महामण्डल के एक कैम्प में 'आत्मा ' के विषय पर चर्चा को सुनकर किसी छात्र ने एक बार श्रद्धेय 'नबनी दा' (महामण्डल के संस्थापक सचिव श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय) से प्रश्न किया था - वास्तव में ' मैं कौन हूँ और आत्मा क्या है ?
मैं कौन हूँ, Who am I ?
[Vivekananda Yuva Mahamandal-
Lec-Nabani Haran Mukhopadhyaya]
उसके उत्तर में 'श्रद्धेय दादा' ने बंगला भाषा में जो कहा था उसका हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है -
" तुम जो पूछते हो कि हमारे शरीर के भीतर 'हृदय -गुहा ' में जो है वो क्या है , उसको कैसे जाने? तो जो ह्रदय -गुहा के भीतर में विद्यमान है, उस ह्रदय की गहराई को समझना , इतना कठिन है कि अधिकांश मनुष्य को सारा जीवन साधन-भजन करने पर भी समझ में नहीं आता है।
और इसके भी ऊपर तुम्हारा दूसरा प्रश्न, 'असले आमि के' ? -वास्तव में मैं कौन हूँ ? इसकी जिज्ञासा ही अधिकांश मनुष्य के मन में कभी उठती ही नहीं है। बड़े संयोग से, लाखों में एक-दो मनुष्यों के मन में ऐसा प्रश्न उठता है। और उन ऐसे हजारों -हजार प्रयत्न करने वालों में किसी एक व्यक्ति को उस 'आत्मतत्व ' की अनुभूति होती है।
तो तुम्हारे बुद्धि में यह प्रश्न कैसे उठा , मैं कह नहीं सकता। क्योंकि हमलोग अपने प्रशिक्षण-कार्यक्रम इस विषय पर चर्चा नहीं करते। मुझे लगता है यह बात तुमने अन्य कहीं से सुनकर पूछ ली है। शायद कल के संध्या-कालीन सत्र के समय ही किसी वक्त के द्वारा कही हुई ये मेरे कानों तक पहुँची थी कि, "अपने वास्तविक स्वरुप में हमलोग आत्मा हैं।"
लेकिन आत्मा है क्या चीज ? इसको भला हमलोग अभी कैसे समझ सकते हैं ? आत्मा का अर्थ होता है चैतन्य ! लेकिन यदि हम सोचते हैं कि होश या चैतन्य को ही आत्मा के रूप में हमने ठीक ठीक समझ लिया है, या आत्मा का वास्तविक परिभाषा या अर्थ समझ लिया है, तो दोनों शब्दों में कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है। क्योंकि 'चेतना' (consciousness) को 'शक्ति' का केवल एक कण मात्र भी कहा जा सकता है -It could be called a particle of energy, इसलिए आत्मा के संबंध में - या चेतना के सम्बन्ध में मुख से जो कुछ भी उच्चारित किया जायेगा, उसका विवरण देने की चेष्टा होगी , या व्याख्या करने की जितनी भी चेष्टा की जाएगी, वही गलत सिद्ध होगी। क्योंकि आत्मा—या चेतना—का वर्णन नहीं किया जा सकता। For the soul—or consciousness—cannot be described.' इसलिए उसका नाम-करण ही नहीं हो सकता! (1:23 मिनट)
उसका (उस अनन्त -असीम का एकमेवाद्वितीय का) कोई भी 'नाम '( ससीम नाम चेतना या आत्मा) नहीं रखा जा सकता। क्योंकि उनके गुणों या विशेषताओं को नाम देकर और लिस्ट बनाकर कभी समाप्त नहीं किया जा सकता, और न मुख से ही कहा जा सकता है। हमलोग अपने वास्तविक स्वरुप में (पक्का मैं) आत्मवस्तु -आत्मतत्व ही हैं। वास्तव में वह आत्मतत्व ही शाश्वत चैतन्य स्वरुप है !वही चैतन्य; जिससे सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है, उसको 'ब्रह्म' भी कहा जाता है, चैतन्य भी कहा जाता है। वास्तव में हमलोग 'वह' ब्रह्म, आत्मा या चैतन्य ही हैं।
