों जैसा अपने संयुक्त-परिवार का पालनपोषण करने के लिये १७ वर्ष की आयु से लेकर रिटायरमेन्ट लेने तक कार्यरत रहे थे। वहीँ दूसरी ओर एक यायावर यात्री बनकर सम्पूर्ण भारत में -हमलोग जैसे हजारों साधारण मनुष्यों को 'ब्राह्मण धर्म में प्रतिष्ठित' अर्थात साम्यभाव में प्रतिष्ठित मनुष्य' बनने और बनाने (लीडरशिप ट्रेनिंग) का प्रचार-प्रसार करने के लिए जीवन के अंतिम क्षणों तक भ्रमण करते ही रहे थे ! गीता ३/२१ में श्री भगवान कहते हैं -
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।
श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो करता है, सामान्य लोग वैसा ही करने लगते हैं। वह जैसा आदर्श उपस्थित करता है, उसी का लोग अनुगमन करने लगते हैं। सामान्य लोग श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा स्थापित किए गए आदर्शों का अनुकरण करते हैं। किन्तु गीता इस बात को स्पष्ट रूप से कहती है कि महापुरुष ही मार्ग बनाने वाले होते हैं। वे जो रास्ता दिखाते हैं, अन्य लोग उनका अनुगमन करते हैं।
प्रकाश सामान्यतया उन व्यक्तियों द्वारा ही प्राप्त होता है, जो समाज से आगे बढ़े हुए होते हैं। जब उनके साथी नीचे घाटी में सो रहे होते हैं। ईसा के शब्दों में, वे मानवसमाज के ’नमक’,’खमीर’ और ’प्रकाश’ हैं। जब वे उस प्रकाश की आभा की घोषणा करते हैं, तब थोडे़ -से लोग उसे पहचान पाते हैं और धीरे-धीरे बहुत-से लोग उनके अनुयायी बनने को तैयार हो जाते हैं।
आदिगुरु शंकराचार्य ने अपने अनुभव से यह ज्ञान प्राप्त किया, कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म (निरपेक्ष -सत्य) है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। “सत्य अद्वैत है; परन्तु द्वैत पूजा के लिए है; और इस प्रकार यह पूजा मुक्ति की अपेक्षा सौगुनी महान् है।” उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। उन्होंने ‘ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या’ का उद्घोष भी किया और शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि के भक्तिरसपूर्ण स्तोत्र भी रचे। उन्होंने आसेतु हिमालय संपूर्ण भारत की यात्रा की और चार मठों की स्थापना करके पूरे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा भौगोलिक एकता के अविच्छिन्न सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने समस्त मानव जाति को जीवन्मुक्ति का एक सूत्र दिया-
दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।
शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥
अर्थात दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें। ऐसा नेता (सद्गुरु) अपने अनुयायियों को दुर्जन को सज्जन बनने का प्रशिक्षण कैसे देता है ?
दुष्ट मनुष्य सज्जन बन जाए; सज्जन को शान्ति प्राप्त हो; शान्त मनुष्य बन्धन से छूट जाए और मुक्त मनुष्य दूसरों को मुक्त कराए।
असंस्कृतास्तु संस्कार्याः भ्रातृभिः पूर्वसंस्कृतैः।
जो लोग पहले दीक्षित हो चुके हैं, उनका यह कर्तव्य हो जाता है कि वे अपने अदीक्षित भाइयों को भी दीक्षित करें। जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।
स्वामी जी सितम्बर १८८४ को 'मद्रास-अभिनन्दन' के उत्तर में लिखित पत्र में कहते हैं - " वेदान्त -केसरी गर्जना करे, सियार अपने बिलों में छिप जायेंगे !"
'लेट दी लायन ऑफ़ वेदान्ता रोर, ऐंड दी फॉक्सेज विल फ्लाई टू देयर होल्स!'
