इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
पुष्पक विमान से प्रयाग राज पहुँचने पर त्रिवेणी स्नानादि के पश्चात् हनुमान को अयोध्या का समाचार लाने का आदेश।
श्रीराम , सीता , लक्ष्मण तथा विभीषण, सुग्रीव , हनुमान आदि अनेक सेवकों को लेकर पुष्पक विमान उत्तर दिशा में अयोध्या की ओर बढ़ रहा है। प्रयाग पहुँचकर त्रिवेणी स्नान आदि के पश्चात् श्रीराम ने हनुमान को आदेश दिया कि वे ब्रह्मचारी के रूप में अयोध्या जाकर यहाँ का समाचार सुनावें और वहाँ का कुशल-क्षेम पूछ कर लौटें -
चौपाई :
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा॥
कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना॥1॥
भावार्थ:-विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया, जहाँ परम सुंदर दण्डकवन थाऔर अगस्त्य आदि बहुत से मुनिराज रहते थे। श्री रामजी इन सबके स्थानों में गए॥1॥
* सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥
तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥2॥
भावार्थ:-संपूर्ण ऋषियों से आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्री रामजी चित्रकूट आए। वहाँ मुनियों को संतुष्ट किया। (फिर) विमान वहाँ से आगे तेजी के साथ चला॥2॥
* बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥
पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥3॥
भावार्थ:-फिर श्री रामजी ने जानकीजी को कलियुग के पापों का हरण करने वाली सुहावनी यमुनाजी के दर्शन कराए। फिर पवित्र गंगाजी के दर्शन किए। श्री रामजी ने कहा- हे सीते! इन्हें प्रणाम करो॥3॥
* तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥
देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥4॥
पुनि देखु अवधपुरि अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥5॥
भावार्थ:-फिर तीर्थराज प्रयाग को देखो, जिसके दर्शन से ही करोड़ों जन्मों के पाप भाग जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणीजी के दर्शन करो, जो शोकों को हरने वाली और श्री हरि के परम धाम (पहुँचने) के लिए सीढ़ी के समान है। फिर अत्यंत पवित्र अयोध्यापुरी के दर्शन करो, जो तीनों प्रकार के तापों और भव (आवागमन रूपी) रोग का नाश करने वाली है॥4-5॥
दोहा :
सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम।
सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥120 क॥
भावार्थ:-यों कहकर कृपालु श्री रामजी ने सीताजी सहित अवधपुरी को प्रणाम किया। सजल नेत्र और पुलकित शरीर होकर श्री रामजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं॥120 (क)॥
पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह।
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह॥120 ख॥
भावार्थ:-फिर त्रिवेणी में आकर प्रभु ने हर्षित होकर स्नान किया और वानरों सहित ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिए॥120 (ख)॥
चौपाई :
* प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥1॥
भावार्थ:-तदनन्तर प्रभु ने हनुमान्जी को समझाकर कहा- तुम ब्रह्मचारी का रूप धरकर अवधपुरी को जाओ। भरत को हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार लेकर चले आना॥1॥
* तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ॥
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥2॥
भावार्थ:-पवनपुत्र हनुमान्जी तुरंत ही चल दिए। तब प्रभु भरद्वाजजी के पास गए। मुनि ने (इष्ट बुद्धि से) उनकी अनेकों प्रकार से पूजा की और स्तुति की और फिर (लीला की दृष्टि से) आशीर्वाद दिया॥2॥
* मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी। चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी॥
इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥3॥
भावार्थ:-दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनि के चरणों की वंदना करके प्रभु विमान पर चढ़कर फिर (आगे) चले। यहाँ जब निषादराज ने सुना कि प्रभु आ गए, तब उसने 'नाव कहाँ है? नाव कहाँ है?' पुकारते हुए लोगों को बुलाया॥3॥
सुरसरि नाघि जान तब आयो। उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो॥
तब सीताँ पूजी सुरसरी। बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥4॥
भावार्थ:-इतने में ही विमान गंगाजी को लाँघकर (इस पार) आ गया और प्रभु की आज्ञा पाकर वह किनारे पर उतरा। तब सीताजी बहुत प्रकार से गंगाजी की पूजा करके फिर उनके चरणों पर गिरीं॥4॥
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥
सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥5॥
भावार्थ:-गंगाजी ने मन में हर्षित होकर आशीर्वाद दिया- हे सुंदरी! तुम्हारा सुहाग अखंड हो। भगवान् के तट पर उतरने की बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेम में विह्वल होकर दौड़ा। परम सुख से परिपूर्ण होकर वह प्रभु के समीप आया,॥5॥
भावार्थ:-और श्री जानकीजी सहित प्रभु को देखकर वह (आनंद-समाधि में मग्न होकर) पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे शरीर की सुधि न रही। श्री रघुनाथजी ने उसका परम प्रेम देखकर उसे उठाकर हर्ष के साथ हृदय से लगा लिया॥6॥
छंद :
* लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापति।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥
अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे।
सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥1॥
भावार्थ:-सुजानों के राजा (शिरोमणि), लक्ष्मीकांत, कृपानिधान भगवान् ने उसको हृदय से लगा लिया और अत्यंत निकट बैठकर कुशल पूछी। वह विनती करने लगा- आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शंकरजी से सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ। हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्री रामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ॥1॥
* सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो।
मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥
यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा।
कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥2॥
भावार्थ:-सब प्रकार से नीच उस निषाद को भगवान् ने भरतजी की भाँति हृदय से लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं- इस मंदबुद्धि ने (मैंने) मोहवश उस प्रभु को भुला दिया। रावण के शत्रु का यह पवित्र करने वाला चरित्र सदा ही श्री रामजी के चरणों में प्रीति उत्पन्न करने वाला है। यह कामादि विकारों को हरने वाला और (भगवान् के स्वरूप का) विशेष ज्ञान उत्पन्न करने वाला है। देवता, सिद्ध और मुनि आनंदित होकर इसे गाते हैं॥2॥
दोहा :
समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥121 क॥
भावार्थ:-जो सुजान लोग श्री रघुवीर की समर विजय संबंधी लीला को सुनते हैं, उनको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति (ऐश्वर्य) देते हैं॥।121 (क)॥
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार।
श्री रघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार॥121 ख॥
भावार्थ:-अरे मन! विचार करके देख! यह कलिकाल पापों का घर है। इसमें श्री रघुनाथजी के नाम को छोड़कर (पापों से बचने के लिए) दूसरा कोई आधार नहीं है॥121 (ख)॥
विगत 19 सत्रों (Sessions) में विवेक-चूड़ामणि शास्त्र के जिन विषयों पर गहराई से चर्चा किया है, उसमें से अपने दैनन्दिन जीवन में धारण करने योग्य कुछ निष्कर्षों पर अभी ध्यान देना है। आगे जाने से पहले कुछ चीजें हमलोग और भी देखें। हमलोगों ने जीव, जगत और ईश्वर पर विचार करते हुए यह समझ लिया कि -यदि आप मनुष्य के अंदर झाँककर देखोगे, तो मनुष्य गायब हो जाता है, और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं !If you dig into the human being, God emerges ! यदि आप जीव के भीतर खोज करेंगे तो, जीव गायब हो जायेगा और ईश्वर प्रकट हो जायेंगे! उसी प्रकार जब इस दृष्टिगोचर जगत या विश्व-प्रपंच के भीतर खोजो जगत गायब हो जाता है , ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। क्यों ? क्योंकि इस जीव और जगत सबके मूल में ईश्वर हैं।सबके मूल में ईश्वर हैं। स्थूल सृष्टि हो या सूक्ष्म सृष्टि इस सबके मूल में ईश्वर हैं।
आपको ये जो हिमालय पर्वत शृंखला दिखाई दे रही है , हम सिर्फ स्थूल पर्वतों को ही देख रहे हैं। इस स्थूल पर्वत के पीछे इस पर्वत का भी एक सूक्ष्म स्तर है ! जगत-सृष्टि का स्थूल चेहरा एक अलग प्रकार का है, और वह स्थूल चेहरा ही हमको दिखाई दे रहा है। हम स्थूल चेहरे से ही प्रभावित हैं , और मोहित हैं।
इसी जगत का एक सूक्ष्म पक्ष भी है, और सृष्टि का कारण स्तर भी है। जब हम इस स्थूल शरीर या दृष्टोगोचर जगत के कारण स्तर में पहुँच जाते हैं। तो वह कारण स्तर ही ईश्वर है ! (3 :09) व्यक्ति हो या समष्टि हो ? व्यष्टि हो या समष्टि हो -कोई एक व्यक्ति हो , या यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड हो , जीव हो या जगत हो -सबमें स्थूल, सूक्ष्म , कारण(Electron, proton, neutron???)ये तीन शरीर या स्तर अनिवार्य रूप से रहते हैं। अब आप जीव-जगत को इसविवेक-दृष्टि से देखने का अभ्यास कीजिये। आप कोई भी जीव /प्राणी ले लीजिये , हमलोगों को वह बाहर से सिर्फ स्थूल ही दिखाई देता है। उस स्थूल के भीतर और पीछे उसीका एक सूक्ष्म-स्तर भी है। और उस सूक्ष्म के भी भीतर और पीछे कारण स्तर है। और यदि हम कारण में पहुँच जायें तो हम ईश्वर में पहुँच जाते हैं। (3:39)
तो हर जीव-जंतु के अंदर और भीतर में क्या है ? ईश्वर हैं , लेकिन ढँका हुआ है। इसलिए हमको दिख नहीं रहा है। अतएव बाहर से इन बुलबुलों को देखकर हम भ्रमित और मोहित हो जाते हैं। (स्कूल -मेट्स में स्त्री-पुरुष के नश्वर स्थूल शरीरों को देखकर हम भ्रमित और मोहित हो जाते हैं, आसक्त हो जाते हैं और उसी को प्रेम कहते हैं ?) अब इसमें से कुछ Conclusion या निष्कर्ष निकलता है, उसको इसी बिन्दुवार ढंग से सजाया जाये , तो इस प्रकार होगा -
>>>1. आपके अंदर जो भी सामर्थ्य या क्षमता (potence)है। किसी भी व्यक्ति में जो भी सामर्थ्य है, हो सकता है कोई अच्छा गायक है , कोई अच्छा बाँसुरी वादक है। हो सकता है कोई अच्छा नृत्य कर सकता है , हो सकता है कोई अच्छा वकील है , कोई अच्छा Scientist है, कोई अच्छा डॉक्टर है, कोई त्रि-भाषाविद है ? ये जो भी आपकी क्षमता (potence) या योग्यता (ability) है, क्षमतायें कहाँ से आ रही हैं ? यह सब ईश्वर प्रदत्त (God-given) है। Whatever qualities you have , good qualities , skills ! Some people are very good in certain things. आपके पास जो भी गुण हैं, अच्छे गुण, कौशल हैं -वे ईश्वर प्रदत्त हैं!