किन्तु इस सत्य को कितने लोग जानते हैं ? क्योंकि इस सूक्ष्म आत्मतत्व को जानना अत्यन्त कठिन है; इसलिए "ब्रह्मैव इदं सर्वं' या 'आत्मैव इदं सर्वं" या "जगत्यां यत् किं च जगत् अस्ति इदं सर्वम्" रूप से इस तरह आत्मनु-सन्धान करते हुए परम् सत्य को जानने में रूचि- बताओ कितनों को होती है ? और जब किसी को आत्मानुभूति या,चैतन्य-बोध हो जाता है , तब यह बहुत स्वाभाविक है कि , हमारी जो यह चेतना है - यह बोध कि इस शरीर M/F में है , जिसका एक नाम-रूप है। अपना परिवार , समाज और जगत है , जिस जगत में हमलोग जो रह रहे हैं। हमारा एक परिचय है, (एक आधारकार्ड वाला परिचय ,apparent 'I') एक पेशा है -जिसका एक 'Pan Card' संख्या है। हमारे पास अमुक -अमुक डिग्री है ! जब हम उस 'व्यावहारिक मैं ' वाले परिचय के आलावा वास्तव में कौन है; जब यह जानने की जिज्ञासा होती है कि वास्तव में कौन हूँ , तब आत्मा या चैतन्य को जानने का सवाल मन में उठता है। लेकिन जिनको (सत्यान्वेषी को) ऐसी ठीक- ठीक चैतन्य अनुभूति या आत्मानुभूति हो जाती है - फिर उनके मन में अपने वास्तविक स्वरुप के बारे में इस तरह की कोई दुविधा नहीं होती। (2:13 मिनट) क्योंकि चैतन्य और ज्ञान (आत्मज्ञान) समानार्थक शब्द हैं। जो ज्ञानस्वरूप है , वही चैतन्य है। (आनन्द-स्वरूप है ?) इसलिए इसकी कोई परिचयात्मक विवरण या व्याख्या नहीं की सकती। वास्तव में हमलोग वही हैं। किन्तु इस सत्य (इन्द्रियातीत) को हम समझ नहीं पाते हैं।
लेकिन किसी ब्रह्मज्ञानी या आत्मज्ञानी महापुरुष के मुख से सुनकर भी , उदाहरण के लिए जैसे स्वामी विवेकानन्द के शक्तिदायी विचार को पढ़कर, या श्रीरामकृष्ण देव के वचनामृत को पढ़कर या किसी के मुख से श्रवण कर यदि उनपर हमारी थोड़ी भी आस्था, विश्वास श्रद्धा है। और हम अपने मन को (अन्तर्मुखी शुद्धबुद्धि-विवेकी बुद्धि जोड़कर) यही बात यह समझाना चाहें कि -हमारा नाम चाहे जो कुछ हो , परिवार जो कुछ हो, शरीर M/F -स्त्री-पुरुष कुछ भी हो , किसी भी जाति का हो, डिग्री भी कितनी बड़ी हो , इन सब ऊपरी भेद-दृष्टि/बुद्धि/मति से हमारे वास्तविक स्वरुप में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। हमारी आयु कम हो या हम अधिक उम्र के ही क्यों न हों। वास्तव में हमलोग उसी चैतन्य शक्ति के एक छोटे से कण या अंश मात्र है, जो एक विशेष शरीर (M/F) शरीर और एक नाम-रूप धारण करके (अर्थात अनेकों प्रकार के जीव -जगत और ईश्वर आदि का नाम-रूप धारण करके ) इस धरती पर विचरण कर रहे हैं।
