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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

' शिक्षा ही समाधान है ! 'सर्वश्रेष्ठ समाज सेवा: नेता-गुरु (शिक्षक -प्रशिक्षक) बनना और बनाना !

१. 
शिक्षा किसे कहते हैं ?
हमलोगों के लिये अपने जीवन में भगवान श्री रामकृष्ण (परमहंस गुरुदेव) के इस उपदेश- "जावत बाँची तावत सीखी" को हर समय स्मृति में रखना आवश्यक है। शिक्षा क्या है ? कुछ विचारों को (उच्च जीवन मूल्यों को) स्वभावगत बना लेना ही शिक्षा है। हमलोगों के भीतर जो सम्पूर्णता पहले से अंतर्निहित है, उसे अभिव्यक्त कर लेने का नाम है शिक्षा। हमलोगों ने स्वामी विवेकानन्द से सुना है, " शिक्षा उस संयम का नाम है जिसके द्वारा हमलोग इच्छाशक्ति के विकास और प्रवाह को संयमित और एकमुखी बनाकर, इस प्रकार अभिव्यक्त कर सकें ताकि वह मनोवांछित परिणाम देने में समर्थ हो! अर्थात इच्छशक्ति को नियंत्रित करने की पद्धति को सीख लेने का नाम ही शिक्षा है। 
शिक्षा का अर्थ है आदरणीय (decent) चरित्र का अधिकारी मनुष्य बन जाना। स्वामी जी ने कहा था, " हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिससे चरित्र-निर्माण हो, मानसिक शक्ति बढ़े, बुद्धि विकसित हो,और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होना सीखे। " ताकि हमलोग उपयुक्त मनुष्य बन कर अपने कर्तव्य के सम्बन्ध में जागरूक (aware) हो सकें, और सही तरीके से अपने कर्तव्य का पालन कर सकें। इस प्रकार का सुयोग्य और कार्यक्षम मनुष्य (competent) बन जाने का नाम ही शिक्षा है। स्वामीजी ने कहा था, शिक्षा का अर्थ यह नहीं है कि कुछ सूचनाओं को, जिन्हें हम पचा भी नहीं सकें, रट कर किसी प्रकार अपने दिमाग में भर लेना, जो आजीवन वहीं जमा रह कर दिमाग में उपद्रव मचाते रहें !   
स्वामीजी ने कहा है, केवल इसीलिये नहीं -यदि उपरोक्त सभी बातों पर, हमलोग भी शान्त होकर विचार करें, तो हमलोग स्वयं भी समझ सकते हैं। क्या वास्तव में हमलोग इसको शिक्षा कह सकते हैं? शिक्षा का अर्थ क्या स्कूल-कॉलेज में जाना भर है? शिक्षा का अर्थ क्या विभिन्न विषयों के कुछ सिद्धान्तों को रट लेना है? कुछ फॉर्मूला और सूचनाओं को रट कर याद कर लिया और परीक्षा-हॉल में बैठकर उत्तर-पत्रिकाओं में उन सबको लिख दिया -क्या इसको शिक्षा कह सकते हैं ? उस प्रकार हमलोग कुछ डिग्री-सर्टिफिकेट्स प्राप्त कर लेते हैं। उन सर्टफिकेट्स के कुछ बाजार मूल्य हैं। उन्हें बाजार में दिखाकर नौकरी पा लिए, या उन्हें भुना कर और कुछ कर लिए। किन्तु, इसको तो शिक्षा नहीं कह सकते। शिक्षा कहा जाता है, जो पहले
बताया गया उसे, जिसके द्वारा हमलोग अपनी आंतरिक शक्ति को उपयुक्त तरीके से अपने कार्य में लगा सकते हैं। 
मेरी शिक्षा सही ढंग से हुई है या नहीं ? - इस बात कैसे समझेंगे ? उसका टेस्ट यही है कि- उससे हमलोगों का अपना जीवन सार्थक हो जायेगा, ईश्वर का वरदान प्रतीत होगा, अच्छा प्रतीत होगा। हालोगों का जीवन प्रेम-पूर्ण होगा, असहनीय (Intolerable) नहीं लगेगा। 
[परमहंस नवनीदा के शब्दों में -" उन्नत मनुष्य या यथार्थ रूप से शिक्षित मनुष्य उसी को कहेंगे जिससे मिलने के बाद,  ऐसा प्रतीत हो कि 'इनसे मिलकर'- मेरा जीवन धन्य हो गया है!" यदि तुम पाँच ही भावों 
(आत्मश्रद्धा, निर्भीकता, निःस्वार्थपरता, त्याग और सेवा) को हजम (आत्मसात) कर के तदनुसार अपना जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तो तुमसे जो भी मिलेगा उसे वैसा ही लगेगा। 
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[ऐसे उन्नत मनुष्यों का निर्माण करने के लिए - यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि इच्छाशक्ति देवी का रूप कैसे धारण कर सकती है? उपनिषदों में इच्छा को ही शक्ति या देवी का रूप माना गया है, ऐसी इच्छाशक्ति का विकास कैसे होता है ?
