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मंगलवार, 9 सितंबर 2025

🔱 ज्ञान चक्षु से जीव और जगत भी सगुण ब्रह्म ही है ! 🔱 Session 19 | The Essence of Vivekachudamani |🔱https://www.sadhanapath.in/2025/09/111.html|🔱https://shlokam.org/texts/vivekachudamani-120-121/

 परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,

 निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।

यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,

 तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥

(वेदसार शिवस्तव स्तोत्र) 

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

ॐ शांति, शांति, शांतिः  

       हरिः ॐ ! विगत सत्र में हमने जो विचार किया था , उसको थोड़ा हमलोग Revise कर लेते हैं। यह पूरा डिस्कसन 5 वें प्रश्न के उत्तर के रूप में शुरू हुआ था। हमलोग पाँचवें प्रश्न पर विचार कर रहे हैं। पाँचवाँ प्रश्न था - अनात्मा क्या है ? 

      इस प्रश्न के उत्तर में पहले स्थूल शरीर का विश्लेषण हुआ , स्थूल शरीर जो सामने दिखाई देता है। जैसे स्थूल जगत जो सामने दिखाई देता है। तो स्थूल शरीर और स्थूल जगत एक ही हैं। हमने स्थूल शरीर के विश्लेषण में देखा था कि स्थूल शरीर पंचभूतों से बना हुआ है। स्थूल शरीर और इन्द्रियों के माध्यम से जो विषय दिखाई दे रहे हैं,  वो भी पंचभूतों (तन्मात्राओं) से ही बना हुआ है। ये दोनों एक ही level के हैं। यह स्थूल शरीर हमने देखा कि यह क्या है ? किन चीजों से बना हुआ है ? इसके भीतर क्या है ? और बाहर से क्या दिखाई दे रहा है ? हमारी आज की जो दृष्टि है , वो केवल चर्म दृष्टि है , बाहर सतह पर जो दिखाई दे रहा है , वहीँ तक सीमित है। यही हमारी समस्या है।  हम इसके परे न कुछ देख पा रहे हैं , न कुछ समझ पा रहे हैं। हमारी दृष्टि पूरी तरह से ऊपर जो दिखाई दे रहा है , सतह पर जो दिखाई दे रहा है - M/F नामरूप बस वहीं तक सीमित है, और वहीँ पर अटकी हुई हैयही बन्धन है। एक बुलबुला दूसरे बुलबुले को देखकर आकृष्ट हो रहा है, राग है यही तो बंधन है। ये स्थूल शरीर जो ऊपर-ऊपर से दिख रहा है, ये सचमुच में वैसा है क्या ? ये जो ऊपर दिख रहा है , यह तो बुलबुले के समान है।

       ये तो बनता हे , टूटता है , बनता हे , टूटता है , बनता हे , टूटता है। अभी आता है , अभी जाता है ,अभी आता है , अभी जाता है। और इस बुलबुला रूपी स्थूल शरीर के प्रति अगर आपकी आसक्ति हो , तो क्या होगा ? कोई सुखी हो सकता है ? हमलोग इसी में तो फँसे हुए हैं। सतह पर सुंदर जो दीखता है , जो सुंदर दृश्य दीखता है , वैसा है नहीं। 2mm दृष्टि से भी गहरी दृष्टि जब जग जाती है , हम और भी गहराई में जब देखना शुरू करते हैं। तब पूरा चित्र बदलने लगता है। 

      आँख खोल करके भी अब हम आँखों से नहीं देख रहे हैं। दूसरे अन्तः चक्षु से देख रहे हैं। जो हमारी सही दृष्टि है , उसको ज्ञान चक्षु कहते हैं। ज्ञान चक्षु हम सबके अंदर है , लेकिन बंद पड़ी है। वो आँख जब खुल जाती है ,तब आप चर्म चक्षु से नहीं देखोगे , अब तुम ज्ञान चक्षु से देखोगे। ज्ञान चक्षु से आपको सबकुछ , कुछ और ही नजर आएगा। चर्म चक्षु आपको सिर्फ चर्म ही दिखायेगा। और सारी दुनिया इस चर्म चक्षु में ही फंसी हुई है। चर्म में फिर M/F भेद से पुरुष है, स्त्री है। सारी समस्या वहीं से शुरू होती है, लेकिन जब ज्ञान-चक्षु खुलती है , तब हम सिर्फ चर्म तक ही नहीं देखते। तब हमारी दृष्टि चमड़े तक ही सीमित नहीं होती। तब हम गहराई में देखते हैं। जब गहराई में देखते हैं , तो वहाँ कुछ और ही नजर आता है। 

             हुनमानजी सीना खोल करके क्या दिखाते है ? (5:32) इस स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर है, और सूक्ष्म शरीर के भी पीछे क्या है ? (सगुण ब्रह्म श्रीराम) प्रभु परमेश्वर बैठे हैं, जो पूरे सृष्टि का मूल कारण है। वहाँ पर राम-लखन-सीता है,  रामलखन-सीता और कुछ नहीं हैं , सच्चिदानन्द ब्रह्म ही हैं। जिस (सत्य) का हमलोग (सत्यार्थी लोग) यहाँ अध्यन कर रहे हैं। वही आपके अंदर है , वही हम सब सभी के अंदर हैं। लेकिन जब तक आपकी दृष्टि सिर्फ चर्म तक ही सीमित थी , आप उसके भीतर ईश्वर है , प्रभु श्री राम हैं -ऐसा सोच भी सकते हैं जब तक आपकी दृष्टि सिर्फ 2mm चर्म तक ही सीमित होगी, आपको ईश्वर नजर आयेंगे ? लेकिन जब ज्ञान-चक्षु खुल जाती है, तो हमें आँखों को खोलकर भी सभी अंदर ईश्वर दिखाई देने लगता है।         तब फिर जीव कहाँ है ? ये सब ईश्वर के ही तो रूप हैं ! अब इसमें -स्त्री-पुरुष कहाँ है ? जीव कहाँ है ? जगत कहाँ है ? जब तक आपकी दृष्टि स्थूल स्तर तक ही सीमित है। तब तक जीव -जगत , जीव -जगत करते रहते हैं। जब तक हमारी दृष्टि सिर्फ स्थूल शरीर तक ही सीमित हो , तब तक हम जीव -जगत , जीव -जगत करते रहते हैं। ये जीव और जगत दोनों एक ही level के हैं। प्रश्न है -ये जीव और जगत क्या है ? पहले ही दिन से हमलोग जीव, जगत और ईश्वर क्या हैं? इसी पर चर्चा करते आ रहे हैं। क्योंकि जीव , जगत और ईश्वर -इन तीनों के बारे में हमारे भीतर भ्रान्ति ही भ्रान्ति भरी हुई है। (6:53ईश्वर के विषय में भी भ्रांति भरी हुई है। अभी तक ईश्वर को विभिन्न रूपों में यहाँ वहाँ कल्पना कर रहे थे ? कुछलोग कहते हैं -ये ऊपर वाला है। तीनो वस्तुओं के बारे में पहले हमारी असम्यक दृष्टि थी। हम जीव-जगत और ईश्वर को ठीक से नहीं देख पा रहे थे। अब उस भ्रमित दृष्टि से जगत को देखते हुए आपका जो जीवन चलेगा, वो कैसा होगाहम पूरी तरह से भ्रमित हैं कि नहीं ?

       हम जीव को यह मानकर ही चल रहे हैं- कि यह जीव है  लकिन वास्तव क्या वह जीव है ? (वह तो ब्रह्म है।) और उसी प्रकार हमारे सामने यह जो ऊपर से दिखाई दे रहा है -यह जगत है ? सचमुच यह जगत ही है क्या ? यह मूलभूत प्रश्न है।  तो इसी सत्य की खोज करते हुए हमने स्थूल शरीर को जाँच करके देखा , स्थूल शरीर के प्रति जो मोह है , इसमें ही तो सभी लोग मोहित हो जाते हैं। हम सभी यहीं पर फँस जाते हैं। देखिये आप अदृश्य राग रूपी रस्सी का बंधन कैसा है, आप समझ रहे हैं ? हम किस बंधन से मुक्त होना चाहते हैं ? जब तक हम जो स्थूल स्तर में दिखाई दे रहा है। वहीँ तक जबतक हमारी दृष्टि सीमित हो , तब तक हम बंधन में हैं। इस बद्ध दशा में  शरीर के प्रति आसक्त होक पुरुष -स्त्री को देखता है , स्त्री पुरुष को देखती है। उसीमे तो संसार का जाल फ़ैल जाता है। और उसमें हम सुखी होने की आशा करते हैं। यहां आशा महत्वपूर्ण है। और स्थूल शरीर में आसक्त रहते हुए ही हम सुखी होने की आशा करते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे मगरमच्छ को लट्ठा समझकर उसकी  पीठ पर बैठकर नदी पार करने की आशा करते हैं। वो आशा कभी पूर्ण होती है क्या ? स्त्री -परुष भेद देखने वाली 2mm की चर्म दृष्टि से देख कर एक बुलबुला दूसरे बुलबुली को पकड़ेगा। पकड़ कर सोचेगा कि मैं पूर्ण हो जाऊँगा , या पूर्ण हो जाउंगी। अब सारे रिश्ते-नाते पकड़ लीजिये , कैसा जाल फ़ैल गया है ? सबके मूल में है -आसक्ति। 

     सभी बुलबुले दूसरे बुलबुलों से कैसे बंधे हुए हैं ? राग रूपी अदृश्य रस्सी के द्वारा बंधे हुए हैं। इस तरह से बंधे हुए हैं कि कभी -कभी तो हमारा दम घुटने लगता है। लेकिन वे बुलबुले इस आशा से बंधे हुए हैं कि हम सुखी होंगे ? वो एकदूसरे से चिपकना चाहते हैं , एक दूसरे को छोड़ना नहीं चाहते हैं। देखो न छोड़ने की जो वृत्ति है ,कितनी गहरी है ? हम कुछ छोड़ना नहीं चाहते हैं। एक बुलबुला दूसरे बुलबुले को इतना जकड़ कर पकड़े हैं कि उसको छोड़ना नहीं चाहते हैं। लेकिन ये physical पकड़ना नहीं है , हमलोग राग रूपी अदृश्य रस्सी के द्वारा हमलोग जकड़े हुए हैं। मोह छूटता ही नहीं है , लेकिन कोई भी व्यक्ति आसक्त रहते हुए सुखी हुआ है क्या ? यह प्रश्न है। तो स्थूल शरीर को जाँचने के क्रम में हमने देखा था कि स्थूल शरीर M/F शरीर - जो स्थूल स्तर पर हमें दिखाई देता है , यही हमारे मोह का आस्पद है। इसी स्थूल शरीर के प्रति 'मैं' और 'मेरा' ऐसा हमारा  बोध होता है। स्थूल शरीर को लेकर ही हम यह समझते हैं , कि मैं यह हूँ , और यह दूसरा स्थूल शरीर मेरा /मेरी है ? यह मोह का आस्पद है। इस प्रकार मोहित होकर के ये दूसरे बुलबुलों से बंध जाता है। कैसे बंधता है ? राग रूपी रस्सी के माध्यम से। और यह राग या Attachment एक ऐसा बीमारी है जो समाज में, संसार में प्रेम के रूप दीखता है। (11:18इसीको सभी लोग प्रेम समझ बैठते हैं।

        सर्वत्र देखो यही चल रहा है - एक चीज को हम दूसरा समझ रहे हैं।  राग को हम प्रेम समझ लेते हैं। यह प्रेम की तरह दीखता है , और बहुत मीठा भी दीखता है। ये मिठास कुछ ही दिनों में कड़वी हो जाती है। होती है कि नहीं ? देह वाला प्रेम मीठा रहता है ? कड़वा हो जाता है। देखो सबको पता है ? शारीरिक आकर्षण वाला राग शुरुआत में ही मीठा रहता है , कुछ ही देर में ये सब कड़वाहट में बदल जाता है। ये सच्चाई है , सबसे बड़ी सच्चाई है। प्रेम का शरीर के साथ कुछ लेना देना नहीं है। न स्त्री-पुरुष लिंग के साथ कुछ लेना देना है। ये पारस्परिक लैंगिक आकर्षण प्रेम है ही नहीं। वो सिर्फ मोह है , अंधापन है , राग मात्र ही है।