यही वास्तविक बात या परम सत्य है। किन्तु इस सत्य को सामान्य जनों के समझने की भाषा में कहना तो कठिन तो है ही,लेकिन सुनकर इसे समझ लेना तो और भी अधिक कठिन है। यदि तुमने केवल प्रश्न करने को कहा गया है , इसलिए तुमने भी मजा करने के लिए एक प्रश्न पूछ लिया है , तो इससे तुम्हें कुछ लाभ नहीं होगा। लेकिन यदि तुमने अपने मन में काफी सोच-विचार करने के बाद यह प्रश्न किया है , और सचमुच इसी प्रश्न का उत्तर खोजने की दिशा में , आत्मानु-संधान करने या सत्य को जानने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हो। और इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने तक रुकना नहीं चाहते हो ; तो तुम्हारे जीवन में किसी न किसी दिन, ऐसा खास समय में आ सकता है जब तुम इस प्रश्न के उत्तर- अपने यथार्थ स्वरुप के प्राप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के बहुत निकट पहुँच सकते हो।
और इसके उत्तर के निकट तक पहुँच पाने जाने से भी तुम्हें उसी आनन्द की उपलब्धि होनी आरम्भ हो जाएगी। जिस 'परमानन्द' के विषय में बोलते हुए, " श्रीरामकृष्ण देव कहते हैं कुछ लोग समुद्र देखने के लिए गए थे। (4:00 मिनट) उनमें से एक व्यक्ति दूर से समुद्र की गर्जना सुनकर ही अचेत (unconscious) हो गया, या मूर्छित हो गया। और वह महाआनन्द में लीन हो गया ! हे भगवान ! मैंने समुद्र की दहाड़ सुनी ??!! और वह "Oh, Father—I have heard the roar of the sea!" সমুদ্রের জল দেখে নীল ! আপাতত দৃষ্টিতে অনন্ত সমুদ্র -যেন সমুদ্রের পার নেই।
और एक दूसरा व्यक्ति थोड़ा आगे बढ़कर दूर से ही देखता है - समुद्र का जल तो एकदम नीला पानी है , और मानो उसका कहीं किनारा ही नहीं है ! Upon seeing his blue waves' তার নীল তরঙ্গরাজি দেখে ' - उसकी नीली-नीली लहरों को देखकर ही वह सम्मोहित होकर अचेत हो गया। मूर्छित हो गया। और कोई-कोई ऐसा भी है , जो समुद्र की दहाड़ सुनकर भी अचेत नहीं हुआ ! उसका दृश्य (रूप) देखकर भी वह मूर्छित नहीं हुआ; और बिल्कुल निकट , समुद्र के किनारे जाकर , थोड़ा जल में उतर कर उसका स्पर्श भी कर लिया ! यह अवस्था बहुत थोड़े से,गिने-चुने लोगों को ही प्राप्त होती है।
यह जो आत्मवस्तु है - वास्तव में हमलोग जो आत्मा या चैतन्य हैं, यह अनुभव भी ठीक उसी तरह का होता है। आत्मा या चैतन्य कहने से क्या हमारा शरीर रोमांचित जैसा अनुभव होता है ? (5:03) या अपने ह्रदय में एक अद्भुत आनन्द की अनुभूति , Wondrous Thrill - अद्भुत पुलकन की अनुभूति क्या हमारे ह्रदय का स्पर्श करती है ! किन्तु चैतन्य , ब्रह्म या आत्मा कहने से ही , उसी प्रकार कुछ हो जाने की बात सोचकर ही हम बोल पड़ते है ! " अरे वाह—यह विशेष शब्द ठीक वही सत्ता है, जो न केवल हर चीज़ के *भीतर* विद्यमान है, बल्कि जिसके बारे में हम कहते हैं कि *वही* सब कुछ है। [Oh my—this particular word is that very entity which resides not merely *within* everything, but which we say *is* everything.]