-अर्थात अपनी अन्तर्निहित दिव्यता (निःस्वार्थपरता) को प्रकट करो, सारे भारत के विस्तृत क्षेत्र में उसे ढाल दो, और उसके चारो ओर सब कुछ समन्वित होकर विन्यस्त हो जायेगा।" यदि (सन्यासी बनने की पात्रता नहीं है, और) तुम गृहस्थ हो तो - दादा कहते थे , यदि नेता होना चाहते हो, तो " तुम लोग 'लस्ट और लूकर' में आसक्ति और क्षुद्रस्वार्थ को त्याग दो का त्याग कर दो ! महान बनो! महान -'बुद्ध' बनना है, तो सिद्धार्थपना को त्याग दो; तुम्हारे देश को इसकी-(सैकड़ों बुद्धों की) आवश्यकता है। सारे संसार को इसकी आवश्यकता है।
कोई भी बड़ा कार्य बिना त्याग के नहीं किया जा सकता। " लस्ट और लूकर ' में आसक्ति का त्याग किये बिना ब्रह्मत्व को प्रकाशित नहीं किया जा सकता"वेदों में (छान्दोग्य उपनिषद में) बताए हुए इन्द्र और विरोचन के उदाहरण को स्मरण रखो। दोनों को अपने अपने ब्रह्मत्व का बोध कराया गया था। परन्तु असुर विरोचन अपने शरीर को ही ब्रह्म मान बैठा। इन्द्र तो देवता थे, वे समझ गए कि वास्तव में आत्मा ही ब्रह्म (परमात्मा) है। तुम तो इन्द्र की संतान हो**। तुम देवताओं के वंशज हो। जड़ पदार्थ तुम्हारा ईश्वर कदापि नहीं हो सकता; शरीर तुम्हारा ईश्वर कभी नहीं हो सकता। आधुनिक युग के भगवान -श्री रामकृष्ण के चरणों के दैवी स्पर्श से जिनका रूपान्तरण (यथार्थ मनुष्य में?) हुआ, उन मुठ्ठी भर नवयुवकों की ओर देखो। उन्होंने उनके उपदेशों का प्रचार ब्रह्मपुत्र से सिंध तक और हिमालय (मायावती) से कन्याकुमारी तक कर डाला। [**एक बार देवराज इन्द्र और असुरराज विरोजन प्रजापति ब्रह्मा के पास 'आत्मा' व 'ब्रह्मज्ञान' के यथार्थ सत्य को जानने की जिज्ञासा से पहुंचते हैं और उनके पास रहकर बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं; क्योंकि ब्रह्मचर्य के बिना 'ब्रह्म' की प्राप्त नहीं की जा सकती। बत्तीस वर्ष पूर्ण होने पर प्रजापति ब्रह्मा ने उनके आने का कारण पूछा। इस पर उन्होंने 'ब्रह्मरूप और 'आत्मा' के स्वरूप को जानने के लिए अपनी जिज्ञासा प्रकट की। इस पर ब्रह्मा ने कहा कि हम जो कुछ भी आंखों से देखते हैं, वह 'आत्मा' का ही रूप है। यह सुनकर दोनों ने दर्पण मं अपने स्वरूप को देखकर अपने प्रतिबिम्ब को ही 'आत्मा' मान लिया तथा दोनों अपने-अपने लोकों को लौट गये। विरोचन ने असुरों के पास जाकर कहा कि यह अलंकृत शरीर ही 'आत्मा' है। इसे ही 'ब्रह्म' का स्वरूप समझो और इसी की उपासना करो।उधर इन्द्र ने देवलोक पहुंचने से पहले सोचा कि यह नश्वर शरीर नष्ट हो जायेगा, तो क्या 'आत्मा' अथवा 'ब्रह्म' भी नष्ट हो जायेगा। उसे सन्तुष्टि नहीं हुई, तो वह पुन: ब्रह्मा के पास लौटकर आया और अपनी शंका प्रकट की। ब्रह्मा ने उसे पुन: बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए कहा। बत्तीस वर्ष बाद ब्रह्मा ने इन्द्र से कहा कि पुरुष के जिस रूप का मनुष्य स्वप्न में दर्शन करता है, वही 'आत्मा' है। इन्द्र ऐसा सुनकर चला गया, किन्तु मार्ग में उसे फिर शंका ने आ घेरा कि स्वप्न में देखे गये पुरुष की आकृति जागने पर नष्ट हो जाती है, यह 'ब्रह्म' नहीं हो सकता। वह पुन: ब्रह्मा के पास लौट आया और अपनी शंका प्रकट की। तब ब्रह्मा ने उसे पुन: बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए कहा। इन्द्र ने ऐसा ही किया और पुन: ब्रह्मा के पास जा पहंचा।