      प्रेम और ही चीज है। प्रेम तब आएगी जब आप उस कारण शरीर में पहुंचोगे ? अभी हमको समझ में आएगा कि प्रेम का मतलब क्या है ? पांच पशुओं के उदाहरण से हमने यह भी देखा कि विषयों से राग कैसे मनुष्य को मार देती है। ये विषय कैसे हैं ? काले नाग के विष से भी अधिक घातक हैं। अली-मृग-मीन -पतंग -गज जरै एक ही आँच मर जाता है , ये सब पशुओं का गुण है। फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या -जो पाँचों इन्द्रियों के विषय में आबद्ध हैं। कितने भयंकर रूप से हमलोग आबद्ध हैं ! ये सारे विषय कैसे हैं ? ये काले नाग के भी विष से विषाक्त हैं।  विषय दूर से देखकर ही मनुष्य मनुष्य मृत्युग्रस्त हो जाता है। कितना गहरा मनोविज्ञान है ? ये विषय ऐसे हैं कि व्यक्ति दूर से देखकर ही मर जाता है। मर जाने का मतलब और कुछ नहीं है , इसका अर्थ है; उसके मन का अपहरण हो जाता है। होता है कि नहीं ? बिल्कुल उसके मन का अपहरण हो जाता है। दूर से देखने मात्र से अगर वो वस्तु (Bh) उसके मन में एक बार प्रवेश कर गया -तो आपका चैन ,शांति , नींद सब उड़ जाता है। स्थूल शरीर को जांचने के क्रम में हमने इन सब निष्कर्षों को देखा , सीखा और जाना। 

     इसी स्थूल शरीर को जांचने के क्रम में जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य हमने सीखा वो है - राग और प्रेम में अन्तर ! (14:23) हमे इस पर विचार करना चाहिए कि समाज में पुराने M/F स्कूल मेट्स के बीच दोस्ती या प्रेम के नाम पर जो दिखाई दे रहा है , वो क्या है ? अगर वो प्रेम हो तो, वह व्यक्ति को कभी दुःखी नहीं करेगा। लेकिन प्रेम के नाम पर क्या चल रहा है ? सब राग ही चल रहा है। इसलिए सभी दुःखी हैं। प्रेम में कभी भी दुःख नहीं होता ,प्रेम कभी कड़वा नहीं होता। राग में से सब समय दुःख ही निकलेगा। ये दो अलग अलग चीजें है। प्रेम का मूल स्थान कहाँ है

       हमने देखा कि स्थूल शरीर के पीछे और भीतर सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर में जैसे ही हम प्रवेश करते हैं - तो देखते हैं कि लिंग-भेद कितना निरर्थक है ! यह एक बुलबुले का दूसरे बुलबुले के प्रति ये 2mm दृष्टि है , यही तो हमें धोखा दे रही है। थोड़ा गहराई से देखें तो सूक्ष्म शरीर में लिंग कहाँ है ? कौन स्त्री है , कौन पुरुष है सब तो एक समान हैं। सूक्ष्म शरीर किन चीजों का बना हुआ है ? हमने देखा कि सूक्ष्म शरीर आठ चीजों से बनी हुई है। पंच कर्मेन्द्रिय पंच ज्ञानिद्रिय है , पंच प्राण है , पंच तन्मात्राएँ है , चार अन्तःकरण है , फिर अविद्या , काम और कर्म इन आठ चीजों से बनी है यह सूक्ष्म शरीर। यह भी आप नहीं हो। (मने यह भी आत्मा नहीं है) यह भी बुलबुला ही है। वहाँ सब कुछ सतत बदल रहा है। आपके moods बदल रहे हैं , कभी मन खुश है , कभी उदास है ? Depression- मन कभी कभी अवसादग्रस्त भी हो जाता है। ये आजकल बहुत Common बीमारी बन गयी है। यह सब सूक्ष्म शरीर का खेल है। लेकिन जिस प्रकार आप स्थूल शरीर नहीं हो , उसी प्रकार आप सूक्ष्म शरीर भी नहीं हो , ये भी दिख रहा है। इसके भी आप साक्षी हो। आप स्थूल शरीर के साक्षी हो , आप सूक्ष्म शरीर के साक्षी हो (16:35)

      फिर जब हम इस सूक्ष्म शरीर के भी भीतर और पीछे, कारण शरीर में प्रवेश करते हैं। जैसे ही हम कारण शरीर में प्रवेश करते हैं ,हम सृष्टि के मूल में ही पहुंच जाते हैं। ये कारण शरीर अद्भुत चीज है। सारी सृष्टि की उत्पत्ति वहाँ से हो रही है , सारी सृष्टि की उत्पत्ति आपके कारण शरीर से हो रही है। Big bang से नहीं हो रही है ? और इस कारण शरीर को ही माया कहते हैं। यह शक्ति है , यह शक्ति ही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है। सारी सृष्टि का मूल आपके भीतर है , आप सोच सकते हैं ? 2mm के चर्म दृष्टि में फंसकर हमलोग कितना अपने को दीनहीन बना लेते हैं? दृष्टि जितनी गहरी होगी आपको पता चलेगा कि आपके भीतर अनंत शक्ति है। अनंत सीमाहीन शक्ति। सारी शक्ति वहीं से आती है। 

      वेदांत कहता है - तुम जो चाहो (ईश्वर भी ?) प्राप्त कर सकते हो। इसको थोड़ा लौकिक दृष्टि से भी देख सकते हैं। आप विद्यार्थी हो , तो संसार की वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए भी जिस शक्ति, बुद्धि और बल की आवश्यकता है , वो असीम रूप से आपके भीतर विद्यमान है। चलो थोड़ी देर के लिए हम अध्यात्म को भूल जाते हैं। सांसरिक दृष्टि से आपको संसार जो कुछ भी बनना है , वह बनने के लिए जिस बल , बुद्धि और शक्ति की आवश्यकता है; वह सब आपके भीतर अनंत मात्रा में विद्यमान है।

       ये कोई theory नहीं है, ये सच्चाई है कि अनंत मात्रा में बल,बुद्धि और शक्ति आपके भीतर विद्यमान है। वेदांत कहता है आप जो चाहें वह प्राप्त कर सकते हैं। सिर्फ आपमें लगन और एकाग्रता होनी चाहिए। लगन होगा एकाग्रता होगी तो जीवन में जो चाहिए आप प्राप्त कर सकते हैं। Any doubt ? ये हर व्यक्ति के लिए है। देखिये इसका practical application देखिये। अभी आप विद्यार्थी हो पढ़ रहे हो , कल अपने जीवन में आपलोग settle हो जाओगे। आपका एक अलग अलग आशा , सपना होगा। आपके ambitions अलग है , aspirations आकांछाएं अलग हैं। आपको जो भी प्राप्त करना हो , शक्ति बाहर से नहीं आने वाली है। अनंत शक्ति आपके भीतर अभी ही विद्यमान है। 

        सिर्फ इसको जानना है और उसको अभिव्यक्त कैसे किया जाता है ?  हमें केवल  यह सीखना है कि उस शक्ति को अभिव्यक्त कैसे किया जाता है ? हमें शास्त्र और गुरु यह सिखाते हैं कि इस शक्ति को अभिव्यक्त कैसे किया जाता है ? यह शक्ति अभी छिपी हुई है अदृश्य रूप में है। इस अव्यक्त या अदृश्य शक्ति को अभिव्यक्त कैसे करें ? स्वामी विवेकानन्द उसी अव्यक्त शक्ति को अभिव्यक्त करने की पद्धति बताते हुए क्या कहते हैं ? Each soul is potentially divine ! ' potentially को अव्यक्त क्यों कहते हैं ? क्योंकि कारण शरीर दिखाई नहीं दे रहा है। कारण शरीर दिखाई दे रहा है क्या ? नहीं दिखाई दे रहा है , हमको तो सतह पर जो यह स्थूल शरीर (M/F) है -यही दिखाई दे रहा है। इसीलिए स्वामीजी कहते है - “Each soul is potentially divine. (And) The goal is to manifest this divinity by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy - by one, or more, or all of these - and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details.” (19:43) 

     हमारे भीतर जो दिव्यता या अनंत शक्ति अन्तर्निहित है, इस अव्यक्त अनन्त शक्ति को हम अपने दैनन्दिन जीवन में अभिव्यक्त कैसे करेंगे ? यह जान लेना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है -और उसी अव्यक्त शक्ति को अभिव्यक्त करने की पद्धति को परिभाषित करते हुए स्वामी विवेकानन्द कह रहे हैं - " प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया – कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।" (वि.सा.-१ : राजयोग : पातंजल योगसूत्र : साधनपाद) अपने दैनंदिन जीवन में आप इस दिव्यता को , इस अनंत शक्ति को कैसे अभिव्यक्त करोगे ? यही (अष्टांग योग, राजयोग या मनःसंयोग) सीखना मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य है। आप अपने अंतर्निहित  दिव्यत्व को अभिव्यक्त न करके आप अपनी ही हानि कर रहे हो। और केवल मनुष्य ही इस अव्यक्त दिव्यत्व को अभिव्यक्त कर सकता है। कोई पशु नहीं कर सकता। (20:27

       तो हमने देखा , कि सूक्ष्म शरीर के भी भीतर और पीछे कारण शरीर है। इस कारण शरीर को माया कहते हैं। और ये माया शक्ति है। यह कारण शरीर परमेश शक्ति है , परमात्मा की अपनी ही शक्ति है। अर्थात ब्रह्म की अपनी ही शक्ति है। उसको थोड़ा और रूप दे दें तो आप कह सकते हो , परमात्मा शिव है और शिव की अपनी शक्ति काली है। शिव ही काली है ,काली ही शिव है। अब देखिये पद्धति सीखते हुए कहाँ आ गए हम ? हम मन्दिरों में दुर्गा पूजा के पण्डालों में जो भी उपासना कर रहे हैं , वह सब इसी शक्ति की उपासना कर रहे हैं। तो ये माया की परिभाषा क्या है ? दोबारा उस पर चर्चा कर लें क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण है। -अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति-रनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा। कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते ॥ ११० ॥ हो सकता है कि अभी पुनः सारे समय इसी पर चर्चा करे। क्योंकि हमको यहीं पर प्रतिष्ठित होना है। (अपने आधारकार्ड वाले स्थूल और सूक्ष्म शरीर की पहचान को छोड़कर हमें इसी कारण शरीर में प्रतिष्ठित होना है। ) प्रत्येक मनुष्य को यहीं पर प्रतिष्ठित होना है।  जैसे ही आप इस शक्ति में प्रतिष्ठित हो जाते हो , आपके जीवन की सारी समस्यायें खत्म हो जाती हैं। To be established here is the goal of human lifeकारण शरीर या शक्ति में प्रतिष्ठित होने का अर्थ समझ रहे हो ? आज हम कहाँ प्रतिष्ठित established हैं ?  इस M/F के स्थूल शरीर में established हैं । हम मान के चलते हैं और ये गर्व करते हैं कि हम पुरुष/स्त्री हैं ! अपने को केवल स्थूल शरीर समझना , और उस पर गर्व करना ; ये मूर्खता है या नहीं ? हम अपने आप को बड़ा शातिर समझ लेते हैं , जो अपने को नश्वर शरीर मानकर चलता है -यह तो मूर्खता का लक्षण है। जो शरीर को ही मैं मानकर चलता है , तो यह शरीर कितने दिनों तक रहने वाला है ? ये सिर्फ दो मिनट में खत्म हो जायेगा। लेकिन वो ? जो मूल में है -वो खत्म होता है क्या ? आप वह हो - यह शरीर टूटेगा -जायेगा लेकिन आप तो वह हो;  जो कारण और कारण शरीर के भी पीछे है - आप तो वह हो। आप अजर अमर , अविनाशी आत्मा हो। आप ही वह परमेश शक्ति हो ! 

       अब देखिये स्व के विषय में आपकी जो पहले की धारणा थी , वह बिल्कुल बदल जाती है। तो अब ये कारण शरीर , माया क्या है ? शंकराचार्यजी के जो अतुलनीय शब्द हैं - वो इसकी परिभाषा देते हुए कहते हैं। क्या है ये कारण शरीर ?  इसको अव्यक्त कहते हैं ! वो तो व्यक्त नहीं है। बीजावस्था है। (23:00अव्यक्त है-अदृश्य है। और परमेश शक्ति है। ये परमात्मा की अपनी ही शक्ति है- अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्तिः। फिर क्या है ? अनादि अविद्या -ये जो कारण शरीर है , ये अविद्या जो है , ये माया जो है , यह अनादि अविद्या है ! यह अविद्या है -यह सत्य को ढँक रही है। अब काली को आप अपने सामने लाइए। माँ भवतारिणी काली के चित्र को आप अपने सामने ला सकते हो। यहाँ पर हैं। वो शिव को ढँक रही हैं , उनका नृत्य चल रहा है। यह जगत और जीव के सत्य को ढँक रही हैं। सत्य बिल्कुल इसके भीतर ही छुपा हुआ है। इसके भीतर ही विद्यमान है -लेकिन छिपा हुआ है। एक जो सत्य है , और दूसरा जो सत्य सा प्रतीत हो रहा है - इसके बीच की स्पष्टता को ही विवेक कहते हैं। (23:56

    एक तो वह सत्ता जो विद्यमान है उसी में वह छिपी हुई है। लेकिन सतह पर जो दिखाई दे रहा है , वो सत्य सा प्रतीत हो रहा है। ऊपर सतह पर हमको जो भी दिखाई दे रहा है , वह सब बुलबुलों के समान आ रहा है , जा रहा है। लेकिन उस बुलबुले के भीतर ही सत्य छिपा हुआ है। ऊपर जो हमको दिखाई दे रहा है -नाम-रूप जो दिखाई दे रहा है , वो सत्य को (यानि अस्ति -भाति -प्रिय को) ढँक रहा है। तो ये माया जो है ये अनादि अविद्या है। उसकी शुरुआत कब हुई ? ये कोई नहीं बता सकता -क्योंकि वो अनादि है ! अविद्या है -यानि अज्ञान है , जो कि सत्य को ढँक रही है। और ये त्रिगुणात्मिका है। माया तीन गुणों से बना है -और ये माया जो है -ये श्रेष्ठ है, परा है। किससे श्रेष्ठ है ? अपने ही कार्य से श्रेष्ठ है। ये अद्भुत ऋषि दृष्टि है जो रोंगटे खड़ी देती है। माया का कार्य क्या है ? यह जगत! और जगत का कारण क्या है ? माया ! जगत का कारण क्या है ? माया !जगत का कारण क्या है ? माया ! 

