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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

⚜️️🔱श्रीमद् भगवद्गीता : अध्याय -9 ⚜️️🔱अध्याय -9 : राजविद्या -राजगुह्य योग ⚜️️🔱भक्ति स्पर्शमणि है ! ⚜️️🔱प्रयत्नपूर्वक शुद्धबुद्धि से आत्मा (इष्टदेव) का स्मरण ही सफलता का रहस्य है।⚜️️🔱

 नवम अध्याय का सारामृत

34 श्लोकों वाले इस नवम अस्ध्याय का नाम राजविद्या -राजगुह्य योग है। इस अध्याय में -'ईश्वर में एकान्त शरणागति ही भक्तिलाभ का श्रेष्ठ उपाय' आदि विषयों पर चर्चा हुई है। अष्टम अध्याय में निर्गुण निराकार अक्षर -स्वरुप की विवेचना के प्रसंग में श्री भगवान ने कहा - केवल भक्ति से ही परमात्मा का दर्शन संभव है। श्री भगवान अपनी माया या प्रकृति का आश्रय लेकर संसार की रचना करके उसमें अनुप्रविष्ट होकर विविध लीलायें करते हैं। जीवों के कल्याण के लिए मनुष्य-देह धारण भी उनकी एक लीला है , और इसीको अवतार-लीला कहते हैं। 

    श्रीरामकृष्ण देव कहते हैं - " नर लीला में अवतार है। नर लीला कैसी है जानते हो ? जैसे बड़ी छत की नाली से पानी भीतर से बड़े वेग से नीचे आ गिरता है। उस सच्चिदानन्द की शक्ति एक प्रणाली से नल के भीतर से आती है ..... अवतार को सबलोग पहचान नहीं सकते। " उन्होंने अन्य स्थान में कहा है - " मनुष्यदेह धारण कर ईश्वर अवतीर्ण होते हैं। वे सभी प्राणियों में हैं सही , किन्तु अवतार हुए बिना जीव की आकांक्षा पूर्ण नहीं होती, उनकी आवश्यकता की पूर्ति भी नहीं होती। कैसा जानते हो ? गाय के शरीर के जिस स्थान का स्पर्श करोगे , गाय का स्पर्श होता है सही , किन्तु दूध मिलता है उसके थन से। .... आद्या शक्ति की सहायता से अवतार-लीला होती है। उनकी शक्ति से अवतार है। किन्तु अवतार ही जीव का त्राण करते हैं - खंडन भव बंधन ! सभी जगन्माता की शक्ति है। .......अवतार को देखना और ईश्वर को देखना एक ही बात है। ईश्वर ही हर एक युग में मनुष्य का शरीर धरकर अवतीर्ण होते हैं। ईश्वर के पूर्ण रूप की धारणा कौन कर सकता है ? .... उनके अवतार को ही देखने से उनका दर्शन हो जाता है। यदि कोई गंगाजल का स्पर्श करता है और कहता है कि गंगा का दर्शन , स्पर्शन कर लिया। तो उसे हरिद्वार से गंगासागर तक समूची गंगा का स्पर्श नहीं करना पड़ता। 

उन्होंने और भी कहा है - 

" मनुष्य को प्रेम , भक्ति सिखाने के लिए ईश्वर समय -समय पर मनुष्य-देह धारण कर अवतीर्ण होते हैं। अवतार के भीतर से ही उनकी प्रेम-भक्ति का स्वाद मिलता है। उनकी लीलाएं अनंत हैं , किन्तु मुझे प्रयोजन है उनका प्रेम और भक्ति। मुझे क्षीर ही चाहिए। गाय के थन से ही क्षीर आता है। अवतार मानो गाय के थन हैं। अवतार वे हैं , जो तारण करते हैं। अवतार 10 हैं , 24 अवतार भी हैं , फिर असंख्य भी हैं। "....अवतार या अवतार के अंश ईश्वरकोटि हैं,  और साधारण मनुष्यों को जीव या जीवकोटि कहते हैं। जो लोग जीवकोटि हैं , वे साधन साधन करते हैं, ईश्वरलाभ तक कर सकते हैं, किन्तु वे निर्विकल्प समाधिस्थ होने पर फिर लौट नहीं सकते जो लोग ईश्वरकोटि हैं , वे मानो राजपुत्र हैं , सात मंजिलों की कुंजी उनके हाथ में है। वे 7 वें मंजिल तक चढ़ जाते हैं , और इच्छानुसार नीचे उतर सकते हैं। जीवकोटि मानो छोटे कर्मचारी हैं। 7 मंजिल वाले मकान में वे कुछ मंजिलों तक ही चढ़ सकते हैं , बस। " 

