इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
⚜️️🔱मनुष्य जीवन का गौण उद्देश्य क्या है एवं मनुष्य जीवन चरम उद्देश्य क्या है ?⚜️️🔱
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” Arise, awake, and stop not till the Goal is reached !उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए !
साधारण मनुष्य के जीवन का गौण लक्ष्य कई हो सकते हैं , होना भी चाहिए और पुरुषार्थ करके उन्हें प्राप्त भी करना चाहिए। लेकिन 'Indian philosophy' के मतानुसार विवेकी मनुष्य के जीवन का चरम-लक्ष्य है अपने सत्य-स्वरुप से - 'Real I' (आत्मा या ईश्वर) के साथ जुड़ जाना।
बुद्धि और विवेक में अन्तर : मनुष्य का मन -बुद्धि परिवर्तनशील है निरंतर बदलता रहता है; लेकिन नित्य-अनित्य विवेक यदि एक बार जाग्रत हो जाये, तो फिर वह कभी नहीं बदलता। मनुष्य की विशेषता (विशेष योग्यता) यही है कि, वह किसी सद्गुरु के निर्देशन में अपने सोये हुए विवेक को जाग्रत कर सकता है।
विवेक क्या है ? श्रेय-प्रेय विवेक समझ लेने के बाद , विवेक का वास्तविक अर्थ होता है, नित्य-अनित्य विवेक। अर्थात यह जानना कि हमारे दो पहचान हैं। हमारा जो वास्तविक मैं (Real I, सत्य-स्वरुप आत्मा , ब्रह्म) अविनाशी है, और प्रातिभासिक मैं (Apparent I M/F देह ) परिवर्तनशील, नश्वर होने से मिथ्या है , और जीव भी ब्रह्म ही है, दूसरा नहीं !
इसलिए सनातन हिन्दू वैदिक धर्म के समस्त ग्रंथ , गीता , शास्त्र और सद्गुरु क्या करते हैं? शास्त्र और सद्गुरु अर्थात शंकराचार्यजी जैसे परमज्ञानी, ब्रह्मविद सद्गुरु "जीव, जगत और ईश्वर " के एकत्व या अद्वैत बारे में हमारी दृष्टि (मति, बुद्धि या सोंच) को बदलने के लिए हमें यह शिक्षा देते हैं कि -
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभिः।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।।
जो अनेक ग्रंथों में लिखा है । उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं - ब्रह्म सत्य है । जगत मिथ्या है । तथा जीव ब्रह्म ही है । कोई अन्य नहीं ।
वर्तमान युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द, आदि गुरु शंकराचार्यजी के इसी अद्वैत वेदान्त को 'व्यावहारिक वेदान्त' के रूप में ढालकर यह शिक्षा देते हैं कि - " योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा 'अज्ञान' (अविद्या) के कारण प्रकृति के साथ (बन्ध गयी है) संयुक्त हो गयी है। इस 'प्रकृति' के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस अंतर्निहित ब्रह्मत्व (Inherent Divinity) को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"
"तुम्हारे पास तीन चीजें '3H' हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत है। मन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अजर-अमर-अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम (नश्वर) शरीर हो।
जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ', तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ ! (अभी मजा चखाता हूँ!)" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो।जब मैं सोचता हूँ कि मैं मन हूँ , मैं उस अनन्त अग्नि का एक स्फुलिंग हूँ , जो तुम हो। जब मैं यह अनुभव करता हूँ कि मैं आत्मा हूँ , तब तुम और मैं एक हूँ -यह एक प्रभु के भक्त (हनुमानजी) का कथन है। क्या 'मन' (बुद्धि) आत्मा से भी श्रेष्ठ है या परे है ? " (खंड 10. पृष्ठ 40) [देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक। आत्मबुद्धया त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ देह-बुद्धि से (मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि) तो मैं दास हूँ, जीव-बुद्धि से आपका अंश ही हूँ और आत्म-बुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु श्रीराम के महान भक्त हनुमानजी का कथन है। ॐ !]
[You have three things in you: (1) the body, (2) the mind, (3) the spirit. The Soul is intangible (Real I-आत्मा अतीन्द्रिय है - यानि अविनाशी है!) the Mind comes to birth and death, (सूक्ष्म शरीर-मन , बुद्धि, चित्त और अहंकार' जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं।) , and so does the body. (Apparent I' यानि स्थूल शरीर या M/F शरीर की भी यही दशा है।) You are that Soul, but often you think you are the body. When a man says, "I am here", he thinks of the body. Then comes another moment when you are on the highest plane (Real I, सत्य-स्वरुप आत्मा की भूमिका); you do not say, "I am here". But if a man abuses you or curses you and you do not resent it, you are the spirit. (Volume 8- page 180)
इस प्रकार हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के शास्त्र और स्वामी विवेकानन्द जैसे सद्गुरु हमारे शरीर को नहीं बदलते, बल्कि 'जीव, जगत और ईश्वर' को देखने के प्रति हमारी बुद्धि, मति, सोंच या दृष्टि को बदलने की शिक्षा देते हैं। स्वयं शंकराचार्यजी कहते हैं -"दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् " अर्थात विवेकी मनुष्य को अपनी 'बुद्धि' को व्यावहारिक मैं(Apparent I) के साथ नहीं जोड़कर, (परिवर्तनशील होने के कारण नश्वर देह, मन और इन्द्रियों से न जोड़कर), बुद्धि से भी श्रेष्ठ और हृदय में ही विद्यमान आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) से, अपने अविनाशी 'सत्य-स्वरुप' (Real I) से जोड़ना चाहिए। और इस प्रकार अपनी बुद्धि (मति या 'दृष्टि') को ज्ञानमयी बनाकर जगत को (अपना -पराया नहीं) ब्रह्ममय देखना चाहिए।क्योंकि हमारे शास्त्रों (अष्टावक्र गीता) में कहा गया है -
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि, बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किवदन्तीह सत्येयं, या मतिः सा गतिर्भवेत्॥१-११॥
स्वयं को मुक्त (अविनाशी आत्मा) मानने वाला मुक्त (आत्मा , ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) ही है। और स्वयं को बद्ध (पशु -नश्वर देह M/F) मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी 'मति' वैसी गति, (यानि जिसकी मति, बुद्धि या दृष्टि जैसी होती है) उसकी वैसी ही गति होती है॥११॥
जब कोई सद्गुरु कृपा करके भगवान को पुकारने का नाम (महावाक्य) तथा उन्हें अपने ह्रदय में ही देखने की पद्धति, सिखला देते हैं, तब सद्गुरु की कृपा से यह अनुभव होता है,यह समझ में आता है कि " सचमुच ! सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाली माँ काली (निर्गुण ब्रह्म की शक्ति) ही मनुष्य देह धारण करके भी सगुण प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, ईसा और श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतार लेती हैं! [ प्राणियों की उन्नति और परम कल्याण का जो साधन है 'वर्णाश्रम धर्म ' है उस धर्म की जब-जब हानि होती है, और अधर्म का अभ्युत्थान अर्थात् उन्नति होती है, तब-तब ही मैं माया से अपने स्वरूप को रचता हूँ। 'यदा यदा हि धर्मस्य' का अर्थ हुआ की निर्गुण ब्रह्म के सगुण ईश्वर के रूप अवतार लेती हैं!]
एक बार अमेरिका में स्वामी विवेकानन्द से पूछा गया कि - " ईसा का पुनरागमन कब होगा ?" उत्तर में उन्होंने कहा " मैं ऐसी बातों पर विशेष ध्यान नहीं देता। मुझे तो (सनातन) सिद्धान्तों -का विवेचन करना है। मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि - ईश्वर बार बार आता है वह भारत में राम , कृष्ण और बुद्ध के रूप में आया था और पुनः आयेगा ! (नहीं ,श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हो चुका है।) यह देखा जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्षों के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, (धर्म का पतन होता है), और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है।
समस्त संसार में एक बड़ा परिवर्तन होनेवाला है और यह एक चक्र जैसा है। लोग अनुभव करते हैं कि जीवन पकड़ से बाहर होता जा रहा है। वे किधर जायेंगे ? वे किधर जायेंगे ? नीचे या ऊपर ? निस्सन्देह, ऊपर। नीचे कैसे ?खाई में कूद पड़ो। उसे अपने शरीर से , जीवन से पाट दो। जब तक तुम जीवित हो , दुनिया को नीचे क्यों जाने दो ? (१०/४०)
" अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डाल दो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरन्तर एक हैं, गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में वे निरन्तर भिन्न हैं। ब्रह्म (आत्मा) ईश्वर तथा मनुष्य (चित्त) दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं , परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर अनन्त स्वामी हैं और हम शाश्वत सेवक हैं। [ दूसरे शब्दों में आत्मा, ब्रह्म या उनकी माया शक्ति ही ईश्वर और मनुष्य (स्थूल और सूक्ष्म शरीर) दोनों का कारण-शरीर है !!]
[When Will Christ Come Again? I never take much notice of these things. I have come to deal with principles. I have only to preach that God comes again and again, and that He came in India as Krishna, Rama, and Buddha, and that He will come again. It can almost be demonstrated that after each 500 years the world sinks, and a tremendous spiritual wave comes, and on the top of the wave is a Christ.
There is a great change now coming all over the world, and this is a cycle. Men are finding that they are losing hold of life; which way will they turn, down or up? Up, certainly. How can it be down? Plunge into the breach; fill up the breach with your body, your life. How should you allow the world to go down when you are living? [Volume 8, Notes Of Class Talks And Lectures/ 180 -181]} (There is much difference in manifested beings. As a manifested being you will never be Christ. Out of clay, manufacture a clay elephant, out of the same clay, manufacture a clay mouse. Soak them in water, they become one. As clay, they are eternally one; as fashioned things, they are eternally different. The Absolute is the material of both God and man. As Absolute, Omnipresent Being, we are all one; and as personal beings, God is the eternal master, and we are the eternal servants.)
"When I think I am the mind, I am one spark of that eternal fire which Thou art; and when I feel that I am the spirit, Thou and I are one"-- so says a devotee to the Lord. Is the mind in advance of the spirit? (Volume 8- page 181) ]
देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक
आत्मबुद्धया त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥
देह-बुद्धि से (मूढ़बुद्धि या सम्मोहित बुद्धि) तो मैं दास हूँ, जीव-बुद्धि से आपका अंश ही हूँ और आत्म-बुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ यह प्रभु श्रीराम के महान भक्त हनुमानजी का कथन है। ॐ !
और अपने 'Real I' सत्यस्वरुप, आत्मा या ईश्वर से जुड़ जाने की पद्धति को ही गीता में योग कहा गया है। श्रीमद्भवत गीता में कुल 18 अध्याय हैं और वहां 700 श्लोकों में मूढ़ बुद्धि (सम्मोहित बुद्धि- जो अपने को M/F मानकर नश्वर शरीर आदम और हव्वा समझ रही है, उस सम्मोहित बुद्धि) को शुद्धबुद्धि बनाकर अविनाशी आत्मा से सम्बन्ध बनाने, या बुद्धि को आत्मा से जोड़ने की पद्धति को 18 प्रकार के योग का नाम दिया गया है।
स्वामी विवेकानन्द ने भगवत गीता में वर्णित 18 प्रकार के योग को 4 योगों में विभक्त करके उन्हें "कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान" योग नाम देकर, उन सभी योग-मार्गों पर अपनी व्याख्या लिखी हैं। 4 योगों पर अपनी व्याख्या लिखने के बाद गीता, उपनिषदों और समस्त वैदिक सनातन धर्म में समाहित उपदेशों के निचोड़ को प्रस्तुत करते हुए स्वामी विवेकानन्द "मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने के उपाय " पर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखते हैं- (https://patanjaliyogasutra.in/sadhana-pada-2-25/)
तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्।।
25. There being absence of that (ignorance) there is absence of junction, which is the thing-to-be avoided; that is the independence of the seer.
According to Yoga philosophy, it is through ignorance that the soul has been joined with nature. The aim is to get rid of nature's control over us. That is the goal of all religions. Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this Divinity within, by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy — by one or more or all of these — and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details. The Yogi tries to reach this goal through psychic control. Until we can free ourselves from nature, we are slaves; as she dictates so we must go. The Yogi claims that he who controls mind controls matter also. The internal nature is much higher than the external and much more difficult to grapple with, much more difficult to control. Therefore he who has conquered the internal nature controls the whole universe; it becomes his servant. Raja-Yoga propounds the methods of gaining this control. Forces higher than we know in physical nature will have to be subdued. This body is just the external crust of the mind. They are not two different things; they are just as the oyster and its shell. They are but two aspects of one thing; the internal substance of the oyster takes up matter from outside, and manufactures the shell. In the same way the internal fine forces which are called mind take up gross matter from outside, and from that manufacture this external shell, the body. If, then, we have control of the internal, it is very easy to have control of the external. Then again, these forces are not different. It is not that some forces are physical, and some mental; the physical forces are but the gross manifestations of the fine forces, just as the physical world is but the gross manifestation of the fine world.]
भवरोग क्या है ?भवरोग की व्याख्याकरते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -
[तत् - उस (अविद्या के), अभावत् - अभाव से, संयोग - आत्मा का (प्रकृति) मूढ़ बुद्धि के साथ संयोग का अभावः -मूढ़बुद्धि यानि वह बुद्धि जो M/F स्थूल शरीर, इन्द्रिय, मन (Apparent I) को, देहाध्यास को मैं समझती थी और भ्रमित बुद्धि थी उसका अभाव (हो जाता है, यही), हानम् - हान (अज्ञान का परित्याग है, और) तत् - वही, दृशे: - द्रष्टा (चेतन आत्मा का) , कैवल्यम् - 'कैवल्य' अर्थात् मोक्ष है ।]
तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥
(पतंजलि योगसूत्र -साधनपाद-25 )
" योगशास्त्र के मतानुसार,आत्मा 'अज्ञान' के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है। इस 'प्रकृति' के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। उस अज्ञान का अभाव (अविद्या का अभाव) होते ही, पुरुष-प्रकृति के संयोग का अभाव हो जाता है।(अर्थात आत्मा का मूढ़ बुद्धि के साथ संयोग 'junction-गाँठ, चिज्जड़ग्रंथि का अभाव) हो जाता है, यही 'हान' यानि अज्ञान (अविद्या) का परित्याग है, और वही द्रष्टा चेतन आत्मा(साक्षी)का 'कैवल्य' अर्थात् मोक्ष है ।
⚜️️🔱"योगशास्त्र के मतानुसार,आत्मा 'अज्ञान' के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है।"
["According to Yoga philosophy, it is through ignorance that the soul has been joined with nature. "
अर्थात योगशास्त्र के मतानुसार अर्थात हिन्दू वैदिक सनातन धर्म या उपनिषदों के ऋषियों के मतानुसार हमारी अपरिवर्तनशील, अविनाशी, कूटस्थ, यथार्थ सत्ता-आत्मा(Real I,एकमेवा-द्वितीय ब्रह्म, ईश्वर या राम') ने 'अज्ञान' के कारण (अविद्या, अस्मिता,राग-द्वेष,अभिनिवेश के कारण या 'महाअद्भुतं अनिर्वचनीयंमाया मरीचिका'-भ्रम के कारण) या जन्म-जन्म से चले आ रहे देहध्यास के कारण अपना सम्बन्ध परिवर्तनशील नश्वर शरीर (Apparent I)याप्रकृति के साथ बना लिया है, और यही है भवरोग।]
⚜️️🔱इस 'प्रकृति' (Apparent I) के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है।
"The aim is to get rid of nature's control over us."