तब ब्रह्मा ने कहा कि जो प्रसुप्त अवस्था में सम्पूर्ण रूप से आनन्दित और शान्त रहता है और स्वप्न का अनुभव भी नहीं करता, वही 'आत्मा' है। वही अनश्वर, अभय और 'ब्रह्म' है। इन्द्र सन्तुष्ट होकर चल दिया। उसने सोचा कि उस समय जीव को यह कैसे ज्ञान होगा कि वह कौन है और कहां से आया है? अत: यथार्थ ज्ञान शरीर से सम्बन्धित हुए बिना कैसे प्राप्त हो सकता है? शंका उत्पन्न होते ही वह पुन: ब्रह्मा के पास जा पहुंचा और अपने मन की शंका प्रकट की। इस पर ब्रह्मा ने उसे पांच वर्ष तक पुन: ब्रह्मचर्य धारण करने के लिए कहा। इस प्रकार इन्द्र ने (३२ x ३ = ९६, + ५= १०१) जब कुल एक सौ एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन कर लिया, तब ब्रह्मा ने उससे कहा- 'हे इन्द्र! यह शरीर मरणधर्मा है, एवं सदैव मृत्यु से आच्छादित है। अविनाशी तथा अशरीरी 'आत्मा' इस शरीर में निवास करता है। जब तक यह शरीर में रहता है, तब तक प्रिय-अप्रिय से घिरा रहता है। शरीर से युक्त होने के कारण वह उनसे मुक्त नहीं हो पाता, किन्तु जब यह शरीर छोड़कर अशरीरी हो जाता है, तब प्रिय-अप्रिय कोई भी इसे स्पर्श नहीं कर पाता। तब वह 'आत्मा' आकाश में वायु की भांति ऊपर उठकर इस शरीर को छोड़ते हुए परमज्योति में केन्द्रित हो जाता है। इस प्रकार जो यथार्थ 'आत्मा' है, वह सूर्य की ज्योति से प्रकट होकर शरीर में प्रवेश करता है, किन्तु मृत्यु के समय शरीर के सभी सुख-दु:ख से मुक्त होकर यह पुन: उसी 'आदित्य' में समा जाता है। यही 'ब्रह्म है।' इन्द्र इस बार पूर्ण रूप से सन्तुष्ट होकर इन्द्रलोक को चला गया।"
इसी विषय पर स्वामी जी कहते हैं - " प्रलय-विज्ञान (एसकटोलॉजी, eschatology = मृत्यु के बाद अंतिम निर्णय- क्या होता है, जजमेन्ट के बाद स्वर्ग-नरक कहाँ जाता है, मानवजाति की अंतिम परिणति - परलोक विद्या) की व्याख्या केवल अद्वैत की दृष्टि से ही हो सकती है। द्वैतवादी कहते हैं कि मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा सूर्यलोक में जाती है, वहाँ से चन्द्रलोक में और वहां से विद्युतलोक में। वहां किसी पुरुष के साथ वह ब्रह्मलोक जाती है। अद्वैती कहता है वहाँ से वह निर्वाण प्राप्त करती है। अद्वैतवाद के अनुसार जीव न कहीं आता है, न जाता है, और ये सब लोक या जगत के स्तर 'आकाश' और 'प्राण' के रूपांतरित परिणाम मात्र हैं । इस दृश्य जगत (सूर्य-लोक) में प्राण भौतिक-शक्ति के रूप में और आकाश इन्द्रियग्राह्य भौतिक पदार्थ के रूप में प्रकट होता है। चन्द्रलोक यह चन्द्रमा नहीं है, परन्तु देवताओं का निवास-स्थान है, अर्थात यहाँ प्राण मानसिक शक्तियों के रूप में और आकाश ,तन्मात्र या सूक्ष्म भूत के रूप में प्रकट होता है। इसके परे विद्युत् लोक है, अर्थात वह अवस्था जहाँ प्राण, आकाश के साथ प्रायः अभिन्न होकर रहता है; यह बताना कठिन हो जाता है कि विद्युत् (वज्र= पूर्ण निःस्वार्थी मनुष्य थंडरबोल्ट)जड़ है या शक्ति ? इसके बाद ब्रह्मलोक है , जहाँ न प्राण है, न आकाश , बल्कि दोनों ही चित-शक्ति अर्थात आदिशक्ति में विलीन हैं। यहाँ प्राण और आकाश के न रहने से जीव को सम्पूर्ण विश्व समष्टि-महत या समष्टि मन के रूप में प्रतीत होता है । यह भी पुरुष या सगुण विश्वात्मा (श्रीरामकृष्ण परमहंस जी) की अभिव्यक्ति है, न कि निर्गुण अद्वितीय परमात्मा की , क्योंकि यहाँ भी भेद सूक्ष्म रूप से विद्यमान है।
इसके पश्चात् जीव (आत्मा ) को पूर्ण एकत्व की अनुभूति होती है, जो कि अंतिम लक्ष्य है -यहाँ जीव नहीं रहता -मन की चहार दीवारी को लाँघ लेने के बाद आत्मा को परमात्मा -शाश्वत चैतन्य सच्चिदानन्द के रूप में प्रत्यक्ष अनुभूत होता है। अद्वैत के अनुसार जीव के सम्मुख इन सब अनुभूतियों का प्रकाश एक के बाद एक क्रमशः होता है; परन्तु जीव स्वयं न कहीं आता है, न जाता है; और इसी प्रकार इस वर्तमान जगत की अभिव्यक्ति हुई है। इसी क्रम से सृष्टि और प्रलय होते रहते हैं, एक का अर्थ है क्रम-संकोच 'पीछे जाना', और दूसरे का क्रमविकास या 'बाहर निकलना'।
( The projection (Srishti) and dissolution must take place in the same order, only one means going backward, and the other coming out. जबकि प्रत्येक व्यक्ति अपने ही विश्व को देखता है, इसीलिये उस विश्व की उत्पत्ति उसके बन्धन के साथ ही होती है , और व्यक्ति की मुक्ति से -डीहिप्नोटाइज्ड होने से, वह विश्व (लस्ट-लूकर में आसक्ति वाला) विनष्ट हो जाता है, तथापि वह औरों के लिए, जो -लस्ट और लूकर के बंधन में हैं, अवशिष्ट रहता है। नाम और रूप से ही विश्व बना है। समुद्र की तरंग, तभी तक तरंग कहला सकती है, जबतक कि नाम और रूप से वह सीमित है। यदि तरंग लुप्त हो जाय , तो वह समुद्र ही है।