अवतार के हाथ में मुक्ति की कुंजी, 'खंडन -भव -बंधन' की कुंजी है केवल षड्-विध ऐश्वर्य युक्त भगवान ही जीव को मुक्ति दे सकते हैं , भगवान के अवतार कैवल्यमुक्ति देने की शक्ति लेकर ही संसार में आते हैं। स्वामी विवेकानन्द जी ने एक स्थान में कहा है - वे (अवतारी पुरुष) स्पर्श से , यहाँ तक कि केवल इच्छामात्र से, दूसरे के भीतर धर्मशक्ति संचारित कर सकते हैं। उनकी शक्ति से हीनतम अधर्माचारी व्यक्ति भी क्षणमात्र में साधु बन जाता है। श्रीरामकृष्ण के जीवन में इसका प्रमाण मिलता है। उन्होंने स्पर्श मात्र से अनेकों को समाधिस्थ कर दिया है , फिर पापाचारियों को साधु रूप में परिणत कर दिया है।  

विभिन्न देवदेवियों के हाथों में भगवान मुक्ति की कुंजी नहीं देते। जीव को मुक्तिदान रूप विशेष साधिकार उन्होंने अपने हाथ में रखा है। श्रीकृष्ण अनेक शास्त्रकारों के मत में -"कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।" (महाभारतके उद्योगपर्व (69.42) में भी कहा गया है, "कृष्णस्तु भगवान् साक्षात् नारायणः परः" - कृष्ण ही साक्षात् नारायण हैं।)

 भगवान की अवतार -लीला बहुत ही दुर्बोध और गहन विषय है। षड्-विध ऐश्वर्य युक्त परम करुणामय भगवान 'साढ़े तीन हाथ ' मनुष्य बनकर संसार में आते हैं और मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं -यह मानो एकदम अविश्वसनीय घटना है। साधन -भजन के द्वारा इसका रहस्योद्घाटन संभव नहीं है। यदि वे कृपा करके किसी को जता देते हैं तो उनका स्वरुप जाना जा सकता है। " श्रीरामकृष्ण -कथामृत ' ग्रन्थ में मिलता है कि यद्यपि दण्डकारण्य में तपस्या करने वाले सोलह हजार ऋषि थे , किन्तु उनमें भरद्वाज आदि 12 ऋषि ही रामचन्द्र को अवतार रूप से जान सके। दूसरे लोगों ने कहा था -" हे रामचन्द्र, हम तुम्हें दशरथ के पुत्ररूप से ही जानते हैं। अवतार को कोई कोई साधारण मनुष्य समझते हैं , और कोई सिद्ध साधु रूप से मानते हैं , विरले ही 2 -4 मनुष्य ऐसे हैं जो उन्हें अवतार कहकर पूजते हैं। - कृष्ण के जितने खेल हैं उनमें नरलीला सर्वोत्तम है। उसमें मनुष्य शरीर ही उनका स्वरूप है।

ईश्वर-लीला , देवलीला , नरलीला और जगतलीला आदि विविध लीलाओं में उनकी अवतरलीला ही श्रेष्ठ है। 

अवतार की देखकर ही - "स ईशः अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् मूकास्वादनवत्" इस वाक्य का आशय समझना कुछ सम्भव है। 

भक्ति स्पर्शमणि है और अन्यान्य भावों में श्रीभगवान की शरण लेने का सुपष्ट निर्देश इस अध्याय में विशेष रूप से मिलता है। 

इस अध्याय के लिए दिया गया यह नाम उपयुक्त है। राजविद्या और राजगुह्य इन दो शब्दों का विस्तृत विवेचन किया जा चुका है। अध्याय के प्रारम्भ में हमने देखा कि शुद्ध चैतन्य ही वह ज्ञान है। जिसके प्रकाश में सभी औपाधिक या वृत्तिज्ञान सम्भव है। अतः उस पारमार्थिक तत्त्व का बोध कराने वाली इस विद्या को राजविद्या कहना अत्यन्त समीचीन है। उपनिषदों में इसे सर्वविद्या प्रतिष्ठा कहा गया है।  क्योंकि इसे जानकर और कोई जानने योग्य शेष नहीं रह जाता है यही मुण्डकोपनिषद् की भी घोषणा है।