वैदिक साहित्य में इच्छा शब्द का प्रयोग प्रायः क्रिया के रूप में 'इच्छतिआदि हुआ है। जिस प्रकार जगत में जब प्यासे को पानी की इच्छा, भूखे को अन्न की इच्छा होती है, तो उसे अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिये तत्काल कुछ कार्य अवश्य करना पड़ता है।
उसी प्रकार जब किसी शिष्य (भावी नेता बनने योग्य मनुष्य) में अपने 'परमहंस गुरु' या नेता के मुख से यह सुनकर कि -" इस नश्वर मनुष्य -शरीर से ही अविनाशी आत्मा की प्राप्ति हो सकती है !", यह ज्ञान (विवेकज ज्ञान) हो जाने के बाद जब- उस शिष्य में आत्मा को प्राप्त करने की 'इच्छा', तीव्र-व्याकुलता का रूप धारण कर लेती है,या आत्मा,ब्रह्म या ईश्वर को जान लेने की इच्छा जब तड़प बन जाती है तब वह इच्छा 'शक्ति' बन कर देवी का रूप धारण कर लेती है ! 
अपनी आत्मा के अवलोकन की इच्छा मोह का क्षय करने वाली (विद्या माया) है, जबकि इच्छामात्र अविद्या है जिसका नाश करना ही मोक्ष को प्राप्त होना है। (महोपनिषद ४.११४) क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति त्रिशक्तियां हैं। कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने पर वह इच्छाशक्ति के जाग्रत होने का आधार बनती है। न्याय सिद्धान्त से यह श्लोक प्रायः उद्धृत किया जाता है :
आत्मजन्या भवेदिच्छा इच्छाजन्या भवेत् कृतिः।
     कृतिजन्या भवेच्चेष्टा चेष्टाजन्या भवेत् क्रिया॥ 
केनोपनिषद में कथा है : जीवात्मा (नाम-रूप का अहं करने वाला ),मन, प्राण, इन्द्रिय सभी 'आत्माराम' (ब्रह्म = 'परमहंस देव श्रीरामकृष्ण") से अनुप्रेरित और शक्तिमान होकर कार्य करने में सक्षम होते हैं । विश्व में जो कोई भी प्राणी या पदार्थ शक्तिमान, सुन्दर और प्रिय प्रतीत होते हैं, उनके जीवन में जो सफलता दीखती है, सब 'परमहंस देव' की महिमा है। गीता१०/४१ इन पर यदि कोई अभिमान करता है, तो इसका मतलब है कि वह अविद्या माया-शक्ति से हिप्नॉटाइज्ड है (अपने को भेंड़ मान रहा है ?)।  देवासुर-संग्राम में एक बार 'परमहंस पुरुषोत्तम देव-श्रीरामकृष्ण ने कृपा करके देवों को  "विद्या-शक्ति" प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरों पर विजय प्राप्त कर लिया। 
यह विजय वस्तुतः भगवान की थी, देवता तो केवल निमित्त मात्र थे, परन्तु वे "मैं-पन " के भ्रम में थे, इसीलिये इस एब्सॉल्यूट ट्रूथ ओर उनका ध्यान गया ही नहीं ! और वे भगवान की कृपा को अपने ध्यान का केंद्र नहीं बना सके। और भगवान की महिमा को अपनी महिमा समझ बैठे,ब्रह्म की विजय को अपनी विजय मानकर कहने लगे -"अयं अस्माकं एव विजयः, अयं अस्माकं महिमा! " और अभिमानवश यह मानने लगे - कि हम बड़े शक्तिशाली हैं, और अपने ही बल-पौरुष से हमने असुरों को पराजित किया है।
भक्त-कल्याणकारी भगवान ने सोचा कि यह अभिमान बना रहा तो इनका पतन हो जायेगा। उनका दर्प चूर करने के लिये वे उनके सामने दिव्य साकार 'यक्षरुप' में प्रकट हो गए। देवता उन्हें पहचान नहीं सके, आश्चर्यचकित होकर उस अद्भुत विशाल रूप को देखकर करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है ? 