समुद्र की तरंग के नाम और रूप जल के बिना नहीं हो सकते, जिससे नाम और रूप ने तरंग का निर्माण किया था, परन्तु फिर भी वे स्वयं तरंग नहीं हैं। जैसे ही तरंग पानी बन जाती है, वैसे ही नाम और रूप का लोप हो जाता है। सब काल में तरंग पानी ही है, परन्तु फिरभी तरंग के आकर में उसका नाम और रूप है। फिर ये नाम और रूप एक क्षण के लिए भी पानी से पृथक होकर नहीं रह सकते, यद्यपि तरंग जल रूप में नाम और रूप से पृथक होकर अनंत काल तक रह सकती हैं।
परन्तु नाम और रूप पृथक नहीं किये जा सकते, इसीलिए उनका अस्तित्व नहीं माना जा सकता। फिर भी वे शून्य नहीं हैं ; और यही माया है ! परन्तु अब मेरे मन पर स्पष्ट प्रकाश पड़ रहा है, मेरी जगत -जिव और ईश्वर सम्बन्धी धारणा का धुँधलापन दूर हो गया है। 3H के परस्पर सम्बन्ध को जानने के लिए (हार्ट-माइंड के फंक्शन्स को गहराई से समझने के लिये) शारीरिक विज्ञान का और अधिक अध्यन करने की आवश्यकता है। मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार के मनोविज्ञान को समझना होगा।
मैं जगत को अद्वैत के रूखे और कठोर तर्क ('I AM HE' या आप भेंड़ नहीं सिंह हैं!) को; प्रेम के अति कोमल मधुर रस में लपेट कर, उत्कट कर्म से सुगन्धित मसालेदार बना कर, और मनःसंयोग की रसोई में पका कर, इस प्रकार देना चाहता हूँ, ताकि एक शिशु भी उसे सहज रूप से पचा सके ! " ४/ ३८३-८६
[ इ वांट टू गिव देम ड्राई, हार्ड रीज़न, सौफ्टन्ड ऐंड टाइल्ड इन स्वीटेस्ट सिरप ऑफ़ लव, ऐंड मेड स्पाइसी विथ इंटेन्स वर्क, ऐंड कुक्ड इन किचेन ऑफ़ योगा, सो दैट इवेन अ बेबी कैन ईजिली डाइजेस्ट इट।
(रुमाल की गाँठ लुप्त हो जाये तो वह रुमाल ही है !)
कैवल्यपाद ४.३३ पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।।34 ।।
[पुरुषार्थशून्यानां – जिनका पुरुष के लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा, ऐसे, गुणानाम् – गुणों का, प्रतिप्रसवः – अपने कारण में विलीन हो जाना, कैवल्यम् – कैवल्य है, वा - अथवा, इति – यों, चितिशक्तेः – द्रष्टा का, स्वरूपप्रतिष्ठा – अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना (कैवल्य) है।]
गुणों से जब पुरुष का कोई प्रयोजन नहीं रहता, तब 'प्रतिप्रसवः' अर्थात प्रतिलोम क्रम से अपने कारण में गुणों के लय को (विलीन हो जाने को ) कैवल्य कहते हैं, अथवा यों कहिये कि द्रष्टा (चित शक्ति) का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना ही कैवल्य है।
प्रकृति का काम समाप्त हो गया। हमारी परम कल्याणमयी धात्री प्रकृति ने इच्छापूर्वक जिस निःस्वार्थ कार्य का भार अपने कन्धों पर लिया था, वह समाप्त हो गया। उसने मानो आत्मविस्मृत जीवात्मा का हाथ पकड़ कर उसे धीरे धीरे संसार के समस्त भोगों का अनुभव कराया, अपनी समस्त अभिव्यक्ति दिखायी, सारे विकार दिखाये, और इस प्रकार वह उसे विभिन्न शरीरों में से ले जाते हुए क्रमशः उच्च से उच्चतर अवस्था में उठाती गयी!!! अन्त में आत्मा ने अपनी खोयी हुई महिमा फिर से प्राप्त कर ली, उसका अपना स्वरुप फिर से उसके मानस में उदित हो गया।
तब वह करुणामयी जननी जिस रास्ते से आयी थी, उसी रास्ते से वापस चली गयी और उन लोगों को रास्ता दिखाने में प्रवृत्त हो गयी, जो इस जीवन के पदचिन्ह-विहीन मरुभूमि में अपना पथ खो बैठे हैं। वह अनादि, अनन्त काल से इसी प्रकार काम करती चली आ रही है। बस, इसी प्रकार सुख और दुःख, भले और बुरे के माध्यम से होते हुए जीवात्मा की अनन्त नदी सिद्धि और आत्मसाक्षात्काररूप समुद्र की ओर प्रवाहित हो रही है। जिन्होंने अपने स्वरुप का अनुभव कर लिया है, उनकी जय हो। वे हम सबको आशीर्वाद दें ! १/२१८