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श्री भगवानुवाच   

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।9.1।।

।।9.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।। 

।।9.1।। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन में एक मुमुक्षु के लक्षण पाते हैं।  जो वास्तव में आत्मोन्नति के द्वारा संसार के समस्त बंधनों का विच्छेदन करना चाहता है। उसे केवल किसी ऐसी सहायता की आवश्यकता है जिससे कि उसे अपने साधन मार्ग की प्रामाणिकता का दृढ़ निश्चय हो सके। 

भगवान् कहते हैं कि वे अनसूयु अर्जुन को विज्ञान के सहित ज्ञान का अर्थात् सैद्धान्तिक ज्ञान तथा उसके अनुभव का उपदेश देंगे। अनसूयु का अर्थ है वह पुरुष जो असूया रहित है अथवा दोष दृष्टि रहित है। इस ज्ञान का प्रयोजन है जिसे जानकर तुम अशुभ अर्थात् संसार बंधनों से मुक्त हो जाओगे।

जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मनुष्य की अक्षमता का कारण यह है कि वह वस्तु और व्यक्ति अर्थात् जीव और जगत् का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करता है। फलत जीवनसंगीत के सुर और लय को वह खो देता है। अपने तथा बाह्य जगत् के वास्तविक स्वरूप को समझने का अर्थ है जगत् के साथ स्वस्थ एवं सुखवर्धक संबंध रखने के रहस्य को जानना। जो पुरुष इस प्रकार समष्टि के साथ एकरूपता पाने में सक्षम है वही जीवन में निश्चित सफलता और पूर्ण विजय का भागीदार होता है। 

आन्तरिक विघटन के कारण अपने समय का वीर योद्धा अर्जुन एक विक्षिप्त पुरुष के समान व्यवहार करने लगा था। ऐसे पुरुष को जीवन की समस्यायें अत्यन्त गम्भीर कर्तव्य महत् कष्टप्रद और स्वयं जीवन एक बहुत बड़ा भार प्रतीत होने लगता है। 

यद्यपि 'आत्मज्ञानी'  का यह पद मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है,  तथापि इस धरोहर का लाभ केवल वह विवेकी पुरुष पाता है,  जिसमें अपने मन पर विजय पाने का उत्साह और साहस होता है।  और वह विवेकी पुरुष सभी परिस्थितियों का शासक बनकर और जीवन की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों में भी इस पृथ्वी पर ईश्वर के समान हँसता हुआ रहता है। 

जीवन जीने की इस कला के प्रति साधक के मन में रुचि और उत्साह उत्पन्न करने के लिए इस ज्ञान की स्तुति करते हुए भगवान् कहते हैं --

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।9.2।।

।।9.2।। यह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।

 धर्म शब्द का अर्थ अनेक स्थलों पर बताया जा चुका है। आत्मचैतन्य के अभाव में मनुष्य स्थूल और सूक्ष्मरूप जड़तत्त्वों का समूह मात्र है,  जो स्वयं कोई भी कार्य करने में समर्थ नहीं है। यह चेतनतत्त्व 'आत्मा' ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है स्वरूप है। 

भगवान् यहाँ जो ज्ञान प्रदान करने वाले हैं वह न भौतिक विज्ञान है और न मनोविज्ञान किन्तु वह आत्मज्ञान अर्थात् मनुष्य के स्वस्वरूप का ज्ञान है। सुसुखं कर्तुम् धर्म कोई बाह्य जगत् में की जाने वाली क्रिया नहीं वरन् आत्मिक उन्नति का मार्ग  जिसका अनुसरण प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही करता है। 

 आत्म साक्षात्कार का अर्थ है स्वयं अनादि-अनन्त आत्मा ही बन जाना,  जो इस आभासिक दृश्यमान जगत् का एकमेव अद्वितीय अधिष्ठान है। इसलिए कहा गया है कि यह ज्ञान अव्यय है।

ज्ञान के साधकों के विपरीत जो लोग इस नित्य वस्तु के लिए प्रयत्न नहीं करते? उनके विषय में कहते हैं --