कुछ लोग कुछ अलग-अलग क्षेत्र में बहुत अच्छे होते हैं। कोई व्यक्ति स्पोर्ट्स के किसी एक क्षेत्र में - भाला फेंकने में ओलम्पिक विजेता बन जाता है। सारी क्षमता 'potence' (शक्ति) या योग्यतायें (Capabilities) कहाँ से आती हैं ? ये सब क्षमतायें उस 'अव्यक्त नाम्नी परमेश शक्ति' कारण शरीर -काली या ईश्वर से ही आ रही हैं। हमें समझ में नहीं आ रहा है। [ सामर्थ्य, क्षमता और सम्भाव्यतायें (Potentiality) योग्यता यानि चरित्र के 24 गुणअव्यक्त कारण शरीर या ईश्वर से ही आती हैं , इसीलिए स्वामीजी ने कहा है -" Each soul is potentially divine !"] तो विवेक -चूड़ामणि के अध्यन से प्राप्त विवेक-दृष्टि का यह पहला निष्कर्ष है। जिसे हमारे दैननन्दिन जीवन में धारण करना चाहिए।
>>>2. इस विवेक-दृष्टि में प्रतिष्ठित होने के बाद दूसरा निष्कर्ष यह निकलता है, कि हमें किसी भी व्यक्ति को Underestimate नहीं करना चाहिए। किसी को भी व्यक्ति को अपने से कम नहीं समझना चाहिए। हमलोग कभी-कभी किसी व्यक्ति के वेश-भूषा, डिग्री, पेशा आदि के आधार पर अपने से कम महत्व का व्यक्ति समझने लगते हैं। और कभी -कभी क्या अक्सर हमलोग दूसरों को Underestimate ही किया करते हैं, किसको Underestimate कर रहे हैं आप ?अपने से कमतर किसको समझ रहे हैं आप? आप ईश्वर को Underestimate कर रहे हो ? कभी किसी को Underestimate मत कीजिये। सबके अंदर समान क्षमतायें-Similar capabilities विद्यमान हैं। किसी में ज्यादा नहीं, किसी में कम नहीं सभी में समान रूप से विद्यमान हैं। लेकिन क्षमताओं की अभिव्यक्ति में तारतम्य हो सकता है। वो संस्कारवश अभिव्यक्त नहीं हो पातीं हैं यह एक अलग बात है।लेकिन ईश्वर !! अनंत शक्तिमान ईश्वर सबके अंदर विद्यमान हैं। (5:19) (संस्कारवश, - by traditionआदतों के वश में रहने के कारणया चरित्र-निर्माण की पद्धति सीखकर चरित्र के गुणों को अभिव्यक्त करने के प्रयास में कमी रह जाने के कारण सभी मनुष्यों में पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं हो पातीं हैं।)
>>>3. तीसरा निष्कर्ष हमने यह देखा कि जो हमारी केवल प्राचीन भारतीय संस्कृति या सनातनी हिन्दू संस्कृति में ही यह विशेषता है कि "हम सबको नमन करते हैं।"ऐसा है कि नहीं ? पर्वत, नदियाँ, पहाड़ ,वृक्ष, मनुष्य , गाय, यहाँ तक कि 'नागपंचमी ' में सर्प को भी नमन करते हैं। कण-कण में भगवान - ये भावना आपको भारत के आलावा पृथ्वी पर और कहीं देखने को नहीं मिलेगा। इसलिए भारतीय संस्कृति, हिन्दू सनातनी संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है। इससे बढ़कर कोई संस्कृति पहले नहीं थी , आगे होगी कि नहीं ? अभी पता नहीं। यह भारतीय हिन्दू सनातनी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है ,विवेकानन्द यह बताते हुए थकते नहीं हैं कि हिन्दू-सनातन धर्म ही यथार्थ रूप से सच्चा धर्म है। (5:55) बाकि के सारे सम्प्रदाय ,या मजहब परछाई की तरह है। All other sects and religions are like shadows ! यह सुनने में कुछ लोगों को थोड़ा कट्टर लगेगा। लेकिन यह कट्टर नहीं है ! ये वास्तविकता है। This might sound a bit radical to some people. But it's not radical! यह एक ऐसी सच्चाई जिसको नाकारा नहीं जा सकता। स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका में इसी सत्य को विश्व के समक्ष प्रकट करते हुए कहा था- "प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है !.... “Each soul is potentially divine. (And) The goal is to manifest this divinity by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy - by one, or more, or all of these - and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details.” एकमात्र प्राचीन भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति में विद्यमान हमारी यह दृष्टिकोण के कारण (इसी विवेक-दृष्टि के कारण) ही हिन्दू जाति ने पूरे इतिहास में बाहर जाकर कभी किसी का गला नहीं काटा है। क्योंकि हमारे लिए कोई पराया है ही नहीं। भले ही हमारे सामने वाला किसी अन्य मजहब को मानने वाला हो , हमारे अंदर कभी किसी के प्रति धर्म के आधार पर दुश्मनी का भाव आती ही नहीं है। आती है क्या ? नहीं आती है। हमारे रक्त में ही दुश्मनी या कट्टरता नहीं है। यह सोचकर कि सामने वाला किसी दूसरी मजहब का है-हिन्दुओं के मन में किसी के भी प्रति ऐसी दुर्भावना कभी आती ही नहीं है। लेकिन जब पिछले 1000 वर्षों से सनातनी हिन्दुओं पर इतना आक्रमण होता रहा है। आज भी हो रहा है। और अब अपने Defence में जब हम प्रतिवाद करते हैं , तो उनको लगता है कि हम भी आक्रामक हैं। जबकि हम किसी का बुरा नहीं चाहते है। कभी नहीं चाह सकते हैं। लेकिन जब आक्रमण होता है तो defend करना पड़ता है। तो आज के भारत का यह position है।