[यानि 3H में सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद अज्ञान के कारण (नादानी के कारण) आत्मा ने अपना सम्बन्ध खुद को (Apparent I' M/F) 'आदम और हव्वा'-समझने वाली सम्मोहित या मूढ़-बुद्धि के साथ बना लिया है।the soul has been joined with nature. ज्ञानस्वरूप अविनाशी आत्मा' ने अज्ञान (माया-मरीचिका) के कारण स्वयं को नश्वर देह (M/F) समझने वाली या 'सम्मोहित बुद्धि' के साथ 'Love Marriage' कर लिया है ! उस देहभाव (M/F) से सम्मोहित बुद्धि यामूढ़बुद्धि के साथ, Living Relation में रह रहे, आत्मा का सम्बन्ध -विच्छेद करने या छुटकारा पाने के लिए निरंतर नित्यानित्य विवेक-प्रयोग करने की पद्धति सीखना और उसका लक्ष्य प्राप्त होने तक अध्यवसाय पूर्वक अभ्यास करते रहना ही हमारा मुख्य उद्देश्य है।
⚜️️🔱यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है।
"That is the goal of all religions." अर्थातयही सारे धर्मो का (शास्त्रों का और गुरुओं का) यानि विवेकानन्द की मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा - 'Be and Make' तुम स्वयं 'विवेकी मनुष्य बनो और दूसरों को विवेकी मनुष्य' बनाने में सहायता करो में निहित 'चरैवेति, चरैवेति' अभियान का एकमात्र लक्ष्य है।
⚜️️🔱Conclusion : तो निष्कर्ष क्या निकला ?
" प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ।बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"
("Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this Divinity within, by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy — by one or more or all of these — and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details.")
योगी 'मनःसंयोग' (psychic control) के द्वारा इस चरम लक्ष्य में पहुँचने का प्रयत्न करते हैं।जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना (आत्मा का) उद्धार नहीं कर लेते तब तक हम गुलाम हैं ; प्रकृतिजैसा कहती है, हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते है। इसलिए जो अन्तःप्रकृति को वशीभूत कर सकते हैं (आत्मा की शक्ति से अन्तः प्रकृति मन और मूढ़बुद्धि को वशीभूत कर सकते हैं, सारा जगत (M/F देह-इन्द्रिय) उनके वशीभूत हो जाता है। वह उनका दास हो जाता है। राजयोग , प्रकृति को इस तरह वश में लाने का उपाय दिखला देता है। ....यह यह शरीर मन काएक बाहरी परत (crust छिलका) मात्र है। शरीर और मन दो अलग अलग वस्तुएं नहीं हैं, वे तो सीप (oyster-घोंघा) और उसके खोल (shell) के समान हैं। वे एक ही वस्तु की दो विभिन्न अवस्थायें हैं।सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। उसी प्रकार मन नामक यह आंतरिक सूक्ष्म -शक्ति समूह (अन्तःकरण) भी बाहर से स्थूल पंचभूत (आकाश,वायु , अग्नि, जल और पृथ्वी) को लेकर उससे इस शरीर रूपी ऊपरी खोल को तैयार कर रहा है। अतः हम यदि अन्तर्जगत पर विजय प्राप्त कर सकें, तो बाह्य जगत को जितना फिर बड़ा आसान हो जायेगा। फिर ये दो शक्तियाँ अलग अलग नहीं हैं !ऐसी बात नहीं है कि कुछ शक्तियाँ भौतिक हैं , और कुछ मानसिक। जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत सूक्ष्म जगत की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है,उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्तियों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है।
[conclusion : निष्कर्ष पर आते हुए 'भारत के राष्ट्रीय युवा' -आदर्श, आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्यस्वामी विवेकानन्द कहते हैं -
तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पदार्थ की तीन अवस्थायें होती हैं -बर्फ , पानी और भाफ , ठोस-द्रव और गैस। वैसे ही मनुष्य के तीन प्रमुख अवयव- '3H' के देह (Hand) , मन (Head) और आत्मा (Heart:समानुभूति या चेतना) को उलट कर समझें- तो आसानी से समझ सकते हैं कि मनुष्य का स्थूल शरीर, (Hand-M/F देह-इन्द्रियों) तथा मन (Head-सूक्ष्म शरीर, अन्तःकरण) भी आत्मा (Heart, ह्रदय -शुद्धबुद्धि, कारणशरीर) की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है। जीव, जगत और आत्मा या मूढ़बुद्धि और शुद्धबुद्धि(नित्य-अनित्यविवेक-सम्पन्न बुद्धि)अलग -अलग नहीं हैं, एक ही बुद्धि की दो अवस्थायें (E=Mc2) हैं। If, then, we have control of the internal, it is very easy to have control of the external.]
स्वामीजी और ठाकुर दोनों अक्सर सिंह-शावक (आत्मा) के खुद को भेंड़ (नश्वर शरीर-Apparent I) समझने की मूढ़बुद्धि का उदाहरण देते थे। कि कैसे हमलोग सिंह-शावक होकर भी भेंड़ों की तरह घाँस चरते हैं , (अर्थात विवेकी मनुष्य होकर भी मूढ़बुद्धि की गुलामी करते हैं) और बाघ से तो क्या गड़रिया से भीडरते हैं।
विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से।
जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।।
यह मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। और यम से (मृत्यु के भय से) डरता रहता है। ये 'शुद्ध बुद्धि' बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रियों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती।
स्वामी विवेकानन्द अपने गुरुभाई स्वामी अखण्डानन्द को , 13 नवंबर, 1895 को लिखित एक पत्र में कहते हैं - " जबरदस्त उत्साह, अदम्य साहस , अद्भुत ऊर्जा , और सर्वोपरि गुरु (युवा आदर्श स्वामी विवेकानन्द) की आज्ञा का पालनयही वे गुण हैं, जो किसी व्यक्ति या राष्ट्र को महान बना सकते हैं !" (४/३६०)
" Great enterprise, boundless courage, tremendous energy, and, above all, perfect obedience — these are the only traits that lead to individual and national regeneration. "
स्वामी विवेकानंद जयंती (Swami Vivekananda Jayanti) :
>>>युवाओं में देश का शक्तिपुंज देखने वाले संत थे स्वामी विवेकानंद।
आज के युवा समाज को जिसमें देश का भविष्य निहित है और जिसमें जागरण के चिन्ह दिखाई दे रहे हैं। आज के युवाओं को अपने जीवन का एक उद्देश्य (गौण उद्देश्य और चरम उद्देश्य) ढूंढ़ लेना चाहिए।
युवा शक्ति को राष्ट्र की सबसे बड़ी धरोहर मानने वाले शायद भारत के पहले संत थे स्वामी विवेकानंद। उनका कहना था कि आज के युवा समाज को, जिसमें देश का भविष्य निहित है और जिसमें जागरण के चिन्ह दिखाई दे रहे हैं, उन्हें अपने जीवन का एक उद्देश्य ढूंढ़ लेना चाहिए। हमें ऐसे प्रयास करना चाहिए जिससे हमारे अंदर की जगी हुई प्रेरणा और उत्साह सही मार्ग पर चले। नहीं तो युवा शक्ति का अपव्यय और दुरुपयोग हो सकता है। युवा शक्ति को उठकर जागना होगा और राष्ट्र कल्याण के लिए संघर्ष करना होगा। तभी भारत का कल्याण संभव है।
स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए आज भी एक प्रेरणा के स्रोत हैं। उन्होंने आज से 150 वर्ष पहले ऐसी बातें कही थीं जो आज भी प्रासंगिक हैं। युवा जागृति के लिए उन्होंने एक मूल मंत्र दिया था, उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाए। उनके इस संदेश में गौर करने की बात है कि स्वामी विवेकानंद ने पहले उठने का संदेश दिया है। इसके बाद फिर जागने का, इसका अर्थ है कि हमें जीत के लिए पहले खुद प्रयत्न करना होगा। इसके बाद ही जाग कर समस्या के उपाय खोजने होंगे।
उन्होंने युवाओं को ललकारते हुए कहा था-YOU ARE THE CREATOR OF YOUR OWN DESTINY. कि हर युवा के हाथों में उसका भविष्य है। उन्हें अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ना होगा।
स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि 'गतस्य शोचना नास्ति- सारा भविष्य तुम्हारे सामने पड़ा हुआ है।' तुम सदैव ये बात स्मरण रखो की तुम्हारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक कार्य संचित रहेगा। जिस प्रकार तुम्हारे असत विचार और असत कार्य तुम्हारे सामने कूद पड़ने को तैयार हैं। उसी प्रकार तुम्हारे सद्कार्य और सद्विचार हजारों देवी-देवता की शक्ति लेकर सर्वदा तुम्हारी रक्षा के लिए तैयार हैं।
एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान (मनःसंयम)
स्वामी जी ने बताया था कि पढ़ने के लिए युवाओं में एकाग्रता जरूरी है। एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। विवेकानंद खुद भी प्रतिदिन ध्यान करते थे। वो कहते थे कि ध्यान के बल से ही वो जो कुछ भी एक बार पढ़ते हैं उसे याद रख पाते हैं। इसके साथ ही वो शिक्षा को एक अलग आयाम से देखते थे। उन्होंने कहा कि जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जो मनुष्य में चरित्र बल, परहित भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है। जिस शिक्षा के द्वारा मनुष्य जीवन में आदर्श के साथ अपने पैरों पर खड़ा रह सके वो शिक्षा है।
[प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति (पातंजल अष्टांग योग दर्शन) के अनुसार मन की शक्ति को विकसित करने हेतु एकाग्रता अनिवार्य है और एकाग्रता के लिए जरुरी है- 'ध्यान' अर्थात 'मनःसंयोग'।इस मनःसंयम के 8 चरण इस प्रकार हैं :यम-नियम -आसन -प्राणायाम -प्रत्याहार -धारणा -ध्यान और समाधि। इसमें से विद्यार्थियों के लिए 5 चरणों का अभ्यास यथेष्ट है। यम और नियम का अभ्यास 24 X 7 तथा आसन-प्रत्याहार -धारणा का अभ्यास दिन भर में 2 बार -प्रातः और संध्या में। प्राणायाम-ध्यान और समाधि को केवल पुस्तक पढ़कर ही नहीं किसी अनुभवी योगाचार्य से ही सीखना जरुरी है।
धर्म -अर्थात 'सेवाधर्म' का पहला साधन शरीर ही है
विवेकानंद का खेल से विशेष प्रेम था। उनका मानना था कि खेल से शरीर को बल मिलता है। शरीर में शक्ति का प्रवाह को हमेशा सही दिशा देने की जरूरत हैं। उन्होंने कहा था कि यह बड़ा सत्य है कि बल ही जीवन है और दुर्बलता मरण। बल ही अन्नत सुख है। वो हर युवक को एक बात जरूर कहते थे कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है। दूसरों की शिव-ज्ञान से जीव सेवा ही ईश्वर की सेवा है। समाज में उन्होंने लोगों को हमेशा दूसरों की सेवा के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि परहित सेवा ही ईश्वर की सेवा है। दूसरों के प्रति हमारा कर्तव्य है कि सहायता और संसार का भला करना। कई लोग ये पूछते हैं कि वो संसार का भला क्यों करें?ऐसे में मैं उनसे कहना चाहता हूं कि ये देखने में लगता है कि हम संसार का उपकार कर रहे हैं। मगर असल में हम हमारा ही उपकार करते हैं।ये (सेवाधर्म) हमें पवित्र और पूर्ण (चरित्रवान मनुष्य) होने का अवसर देता है। स्वामी विवेकानंद के द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन में आज भी इस बात का अनुशरण किया जाता है।
स्वामी विवेकानंद की कुछ प्रमुख उक्तियां
1.उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तुम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।
2.ज्ञान (आत्मज्ञान) स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।
3.जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
4.पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं।
5.लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहात आज हो या युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
6.जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिए, नहीं तो लोगों का विश्वास उठ जाता है।
7.जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
8.एक समय में एक काम करो , और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ। जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी।
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विवेक-जीवन ब्लॉग : September 12, 2012 🔱🔆🙏युवा समस्या और स्वामी विवेकानन्द का मार्गदर्शन 🔱🔆🙏'मनुष्य बनने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है !' (যুব সমস্যা ও স্বামী বিবেকানন্দ) 🔱🔆🙏 [ SVHS- 3.4 स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : खण्ड 3 -स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ]*
[Kali is none other than Brahman. That which is called Brahman is really Kali. she is the primal energy .Whem that energy remains inactive , I call it brahman , and when it creates, preserves or destroys , I call it shakti or Kali . What you call Brahman I call Kali ."
Sri Ramkrishna ~ जम्मू RKM 7.12.2025]
ठाकुर देव का अद्वैत सिद्धान्त - "काली (ब्रह्म) सत्यं जगत मिथ्या !"
[ (19 अक्टूबर, 1884) श्रीरामकृष्ण वचनामृत-9 ]
श्रीरामकृष्ण - जो ब्रह्म है, वही काली भी हैं । जब निष्क्रिय हैं, तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं । जब सृष्टि, स्थिति, प्रलय, यह सब काम करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं। स्थिर (निश्चल-Still) जल से ब्रह्म की उपमा हो सकती है । वही पानी जब हिलता-डुलता है (The same water, moving in waves),तब वह शक्ति की - काली की उपमा है।
MASTER: "That which is Brahman is also Kali, the Mother, the Primal Energy. When inactive It is called Brahman. Again, when creating, preserving, and destroying, It is called Sakti. Still water is an illustration of Brahman. The same water, moving in waves, may be compared to Sakti, Kali.
[শ্রীরামকৃষ্ণ — যিনি ব্রহ্ম, তিনি কালী (মা আদ্যাশক্তি)। যখন নিষ্ক্রিয়, তাঁকে ব্রহ্ম বলে কই। যখন সৃষ্টি, স্থিতি, প্রলয় — এই সব কাজ করেন, তাঁকে শক্তি বলে কই।স্থির জল ব্রহ্মের উপমা। জল হেলচে দুলচে, শক্তি বা কালীর উপমা।
[ঈশ্বরই বস্তু আর সব অবস্তু। তাঁকে লাভ হলে আবার বোধ হয়, তিনিই কর্তা আমরা অকর্তা। (15 जून ,1884) श्रीरामकृष्ण वचनामृत](6) ⚜️️🔱जीवन का उद्देश्य - कर्म अथवा ईश्वरलाभ ? ⚜️️🔱 " ঈশ্বরই বস্তু আর সব অবস্তু। "एकमात्र ईश्वर वस्तु है, और सब अवस्तु ।God alone is real and all else unreal.