       तो माया और जगत दो चीजें हैं क्या ? एक ही है। माया ही जगत है , जगत ही माया है। जगत नहीं है -माया ही है। हो गया न ? और माया कैसी है - अनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा। है। कार्य से कारण श्रेष्ठ होता है।  और ये कार्यानुमेय है -कार्य को देखकर आप कारण का अनुमान लगा सकते हैं। आप इस विस्मयकारी अद्भुत विश्व प्रपंच को देख करके आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि इसके पीछे एक अद्भुत शक्ति है, जो सृष्ट कर रही है , निर्मित कर रही है। कार्यानुमेया सुधिया एव माया - इसीको ऋषि गण माया कहते हैं।  यया जगत् सर्वम् इदं प्रसूयते - जहाँ से सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड की प्रसूति या उत्पत्ति हुई है।  इसलिए  इस शक्ति को ही हमलोग जगतजननी, जगत धात्री , विश्व प्रसविनी , काली , दुर्गा , लक्ष्मी , सरस्वती , अनगिनत नामों से उनकी ही पूजा करते हैं। अब आप सनातन हिन्दू संस्कृति की गरिमा को देखिये। ये माया क्या है ? इसके विषय में क्या कहोगे आप ? महा अद्भुतं अनिर्वचनीयम ! आप इतना ही कह सकते हो। क्योंकि ये मनुष्य की बुद्धि के परे की चीज है। अब आप इसको बुद्धि से समझ नहीं सकते हैं।

       क्योंकि परस्पर विरोधी चीजों का मिश्रण इसमें दिखाई देता है। परस्पर विरोधी चीज एक जगह पर एक ही समय में कैसे उपस्थित हो सकता है ? अगर logically देखिये , logical framework-तार्किक रूपरेखा के अनुसार माया क्या है ? दो परस्पर विरोधी चीजे एक ही समय और एक स्थान पर होना सम्भव है क्या ? logical होने पर हमलोगों बड़ा गर्व होता है। किन्तु सत्य तो logic में fit नहीं होगा ! (27:34is it not ?  दो परस्पर विरोधी चीजें एक ही स्थान पर एक ही समय में विद्यमान हो सकते हैं क्या ? नहीं हो सकते। किन्तु ये जो माया है -वो ऐसी ही अद्भुत है। शंकराचार्य जी माया के विषय में , यानि जगत के विषय में कह रहे हैं - इस जगत के विषय में यानि इस माया के विषय में हम यह नहीं कह सकते की यह सत्य है। 

      क्योंकि चली जाती है। उदाहरण ? सपना ? चली जाती है ? आप सपने को कह सकते हो कि विद्यमान है ? क्योकि सत्य की परिभाषा क्या है ? त्रिकाल अबाधित ! सत्य वो है जो कभी भी बाधित नहीं होती। जो सब समय विद्यमान है। जो चला जाता है , वो सत्य हो सकता है क्या ? आपकी स्वप्न सृष्टि जो सत्य सा प्रतीत होता है , वह चला जाता है या नहीं ? जब तक सपना चल रहा है , आप उसको असत्य भी नहीं कह सकते हो। जब तक सपना चल रहा होता है , उस समय के लिए तो वो सत्य सा ही प्रतीत हो रहा है। 

         अभी जो यहाँ PC में चल रहा है , इसको आप असत्य कह सकते हो क्या ? अभी आप इसको असत्य नहीं कह सकते। ये तो अनुभव में आ रहा है। अनुभव में आ रहा है , इतने मात्र से वह सत्य नहीं हो जाता , क्योंकि वो चला जाता है। थोड़ी देर पहले ये नहीं था। स्मरण कीजिये 4 घंटे पहले ये कक्षा नहीं था। अभी जो अनुभव में आ रहा है , इसके बारे में आप क्या कह सकते हो ? महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं। एक ऐसी वस्तु की अनुभूति है , जो विद्यामन न होते हुए भी उसकी अनुभूति हो रही है। स्वप्न में सारी सृष्टि अनुभव होती है या नहीं ? इसको क्या कहोगे ? महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं।

      लेकिन अभी जाग्रत अवस्था में जो रहा है -हमको लगता ये सत्य है(30:37) लेकिन सपना देखते समय भी वही सत्य लग रहा था। जिस समय सपना में राजा भिखारी का रोल कर रहा था क्या उसको पता था कि वो सपना है ? यह परिस्थिति भी सपने जैसी ही है। हम इस जाग्रत सपने को सत्य मानकर चल रहे हैं।  हम तुम , यह वह -पूरा ताम झाम यहां पर चल रहा है। तो ये जगत जो हमको दिखाई दे रहा है , वो तो माया है। माया ही जगत है। माया एक ऐसी चीज है जो न होते हुए भी सत्य सा प्रतीत होती है। तो इस जगत को भी हम ही कह सकते हैं-महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं ! 

     क्या यह जगत ब्रह्म से भिन्न है ? नहीं कह सकते। क्योंकि सभी ऋषियों की अंतिम अनुभूति तो एक ही है - ब्रह्म से भिन्न द्वितीय कोई वस्तु हो ही नहीं सकती। तो माया भी ब्रह्म से भिन्न कोई द्वितीय वस्तु हो ही नहीं सकती। तो क्या माया ब्रह्म से अभिन्न है ? ऐसा भी आप नहीं कह सकते। क्योंकि यह चली जाती है। तो क्या कहेंगे इसके विषय में ? महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं ! इसको आप categories नहीं कर सकते हो। आप इसको किसी भी श्रेणी में नहीं रख सकते हो। हम सिर्फ इतना ही कह सकते हैं - महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं ! 

        इस माया शक्ति की सबसे सुंदर प्रतीक हैं -काली। एक निर्वस्त्र महिला जो शिव की छाती पर खड़ी हुई है ,और उसका नृत्य चल रहा है। अब दृष्टि बदल जाती है - जगत में जो कुछ भी चल रहा है , ये उसीका नृत्य चल रहा है। आप आँखों को खोल करके -दैनन्दिन जीवन की हर घटना में सर्वत्र एक दिव्य दर्शन करना शुरू कर दोगे। [sdd का आना , बक रेन का व्यव्हार] जीवन दिव्य है , मृत्यु दिव्य है , बीमारी दिव्य है। स्वास्थ्य दिव्य है ,सब में इस काली का नृत्य चल रहा है। अब क्या complaint करोगे आप ? complain करने के लिए कुछ बचता है? अब रोने के लिए कोई स्थान है ? आप किसको लेकरके आप रोओगे ? This is dance of life and death which is going on ! यह जीवन और मृत्यु का नृत्य चल रहा है। She is life , and She is death !She is creation, and She is destruction ! वह सृजन है, और वह विनाश है!She is health , She is disease ! वह सब कुछ है, वह दर्द है, वह खुशी है! She is everything, She is pain , She is pleasure ! वही शक्ति सर्व रूपों में दिखाई देती है , सब वही है जब सब वही है , तो हमे करना क्या चाहिए ? (33.38) करना कुछ नहीं है - इस दृष्टि में प्रतिष्ठित होना है।

        'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या' के ब्रह्म ही सत्य - इस दृष्टि में प्रतिष्ठित होना है। सत्य को अब आँख मूँदकर नहीं , आँखों को खोल कर देखना है। ऋषि लोग इसी ज्ञानमयी दृष्टि में प्रतिष्ठित हैं। हमें भी उसी ज्ञानमयी दृष्टि में प्रतिष्ठित होना है। 'जगत मिथ्या' दृष्टि से हटकरके ब्रह्म सत्य की दृष्टि में प्रतिष्ठित रहना है। जब तक हमारी दृष्टि मिथ्या दृष्टि होगी , जीवन में कष्टों का अंत नहीं होगा। और 'सत्य दृष्टि ' में कष्ट है ही नहीं ! यह अलग प्रकार की दृष्टि है। जगत को काली का नृत्य चल रहा है , उस दृष्टि से देखने की दृष्टि है। और सबसे बड़ी बात - यह शक्ति -काली महामाया जो है , वो सत्य को ढँक रही है। काली परमात्मा की अपनी शक्ति है। बड़ा विचित्र है। परमात्मा सच्चिदानन्द ब्रह्म अपनी ही शक्ति से अपने आप को ढँक रहा है(34:23) अंत में ऐसा दिखाई देने लगता है , कि परमात्मा अपनी ही शक्ति से अपनेआप को ढँक भी रहा है। और उसी शक्ति से अपने आप को दिखा भी देता है। यह खेल चल रहा है। ब्रह्म अपनी ही शक्ति से अपनेआप को ढँक भी देती है , और अपनेआप को दिखा भी देती है। और यह शक्ति जब ढँकती है , तब हम फँस गए हैं। और जब सत्य को दिखा देती है - तब हम मुक्त भी हो जाते हैं।  अतएव मुक्ति की चाबी इस काली के हाथ में है; मुक्ति की चाबी इस माया शक्ति , कारण शरीर के हाथ में है ? इसी बात को शंकराचार्य जी अपने अन्नपूर्णा -स्त्रोत्र में कहते हैं - 

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी

निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।

इसके चौथे stanza (छन्द) में आता है - मोक्षद्वार-कपाट-पाटनकरी काशीपुराधीश्वरी, भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥ 

       यहाँ शंकराचार्य जी कहते हैं - यह वह माया है , जिसके हाथों में मोक्ष के दरवाजे की चाबी है।  'मोक्ष द्वारा कपाट पाटनकरी' -मोक्ष के द्वार को खोलने वाली यही शक्ति है। वो जबतक दरवाजा नहीं खोल देती , तब तक जीव को यह कभी भी समझ में नहीं आएगा कि - सत्य क्या है ? आप चाहे कुछ भी कर लीजिये , ( चाहे जितना सिर पटक लीजिये।) यह जो शक्ति है , जिसको हमने काली नाम दे दिया। आप इसको काली , दुर्गा या अन्नपूर्णा कह लीजिये - या माँ सारदा ? कह लीजिये ! लेकिन काली सबसे सुंदर प्रतीक है इस शक्ति की। जब तक यह शक्ति दरवाजा नहीं खोलती तब तक हमें सत्य समझ में नहीं आएगा।  महामाया शक्ति काली जब हमें सत्य समझाने लगती है , अगर हमें धीरे-धीरे यह समझ में आने लग रहा है कि सत्य क्या है ? यदि हमें यह सत्य समझ में आने लगता है , तो हमारे साथ क्या हो रहा है ? (35:44) अनुग्रह !  माँ काली -माँ तारा का अनुग्रह हो रहा है , माँ की कृपा हम पर बरस रही है। यही ईश्वर का अनुग्रह है।

