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गुरुवार, 15 मार्च 2018

या देवी सा सारदा -1

अमेरिका के सेंट् लुईस वेदान्त सोसाइटी के अध्यक्ष परमपूज्य स्वामी चेतनानन्द जी महाराज लिखते हैं -'या देवी' अर्थात  'जो माँ जगदम्बा हैं', 'सा सारदा'- वे सारदा सरस्वती हैं ! श्रीदुर्गासप्तशती (देवीमाहात्म्यम्) ग्रन्थ में देवी भगवती- दुर्गा, काली, कौशाम्बी, चामुण्डा, लक्ष्मी, सरस्वती, शिवदूती, शाकम्भरी, अम्बिका, कात्यायनी, गौरी, जगद्धात्री, ब्राह्मणी, वैष्णवी, महामाया, मंगला, जयन्ती इत्यादि विभिन्न नामों से वर्णित हुई हैं। अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान,जब दैत्यराज शुम्भ ने यह समझ लिया कि वह माँ से कभी जीत नहीं सकता, तब वह आत्मदया (self-pity) दिखलाते हुए माँ जगदम्बा पर आरोप लगाता है कि आप तो अकेली नहीं लड़ रही हैं, बल्कि कई स्त्रियों की सहायता से युद्ध लड़ रही हैं, और यह युद्ध में अनुचित लाभ उठाने जैसा कार्य है। और तब वह (कुपित होकर) देवी दुर्गा से कहता है - ' तू बलके अभिमान में आकर झूठ-मूठ का घमण्ड न दिखा। तू बड़ी माननी बनी हुई है, किन्तु दूसरी देवियों के बल का सहारा युद्ध कर रही हो। ' 
तब देवी (माँ जगदम्बा) ने कहा -"एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।" देवी बोलीं- (एक एव अहम् जगति अत्र, द्वितीय का मम अपरा) ओ दुष्ट ! देख यहाँ केवल एक ही माँ है - मैं अकेली ही हूँ । इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख, ये सब देवियाँ, मेरी ही विभूतियाँ (शक्तियाँ) हैं, अत: मुझ में ही प्रवेश कर रही हैं। (चण्डी १०/३-५)
माँ सारदा की जीवनी पर आधारित पुस्तकों का अध्यन करने पर हमलोग देखते हैं कि उनको भी,सरस्वती, काली, बगलामुखी, लक्ष्मी, जगद्धात्री, त्रिपुरसुन्दरी, दुर्गा, भगवती, पर्वतवासिनी, सीता, राधा, विष्णुप्रिया, उमा, महामाया, जगदम्बा, शिवानी, सती इत्यादि नामों से वर्णित किया गया है। एक दिन बातचीत के क्रम में स्वामी केशवानन्द (केदार बाबू ) ने कहा -" माँ, आपके बाद षष्ठी, शीतला आदि देवियों को कोई नहीं मानेगा। " श्रीमाँ ने कहा था -" मानेगा क्यों नहीं ?  वे सब भी तो मेरे ही अंश हैं,मेरी ही विभूतियाँ हैं ! " 
(श्रीमाँ सारदा देवी -पेज ५३२) 
सारदा नाम का रहस्य : 'सा' -कहने से 'स'- अक्षर से शुरू होने वाले जितने दैवी गुण हैं; जैसे साधना, सेवा, सहिष्णुता, समदृष्टि, सदाचार, सरलता; स से सबुज या तारुण्य, सादगी या पवित्रता आदि उनके साथ सामीप्य का बोध होता है। एवं जो देवी इन समस्त दैवी गुणों की मूर्त विग्रह हैं, उनका ध्यान करने से (उनके चित्र पर मन को एकाग्र करने से) सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है। र - रक्षणे; जो माता काम-क्रोधादि षड रिपुओं से, आपदाओं से, मानसिक उन्माद (संविभ्रम -Paranoia) से, रोग-शोक-जरा-मृत्यु के भय से रक्षा करती हैं। 'दा -दाने, जो माता 'ज्ञान-भक्ति-विवेक-वैराग्य', 'धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष,' सुख-सम्पद, आनन्द आदि का दान करती हैं। इस प्रकार जो अपने सन्तानों का भरण, पोषण और रक्षण करती हैं -वे हैं सारदा।
 'आत्म-तत्व' का निरूपण करने के लिये वेदान्तशास्त्रों में जिस प्रकार- श्रुति, युक्ति और स्वसंवेद्य तथा परसंवेद्य अनुभूति आदि विभिन्न प्रणालियों का सहारा लिया जाता है।  [अर्थात " इस  संसार में जो कुछ भी दृश्यमान है और जहाँ तक हमारी बुद्धि अनुमान कर सकती है, उन सबका (3H) का मूल स्रोत्र एक मात्र ‘परब्रह्म’ (हृदय) ही है।" इस रहस्य को समझाने के लिए, अन्नमय कोष से आनन्दमय कोष तक की उर्ध्वमुखी यात्रा करने के लिये जिस प्रकार वेदान्त शास्त्रों में -  'श्रुति,युक्ति और अनुभूति' आदि प्रणालियों का सहारा लिया जाता है।] उसी प्रकार- 
'या देवी' अर्थात  'जो माँ जगदम्बा हैं', 'सा सारदा'- वे सारदा सरस्वती हैं!" 