P.M. Modi Wonderful Interview with Rajat Sharma - Sunday 7-12-2025 / Work of Swami Vivekananda and Maharshi Arvind till 2047
"मैं दीया हूँ,मेरी दुश्मनी अंधेरे से है।
हवा तो बेवजह ही मेरे ख़िलाफ़ है !
हवा से कह दो- कि खुद को आज़मा के दिखाए;
बहुत चिराग बुझाती है, एक जला के दिखाए ! "
আমার চেতনা চৈতন্য করে দে মা চৈতন্যময়ী /Amar Chetana Chaitanya Kore | Devotional Songs | Pannalal Bhattacharya | Audio
अद्वैत तत्व श्रीरामकृष्ण देव की प्रार्थना -
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके |
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ||
(ॐ सर्व मंगल मांगल्ये= सभी मंगलों में मंगलमयी/ शिवे= कल्याणकारी/ सर्व अर्थ साधिके= सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाली/ शरण्ये = शरणागत वत्सला , शरण ग्रहण करने योग्य/ त्रयम्बके= तीन नेत्रों वाली/ गौरी= शिव पत्नी/ नारायणी= विष्णु की पत्नी/ नमः अस्तु ते = तुम्हे नमस्कार हैं। )
सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी, कल्याण करने वाली, सब के मनोरथ को पूरा करने वाली, तुम्हीं शरण ग्रहण करने योग्य हो, तीन नेत्रों वाली यानी भूत भविष्य वर्तमान को प्रत्यक्ष देखने वाली हो, तुम्ही शिव पत्नी, तुम्ही नारायण पत्नी अर्थात भगवान के सभी स्वरूपों के साथ तुम्हीं जुडी हो,आप को नमस्कार है।
[साभार ૐ~Sri Lalita Tripura Sundari~ૐ's post]
- विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्धाटयत " इसे पढने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो व्यासदेव हजारों साल पहले जान चुके थे, कि 'नित्य-अनित्य विवेक' ही सभी के ह्रदय में विद्यमान अन्तर्यामी गुरु है ! तथा एक दिन (१२ जनवरी १८६३) को वे स्वयं ही स्वामी विवेकानन्द के रूप में आविर्भूत होंगे; तब उनके मूर्त रूप पर मन को धारण करने से ही ' विवेक-स्रोत ' उदघाटित हो जायेगा !(विवेक-जीवन ब्लॉग : Monday, January 17, 2011/ विवेकानन्द का दर्शन करने के अभ्यास से - ' विवेक स्रोत ' उदघाटित होता है !)
{ तो निष्कर्ष रूप से ' ब्रह्म और जगत'[सत्यम और मिथ्या या "Equation between The Absolute and Manifestation "(अभिव्यक्ति)'परमसत्ता और स्वरुप- प्रकाश' या ब्रह्म और शक्ति के बीच समीकरण क्या निकला ? इस 'ब्रह्म और जगत' के बीच समीकरण के बारे में हमारे ऋषि या उपनिषद क्या कहते हैं, यह उन्हीं की वाणी में समझना अत्यंत आवश्यक है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
(-वृहदारण्यक उपनिषद/ ईशावास्योपनिषद)
अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम (अवतार वरिष्ठ) से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। [अनंत -अनंत = अनंत / coordinate geometry/अर्थात जगत ब्रह्म का परिणाम नहीं विवर्त है।
यह जगत सत्य जैसा विद्यमान या प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म के समान शाश्वत और पूर्ण (The Absolute-परम सत्य) नहीं है। यह जगत-ब्रह्माण्ड एक मिथ्या वस्तु का वास्तविक जैसा अनुभव है, पर अंतिम सत्य नहीं, जैसे रस्सी को साँप समझना। या मृगमरीचिका में जल का एक बून्द भी न होना। अथवा सिनेमा के पर्दे पर चल रहे महाभारत फिल्म के श्रीकृष्ण और अर्जुन को हाथ से पकड़ने की कोशिश !
इस कथन के मुख्य बिन्दु : Key points of this statement:
1. ब्रह्म सत्यं: ब्रह्म ही एकमात्र परम, शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्य है। जगत मिथ्या/विवर्त: जगत सत्य (पूर्ण) नहीं है, बल्कि एक आभास (मिथ्या या विवर्त) है। यह ब्रह्म से उत्पन्न होता है, लेकिन ब्रह्म जैसा पूर्ण और नित्य नहीं है।
2.माया का सिद्धांत: जगत माया के कारण ब्रह्म पर आरोपित होता है। यह दिखता है, महसूस होता है, पर इसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है; यह ब्रह्म के अधीन है।
3. विवर्त का अर्थ: 'विवर्त' का मतलब होता है जहाँ कोई वस्तु किसी और वस्तु के रूप में दिखाई दे, जबकि वह वास्तव में वह न हो (जैसे सोने के गहने सोने के ही होते हैं, पर दिखते अलग-अलग हैं, वैसे ही जगत ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है, पर पूर्ण ब्रह्म नहीं)।
4. निष्कर्ष: यह कथन हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारा यह संसार, जिसमें हम रहते हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है। यह जगत ईश्वर (आत्मा, ब्रह्म) की ही एक अभिव्यक्ति है, जिसे हम अपनी अज्ञानता (अविद्या-अस्मिता M/F देहाध्यास -राग-द्वेष -अभिनिवेश) के कारण अलग-अलग और 'मिथ्या' (अस्थायी या मायावी) समझते हैं, लेकिन ज्ञान (आत्मज्ञान) होने पर यह बोध होता है कि सब कुछ एक ही परम तत्व (आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर) का प्रकटीकरण है ]
[(यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का लोप हो जाता है । इसीलिए इसको मिथ्या कहा जाता है। यह रस्सी को सांप समझने जैसीभ्रांति के समान है,मृगमरीचिका के समान है, जहाँ सत्य से परे कुछ और दिखाई देता है। इसीलिए सन्त तुलसी दास जी कहते हैं -* गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥ भावार्थ : इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥2॥ (अरण्यकाण्ड)]
(जैसे पर्दे पर गंगा नदी बह रही है , किन्तु हम उससे एक ग्लास पानी भी नहीं ले सकते !) (जो स्त्री-पुरुष की भेद-दृष्टि से परे 'मनुष्य (माँ) बनना और बनाना ' चाहते हों, उनके लिए)
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- विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्धाटयत " इसे पढने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो व्यासदेव हजारों साल पहले जान चुके थे, कि 'नित्य-अनित्य विवेक' ही सभी के ह्रदय में विद्यमान अन्तर्यामी गुरु है ! तथा एक दिन (१२ जनवरी १८६३) को वे स्वयं ही स्वामी विवेकानन्द के रूप में आविर्भूत होंगे; तब उनके मूर्त रूप पर मन को धारण करने से ही ' विवेक-स्रोत ' उदघाटित हो जायेगा !(विवेक-जीवन ब्लॉग : Monday, January 17, 2011/ विवेकानन्द का दर्शन करने के अभ्यास से - ' विवेक स्रोत ' उदघाटित होता है !)
{ तो निष्कर्ष रूप से ' ब्रह्म और जगत'[सत्यम और मिथ्या या "Equation between The Absolute and Manifestation "(अभिव्यक्ति)'परमसत्ता और स्वरुप- प्रकाश' या ब्रह्म और शक्ति के बीच समीकरण क्या निकला ? इस 'ब्रह्म और जगत' के बीच समीकरण के बारे में हमारे ऋषि या उपनिषद क्या कहते हैं, यह उन्हीं की वाणी में समझना अत्यंत आवश्यक है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
(-वृहदारण्यक उपनिषद/ ईशावास्योपनिषद)
अर्थ : अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम (अवतार वरिष्ठ) से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। [अनंत -अनंत = अनंत / coordinate geometry/अर्थात जगत ब्रह्म का परिणाम नहीं विवर्त है।
यह जगत सत्य जैसा विद्यमान या प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म के समान शाश्वत और पूर्ण (The Absolute-परम सत्य) नहीं है। यह जगत-ब्रह्माण्ड एक मिथ्या वस्तु का वास्तविक जैसा अनुभव है, पर अंतिम सत्य नहीं, जैसे रस्सी को साँप समझना। या मृगमरीचिका में जल का एक बून्द भी न होना। अथवा सिनेमा के पर्दे पर चल रहे महाभारत फिल्म के श्रीकृष्ण और अर्जुन को हाथ से पकड़ने की कोशिश !
इस कथन के मुख्य बिन्दु : Key points of this statement:
1. ब्रह्म सत्यं: ब्रह्म ही एकमात्र परम, शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्य है। जगत मिथ्या/विवर्त: जगत सत्य (पूर्ण) नहीं है, बल्कि एक आभास (मिथ्या या विवर्त) है। यह ब्रह्म से उत्पन्न होता है, लेकिन ब्रह्म जैसा पूर्ण और नित्य नहीं है।
2.माया का सिद्धांत: जगत माया के कारण ब्रह्म पर आरोपित होता है। यह दिखता है, महसूस होता है, पर इसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है; यह ब्रह्म के अधीन है।
3. विवर्त का अर्थ: 'विवर्त' का मतलब होता है जहाँ कोई वस्तु किसी और वस्तु के रूप में दिखाई दे, जबकि वह वास्तव में वह न हो (जैसे सोने के गहने सोने के ही होते हैं, पर दिखते अलग-अलग हैं, वैसे ही जगत ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है, पर पूर्ण ब्रह्म नहीं)।
4. निष्कर्ष: यह कथन हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारा यह संसार, जिसमें हम रहते हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है। यह जगत ईश्वर (आत्मा, ब्रह्म) की ही एक अभिव्यक्ति है, जिसे हम अपनी अज्ञानता (अविद्या-अस्मिता M/F देहाध्यास -राग-द्वेष -अभिनिवेश) के कारण अलग-अलग और 'मिथ्या' (अस्थायी या मायावी) समझते हैं, लेकिन ज्ञान (आत्मज्ञान) होने पर यह बोध होता है कि सब कुछ एक ही परम तत्व (आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर) का प्रकटीकरण है ]
[(यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का लोप हो जाता है । इसीलिए इसको मिथ्या कहा जाता है। यह रस्सी को सांप समझने जैसीभ्रांति के समान है,मृगमरीचिका के समान है, जहाँ सत्य से परे कुछ और दिखाई देता है। इसीलिए सन्त तुलसी दास जी कहते हैं -* गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥ भावार्थ : इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥2॥ (अरण्यकाण्ड)]
(जैसे पर्दे पर गंगा नदी बह रही है , किन्तु हम उससे एक ग्लास पानी भी नहीं ले सकते !) (जो स्त्री-पुरुष की भेद-दृष्टि से परे 'मनुष्य (माँ) बनना और बनाना ' चाहते हों, उनके लिए)
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Sri Sarada Devi
(1853 - 1920)
Endearingly known as ‘Holy Mother’, Sri Sarada Devi, the spiritual consort of Sri Ramakrishna, was born on 22 December 1853 in a poor Brahmin family in Jayrambati, a village adjoining Kamarpukur in West Bengal. Her father, Ramachandra Mukhopadhyay, was a pious and kind-hearted person, and her mother, Shyama Sundari Devi, was a loving and hard-working woman.
Marriage
As a child Sarada was devoted to God, and spent most of her time helping her mother in various household chores like caring for younger children, looking after cattle and carrying food to her father and others engaged in work in the field. She had no formal schooling, but managed to learn the Bengali alphabet. When she was about six years old, she was married to Sri Ramakrishna, according to the custom prevalent in India in those days. However, after the event, she continued to live with her parents, while Sri Ramakrishna lived a God-intoxicated life at Dakshineshwar.
Visit to Dakshineshwar
At the age of eighteen she walked all the way to Dakshineshwar to meet her husband. Sri Ramakrishna, who had immersed himself in the intense practice of several spiritual disciplines for more than twelve years, had reached the highest state of realization in which he saw God in all beings. He received Sarada Devi with great affection, and allowed her to stay with him. He taught her how to lead a spiritual life while discharging her household duties. They led absolutely pure lives, and Sarada Devi served Sri Ramakrishna as his devoted wife and disciple, while remaining a virgin nun and following the spiritual path.
Life at Dakshineshwar
Sri Ramakrishna looked upon Sarada Devi as a special manifestation of Divine Mother of the universe. In 1872, on the night of the Phala-harini-Kali-puja, he ritualistically worshipped Sarada Devi as the Divine Mother, thereby awakening universal Motherhood latent in her. When disciples began to gather around Sri Ramakrishna, Sarada Devi learned to look upon them as her own children. The room in which she stayed at Dakshineshwar was too small to live in and had hardly any amenities; and on many days she did not get the opportunity of meeting Sri Ramakrishna. But she bore all difficulties silently and lived in contentment and peace, serving the increasing number of devotees who came to see Sri Ramakrishna.
Worship by Sri Ramakrishna
In 1872, his wife Sarada, now nineteen years old, came from the village to meet him. He received her cordially, and taught her how to attend to household duties and at the same time lead an intensely spiritual life. One night he worshipped her as the Divine Mother in his room at the Dakshineswar temple. Although Sarada continued to stay with him, they lived immaculately pure lives, and their marital relationship was purely spiritual. It should be mentioned here that Sri Ramakrishna had been ordained a Sannyasin (Hindu monk), and he observed the basic vows of a monk to perfection. But outwardly he lived like a lay man, humble, loving and with childlike simplicity. During Sri Ramakrishna’s stay at Dakshineswar, Rani Rasmani first acted as his patron. After her death, her son-in-law Mathur Nath Biswas took care of his needs.
Leading the Sangha after the Master’s Passing
After Sri Ramakrishna’s passing away in 1886, Sarada Devi spent some months in pilgrimage, and then went to Kamarpukur where she lived in great privation. Coming to know of this, the disciples of Sri Ramakrishna brought her to Kolkata. This marked a turning point in her life. She now began to accept spiritual seekers as her disciples, and became the open portal to immortality for hundreds of people. Her great universal mother-heart, endowed with boundless love and compassion, embraced all people without any distinction, including many who had lived sinful lives.
When the Western women disciples of Swami Vivekananda came to Kolkata, the Holy Mother accepted them with open arms as her daughters, ignoring the restrictions of the orthodox society of those days. Although she had grown up in a conservative rural society without any access to modern education, she held progressive views, and whole-heartedly supported Swami Vivekananda in his plans for rejuvenation of India and the uplift of the masses and women. She was closely associated with the school for girls started by Sister Nivedita.
She spent her life partly in Kolkata and partly in her native village Jayrambati. During the early years of her stay in Kolkata, her needs were looked after by Swami Yogananda, a disciple of Sri Ramakrishna. In later years her needs were looked after by another disciple of Sri Ramakrishna, Swami Saradananda, who built a new house for her in Kolkata.