लेकिन दूसरे मजहबों इतना रक्तपात क्यों है ? (6:59) वे अन्य मजहबी लोग जो विश्वास करते हैं, और जो उनके मजहब को belong नहीं करते हैं। उनके प्रतिकुछ कट्टरपंथी लोगों के मन में दुश्मनी का भाव रहता है। We know the history of Christianity and Islam. हम ईसाई और इस्लाम धर्म का इतिहास जानते हैं। In Christianity you have heard about Holy wars! ईसाई धर्म में आपनेHoly warsके बारे में सुना होगा। In history it is named Crusades ! इतिहास में इसे क्रूसेड्स नाम दिया गया है। You can't read Those chapters in history. आप इतिहास के उन अध्यायों को जहाँ नहीं पढ़ सकते। इन युद्धों में बर्बरता की सीमा पर कर गए थे ये लोग ,इनकी शिक्षा यही है कि जो भी Christian नहीं हैं , या तो उनका धर्मान्तरण कर दो, नहीं तो उनको मार देना है। इस्लाम में भी कुछ लोग कट्टरता की धारणा रखते हैं। क्योंकि धर्म के विषय में इनकी धारणा बिल्कुल संकीर्ण है। और केवल सनातनी भारतीय संस्कृति ही ऐसी है , जिसमें हम वसुधैव कुटुंबकं की बात करते हैं। पूरा विश्व एक परिवार की भावना रखते हैं। हमारे लिए सभी मनुष्य समान हैं। क्योकि सभी के भीतर वही ईश्वर विद्यमान हैं। हम भारतीय सनातनी हिन्दू लोग धर्म, जाति, भाषा, स्त्री -पुरुष आदि के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं। (7:59)
>>>4. Difference between Attachment and Love : चौथा महत्वपूर्ण बिन्दु था कम उम्र में या स्टूडेंट्स लाइफ में प्रेम और राग (आसक्ति -Attachment) के बीच अंतर को हम नहीं समझ पाते हैं। लेकिन जब सही शिक्षा के द्वारा आप यह जान लेते हो कि सबके भीतर वही ईश्वर विराजमान है, तब आपको यह समझ में आयेगा कि प्रेम क्या चीज है ? समझ रहे हो ? प्रेम में कोई शारीरिक या लैंगिक आकर्षण की बात ही नहीं है। वो स्त्री हो पुरुष हो सब में एक ही ईश्वर का वास है। स्त्री पर पुरुष (M/F) का भेद तो हम सिर्फ ऊपर से देख रहे हैं , स्थूल शरीर के स्तर पर देख रहे हैं। लेकिन जिसकी विवेक-दृष्टि में स्थूल शरीर के पीछे और भीतर सूक्ष्म शरीर , और सूक्ष्म के पीछे कारण शरीर या ईश्वर दिख रहा हो , वह सबको समान भाव से देखेगा। अब 'मैं' और 'मेरा' को लेकर उसकी जो अनुभूति या Feelings है , वह किसी एक या दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह सकती। उसकी दृष्टि में तो अब सबके भीतर ईश्वर दिखाई देता है। तब यह व्यक्ति प्रेम करता है। (8:50) Now you understand difference between Attachment and Love !अब आप आसक्ति और प्रेम में अंतर को समझ गए होंगे! In attachment, it is completely between just three -four Bubbles ; and it is all physical attraction or physical connection . यह आसक्ति पूरी तरह से सिर्फ़ तीन-चार बुलबुलों के बीच होता है; और यह पूरी तरह से शारीरिक आकर्षण या शारीरिक संबंध पर आधारित होता है। या Genetic connections -आनुवंशिक संबंध में बंधा होता है। मेरे बच्चे हैं, मेरी बेटी , मेरा बेटा है, पति है-पत्नी है , माँ-बाप हैं। बस इतने जो सम्बन्ध हैं , ये संबंध सिर्फ स्थूल शरीर को केंद्र बनाकर स्थापित होते हैं। यह सम्बन्ध प्रेम की तरह दीखता है, लेकिन है आसक्ति। यह आसक्ति या राग M/F शरीर केंद्रित है, इसलिए उसमें आगे चलकर सिर्फ कड़वाहट ही आती है। लेकिन प्रेम कभी कोई कड़वाहट आ ही नहीं सकती। क्योंकि प्रेम शरीर केंद्रित नहीं है, प्रेम ईश्वर केंद्रित है। अब आपको राग और प्रेम का अंतर समझ में आया ? हम लोग Love, Love की बातें करते हैं , लेकिन यह प्रेम क्या है , किसीको पता नहीं है कि, यह ईश्वर केंद्रित है। एक ईश्वर-केंद्रित दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति ही प्रेम कर सकता है। और उस प्रेम की कोई सीमा नहीं है। उसके लिए कोई पराया नहीं है, सब अपने हैं। You understand what is love ? समाज में आपको ऐसा 'L'ove कैपिटल 'L' वाला प्रेम , ईश्वर केंद्रित प्रेम कहाँ दीखता है ? आपको यह प्रेम कहीं नहीं दिखेगा। ये आपके लिए विचारणीय है। इस प्रेम का Bottom line यह है होगा कि प्रेम ईश्वर-केंद्रित है, राग, आसक्ति या मोह शरीर केंद्रित है। शरीर दृष्टि से उत्पन्न होने वाला जो लगाव है -वह राग है। और ईश्वर दृष्टि से होने वाला लगाव है -वह प्रेम है ! (भक्ति) है? तो हमें अपने दैनन्दिन जीवन में यदि किसी विपरीत लिंग के शरीर के प्रति अधिक लगाव हो रहा है, तो हमे विवेक-दृष्टि से यह समझ लेना चाहिए कि वह राग है या प्रेम है ? प्रेम में शरीर का कोई लेनादेना है ही नहीं। आप किसी भी लिंग के हो , पुरुष