१. महामण्डल का " प्रतीक-चिन्ह " (Emblem) : महामण्डल के आविर्भूत हो जाने बाद, सोंच-विचार कर के सर्वप्रथम इसका एक " प्रतीक-चिन्ह " निर्धारित किया गया। आप जब इन्टरनेट से ब्राउज करने के लिये महामण्डल का वेब-पेज खोलेंगे तो दाहिनी तरफ महामण्डल का प्रतीक-चिन्ह (Emblem) दिखाई देगा।
उसमे जो गोलाई है, वह पृथ्वी है; और सुदूर दक्षिणी भाग में स्थित कन्याकुमारी के ऊपर से शुरू होता हुआ भारतवर्ष का मानचित्र है, जिसके भीतर दण्डधारी स्वामी विवेकानन्द को एक
रमता योगी या भ्रमणकारी संन्यासी, आइटिनेरेन्ट मोंक (Itinerant monk-दादा बोलते थे 'छन्नछाड़ा गोष्ठिर पुरोधा') के रूप में दर्शाया गया है। एक युवा भ्रमणकारी रमता योगी, या एक दण्डधारी यायावर युवा संन्यासी, के रूप में स्वामी विवेकानन्द ही महामण्डल के आदर्श हैं।
किसी महापुरुष के निजी जीवन में संचित कुछ महान गुणों के संकलन-फल को आदर्श (model-प्रतिमान या नमूना) कहते हैं। जिस प्रकार किसी शिल्पकार को मूर्ति को गढ़ने के लिये एक साँचे की आवश्यकता होती है,उसी प्रकार युवाओं को भी अपना जीवन-गठन करने के लिये किसी जीवन्त और ज्वलन्त आदर्श को एक साँचे (Role Model) के रूप में अपने सामने रखना आवश्यक है। जिस व्यक्ति के अपने आचरण में वैसे महान गुण परिलक्षित नहीं होते हों, उनके मुख से केवल कुछ रटे-रटाये बेजान शब्दों के संयोजन का श्रवण करने से उन महान सत्यों (अहम् ब्रह्मास्मि जैसे महावाक्यों) की वास्तविक अवधारणा नहीं हो सकती है। जब किसी महापुरुष के व्यक्तिगत जीवन में समस्त गुण पूर्ण मात्रा में विकसित हो जाते हैं, तभी उस जीवन से आदर्श का जीवन्त-ज्वलन्त प्रतिफलन प्राप्त किया जा सकता है। किसी वैसे ही आदर्श स्वरूप व्यक्ति को देखकर सीखा जा सकता है, उनसे प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है, उनके हृदय के जोश और उत्साह से प्रेरणा लेकर अपने ह्रदय को भी जोश और उत्साह से भर लेना संभव हो जाता है। युवा पीढ़ी के सामने ऐसा ही एक जीवन्त आदर्श रहना बहुत आवश्यक है। आधुनिक युग के युवा पीढ़ी के लिये स्वामी विवेकानन्द ही वह श्रेष्ठ आदर्श (Role Model) हैं!
२. महामण्डल का आदर्श वाक्य या मोटो -" Be and Make " ! उस गोलाई के नीचे लिखा है स्वामीजी का यह आह्वान " बनो और बनाओ " (Be and Make ) उपनिषदों में कहे गये " महावाक्यों " के जैसा अत्यन्त सारगर्भित है। इसका सरल अर्थ है -" स्वयं मनुष्य बनो दूसरों को मनुष्य बनने में सहायता करो !
३. महामण्डल की 'कैम्पेन पॉलीसी ' समर-नीति या अभियान मन्त्र है- " चरैवेति चरैवेति !" अर्थात "आगे बढ़ो, आगे बढ़ो रहो !" जो इस प्रतीक चिन्ह के ऊपर लिखा है । इस मन्त्र को (ऐतरेय ब्राह्मण ७.१५) के वैदिक संचरण गीत "चरैवेति-चरैवेति।" से लिया गया है। इस वैदिक गीत में मनुष्य एवं समाज के विकास के केन्द्र में मनुष्य के श्रम या पुरुषार्थ के महत्व को उजागर किया गया है। दादा कहते थे- इस मन्त्र में इतनी शक्ति है, कि जो भी इस चरित्र-निर्माण आंदोलन को भारत के गाँव-गाँव तक पहुँचा देने के कार्य में निष्ठा पूर्वक जुड़ा रहेगा वह स्वयं यथार्थ मनुष्य बन जायेगा ! उसे मोक्ष (मुक्ति-भक्ति) तक की प्राप्ति स्वतः हो जायेगी, उसके लिये अलग से अन्य कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी। अतः चरित्र-निर्माण आंदोलन को भारत के गॉंव-गाँव तक प्रचारित कर देने की नीति-योजना है -'चरैवेति चरैवेति हुँकारों स्माकम!'
कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन् । चरैवेति चरैवेति॥
इस मंत्र के ऋषि ने बताया है कि - जो मनुष्य (मोहनिद्रा में ) सोया रहता है और यथार्थ मनुष्य बन जाने के लिए पुरुषार्थ नहीं करता उस मनुष्य का भाग्य भी सोया रहता है, जो पुरुषार्थ करने के लिये खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है. जो आगे चलना शुरू कर देता है , उसका भाग्य भी आगे आगे चलने लगता है, इसीलिये- " हे मनुष्यों- चरैवेति चरैवेति ! "आगे बढो ,आगे बढ़ते रहो !"