Simplicity and Forbearance
Although she was highly venerated for her spiritual status, and literally worshipped as the Divine Mother, she continued to live like a simple village mother, washing clothes, sweeping the floor, bringing water from the pond, dressing vegetables, cooking and serving food. At Jayrambati she lived with her brothers and their families. They gave her endless troubles but, established as she was in the awareness of God and in Divine Motherhood, she always remained calm and self-possessed, showering love and blessings on all who came into contact with her. As Sister Nivedita stated, “Her life was one long stillness of prayer.”
Mother of All
In the history of humanity there has never been another woman who looked upon herself as the Mother of all beings, including animals and birds, and spent her whole life in serving them as her children, undergoing unending sacrifice and self-denial. About her role in the mission of Sri Ramakrishna on earth, she stated: “My son, you know the Master had a maternal attitude (matri-bhava) towards every one. He has left me behind to manifest that Divine Motherhood in the world.”
Ideal Woman
On account of her immaculate purity, extraordinary forbearance, selfless service, unconditional love, wisdom and spiritual illumination, Swami Vivekananda regarded Sri Sarada Devi as the ideal for women in the modern age. He believed that with the advent of Holy Mother, the spiritual awakening of women in modern times had begun.
Last Days
Under the strain of constant physical work and self-denial and repeated attacks of malaria, her health deteriorated in the closing years of her life, and she left the mortal world on 21 July 1920.
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Ramakrishna Advaita Ashram, Varanasi
श्रीमाँ सारदा और श्रीश्रीकाली
अपने पिता के साथ दक्षिणेश्वर जाते समय (मार्च 1872) रास्ते में सारदा को तीव्र ज्वर ( तेज़ बुखार) हो गया और उन्हें राह की एक धर्मशाला में रुकना पड़ा। शारीरिक और मानसिक रूप से थकी वे लगभग अचेतन अवस्था में जब बिस्तर पर लेटी कि तभी उन्होंने देखा कि दैवी सौंदर्य से युक्त एक स्त्री ने उनके कमरे में प्रवेश किया और उनके निकट बैठ गयी। आगंतुक स्त्री का रंग माँ काली के समान ही गहरा काला था। जैसे ही उस स्त्री ने सारदा को सहलाया मानो सारा दर्द और पीड़ा रोम-कूपों से बहकर बाहर निकल गयी। उन्होंने आगंतुक स्त्री से पूछा कि वो कहाँ से आयी हैं ?
- दक्षिणेश्वर से , उत्तर मिला। तब सारदा ने आश्चर्यपूर्वक कहा - सच में ! मैं भी वहाँ जाना चाहती थी, उन्हें देखने, उनकी सेवा करने। पर लगता है दुर्भाग्यवश ऐसा नही हो सकेगा।
- आगंतुक स्त्री : ऐसा मत कहो। तुम निश्चित ही दक्षिणेश्वर जाओगी। तुम स्वस्थ हो जाओगी और उन्हें देखोगी। तुम्हारे लिए ही तो मैंने उन्हें वहाँ रखा है।
- सारदा : क्या यह सच है ? तुम कौन हो ? क्या हमारा कोई सम्बंध है ?
- आगंतुक स्त्री : मैं तुम्हारी बहन हूँ।
- सारदा : ऐसा है ? शायद इसीलिए तुम आयी हो।
- सारदा ने देखा कि उस अजनबी महिला के पैर मिट्टी से सने थे, जैसा कि वह बहुत चलकर आयी हो। और उन्होंने पूछा भी कि किसी ने उन्हें पैर धोने के लिए पानी नही दिया। अजनबी स्त्री ने कहा कि उसे तुरन्त ही जाना होगा और वो अदृश्य हो गयी।
जय श्रीश्रीकाली माई की जय
दक्षिणेश्वर में श्री सारदा मठ (Sri Sarada Math), रामकृष्ण मठ और मिशन (Ramakrishna Math and Mission) से जुड़ी एक महत्वपूर्ण महिला मठवासी संस्था है, जिसकी स्थापना 2 दिसंबर, 1954 को हुई थी, जिसका उद्देश्य रामकृष्ण दर्शन और श्री शारदा देवी के मातृत्व आदर्शों का प्रचार करना, शिक्षा, संस्कृति और परोपकार के माध्यम से सेवा करना है।
[সকলি তোমারি ইচ্ছা,ইচ্ছাময়ী তারা তুমি।তোমার কর্ম তুমি করমা লোকে বলে করি আমি।পঙ্কে বদ্ধ করাও করি,পঙ্গুরে লঙ্ঘাও গিরি কারে দাও মা ব্রহ্মপদ,কারে কর অধোগামী ।আমি যন্ত্র , তুমি যন্ত্রী ,আমি ঘর , তুমি ঘরণী। আমি রথ , তুমি রথী , যেমন চালাও তেমনি চলি ।।
सकलि तोमारि इच्छा इच्छामयी तारा तुमि ।
तोमार कर्म तुमि करो माँ, लोके बोले करि आमि।।
पंके बद्ध करो करि, पंगुरे लंघाओ गिरि,
कारे दाओ माँ ब्रह्मपद, कारे करो अधोगामी ।।
आमि यंत्र तुमि यंत्री, आमि घर तुमि घरनी,
आमि रथ तुमि रथी, जेमन चालाओ तेमनि चलि ।।
भावानुवाद
सभी तेरी इच्छा है माँ इच्छामयी तारा तुम्हीं ।
अपना कर्म तुम्हीं करती माँ लोग कहते करते हमहीं ।।
फँसाती कीच में हाथी, लंघाती पंगु को गिरि ।
देती हो किसी को ब्रह्मपद माँ, करती किसी को अधोगामी ।।
मैं हूँ यंत्र तुम हो यंत्री, मैं हूँ घर तुम हो घरनी ।
मैं हूँ रथ तुम हो रथी माँ, चलता जैसा चलाती माँ ।।
written by Ramdulal Nandy.The song belongs to the genre of Shyama Sangeet or Bhaktigeeti (Bengali devotional song), dedicated to Goddess Kali/Tara.The central theme is the concept of complete surrender (non-doership) to the Divine Mother, stating that all actions are performed by Her will.
>>>Autosuggestion:आत्मसुझाव या संकल्प-ग्रहण द्वारा श्रद्धा जागरण: “मैं ॠषि-मुनियों की संतान हूँ। भीष्म पितामह जैसे दृढ़प्रतिज्ञ पुरुषों की परम्परा में मेरा जन्म हुआ है। गंगा को पृथ्वी पर उतारनेवाले राजा भगीरथ जैसे दृढ़निश्चयी महापुरुष का रक्त मुझमें बह रहा है। समुद्र को भी चुल्लू में पी जानेवाले अगस्त्य ॠषि का मैं वंशज हूँ।श्री राम, श्रीकृष्ण, अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण की अवतरण -भूमि भारत में, जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं वहाँ मेरा जन्म हुआ है, फिर मैं ऐसा दीन-हीन क्यों रहूँगा ? मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ। आत्मा की अमरता का, दिव्य ज्ञान का, परम निर्भयता का संदेश सारे संसार को जिन ॠषियों ने दिया, उनका वंशज होकर मैं दीन-हीन नहीं रह सकता। -मैं अपने रक्त के निर्भयता के संस्कारों को जगाकर रहूँगा। मैं वीर्यवान् बनकर रहूँगा। ”
"सिर्फ इच्छा होने से ही कोई बड़ा नहीं बन जाता, जिसे वे उठाते हैं वही उठता है, --जिसे वे गिराते हैं वह गिर जाता है। हमलोग सार्वभौमिक धर्म का प्रचार कर रहे हैं -गुट्टबाजी करके ? ईर्ष्या गुलाम जाति का स्वभाव है, उसे उखाड़ फेंकने चेष्टा करनी चाहिये। मुझे नाम की आवश्यकता नहीं-I want to be a voice without form!मैं निराकार की वाणी हो जाना चाहता हूँ । " (पत्रावली /स्वामी ब्रह्मानन्द/सितंबर १८९४)
>>>अथर्व वेद में मानव (साधु युवा) की महिमा का वर्णन (Description of human glory in Atharva Veda) इस प्रकार मिलता है -
(अहम् भूम्याम्) मैं पृथिवी पर (उत्तरः नाम अस्मि) सर्वोत्कृष्ट प्रसिद्ध हूँ। क्योंकि मैं (सहमानः) अत्यन्त साहसी हूँ। (अभीषाट् अस्मि) मैं सबसे अधिक सहनशील हूँ, (आशाम्-आशाम् ) प्रत्येक दिशा में (विषासहिः) अच्छी प्रकार विजयी हूँ। इसीलिये (विश्वषाट्) सर्वत्र विजयी हूँ।
अर्थात मैं स्वभावतः विजयशील हूँ (प्रत्येक आत्मा स्वभावतः विजयशील है !), पृथ्वी पर मेरा उत्कृष्ट पद है। मैं विरोधी शक्तियों को परास्त कर समस्त विघ्न-बाधाओं को दबाकर प्रत्येक दिशा में सफलता पाने वाला हूँ। भावार्थ- सहनशील मनुष्य संसार में प्रसिद्ध हो जाता है। अपनी आलोचना सुनकर भी सहनशील ही रहना चाहिए। शत्रु के सम्मुख आ जाने पर भी सहनशीलता को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। हॉं, देश के शत्रुओं का डटकर मुकाबला कर उसे परास्त कर देना चाहिए। परन्तु हमारी सहनशीलता में न्यूनता नहीं आनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को सहनशील बनने का प्रयत्न करना चाहिए। प्यास जो मेरी बुझ गयी होती। ज़िन्दगी फिर न ज़िन्दगी होती। कहते हैं - ”अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्“ यजुर्वेद 36/24 अर्थात् हम सौ वर्ष तक जियें और उससे भी अधिक समय तक दैन्य भाव से दूर रहें। "
इसका अर्थ है: " युवा रहो; अच्छे आचरण वाले युवा बनें; अध्ययनशील, विनम्र, दृढ़निश्चयी और मजबूत बनें। इस स्तोत्र का प्रत्येक शब्द सारगर्भित है। आइए इस पर गौर करें।
युवा स्यात् - ऋषि कहते हैं कि मनुष्य को सच्चे अर्थों में युवा बनना चाहिए। युवा आयु स्वाभाविक रूप से रचनात्मक ऊर्जा से भरपूर होती है। जिन लोगों में कुछ नया करने का जज्बा होता है वही सही मायने में युवा होते हैं। इससे कम कुछ भी युवा होने की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता।
साधु युवा- एक युवा को अच्छे आचरण वाला और कानून का पालन करने वाला व्यक्ति होना चाहिए ताकि वह बुरे रास्ते पर न भटके। इसके लिए प्रत्येक युवा को निम्नलिखित चार गुणों को विकसित करते रहने की आवश्यकता है:
अध्यायकः > स्वाध्याय : - युवाओं को अयोग्य विचारों से दूर रहने में मदद करने के लिए नियमित रूप से अच्छे विचारों का अध्ययन करते रहना चाहिए।
आशिष्ठो - युवा को पूरी तरह से विनम्र होना चाहिए (उसे सोच, आचरण और भाषण में शिष्टाचार व्यक्त करना चाहिए और दूसरों के प्रति सम्मानजनक होना चाहिए।)
दृढिष्ठो - परिपक्व सोच के आधार पर लिए गए निर्णय को दृढ़ संकल्प के साथ क्रियान्वित किया जाना चाहिए।
बलिष्ठः - युवाओं को अपने कर्तव्यों को पूरा करने और बुराई के खिलाफ संघर्ष करने में सक्षम होने के लिए मजबूत होना चाहिए।
हमारे अभियान को बढ़ावा देने के लिए सभी पुनर्निर्माण गतिविधियों को वास्तव में हमेशा की तरह शामिल किया जाएगा लेकिन हमें हमेशा उपर्युक्त ऋषि के मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुरूप होने का प्रयास करना चाहिए।
बनो, वैसा बन जाने पर तुम्हारे अपवित्र विचार बिल्कुल चले जायेंगे। इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व परिवर्तित हो जायेगा। यही समाज का बहुत बड़ा लाभ है। समग्र मानव-जाति के लिये यही महत्वपूर्ण लाभ है।"
[सर्वे भवन्तु सुखिनः प्रार्थना से सभी के प्रति मित्रवत दृष्टि सम्पन्न मनुष्यधर्म के तीनो स्कंध का पालक ब्रह्मचारी ,सत - चरित्रवान मनुष्य बनो और बनाओ।]
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>>>'शी'-क्षा # (= आत्मसंयम का अभ्यास) अष्टांगयोग की सहायता से साधु युवा कैसे बनें और बनायें ?
आचरण में लाए जाने योग्य जो विषय (शीक्षा#) हैं, उनको पतञ्जलि ने आठ भागों में बांटा है । ये हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि । इनमें से पहले पांच तो हम सभी को प्रयत्न करके करने चाहिए । बचे तीन के लिए पहले पांच में थोड़ा पारङ्गत होना पड़ता है । अन्तिम अङ्ग तक पहुंचने पर आत्म- और परमात्म-दर्शन हो जाते हैं । इन अङ्गों का विवरण इस प्रकार है -
>>>१) यम - ये दूसरे के साथ व्यवहार में प्रयोग होते हैं । वस्तुतः, ये मानव-मात्र के लिए महाव्रत हैं । पतञ्जलि ने कहा है कि ये जाति (ब्राह्मण, शूद्र, म्लेच्छ, आदि),देश (स्थान - मन्दिर, विदेश, आदि), काल (तिथि, मुहूर्त, आदि), और समय (विशेष समय - "क्षत्रिय केवल युद्ध में मारेगा",या शिष्टाचार - "केवल ब्राह्मण से सत्य बोलो") - इन सभी से बाधित नहीं है । अर्थात् ये यम सार्वजनिक, सार्वभौम और सार्वकालिक हैं । ये पांच इस प्रकार हैं -
क) अहिंसा - कभी भी, किसी भी प्रकार से, किसी भी प्राणी को पीड़ा न देने की भावना । वेद का यह मन्त्र इस का सरल उपाय बताता है -"मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे(यजु० ३६।१८)" - सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखो ।
इसका फल है, पतञ्जलि बताते हैं, कि योगी के सान्निध्य में आने वाले प्राणी का, चाहे वह कितना ही हिंस्र क्यों न हो, वैर समाप्त हो जाता है । महाभारत आदि में हम पढ़ते हैं कि अमुक ऋषि के आश्रम में शेर और हिरण भी मैत्री से विचरते थे । ये ऋषि की अहिंसा-प्रवित्ति के उदाहरण हैं ।
ख) सत्य - जो जैसा है, उसे वैसा ही मानना व बोलने को सत्य कहते हैं । प्रधानतया यह वाणी के लिए है । व्यास जोड़ते हैं कि योगी की वाणी, सत्य होने के साथ-साथ, कटु न हो, ठगने वाली न हो और संशय उत्पन्न न करे; प्रत्युत सबके लिए हितकारी हो । सच्चे योगी तो केवल वही बोलते हैं जो हितकारी होता है, gossip, आदि वे नहीं करते ! अर्थात् वे सत्, हित और मित (कम) बोलते हैं । इसका फल है - योगी सत्य-सङ्कल्प हो जाता है - जो वह निश्चय करता है, जिसके लिए प्रयत्न करता है, वह सफल होकर ही रहता है ।
ग) अस्तेय - किसी पदार्थ के स्वामी की आज्ञा के बिना उसका उपयोग करना या छीन लेना, यहां तक इच्छा भी करने को ’स्तेय’ = चोरी कहते हैं । इस चोरी को मन, वचन व कर्म से त्याग देने को ’अस्तेय’ कहते हैं । इसका फल है - अमूल्य पदार्थों की उपलब्धि होने लगती है ।
घ) ब्रह्मचर्य - गुप्तेन्द्रिय का संयम है । इसका फल - शरीर और बुद्धि का बल बढ़ जाता है ।
ङ) अपरिग्रह -भौतिक पदार्थों के सङ्ग्रह करने का नाम परिग्रह है । इसमें यह दोष है कि उनके सङ्ग्रह में धन का व्यय और उनसे लगाव होता है । साथ-साथ, उनके रक्षण में समय, श्रम व धन का व्यय होता है । ऊपर से, इनके कारण हम हिंसा, असत्य और स्तेय का आश्रय भी ले सकते हैं । इसलिए पतञ्जलि इन्हें त्यागते जाने का उपदेश देते हैं । इसका फल बहुते ही विचित्र है -यह जन्म क्यों हुआ है, अगला जन्म क्या होगा - इसका ज्ञान हो जाना । सम्भवतः, यह इतना कठिन व्रत है कि इसका फल भी अधिक है !