इस उच्चतर सत्य का निरूपण,अथवा माँ सारदा के देवीत्व का निर्धारण करने के लिये भी, हमलोग यहाँ भगवान श्रीरामकृष्णदेव उक्तियों  का, माँ के द्वारा स्वयं अपने मुख से उच्चारित स्वरुप को प्रकाशित करने वाले कथनों का, तथा विभिन्न सन्यासियों और भक्तों के दर्शन एवं अनुभवों का संक्षेप में उल्लेख करेंगे।
श्रीमाँ की अलौकिकता के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्णदेव की उक्ति : 
स्वामी गम्भीरानन्द जी अपनी पुस्तक श्रीमाँ सारदा देवी की भूमिका में लिखते हैं -" हम इस विश्वास के साथ इस असीम साहसिक कार्य में (अर्थात माँ जगदम्बा ही श्रीमाँ सारदा के रूप में अवतरित हुई हैं-का निर्धारण  करने के कार्य में) अग्रसर हुए कि इसमें हमें व्यक्तिगत लाभ है। श्रीमाँ सारदा की जीवनी-रचना के माध्यम से हम वस्तुतः एक सुदीर्घ आध्यात्मिक साधना में ही रत हुए हैं। क्योंकि 'माँ' कोई निगूढ़ दर्शन अथवा जटिल मतवाद लेकर अविर्भूत नहीं हुई थीं। वे तो आई थीं जीवमात्र की कल्याण-विधायनी जननी के रूप में। और ('सर्वोच्च सत्य अत्यन्त सरल है!') इसीलिये जननी के स्नेह की व्याख्या सन्तान के निकट करने की आवश्यकता नहीं होती। " 
वर्तमान युग में युवाओं के चरित्र से आत्मश्रद्धा, विवेक-प्रयोग, मनःसंयोग आदि सद्गुणों को निर्मूल करने के लिये अश्रद्धा, जड़वादप्रियता, भोगपरायणता आदि आसुरी वृत्तियों ने जो लड़ाई ठानी है, और जिसके फलस्वरूप धर्म की ग्लानि, अधर्म की वृद्धि और ईर्ष्या, द्वेष, 'कामिनी--कांचन में आसक्ति के प्राबल्य से चरित्रनिर्माण की शिक्षा देने में समर्थ मातृहृदय लोक-शिक्षकों का, या मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक नेताओं का घोर अभाव हो गया है। इस कमी को दूर करने के लिये तथा सच्चे लोकशिक्षक या नेता के आदर्श को स्थापित कर, मानवसमाज को आध्यात्मिक अनुभूति के उच्च सोपान पर ले जाने के लिये स्वयं 'ब्रह्म और उनकी शक्ति' दोनों को कर्म-क्षेत्र में अवतीर्ण होना पड़ता है।
जिस समय श्रीभगवान (ब्रह्म) नररूप में अवतीर्ण होते हैं, उस समय प्रायः उनकी आराधिता शक्ति भी नारी-रूप में उनकी सहगामिनी होती है। श्रीरामचन्द्रजी के साथ सीता, श्रीकृष्णजी के साथ राधा, बुद्धदेव के साथ यशोधरा, श्रीचैतन्यदेव के साथ विष्णुप्रिया के आगमन से यही प्रमाणित होता है। बिना मातृजाति के अभ्युदय के भारत का कल्याण सम्भव नहीं है। पक्षी एक पंख से कभी उड़ नहीं सकता। इसीलिये श्रीरामकृष्ण देव ने स्वयं अपनी सहधर्मिणी को प्रशिक्षित करने का भार-ग्रहण किया था (मातृहृदय लोक-शिक्षक बनने और बनाने बनाने वाली' भारत की प्राचीन 'गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' - 'BE AND MAKE'  में प्रशिक्षित करने का भार-ग्रहण किया था।)   
यद्यपिमानवजाति के महान मार्गदर्शक नेता - भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (९/११) में इस प्रकार का संकेत दिया है कि भगवान के स्वयं मानव-देह धारण करके आने पर भी मूढ़ व्यक्ति उनके 'अन्तर्निहित परमेश्वरत्व (डिविनिटी)' को न जान साधारण नर-बुद्धि से उनकी अवज्ञा करते हैं। 'अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्।' .... मूर्ख लोग मेरी अन्तर्निहित दिव्यता (ब्रह्मत्व) को न जानते हुए मुझे भी (ब्रह्म के अवतार या निर्विकल्प-समाधिवान पुरुष श्रीरामकृष्ण को भी) साधारण मनुष्यों के जैसा मनुष्य शरीर के आश्रित  मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं। [अवतार (या निर्विकल्प समाधिवान पुरुष सिंह-शावक) को भी अपने ही जैसा मोहग्रस्त या हिप्नोटाइज्ड (कामिनी-कांचन में आसक्त भेंड़-शिशु)  समझते हैं, इसीलिये उनकी अवज्ञा करते हैं !]  तथापि मानवजाति के समस्त मार्गदर्शक नेता, हर युग में मनुष्य-शरीर के सहारे ही सुखदुःख और भ्रमप्रमाद से पूर्ण मानव-जीवन को दैवी सम्पदाओं से विभूषित कराने की प्रणाली (प्रशिक्षण -पद्धति) दिखाते आये हैं। क्योंकि स्वार्थ-विजड़ित संसार में निबद्धदृष्टि जन-साधारण को उच्चतर सत्य की अनुभूति कराकर उन्हें अपनी अन्तर्निहित ब्रह्मत्व (दिव्यता) को अभिव्यक्त करने के लिए अनुप्रेरित करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय है ही नहीं। (श्रीमाँ सारदा देवी-१-८)               
" तत्वदर्शी तोतापुरी ने कहा था कि श्रीरामकृष्ण के समान निर्विकल्प-समाधिवान पुरुष यदि निर्विकार चित्त से अपनी सहधर्मिणी के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे तो धर्महानि नहीं है। 'किशोरी सारदा सारदा देवी' धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की  साधना की उत्तराधिकारिणी (भावी-संघमाता) के रूप में  संसार में मातृत्व की महिमा को स्थापित करने के लिये प्रस्तुत हो रही हैं। लीला-शरीरधारी, भावपुंज श्रीरामकृष्ण इस बात को जानते हुए अपनी सहधर्मिणी को तदनुसार तैयार कर रहे थे। 