       तो इस ग्रन्थ की शुरुआत कहाँ से हुई थी ? दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम्। मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ ये तीन चीजें दुर्लभ हैं और ईश्वर की कृपा से ही मिलते हैं - मनुष्य. जन्म , मोक्ष की इच्छा और महापुरुषों का साथ। आप मनुष्य शरीर में जन्मे हो , आपके अंदर मुक्ति की इच्छा , मतलब क्या ? इस परम् सत्य को जानने की इच्छा। लेकर जन्मे हो। आप जो पहले 2mm दृष्टि में फँसे हुए थे , उससे असन्तुष्ट होकर के अब आप सत्य को जानने और उसमें निरंतर प्रतिष्ठित रहने का सामर्थ्य प्राप्त करने की तीव्र इच्छा , सत्य को जानने की तीव्र इच्छा अगर आपके अंदर उत्पन्न होती है। तो यह व्याकुलता क्यों उत्पन्न हो रही है ? उसके अनुग्रह से -माँ काली के अनुग्रह से , माँ तारा के अनुग्रह से हो रही है। इसमें हमारी कोई चालाकी , या बुद्धिमानी नहीं है। सिर्फ और सिर्फ माँ की कृपा है। ऐसी इच्छा सबों में तो नहीं जगती है ? एक ही माँ के चार बच्चों में तो यह -मुक्ति की इच्छा , सत्य को जानने की इच्छा तो नहीं जगती है ? किसी एक में जो जग जाती है , वह इसी माँ काली के अनुग्रह से होता है। सारा विश्व प्रपंच सभी लोग तो इस जन्म-मृत्यु के कुँए में ही तो पड़े हुए हैं। किसके अंदर मुक्ति की इच्छा है ? लेकिन जब इस महामाया का अनुग्रह होने लगता है , तब जगत की सारी वस्तुओं को छोड़-छाड़कर (कामिनी , कांचन और कीर्ति में आसक्ति को त्याग कर) हमारे अंदर निरंतर सत्य में प्रतिष्ठित रहने की इच्छा जग जाती है। (37:41) फिर जीवन में किसी महापुरुष का आश्रय (सद्गुरुदेव और नवनीदा ) हमको मिल जाता है। वो सब उसी माँ काली का अनुग्रह है। उनकी कृपा से यह जीव उस परम् सत्य को जान लेता है। या ऐसा समझें कि महामाया के अनुग्रह से ही जीव के सामने सत्य प्रकट होते हैं ! जीव क्या जानेगा ? हम क्या जान सकते हैं ?वो माँ काली हमें दिखा देती है , इसलिए हमारी आँखे (ज्ञान चक्षु ?) खुल जाती हैं। 

       मैं यह प्रश्न अक्सर करता हूँ। आपलोग जो यहाँ मायावती आये हो ? आपलोग यहाँ आये हो ? प्रश्न है ! 'मृणाली' (=कमल) तुम यहाँ आयी हो ? या कुछ और है ? अनुग्रह है !! लेकिन पहले तो ऐसा नहीं लग रहा था न ? (38:31) पहले तो तुम्हें लगा कि मैं फ्लाइट का टिकट बुक की थी, मैं ट्रेन की टिकट बुक की थी। सब जगह मैं, मैं, मैं, मैं ही चल रहा था। लेकिन जब हमारी दृष्टि में अगर स्पष्टता आ रही है,अगर भगवान की ओर (अवतार वरिष्ठ की ओर) हमारी बुद्धि जा रही है। तो यह महामाया काली ही कर रही है , ये सब हम नहीं कर रहे हैं। इसीको अनुग्रह कहते हैं। माँ की यह कृपा , ऐसा अनुग्रह अद्भुत चीज है ये हमें दिखाई नहीं देता। यही ईश्वर का अनुग्रह है। यहाँ तक थोड़े से लोग ही पहुँच सके हैं , बाकि सब लोग उसी कुएँ में पड़े हैं। हमारे सामने विकल्प था कैम्प या पिकनिक ?  आपको जितना कुछ समझ में आ सका , लेकिन अब इसके आगे क्या ? इसको चाहे तो आप छोड़ भी सकते हो। लेकिन अगर इसी रास्ते पर आगे बढ़ते रहोगे , तो आपका जीवन एक अलग ही प्रकार का होगा। अलग प्रकार का आनंदमय जीवन होगा- सही आनंद ! और इस मार्ग को छोड़कर बिना तली वाले कुँए में गिरने का जो परिणाम है , वह तो हम जानते ही हैं। तो ये विकल्प आप लोगों के सामने है।

 [[लेकिन 37 वर्षों तक वार्षिक शिविर में जाने के बाद ,पहले तो तुम्हें लगा होगा कि मैं स्वयं टिकट बुक करया और, 14 अप्रैल 1986 को गुरु खोजने अकेले हरिद्वार कुम्भ चला गया ? वहाँ देवराहा बाबा से मिला ? वापस आकर राँची रामकृष्ण मिशन में फॉर्म भर दिया , और 27 मई, 2087 को सद्गुरु देव का आश्रय मिल गया। 10 लोगों का टिकट बुक कराया कोई नहीं आया, श्रीकृष्ण सिंह को बुलाने उनके घर गया , पर कोई नहीं आया तो 25 दिसम्बर, 1987 को अकेले बेलघड़िया कैम्प चला गया ? वहाँ क्या -क्या हुआ ? माँ तारा -भवतारिणी -काशीपुर उद्यान -कल्पतरु उत्सव , ugp ?.]               

       इस जगत रूपी माया को जब हम समझने का प्रयास करते हैं , तो यह एक ऐसे वस्तु की अनुभूति है , जो वास्तविक रूप में देखो तो है ही नहीं। मृगतृष्णा में दिखाई देने वाला जो जल है , वो वास्तविक रूप में है क्या ? न होते हुए भी दिखाई देता है। रज्जु में जो सर्प दिखाई देता है , वास्तविक रूप में है क्या ? न होते हुए भी वहाँ दिखाई देता है। लेकिन वास्तविक रूप में वहाँ क्या है ? वहाँ केवल रज्जु है। रेगिस्तान में जो मरू मिरीचिका दिखाई देती है , वहाँ एक बून्द भी जल नहीं है , रेत ही है। लेकिन जल दिखाई देता है। मरू-मरीचिका और रज्जु-सर्प बाहरी उदाहरण है; हमसे  बाहर में घटित होने वाला भ्रम है। सबसे सुंदर उदाहरण तो स्वप्न का है। लेकिन स्वप्न देखना तो आपके भीतर हर रोज हो रहा है। हमने कभी ध्यान नहीं दिया इसके ऊपर। हर रोज हमारे साथ हो रहा है। स्वप्न जो स्वप्न सृष्टि दिखती है - राजा जनक भिखारी बने और अन्न को तरस रहे थे। ऐसा सपना तो आपके भीतर हर रोज हो रहा है। हमने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। ये पूरा स्वप्न सृष्टि एक बुलबुले के समान है।  (40:56) हमारा निष्कर्ष यही होगा कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक बुलबुला मात्र ही है। और ये बुलबुला कहाँ उठ रहा है , और लीन हो रहा है ? ये आपके अंदर उठ रहा है। आप वह सच्चिदानन्द आत्मा हो ! आप कल्पना कर सकते हैं ? ये बुलबुला , ये स्वप्न ब्रह्माण्ड जो है ये कहाँ उत्पन्न हो रहा है ? आपके भीतर ? स्वप्न में जो विश्व-प्रपंच दिख रहा था वो निर्मित कहाँ हुआ था ? स्वप्न ब्रह्माण्ड जो है वो उत्पन्न कहाँ हो रही थी ? आत्मा में उठ रही थी। आत्मा में उठ रही है , और आप वह हो।  वो फिर मृणाली या ugp नहीं है - वह सच्चिदानन्द ब्रह्म आत्मा ही है। मृणाली उस नाम-रूप वाले बुलबुले से छूट गयी ! वो स्वप्न ब्रह्माण्ड रूपी बुलबुला कहाँ  उठ रहा था ? आत्मा में ही उठ रहा था। और आप वही आत्मा सच्चिदानन्द शिव हो ! तो यह हमारी 'ultimate position ' अंतिम स्थिति हो गयी। तो यह ब्रह्माण्ड श्रेष्ठ (यानि परा है ?) या आप ब्रह्माण्ड से भी श्रेष्ठ हो ? ब्रह्माण्ड के जितने सारे ग्रह नक्षत्र हैं , क्या हम उसके अधीन हैं ? प्रश्न तो उठता है। लेकिन जो भक्त होता है, जो सगुणोपासक ज्ञानी भक्त होता है, भक्त ज्ञानी की दृष्टि अलग ही होती है। (42:06) 

सगुणोंपासक ज्ञानी -भक्त हनुमान जी तो मोक्ष को त्याग देते हुए कहेंगे - रामलखन सीता मनबसिया॥8॥  क्योंकि पूरे ब्रह्माण्ड का जो मालिक है , वो मेरे ह्रदय में बसता है। मतलब मैं - सच्चिदानन्द ब्रह्म हूँ ! और क्या ? जिन पर माँ काली या अवतार वरिष्ठ की कृपा हो जाती है, उसके लिए ब्रह्माण्ड कुछ भी नहीं है -" उनकी कृपा से "ब्रह्माण्डं गोष्पदायते The whole universe becomes a hoof-mark of the cow.[4 अक्टूबर, 1895 को राखाल महाराज को लिखित पत्र में स्वामी जी कहते हैं - " हे भाई , जिन्होंने खिला-पिलाकर , विद्या-बुद्धि देकर मनुष्य बनाया , जिन्होंने हमारी आत्मा की ऑंखें खोल दी , जिनके रूप में हमने रातदिन सगुण ईश्वर का दर्शन किया।" (४/३५४) इसका कारण बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस (लंका काण्ड) में कहा है - * सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।]

   एक दूसरा उदाहरण हमलोग देखते हैं। (42:23) शंकराचार्य जी एक और भाष्य में माया के विषय में बहुत सुंदर कहे हैं। इस जगत में ही हमलोग फंसे हुए हैं। हमलोग इसको -जगत,जगत, जगत मानकर चल रहे हैं। Modern science पढ़ करके हमलोग और भी भ्रमित हो गए हैं। Modern science की दृष्टि में तो बस यह स्थूल जगत ही सत्य है। उनके जगत की परिभाषा भी अत्यंत संकीर्ण है। इन्द्रियगोचर जगत को ही वे लोग सत्य मानते हैं। उनके पाश्चत्य जगत के इस संकीर्ण दृष्टिकोण से हमलोग इतने Hypnotized हैं , क्या दुःख की बात है। कि हमारे बच्चे भी उन्हीं के दृष्टिकोण को देखकर बड़े हो रहे हैं। जहाँ उनको अपने पूर्वज ऋषियों के दृष्टिकोण को पढ़कर बड़ा होना चाहिए था। आधुनिक विज्ञान को पढ़कर हमारे बच्चों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा कम हो जाती है। वह खत्म हो जाती है। सबसे बड़ा जहरीला काम कर रहा है , आधुनिक शिक्षण पद्धति। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "This modern education system, the first thing that it does is , it kills shraddha !"[हमको इसका दुष्परिणाम अब थोड़ा थोड़ा समझ में आने लगा है। विवाह-तलाक ,live in relationship-लिव-इन रिलेशनशिप का अर्थ है जब दो वयस्क बिना शादी किए एक साथ कानूनी बंधन में रहते हैं और एक-दूसरे को पति-पत्नी की तरह समझते हैं।]  यह आधुनिक शिक्षा प्रणाली, सबसे पहली काम तो यह करती है कि यह श्रद्धा को ही मार देती है! इसलिए आज जो हमारे स्कूल और यूनिवर्सिटी से बच्चे बाहर निकल रहे हैं - वे लोग भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े कर देते हैं। भगवान को मानना उनको दकियानूसी जैसी लगता है। आजकल भगवान कौन मानता है। मनुष्य को इतना दिग्भ्रमित बना देती है , हमारी आधुनिक शिक्षण पद्धति। अपने ऋषि -मुनियों की सच्ची दृष्टि हम अपने बच्चों को नहीं दे पा रहे हैं। तो अपनी ऋषि दृष्टि के आलोक में पढ़कर या तथाकथित पाश्चत्य विज्ञान की दृष्टि में पढ़ना कौन सा अच्छा है ? 

        जो भी हो शंकराचार्यजी के बाद एक विवेकानन्द ही अद्भुत दिखाई देते हैं। वे अपने एक भाष्य में कहते हैं - इस जगत से ही तो हमलोग मोहित हैं , हमलोग इस जगत को सत्य मानकर चल रहे हैं , जगत हमको सत्य जैसा प्रतीत हो रहा है। जीव और जगत दोनों सत्य सा प्रतीत हो रहा है , क्योकि हमने इसके बारे में कभी ध्यान से सोचा ही नहीं है। जीव -जगत जो सामने दिखाई दे रहा है , इसको समझाने के लिए शंकराचार्य जी एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। वे इस दृष्टिगोचर जगत के विषय में संस्कृत मे कहते हैं, है-'चित्रित इव पटं' यानि पट-चित्रवत ! पट चित्र का मतलब क्या है ? 1200 -1300 साल पहले शंकराचार्य जी के समय की बात है। उस समय कागज का अविष्कार नहीं हुआ था। तो लोग कपड़े के ऊपर चित्र बनाते थे। सफ़ेद कपड़ा रहा होगा। canvas पर उस समय के लोग चित्र बनाते होंगे। आज हमलोग कागज पर पेन्ट करते हैं , पुराने जमाने में कपड़े पर पेंटिंग होती होगी। 'पट-चित्रवत' जैसे आप पर्दे के ऊपर चित्र बना रहे हो। चित्रित इव पटं ! ये जगत कैसा है ? जैसे की 'पट चित्रवत' ! जैसे कि अपने कपड़े के ऊपर चित्र बना दिया गया हो। आप बताइये उस कपड़े पर जी चित्र है , उसको देखते समय चित्र देख रहे हो या कपड़ा देख रहे हो ? 