>>>२) नियम - योग के इस दूसरे अङ्ग को हम personal discipline के रूप में समझ सकते हैं । ये हमें यमों को करने में सहायता भी देते हैं । ये भी पांच हैं -
च) शौच - शरीर की अन्दर और बाहर से स्वच्छता, और मन की शुद्धी । शरीर की बाहरी शुद्धी के लिए हम साबुन, आदि लगाते हैं । आन्तरिक शुद्धि के लिए हमें भोजन में अभक्ष्य का आहार नहीं करना चाहिए, जैसे - मांस, मदिरा, सड़े पदार्थ, आदि । मानसिक शुद्धि के लिए हमें राग-द्वेष को प्रयत्न से अपने मन से निकाल देना चाहिए । इसका फल है - अपने शरीर से घृणा और दूसरों के शरीरों से दूर रहना । यह अजीब-सा फल लगता है, लेकिन इसका एक प्रयोजन है । जब हम अपने शरीर को मल का भण्डार जानने लगेंगे तब हम में मोक्ष की इच्छा और तीव्र हो जायेगी । इसके अन्य फल भी हैं - मन का प्रसन्न और एकाग्र हो जाना, इन्द्रियों पर वश हो जाना । इनसे योगी आत्म-दर्शन के योग्य हो जाता है ।
छ) सन्तोष - अर्थात् जितना प्रयत्न से प्राप्त हुआ है, उससे अधिक की लालसा न करना । यह भौतिक पदार्थों के लिए - परिवार, धन, आदि - के लिए ही है, क्योंकि आध्यात्मिक स्तर पर तो आत्मा को सदैव परमात्मा के और अधिक पास आने की लालसा रहनी चाहिए ! इसका फल है अत्यन्त सुख की प्राप्ति । महर्षि ने तो इसे मोक्ष-तुल्य सुख कहा है !
ज) तप - द्वन्द्वों (ठण्डी-गर्मी, भूख-प्यास, आदि) को सहन करना, उपवास करना । इसका फल - शरीर और इन्द्रियों की अशुद्धियों का क्षय होना, उनका दृढ़ और स्वस्थ होना ।
झ) स्वाध्याय - मोक्षपरक शास्त्रों का अध्ययन करना और ओम् का जप करना । इसके फलस्वरूप, परमात्मा और विद्वानों का सहायता मिलता है, जिससे मुक्ति का पथ प्रशस्त होता है ।
ञ) ईश्वरप्रणिधान - अर्थात् अपने सब कर्मों को परमात्मा को अर्पित कर देना । इसका फल
है - समाधि की सिद्धि सरलता से होना । व्यास के अनुसार, जीवात्मा सब पदार्थों को ठीक- ठीक जानने लगता है, चाहे वे दूसरे स्थान, दूसरी देह या दूसरे काल में क्यों न हों ।
>>>३) आसन - यह जो हम योगासन के रूप में - शरीर को विभिन्न प्रकार से कठिन मुद्राओं में ढालना - समझते हैं, वह नहीं है, प्रत्युत समाधि के लिए इस प्रकार बैठना है, जिससे कि हमारे किसी भी अङ्ग में tension न रहे और हम लम्बे समय तक बिना किसी कष्ट के बैठ सकें । सब प्रकार से शरीर को शिथिल करके, चित्त को अनन्त में लीन कर देना चाहिए । आसन की सिद्धि हो जाने पर द्वन्द्व बाधित नहीं करते ।
आसन के बाद, प्राणायाम आता है , किन्तु स्वामीजी ने बिना योग्य गुरु के सानिध्य में रहे इसे करने से मना किया है। अतएव हमलोग भी इसे नहीं करेंगे। ध्यान से समाधि होता है , इसी लिए ध्यान -समाधि में जाने से ठाकुर ने विवेकानन्द को मना किया था इसलिए हमलोग ध्यान-समाधि का अभ्यास नहीं करेंगे।
>>>4. प्रत्याहार : - इन्द्रियों को अपने विषयों से निकालकर, अन्दर संकुचित कर लेना । इससे वे ’चित्त के आकार’ की हो जाती हैं । प्रत्याहार के अभ्यास से पूर्ण जितेन्द्रियता प्राप्त हो जाती है । फिर हम जिसको देखना चाहे, उसको छोड़ हमें और कुछ नहीं दिखेगा । अर्थात् पूर्ण focus प्राप्त हो जाता है ।
>>>5. धारणा - एक देश (point) पर - ह्रदय में अपने पूर्व-निर्धारित आदर्श -स्वामी विवेकानन्द की छवि पर चित्त को स्थिर करना । ये शरीर का कोई भी भाग हो सकते हैं, जैसे - नाभि, हृदय, मस्तक, आज्ञाचक्र ।
इस प्रकार योग के आठ अङ्ग में से सिर्फ 5 अंग का अभ्यास छात्रों को पशुत्व से मनुष्यत्व में और फिर साधारण मनुष्य से देवत्व (100 % निःस्वार्थपरता अभिव्यक्त करने) की ओर ले जाते हैं, और अन्त में मोक्ष के भागी (De-Hypnotized) बना देते हैं । यदि हम इनका पूरा पालन न भी कर पाएं, हम अपनी शक्ति-अनुसार इनका अभ्यास प्रतिदिन बढ़ाते रहना चाहिए, क्योंकि बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है...साधु युवा अर्थात राजर्षि -'राजा+ ऋषि ' !!
"श्रद्धा सामान्य नारी नहीं वे तो विश्व मंगला मातृ-मूर्ति हैं !"
सहज विश्वास अथवा अन्धविश्वास का नाम श्रद्धा नहीं है। सत्य को निश्चय पूर्वक जानकर, उसे दृढ़ता के साथ हृदय में धारण कर लेना श्रद्धा है। श्रद्धा=श्रत्+धा, सत्य+धारणा, सत्य+धारण, आत्म+विश्वास।धर्ता"- सत्य धारणा अथवा निष्ठा के साथ, अभीष्ट की साधना में लगे रहना श्रद्धा है। आत्मविश्वास के साथ साध्य की साधना में जुट जाना श्रद्धा है। हृदयसंकल्प के साथ लक्ष्य की ओर प्रवृत्त रहना श्रद्धा है। हृदय की गहन भावना के साथ साधना करना श्रद्धा है।
छन्दोबद्ध मन्त्रों को ऋक् या ऋचा कहते हैं। वेद शब्द विद् ज्ञाने (जानना) धातु से बना है , अतः वेद शब्द का अर्थ है---ज्ञान । संहिता शब्द का अर्थ संकलन होता है । इस प्रकार ऋग्वेद-संहिता का अर्थ हुआ---छन्दोबद्ध ज्ञान का संग्रह । ऋग्वेद के दशम मंडल के १५१ वें सूक्त को श्रद्धा सूक्त कहते है इसकी रिषिका श्रद्धा कामायनी है, इस सूक्त में श्रद्धा का आवाहन देवी के रूप में करते हुए कहा है कि वह हमारे हृदय में श्रद्धा उत्पन्न करे। ऋग्वेदः (१०-१५१-४) में कहा गया है -
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते।
श्रद्धा हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु।।
(देवाः) देवजन, (यजमानाः) यज्ञानुष्ठानी, यज्ञशील जन और (वायु-गोपाः) प्राणरक्षक जन (हृदय्यया आकूत्या) हृदय भावना द्वारा (श्रद्धाम् श्रद्धाम्) अभीष्ट को प्राप्त कराने वाली श्रद्धा को (उपासते) उपासते हैं। वे (श्रद्धया) श्रद्धा से ही (वसु) धन, अभीष्ट (विन्दते) प्राप्त करते हैं।
देवजनों ने श्रद्धा के द्वारा ही देवत्व को प्राप्त किया था । यज्ञानुष्ठानी श्रद्धा द्वारा ही यज्ञफल {सुखैश्वर्य} प्राप्त करते हैं। यज्ञशील श्रद्धा द्वारा ही श्रेष्ठतम कर्मों की साध में निरत रहते हैं। वीर श्रद्धा द्वारा ही विजयलाभ करते हैं। योगी भी श्रद्धा द्वारा ही योगसाधना में सिद्धि प्राप्त करते हैं। हृदय-संकल्प में ही श्रद्धा का निवास है। निस्सन्देह हृदय की भावना ही श्रद्धा है। श्रद्धा से प्रत्येक धन प्राप्त होता है। श्रद्धावान् व्यक्ति किसी भी ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकता है। श्रद्धा के साथ, दृढ़संकल्प और निश्चय के साथ योगपथ {महामण्डल द्वारा निर्देशित 3H विकास के 5 अभ्यास के पथ} पर आरूढ़ होइये। आप बहुत शीघ्र सफल होंगे। विश्वास रखिए और प्रसन्नता के साथ योगानुष्ठान प्रारम्भ कीजिए।
श्रद्धा का अर्थ है -आस्तिक्य बुद्धि, अर्थात आत्म-विश्वास और आत्म विश्वास का अर्थ है ईश्वर (ठाकुर) पर विश्वास। इसलिए ऋग्वेद के दशम् मण्डल १/१२४ में श्द्धा की स्तुति देवता रूप में इस प्रकार की गई है-
अर्थात 'हम प्रातः मध्याह्न और सांयकाल में श्रद्धा का आह्नान करते हैं, हे श्रद्धे! तू हमें इस लोक में भी श्रद्धायुक्त कर।
छान्दोग्योपनिषद् ७/१९-२० में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएं वर्णित हैं - मनुष्य के हृदय में निष्ठा या आस्तिक्य बुद्धि जाग्रत कराना व मनन कराना। श्रद्धा हृदय की उच्च भावना का प्रतीक है। इससे मनुष्य का आध्यात्मिक जीवन सफल होता है और धन प्राप्त कर सुखी होता है। नारदपुराण में कहा गया है -
-नारदपुराण>पूर्वभाग 4/6 श्रद्धालु पुरुष को धर्म का लाभ होता है। श्रद्धालु ही धन पाता है, श्रद्धा से ही कामनाओं की सिद्धि होती है तथा श्रद्धालु ही मोक्ष पाता है।
" श्रद्धया विन्दते वसु "
जयशंकर प्रसाद के ‘कामायनी’ की रचना 'ऋग्वेद' में वर्णित इसी सूक्त श्रद्धां हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥-ऋग्वेदः १०-१५१-४॥- के आधार पर हुई है-अर्थात सब लोग हृदय के दृढ़ संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं क्योंकि श्रद्धा से ही ‘वसु’ (भौतिक कल्याण -धन वैभव,या अभ्युदय ) और आध्यात्मिक कल्याण (अमरत्व या निःश्रेयस) दोनों प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कामयानी महाकाव्य वस्तुतः अपूर्ण मानव (कच्चा मैं,द्वैत ) को परिपूर्णता (पक्का मैं-अद्वैत ) की ओर ले जाने वाली विकास-यात्रा की दिशा व अन्तिम पड़ाव दोनों ही है।
श्रद्धा वाले सूक्त में सायण ने श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है-‘काम-गोत्रजा श्रद्धानपामर्षिका’ इसीलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है। श्रद्धा काम-गोत्रजा अथवा काम की संतति है, इसीलिए तो महाकाव्य का नाम ‘कामायनी’ पड़ा है। सृष्टि-रचना का मूल भी वह प्रबल ‘काम’ ही है। नासदीय सूक्त में सृष्टि-व्युत्पत्ति की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार वर्णित हैः
"कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
स तो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा। "
सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व ‘काम’ विद्यमान था यहां ‘काम’ का अर्थ ‘सिसृक्षा’ अर्थात् सृजन की इच्छा से है। परमात्मा ने ‘ईक्षण’ (आलौकिक इच्छा) से ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ का संकल्प लिया। यह ‘काम’ अथवा कामना सृष्टिकर्ता ब्रह्म के मन में बीज रूप में पूर्व से ही विद्यमान थी।
इस काव्य की कथावस्तु वेद, उपनिषद, पुराण आदि से प्रेरित है। कामायनीकार के अनुसार काम के दो स्वरुप हैं - 'संभोगात्मक (प्रवृत्ति) तथा प्रगतिशील (निवृत्ति)' और दोनों ही स्वरूप मांगलिक है। किन्तु अपने प्रथम रूप तक ही सीमित रहने के कारण वह मनुष्य-जीवन को वात्याचक्र (बवंडर - Whirlwind cycle) के समान जीवन को भटकाता रहता है। भोगवादी काम का यही परिणाम है। देव सृष्टि के विनाश का भी यही कारण था। देवगण के उच्छृंखल स्वभाव, निर्बाध आत्मतुष्टि में अंतिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को नए युग की सूचना मिली। दूसरी ओर जो प्रवृत्ति मार्ग के अधिकारी हैं, उनके लिए काम के इस संभोगात्मक रूप का पूर्णतया परित्याग जीवन-शक्ति की इच्छा का विरोध है, विकास का बाधक है। उससे जीवन का सम्पूर्ण आनन्द समाप्त हो जाता है। इसीलिए कामायनी में राग-विराग समर्पित काम को (विवाह संस्कार को) स्वीकार किया गया है।“