लेकिन ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। सभी कुछ के भीतर वह है नहीं -बल्कि जिसमें से सबकुछ उत्पन्न हुआ है -उसकी आत्मा कहते हैं। उसीको ब्रह्म कहते हैं , उसी को ही चैतन्य कहते हैं ! उसका नाम सुनते ही हमलोगों के शरीर और ह्रदय में एक रोमांच होता है , ह्रदय में एक आनन्द का स्पर्श जो हमारे मन को ही पुलकित कर देती है। ह्रदय को विशाल बना देती है। और जितना ही उसके निकट होते जायेंगे , उसका जितना सौन्दर्य दिखाई देगा , जितने भी रूप दिखाई देंगे -जितने उसके गुण दिखाई देंगे -उतने ही आनंद में डूबते जायेंगे। उस समय हमलोग उसी ब्रह्मसमुद्र में -इसी चैतन्य समुद्र में बिल्कुल लीन हो जायेंगे। (6:09) उस समय (अहंकार के गिर जाने पर) देखेंगे -'चैतन्य और मेरे बीच में कोई पार्थक्य नहीं है !" हम देखेंगे -' मैं' चैतन्य (आत्मा ,ब्रह्म) से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है ! उस समय देखेंगे - 'मैं ही चैतन्य हूँ ! 'अहंब्रह्मास्मि ' मैं ही ब्रह्म हूँ ! मैं ही आत्मा हूँ ! चैतन्य , ब्रह्म, आत्मा - ये तीन नाम हैं किन्तु वस्तु एक ही है ! Consciousness, Brahman, the Soul—these are three names, yet the reality is one and the same! जो चैतन्य है , वही आत्मा है , वही ब्रह्म है। और उससे यह यह सब दृष्टिगोचर सृष्टि अभिव्यक्त हुई है। और हमें अनेक प्रकार के जड़-चेतन नाम और रूपों में - जिसको हम 'जड़' या 'जीव'- कहते हैं , वास्तव में 'जड़' नामक कोई चीज है ही नहीं। जो कुछ भी है - सबकुछ चैतन्यमय हैं ! अचैतन्य या जड़ कोई नहीं है। सभी के भीतर वही एक चैतन्य वही एक आत्मवस्तु (इष्टदेव) ही हैं ! (6:49)
प्रतिदिन के जीवन में अनुभूत अखण्डता के समान ही प्रत्येक जन्म पूर्व जीवन की अगली कड़ी है। जैसे आज का दिन बीते हुए कल का विस्तार है। पुनर्जन्म के इसी सिद्धान्त को मुसलमान सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी ने बड़े सुंदर ढंग से व्याख्या करते हुए कहा था -
मनुष्य का जीवन मिट्टी के नीचे जो खनिज या धातु रहता है, उसी खनिज से देवता और फरिश्ता या पैगम्बर से भी परे जाने की यात्रा की समान है--
"मैं एक खनिज (मिट्टी) के रूप में मरा और पौधा हो गया,
मैं पौधे के रूप में मरा और पशु बन गया,
मैं पशु के रूप में मरा और मनुष्य बन गया,
तो फिर मरने से डरूँ क्यों, क्या मरने से कभी मैं कम हुआ ?
एक और बार मैं मनुष्य से मरूँगा,
ताकि फ़रिश्तों के पंख और सिर (उच्च अवस्था) को प्राप्त करूँ।
और फ़रिश्ते से भी मुझे आगे बढ़ना होगा,
क्योंकि “हर चीज़ नष्ट होने वाली है,
केवल उसका (ईश्वर का) मुख शेष है।”
फिर एक बार फ़रिश्ते से भी क़ुर्बान हो जाऊँगा,
और वह बन जाऊँगा जो कल्पना में भी नहीं आता।
पस अदम गर्दम अदम चूँ अर्घनून गोयदम,
“इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन” -
"निःसंदेह हम अल्लाह के हैं; और निःसंदेह
उसी की ओर लौटकर जाने वाले हैं।"
[कुरान की एक आयत (2:156) है, जिसे
इस्लाम में "इस्तिरजा" (Istirja) कहा जाता है। ]
अंततः मैं ‘अदृश्य, निराकार’ हो जाऊँगा—जैसे वीणा (अर्घनून) की ध्वनि—
हमारे जीवन-विणा की आकारहीन आवाज कहेगी
(Voice without Form-कहेगा )
और वह (सत्य) कहेगा:
“हम उसी की ओर लौट कर जाने वाले हैं।”
(मिट्टी के नीचे जाने के बाद- खनिज? या मोक्ष का मार्ग ?)