     आप कपड़ा ही देख रहे हो , पर आपको समझ में नहीं आ रहा है। आपकी ऑंखें कहाँ टिकी हुई हैं -कपड़े पर या चित्र पर ? लेकिन हमें कपड़े का बोध नहीं हो रहा है , चित्र का ही बोध हो रहा है। क्या सुंदर उदाहरण है। ये सारा विश्व-प्रपंच उसी चित्र के समान है। हमारी दृष्टि इस चित्र में फँसी हुई है लेकिन इसके पीछे का जो कपड़ा है वो हमको दिखाई नहीं दे रहा है। वो ईश्वर हैं ! (आत्मा -सच्चिदानन्द ब्रह्म हैं ?) ये सामने जो जीवजगत रूपी चित्र दिखाई दे रहा है , ये कहाँ दिखाई दे रहा है ? ये ईश्वर रूपी कपड़े पर दिखाई दे रहा है। इसके मूल में ईश्वर (आत्मा ) है न ? अभी तक वही सत्य तो हम खोज रहे हैं ! स्थूल शरीर को छोड़कर हमलोग सूक्ष्म शरीर में प्रवेश किये , सूक्ष्म शरीर को भी छोड़कर हमलोग कारण शरीर में जब पहुँच गए तो हमलोग कपड़े में पहुँच गए। (48:10) तब तो हम कपड़े में पहुँच गए न ? शंकराचार्यजी के समय में तो ये पट और चित्र ही था। लेकिन आज के युग में यदि शंकराचार्यजी आ जाएँ तो वे जगत को - 'पट चित्रवत' नहीं कहेंगे। यह जीव -जगत 'चल-चित्रवत' कहेंगे। शंकराचार्यजी के समय में सिनेमा नहीं था , चलचित्र नहीं था , पट-चित्र ही हुआ करता था। इसीलिए उन्होंने पट चित्र का उदाहरण दिया था। आज के दृष्टिकोण  से देखिये तो सिनेमा या चलचित्र ही इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण है। हम सभी लोग सिनेमा देख कर ही बड़े हुए हैं। St.Columba’s College हजारीबाग में पढ़ते समय मोहन टॉकीज या दूसरे सिनेमा घर में जीवन-बॉस से ब्लैक में , फिल्म 'शोले' (1975) फिल्म का टिकट ले कर मित्रों के साथ  सिनेमा देखा है। आपने सिनेमा हॉल में जाकर 2 घंटे या 3 घंटे सिनेमा देखा। प्रश्न यह है कि आपने उस समय क्या देखा ?(49:09)अभी तो आप बोलेंगे पर्दा देखा। लेकिन पहले क्या कहते ? हमने सिनेमा देखा। अच्छा सिनेमा देखते समय किसी को पर्दे का बोध है क्या ? किसी को नहीं है। हम सिनेमा में ही अटके हुए हैं। हम तीन घंटे सिर्फ पर्दा ही देख रहे थे था । हमको कभी यह बात समझ में ही नहीं आया। तीन घंटे सिर्फ आप पर्दा ही देख रहे थे , पर ये बात आपको उस समय समझ नहीं आया। तीन घंटे आप सिर्फ पर्दा ही देख रहे थे। अब और भी कई प्रश्न उठते हैं। अब परदे में जो दिखाई दिया उसके विषय क्या बोलोगे ? क्या आप कह सकते हो कि वो सत्य है ? वह सत्य है ऐसा नहीं कह सकते , क्योंकि वो सिनेमा त्रिकाल अबाधित नहीं है,इसलिए वो तो चला जायेगा। तो क्या वह असत्य है ? ऐसा भी नहीं कह सकते। क्योंकि जब तक सिनेमा चल रहा है , तब तक तो आप फिल्म शोले में एकदम डूबे हुए हो। तो उस सिनेमा के विषय में आप क्या कहोगे ? महा अद्भुतं , अनिर्वचनीयं। क्या उस सिनेमा के विषय में आप यह कह सकते हो कि वह सचमुच विद्यमान है ? क्या सिनेमा सचमुच विद्यमान है ? लेकिन विद्यमान सा लगता है कि नहीं ? तो जो विद्यमान न होते हुए भी विद्यमान से प्रतीत होता है , उसको क्या कहोगे ? महा अद्भुतं , अनिर्वचनीयम। कैसी अद्भुत अनुभूति है ? वहां सच्चाई में क्या विद्यमान है ? पर्दा ही विद्यमान है , लेकिन पर्दा हमको दिखाई नहीं दे रहा है। और जो सिनेमा विद्यमान सा प्रतीत हो रहा है , हम वहीं पर अटके हुए हैं

    दूसरा प्रश्न - ये सिनेमा जो है, क्या वह पर्दे से भिन्न है ? क्या आप सिनेमा को पर्दे से भिन्न कोई द्वितीय वस्तु कह सकते हो सिनेमा तो है ही नहीं न ? क्या आप कह सकते हो कि पर्दे पर सिनेमा था ?  आप उस सिनेमा में कहीं भी अपनी ऊँगली रख दीजिये आपकी ऊँगली कहाँ पहुँचेगी ? परदे पर पहुंचेगी। क्या सिनेमा है वहाँ पर ?  सिनेमा में कई पात्र होते हैं - कोई हीरो है, कोई हीरोइन है  कोई गब्बर है। आप हीरो के ऊपर ऊँगली रख दीजिये , ऊँगली कहाँ पहुँचेगी ? आप किसी को पकड़िए - पकड़ायेगा पर्दा हीतो जीव जो है वो पर्दा ही है कि नहीं ? तो शंकराचार्य जी कहते हैं - जीव ब्रह्मैव न अपरः ! समझ में आ रहा है ? ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः॥ " पर्दा सत्यं सिनेमा मिथ्या', और उस सिनेमा में दिखने वाले जितने भी पात्र है, जय-बीरु -गब्बर वे सब क्या हैं ? पर्दा ही तो हैं। शंकराचार्य की ऋषि दृष्टि सचमुच अद्भुत है ! तो उस सिनेमा के विषय में क्या कहोगे ? क्या वो पर्दे से भिन्न हैं ? सिनेमा पर्दे से भिन्न है -ऐसा नहीं कह सकते। तो क्या सिनेमा पर्दे से अभिन्न है ? आप ऐसा भी नहीं कह सकते। तो क्या कहोगे सिनेमा के बारे में ? महा अद्भुतं , अद्वितीयं ! तो यह जीव-जगत क्या है ? यह माया सृष्टि है(52:06)  ऐसी एक वस्तु की अनुभूति है , जो कि विद्यमान न होते हुए भी हमको विद्यमान सा लगता है। और माया जब तक हटती नहीं हैं , तब तक पर्दे का ज्ञान नहीं होता। लेकिन अब शास्त्र और गुरु की कृपा बिग बैंग थ्योरी 'The Big Bang Theory' आदि तो केवल एक वैज्ञानिक अन्धविश्वास है , जिसको स्वामीजी Scientific superstitions कहते थे, इसको समझ लेने के बाद, अगर हमारी बुद्धि में श्रद्धा वापस आने लगी हो । अगर हमारे अंदर यह ज्ञान होने लगा है, तो वह इस परमेश शक्ति माया के अनुग्रह से ही हो रहा है ! यह स्पष्टता आने लगी कि 'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या' आत्मा सत्यं देह मिथ्या। तो यही उस परमेश शक्ति माया का अनुग्रह है। यह आत्मबोध हमें उनकी अनुग्रह से ही हो रहा है। तो ये -माया शक्ति का अनुग्रह क्या है ? इसे हमें ठीक से समझ लेना चाहिए। तो देखिये ये सब ज्ञान-चक्षु खुलने के कई पहलू है। तो देखिये हमलोग कारण शरीर में पहुँचते ही, हमलोग सीधे ईश्वर में पहुँच गए हैं। (52:49)  