श्रीरामकृष्ण ने एक दिन उनसे कहा था, ' चन्दा मामा जैसे सभी बच्चों के मामा हैं, वैसे ही ईश्वर सभी के अपने हैं। उन्हें पुकारने का सभी को समान अधिकार है। जो कोई भी उन्हें पुकारेगा, उसी को वे दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे। यदि तुम उन्हें पुकारोगी, तो तुम्हें भी दर्शन मिलेगा। " वे श्रीमाँ को केवल उपदेश देकर ही निवृत्त नहीं होते थे, बल्कि वे इस बात की भी खोज रखते थे कि श्रीमाँ उन उपदेशों का (५-अभ्यासों का ?) अपने जीवन में कितना और किस प्रकार पालन करती हैं। 
श्रीमाँ सारा दिन नौबतखाने में रहकर गृहस्थी के कार्य करती थीं; लेकिन रात में श्रीरामकृष्ण के कमरे में उन्हीं की शय्या पर सोने की आज्ञा पा चुकी थीं। इसी बीच एक दिन एकान्त पाकर श्रीरामकृष्ण ने परीक्षा की तौर पर श्रीमाँ से पूछा -" क्यों, क्या तुम मुझे संसार-मार्ग (प्रवृत्ति मार्ग) में खींचने के लिये आयी हो ?" श्रीमाँ ने रंचमात्र दुविधा किये बिना उत्तर दिया, " नहीं, मैं तुम्हें प्रवृत्ति-मार्ग में क्यों खींचने लगी ? मैं तो तुम्हारे इष्टपथ (सत्ययुग -स्थापन) में सहायता ही करने के लिए ही आयी हूँ। "  
एक दिन श्रीमाँ ने भी श्रीरामकृष्ण का पैर दबाते समय पूछा,"तुम मुझे किस रूप में सोचते हो ?"  श्रीरामकृष्ण ने उत्तर दिया," जो माँ (भवतारिणी) मन्दिर में हैं,उसीने इस शरीर को उत्पन्न किया है और अब नौबतखाने में हैं; फिर वही इस समय मेरे पैर दबा रही हैं। सचमुच मैं तुम्हें सर्वदा साक्षात् आनन्दमयी के रूप में ही देखता हूँ। "
श्रीमाताजी श्रीरामकृष्ण के कमरे में उन्हीं के साथ शयन करती थीं। किन्तु यह कोई साधारण दाम्पत्य-जीवन तो नहीं था ! पूर्णयौवन श्रीरामकृष्ण और नवयौवना श्रीमाँ इस समय मानव-समाज की शिक्षा के लिए (मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेताओं का निर्माण करने के लिए) जिस लीला में प्रवृत्त हुए थे, उसके मुकाबले माँ सीता की अग्नि-परीक्षा भी तुच्छ प्रतीत होती है। " (श्रीमाँ सारदा देवी -देवीत्व का जागरण,५७- ५८)        
श्रीरामकृष्ण ने कहा है -"मातृभाव (लीडरशिप) साधना की अन्तिम बात है। " इन्द्रीय-लोलुप, संसार को ही सर्वस्व समझने वाले, देहात्मवादी मानवसमाज को उच्चतर सत्य की अनुभूति के राज्य में उठा लेने के लिये इस युग में श्रीभगवती का मातृरूप में अवतीर्ण होना अत्यन्त आवश्यक था। श्रीमाँ के जीवन के इस रहस्य को श्रीरामकृष्ण जानते थे, और श्रीमाँ से उसे कह भी गए थे। उत्तरकाल में एक जिज्ञासु भक्त ने उनसे प्रश्न किया, " माँ, अन्य अवतारों ने तो अपनी शक्ति के तिरोहित होने के पश्चात् अपना शरीर त्यागा, पर इसबार ठाकुर आपको रखकर पहले ही क्यों चले गए ? इसके उत्तर में श्रीमाँ ने कहा, " बेटा, यह तो तुम जानते ही हो कि ठाकुर संसार में प्रत्येक को मातृभाव से देखते थे। जगत में उसी मातृभाव के विकास के लिये वे मुझे इसबार छोड़ गए हैं। " (श्रीमाँ सारदा देवी -१५१ ) 
स्वामी गम्भीरानन्द जी अपनी पुस्तक श्रीमाँ सारदा देवी में लिखते हैं - " स्वर्ग की देवी भगवती के साथ मनुष्यों ने अनेक प्रकार के नाते जोड़े हैं, तो भी देवी देवी-भगवती ही रह गयी हैं। मनुष्यों की तरह उन्होंने शरीर धारण नहीं किया। श्रीमाँ के जीवन में हम मातृरुपा देवी के अवतरण को अपनी चरम सीमा पर पहुँचा हुआ देख पाते हैं। यहाँ पर देवी साक्षात्, सचला, रक्त-मांस के शरीर से युक्त हैं- श्रीरामकृष्ण की आराधिता देवी भवतारिणी तथा उनकी गर्भधारिणी जननी से अभिन्ना -श्रीमाँ सारदा हैं ! किन्तु आधुनिक शिक्षा और वंशाभिमान आदि आडम्बर से रहित, सरला श्रीमाँ को पहचानना आसान नहीं है। इसी से श्रीरामकृष्ण स्वयं उनका स्वरूप प्रकट करने के लिये अग्रसर हुए थे। " (श्रीमाँ सारदा देवी ,भार-समर्पण -१४४ -१४९) 
तथा श्रीमाँ के संबन्ध में श्रीरामकृष्णदेव ने विभन्न अवसर पर कई वक्तव्य दिये हैं :
श्रीरामकृष्णदेव ने एक दिन गोलाप-माँ से कहा था - " वह (श्रीमाँ) सारदा है - सरस्वती है। ज्ञान देने के लिये आयी है। सौन्दर्य रहने पर उसे अशुद्ध भाव से देखने के कारण कहीं लोगों का अमंगल न हो जाय, इसी कारण इस बार रूप छिपाकर आई है। वह ज्ञान- दायिनी, महाबुद्धिमती है। वह क्या ऐसी-वैसी है ? वह मेरी शक्ति है!" (श्रीमाँ सारदा देवी-भार-समर्पण-१४४)  
[ ओ सारदा -सरस्वती, ज्ञान दिते ऐसेछे। रूप थाकले पाछे अशुद्ध मने देखे लोकेर अकल्याण होय, ताई एबार रूप ढेके ऐसेछे। ओ ज्ञानदायिनी, महाबुद्धिमती, ओ कि जे से ? ओ आमार शक्ति। एइ जे मन्दिरे माँ (भवतारिणी) रयेछेन, आर एई नहबतेर माँ (श्रीमाँ) --अभेद। ओरे, हृदे एके (निज देह देखाईया) तुई तुच्छताच्छील्य करे कथा बोलिस बोले ओके (श्रीमाँ के) आर कखनो एमन कथा बोलिस नि। ऐर भीतरे जे आछे, से फोंस कोरले होयतो रक्षा पेलेउ पेते पारिस; किन्तु ओर भीतर जे आछे, से फोंस कोरले तोके ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वरउ रक्षा करते पारबेन ना। अनन्त राधार माया कहने ना जाय, कोटि कृष्ण कोटि राम हय जाय रय।"]