'देवता' (100 % निस्वार्थ) बन जाने से भी भी यात्रा पूरी नहीं हुई ? देवता भी तुच्छ वस्तु है देवत्व से भी मुझे परे अनन्त के आलोक में जाना है ! उसी को ब्रह्म कहते हैं उसी को चैतन्य कहते हैं ! (7:47) उसीको आत्मा कहते हैं। और हम सभी लोग वास्तव में उन्हीं के अंश हैं। जो सर्वशक्तिमान हैं ! प्रेममय ! आनन्दमय ! हैं वही वस्तु हमलोग भी हैं ! वही प्रेम , वही आनन्द , उसी सत्य का एक कण मात्र हैं ! यही हमारा वास्तविक परिचय है ! Real I- पक्का मैं है !
देवता/फरिश्ता सबसे बड़े हैं। किन्तु -- "परन्तु देवदूत /फरिश्ता की स्थिति से भी मुझे आगे जाना है;ईश्वर (अल्लाह) के सिवा सब कुछ नाशवान है। जब मैं देवदूत की आत्मा का त्याग कर दूँगा,
तब मैं वह बनूँगा जो कोई मन सोच भी नहीं सकता।"
तो तुमने जो पूछा है उस अवस्था को ऐसी अद्भुत अवस्था में पहुँचना समझ सको , और तुमने बड़े मन की आकुलता से यह प्रश्न पूछा है, इस प्रश्न के उत्तर का अनुसरण करते रहो ; जीवन में अन्य जो कुछ भी कर रहे हो , उसको करने के साथ -साथ यह आत्मान्वेषण या सत्यान्वेषण भी जारी रखो , तो हो सकता है , एक दिन तुम्हारे जीवन में वह अद्भुत अनुभूति एक दिन होगी, और उसी दिन तुम्हें इस चैतन्य , इस ब्रह्म ,इस आत्मा के अभेद-बोध होगा , और तब तुम अद्वैत में प्रतिष्ठित हो जाओगे। वह अवस्था तुम्हारी हो , हम सभी को वह अवस्था प्राप्त हो यही प्रार्थना करता हूँ !
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अज जमादी मुर्दम ओ नामी शुदम
वज़ नमा मुर्दम ब-हैवान बर ज़दम
[मैं जड़ (पदार्थ) से मरा और वनस्पति बन गया।
वनस्पति से मरा तो पशु बनकर उभरा।]
मुर्दम अज़ हैवानी ओ आदम शुदम
पस चे तरसम? के ज़ मुर्दन कम शुदम?
[पशु से मरकर मैं मनुष्य बन गया।
फिर मैं क्यों डरूँ? मृत्यु से मैं कब घटा हूँ?]
हमला-ए दीगर बमीरम अज़ बशर
ता बरारम अज़ मलाइक पर्र ओ सर
[एक और बार मैं मनुष्य से मरूँगा,
ताकि फ़रिश्तों के पंख और सिर (उच्च अवस्था) को प्राप्त करूँ।]
वज़ मलिक हम बायदम जस्तन ज़ जू
कुल्लु शय्इन हालिक इल्ला वज्हहु
[और फ़रिश्ते से भी मुझे आगे बढ़ना होगा,
क्योंकि “हर चीज़ नष्ट होने वाली है, केवल उसका (ईश्वर का) मुख शेष है।”]
बार-ए दीगर अज़ मलिक कुर्बान शवम
आन्चे अंदर वह्म नायद आन् शवम
[फिर एक बार फ़रिश्ते से भी क़ुर्बान हो जाऊँगा,
और वह बन जाऊँगा जो कल्पना में भी नहीं आता।]
पस अदम गर्दम अदम चूँ अर्घनून
गोयदम के इन्ना इलैहि राजिऊन
[अंततः मैं ‘अदृश्य/शून्य’ हो जाऊँगा—
जैसे वीणा (अर्घनून) की ध्वनि—
और वह (सत्य) कहेगा: “हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।”]
[दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत्।
देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक
आत्मबुद्धया त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥
ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए; देहबुद्धिसे तो मैं दास हूँ, जीवबुद्धिसे आपका अंश ही हूँ और आत्मबुद्धिसे में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु के एक भक्त श्रीहनुमान जी का कथन है। ]
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