       यही वेदांत कहता है कि-If you dig into the human being , what emerges ?यदि आप किसी मनुष्य के अन्दर झाँकने की चेष्टा करें तो क्या सामने आता है? क्या यह सत्य नहीं है? Is not a fact ? And if you dig into the world, what emerges ?God emerges ! यदि तुम जगत की या विश्व-ब्रह्माण्ड के सत्य को जानने की चेष्टा करते हो तो ईश्वर प्रकट हो जाता है ! तो फिर जीव और जगत कहाँ चले गए? So where is the Jiva and World?  gone ?  तो अब बताओ वास्तविक रूप में ये जीव और जगत है क्या जीव और जगत ईश्वर ही है , परमेश शक्ति ही है। कहाँ है जीव ? केवल अज्ञान में ही आप कह सकते हो कि कोई जीव है , कोई पुरुष है , कोई स्त्री है। लेकिन ज्ञानी पुरुषों (भक्तों) के लिए न कोई जीव है न कोई स्त्री- पुरुष है; उसको तो सब ईश्वर रूप ही दिखाई देता है। जैसे कि हनुमान का उदाहरण अति सुंदर है।  -" राम-लखन सीता मनबसिया॥8॥ क्या है इस स्थूल शरीर के और सूक्ष्म शरीर के भीतर क्या है ? वो केवल हनुमान के लिए ही सत्य नहीं है , हम सबके लिए सत्य हैहनुमानजी का वह चित्र : कारण-शरीर , परमेश शक्ति, ईश्वर हमारे ह्रदय में विद्यमान हैं - इसको समझाने का कितना सुंदर उदाहरण है। लेकिन रामायण देखकर ये पाश्चात्य जगत के लोग बोलेंगे , ये सब कितना बड़ा अंधविश्वासी चीज है ? हनुमान अपनी छाती चीरकर क्या दिखा रहे हैं ? (53:44) उनको पता नहीं है कि यह सब परमसत्य का Demonstration है , ईश्वर या कारणशरीर को समझाने का एक तरीका है। Is it not ?  हमारे रामायण हो या महाभारत हो उसकी हर घटना इसी प्रकार की है। वो ऐसी काल्पनिक चित्रण नहीं है। वो इस परम् सत्य को दर्शा रही है कि हर व्यक्ति के भीतर वही प्रभु परमेश्वर विराजमान हैं; जो सृष्टि के मूल में हैं , जो अपनी शक्ति से जो सच में विद्यमान नहीं है, ऐसी वस्तु की सृष्टि भी कर रहे हैं ! उसको भी वो दिखा रहे हैं। इसलिए ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। यह जगत जो दिखाई दे रहा है , यह एक ऐसी अद्भुत अनुभूति है , जो न होते हुए भी अनुभव हो रहा है। इसीलिए उस जगत को  मिथ्या कहा है। लेकिन वो पर्दा तो सत्य है। सिनेमा मिथ्या है , कहने का मतलब है , 'सिनेमा एक ऐसी अनुभूति है जो न होते हुए भी अनुभव हो रहा है।' तो क्या कहोगे ? लेकिन सत्य तो पर्दा है न ? क्योंकि पर्दा त्रिकाल अबाधित है। पर्दा तो त्रिकाल अबाधित है , वो कभी बाधित नहीं होती। सिनेमा तो बुलबुले के समान है , आ रही है , जा रही है ,आ रही है , जा रही है, आ रही है , जा रही है। लेकिन पर्दा सब समय है -आप वो पर्दा हो। हम सब वही पर्दा हैं। हमारे अंदर ही ये सारी सृष्टि बुलबुले के समान प्रकट भी हो रही है , और अदृश्य हो रही है। बुलबुले के समान आपके अंदर वो सृष्टि प्रकट हो रही है , और अदृश्य हो रही है। आप सृष्टि से भी ऊपर हो , पूरे ब्रह्माण्ड से भी ऊपर हो। प्रभु मरमेश्वर हमारे ह्रदय में बैठे हुए हैं। ये विवेक-दृष्टि है ! इसको कभी भूलना मत। तो इतनी सारी बातें हमको कारण शरीर से सीखना था। (55:24) तो यह सब समझ लेने के बाद , हमारा अंतिम निष्कर्ष क्या होगा यहाँ जो भी हमको दिखाई दे रहा है ,यह सब क्या है ? ये सब परमेश शक्ति ही है। ये जो भी हमको दिखाई दे रहा है , ये सब क्या है ? परमेश शक्ति है। काली का नृत्य चल रहा है। और ये काली क्या है ? वो शिव ही है। शिव ही काली है , काली ही शिव है। ब्रह्म ही शक्ति है , शक्ति ही ब्रह्म है। ये शक्ति का एक नृत्य चल रहा है यहाँ पर। लेकिन अगर इस सत्य को एक सुंदर रूप में देखना हो तो काली ही सबसे सुंदर रूप है। भयानक रूप है लेकिन वो सबसे बड़ा सत्य है। अज्ञानी को ही काली भयानक लगती है , ज्ञानी उस सत्य से प्रेम करेंगे। हमारे प्रेम की वस्तु , हमारे प्रेम का विषय तो ये काली हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण परमहंस इसके पुजारी थे। अति सुंदर प्रतीक; परम सत्य का भवतारिणी काली से बढ़कर सुंदर और कोई दूसरा प्रतीक नहीं हो सकता। (56:16)  ये शक्ति कैसे सत्य को ढँक रही है , कैसे शिव को ढँक रही है ? ये पूरा जो खेल चल रहा है , सृष्टि-स्थिति -प्रलय, सृष्टि -स्थिति -प्रलय का खेल यहाँ पर अविरत चल रहा है। सोंचकर देखो तो, यहाँ पर काली का नृत्य चल रहा है। अब आप थोड़ा सा कल्पना करके देख सकते हो। कितने जीव-जन्तु इसी क्षण पैदा हुए है, इसी क्षण जगत में कितने बच्चों का जन्म हुआ है ? पता है हमको ? इसी क्षण कितने बुलबुलों का जन्म हुआ है ? हुआ है कि नहीं ? पूरे सृष्टि में , सिर्फ मनुष्य योनि में ही नहीं। क्या हम कल्पना कर सकते हैं ? काली का नृत्य चल रहा है। सृष्टि-स्थिति -प्रलय,  सृष्टि-स्थिति -प्रलय, यही वास्तविकता है। इसी क्षण सिर्फ मनुष्य प्रजाति या Human Species में ही नहीं , मैं सभी Species की बात कर रहा हूँ। सभी Species में कितने बुलबुलों का जन्म हुआ; और इसी क्षण, साथ ही साथ कितने बुलबुले गायब हो गए सृष्टि-स्थिति -प्रलय, तो प्रकृति का विधान ही है। अब रोना क्या है इसमें ? या ख़ुशी भी क्या मनाना है ?  ये वास्तविकता है। This is the Reality ! यही सच्चाई है ! सृष्टि-स्थिति -प्रलय यहाँ पर अविरत चल रही है। शक्ति का खेल है। उसी काली का नृत्य चल रहा है। और वही (श्रीराम-काली) यहाँ पर सर्व रूप में हैं , सभी रूपों में हैं ! यहाँ जो भी है , वही है। अपने वो पढ़ा होगा न - या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। निद्रा रूपेण संस्थिता , लज्जा रूपेण संस्थिता , यहाँ पर जो भी है सब वही है। मातृरूपेण संस्थिता, यहाँ पर जो भी है , सब उसी 'एक शक्ति माँ काली' का ही रूप है। वही बीमारी है , और वही स्वास्थ्य भी है। तो अब प्रत्येक घटना की ओर देखने की हमारी दृष्टि बदल जाएगी , हम हर घटना को अब विवेक दृष्टि से देखेंगे , या ज्ञान चक्षु से देखेंगे। जब बीमारी आएगी - तो भक्त उसको भी गले लगा लेगा। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप डॉक्टर के पास नहीं जाओगे। जरूर जाइएगा  डॉक्टर के पास, क्योंकि डॉक्टर भी वही है। समझ रहे हो ? डॉक्टर भी उसी शक्ति का रूप है। जरूर जाइएगा। लेकिन कोई बीमारी अगर ठीक नहीं होती है , कई ऐसी बीमारी है जो ठीक नहीं होती है। तो वो विवेक-भक्त उसको स्वीकार कर लेगा। हँस कर स्वीकार कर लेगा। उसमें भी वो ईश्वर को ही देखेगा। अब पूरा दृष्टिकोण ही अलग है! There is no complaint, you understand? The whole vision is different now ! (58:22) बीमारी भी वही है , स्वास्थ्य भी वही है। दुःख-कष्ट भी वही है। वही दुःख-कष्ट के रूप में आती है। और सुख के रूप में भी वही आ रही है। तो अब आप क्या कहोगे ? इसलिए फिर इस व्यक्ति के लिए सुख-दुःख समान हो जाते हैं। अब देखिये सुख-दुःख की घटनाओं के प्रति देखने की आपकी दृष्टि बदल जाएगी। सुख-दुःख के लिए सम दृष्टि चली आती है। यही ज्ञान दृष्टि है। देखिये ज्ञान दृष्टि में क्या होता है ? सम दृष्टि आ जाती है। फिर सुख और दुःख समान हो जाते हैं। Pain and pleasure, फिर दर्द और खुशी समान हो जाते हैं। जीवन-मृत्यु समान , अपना -पराया का भेद मिट जाता है। ये परस्पर विरोधी चीजें एक ही जगह पर एक ही समय में विद्यमान रहती हैं। इसीको महाअद्भुतं अनिर्वचनीयं कहते हैं। इसलिए यह कारण शरीर (ईश्वर) ये बुद्धि के परे की बात है। लेकिन हमारे जीवन की यही सबसे बड़ी सच्चाई है। इस दृष्टि में प्रतिष्ठित होना ये मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। ऐसी ज्ञानमयी विवेक-दृष्टि बनाकर आप अपने शेष बचे जीवन को व्यतीत कीजिये। तो कैसा रहेगा ? बताइये आप ? This is the vision of wonderful free life!यह अद्भुत मुक्त जीवन का दर्शन है ! अब आप जीवनमुक्त पुरुषों की तरह जिओगे। अब उस दीन -हीन बँधे हुए , बेड़ियों में जकड़े गुलामों की तरह जिंदगी नहीं गुजारोगे ! एक बुलबुला दूसरे बुलबुले से चिपक कर यह समझता है कि हम सुरक्षित हैं, वह सुरक्षा नहीं है, विवेक-दृष्टि प्राप्त कर लेना सुरक्षा है। यह दृष्टि मिल जाने पर सारी असुरक्षा की भावना खत्म हो जाती है। आत्मदृष्टि जग जाने पर सारा भय समाप्त हो जाता है। काली भी भी सृष्ट करती है,और काली जब अनुग्रह करती है , तब वह भयमुक्त भी कर देती है। भय को समाप्त भी कर देती है। ये सब अति सुंदर बातें हैं , करते जाओ तो इसका अंत नहीं है। कारण शरीर पर पहुँचने से हम समदर्शिता प्राप्त कर लेते है। अब कारण शरीर की परिभाषा का 122  वां श्लोक भी हम लोग लेते हैं -यहाँ शंकराचार्य जी कह रहे हैं। 

अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं

तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः ।

सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था,

प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः ॥ 

(१२0/122) 

 (1:00:52 ) अव्यक्तं एतत -इसी कारण शरीर को अव्यक्त कहते हैं। इसको त्रिगुणै निरुक्तं भी कहते हैं , जो तीन गुणों से बना हुआ है , माया त्रिगुणात्मिक है। इसकी अभिव्यक्ति की विशेष अवस्था सुषुप्ति है , जिसमें बुद्धि की सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं।  तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः। यही आत्मा का कारण शरीर है , जो पूरी सृष्टि का भी कारण है, जो हर जीव के भीतर ही है। क्या सुंदर बात है? जीव की अपनी पहचान ही बदल जाती हैअब तक हम अपने आप को क्या समझते थे ? (मैं आधारकार्ड की पहचान वाला यह स्थूल शरीर हूँ और अमुक-अमुक मेरा भाई, बहन, पुत्र-पुत्री-पुत्रवधु, दामाद ,पोता -पोती, पत्नी, मित्र-शत्रु हैं?) लेकिन हमारी सच्चाई क्या है ? हम अपने आप को आज तक क्या समझ रहे थे ? यह सब हमको पाश्चात्य संस्कृति, बिना आत्मबोध हुए 'Co-education' और बे रोक-टोक बुलबुला -बुलबुली के चिपकने वाली दोस्ती की पाश्चात्य संस्कृति और शिक्षा ने हमें स्थूल शरीर में चिपके रहना ही सीखा दिया था, हम बिल्कुल भेंड़ की तरह डर कर में में करने लगे थे ? पाश्चत्य दृष्टिकोण हमें क्या बताती है ? और यहाँ पर हमारे ऋषि क्या बताते हैं ? 'शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥ आप सब वही अजर अमर ईश्वर तत्व हो। मृत्यु के परे जो हमारी अजर अमर ईश्वर तत्व है , ये हमारी असली पहचान है। लेकिन हम इसको अपने अनुभव से जानेंगे कब और कैसे ? माँ काली के अनुग्रह से, गुरु स्वामी विवेकानंद से - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! किसी भी समय, सुनकर ! अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं -अव्यक्तं एतत त्रिगुणैः निरुक्तं ! यह अव्यक्त माया जो है वह तीन गुणों से बनी हुई है। तत कारणं नाम शरीर आत्मनः। हमारे आत्मा की जो अव्यक्त शक्ति है, माया है इसीको हम कारण शरीर कहते हैं।  अब एक महत्वपूर्ण बात कहते है -सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था, सुषुप्तिः एतत विभक्ति अवस्था। इस माया की विशेष अभिव्यक्ति सुषुप्ति में होती है। (1:02:16) 

       क्यों , सुषुप्ति अवस्था में क्या होता है ? प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः - यह हमारे साथ हर रोज हो रहा है , लेकिन हमने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया था। सोते वक्त  अगर आपको पता हो कि आप सो रहे हो , तो इसका मतलब कि आप सो नहीं रहे हो। जब आप सो रहे होते हो आपको कुछ पता होता है ? सुषुप्ति में पूरा अविद्या होता है। कोई दरवाजा खटखटाये और आप कहो कि मैं अभी सो रहा हूँ। तो इसका मतलब कि आप सोये नहीं हो , सोने का नाटक कर रहे हो।अगर आप गाढ़ी नींद में सो रहे हो , तो आपको आवाज भी सुनाई नहीं देगी। Very important point ! बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है। सुषुप्ति में क्या होता है ? सुषुप्ति में पूरा अंधकार है। It's is total darkness ! अविद्या की यही परिभाषा - अनादि अविद्या हैऋषियों की परिभाषा कितनी सुंदर है। वो निद्रा कब शुरू हुआ ? वो अंधकार कब शुरू हुआ ? वह गाढ़ी निद्रा कब शुरू हुई ? इसका कौन निर्णय कर सकता है ? इसलिए कहते हैं - सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था - ये सुषुप्ति जो है वह माया का विशेष स्थान है- अंधकार है। माया का काम क्या है ? ढँक देना-अज्ञान, पूर्ण अंधकार। अब देखिये सुषुप्ति से उठने पर आपकी अनुभूति क्या होती है ? सोचिये आप 3 घंटे गाढ़ी निद्रा में सो गए। हम गाढ़ी निद्रा की बात कर रहे हैं , इसमें सपना भी नहीं है। This is all play of Consciousness ! This is all pure play of Consciousness  ये सब विशुद्ध  चेतना का खेल है Dream is not sleep ! स्वप्न नींद नहीं है! स्वप्न में भी आप सोये नहीं हो , वो बिल्कुल इसी प्रकार है। इसलिए In fact,  सपना देखते वक्त हम थक जाते हैं। उसमें थकावट ही होती है - समझ लीजिये कि आधे घंटे के लिए आप गाढ़ी निद्रा में गए।  गाढ़ी निद्रा से जब हम उठते हैं , हमारी उस समय की अनुभूति के बारे में हमारे शब्द क्या होते हैं ? 'मैं सुख से सोया था , कुछ पता ही नहीं चला। ' So it's a universal experience ! और यह सर्वभौमिक अनुभूति है , चाहे वो व्यक्ति अमेरिका में सोया हो , या अफ्रीका में सोया हो ? प्रत्येक  जीव-जंतु जो निद्रा में जाता है , वहां से बाहर निकलता है , तो उसकी अनुभूति क्या होती है ? मैं सुख पूर्वक आनंद में था, और कुछ भी नहीं जाना। 'कुछ न जानना' ये निद्रा की विशेषता है। जब आप स्वप्न से बाहर आओगे तब यह नहीं कहोगे कि मैं कुछ नहीं जाना। तब कहोगे मैंने स्वप्न में यह देखा। लेकिन गाढ़ निद्रा से जब बाहर आते हो , तो कहते हो मैं सुख पूर्वक आनंद में था। और दूसरी बात जब आप निद्रा से बाहर आते हो,  तो सारि थकावट से मुक्त होकर बाहर आते हो। क्यों ? कभी सोचा है ? क्या है हमारे भीतर ? अभी देखिये आनंद कहाँ है ? बाहर है या भीतर है ? (1:05:57) विषयों के पीछे भागना , दूसरे बुलबुलों में डुबोना क्या आनंद है ? आनंद का खजाना हमारे भीतर पड़ा है। हमलोग हर रोज निद्रावस्था में कहाँ जा रहे हैं ? इसी कारण शरीर में जा रहे हैं। जो की ईश्वर है तो सारा आनंद कहाँ है ? ईश्वर में नहीं है ? जगत में आनंद है क्या ? बाहर के विषयों में आनंद है - हमारी यही धारणा सबसे बड़ी भ्रान्ति है। बाहर के इन्द्रियभोगों में आनंद है क्या ? बाहर के विषयों को भोग करते करते आप तक करके सो जाते हो। आप 10 घंटा सिनेमा देखोगे आप थक जाओगे। थकावट के कारण आप सो जाओगे। नींद में जाकर आप फ्रेश हो जाओगे। नींद में सारी थकावट दूर हो जाती है। सारी ऊर्जा कहाँ से आ रही है ? सारा आनंद भी कहाँ से आ रहा है ? बाहर से आ रहा है क्या ? 