"अरे हृदय, यह सोच कर कि तुम इसकी -(अपने शरीर की ओर संकेत करते हुए) अवज्ञा कर जाते हो, उससे (श्रीमाँ से) ऐसी अवज्ञापूर्ण बातें फिर कभी मत कहना। इस शरीर के भीतर जो है, उसकी फुफकार से तो तुम रक्षा पा भी सकते हो, पर उसके भीतर जो है, उसकी फुफकार से ब्रह्मा,विष्णु, महेश भी तुम्हारी रक्षा न कर सकेंगे।"(श्रीमाँ सारदा-प्रकाश और छाया के बीच-८२) 
"अनन्त राधार माया कहने ना जाय, कोटि कृष्ण कोटि राम हय जाय रय।" अर्थात राधा (माँ जगदम्बा) की माया अनन्त और अनिर्वचनीय है, उसे कहा नहीं जा सकता। करोड़ों की संख्या में राम और कृष्ण उसी से उत्पन्न होते हैं, उसी में रहते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं।" (श्रीमाँ सारदा देवी -१५३) 
 श्रीरामकृष्णदेव ने श्रीषोड़शी-पूजन के समय कलश के मन्त्राभिषिक्त जल से श्रीमाँ का बारम्बार अभिषेक किया। तत्पश्चात उन्हें मंत्र श्रवण कराके प्रार्थना-मंत्र का उच्चारण किया, " हे सर्वशक्तिमयी मातः त्रिपुर-सुन्दरी, सिद्धिद्वार खोलो। इनका (श्रीमाँ का) शरीर और मन पवित्र कर इनमें अविर्भूत हो सर्वकल्याण -साधन करो। "  (श्रीमाँ सारदा देवी -देवीत्व का जागरण-६२प्रश्न किया जा सकता है कि क्या माँ सारदा षोड्षी पूजा के पहले देवी नहीं थीं ? नहीं, वे तो पहले से भी देवी ही थीं। किन्तु जैसे हमलोग पूजा के मण्डप में दुर्गा प्रतिमा में प्राणप्रतिष्ठा करते हैं, और पूजा के द्वारा जाग्रता देवी बना देते हैं, उसी प्रकार ठाकुर ने 'मूर्तिमती विद्यारूपिणी नारी के शरीर की ईश्वरीय उपासना करके उनके देव-मानवत्व को सभी तरह से परिपूर्ण कर दिया था। 
स्वामी गम्भीरानन्द जी लिखते हैं- " जिसे, (श्रीमाँ को) श्रीरामकृष्ण अपनी लीला को पूर्ण करने के लिये, बाद में छोड़ जायेंगे,उसे हार्दिक पूजा (অন্তরের পূজা ) प्रदान कर अपने पास एवं जनसमाज में सम्मानित और महिमान्वित करना तथा अपनी शक्ति (ब्रह्म की अभेद शक्ति) के बारे में सचेत करना भी आवश्यक था। इसीलिए षोड़सी-पूजा का आयोजन किया गया। "(श्रीमाँ सारदा देवी -देवीत्व का जागरण,पृष्ठ ६१)
[लीला-शरीरधारी, भावपुंज श्री रामकृष्ण अपनी सहधर्मिणी को (भावी-संघमाता) के रूप (साँचा )में  संसार में मातृत्व की महिमा को स्थापित करने के लिये, तदनुसार तैयार कर रहे थे। अर्थात भारत की प्राचीन  गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा में प्रशिक्षित कर रहे थे। ताकि भविष्य में सत्ययुग -स्थापन कार्य के प्रचार-प्रसार करने के लिए 'विवेकानन्द -भगिनी निवेदिता भक्ति-वेदान्त लीडरशिप प्रशिक्षण परम्परा ' में  -वुड बी लीडर्स को  मातृहृदय-प्राप्त मानवजाति के मार्गदर्शक प्रेमस्वरूप नेताओं के रूप में 'बी ऐंड मेक यूथ-ट्रेनिंग देने में समर्थ मातृहृदय- संगठन महामण्डल का आविर्भाव हो सके। 
मूढ़ अर्थात हिप्नोटाइज्ड व्यक्ति : वह है जिसका चित्त सत्य की ओर से विमुख हो गया है, विपरीत हो गया है। सत्य का अनुभव तो उन्हें भी होता है। किन्तु उसके साथ साथ असत्य के साथ मोह भी बना रहता है। और जन्मजन्मांतर की आदतों को संस्कार (प्रवृत्ति) बन जाने के कारण उसको हम छोड़ नहीं सकते। यह जो हमलोग जन्मजन्मान्तर के संस्कार वश या अभ्यास वश 'अली-मृग-मीन-पतंग-गज जरै एक ही आँच कहते-सुनते रहने पर भी ' इसी नश्वर संसार में मूढ़ हो गये हैं, अटक गये हैं। क्योंकि देह-मन या कामिनी-कांचन (2H=2K) आसक्त या हिप्नोटाइज्ड हो जाने से साधारण मनुष्यों (अप्रशिक्षित-मनुष्यों) की 'उभयतोवहिनी चित्तनदी का प्रवाह' अधोमुखी या पापवाहा हो गया है। अन्तर्निहित सत्य (आत्मा ही ब्रह्म है) से विमुख, विपरीत हो गया है। वैसे  उनको भी अन्तर्निहित सत्य का अनुभव (सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा का अनुभव) तो होता है, किन्तु 'असत्य-मिथ्या' (2H, देह-मन, नाम-रूप, 2K) के साथ इतना मोह हो जाता है कि, मनःसंयोग में अप्रशिक्षित मनुष्य (हिप्नोटाइज्ड मनुष्य) विवेक-प्रयोग करना नहीं जानते और उसे छोड़ नहीं पाते। 'जैसे जाड़े में पढ़ने के लिए सुबह क्यों नहीं उठे ? पूछने पर लड़का बोलता है, हमने तो कंबल छोड़ दिया है, किन्तु कंबलवे हमको नहीं छोड़ रहा है। 
- उससे बाहर निकलने का उपाय है -'गुरु-शिष्य सनातन वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा' में चरित्रवान मनुष्य बनने और बनाने की पद्धति ' BE AND MAKE' चरित्रनिर्माण की प्रक्रिया अर्थात महामण्डल द्वारा निर्देशित ५ दैनन्दिन अभ्यास का प्रशिक्षण देने में समर्थ वैसे लोकशिक्षकों (वुड बी लीडर्स -मातृहृदय नेताओं) का बहुत बड़ी संख्या में निर्माण करना; जो सुखदुःख और भ्रमप्रमाद से पूर्ण मानव-जीवन को दैवी सम्पदाओं से विभूषित कराने की शिक्षा-प्रणाली (प्रशिक्षण -पद्धति) का प्रचार-प्रसार कर सके। क्योंकि स्वार्थ-विजड़ित संसार में निबद्धदृष्टि जन-साधारण (कामिनी-कंचन में निबद्ध-दृष्टि हिप्नोटाइज्ड जनसाधारण) को उच्चतर सत्य (इन्द्रियातीत सत्य) की अनुभूति कराकर उन्हें यथार्थ मनुष्य (भ्रममुक्त या डीहिप्नोटाइज्ड मनुष्य) बनने और बनाने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय है ही नहीं। (श्रीमाँ सारदा देवी-१-८)  ]
  