हो कि स्त्री हो यह तो स्थूल शरीर में है। अब तो आप सबके भीतर ईश्वर देख रहे हो। आप सबके भीतर सर्वरूपों में विराजमान राम को देख रहे हो। हमारे यहाँ कहते हैं न -घट -घट में राम और कण कण में शिव ? हमारी प्राचीन भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति में कबीर की कहावत है - एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट-घट में लेटा ! (एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट- घट में लेटा। एक राम का जगत पसारा, एक राम जगत से न्यारा।) हमारे लिए सब-कुछ दिव्य है। हमारे दिव्यता अंतर्निहित है -Oneness of existence है Inherent divinity है! इसीलिए हम सबको नमन करते हैं , हर किसी को नमन करते हैं।
>>>5. एक आदर्श गृहस्थ का जीवन : अब इस प्रेम और आसक्ति के बीच अंतर को समझ लेने के बाद, एक स्त्री और एक पुरुष , एक पति और एक पत्नी को कैसे रहना चाहिए ? अगर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध सिर्फ शरीर केंद्रित होगा, तो वह सम्बन्ध कड़वा ही बन जायेगा। सर्वनाश की ओर जायेगा-will lead to destruction.(श्रीरामकृष्ण देव अपने भक्तों से कहते थे कि कोई स्त्री यदि भक्तिमति हो, तो भी उससे आठ हाथ दूर रहना चाहिए। क्योंकि चिपकने से गिरने की सम्भावना रहती है। “Even if a woman rolls on the ground with love for God, you shouldn't visit her frequently.” To a house-holder devotees: You don’t have to renounce women altogether. It’s not wrong to sleep with your own wife. But after you’ve had children, you should live like brother and sister. ” Sometimes he would say, )
लेकिन वही स्त्री और पुरुष यदि एक दूसरे को नारायण के दृष्टि से देखे, तब पति के लिए पत्नी कोई शरीर नहीं है। उसके अंदर भी पति को नारायण दिखाई देता है। और पत्नी के लिए भी पत्नी कोई शरीर नहीं है, पति के अंदर पत्नी को भी नारायण दिखाई देता है। तब उनके बीच व्यवहार कैसे होगा ? वो व्यवहार शरीर केंद्रित नहीं होगा, वह व्यवहार भी ईश्वर केंद्रित होगा। तब कहीं जाकर एक आदर्श गृहस्थ का जीवन बनता है। इसलिए यह जो शादी है , या विवाह है ; इसका उद्देश्य मुख्यतः भोग के लिए नहीं है। गृहस्थाश्रम में भी भोग के लिए एक स्थान है। लेकिन आदर्श गृहस्थ-जीवन कभी भोग-केंद्रित नहीं हो सकता। भोग का भी एक स्थान गृहस्थ-जीवन में है , वो तो होना ही चाहिए थोड़ा सा। लेकिन गृहस्थ जीवन कभी भोग-केंद्रित नहीं हो सकता। जो जीवन शरीर केंद्रित होगा , या जो स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एक आदर्श गृहस्थ जीवन में होता है, उतना भर तो रहेगा। (12:04) उसके लिए भोग का भी एक यथोचित स्थान है ; और वो भी केवल योग्य सन्तान -पुत्र-पुत्री उत्पत्ति के उद्देश्य से किया जाना चाहिए। उतना ही होगा , लेकिन भोग कभी भी वैवाहिक जीवन का मुख्य उद्देश्य हो ही नहीं सकता। थोड़ा सा भोग के पश्चात् फिर पति -पत्नी सम्बन्ध में भी जो मुख्य दृष्टि होगी -वो विवेक दृष्टि होगी- ईश्वर केंद्रित दृष्टि ही रहेगी। पति के लिए पत्नी देवी है , और पत्नी के लिए पति देवता है -यह दृष्टि है। तब जाकर के एक सुंदर आदर्श गृहस्थ जीवन बनता है , और उस सद्गृहस्थ जीवन से देवतुल्य सन्तान की उत्पत्ति होगी। गृहस्थ जीवन में ऐसे ही ईश्वर केंद्रित प्रेम सम्बन्धों से देवतुल्य सन्तानों की उत्पत्ति होती है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है देवतुल्य सन्तानों की उत्पत्ति प्रार्थना से होती है, सिर्फ काम से नहीं। हमारे संस्कृत शास्त्रों की बात है - देवतुल्य सन्तानों की उत्पत्ति प्रार्थना से होती है, न कि काम की उत्तेजना से।Divine children are born through prayer not through Lust. ये सनातन वैदिक सिद्धांत है। तो यह बात समझ लेनी चाहिए कि हर चीज का , धर्म, अर्थ और काम का भी हमारे जीवन में एक स्थान है। लेकिन वैवाहिक जीवन का मुख्य केंद्र (उद्देश्य) काम नहीं हो सकता। उसका एक स्थान है , लेकिन मुख्यतः स्त्री-पुरुष का जो सम्बन्ध है , वह ईश्वर केंद्रित होना चाहिए, विवेक-दृष्टि अलग होनी चाहिए। तब जाकर एक सुंदर आदर्श दाम्पत्य जीवन निर्मित हो जाता है। अब जब आप सबके भीतर ईश्वर को विद्यमान देखने की दृष्टि बना लोगे , तो उपनिषदों के सिद्धान्तों को समझ सकोगे। भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति में हमारे लिए मातृ देवो भव , पितृ देवो भव, आचार्य देवोभव ! ये सब आपने सुना होगा। हमारे लिए माँ केवल एक माँ नहीं है, वो तो ईश्वर का रूप है। आपके पिता जो हैं नारायण के रूप हैं। इसीलिए हमारी संस्कृति क्या है ? वो तो -पिताओं को भी नमन करती है। सबों को नमन करने की ये जो संस्कृति है। यह संस्कृति केवल भारत के पास ही है। क्यों ? क्योंकि हम मानते हैं कि सभी के भीतर वही प्रभु परमेश्वर है। This is a great Culture that we have all based on this great idea of inherent divinity -which declares each soul is potentially divine !