     हमलोग एक Experiment कर के देख सकते हैं। मानलो xyz नामक किसी व्यक्ति को एक कमरे में बंद कर दिया गया है। ये ऋषियों द्वारा दिया हुआ उदाहरण है। तुम्हें एक कमरे बंद कर दिया गया है , और उस कमरे के इन्द्रिय इस जगत के इन्द्रिय भोग की जितनी भी वस्तुएं हो सकती हैं, सब उपलब्ध हैं। आप कल्पना कर लीजिये - आपकी जो 10 इन्द्रियाँ हैं - 5 कर्मेन्द्रियाँ हैं और 5 ज्ञानेन्द्रियाँ हैं , उन सभी इन्द्रियों के भोग वस्तु वहाँ पर आपके लिए फ्रीली उपलब्ध करा दी गयीं हैं। जितना आपको चाहिए फ्रीली उपलब्ध हैं। आप शरीर और इन्द्रियों से सब प्रकार के भोगों में अपने आप को डुबो दीजिये। ठीक है ? आखिर दुनिया तो इसीके लिए पागल हो रही है। दुनिया तो यही समझ रही है कि विषयों में आनंद है। एक बुलबुला दूसरे बुलबुले में डूब कर के उसको लगता है की वो सुखी हो जायेगा। आप डूबिये , सबकुछ उस कमरे में उपलब्ध है। स्वेच्छा से , स्वछंद रूप से आप सब भोग कर सकते हैं। लेकिन एक शर्त है -आपको सोने नहीं दिया जायेगा। आप सिर्फ भोग करते रहिये। सारे भोग उपलब्ध हैं। पंच ज्ञानेन्द्रिय , पंच कर्मेन्द्रिय के सारे भोग उपलब्ध है। लेकिन आपको सोने नहीं दिया जायेगा। डण्डा लेकर एक आदमी वहां खड़ा रहेगा , जैसे ही तुम्हें नींद आएगी , वो उससे तुम्हें मारेगा। आप बताइये वह व्यक्ति कितनी देर जीवित रह पायेगा ? निद्रा के बगैर हम मर जायेंगे , या पागल हो जायेंगे। Can you remain without sleep ? We cannot remain without sleep ? आप निद्रा के बगैर जीवित नहीं रह पाओगे ; यह कहने अर्थ यह निकला कि आप ईश्वर के बिना जीवित नहीं रह पाओगे। निष्कर्ष यह निकला कि -You can remain without everything else, but you cannot remain without God ! आप बाकी सब चीजों के बिना रह सकते हैं, लेकिन आप भगवान के बिना नहीं रह सकते! !  We cannot remain without God !?  निद्रा में हम हर रोज ईश्वर सम्बन्ध बना लेते हैं। हम ईश्वर के साथ एक रूप हो जाते हैं। वहाँ से हम एकदम फ्रेश होकरके बाहर निकलते हैं। सारे freshness का मूल जगह कहा है ? ईश्वर हैं । विषय नहीं है। विषय भोगों में हम थक जाते हैं , और थक कर हम ईश्वर के गोदी में गिर जाते हैं। निद्रा में। वहां से हम दुबारा ताजा होकरके बाहर आते हैं। लेकिन दुबारा हम फिर विषयों के पीछे ही भागते हैं। यही चल रहा है , हमारे जीवन में। यहाँ पर हमारा बैटरी डिस्चार्ज हो रहा है , और चार्ज होने के लिए हमलोग निद्रा में जाते हैं। (1:09:52) निद्रा में हमारा बैटरी चार्ज होता है या नहीं ? यहाँ पर तो हम सिर्फ बैटरी को डिस्चार्ज कर रहे हैं। जितना हम विषयों में डूब रहे हैं , उतना हम बैटरी को डिचार्ज कर रहे हैं। और थक करके हम निद्रित अवस्था में चले जाते हैं। निद्रा में जाना यानि बिल्कुल ईश्वर के गोदी में जाना।  ईश्वर से एकरूप हो जाना। परमानंद है।  नींद से उठते ही , हमारी अनुभूति क्या है ? क्या आनंद था ! अच्छा बताओ उस आनंद की कोई तुलना है? आप कोई भी विषय भोग को ले लीजिये , और निद्रा में जो आनंद है , उस आनंद से उस प्रगाढ़ निद्रा के आनंद की तुलना कीजिये। किसी भी विषयभोग के साथ उसकी तुलना है ? ये सब बड़ा Indicator है। सत्य कहाँ है ? बाहर के विषयों में ? या हमारे भीतर में ? ये हमको वहाँ से संकेत कर रही है - कि जानलो बच्चो , इसलिए शंकराचार्यजी , और ऋषि लोग कहते हैं कि बाहर एक बून्द भी आनंद नहीं है। ये भ्रम है।  ये आनंद का आभास है। आनंद तो भीतर है। इसलिए देखिये हमें ध्यान करने में कितना आनंद लगता है। ध्यान में हम यही कर रहे हैं। हम अपने कारण शरीर तक पहुँच रहे हैं। सम्पूर्ण सृष्टि के मूल में पहुँच रहे हैं। विषयों के पीछे भागना , अच्छा है या ध्यान करना अच्छा है ? यानि मन को विषयों से खींचकर प्रत्याहार -धारणा का अभ्यास करना अच्छा है ? और ध्यान और समाधि में पहुँच जाना अच्छा है ? क्योंकि ध्यान -समाधि में जाने से क्या होता है ? आप इसी कारण शरीर तक पहुँच जाते हो , ईश्वर (ठाकुरदेव) तक पहुँच जाते हो। ईश्वर तक पहुँच जाते हो ,ध्यान में जो सबका द्रष्टा है , साक्षी है , ईश्वर है आप वहाँ तक पहुँच जाते होआप पर्दे में पहुँच जाते हो। पर्दे में पहुँच जाओगे तो आनंद ही आनंद है। तो आनंद बाहर है , या आपके भीतर है ? ये सब निर्णय आप स्वयं कर लीजिये। ये आपके लिए है। शास्त्र और गुरु सिर्फ आपको संकेत करते हैं। लेकिन निर्णय आपको स्वयं करना है। आपको आपके निर्णय पर आना होगा -आप जब आइये ? अब आप करके देखिये -The direction has been shown ! दिशा बता दी गयी है। अंतर्मुखी करना है मन को या नहीं ? ये आपको निर्णय लेना है। आपको दिशा दिखा दिया गया। अब आप स्वयं इसको जाँच करके देख लीजिये। (1:11:52) आपको किस प्रकार अपना जीवन जीना है , यह आप तय कीजिये। आप इस प्रकार का जीवन जी करके देखिये। 

     अब आप महापुरुषों के चित्र अपने सामने रखकर देखिये। लंगोट धारी रमण महर्षि ऐसे क्यों रहते हैं ? वो तो विषयों के पीछे नहीं भाग रहे हैं। जैसे हमलोग समझ रहे हैं कि विषयों में सुख है -और उसके पीछे भाग रहे हैं। क्या रमण महर्षि सोचेंगे की विषय भोग हमें सुखी बना देंगे ? क्यों ऐसे हैं ? क्योंकि वे उस ईश्वर रूपी परमानंद को प्राप्त कर चुके हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस को आप कभी विषयों के पीछे भागते देख सकते हैं ? क्योंकि वे परमानन्द को प्राप्त कर चुके हैं।                   युवा आदर्श स्वामी विवेकानन्द , शंकराचार्य सभी महापुरुष परमानंद को प्राप्त कर चुके हैं। इसलिए इन आदर्श महापुरुषों की छवि अपने सामने हमेशा रखो। आप के वापस जाने के बाद आपके table पर इन महापुरुषों के चित्र होने चाहिए। वे ही हमें बता देते हैं कि सही आनंद कहाँ है। वे हर समय आपको स्मरण कराते रहेंगे कि सच्चा आनंद कहाँ है ? सही आनंद विषयों में नहीं है। आपके भीतर में ही है। पूरा ब्रह्माण्ड आपके भीतर है। आप बाहर कहाँ भटक रहे हो भाई ? जिस सत्य को आप ढूँढ रहे हो , वह आपके भीतर ही है। बाहर कुछ भी नहीं है। लेकिन यह निर्णय आपको करना है। 

       ये सब जो हमने पढ़ा सुना , उस पर गहन चिंतन करना चाहिए। परख करके देखिये। और खुद अपने निर्णय पर पहुँचिये। अभी जो हमने श्लोक पढ़ा -  अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं - अव्यक्त जो माया है , जो कारण शरीर है , ये त्रिगुणात्मिक है। तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः ।सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था,प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः ॥ इसीको हमलोग कारण शरीर कहते हैं। और इसका जो विशेष स्थान है , वो सुषुप्ति अवस्था है। 

        अब देखिये सुषुप्ति कारण है न ? सुषुप्ति से ही तो जाग्रत , और स्वप्न की उत्पत्ति होती है। पूरे विश्वप्रपंच की उत्पत्ति तो सुषुप्ति से ही हो रही है। हर रोज सुषुप्ति से जाग्रत और स्वप्न की उत्पत्ति होती है। और जाग्रत और स्वप्न भी सुषुप्ति में जाकर विलीन हो जाती है। हर रोज ऐसा हो रहा है कि नहीं ? सृष्टि-स्थिति -प्रलय हर रोज हो रहा है। आपके भीतर हो रहा है। जाग्रत और स्वप्न की उत्पत्ति कहाँ से हुई ? इस सुषुप्ति से ही हुई। सुषुप्ति ही कारण शरीर है। (1:14:15) जाग्रत और स्वप्न की उत्पत्ति कहाँ से हुई ? सुषुप्ति से। और इस जाग्रत और स्वप्न का प्रलय भी सुषुप्ति में ही हो रहा है। और ये तीनों जो चल रहा है , जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति - सृष्टि -स्थिति -प्रलय , जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति - सृष्टि -स्थिति -प्रलय ,जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति - सृष्टि -स्थिति -प्रलय ये हमारे दैनंदिन जीवन में चल ही रहा है। यही शक्ति का खेल है। यह काली का खेल है , काली का नृत्य चल रहा है। 

     यह नवीन दृष्टि , यह शास्त्र दृष्टि हमको प्रदान किया गया  है। अभी इसका अंतिम निर्णय क्या होगा ? हम यहाँ जो भी देख रहे हैं वो माया है। माया क्या है ? शक्ति है। परमेश शक्ति है। काली है। अब इसको आप माया मत कहिये। इसको कहिये कि ये काली है। हम जो भी देख रहे हैं -यह क्या है ? ये काली है। काली शक्ति है।  काली का नृत्य चल रहा है। वो काली क्या है ? वो परब्रह्म ही है , शिव ही है। ब्रह्म ही शक्ति है , शक्ति ही ब्रह्म है। अब जीव -जगत कहाँ है ? हम अज्ञान में जीव -जगत देखते हैं। ज्ञानियों को जीव जगत नहीं दीखता। उसको सिर्फ यहाँ पर परमेश शक्ति ही दीखता है। ब्रह्म और ब्रह्म की शक्ति को आप सगुण ब्रह्म (अवतार वरिष्ठ ) भी कह सकते हो !(1:15:43) तो फिर ये सब क्या है ? सगुण ब्रह्म हो गया न ? हम जो कुछ देख रहे हैं -वह सगुण ब्रह्म ही देख रहे हैं। जीव और जगत कहाँ है ? बताइये , ये सब सगुण ब्रह्म है। अज्ञानी इसको जीव -जगत कहेगा , ज्ञानी भक्त कहेगा सगुण ब्रह्म ही है। उपनिषदों का सिद्धांत (चार महावाक्य ) क्या है ? ब्रह्म से भिन्न कुछ है क्या ? ब्रह्म ही है। ब्रह्म से भिन्न  ब्रह्म से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। हमको जो लगता है , ब्रह्मसे भिन्न द्वितीय वस्तु कुछ है। यह अज्ञान के कारण है। आज इस कारण शरीर का यह लास्ट क्लास हुआ। ..... जिव और जगत भी सगुण ब्रह्म ही है ! ॐ शांतिः ------ 

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रविवार, 7 सितंबर 2025

⚜️️ सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।।⚜️️घटना - 348⚜️️⚜️️स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर, ईश्वर,काली ,या माया शक्ति का 'अद्भुत 'वर्णन ! ⚜️️⚜️️ श्रीराम की महिमा का गुणगान⚜️️⚜️️ ⚜️️⚜️️Shri Ramcharit Manas Gaayan All India Radio Episode - 348⚜️️⚜️️https://www.shriramcharitmanas.in/p/lanka-kand_92.html⚜️️⚜️️