श्रीश्री माँ की महिमा को प्रकाशित करने वाले 'स्वयं-स्वीकृति और आदेश' :
" मेरी माँ (माँ के भक्तों,वीरों या हीरोज की नानी -श्यामासुन्दरी देवी) एक बार शिहड़ ग्राम में देवी का दर्शन करने के लिये गयी थीं। वापस लौटते समय ..... देवालय के निकट.... एक वायु मानो उनके पेट में प्रविष्ट हो गया, उनका पेट भारी लगने लगा। ....अकस्मात मेरी माँ ने देखा कि बेलवृक्ष की शाखा से उतर कर, लाल रंग का घंघरा-चोली पहने एक अतिसुन्दरी छोटी बालिका उनके पास आयी, और पीठ की तरफ से उनके गले में दोनों कोमल बाहें डालकर मधुर स्वर में बोली - "लो, मैं तुम्हारे घर में आ गयी माँ !" तब माँ मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। उन्हें यह नहीं जान पड़ा कि वे इस अवस्था में कब तक रहीं। उनके आत्मीय लोगों ने खोजते हुए आकर, उन्हें सचेत किया,और उन्हें सहारा देकर घर ले आये। जिस बालिका ने माँ के गर्भ में प्रवेश किया था -उसी से मेरा जन्म हुआ है। " (श्रीमाँ सारदा देवी पेज -२१)     
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीमाँ के जन्म और कर्म दिव्य हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता (४/९) में कहा है -" जन्मकर्म च मे दिव्यं -हे अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् अलौकिक है" (भगवान् के जन्म-कर्म की दिव्यता एक अलौकिक और रहस्यमय विषय है, इसके तत्त्व को वास्तव में या तो भगवान् स्वयं जानते हैं, अथवा यत्किंचित् उनके वे भक्त भी जानते हैं, जिनको उनकी दिव्य मूर्ति का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ हो; परन्तु वे भी जैसा जानते हैं कदाचित वैसा कह नहीं सकते।)
जयरामबाटी में श्रीमाँ एक दिन शाम बाद भक्तों के द्वारा भेजे गए पत्रों को सुन रही थीं। किसी स्त्री भक्त ने जो पत्र लिखा था वह माँ की स्तव -स्तुति से भरा हुआ था। पत्र के मर्म को सुनकर माँ ने कहा, " देखो, बहुत बार मैं सोचती हूँ कि मैं तो उन्हीं राम मुखर्जी की बेटी हूँ, मेरी उम्र की और भी तो बहुत लड़कियाँ जयरामबाटी में हैं; तो फिर उनमें और मुझमें अन्तर ही क्या है ? भक्त लोग कहाँ-कहाँ से आकर मुझे प्रणाम कर जाते हैं। उनके बारे में पूछने पर पता चलता है कि कोई हाकिम है,कोई वकील। ये सब भला ऐसे आते ही क्यों हैं ?" पेज ५५८ ) 
एक महिला भक्त ने पूछा -" माँ, आप जो स्वयं भगवती हैं, यह  हम सब क्यों नहीं समझ पाते ? " माँ ने कहा - "सभी क्या पहचान सकते हैं, बेटी ? कहीं घाट पर एक टुकड़ा हीरा पड़ा था। सभी उसे पत्थर समझ उस पर पैर घिस स्नान करके चले जाते। एक दिन एक जौहरी उस घाट पर स्नान करने आया तो उसने पहचाना कि यह एक बड़ा भारी बहुमूल्य हीरा है।" पेज ५३२/ 
उपयुक्त आधार मिलने पर श्रीमाँ अपना देवीत्व स्पष्ट स्वीकार करती थीं। स्वामी तन्मयानन्द ने एक बार जयरामबाटी जाकर श्रीमाँ के चरणों की पूजा की। चरणों को जब अपने मस्तक पर धारण किया, तब माँ ने बाधा डालकर कहा, "नहीं, नहीं, चरण सिर पर नहीं रखना चाहिये, क्योंकि ठाकुर वहाँ रहते हैं-वे साक्षात् भगवान हैं; मस्तक-स्थित सहस्र-दल कमल पर बैठे हुए हैं। " इतना सुनते ही तन्मयानन्द ने प्रश्न किया, "माँ, ठाकुर यदि साक्षात् भगवान हैं, तो आप कौन हैं ? " रंचमात्र द्विधा किये बिना श्रीमाँ ने उत्तर दिया, " मैं और कौन हूँ? मैं भी साक्षात् भगवती हूँ। " पेज-५२९/   
[भक्तों के प्रति कृपावश कभी-कभी श्रीमाँ अनजाने ही मानो अपना दिव्यस्वरूप बतला देती थीं। वैकुण्ठ नामक एक भक्त श्रीमाँ के दर्शन को कामारपुकुर गया। उस समय वहाँ रामलाल दादा और लक्ष्मी दीदी उपस्थित थीं। भक्त (हीरो-वीर) जब विदा होने लगा, तो श्रीमाँ अचानक बोल उठीं -" वैकुण्ठ, मुझे पुकारना।" दूसरे ही क्षण अपने को सँभालते हुई बोलीं," ठाकुर को पुकारना,ठाकुर को पुकारने से ही सब कुछ होगा। "  ....लक्ष्मी दीदी वहीं थीं, उन्होंने वैकुण्ठ को समझा दिया कि श्रीमाँ के मुख से आज जो नई वाणी निकली है, वह बड़ी ही मूल्यवान है। यह श्रीमाँ की स्वयं-स्वीकृति और आदेश है; इसलिये वैकुण्ठ माँ को ही पुकारे। माँ ने सारी बातें सुनीं, पर प्रतिवाद नहीं किया। (श्रीमाँ सारदा देवी पेज-देवी-५३१]     
एक बार माँ के शिष्य स्वामी ईशानानन्द जी से मैंने (स्वामी चेतनानन्द ने) पूछा था - " हमलोग अपने घरों में माँ, मौसी, बुआजी, दीदी इत्यादि महिलाओं को देखते हैं, उनमें और श्रीश्री माँ में क्या अन्तर है ? " उन्होंने शांत चित्त से उत्तर दिया - 'क्या तुमने ऐसे किसी मनुष्य को देखा है जिसमें कोई भी कामना न हो ? हमलोगों ने माँ को देखा है उनमें कोई भी कामना नहीं थी। कामनायें (Desires) तो जीवों में ही हुआ करती हैं, किन्तु ईश्वर कामना-रहित होते हैं। अतः श्रीमाँ स्वयं ईश्वरी थीं !' 