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।

।।9.3।। हे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।9.4।।

।।9.4।। यह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।

भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।

।।9.5।। और (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।

यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।9.6।।

।।9.6।। जैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।9.7।।

।।9.7।। हे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्।।9.8।।

।।9.8।। प्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।

उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।।9.9।।

।।9.9।। हे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ (परमात्मा) को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।

मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।

हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।

।।9.10।। हे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण ( अर्थात् मेरी अध्यक्षता में) प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।

।।9.11।। समस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।9.12।।

।।9.12।। वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।

।।9.13।। हे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।9.14।।

।।9.14।। सतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।

एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।9.15।।

।।9.15।। कोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्।

मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।।9.16।।

।।9.16।। मैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।

वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च।।9.17।।

।।9.17।। मैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।9.18।।

।।9.18।। गति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।9.19।।

।।9.19।। हे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा

यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक

मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।9.20।।

।।9.20।। तीनों वेदों के ज्ञाता (वेदोक्त सकाम कर्म करने वाले), सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं

क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।

एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना

गतागतं कामकामा लभन्ते।।9.21।।

।।9.21।। वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।9.22।।

।।9.22।। अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।

तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्।।9.23।।

।।9.23।। हे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।

न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।9.24।।

।।9.24।। क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।

यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः।

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।9.25।।

।।9.25।। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।9.26।।

।।9.26।। जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।9.27।।

।।9.27।। हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।

 जीवन में सब प्रकार के कर्म करते हुए हम ईश्वरापर्ण की भावना से रह सकते हैं। सम्पूर्ण गीता में असंख्य बार इस पर बल दिया गया है कि केवल शारीरिक कर्म की अपेक्षा ईश्वरार्पण की भावना सर्वाधिक महत्व की है।  और यह एक ऐसा तथ्य हैं जिसका प्राय साधक को विस्मरण हो जाता है। 

    शरीर, मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले विषय ग्रहण और उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया रूप जितने भी कर्म हैं,  उन सबको भक्तिपूर्वक मुझे अर्पण करे।  यह मात्र मानने की बात नहीं हैं और न ही कोई अतिश्योक्ति हैं यह भी नहीं कि इसका पालन करना मनुष्य के लिए किसी प्रकार से बहुत कठिन हो। 

एक ही आत्मा ईश्वर गुरु और भक्त में और सर्वत्र रम रहा है हम अपने व्यावहारिक जीवन में असंख्य नाम और रूपों के साथ व्यवहार करते हैं। हम जानते है कि इन सबको धारण करने के लिए आत्मसत्ता की आवश्यकता है। यदि हम अपने समस्त व्यवहार में इस आत्मतत्व का स्मरण रख सकें तो वह जगत् के अधिष्ठान का ही स्मरण होगा।

जैसे आभूषणों में स्वर्ण , और कपडे में सूत हैं वैसे ही विश्व के सभी नाम और रूपों में आत्मा ही मूल तत्व हैं। जो भक्त अपने जीवन के समस्त व्यवहार में इस दिव्य तत्त्व का स्मरण रख सकता हैं वही पुरुष जीवन को वह आदर और सम्मान दे सकता हैं जिसके योग्य जीवन हैं।

 यह नियम है कि जीवन को जो तुम दोगे वही तुम जीवन से पाओगे। तुम हँसोगे तो जीवन हँसेगा और तुम चिढोगे तो जीवन भी चिढेगा। किसी भी जीवन के पास आत्मज्ञान से उत्पन्न आदर और सम्मान के साथ जाओगे तो जीवन में तुम्हें भी आदर और सम्मान प्राप्त होगा

समर्पण की भावना से समस्त कर्मों को करने पर न केवल परमात्मा के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता है बल्कि आदर्श प्रयोजन और दिव्य लक्ष्य के कारण हमारा जीवन भी पवित्र बन जाता हैं

गीता में अनन्य भाव और सतत आत्मानुसंधान पर विशेष बल दिया गया है इस श्लोक में हम देख सकते हैं कि एक ऐसे उपाय का वर्णन किया गया है जिसके पालन से अनजाने ही साधक को ईश्वर का अखण्ड स्मरण बना रहेगा। इसके लिए चरित्र को व्यवहार में प्रकट करने के लिए कहीं किसी निर्जन सघन वन में या गुप्त गुफाओं में जाने की आवश्यकता नहीं है इसका पालन तो हम अपने नित्य के कार्य क्षेत्र में ही कर सकते हैं।