 श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]

  [ घटना - 348: दोहा -111,] 


श्रीराम की महिमा का गुणगान 

(स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर, ईश्वर,काली ,या माया शक्ति का वर्णन) 

       सीता जी की अग्निपरीक्षा हो चुकी है। देवता वहाँ उपस्थित होकर , दयालु परमहितकारी श्रीराम की महिमा का गुणगान करते हुए जहाँ-तहाँ हाथ जोड़े खड़े हैं। अत्यंत पुलक भरे शरीर  तथा मन से ब्रह्मा प्रभु की स्तुति करते हैं। अनेकों कामदेवों के समान अनुपम छवि है प्रभु की। भक्तवत्सल भगवान शोक और भय का नाश करने वाले , क्रोध से परे और ज्ञान स्वरुप हैं। अवतार लेकर भी वे अजन्मे, व्यापक , अद्वितीय तथा अनादि हैं। हे प्रभु आप सभी दोषों और निंदा से परे अखण्ड और सदा सर्वरूप हैं। सर्वरूप होकर भी आप वो सब कभी हुए ही नहीं - ऐसा वेद कहते हैं ! जैसे सूर्य और उसका प्रकाश अलग अलग होकर भी अलग नहीं है , उसी भाँति आप संसार से भिन्न और अभिन्न दोनों # ही हैं। 

[# वस्तुतः ये परस्पर विरोधी गुण रखने वाली अद्भुतं अनिर्वचनीयं माया शक्ति का वर्णन है। ये माया परमेश शक्ति है। सच्चिदानन्द परब्रह्म की अपनी ही शक्ति है। संत तुलसीदास जी ने उपरोक्त पंक्तियों में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर का बहुत सुंदर वर्णन किया है जिसे समझने के लिए अद्वैत आश्रम मायावती के अध्यक्ष स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज का विवेक-चूड़ामणि पर दिए गए भाग -17,18 और 19 को पढ़ना बहुत सहायक सिद्ध होगा। ]   
       इसी अवसर पर स्वर्ग से दशरथ जी वहाँ आते हैं। पुत्र श्रीराम को देख , उनकी आँखों में आँसू उमड़ रहे हैं, वे राम और लक्ष्मण को आशीर्वाद देते हैं। पिता के सम्मुख नतमस्तक हो श्रीराम अपने उद्गार प्रकट करते हैं - हे तात ! ये आपके पुण्यों का प्रताप है जिसके बल पर मैंने अजेय राक्षसों पर विजय प्राप्त की है ---- 

छंद-

* जय राम सदा सुख धाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे।।

भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥1॥

भावार्थ:-हे नित्य सुखधाम और (दु:खों को हरने वाले) हरि! हे धनुष-बाण धारण किए हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथी को विदीर्ण करने के लिए सिंह के समान हैं। हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणों के समुद्र और परम चतुर हैं‍॥1॥

* तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी।।

जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥2॥

भावार्थ:-आपके शरीर की अनेकों कामदेवों के समान, परंतु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्प को गरुड़ की तरह क्रोध करके पकड़ लिया।।2।।

* जन रंजन भंजन सोक भयं। गत क्रोध सदा प्रभु बोधमयं।।

अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं।।3।।

भावार्थ:-हे प्रभो! आप सेवकों को आनंद देने वाले, शोक और भय का नाश करने वाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञान स्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणों वाला, पृथ्वी का भार उतारने वाला और ज्ञान का समूह है।।3।।

* अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा।।

रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा।।4।।

भावार्थ:-(किंतु अवतार लेने पर भी) आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणा की खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्ष के साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुल के आभूषण! हे दूषण राक्षस को मारने वाले तथा समस्त दोषों को हरने वाले! विभिषण दीन था, उसे आपने (लंका का) राजा बना दिया।।4।।

* गुन ध्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं।।

भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं।।5।।

भावार्थ:-हे गुण और ज्ञान के भंडार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारों से रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदंडों का प्रताप और बल प्रचंड है। दुष्ट समूह के नाश करने में आप परम निपुण हैं।।5।।

* बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं।।

भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं।।6।।

भावार्थ:-हे बिना ही कारण दीनों पर दया तथा उनका हित करने वाले और शोभा के धाम! मैं श्रीजानकीजी सहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागर से तारने वाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत दोनों से परे हैं और मन से उत्पन्न होने वाले कठिन दोषों को हरने वाले हैं।।6।।

* सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जलजारुन लोचन भूपबरं।।

सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं।।7।।

भावार्थ:-आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करने वाले हैं। (लाल) कमल के समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओं में श्रेष्ठ, सुख के मंदिर, सुंदर, श्री (लक्ष्मीजी) के वल्लभ तथा मद (अहंकार), काम और झूठी ममता के नाश करने वाले हैं।।7।।

*अनवद्य अखंड न गोचर गो। सब रूप सदा सब होइ न गो।।

इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा।।8।।

भावार्थ:-आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखंड हैं, इंद्रियों के विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह (कोई) दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्य का प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी है, वैसे ही आप भी संसार से भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं।।8।।

* कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तनानन सादर ए।।

धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे।।9।।

भावार्थ:-हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थ रूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। (और) हे हरे! हमारे (अमर) जीवन और देव (दिव्य) शरीर को धिक्कार है, जो हम आपकी भक्ति से रहित हुए संसार में (सांसारिक विषयों में) भूले पड़े हैं।।9।।

* अब दीनदयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ।।

जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ।।10।।

भावार्थ:-हे दीनदयालु! अब दया कीजिए और मेरी उस विभेद उत्पन्न करने वाली बुद्धि को हर लीजिए, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दु:ख है, उसे सुख मानकर आनंद से विचरता हूँ।।10।।

* खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा।।

नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं।।11।।

भावार्थ:-आप दुष्टों का खंडन करने वाले और पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्री शिव-पार्वती द्वारा स‍ेवित हैं। हे राजाओं के महाराज! मुझे यह वरदान दीजिए कि आपके चरणकमलों में सदा मेरा कल्याणदायक (अनन्य) प्रेम हो।।11।।

दोहा-

* बिनय कीन्ह चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।

सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात।।111।।

भावार्थ:-इस प्रकार ब्रह्माजी ने अत्यंत प्रेम-पुलकित शरीर से विनती की। शोभा के समुद्र श्रीरामजी के दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।।111।।

* तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए।।

अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा।।1 ।।

भावार्थ:-उसी समय दशरथजी वहाँ आए। पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित प्रभु ने उनकी वंदना की और तब पिता ने उनको आशीर्वाद दिया।।1।।

* तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ।।

सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी।।2।।

भावार्थ:-(श्रीरामजी ने कहा-) हे तात! यह सब आपके पुण्यों का प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराज को जीत लिया। पुत्र के वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यंत बढ़ गई। नेत्रों में जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गई।।2।।

* रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना।।

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो।।3।।

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी ने पहले के (जीवितकाल के) प्रेम को विचारकर, पिता की ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूप का दृढ़ ज्ञान करा दियाहे उमा! दशरथजी ने भेद-भक्ति में अपना मन लगाया था, इसी से उन्होंने (कैवल्य) मोक्ष नहीं पाया।।3।।

* सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।।

बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा।।4।।

भावार्थ:-(मायारहित सच्चिदानंदमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त) सगुण स्वरूप की उपासना करने वाले भक्त इस प्रकार मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभु को (इष्टबुद्धि से) बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोक को चले गए।।4।।

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⚜️️ मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥⚜️️घटना - 347⚜️️जनक नन्दिनी सीताजी की अग्नि परीक्षा ⚜️️Shri Ramcharit Manas Gaayan All India Radio Episode - 347⚜️️https://www.shriramcharitmanas.in/p/lanka-kand_92.html⚜️️

श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]

  [ घटना - 347: दोहा -109, 110 ] 


जनक नन्दिनी सीताजी की अग्नि परीक्षा 

     लंका विजय के पश्चात् सीता की अग्नि परीक्षा मात्र एक लीला थी। उनके असली स्वरुप को तो हरण के पूर्व  श्रीराम ने अग्निदेव के पास धरोहर के रूप में रख दिया था। अग्निपरीक्षा का आदेश सुनकर न केवल राक्षसियों को विषाद होता है , बल्कि लक्ष्मण की आँखों में भी दुःख के आँसू उभर आते हैं। किन्तु स्वयं सीता से धर्म ,विवेक तथा नीति के वचन सुनकर वे लकड़ियाँ एकत्र कर अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं। इस लीला की पात्रा के रूप में सीता अग्निदेव से प्रार्थना करती हैं कि यदि मन वचन और कर्म से वे पतिपरायणा रही हैं , तो अग्नि उनके लिए चंदन के समान शीतल हो जाएँ! उनकी छायामूर्ति तथा अपहृत होने का कलंक आग की प्रचण्ड लपटों में भष्म हो जाते हैं।  अग्निदेव स्वयं प्रकट होकर सीताजी का हाथ श्रीराम को वैसे ही समर्पित करते हैं , जैसे क्षीरसागर ने लक्ष्मी भगवान विष्णु को सौंपी थी। .... 
चौपाई :
* प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥1॥

भावार्थ:-प्रभु के वचनों को सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्म से पवित्र श्री सीताजी बोलीं- हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्म के नेगी (धर्माचरण में सहायक) बनो और तुरंत आग तैयार करो॥1॥

सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥
लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥2॥

भावार्थ:-श्री सीताजी की विरह, विवेक, धर्म और नीति से सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजी के नेत्रों में (विषाद के आँसुओं का) जल भर आया। वे हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभु से कुछ कह नहीं सकते॥2॥ 
देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥
पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥3॥

भावार्थ:-फिर श्री रामजी का रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत सी लकड़ी ले आए। अग्नि को खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजी के हृदय में हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ॥3॥
* जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥4॥

भावार्थ:-(सीताजी ने लीला से कहा-) यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्री रघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मन की गति जानते हैं, (मेरे भी मन की गति जानकर) मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाएँ॥4॥

छंद- :
* श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥
प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥1॥

भावार्थ:-प्रभु श्री रामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वंदित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यंत विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चंदन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गए। प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं॥1॥

* धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥
सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।
नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥2॥

भावार्थ:-तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत्‌ में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्री रामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णु भगवान्‌ को लक्ष्मी समर्पित की थीं। वे सीताजी श्री रामचंद्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यंत ही सुंदर है। मानो नए खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो॥2॥
दोहा :
* बरषहिं सुमन हरषि सुर, बाजहिं गगन निसान।
गावहिं किंनर सुरबधू ,नाचहिं चढ़ीं बिमान॥109 क॥

भावार्थ:-देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाश में डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥109 (क)॥

* जनकसुता समेत प्रभु, सोभा अमित अपार।
देखि भालु कपि हरषे, जय रघुपति सुख सार॥109 ख॥

भावार्थ:-श्री जानकीजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी की अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गए और सुख के सार श्री रघुनाथजी की जय बोलने लगे॥109 (ख)॥

चौपाई :
* तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥
आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥1॥

भावार्थ:-तब श्री रघुनाथजी की आज्ञा पाकर इंद्र का सारथी मातलि चरणों में सिर नवाकर (रथ लेकर) चला गया। तदनन्तर सदा के स्वार्थी देवता आए। वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों॥1॥
* दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥2॥

भावार्थ:-हे दीनबन्धु! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव! आपने देवताओं पर बड़ी दया की। विश्व के द्रोह में तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्ग पर चलने वाला रावण अपने ही पाप से नष्ट हो गया॥2॥

* तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥3॥

भावार्थ:-आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखंड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मे, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती) और दयामय हैं॥3॥

* मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥4॥

भावार्थ:-आपने ही मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन और परशुराम के शरीर धारण किए। हे नाथ! जब-जब देवताओं ने दुःख पाया, तब-तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया॥4॥
* यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही।
अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरें मन बिसमय आवा॥5॥

भावार्थ:-यह दुष्ट मलिन हृदय, देवताओं का नित्य शत्रु, काम, लोभ और मद के परायण तथा अत्यंत क्रोधी था। ऐसे अधमों के शिरोमणि ने भी आपका परम पद पा लिया। इस बात का हमारे मन में आश्चर्य हुआ।।5।।

* हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी।।
भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥6॥

भावार्थ:-हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्ति को भुलाकर निरंतर भवसागर के प्रवाह (जन्म-मृत्यु के चक्र) में पड़े हैं। अब हे प्रभो! हम आपकी शरण में आ गए हैं, हमारी रक्षा कीजिए॥6॥
दोहा-

* करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।
अति सप्रेम तन पु‍लकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥110॥

भावार्थ:-विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ के तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे। तब अत्यंत प्रेम से पुलकित शरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे-- ॥110॥
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