सोये रहने का तात्पर्य है, जो मनुष्य अभी तक 'देहाध्यास ' में फँसा है और अपने नश्वर शरीर को (सापेक्षिक सत्य को) ही मैं 'अमुक' नाम वाला/वाली स्त्री/पुरुष शरीर समझ रहा है, वह मोह-निद्रा में सोया हुआ है, अतः अभी उसके लिये ' कलिकाल' चल रहा है, या वह 'कलियुग' में ही वास कर रहा है! नेता स्वामीजी की ललकार - उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्नी बोधत ! सुनने से, जिसकी मोहनिद्रा भंग हो गयी है, वह द्वापर
युग में वास कर रहा है। " उत्तिष्ठ्म स्त्र्रेता भवति "- जो उठ कर के खड़ा हो जाता है- जो पुरुषार्थ करने के लिये- या महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास करने के लिये आलस्य छोड़कर और कमर कस कर उठ खड़ा होता है, वह 'त्रेता युग' में वास कर रहा है। और " कृतं संपद्यते चरन् "- अर्थात जो मनुष्य प्रति मुहूर्त अपने ' क्षुद्र स्वार्थी-मैं ' (काचा आमी -देहाध्यास) को निष्ठुरता के साथ त्याग करते हुए 'पूर्ण निःस्वार्थी
बृहद-मैं' (पाका आमी) बनने का प्रयत्न निरन्तर करता रहता है, वह तो मानो 'सत्य युग' में वास कर रहा होता है!
किन्तु केवल इतना ही काफी नहीं है। इसके साथ साथ सभी युवाओं को व्यक्ति-जीवन से सामाजिक-जीवन तथा राष्ट्रिय जीवन तक 'एक और अभिन्न ' बनते हुए आगे बढ़ने के मन्त्र में अनुप्राणित करना होगा।इसके लिए हमें 'अपने जीवन' को 'सबों के जीवन' से जोड़ कर देखने की पद्धति, अर्थात 'योग' करके देखने की पद्धति को सीखना होगा। हमें अपने जीवन-दीपक को प्रज्वलित करके दूसरों के जीवन-दीप को भी प्रज्वलित करा देने का प्रयत्न करना होगा। इसीलिये स्वामीजी ने कहा था- ' चरैवेति चरैवेति '-चलते रहना ही जीवन है, और थम जाना ही मृत्यु है।' फिर कहते हैं- ' उठो, जागो ! अब और स्वप्न मत देखो ! ' यही है स्वामीजी का जीवन-प्रद मन्त्र, जो जड़-पिण्डों (मुर्दों) में भी जान डाल सकता है।
ब्रह्म तेज और क्षात्रवीर्य : नवनी दा कहते थे-"हमारे वैदिक ऋषिओं ने " ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य " का बहुत गुणगान किया है। वेदों में कहा गया है," जहाँ ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य एक साथ रहते हैं, केवल वहीँ पर पुण्याग्नि के साथ समस्त देवता निवास करते हैं। "
"ब्रह्मतेज" का अर्थ है- आध्यात्मिक ज्ञान या मुक्ति, वह तेज जो ब्रह्म-दृष्टि से उत्पन्न होती है। अर्थात सभी एक है - आत्मा ही परमात्मा है, इस साम्य दृष्टि से जो तेज या शक्ति उत्पन्न होती है, उसे ब्रह्मतेज कहते हैं। जिस किसी व्यक्ति को समदर्शन की उपलब्धि हो जाती है, जो मनुष्य समदर्शी (even-minded) बन जाता है, या साम्यभाव में स्थित हो जाता है, उसका भय सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है।
अर्थात कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं की भावना से प्रेरित -सन्तसुलभ सर्व प्रेमी बुद्धि-या होश ऑल लविंग इन्टेलिजेन्स ऑफ़ सेंटलीनेस =All loving intelligence of saintliness)। "क्षात्रवीर्य" का अर्थ है - यौवन का वह जोश, वैसा स्वतः स्फूर्त पौरुष, या वह लौकिक सार्मथ्य जो 'बनो और बनाओ आंदोलन' को भारत के प्रत्येक राज्य में प्रसारित करने में सक्षम हो। जो अधोपतित समाज के भीतर भी सदाचार को स्थापित कर देने में समर्थ हो ! डायनामिक गुडनेस ऑफ़ मैनलीनेस, Dynamic goodness of manliness)।
आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति से सम्पन्न कोई भी पुरुष जब अपने कार्यक्षेत्र में प्रयत्नशील हो जाता है, तो कोई भी शक्ति उसे सफलता से वंचित नहीं रख सकती। - महाभारत, 12,29,138।में कहा गया है -' क्षताद्र् यो वै त्रायतीति स तस्मात्क्षत्रियः स्मृतः। ’’- जो विनाश से रक्षा करता है, वह क्षत्रिय है।’’ क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर और कोई कर्तव्य नहीं है। उसका स्वधर्म अर्थात् कर्म का नियम उससे युद्ध में लड़ने में मांग करता है। यदि आवश्यकता हो, तो सत्य की रक्षा के लिए युद्ध करना क्षत्रिय का सामाजिक कर्तव्य है। संन्यास उसका कर्तव्य नहीं है। उसका कर्तव्य शक्ति के प्रयोग द्वारा व्यवस्था बनाए रखना है, ’सिर घुटाकर’ साधु बन जाना नहीं!
युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ' तुम्हें भी अपने जीवन में ' क्षात्र-वीर्य और ब्रह-तेज ' इन दो आपात परस्पर विरोधी भावों का समावेश करके, संसार में नये युग की शुरुआत करनी होगी। यही सन्देश यजुर्वेद में भी दिया गया है-" जहाँ ब्रह्मतेज और क्षात्र-वीर्य एक साथ रहते हैं, केवल वहीँ पर पुण्याग्नि के साथ समस्त देवता निवास करते हैं।
भविष्य के गौरवशाली भारत के निर्माण का प्रारम्भ तभी होगा, जब हमारे देश के युवाओं के जीवन में ' क्षात्रवीर्य ' और' ब्रह्मतेज ' (जोश और होश ) साथा-साथ एवं एक सामान आभा बिखेरेंगे। महामण्डल के प्रयास से एवम होली ट्रायो के आशीर्वाद से भविष्य के गौरवशाली भारत में ऐसे ही समाज की स्थापना होगी जहाँ 'क्षात्रवीर्य' और 'ब्रह्मतेज' साथासाथ एवं एक सामान आभा बिखेरेंगे।
इसी महान स्वप्न को अपने ह्रदय में संजोये हुए हमारे अनेको वीर शहीदों ने भारत-माता की बली वेदी पर अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया था। आज का युवा समुदाय अपनी चारित्रिक-शक्ति की संप्रभुता का दुन्दुभीनिनाद कर उनके स्वप्नों को साकार कर सकते हैं। भारत के युवाओं के समक्ष यही सबसे बड़ी चुनौती है। यह चुनौती सबसे ज्यादा कठिन भी है,क्योंकि चुनौती से प्राप्त होने वाला -'जय या पराजय' ही हमारे भविष्य का स्वरूप निश्चित करेगा। इसका सारा उत्तरदायित्व युवाओं के कन्धों पर ही है। अपनी तथा अपनी प्यारी मातृभूमि को संकट में डालने का जोखिम उठा कर ही वे चाहें तो,इस चुनौती को अनदेखा कर सकते हैं।
इस महा-जागरण की वाणी को भारत के खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, स्कुल-कालेजों, ऑफ़िस-अदालतों, व्यापारियों की गद्दीयों, राष्ट्र-चालकों के मसनदों (सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेताओं ) तक, सर्वत्र फैला देना होगा। स्वामीजी ने कहा था- ' भारत झोपड़ियों में वास करता है। ' उसके जनसाधारण की उन्नति से ही भारत की उन्नति होगी। भारत को महान बनाने के लिये यहाँ की साधारण जनता को महान भावों से अनुप्राणित करना होगा। और जो मनुष्य, किसी रमता योगी या यायावर यात्री की तरह (ड्रॉपआउट्स की तरह या छन्नछाड़ा गोष्ठी के पुरोधा की तरह) एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूम घूम कर मनुष्य बनने और बनाने BE AND MAKE के लिए महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यासों के प्रचार-प्रसार में लगा रहता है, एक दिन अवश्य उसके हृदय के बन्द कपाट को फोड़ कर प्रेम-मन्दाकिनी प्रवाहित होने लगती है! और तब वह मनुष्य जो मन (अहं) के बन्धन से मुक्त - या डीहिप्नोटाइज्ड हो कर ,साम्यभाव में स्थित हो जाता है समदर्शी हो जाता है, तब अपने -पराये का भेद मिट जाता है, वह किसी को पराया नहीं मानता, सभी को अपना मानता है।
मनुष्य की इसी अवस्था का वर्णन रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी कविता ' निर्झ्रेर स्वप्नभंग' में करते हुए कहते हैं जब उस उन्मुक्त झरने का स्वप्न भंग हो जाता है, -वह अपने छोटे छोटे स्वार्थ और लालच को त्याग करते हुए, सम्पूर्ण रूप से निःस्वार्थ जीवन-समुद्र के साथ एक हो जाता है। 'हेशे खोलो खोलो गेये कोलो कोलो ताले ताले दिबो ताली' (হেসে খলখল গেয়ে কলকল/তালে তালে দিব তালি।)
अपने इस क्षुद्र 'स्वार्थी काचा आमी' (देहाध्यास, नाम-रूप या M /F का मैं बोध) को त्याग कर अपने यथार्थ स्वरूप या पूर्णतः 'निःस्वार्थपर पाका आमी' बन जाने से (ससीम से असीम बन जाने या बून्द से सागर बन जाने ) को हमें क्यों भयप्रद मानना चाहिए ? यह भय केवल अपनी जड़ावस्था को अचल रखने के दुराग्रहवश उत्पन्न होता है। इसीलिये स्वामीजी युवाओं से आह्वान करते हैं-'चरैवेति चरैवेति','ऑन्वर्ड ऑन्वर्ड', 'आगे बढो, आगे बढो '! अर्थात " Be and Make ! या उन्नततर मनुष्य (निःस्वार्थी मनुष्य) बनने और बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहो ! स्वामी विवेकानन्द द्वारा उद्धरित इन्हीं दोनों आह्वानों या महावाक्यों को महामण्डल के प्रतीक-चिन्ह में उकेरा गया है ! एवं गोलाई के बाकी बचे हिस्से को छोटे छोटे 'वज्र' अर्थात इसी प्रकार के थण्डर बोल्ट तुल्य निःस्वार्थी मनुष्य की शृंखला से सम्पुटित (एनकेप्स्युलेट-encapsulate) किया गया है।
[The emblem of the Mahamandal, which appears at the upper right corner of the webpage, shows Swami Vivekananda as an itinerant monk standing at Kanyakumari at the southernmost part of India, which is represented through the line map on the earth. On the top is written : Charaiveti Charaiveti (Onward! Onward!) and at the bottom: BE AND MAKE. The rest of the circle representing the earth is encapsulated with a series of small Vajras.]