'उद्बोधन' में श्रीरामकृष्ण की पूजा करते समय पगली-मामी बड़बड़ा कर माँ के लिये कठोर शब्दों का प्रयोग कर रही थीं। माँ ने पूजा समाप्त करके पगली की ओर देखकर कहा, " कितने ऋषि-मुनि तपस्या करके भी मुझे नहीं पाते। और तुम सबने मुझे पाकर भी खो दिया।" 
काशी में एक दिन पगली मामी ने सारी रात माँ को गालियाँ दीं -" ठाकुर-झी मरुक,ठाकुर-झी मरुक"- अर्थात 'ननदजी मर जायँ,ननदजी मर जायँ' सुबह श्रीमाँ ने उन बातों का उल्लेख करते हुए कहा -" छोटी बहु नहीं जानती, कि मैं मृत्युंजय हूँ।"  
एक दिन जयरामबाटी में उन्होंने आत्मीयों के उधम से उकताकर कहा, " देखो, तुम लोग मुझे अधिक न सताया करो। इसके भीतर जो हैं, वे यदि एक बार फुफकार उठे, तो फिर ब्रह्मा, विष्णु, महेश -किसी की सामर्थ्य नहीं कि तुमलोगों को बचा सकें। "  
और भी एक बार राधू के अत्याचार की बातों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कोआलपाड़ा में स्पष्ट रूप से कहा था, " देखो बेटी, यह शरीर (अपना शरीर दिखाकर) देवशरीर है ! इससे और कितना अत्याचार सहा जायेगा ? भगवती न होने से क्या मानवी इतना सह सकती है ?.... देखो,बेटी, मेरे रहते ये कोई हमें नहीं जान सकेंगे, बाद में सब समझेंगे (माँ काली जगतजननी बोलकर पूजा भी करेंगे!) " (श्रीमाँ सारदा देवी-पेज-५२६-५२७) 
[जो खाये चीनी,उसे दिलाये चिन्तामणि'-(गृहणी/३९८)]    
संन्यासीयों तथा माँ के भक्तों (वीरों या हीरोज) के दर्शन एवं अनुभूतियाँ : 
श्रीरामकृष्ण अपने भक्तों के सामने-शिव,काली,कृष्ण, राधा, सीता, गोपाल, चैतन्य, ईसा आदि कई रूपों में आविर्भूत हुए हैं। उसी प्रकार श्रीमाँ भी अपने प्रिय भक्तों (हीरो या वीर - जो नाश की गति नाचता है -के सामने) जगद्धात्री, काली, सरस्वती, माँ तारा, बगलामुखी आदि कई रूपों में प्रकट हुई हैं! 
एकबार माँ राधू का इलाज करवाने के लिए स्वामी हरिप्रेमानन्द को साथ लेकर बांकुड़ा गयी थीं। वहाँ एक दिन शाम के समय माँ के चरणकमलों की सेवा करते हुए (तेल मालिश करते समय) हरिप्रेमानन्द के मन में विचार उठा कि इतनी दुबली-पतली माँ क्या सचमुच जगतजननी माँ जगदम्बा हैं ? अपनी आत्मकथा में लिखते हैं - " चरणों पर हाथ हल्के हल्के दबा रहा था, धीरे धीरे ऐसा अनुभव हुआ कि यह तो किसी वृद्धा के दुबले-पतले चरण नहीं हैं, मानो किसी नवयुवती चरण हैं ! नजदीक में ही एक लालटेन जल रहा था, उसकी रौशनी में स्पष्ट रूप से देखा कि 'आलता से सुशोभित दो अत्यन्त सुन्दर चरण हैं,और सुदृढ़ स्थूलरूप से गढ़ी उँगलियों पर अर्धचन्द्राकार नाख़ून शोभायमान हो रहे हैं। ' दोनों चरणों में सोने के पायल है- और पायल में हीरे-मोती जड़े हुए हैं !..... आश्चर्य से भरकर ऊपर .... माँ के मुखड़े की ओर .....ध्यान से देखा- तो, सोने जैसी आभा,त्रिनयना,चतुर्भुजा, कई प्रकार के आभूषणों से सुशोभित माँ जगद्धात्री मूर्ति ! सिर पर मुकुट, हाथों में अस्त्र ! उनके सम्पूर्ण अंगों से एक अत्यंत सुन्दर ज्योति विकीर्ण हो रही थी! अच्छी तरह से देख पाता कि, उसके पहले ही 'माँ' 'माँ' करता हुआ चैतन्य खो दिया और मूर्छित हो गया।" (पदप्रान्ते/खंड १) 
[एक दिन शाम को रा-माँ के पैर में गठिया के लिए तेल मालिश करते-करते सोच रहे थे...माँ की व्याधि उनके शरीर में आ जाये और माँ स्वस्थ हो जायें। माँ ने मुस्कुराते हुए पूछा, "बेटे, तुम यह कैसी बात सोच रहे हो ? तुमलोग जीते रहो। मैं बूढ़ी हो गयी हूँ, अब भला कितने दिन बचूँगी ? इस प्रकार की चिंता क्या कभी करनी चाहिए? ठाकुर तुमलोगों को दीर्घायु करें। " इतना कहकर सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। पेज-५३४/ 
स्वामी तन्मयानन्द कोआलपाड़ा से जयरामबाटी जाते-जाते सोच रहे थे कि यदि माँ की कुछ सेवा कर सकूँ, तो बड़ा ही अच्छा हो। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि माँ पैर पसारे बैठी हैं, और पास में तेल की कटोरी रखी है। भक्त तेल लेकर पैरों में लगाने लगे, और माँ उन्हें बताती रहीं कि किस पैर कैसे तेल लगाना होगा। इस प्रकार मन भरकर करीब पचीस मिनट तक तेल लग जाने के बाद माँ ने कहा, "अब तो हुआ ? अब नहाने जाऊँ, ठाकुर की पूजा करनी होगी। पेज-५३५ /"]  
एक बार चन्द्रमोहन दत्त बैलगाड़ी से माँ के साथ कोआलपाड़ा होते हुए विष्णुपुर जा रहे थे। रास्ते में किसी जगह पर गाड़ी रोक कर पेड़ की छाया में माँ आराम कर रही थीं। एकान्त स्थान देखकर चन्द्रमोहन दत्त ने माँ से कहा -'आपके वास्तविक रूप को देखना ही मेरी अन्तिम इच्छा है।' किन्तु माँ किसी प्रकार से राज़ी नहीं हुईं। बहुत अनुनय-विनय करने के बाद माँ ने अनिच्छा पूर्वक दूसरे लोगों से कहा-" तुमलोग थोड़ा दूर चले जाओ, इसके साथ मुझे कुछ बातचीत करना है। " फिर चन्द्र से बोलीं-" देखो, केवल तुम्हीं देख सकोगे, उनलोगों में से और कोई नहीं देख सकेगा। किन्तु मेरे वास्तविक रूप को देखकर डरना मत, और जो रूप देखोगे, उसके विषय में- जब तक मैं जीवित रहूँगी; किसी से कहना नहीं। " और यह कहने के बाद माँ जगद्धात्री रूप में उनके सामने प्रकट हो गयीं ! (पदप्रान्ते -१२३)