इन्द्र ने अग्निदेव को कहा आप 'जातवेदा ' हैं , आप पता लगाइये, फिर अग्नि में जो दाहिका शक्ति है, वह दैवी-शक्ति तो भगवान की है, वे यदि उस शक्ति-स्रोत को रोक दें, तो फिर शक्ति कहाँ से आएगी ? अग्निदेव इस बात को न समझकर डींग हाँक रहे थे। पर जब ब्रह्म ने अपनी शक्ति को रोक लिया, सूखा तिनका नहीं जल सका, तबतो उनका सिर लज्जा से झुक गया।  .......       
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२. 
शिक्षा और समाज 
अभी तो हमलोग विभिन्न प्रकार की शिक्षा-पद्धति के एक्सपेरीमेन्ट ( १०+२, १०+३ आदि) में से होकर गुजर
रहे हैं, और स्वयं को शिक्षित समझ रहे हैं। लेकिन क्या हमलोगों को अपना जीवन कभी कभी बिल्कुल मिज़रेबल (निरानंद) जैसा नहीं लगने लगता है ? क्या हमलोग स्वयं अपने दृष्टिकोण, विचार, कार्य और परिवेश का निर्माण इस प्रकार से नहीं कर रहे हैं, जो देखने में बिल्कुल अच्छा नहीं प्रतीत होता ? आज जिस समाज में हमलोग रह रहे हैं,और वहाँ जिन परिस्थितियों को हमलोग देख रहे हैं; उसके लिये उत्तरदायी कौन है? वह सब कुछ हमलोग ही तो कर रहे हैं।
जो घटनायें और सामाजिक वातावरण हमलोगों को कई बार बिलकुल असहनीय प्रतीत होने लगता है,उसका
निर्माण भी तो हमलोगों ने ही किया है। हमलोगों ने जैसी शिक्षा प्राप्त की है, उसी के कारण हम लोग इस प्रकार से विचार कर रहे हैं; एवं वे विचार जब कार्य का रूप लेने लगते हैं, तो समाज का वातावरण और परिवेश ऐसा बन रहा है। जरा विचार करके देखें कि हमलोगों का एक दूसरे के साथ विचारों और अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान किस प्रकार हो रहा है? 