कामायनी में ‘श्रद्धा’ के माध्यम से एक सन्तुलित जीवन जीने की प्रेरणा है जहाँ न तो घोर विलासितापूर्ण सतत वासनामय ऐहिक जीवन की तलाश है और न ही एकान्तिक वैराग्य धारण करना ही अभीष्ट है। एक समन्वय का मार्ग विदुषी ‘श्रद्धा’ से प्राप्त होता है। श्रद्धा मनु को निर्भयता का पाठ पढ़ाती है। मनु जो दृष्टा है, वह चेतन है। अतः जल एवं मनु दोनों ही एक हैं। लेकिन अभी इसमें श्रद्धा का प्रवेश नहीं हुआ है अतः वह समरसी भाव को प्राप्त नहीं हुआ है। वह दृश्य (हिम और जल) तो जड़ है, किन्तु उस दृश्य का द्रष्टा जो मनु है वह तो चेतन है। श्रद्धा मनु के भीतर के द्वैत को अद्वैत में बदलने में अपनी भूमिका निभाती है।
‘कामायनी’ के नायक मनु और नायिका श्रद्धा हैं। कामायनी में मनु मन का प्रतीक है और श्रद्धा हृदय तथा इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। अपने आंतरिक मनोविकारों से संघर्ष करता हुआ मनु श्रद्धा याने आस्तिक्यबुद्धि की सहायता से आनन्द लोक तक पहुँचता है। जीवन का अंतिम भाव आनंद है । आनंद की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील मानव अनेक संघर्षों से गुजरता है। शैवदर्शन के अनुसार शिव आनंदस्वरूप हैं। कामायनी में श्रद्धा की शक्ति के रूप में परिकल्पना की गई। ऋषि दयानन्द जी लिखते हैं कि जब जीव शरीर से निकलता है उसी का नाम ‘मृत्यु’ और शरीर के साथ संयोग होने का नाम ‘जन्म’ है। जब शरीर छोड़ता है तब यमालय अर्थात् आकाशस्थ वायु में रहता है क्योंकि ‘यमेन वायुना’ वेद में लिखा है कि यम नाम वायु का है। मृत्यु होने के साथ वा बाद शरीर से जो जीवात्मा निकलती है वह आकाशस्थ वायु में रहती है। इस जीवात्मा को धर्मराज अर्थात् परमेश्वर उसके पाप पुण्यानुसार जन्म देता है। नाना प्रकार के जन्म मरण में तब तक जीव पड़ा रहता है जब तक उत्तम कर्मोपासना ज्ञान को प्राप्त करके मुक्ति को नहीं पाता। क्योंकि उत्तम कर्मादि करने से मनुष्यों में उत्तम जन्म और मुक्ति में महाकल्प पर्यन्त जन्म मरण दुःखों से रहित होकर आनन्द में रहता है।
यह जगत् कल्याणभूमि है, यही श्रद्धा की मूल स्थापना है। इस कल्याणभूमि में एकमात्र प्रेम ही श्रेय और प्रेय दोनों है। प्रेम मानव और केवल मानव की विभूति है। मानवेतर प्राणी, चाहे वे चिरविलासी देव हों, चाहे असुर हों, चाहे दैत्य या दानव हों, चाहे पशु हों, प्रेम की कला और महिमा वे नहीं जानते, प्रेम की प्रतिष्ठा केवल मानव ने की है। कामायनी काव्य का मूलबिंदु है- पहले श्रद्धा को पत्नी रूप में ग्रहण करना। फिर उसे अकेली छोड़कर इड़ा के साथ मनु का रहना। इड़ा को दासी या वंदिनी बनाने का प्रयास करने पर देवों का कोपभाजन बनना।
प्रसाद की रचना कामायनी का प्रमुख पात्र मनु उस विनाश का साक्षी है, जहाँ देवताओं की घोर भौतिकता-वादी प्रवृत्ति भोग, विलास और उनके द्वारा प्रकृति के अनियन्त्रित दोहन के परिणामस्वरूप पूरी सभ्यता का विनाश हो जाता है। जल-प्लावन का वर्णन शतपथ ब्राह्मण के प्रथम कांड के आठवें अध्याय से आरम्भ होता है। जल-प्लावन देवों की उच्छृंखल भोग-वृत्ति और निर्बाध आत्मतुष्टि का प्रकृति के द्वारा प्रतिकार था। पृथ्वी पर घोर जलप्लावन आया और उसमें सिवाय मनु के कोई भी नहीं बचता है। वे देवसृष्टि के अंतिम अवशेष थे। मनु भारतीय इतिहास के आदि पुरुष हैं। 'मनु' ही मानव-जाति के प्रथम पथ-प्रदर्शक या ' नेता ' हैं ! और अग्निहोत्र प्रज्वलित करने वाले तथा अन्य कई वैदिक कथाओं के नायक हैं। भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा (शतरूपा) से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है। इस मन्वंतर के प्रवर्त्तक मनु हुए। राम, कृष्ण और बुद्ध और अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण भी इन्हीं (मनु) के वंशज हैं। देव सभ्यता के प्रलय के बाद नए जीवन की उधेड़-बुन में लगे मनु के जीवन में श्रद्धा और इड़ा नामक दो स्त्रियाँ आती हैं। मनु अर्थात् मन के दोनों पक्ष हृदय और मस्तिष्क का संबंध क्रमश: श्रद्धा और इड़ा (मस्तिष्क में अवस्थित इन्द्रिय-केन्द्र) से भी सरलता से लगाया जाता है। इड़ा के संबंध में शतपथ में कहा गया है कि उसकी उत्पत्ति या पुष्टि पाक यज्ञ से हुई और उस पूर्णयोषिता को देखकर मनु ने पूछा कि ‘‘तुम कौन हो ?’’ इड़ा ने कहा, ‘तुम्हारी दुहिता हूं।’ मनु ने पूछा कि ‘मेरी दुहिता कैसे ?’ उसने कहा, ‘तुम्हारे दही, घी इत्यादि के हवियों से ही मेरा पोषण हुआ है।’ ‘तां ह’ मनुरुवाच-‘का असि’ इति, ‘तव दुहिता’ इति। ‘कथं भगवति ? मम दुहिता’ इति। (शतपथ 6 प्र.3 ब्रा.) श्रद्धा मनु को अहिंसक तथा प्रकृति प्रेमी बनाती है, जबकि इड़ा उसे घोर भौतिकतावाद में उलझा देती है और एतमाम लिप्साओं को ही मनु जीवन का उद्देश्य समझने लग जाता है। फिर एक दिन ऐसा आता है, जब उसे अपनी तमाम गलतियों का अहसास होता है और उसके बुरे समय में श्रद्धा उसकी रक्षा करती है। श्रद्धा जो कि अहिंसा, सात्विकता और प्रकृति प्रेम की परिचायक है। इड़ा को मेघसवाहिनी नाड़ी भी कहा गया है। ऋग्वेद में इड़ा को धी, बुद्धि का साधन करने वाली; मनुष्य को चेतना प्रदान करने वाली कहा है। इड़ा के लिए मनु को अत्यधिक आकर्षण हुआ और श्रद्धा से वे कुछ खिंचे। यह इड़ा और श्रद्धा का एक तरह का बहनापे का भाव है। तभी अपनी संतान को इड़ा के भरोसे छोड़ कर वह (श्रद्धा) मनु की खोज में चल देती है। वह उसे चिर चढी कहती अवश्य है पर इड़ा के प्रति किसी विश्वास के कारण ही अपने पुत्र को उसके हवाले भी कर पाती है। यहाँ इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि अंत में जब इड़ा उस स्थान पर जाती है जहां श्रद्धा और मनु है , तब भी मनु के प्रति किए गए व्यवहार के लिए वह शर्मिन्दा नहीं है पर जहाँ मानव श्रद्धा के अंक में समाता है वहीं इड़ा श्रद्धा के चरणों में यह कहकर गिरती है कि उससे मिल कर वह कितनी कृतार्थ हुई है। श्रद्धा के प्रति कृतार्थता का बोध और अपने बचपने के प्रति सजगता तथा उसका श्रेय श्रद्धा को देना – एक अद्भुत बहनापे का बोध प्रकट करता है। अकेलेपन की चिंता और देव-सृष्टि के विलास की स्मृतियां मनु की बेचैनी का मुख्य कारण है। 'श्रद्धा' के द्वारा किया गया निम्नोक्त प्रश्न, 'मनु' की भीरुता के कारण ही व्याख्या चाहता है-
तपस्वी ! क्यों इतने हो क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश-बताओं यह कैसा उद्वेग।56
श्रद्धा मनु को भयभीत देखकर आश्चर्यचकित है- ‘आह! तुम कितने अधिक हताश!’ इस वाक्य में श्रद्धा के मन में करुणा का आवेग है क्योंकि वह जानती है कि मानव तो अमरता की कृति है-अरे तुम इतने हुए अधीर; हार बैठे जीवन का दाँव, जीतते मरकर जिसको वीर। वेद के सदृश ही श्रद्धा के ये वाक्य महान आशावादी संदेश देते प्रतीत होते हैं। श्रद्धा उन्हें पुनः प्रवृत्ति मार्ग की ओर उन्मुख करती हुई अनवरत कर्म का सन्देश देती है। कामायनी की श्रद्धा यथा समय मनु के मन में आशा का संचार करती प्रतीत होती है-
और यह क्या तुम सुनते नहीं, विधाता का मंगल वरदान ?
शक्तिशाल हो, विजयी बनो विश्व में गूँज रहा जय-गान।
डरो मत, अरे अमृत संतान। अग्रसर है मंगलमय वृद्धि,
पूर्ण आकर्षण जीवन-केन्द्र, खिंची आवेगी सकल समृद्धि
-श्रद्धा सामान्य नारी नहीं वह तो विश्व मंगला मातृ-मूर्ति के रूप में सामने आई है-
तुम देवि! आह कितनी उदार, वह मातृ-मूर्ति है निर्विकार;
हे सर्वमंगले! तुम महती, सबका दुख अपने पर सहती।
”बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,
विश्व भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।“
मनुष्य का चरम लक्ष्य अपने यथार्थ स्वरूप को पाना है। इसे पाने के लिए उसे जगत के आकर्षण से भागना नहीं है- निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ना है। अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को नियंत्रण में रखने का प्रशिक्षण प्राप्त करके, समस्त जागतिक कार्य निष्पादित करना है, और निरंतर लक्ष्य (नश्वर वस्तुओं में आसक्ति का पूर्ण-त्याग ) की ओर बढ़ते रहना है। अपने लक्ष्य तक पहुँचे बिना विश्राम नहीं लेना है ! यह कौशल (तकनीक) प्रसाद जी की कामायनी को भली-भाँति आती है- नायिका के रूप में ' श्रद्धा ' नायक 'मनु' की प्रतिपग सहायिका बनी, उसकी दुर्बलताओं को क्षमा करती हुई, निराशा के मध्य आशा के दीप प्रज्ज्वलित करती हुई, असफलताओं को नकार अनवरत प्रोत्साहन द्वारा जीवन का ध्येय बताने वाली मार्गदर्शिका भी है। श्रद्धा के साथ मनु का मिलन होने के बाद उसी निर्जन प्रदेश में उजड़ी हुई सृष्टि को फिर से आरंभ करने का प्रयत्न हुआ। जीवन के जितने भी नैतिक आदर्श हैं उनका आधार मनुष्य का सत्य-स्वरूप या यथार्थ स्वरूप ही है। अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति जागरूक बने रहना ही वास्तविक धर्म है। सत्य मार्ग को उन्मुख व्यक्ति ही वास्तव में सदाचारी है। हमारे वेद सदा सत्य और ऋत के मार्ग में चलने की आज्ञा देते आए हैं। ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः’ के सिद्धान्त का अनुपालन करती हुई ‘श्रद्धा’ प्रथमतः मनु को कर्म की ओर प्रेरित करके ऐहिक जीवन की प्रेरणा प्रदान करती है। लेकिन वह मानव के वास्तविक उद्देश्य को भी भूली नहीं है। इसीलिए तो मनु को कैलास पर ले जाकर उसके जीवन में सात्त्विकता और समरसता का समावेश करती है। समाज में व्यक्ति यदि अधिकार की माँग रखता है तो उसके कुछ कर्तव्य भी हैं। व्यक्ति का समाज के प्रति समर्पण ही उसे स्वीकार्य है।
अपने में सब कुछ भर, कैसे व्यक्ति विकास करेगा?
यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।
औरों को हँसते देखो मनु- हँसो और सुख पाओ,
अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ!