इस प्रकार समर्पण की भावना का जीवन जीने से क्या लाभ होगा? उसे अब बताते हैं।

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।

संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।9.28।।

।।9.28।। इस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।9.29।।

।।9.29।। मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।9.30।।

।।9.30।। यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।।9.31।।

।।9.31।। हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।

।।9.31।। पूर्व श्लोक में दृढ़तापूर्वक किये गये पूर्वानुमानित कथन की युक्तियुक्तता को इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है। जब एक दुराचारी पुरुष अपने दृढ़ निश्चय से प्रेरित होकर अनन्यभक्ति का आश्रय लेता है तब वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है। 

किसी वस्तु के अस्तित्व का कारण उस वस्तु का धर्म कहलाता है जैसे अग्नि की उष्णता अग्नि का धर्म है जिसके बिना उसका अस्तित्व ही नहीं हो सकता। (मनुष्य चरित्र का मनुष्योचित धर्म है, नित्य-अनित्य विवेक की परिभाषा !)  इसी प्रकार 'मनुष्य' के अस्तित्व का कारण या धर्म है-चैतन्य स्वरुप आत्मा ; जिसके बिना  उसकी कोई भी उपाधियाँ- देह, इन्द्रिय, मन , बुद्धि  कार्य नहीं कर सकती हैं। 

अनन्य भक्ति और पुरुषार्थ से एकाग्रता का विकास होता है, जिसका फल है मन की सूक्ष्मदर्शिता में अभिवृद्धि। ऐसा विवेक-सम्पन्न बुद्धि -मन ध्यान की सर्वोच्च उड़ान में भी अपनी समता बनाये रखता है। शीघ्र ही वह आत्मानुभव की झलक पाता है और इस प्रकार अधिकाधिक प्रभावशाली सन्त का जीवन जीते हुए अपने आदर्शों विचारों एवं कर्मों के द्वारा अपने दिव्यत्व की सुगन्ध को सभी दिशाओं में बिखेरता है।

साधारणत हमारा मन विषयों की कामनाओं और भोग की उत्तेजनाओं में ही रमता है। उसका यह रमना जब शान्त हो जाता है तब हम उस परम शक्ति का साक्षात् अनुभव करते हैं जो हमारे जीवन को सुरक्षित एवं शक्तिशाली बनाती है।  यह शाश्वत शान्ति ही हमारा मूल स्वरूप है

यहाँ आश्वासन दिया गया है कि वह शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है।  परन्तु इसका अर्थ ऐसा नहीं समझना चाहिए कि यह शान्ति हमसे कहीं सुदूर स्थित नहीं है यह तो अपने नित्यसिद्ध स्वस्वरूप की पहचान मात्र है।  दुर्व्यवस्थित जो मन और जो बुद्धि  निरन्तर इच्छा और कामना की उठती हुई तरंगों के मध्य थपेड़े खाती रहती है आत्मदर्शन के लिए उपयुक्त साधन नहीं है

 श्रीकृष्ण मानो अर्जुन की पीठ थपथपाते हुए घोषित करते हैं मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के अतुलनीय धर्मप्रचारक व्यक्तित्व को उजागर करती है। यह बताने के पश्चात् कि अतिशय दुराचारी पुरुष भी भक्ति और सम्यक् निश्चय के द्वारा शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है।

ऋषियों का अनुसरण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उसे इस निर्बाध सत्य का सर्वत्र उद्घोष करना चाहिए कि (प्रतिजानीहि) आदर्श मूल्यों का जीवन जीने वाला साधक कभी नष्ट नहीं होता है। और यदि उसका निश्चय दृढ़ और प्रयत्न निष्ठापूर्वक है तो वह असफल नहीं होता है। 

 इन दोनों श्लोकों का सार यह है कि जो व्यक्ति अपने मन के किसी एक भाग में भी ईश्वर का भान बनाए रखता है तो उसके ही प्रभाव से उस व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन परवर्तित होकर वह अपने अन्तर्बाह्य जीवन में प्रगति और विकास के योग्य बन जाता है।

 उसी प्रकार आत्मा (इष्टदेव) का अखण्ड स्मरण मानव व्यक्तित्व को विनाशकारी आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों के कृमियों से सुरक्षित रखता है।आगे कहते हैं -- 