विभिन्न व्यक्तियों के बीच आदान-प्रदान, पारस्परिक क्रिया बात-चीत (Interaction)  और अन्य वस्तुओं का लेन-देन करते समय हमलोगों का व्यवहार ऐसा हो गया है; कि अब हमलोग परस्पर एक-दूसरे को अविश्वास की दृष्टि से देखने और सन्देह करने लगे हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति यही प्रयास कर रहा है कि 
अपनी बुद्धि या चालाकी द्वारा दूसरे को ठग कर, या वंचित करके, मैं कैसे दूसरों की अपेक्षा अधिक लाभान्वित हो सकता हूँ  यही आज की शिक्षा का परिणाम है; क्या इसी को शिक्षा कहते हैं? [ जो शिक्षा मनुष्य में चरित्र-बल, परहित -भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है ?] निश्चित रूप से यह शिक्षा नहीं है।
यथार्थ शिक्षा प्राप्त करने पर हमलोग अपने नीजि स्वार्थ पर केवल उतना ही ध्यान देंगे, जितना पाकर मुझे तो लाभ हो ही, किन्तु समाज में मेरे और दूसरे मनुष्यों के बीच जो कुछ भी आदान-प्रदान हो वह भी दोनों पक्षों के लिये समानरूप से लाभदायक हो। " एक-दूसरे की सहायता और कल्याण" - यही हमारा उद्देश्य होगा ! इन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध भी इसी 'win win situation ' या दोनों पक्षों के लिए समान रूप से फायदेमंद मॉडल की बुनियाद पर निर्मित किये जा रहे हैं। मात्र अपने निजी-स्वार्थ के प्रति आश्वस्त होकर हमलोग कभी समाज का सच्चा कल्याण नहीं कर सकते। इसीलिये यदि हमलोग सबों के स्वार्थ पर नजर रखना चाहते हों, सबों के स्वार्थ की रक्षा करना चाहते हों, तो हमें पहले स्वयं निःस्वार्थ बनना पड़ेगा। अपनी 
स्वार्थपरता को ['कामुकता और कमाई' के प्रति लालच को] क्रमशः कम करते जाना होगा। और इस स्वार्थ-
परता (अहंकार?) को कम करने की पद्धति (महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ अभ्यास) को सीख लेना ही, सीखने योग्य सबसे महत्वपूर्ण विषय है। जो शिक्षा हमें निःस्वार्थी मनुष्य बनना नहीं सिखाती, वह शिक्षा ही नहीं है। अतः मनुष्य बनने के लिये, पहले 'निःस्वार्थी' बनना सीखना होगा। 
[इसीलिये स्वामी जी ने कहा था -" निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है। एक मनुष्य चाहे सोने के सिंहासन पर आसीन हो, सोने के महल में रहता हो, परन्तु यदि वह पूर्ण रूप से निःस्वार्थ है (अपना अहंकार बिल्कुल नहीं है) तो ब्रह्म में ही स्थित है। परन्तु एक दूसरा मनुष्य चाहे झोपड़ी में ही क्यों न रहता हो, चिथड़े ही क्यों न पहनता हो, सर्वथा दीनहीन ही क्यों न हो, पर यदि वह स्वार्थी है,तो हम कहेंगे वह संसार में (कामुकता और कमाई) में घोर रूप से लिप्त है। " स्वामी जी ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा था. " धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु (घोर-स्वार्थी) मनुष्य तक (कम स्वार्थी), और मनुष्य परमात्मा तक (स्वार्थशून्य या पूर्णतः निःस्वार्थी) उठ सकता है !"
इसीलिये 'स्वार्थशून्य मनुष्य' बन जाने की शिक्षा ही यथार्थ शिक्षा है; इस शिक्षा को -  कब तक सीखना होगा ? जैसा ठाकुर ने बताया है - ' जावत बाँची '-तब तक ! अर्थात अंतिम साँस बाकी है तब तक, क्रमशः पूर्ण निःस्वार्थपर होते होते ईश्वर के निकट पहुँच जाना -या 'द्वासुपर्णा ' का ऊपर वाला पक्षी जो खट्टे-मीठे फल नहीं खाता, केवल 'अभिचाकशीति'। अपने मन का द्रष्टा होने का प्रयास करते-करते, सिद्धार्थ गौतम से गौतम बुद्ध के जैसा बन जाना ही यथार्थ शिक्षा है! 
३. 

शिक्षा और नैतिकता
हमलोग यदि नैतिक (Ethical-आचारवान) बनना चाहते हों, नैतिक सिद्धान्तों (चार महावाक्यों) को यदि अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना चाहते हों, तो हमलोगों को अवश्य नीतिपरायण  (विवेकी या राइट्माइंडेड) मनुष्य बनना होगा। और शिक्षा उसी को कहा जा सकता है, जो हमें नीतिपरायण बना देने में सक्षम हो !   