यह एक ऐसी महान संस्कृति है जो मनुष्य मात्र में अंतर्निहित दिव्यता के महान विचार पर आधारित है -जो घोषित करती है कि प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! हमें इस संस्कृति को बचाकर रखना है, आगे चलकर तुमलोगों की भी अगली पीढ़ी आएगी। आपके आगे की पीढ़ी भी आएगी , तो यह देव-संस्कृति आपके घर की संस्कृति होनी चाहिए। यह नहीं कि हमलोगों को भी पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करना चाहिए।
>>>6 “Art Of Giving” Kneel Down and Give - As Suggested By Swami Vivekananda . स्वामीजी की और एक बात स्मरणीय है -मान लीजिये आपके सामने कोई भिखारी आता है। कौन आता है ? भिखारी आता है ? यह कहना भी दुस्साहस है। अब ज्ञान-चक्षु खुलजाने के बाद , विवेक-दृष्टि खुल जाने के बाद कौन आता है ? वह ईश्वर ही आपके सामने भिखारी के रूप में आता है। तो कौन आ रहा है ? ईश्वर या भिखारी ? आप उसको 10 रुपया देरहे हैं। आप क्या समझ रहे हैं - उस पर आप बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं ? Helping factors, Not help but worship!You ask this question how we can help others ? We can't help anybody in this creation; We can only worship ! हम इस सृष्टि में किसी की सहायता नहीं कर सकते; हम केवल पूजा कर सकते हैं ! आप किसी गरीब को 10 रूपये देते हो तो आप नारायण की पूजा कर रहे हो। आप क्या किसी की मदत करेंगे ? The world is not waiting for your help, to come . दुनिया आपकी मदद का इंतज़ार नहीं कर रही है " -इस बात को लिखकर रख लीजिये आप। हम जब किसी गरीब को 10 रूपये देते हैं , तो हम ये न समझें कि हमने उस गरीब पर दया दिखाया। हमने उसकी मद्त की। या हमने उस गरीब पर कुछ उपकार किया। हम कौन हैं , किसी के ऊपर (ईश्वर के ऊपर) उपकार करने वाले, और किसी को मदत करने वाले ? हम किसी की भी मदत नहीं कर सकते , हम सिर्फ पूजा कर सकते हैं। इसलिए आप जब उसको 10 रूपये देते हो , तो आपको उसके सामने झुक जाना चाहिए। झुक करके उससे request करना चाहिए कि कृपाकर के आप 10 रुपया ग्रहण कीजिये। जबकि हमारा दृष्टिकोण Attitude उल्टा है -हम आज क्या करते हैं ? 10 रुपया फेंक देते हैं , कहते हैं -ले जाओ। ये नहीं। अब देने वाला झुकके -हथजोड़कर याचना करता है -कृपाकरके इसको ग्रहण कीजिये। आप ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं , कि कृपाकरके मेरा यह जो 10 रुपया है , इसको ग्रहण कीजिये। Whole attitude changes now ! ठाकुर , माँ स्वामीजी के पास आने से अब जीव और जगत को देखने का पूरा नजरिया बदल जाता है ! वह नारायण एक भिखारी के रूप में आकर के आपको निःस्वार्थ बनने का - ईश्वर के करीब आने का , एक मौका दे रहा है ! That beggar is giving you a chance, so that you can exercise your sense of charity .वह भिखारी आपको, आपको आपके दान द्वारा निःस्वार्थपरताके चारित्रिक गुणों का प्रयोग करने का एक मौका दे रहा है, ताकि आप क्रमशः पूर्ण निःस्वार्थ (ईश्वर) बन सकें। Again I repeat , That so called beggar is giving you a chance, so that you can exercise your sense of charity .मैं फिर उसी वाक्य को दोहराता हूँ, " वह 'तथाकथित' भिखारी आपको एक मौका दे रहा है, ताकि आप अपनी दान की भावना का प्रयोग कर निःस्वार्थ बन सकें।The world is not waiting for your help to come . आप करें या न करें , उसको कहीं न कहीं से मदत मिलने ही वाला है। और यदि वह दान आपको करते हो , तो यह आपका सौभाग्य है। समझ रहे हो ? तो किसी की भलाई के लिए हम कुछ भी करने की चेष्टा करते हैं , तो उसके पीछे का attitude ठीक होनी चाहिए दृष्टि ठीक होनी चाहिए। आप यह न समझिये कि जैसे दुनिया आपकी प्रतीक्षा में बैठी हुई है ! जैसे कि हम जाकर दुनिया को बचाने वाले हैं क्या ? अब इसी के नाम पर बहुत कुछ Social Work है। हम समाज को बदल देंगे ? अच्छा तो क्या हम समाज को अच्छा बनाने के लिए कोई काम या Social Work न करें क्या ? ऐसा नहीं है , समाज-सेवा का कार्य जरूर करना है लेकिन attitude ठीक होना चाहिए। समाज को बदलने वाले हम बुलबुले क्या कर सकते हैं ? वो तो ईश्वर ही जगत को चलाता है। यह जानकर के भी समाज की भलाई करने के लिए हमें प्रयत्नशील रहना है। हमें निःस्वार्थ भाव से Be and Make का कार्य करते रहना है। और हम जो भी कर रहे हैं वो ईश्वर की पूजा है। ये विश्व प्रपंच -जगत हमारी प्रतीक्षा में नहीं है। यह दुनिया हमारी प्रतीक्षा में खड़ी नहीं है कि आप आकरके उसको बचने वाले हैं ? उसको चलाने वाला है !