तेलोभेलो के मैदान में जब माँ डाकू के सामने पड़ गयीं, तो माँ ने उसको 'पिताजी' कहकर सम्बोधित किया था। माँ के वाणी की मधुरता और दिव्यशक्ति ने उस क्रूर लुटरे डकैत के मन को भी द्रवित कर दिया था।बाद में माँ ने किसी किसी भक्त से कहा था -" मैंने उनलोगों को (लुटेरे दम्पत्ति को) कहा, 'तुम लोग मुझसे इतना स्नेह क्यों करते हो ? " उनलोगों ने उत्तर दिया -' तुम तो साधारण मानवी नहीं हो, मलोगों ने तुम्हें काली के रूप में देखा है। ' मैंने कहा -'ये सब क्या कह रहे हो, ऐसा तुमने क्या देख लिया ? उनलोगों ने कहा -' नहीं माँ , हमलोगों ने सचमुच देखा है, पर हमलोग पापी हैं, इसीलिये तुमने अपने रूप को छुपा लिया है।'  (श्रीश्रीमाँ सारदा देवी ४४ पेज) 
ठाकुर के द्वारा शरीर त्याग दिए जाने के बाद माँ एक साल तक कामारपुकुर में रही थीं। इसी दौरान एक बार हरीश नामक एक पागल व्यक्ति माँ को दौड़ाने लगा। धान के ढेर के चारों ओर सात बार चक्कर काटने के बाद माँ क्लांत हो गयी, उनकी आत्मकथा है : " तब ..... मैंने 'अपना रूप' धारण कर लिया ,उसकी छाती पर घुटना रखकर जीभ खींचकर, गालों पर इतनी जोर जोर से थप्पड़ मारने लगी कि वह हाय हाय करके हाँफने लगा। मेरे हाथों की उँगलियाँ लाल हो गयी थी। " (श्रीश्रीमाँ पेज २०६) माँ ने 'अपना रूप' शब्द को किस अर्थ में प्रयुक्त किया था, अभी उसका निश्चय करना कठिन है। किन्तु ग्रंथकर्ता के मतानुसार उन्होंने माँ ने बगलामुखी का रूप धारण कर हरीश की कूप्रवृत्ति का दमन कठोरता के साथ किया था।
सुरेन्द्रनाथ सेन दीक्षा प्राप्त करने के लिए स्वामी विवेकानन्द के पास गए। स्वामी जी ने उनको दीक्षा नहीं दी, और कहा - " ठाकुर कहते हैं कि वे तुम्हारे गुरु नहीं हैं। उन्होंने दिखला दिया कि तुमको जो दीक्षा देंगे  वे मुझसे भी बड़े हैं। " यह सुनकर सुरेन्द्र सेन निराश हो गए। कुछ दिनों के बाद रात में उन्होंने स्वप्न में देखा कि एक उज्ज्वल देवी मूर्ति उसको कह रही हैं - " एक मंत्र लो ! मैं सरस्वती हूँ !' आगे चलकर सुरेंद्र सेन ने जयरामबाटी जाकर माँ से दीक्षा प्राप्त की थी। माँ के द्वारा दिये मंत्र को सुन कर उनके मन में स्वप्न-दीक्षा का दृश्य जाग्रत हो उठा ;और आश्चर्यचकित होकर उन्होंने देखा कि उनके द्वारा सपने में देखी गयी देवी सरस्वती की मूर्ति और माँ की मूर्ति एक है। 
१९१२ ई ० में श्रीमाँ दुर्गापूजा देखने के लिये बेलूड़ मठ गयीं थीं। देवी का बोधन (प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया) समाप्त होने के साथ ही साथ माँ की गाड़ी मठ में पहुँची। गोलाप माँ ने हाथ पकड़ कर माँ को गाड़ी से नीचे उतारा। उतरने के बाद समस्त आयोजन को देखकर माँ ने कहा -" वाह, यहाँ तो सबकुछ व्यवस्थित रूप से तैयार है, और हमलोग भी मानों माँदुर्गा के रूप में सजधज कर पहुँच गयीं हैं। स्वामी जी की भाषा में माँ सचमुच 'जीवन्त दुर्गा' थीं।  
कोआलपाड़ा के हरिपद मांझी ने अपने कुलगुरु से दीक्षा प्राप्त किया था। श्री माँ उसको बहुत स्नेह देती थीं। एकदिन माँ ने उससे कहा , ' तुम थोड़ा अपने इष्टमंत्र का उच्चारण करके मुझे सुनाओ तो।' हरिपद ने निःसंकोच भाव सेजैसे ही  माँ के आदेश का पालन किया, वैसे ही उन्होंने अपने सामने खड़ी देवी सारदा को अनन्त दैदीप्यमान श्रीदुर्गा के रूप में दर्शन किया। अपनी इष्टदेवी को इस प्रकार अपने सामने प्रकट देखकर आश्चर्यचकित हुए और उसी क्षण उन्होंने श्रीमाँ के पादपद्मों में आत्मसमर्पण कर दिया। " (प्रकृतिं परमां -भाग/२ -३३) 
 [.......पूरा निबन्ध चार ब्लॉग्स में अनुवादित हुआ है, कृपया निबन्ध का शेष भाग अगले ब्लॉग्स में देखें।]     
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सारदाप्रसन्न को (स्वामी त्रिगुणातीतानन्द को) मंत्र ग्रहण करने के लिए श्रीमाँ के पास भेजते समय उनका विश्वास दृढ़ करने के लिए श्रीरामकृष्ण ने एक वचन उधृत किया था - " अनन्त राधार माया कहने ना जाय, कोटि कृष्ण कोटि राम हय जाय रय।" -अर्थात राधा (माँ जगदम्बा) की माया अनन्त है, उसे कहा नहीं जा सकता। करोड़ों की संख्या में राम और कृष्ण उसी से उत्पन्न होते हैं, उसी में रहते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं। (वही १५३)