नैतिकता (morality) क्या है? नीति कैसे बनती है? इस विषय में बहुत से तर्क-वितर्क दिए जाते हैं, और कई प्रकार के वैचारिक मतभेद हैं। 
यहाँ तक कि 'Ethics' या " नीति-विज्ञान"  भी यही कहता है कि 'Absolute Morality' या निरपेक्ष नैतिकता (अपरिवर्तनशील नीति) जैसी कोई चीज नहीं होती। 'Moral' शब्द (जिससे morality शब्द बना है) यह शब्द लैटिन भाषा के 'mores' शब्द से निकला है; Mores का अर्थ होता है-कस्टम (customs)
 या वह प्रथा जो प्रचलन में हो। इस परिभाषा के अनुसार जो रीति -रिवाज जिस देश में प्रचलित हों, या जैसी भी सामाजिक व्यवस्था प्रचलित हों, या जिस स्थान पर जैसा व्यवहार चल रहा है, उसको ही 'moral ' या नैतिक मान लेना पड़ेगा। क्योंकि सदियों से वहाँ ऐसा ही होता आ रहा है। उसी प्रकार Ethics शब्द ग्रीक 
भाषा के 'ethos' (इथॉस) शब्द से निकला है। एथिक्स का अर्थ होता है- Character, चरित्र या आचार-संहिता (कोड ऑफ़ कंडक्ट)। नैतिकता के विषय में और भी कई देशों के सामाजिक-दर्शन के सिद्धांतों में कई जगहों पर, लगभग सर्वत्र ऐसा ही कहा जाता है। 
क्योंकि परम्परागत आचार-व्यवहार या रीति-रिवाज  या 'behavior standards ' (व्यवहार के मानक) 
की धारा (clause) में प्रचलित (तीन तलाक आदि जैसे) mores या customs  सभी देशों में एक समान नहीं होते, सभी समय में एक समान नहीं होते। दो हजार वर्ष पहले जैसे (चोर का हाथ काटो.....आदि)
रीति-रिवाज, या सामाजिक प्रथायें प्रचलन में थीं, वे सभी आज प्रचलित नहीं हैं। जो प्रथायें इस देश में प्रचलित हैं, वैसी प्रथाएं अन्य देश में प्रचलित नहीं हैं। 
इसीलिये अब हमलोगों ने लगभग यह मान ही लिया है कि, सभी समय में और सभी देशों में नैतिकता (Morality) की परिभाषा एक समान हो ही नहीं सकती। क्योंकि जिस प्रथा को को हमलोग अपने देश में moral या नीतिसंगत व्यवहार समझते हैं, हो सकता है अन्य किसी देश में वैसे ही व्यवहार को नीति-
विरुद्ध या अशोभनीय समझा जाता हो। उसी प्रकार हमलोग अपने देश में जिस व्यवहार को अनैतिक 
(amoral) समझते हैं; हो सकता है उसी व्यवहार को अन्य किसी देश में नीतिविरुद्ध नहीं समझा जाता हो? इसिलिये सभी देशों के लिए नैतिकता का कोई एक सामान्य मानदण्ड (norm या कसौटी) होना सम्भव नहीं है
ऐसा मान लेने के बाद अंतिम निष्कर्ष क्या हुआ ? यही, कि नैतिकता का वैसा कोई विशेष अर्थ नहीं है, मोटे तौर पर जहाँ जैसा 'कोड ऑफ़ कंडक्ट' लागु है, उन धाराओं पालन कर लेना ही यथेष्ट है। तो फिर 'अचार -संहिता' किसी भी अनुच्छेद को मानकर व्यवहार करें? या फिर अपने देश में -'जेखन जेमन तखन तेमन'
 'जब जैसा तब तैसा!' का आचरण भी उचित है। लेकिन, क्या ' जब जैसा तब तैसा!' - के आचरण को नीतिसंगत-व्यवहार कहना उचित होगा ? नहीं, इसे नीति नहीं कहा जा सकता । इसीलिये नैतिकता की कोई परिभाषा खोज पाना बहुत कठिन है।















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