वो जो काली का नृत्य है - सृष्टि, स्थिति , प्रलय वो तो चलता रहता है। वही काली सृष्ट भी करती है , पालन भी करती है , वही नष्ट भी करती है। तो इन सभी चीजों के प्रति हमारा जो attitude है , हमारा जो दृष्टिकोण है , हमारा जीव और जगत को देखने का जो भाव है , जो नजरिया है -वह ठीक होना चाहिए। यदि जीव -जगत को आप ईश्वर दृष्टि से देखो तो आप देखोगे कि जिस कुत्ते को आप पहले बिस्किट खिला रहे थे , अब उसको बिस्किट खिला कर देखो ! (18:21) अब आप कुत्ते को बिस्किट नहीं खिला रहे हो , अब भगवान को निवेदित कर रहे हो। इस शिविर से लौटने के बाद आप घर में जाकर जो कुछ भी कीजिये -आपके घर में कोई प्राणी हो कुत्ता या गाय हो , तो किसको कर रहे हैं आप ? animal lover वाली दृष्टि बदल जाएगी। अब आप कुत्ते के साथ गाय की भी सेवा करेंगे। उन सबके भीतर प्रभु परमेश्वर राम बैठे हैं, शिवजी बैठे हैं , ये सही दृष्टिकोण है। सब कुछ दिव्य है - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है ! तो अभी तक विवेक-चूड़ामणि में कारण-शरीर की परिभाषा तक जितनी चर्चा की अध्यन किया है -उससे ये छः सात निष्कर्ष निकलते हैं। आप कीजिये न कीजिये वो हेल्प आने ही वाला है। आप अगर (विद्या) दान कर पा रहे हो, तो ये आपका सौभाग्य है। आप क्रमशः निःस्वार्थ हो जाओगे, आप जितने निःस्वार्थ होते हो उतना ही ईश्वर के करीब पहुँचते हो। ईश्वर के निकट पहुँचते हो। तो यह स्मरण रखो कि हम किसी की मदत नहीं कर सकते,हम सिर्फ पूजा कर सकते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस जी कहते थे , उनका एक प्रसिद्ध वाक्य है - जब भी हम किसी के लिए कुछ करते हैं , तो हमारा भाव क्या होना चाहिए ? शिव ज्ञान से जीव सेवा ! ऐसा श्री परमहंस अपने उपदेश में कहते हैं। 'शिव ज्ञान से ' मतलब सब शिव ही हैं। सब जीवों के अंदर शिव बैठे हुए हैं , इस ज्ञान से आप जो भी करोगे -Be and Make' आंदोलन का प्रचार प्रसार भी करोगे , फिर वो सेवा नहीं पूजा हो जाती है। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -" Let the giver kneel down and give thanks, let the receiver stand up and permit."[Source: Inspired Talks: THURSDAY, July 25, 1895. (Patanjali’s Yoga Aphorisms)] "Be grateful to the man you help, think of him as God. Is it not a great privilege to be allowed to worship God by helping our fellow men?"[Source :Complete Works of Swami Vivekananda, Karma Yoga.]
अब देखिये इस दृष्टिकोण से यदि आप अपने दैनन्दिन जीवन में व्यवहार कीजियेगा , तो आपके जो पारिवारिक सम्बन्ध हैं , वो कितने सुंदर हो जायेंगे ? इस विवेक-दृष्टि से जब आप अपने परिवार के लोगों के साथ व्यवहार करोगे , या अभी 'आपका परिवार' बोल कर क्या रह गया ? अब आपके परिवार की कोई सीमा है ? अब बताओ। अब आपके परिवार की कोई सीमा है ? पूरा विश्व ही अपना परिवार है कि नहीं ? यह प्रेम है ! पूरा विश्व ही अपना परिवार है कि नहीं ? अब प्रेम और राग के बीच का अन्तर समझ रहे हो ? जब आप प्रेम करने का तरीका सीख जायेंगे , तो पूरा विश्व ही आपका परिवार हो जायेगा। अच्छा यही दृष्टिकोण महापुरुषों के जीवन में दीखता है कि नहीं ? आप विवेकानन्द जी को ले लीजिये , शंकराचार्यजी को ले लीजिये। इनमें तो सबके प्रति सामान दृष्टि है। क्यों ? उनको तो अब सब में ईश्वर दिखाई देता है। हमलोग फंसे हुए हैं -उन तीन -चार बुलबुलों में। वह प्रेम सा दीखता है , लेकिन वह प्रेम नहीं राग है। वह आसक्ति है। उसी हमलोग घुटघुट के जीते हैं। घुटघुट के मरते हैं। वही बंधन है। उस घुटन से बाहर निकलने के लिए सही दृष्टिकोण में विवेक-दृष्टि में प्रतिष्ठित होना होगा। अब आपका जो परिवार है -उसकी कोई सीमा नहीं है। ये आपके लिए विचारणीय है ,आप प्रश्न कीजिये आपका परिवार क्या है ? क्या वे वही तीन चार लोग हैं , जिनके साथ आपका रक्त सम्बन्ध है ? क्या आपके परिवार की सीमा उतने तक ही है ? सोंच लीजिये। This is the real Personality development .Personality development is not physical development, it is the growing growth of your awareness about what is ultimately real? यही वास्तविक व्यक्तित्व विकास है। अब देखिये कि सच्चे व्यक्तित्व विकास का अर्थ शारीरिक विकास नहीं है मूलभूत रूप में यह जीव, जगत और ईश्वर में सत्य क्या है, इसके बारे में आपकी जागरूकता में वृद्धि है।In this way when you grow in your consciousness , your awareness-इस तरह जब आपकी चेतना, आपकी जागरूकता बढ़ती है, जब आप देखोगे कि सर्वत्र एक ईश्वर ही है, और मैं उससे भिन्न नहीं हूँ। (21:50)इस प्रकार विवेक-दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाने पर आप सबको आत्मस्वरूप ही पाओगे। विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ का यह एक बहुत महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।