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।9.32।।

।।9.32।। हे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।।9.33।।

।।9.33।। फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।

ये साधनसम्पन्न लोग हैं ब्राह्मण अर्थात् शुद्धान्तकरण का व्यक्ति।  तथा राजा माने उदार हृदय और दूर दृष्टि का बुद्धिमान व्यक्ति। जिस राजा ने बुद्धिमत्तापूर्वक अपनी राजसत्ता एवं धनवैभव का उपयोग किया हो  वह आत्मानुसंधान के द्वारा वास्तविक शान्ति का अनुभव प्राप्त करता है। ऐसे राजा को ही राजर्षि कहते हैं। 

 इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त करके अब तुम मेरा भजन करो। अर्जुन के निमित्त दिया गया उपदेश हम सबके लिए ही है क्योंकि यदि श्रीकृष्ण आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं।  तो अर्जुन उस मनुष्य का प्रतिनिधि है जो जीवन संघर्षों की चुनौतियों का सामना करने में अपने आप को असमर्थ पाता है

असंख्य विषय, इन्द्रियाँ और मन के भाव इनसे युक्त जगत् में ही हमें जीवन जीना होता है। ये तीनों ही सदा बदलते रहते हैं। स्वाभाविक ही इन्द्रियों के द्वारा विषयोपभोग का सुख अनित्य ही होगा। और दो सुखों के बीच का अन्तराल केवल दुखपूर्ण ही होगा।

आशावाद का जो विधेयात्मक और शक्तिप्रद ज्ञान गीता सिखाती है उसी स्वर में भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि यह जगत् केवल दुख का गर्त या निराशा की खाई या एक सुखरहित क्षेत्र है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर अब उसको नित्य और आनन्दस्वरूप आत्मा की पूजा में प्रवृत्त होना चाहिए।

 इस साधना में अर्जुन को प्रोत्साहित करने के लिए भगवान् ने यह कहा है कि गुणहीन लोगों के विपरीत जिस व्यक्ति में ब्राह्मण और राजर्षि के गुण होते हैं उसके लिए सफलता सरल और निश्चित होती है।

 इसलिए भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करो।हे मेरे प्रभु जब मुझे युद्धभूमि में शत्रुओं का सामना करना हो तब मैं आपकी पूजा किस प्रकार कर सकता हूँ ? इस पर भगवान् कहते हैं --

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।9.34।।

।।9.34।। (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।

 यह श्लोक सम्पूर्ण अध्याय का सुन्दर सारांश है क्योंकि इस अध्याय के कई अन्य श्लोकों पर यह काफी प्रकाश डालता है। हम कह सकते हैं कि यह श्लोक अनेक श्लोकों की व्याख्या का कार्य करता है। 

वेदान्त के प्रकरण ग्रन्थों में आत्मविकास एवं आत्मसाक्षात्कार के लिए सम्यक् ज्ञान और ध्यान का उपदेश दिया गया है। ध्यान के स्वरूप की परिभाषा इस प्रकार दी गई है कि उस (सत्य) का ही चिन्तन, उसके विषय में ही कथन।  परस्पर उसकी चर्चा करके मन का तत्पर या तत्स्वरूप बन जाने को ही ज्ञानी पुरुष ब्रह्माभ्यास समझते हैं। 

जीवन में आध्यात्मिक सुधार के लिए मन/ विवेकी बुद्धि  का विकास एक मूलभूत आवश्यकता है। यदि वास्तव में हम आध्यात्मिक विकास करना चाहें तो बाह्य दशा या परिस्थिति हमारी आदतें,  हमारा भूतकालीन या वर्तमान जीवन , कोई भी बाधक नहीं हो सकता है।

प्रयत्नपूर्वक शुद्धबुद्धि से आत्मा (इष्टदेव) का स्मरण या आत्मचिन्तन ही सफलता का रहस्य है। इस प्रकार जब तुम मुझे परम लक्ष्य समझोगे तब तुम मुझे प्राप्त होओगे यह श्रीकृष्ण का अर्जुन को आश्वासन है। वर्तमान में हम जो कुछ हैं वह हमारे संस्कारों के कारण है। शुभ और दैवी संस्कारों के होने पर हम उन्हीं के अनुरूप बन जाते हैं। 

conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्याय।। इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवां अध्याय समाप्त होता है।

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