श्रीमती शैलबाला देवी ने जब एक दिन प्रश्न किया, " माँ, आपने ठाकुर का जप तो मुझे बता दिया है, अब आपका जप किस नाम से करुँगी ?"  तब श्रीमाँ ने कहा ," राधा-नाम से कर सकती हो या और किसी नाम से, जैसे तुम्हें सुविधा हो, वैसे ही करना। यदि कुछ न कर सको, तो केवल 'माँ' कहकर करने से भी होगा।" पेज ५२५/ 
एक बार गलती से माँ का हाथ पगली मामी के पैर में जा लगा। पगली हड़बड़ा कर बोल उठीं, "तुमने क्यों हमारे पैर में हाथ लगाया ? अब मेरा क्या होगा, भला? ब्रह्मचारी रासबिहारी ने कहा कि यद्यपि पगली मामी श्रीमाँ को गालियाँ देती हैं,अपमान करती हैं,फिर भी पैर में हाथ लग जाने का उन्हें डर है। इस पर श्रीमाँ ने कहा, "बेटा, रावण क्या यह नहीं जानता था कि राम नर रूप में नारायण हैं, पूर्णब्रह्म हैं ? और सीता आदिशक्ति जगन्माता है ? फिर भी वह वैसा करने आया था (अर्थात उसे इस रामावतार में वैसा ही रोल निभाना था।) यह (पगली) क्या मुझे नहीं जानती है ? जानती सब है, फिर भी ऐसा ही करने वह आई है।" पेज ५३१/
[भारीतय ऋषियों ने (योगवशिष्ठ 4।15।16) में सृष्टि रचना को 'कदलीदल पीठवत् ' कहा है, और सात लोकों और चौदह भुवनों का वर्णन किया है जो एक से अधिक  सूक्ष्तर और शक्ति सम्पन्न हैं। भू, भुव, स्वः, तप, जन, महः, सत्यम् ये सात लोक हैं । भूः, भुवः एवं स्वः=धरती,आकाश और पाताल का स्थूल लोक है,जो की हमारा दृश्य जगत है। तपः =सूक्ष्म अदृश्य लोक है। जन, महः, सत्यम्= अदृश्य सूक्ष्तर देवलोक हैं। विशुद्धतः चेतनात्मक सत्ता देवी देवताओं या दिव्य सत्ताओं के रूप में उच्च लोक में अवस्थित रहते हैं । अंतरिक्ष में कई आलौकिक और दिव्य सत्ताएं  विद्यमान हैं ,कभी कभी वे समय समय पर मानव को दर्शन देकर सत्कर्मों के लिए प्रेरणा देती हैं और उनकी सहायता करती हैं ।
यह जगत केवल स्थूल या जड़ ही नहीं है इसमें अनंत सूक्ष्म और सूक्ष्तर जगत एक दूसरे में समाये हुए सह अस्तित्व में स्थित हैं। श्रुति, युक्ति और अनुभूति द्वारा ही हमें आत्मतत्व का निरूपण करना पड़ता है। श्रुति के द्वारा आत्मतत्व का ज्ञान प्राप्त करते हैं, युक्ति के द्वारा शास्त्रों के समर्थन का विचार करते हैं। फिर अपने जीवन में अनुभूति करते हैं तब हमारी साधना पूर्ण होती है।
आध्यत्मिक जगत में होने वाले दिव्य दर्शनों को दो भागों में बाँटा जा सकता है स्वसंवेद्य और परसंवेद्य। ऐसे दिव्य दर्शन किसी विशेष विश्वास या साधना के ऊपर आश्रित नहीं होते हैं, यह वास्तविक दर्शन हैं। और परसंवेद्य अनुभूति का अर्थ है बाहरी कारणों से उत्पन्न होने वाले अनुभव। स्वसंवेद्य अनुभूति का अर्थ है स्वयं के कारण उत्पन्न होने वाले अनुभव। 
[Sunday, October 9, २०११,स्वामी विवेकानन्द का नव-वेदान्त,अरुणाभ सेनगुप्ता।]  
(স্বামী গম্ভীরানন্দ লিখছেন : "যাঁহাকে ঠাকুর অতঃপর স্বীয় লীলা সম্পূরণের জন্য রাখিয়া যাইবেন, তাঁহাকে অন্তরের পূজা প্রদানপূর্বক নিজসকাশে ও জনসমাজে সম্মানিত ও মহিমামন্ডিত এবং সেই দেবীকে স্বীয় শক্তিবিষয়ে অবহিত করার প্রয়োজন ছিল। এইজন্যই ষোড়শী পূজার আয়োজন।")
[ "ও সারদা-সরস্বতী, জ্ঞান দিতে এসেছে। রূপ থাকলে পাছে অশুদ্ধ মনে দেখে লোকের অকল্যাণ হয়, তাই এবার রূপ ঢেকে এসেছে।ও জ্ঞানদায়িনী, মহাবুদ্ধিমতী, ও কি যে সে! ও আমার শক্তি।ঐ যে মন্দিরে মা (ভবতারিণী) রয়েছেন, আর এই নহবতের মা (শ্রীমা) - অভেদ।ওরে, হৃদে একে (নিজ দেহ দেখাইয়া) তুই তুচ্ছতাচ্ছিল্য করে কথা বলিস বলে ওকে (শ্রীমাকে) আর কখনো এমন কথা বলিস নি। এর ভিতর যে আছে, সে ফোঁস করলে হয়তো রক্ষা পেলেও পেতে পারিস; কিন্তু ওর ভিতর যে আছে, সে ফোঁস করলে তোকে ব্রহ্মা, বিষ্ণু, মহেশ্বরও রক্ষা করতে পারবে না।অনন্ত রাধার মায়া কহনে না যায়। কোটি কৃষ্ণ কোটি রাম হয় যায় রয়।।"]  
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1 टिप्पणी:

  1. स्वामी गम्भीरानन्द जी अपनी पुस्तक श्रीमाँ सारदा देवी में लिखते हैं -" तत्वदर्शी तोतापुरी ने कहा था कि श्रीरामकृष्ण के समान निर्विकल्प-समाधिवान पुरुष यदि निर्विकार चित्त से अपनी सहधर्मिणी के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे तो धर्महानि नहीं है। 'किशोरी सारदा सारदा देवी' धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की साधना की उत्तराधिकारिणी (भावी-संघमाता) के रूप में संसार में मातृत्व की महिमा को स्थापित करने के लिये प्रस्तुत हो रही हैं। लीला-शरीरधारी, भावपुंज श्रीरामकृष्ण इस बात को जानते हुए अपनी सहधर्मिणी को तदनुसार तैयार कर रहे थे।

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