स्वार्थ में लीन आत्मकेन्द्रित व्यक्ति श्रद्धा दृष्टि में महनीय नहीं है। समग्र समाज की भलाई व प्रसन्नता हेतु कार्यरत व्यक्ति, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शक नेता (श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, माँ सारदा पूज्य नवनी दा ---) ही उसके लिए श्रद्धेय है- ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः (ऋ.9/सू.73/6) - प्रार्थना और यज्ञ करने वाला सदाचारी होना चाहिए। नहीं तो उसकी पूजा-प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। सदाचारी लोग ही तरते हैं, दुराचारी नहीं। अज्ञानी लोग जो हितोपदेश को भी नहीं सुन सकते वे सच्चाई के मार्ग को छोड़ देते हैं, वे दुष्टाचारी इस भवसागर की लहर को नहीं तर सकते।
कामायनी में जब मनु सत्य के मार्ग में न चलने का दुष्परिणाम भोगकर मुमूर्षु दशा में पहुँचते हैं तो वह श्रद्धा ही है जो उन्हें सत्य के मार्ग की ओर पुनः प्रवृत्त करा आनन्द उपलब्ध कराती है। 'ऋत' अर्थात महत् - महा चित्त की शक्ति ही विश्व को एक नियम एक कानून-व्यवस्था (इन्द्रिय-विषयों के प्रति आसक्ति का त्याग) में स्थापित रखती है और जो अपने कर्मों से इस नियम में व्याघात पहुँचाता है उसे वह नष्ट कर देती है। मनु ने स्वेच्छाचारिता में इस नियमन को नहीं माना था। यही उसके समूचे वंश के सर्वनाश का कारण बना। श्रद्धा ऋृत की इस महान व्यवस्था से परिचित है। और सर्वत्र उसी एक सत्य की उपस्थिति पाती है-‘श्रद्धा देवी प्रथमजा ऋतस्य’, तै.ब्रा. 3/12/1-2| जिसके आधार से सब चल रहा हैं , सब ठहरा हैं , जिसके कारण अराजकता नहीं हैं। बसंत आता हैं और फूल खिलते हैं। पतझड़ आता हैं और पत्ते गिर जाते हैं। वह अदृश्य नियम , जो बसंत को लाता हैं और पतझड़ को। सूरज हैं , चाँद हैं , तारे हैं । यह विराट विश्व हैं और कही कोई अराजकता नहीं । सब सुसंबद्ध हैं। सब एक तारतम्य में हैं। सब संगीतपूर्ण हैं। इस लयबद्धता का ही नाम ऋत हैं । न तो वृक्षों से कोई कह रहा हैं कि हरे हो जाओ , न ही पत्तो को कोई खीच खीच कर उगा रहा हैं ….बीज से वृक्ष पैदा होते हैं , वृक्षों में फूल लग जाते हैं । सुबह होती हैं, पंक्षी गीत गाने लगते हैं । सब कुछ समायोजित ढंग से हो रहा हैं । कही कोई संघर्ष नहीं हैं , सहयोग हैं – ऋत शब्द में यह सब समाया हुआ हैं । सृजन की नियत व्यवस्था होने के कारण ही नारी ‘ऋतुमती’ कहलायी हैं।
सायण भाष्य आदि में ऋत को सत्य का पर्यायवाची माना जाता है । ऋत और सत्य में अन्तर बताते हुए प्रायः सायण भाष्य में कहा जाता है कि जो मानसिक स्तर पर सत्य है वह ऋत है और जो वाचिक स्तर का सत्य है, वह सत्य है। पुराणों में अनृत (अन्- ऋत) को मृत कहा गया है । अनृत अवस्था में केवल जीवन के रक्षण भर के लिए ऊर्जा विद्यमान है, जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए नहीं । ऋत अवस्था जीवन में क्रियाशीलता लाती है, पुष्प, फल उत्पन्न कर सकती है । जीवन में जो भी कामना हो, वह सब ऋतम् का भरण करने से पूर्ण होगी। जब हम सोए रहते हैं तो वह अनृत अवस्था कही जा सकती है । उसके पश्चात् उषा काल की प्राप्ति होने पर सब प्राणी जाग जाते हैं । ऋग्वेद में श्रद्धा हेतु प्रशंसासूचक वाणी में कहा गया कि जिस प्रकार सूर्य की पुत्री उषा मनुष्यों के हृदय में आह्लाद उत्पन्न करती है, ठीक उसी प्रकार जिन मनुष्यों के हृदय में 'श्रद्धा-देवी' का निवास है वे लोग उसी देवी के समान सभी मनुष्यों में आह्लाद जन्य सौम्य स्वभाव उत्पन्न करते हैं। तत्त्वज्ञ ऋषि तो मनुष्य ही नहीं प्राणि मात्र में समत्व दृष्टि रखते थे। उनका तो उद्घोष थाः " मित्र स्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।" वैदिक ऋषि समाज में एकता व समन्वय की अपेक्षा रखते थे। एक ऐसे आदर्श समाज की परिकल्प उनके मन में थी जहाँ सभी के संकल्प, सोच, भावनाएँ, खान-पान, मंत्र, यज्ञ-भावना एक सी हों। पारस्परिक सौहार्द और सहयोग की उदान्त भावना से सम्पृक्त समाज ही उन्हें काम्य था। मनु का यह कथन-
देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया,
हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं,
तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है।
शापित न यहाँ कोई है तापित पापी न यहाँ हैं,
जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है।
श्रद्धा की उदात्त चेतना समूची सृष्टि से तादात्म्यीकरण की स्थिति में है। यहाँ मनुष्येत्तर पशु-पक्षी भी उसी की सत्ता के पर्याय है। सचमुच यहाँ श्रद्धा की उपस्थिति एक ऋषिका सी ही है। प्राणी मात्र पर कष्ट उसके हृदय में शर-सा प्रहार करता है। आकुलि-किलात से मिलकर मनु हिंसा का जो आयोजन करते हैं, श्रद्धा उसमें हिस्सा नहीं लेती। वह 'एलियनेशन' का अनुभव करती है और आधुनिक मानव की हिंसा वृत्ति पर सवाल दागती है—
यह विराग सम्बन्ध हृदय का कैसी यह मानवता!
प्राणी को प्राणी के प्रति बस बची रही निर्ममता!
जीवन का संतोष अन्य का रोदन बन हँसता क्यों?
एक-एक विश्राम प्रगति को परिकर-सा कसता क्यों?]
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$$$$ वेदों में परस्पर मित्रता की अवधारणा :
भारतीय संस्कृति में मैत्री की अवधारणा बहुत ही गहरे सम्बन्धों को इंगित करती है। यद्यपि मैत्री के कई रूप हैं, जिनमें कुछ स्थानीय भिन्नता हो सकते हैं। ऐसे कई बन्धनों में कुछ विशेषताएँ होती हैं। एक दूसरे के साथ रहना, एक साथ बिताए समय का आनन्द लेना और एक दूसरे के लिए सकारात्मक और सहायक भूमिका निभाने में सक्षम होना आदि मित्रता की विशेषताओं में शामिल है।
‘मेद्यति, स्निह्यति स्निह्यते वा स मित्रः’ जो सब से स्नेह करके और सब को प्रीति करने योग्य है, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘मित्र’ है। वेदों में अंकित शन्नो मित्रः शं व०…. आदि मंत्रों में जो मित्र आदि नाम आये हैं, वे भी परमेश्वर के हैं, क्योंकि स्तुति, प्रार्थना, उपासना श्रेष्ठ ही की की जाती है। श्रेष्ठ उसको कहते हैं जो अपने गुण, कर्म, स्वभाव और सत्य-सत्य व्यवहारों में सब से अधिक हो।उन सब श्रेष्ठों में भी जो अत्यन्त श्रेष्ठ उसको परमेश्वर (अवतार वरिष्ठ श्रीरामकृष्ण परमहंस देव) कहते हैं। जिसके तुल्य न कोई हुआ, न है और न होगा। जब तुल्य नहीं तो उससे अधिक क्योंकर हो सकता है? जैसे परमेश्वर के सत्य, न्याय, दया, सर्वसामर्थ्य और सर्वज्ञत्वादि अनन्त गुण हैं, वैसे अन्य किसी जड़ पदार्थ वा जीव के नहीं हैं। जो पदार्थ सत्य है, उसके गुण, कर्म्म, स्वभाव भी सत्य ही होते हैं। इसलिए सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें।
मित्र आदि नामों से सखा और इन्द्रादि देवों के प्रसिद्ध व्यवहार देखने से उन्हीं का ग्रहण करना योग्य नहीं, क्योंकि जो मनुष्य किसी का मित्र है, वही अन्य का शत्रु और किसी से उदासीन भी देखने में आता है। इससे मुख्यार्थ में सखा आदि का ग्रहण नहीं हो सकता क्योंकि परमेश्वर के जैसा सब जगत् का निश्चित मित्र, न किसी का शत्रु और न किसी से उदासीन है, इससे भिन्न कोई भी जीव इस प्रकार का कभी नहीं हो सकता, इसलिये परमात्मा ही का ग्रहण यहाँ होता है। हाँ, गौण अर्थ में मित्रदि शब्द से सुहृदादि मनुष्यों का ग्रहण होता है।
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेदों में भी मित्रता की अवधारणा है। मित्रता के गुण की महिमा परमेश्वरोक्त ग्रन्थ वेद में भी गाये गये हैं, और मनुष्यों के मध्य परस्पर मित्रता की कामना की गई है। अथर्ववेद 7/36/1 में परस्पर मित्रता होने की कामना करते हुए कहा गया है कि हम दोनों मित्रों की दोनों आँखें ज्ञान का प्रकाश करने वाली हों। हम दोनों का मुख यथावत विकास वाला होवे। हमें अपने हृदय के भीतर कर लो। हम दोनों का मन भी एकमेव हो। अर्थात् हम सदा ही प्रीति पूर्वक रहें। यजुर्वेद 36/18 में सभी के प्रति मित्रभाव होने की प्रार्थना परमात्मा से करते हुए कहा गया है कि तुम मुझे दृढ़ बनाओ। सर्वभूत मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सर्वभूतों को मित्र की ही दृष्टि से देखूँ। हम परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें। मित्रता में मनुष्यों के मध्य एकमत होना सबका विचार एक होना आवश्यक है,अन्यथा यह सम्बन्ध प्रगाढ़ नहीं हो सकती। इसलिए परमेश्वर स्वयं सभी को एकमत होने का सन्देश देते हुए ऋग्वेद 10/191/2में कहता है-हे स्तीताओं ! तुम मिलकर रहो। एक साथ स्तोत्र पढ़ो और तुम लोगों का मन एक सा हो।प्राचीन देवताओं के एकमत होकर अपना हविर्भाग स्वीकार करने की भांति ही तुम लोग भी एकमत होकर रहो। इसका अगला मन्त्र ऋग्वेद 10/191/3 सबके विचार एक होने की कामना करते हुए कहता है कि इन पुरोहितों की स्तुति एक सी हो, इनका आगमन एक साथ हो और इनके मन (अन्तःकरण) तथा चित्त (विचारजन्य ज्ञान) एकविध हों। ऋग्वेद 6/45/6 में परमात्मा से द्वेषभाव न होने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि हे प्रभु ! तू द्वेष करने वाले के द्वेषभाव को निश्चय ही निकाल डालता है। तू उन्हें अपना प्रशंसक बना देता है। सच्चे मनुष्यों से तू सुवीर कहलाता है। >>>ईर्ष्या मित्रता की सबसे बड़ी बाधक है। इसीलिए ईर्ष्या से मुक्त होने का संदेश देते हुए अथर्ववेद 6/18/1 में परमात्मा की वाणी है कि, " हे ईर्ष्या संतप्त मनुष्य ! हम ईर्ष्या की पहली और उसके बाद वाली अर्थात् दूसरी वेगवती गति को, ज्वाला को बुझाते हैं। इस तरह तेरी उस हृदय में जलने वाली अग्नि को तथा उसके शोक संताप को बिल्कुल शान्त कर देते हैं।अर्थात् मनुष्य को दूसरे की वृद्धि देख कर कभी ईर्ष्या नहीं करना चाहिए।द्वेष की परम्परा का अवसान करने के लिए अथर्ववेद 19/41/1 में कहा गया है कि " हे भाई ! मैं ही तेरे साथ द्वेष करना छोड़ देता हूँ। अब यही कल्याणकर है कि मैं स्वयं ही अब इस मूछों की लड़ाई की समाप्ति पर आ जाऊँ, शत्रुता की परम्परा का विराम कर दूँ। द्यौ और पृथ्वी भी मेरे लिए अब कल्याण-कारी हो जाएँ। सभी दिशाएँ मेरे लिए शत्रुरहित हो जाएँ। मेरे लिए अब अभय ही अभय हो जाए।अथर्ववेद 6/40/3 में परमात्मा इंद्र से प्रार्थना करते हुए हुए कहा गया है कि हमारे लिए नीचे से निर्वैरता, ऊपर से, पीछे से और आगे से निर्वैरता तू हमारे लिए कर दे। अर्थात् हम सदा निर्वैर हो कर रहें।
अथर्ववेद 14/1/22 में आपसी प्रेम व संयुक्त परिवार का संदेश देते हुए वर-वधू से परिवार में सबके मिलकर रहने की आकांक्षा की गई है, कि यहाँ गृहस्थाश्रम के नियमों में ही तुम दोनों रहो।कभी अलग मत होओ। पुत्रों के साथ तथा नातियों के साथ क्रीड़ा करते हुए, हर्ष मनाते हुए और उत्तम घर वाले तुम दोनों सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होओ। अथर्ववेद 3/30/2 में कामना की गई है कि पुत्र पिता के अनुकूल व्रती हो कर माता के साथ एक मन वाला होवे। पत्नी-पति से मधुवत अर्थात् मधु के समान और और शान्तिप्रद वाणी बोले। सन्तान माता-पिता की आज्ञाकारी और माता-पिता सन्तानों के हितकारी हों। पति-पत्नी आपस में मधुरभाषी और मित्र हों।
यजुर्वेद 2/34 में पितरों को अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम रस, स्वादिष्ट जल, अमृतमय औषधि, दूध घी, स्वादिष्ट भोजन, रस से भरे हुए फलों को दे कर तृप्त करने के लिए आदेश देते हुए कहा गया है कि परधन का त्याग करके अपने को प्राप्त धन का उपयोग करने वाले होओ। अर्थात् जिस प्रकार पितर अर्थात माता-पिता आदि ने हमारा पालन-पोषण किया है, उसी प्रकार हमें भी उनकी सेवा व सत्कार करना चाहिए।अथर्ववेद 3/30/3 में भाई, भाई से और बहन, बहन से द्वेष नहीं करने,एकमत वाले और एकव्रती होकर कल्याणी रीति से वाणी बोलने अर्थात परिवार में सबके प्रेमपूर्वक रहने के लिए कहा गया है।
अथर्ववेद 20/128/2स्त्रियों को सम्मान देने की आज्ञा देते हुए कहता है कि कुलस्त्री को गिराने, मित्र को मारने की इच्छा रखने वाले मनुष्य अतिवृद्ध हो कर भी अज्ञानी है।ऐसा मनुष्य परमात्मा को नहीं भजता और अधोगति को प्राप्त होता है। अथर्ववेद 14/1/44 में बधू को अपने श्वसुर, सास देवरों तथा ननदों के मध्य सम्राज्ञी होने की घोषणा करते हुए उसे ससुराल पक्ष के लोगों को सम्मान देने की आज्ञा देते हुए कहा गया है कि वधू ! तुम अपने विद्या और बुद्धि के बल से तथा अपने कर्तव्यों से छोटे-बड़े सबके मध्य प्रतिष्ठित हो। इसी प्रकार अथर्ववेद 14/2/17 में वधू से कहा गया है कि तू घर वालों के लिए प्रिय दृष्टि वाली, पति को न सताने वाली, सुखदायिनी, कार्यकुशला, सुन्दर सेवा वाली, सुन्दर मनवाली, वीरों को उत्पन्न करने वाली और प्रसन्न चित्त वाली हो। तेरे साथ मिल कर हम सब घर वाले बढ़ते रहें। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक ग्रन्थों में मित्रता की महिमागान करते हुए घर-परिवार से लेकर समाज और विश्व में मित्रता, मैत्री व विश्व बन्धुत्व की कामना की गई है।
एक मित्र होने का अर्थ है अपने सच्चे और ईमानदार हिस्से को साझा करना। मित्रता महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक बड़ा उत्तरदायित्व है, जिसे दोनों पक्षों को स्वेच्छा से ग्रहण करना पड़ता है। एक मित्र का कर्तव्य उच्च और महान कार्य में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना है कि मित्र अपनी निज की सामर्थ्य से बाहर का कार्य कर गुजरे। ऐसे व्यक्तियों से सुग्रीव के द्वारा श्रीराम से मित्रता का बंधन बंधाये जाने के समान मित्रता का बंधन बना लेना चाहिए। मित्र प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के होने चाहिए। मित्र मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे उन पर भरोसा और यह विश्वास कर सके कि उनसे किसी प्रकार का धोखा न होगा। इसीलिए मित्रों के चुनाव को सचेत कर्म समझकर हमें अपने से अधिक आत्मबल वाले व्यक्तियों को मित्र के रूप में ढूंढना चाहिए।
एक व्यक्ति के कई मित्र हो सकते हैं, और प्रायः एक या दो लोगों के साथ अधिक गहन सम्बन्ध हो सकते हैं, जिन्हें अच्छे या सबसे अच्छे मित्र कहा जा सकता है। दो मित्रों के बीच मित्रता की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। मैत्री अर्थात् मित्रता अथवा बन्धुत्व लोगों के मध्य पारस्परिक स्नेह का एक मधुर सम्बन्ध है। यह एक सहपाठी, पड़ोसी अथवा सहकर्मी जैसे परिचित अथवा सहचर की तुलना में पारस्परिक बन्धन का एक मजबूत व शक्तिशाली रूप है।
अन्तःप्रजातीय मैत्री : मैत्री की भावना उच्च बुद्धि वाले उच्च स्तनधारी पशुओं और कुछ पक्षियों में पाई जाती है। अन्तःप्रजातीय मैत्री मनुष्यों और पालतू पशुओं यथा, पालतू सर्प के बीच सामान्य है। मनुष्यों और पशुओं के बीच भी मैत्री हो सकती है। एक मनुष्य और एक गिलहरी अथवा बन्दर की मैत्री के दृश्य तो अक्सर ही दृष्टिगोचर होते रहते हैं। मैत्री दो पशुओं, जैसे कुत्तों और बिल्लियों के बीच भी हो सकती है।
-अशोक “प्रवृद्ध”-सु
>>>'मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।'(यजुर्वेद 36/18) सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखना चाहिए, लेकिन 'गृहस्थ-नेता' (राजर्षि) को हाथी नारायण है तो महावत भी नारायण है। साँप को काटने के लिए मना किया था , फुँफकारना जरूर याद रखते हुए, दूसरा गाल आगे करने के बजाये, भीतर से क्रोधित हुए बिना 'न आँख उठाकर , न आँख झुका कर , आँख से आँख मिलाकर' डिप्लोमैटिकली मुँहतोड़ उत्तर भी देना चाहिए,साथ-साथ निरंतर " सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ' तथा "मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।' (यजुर्वेद 36/18) की प्रार्थना भी जारी रहनी चाहिये।जैसे जयशंकर ने पन्नू खालिस्तानी और पाकिस्तानी का साथ देने पर अमेरिका और कनाडा को सुनाया है। लेकिन लीडर को अपना संतुलन बनाये रखने के लिए, यह याद रखने के लिए मैं देह नहीं आत्मा हूँ और - यहाँ x का पति, भाई, पिता और, होने का ऐक्टिंग कर रहा हूँ। वेद सुझाते हैं कि हम सबको परस्पर "मित्र की दृष्टि" से देखना चाहिए।मित्र (नवनीदा की दृष्टि -सूर्य निर्लिप्त भाव से) सबको समान दृष्टि से देखता है। (2020- 2023) > जीवन का स्वर्णिम काल है जब मैंने 'सर्वेभवन्तु मंत्र और वेदों के मित्रस्य चक्षु समीक्षामहे' का (अर्थ - हमें विश्व के सभी प्राणी मित्र दृष्टि से नित मुझे देखें, और सभी प्राणियों मित्रों को हम भी मित्र दृष्टि से नित देखें। poise या शिष्टता,या शाप ? का टेस्ट तुलनात्मक अध्यन किया - तो समझा ब्रह्म ही जगत बन गया हैं - इसलिए कोई बुरा नहीं है। समझने पर व्यष्टि अहं सर्वगत अहं में रूपान्तरित हो गया है, या नहीं ? इसके Test का इंतजाम माँ ने पर सौंपा था ?