इस विषय के महत्व पर गीता के अन्तिम श्लोक (१८. ७८) में कहा गया है-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।
[यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थः धनुर्धरः/ तत्र श्रीः विजयः भूतिः ध्रुवा नीतिः, मतिः मम/ ]
जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं, वहाँ - लक्ष्मी, शोभा, सम्पत्ति -- श्री रहेगी ही; ये सब श्री शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण होंगे, वहाँ विभूति -- ऐश्वर्य, महत्ता, प्रभाव, सामर्थ्य आदि सब के सब भगवद्गुण रहेंगे ही! जिस व्यक्ति के मन में सबों के प्रति एकत्व का, साम्यभाव का या अपनेपन का बोध रहता है, समदृष्टि रहती है, उसी को योगी कहते हैं। (मनःसंयोग के रचयिता नवनी दा योगेश्वर हैं !)
शूरवीरता आदि का भी एक नाम विजय है, और अर्जुन का भी है एक नाम विजय है। जहाँ विजय-रूप अर्जुन होंगे, वहाँ शूरवीरता, उत्साह आदि क्षात्र- ऐश्वर्य रहेंगे ही। जहाँ धर्मात्मा अर्जुन जैसा महामण्डल के नेता होंगे, वहाँ ध्रुवा नीति-अटल नीति, न्याय, धर्म या चरित्र आदि रहेंगे ही।
गीता का उपदेश योग है और उस उपदेश को देने वाला योगेश्वर है। जब मानव-आत्मा प्रबुद्ध और डीहिप्नोटाइज्ड अर्थात ब्रह्म के साथ एक हो जाती है, तब सौभाग्य और विजय, कल्याण और नैतिकता सुनिश्चित हो जाती हैं। श्रीकृष्ण योग के मूर्त रूप हैं। जो कर्म (अपने-पराये का भेद छोड़ कर ) समग्र-कल्याण की दृष्टि से किया जाता है, उसी को योग की अवस्था में समदृष्टि के साथ कर्म करना कहते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन के इस चित्र से आदर्श जीवन पद्धति का रूपक पूर्ण हो जाता है।
४. महामण्डल का ऐन्थम : महामण्डल का 'संघ-मन्त्र' है- " हे जना:! सं गच्छध्वम्, सं वदध्वम् !" जिसका हिन्दी भाव है- (हे मनुष्यों) मिलकर चलो । मिलकर बोलो । तुम्हारे मन एक प्रकार के विचार करें । जिस प्रकार प्राचीन देवगण (विद्वान् लोग) एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, (उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग ग्रहण करो) । इस प्रकार हम अपने सारे निर्णय एक मन हो कर ही करेंगे,क्योंकि देवता लोग एक मन रहने के कारण ही असुरों पर विजय प्राप्त कर सके थे । अर्थात एक मन बन जाना ही समाज-गठन का रहस्य है ......कैसा अनोखा मन्त्र है.' संजयान ' हो उठना का तात्पर्य है, 'साम्य-भाव' में जाग उठना, और एकमत (अविरोध में स्थित) हो जाना ! यह एन्थम भी स्वामीजी ने ही ऋग्वेद से उद्धृत किया था !
[सं गच्छध्वं सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ।।- ऋग्. १०.१९१.२
अन्वय - (हे जना:) सं गच्छध्वम्, सं वदध्वम्, व: मनांसि सं जानताम् । यथा पूर्वे देवा: संजानाना: भागम् उपासते, (तथैव यूयं कुरुत) शब्दार्थ- (हे जना:) हे मनुष्यो, (सं गच्छध्वम्) मिलकर चलो । (सं वदध्वम्) मिलकर बोलो । (वः) तुम्हारे, (मनांसि) मन, (सं जानताम्) एक प्रकार के विचार करे । (यथा) जैसे, (पूर्वे) प्राचीन, (देवा:) देवो या विद्वानों ने, (संजानाना:) एकमत होकर, (भागम्) अपने - अपने भाग को, (उपासते) स्वीकार किया, इसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग स्वीकार करो ।हिंदी अर्थ- (हे मनुष्यों) मिलकर चलो । मिलकर बोलो । तुम्हारे मन एक प्रकार के विचार करें । जिस प्रकार प्राचीन देवगण (विद्वान् लोग) एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, (उसी प्रकार तुम भी एकमत होकर अपना भाग ग्रहण करो) । ]