हे ( द्रते )= अविद्यान्धकार के चिकित्सक, जगदीश्वर (ठाकुरदेव माँ काली) ! ( दुंहा मा ) मुझे मजबूती प्रदान करें। (मित्रस्य चक्षुषा) मित्र की आँख से (मा) मुझे (सर्वाणि भूतानि) सब प्राणी (समीक्षान्ताम्) देखें। (मित्रस्य चक्षुषा) मित्र की आँख से (अहं) मैं (सर्वाणिभूतानि) सब प्राणियों को (समीक्षे) देखें। (मित्रस्य चक्षुषा) मित्र की आँख से (समीक्षकहे) हम सब एक-दूसरे को देखते हैं।
व्याख्याअविद्या-अस्मिता पंचक्लेश के अंधकार में पीड़ित बने रहने के कारण हमें यह नहीं पता कि समाज में अन्य छात्रों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, एक-दूसरे को जैसी दृष्टि से देखना चाहिए। हम एकता कलह, विद्वेष, असन्तोष, उपद्रव, मार-काट में ही जीना चाहते हैं, भय के वातावरण में ही रहना पसंद करते हैं, चोरी-डकैती, अतिवाद और हिंसा के नग्न तांडव और अर्तनाद में ही जीना चाहते हैं। पता नहीं कब कोई किसी की जान ले लेगा, पता नहीं कब किस पर वज्रपात हो जाएगा और उसके आश्रय में रहने वाले की शिकायत कर उठेंगे, पता नहीं कब कोई अनाधिकृत विधवा हो जाएगी और उसके तथा उसकी अस्थि-पंजर के विलाप से दिशा करने लगेगी, पता नहीं कब राजमहलों रहनेवाले परिवार में खण्डहरों के निवासी हो जायेंगे, पता नहीं कब अच्छे घरों के लोग पर बसेरा करने को बसेरे हो जायेंगे। ऐसी भीषण परिस्थितियाँ पैदा होने वाले आतंकवादी हमले को, वेदना को, अनुभव क्यों नहीं करतीं? वे शांति को भंग करने और हँसी-मज़ाक करने वालों में ही सुखी क्यों होते हैं?
आओ इस परस्पर के ईर्ष्या-द्वेष, घृणा की संहार-लीला को खत्म करें हम आपसी प्रेम और भाईचारे से रहना सीखें। हम जिनका घर लूटते हैं, वे अगर हमारा घर लूटेंगे हैं तो हमें कैसा लगेगा ? थोड़ी देर के लिए यह भी तोड़ दें। हम स्टूडियो जान लेते हैं, वे अगर हमारी जान फिल्म में उतारू हों, तो हम कैसा अनुभव लेंगे, यह भी स्टूडियो। एक दिन आएगा जब हम हिंसा, मार-धाड़, व्यंग्य, हाहाकार, विलाप के माहौल से तांग ज्ञान शांति और प्रेम के माहौल की आवश्यकता अनुभव करने के लिए। तब बन्दूकों, तलवारों और बम के गोलों से हमारा विश्वास उठेगा। कराहती बधियाँ हमें प्रेम, स्मारक और मैत्री का वातावरण जन्म लेने को मिला।
जब मनुष्य में अहिंसा प्रतिष्ठित हो जाती है, तब सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक जीव भी वैरभाव को ठीक मित्र बन जाते हैं। क्या आपने सच्ची कहानी नहीं सुनी है कि एक शेर बंदूक की गोली से आहत हो गया था, उसकी मरहम पट्टी एक बौद्ध साधु ने किया था और उस साधु के मंच पर सिर झुकाने वह शेर रोजाना नियत समय पर आता था।सभी प्राणी हमें मित्र की आंख से देखें, हम सभी प्राणी हमें मित्र की आंख से देखें। मित्रता और शांति के साम्राज्य में हम रहते हैं। एक-दूसरे के सुख-दु:ख में हम साझी हैं। दूसरे का आनंद लेने पर हम भी आनंदित होते हैं, दूसरे का आनंद लेने पर हम भी आनंद लेते हैं। हे जगदीश्वर हमें ऐसा दिन देखने का सौभाग्य प्रदान करो। >>>विषय : परस्पर मेल का उपदेश।
पदार्थ : (सहृदयम्) एकहृदयता, (सांमनस्यम्) एकमनता और (अविद्वेषम्) निर्वैरता (वः) तुम्हारे लिये (कृणोमि) मैं करता हूँ। (अन्यो अन्यम्) एक दूसरे को (अभि) सब ओर से (हर्यत) तुम प्रीति से चाहो (अघ्न्या इव) जैसे न मारने योग्य, गौ (जातम्) उत्पन्न हुए (वत्सम्) बछड़े को [प्यार करती है] ॥१॥"
भावार्थ : ईश्वर उपदेश करता है, सब मनुष्य वेदानुगामी होकर सत्य ग्रहण करके एकमतता करें और आपा छोड़कर (अर्थात मिथ्या अहं को सर्वगत अहं में रूपान्तरित कर)सच्चे प्रेम से एक दूसरे को सुधारें, जैसे गौ आपा छोड़कर तद्रूप होकर पूर्ण प्रीति से उत्पन्न हुए बच्चे को जीभ से चाटकर शुद्ध करती और खड़ा करके दूध पिलाती और पुष्ट करती है ॥१॥
टिप्पणी :१−तैत्तिरीयारण्यक में पाठ है−ओ३म्। सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। तैत्ति० आ० १०।१ ॥ ओ३म्। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (अवतु) बचावे। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (भुनक्तु) पाले। हम दोनों (सह) मिलकर (वीर्यम्) उत्साह (करवावहै) करें। (नौ) हम दोनों का (अधीतम्) पढ़ा हुआ (तेजस्वि) तेजस्वी (अस्तु) होवे। (मा विद्विषावहै) हम दोनों झगड़ा न करें ॥ भगवान् यास्क मुनि कहते हैं। (अघ्न्या) गौ का नाम है−निघ० २।११। वह अहन्तव्या, [अवध्या न मारने योग्य] अथवा, अघघ्नी [पाप अर्थात् शारीरिक दुःख अथवा दुर्भिक्षादि पीड़ा नाश करनेवाली] होती है−निरुक्त ११।४३ ॥ श्रीमान् महीधर यजुर्वेदभाष्य अ० १ म० १ में लिखते हैं−अघ्न्या गौएँ हैं। गोवध उपपातक ‘भारी पाप’ है, इसलिये वे न मारने योग्य ‘अघ्न्या’ कही जाती हैं ॥ १−(सहृदयम्) वृह्रोः षुग्दुकौ च। उ० ४।१०। इति हृञ् हरणे=स्वीकारे कयन्, दुक् च। सहस्य सभावः। सहग्रहणम्। सहवीर्यम्। (सांमनस्यम्) सम्+मनस्-भावे ष्यञ्। समानमननत्वम्। ऐकमत्यम् (अविद्वेषम्)। द्विष वैरे-घञ्। अशत्रुताम्। सख्यम् (कृणोमि) उत्पादयामि। (वः) युष्मभ्यम्। (अन्यो अन्यम्) छान्दसं द्विपदत्वम्। परस्परम्। (अभि) सर्वतः। (हर्यत) हर्य गतिकान्त्योः। कामयध्वम्। (वत्सम्) अ० ३।१२।३। गोशिशुम्। (जातम्) नवोत्पन्नम्। (इव) यथा। (अघ्न्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२।
पदार्थ : (पुत्रः) कुलशोधक पवित्र, बहुरक्षक वा नरक से बचानेवाला पुत्र [सन्तान] (पितुः) पिता के (अनुव्रतः) अनुकूल व्रती होकर (मात्रा) माता के साथ (संमनाः) एक मनवाला (भवतु) होवे। (जाया) पत्नी (पत्ये) पति से (मधुमतीम्) जैसे मधु में सनी और (शन्तिवाम्) शान्ति से भरी (वाचम्) वाणी (वदतु) बोले ॥२॥"
भावार्थ : सन्तान माता पिता के आज्ञाकारी, और माता पिता सन्तानों के हितकारी, पत्नी और पति आपस में मधुरभाषी तथा सुखदायी हों। यही वैदिक कर्म आनन्दमूल है। मन्त्र १ देखो ॥२॥
पदार्थ : (भ्राता) भ्राता (भ्रातरम्) भ्राता से (मा द्वितीय) द्वेष न करे (उत्) और (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन से भी (मा) नहीं। (सम्यञ्चः) एक मत वाले और (सवृताः) एकव्रती (भूत्वा) अकार (भद्राया) कल्याणी रीति से (वाचम्) वाणी (वदत) बोलो 3॥"
भावार्थ: भाई-भाई, बहिन-बहिन और सब कुटुम्बी नियम डिक मेल से वैदिक रीति पर सुख भोगें ॥3॥
भावार्थ: भाई-भाई, बहिन-बहिन और सब कुटुम्बी नियम आदि मेल से वैदिक रीति पर सुख भोगें ॥3॥
पदार्थ: (येन) जिस [वेद पथ] से (देवाः) विजय सामान्यवाले पुरुष (न) नहीं (वियन्ति) साथ में रहते हैं (च) और (नो) न कभी (मिथः) अपने में (विद्विष्टे) विद्वेष करते हैं। (तत्) उस (ब्रह्म) वेद पथ को (वः)फाइ (गृहे) घर में (पुरुषेभ्यः) सब पुरुषों के लिए (संज्ञानम्) ठीक-ठीक ज्ञान का कारण (कृण्मः) हम करते हैं ॥4॥"
भावार्थ :सर्वभौम हितकारी वेदमार्ग घर के सभी लोग आनंद भोगें ॥4॥
पदार्थ : (ज्यायसंतः) बड़ों का मन रखेवाले (चित्तिनः) उत्तम चित्तवाले, (संराध्यायन्तः) समृद्धि [धन-धान्य की वृद्धि] करते रहे और (सधुराः) एक धुरा भरा (चरन्तः) बचे रहे तुम लोग (मा वि यौष्ट) अलग-अलग होओ, और (अन्यो अन्यस्मै) एक दूसरे से (वल्गु) मनोहर (वदंतः) टूटे हुए (एट) आओ। (वः) तुमको (सदृचिनान्) साथ-साथ गति [उद्योग वा विज्ञान] वाले और (संमानसः) एक मनवले (कृणोमि) मैं करता हूं ॥5॥"
भावार्थ: वेदानुयायी मनुष्य विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्धों का आदर्श बनाकर उत्तम गुणों की प्राप्ति, और समूह उद्योग से, धन धान्य राज आदि आनंद और भोगते हैं।
पदार्थ : (देवः) विजय सामान्यवाले पुरुष (जरसा) आयु के घटेव से (वि) भिन्न (अवृतन्) रह रहे हैं। (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष (त्वम्) तू (अरात्या) कंजूसी वा शत्रुता से (वि=वि वर्तस्व) भिन्न रह। (अहम्) मैं (सर्वेण) सब (पाप्मना) पाप कर्म से (वि) अलग और (यक्ष्मेण) राजरोग, क्षयी आदि से (वि=विवर्त्तै) अलग रहूं और (आयुषा) जीवन [उत्साः] से (सम्=सम् वर्तै) मिला रहौं ॥1॥"
भावार्थ : पुरुषार्थी लोग ब्रह्मचर्य आदि के सेवन से सदा बलवान रहते हैं, इसी प्रकार सभी मनुष्य मानसिक पाप और शारीरिक रोग के त्याग और शुभ लक्षण के सेवन बल से अपना जीवन सफल करते हैं ॥॥