>>>7: यह जीव -जगत काली का अद्भुत नृत्य है: तो इस प्रकार की विवेक -दृष्टि में प्रतिष्ठित होना एक अद्भुत उपलब्धि है कि नहीं ? यह जगत क्या है ? इसमें सृष्टि ,स्थिति , प्रलय का खेल रूपी काली का नृत्य निरंतर चल रहा है। अद्भुत है न ? अब आप आँख खोल करके चारों ओर देख सकते हो। इस जीव और जगत के रूप में उसकाली (कारणशरीर) का नृत्य चल रहा है, उस परमेश शक्ति का खेल चल रहा है। सृष्टि ,स्थिति , प्रलय का खेल चल रहा है। और वही परमेश-शक्ति सभी रूपों में है ! अब जीव-जगत को देखने के प्रति आपकी दृष्टि ही बदल जाएगी। आपको सब जगत-व्यवहार अद्भुत प्रतीत होगा। सबकुछ दिव्य है , सभी मनुष्य दिव्य हैं, सारी सृष्टि ही प्रभु की दिव्य लीला है ! तो हमने अभी तक इन 7 महत्वपूर्ण निष्कर्षों के विषय में विवेक-चूड़ामणि शास्त्र की दृष्टि से अध्यन कर लिया। अब आज की चर्चा समाप्त होती है। ॐ शान्ति , शान्ति , शान्तिः हरिः ॐ तत्सत !
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“Each soul is potentially divine. (And) The goal is to manifest this divinity by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy - by one, or more, or all of these - and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details.”
" प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया – कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"
[Electron, proton, neutron: इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन परमाणु के तीन मूलभूत कण हैं। प्रोटॉन परमाणु के नाभिक (केंद्र) में पाया जाने वाला धनावेशित कण है, न्यूट्रॉन भी नाभिक में पाया जाता है और उदासीन (आवेशहीन) होता है, जबकि इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण होता है जो नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का द्रव्यमान लगभग बराबर होता है, और ये इलेक्ट्रॉन से कहीं अधिक भारी होते हैं, जबकि प्रोटॉन पर धनात्मक आवेश इलेक्ट्रॉन के ऋणात्मक आवेश के बराबर होता है।]
1095 से लेकर 1291 के बीच लगभग 200 वर्षों तक छः Crusades लड़े गए ! Holy-Land वर्तमान में इजराइल और पलिस्टिन वाला प्रदेश था। यह ईसाई ,मुस्लिम औऱ यहूदियों का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल माना जाता हैं !
आनंदमयता, दूसरे का दु:ख देखकर मन में करूणा, दूसरे का पुण्य तथा अच्छे कर्म समाज सेवा आदि देखकर आनंद का भाव, तथा किसी से पाप कर्म हो गया हो, तो मन में उपेक्षा का भाव 'किया होगा छोड़ो' आदि प्रातिक्रियाएँ उत्पन्न होनी चाहिए।
मनसा चिन्तितंकर्मं वचसा न प्रकाशयेत् ।
अन्यलक्षितकार्यस्य यत: सिद्धिर्न जायते ॥
मनमे की हुई कार्य की योजना दुसरों को न बताये । दूसरें को उसकी जानकारी होने से कार्य सफल नही होता ।
सर्वं परवशं दु:खं सर्वमात्मवशं सुखम्,
एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयोः।
दुसरों पे निर्भर रहना सर्वथा दुःख का कारण होता है। आत्मनिर्भर होना सर्वथा सुखका कारण होता है। सारांश, सुख–दु:ख के ये कारण ध्यान मे रखें।
तद्वत् कामा यं प्राविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
गीता 2|70
जो व्यक्ती समय समय पर मन में उत्पन्न हुइ आशाओं से अविचलित रहता हैर् जैसे अनेक नदीयां सागर में मिलने पर भी सागर का जल नही बढता, वह शांत ही रहता हैर् ऐसे ही व्यक्ती सुखी हो सकते है ।
इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु स: ॥
गीता 3|42
इंद्रियों के परे मन है , मन के परे बुद्धि है और बुद्धि के भी परे आत्मा है ।
वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च ।
अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत: ॥
सदाचार की मनुष्यने प्रयन्तपूर्व रक्षा करनी चाहिए , वित्त तो आता जाता रहता है ।
धनसे क्षीण मनुष्य वस्तुत: क्षीण नही , बल्कि सद्वर्तनहीन मनुष्य हीन है ।
जानामि धर्मं न च मे प्रावॄत्ति: ।
जानाम्यधर्मं न च मे निवॄत्ति: ॥
दुर्योधन कहते है "ऐसा नही की धर्म तथा अधर्म क्या है यह मैं नही जानता था ।
परन्तू ऐसा होने पर भी धर्म के मार्ग पर चलना यह मेरी प्रावॄत्ती नही बन पायी और अधर्म के मार्ग से मैं निवॄत्त भी नही हो सका ।
यादॄशै: सन्निविशते यादॄशांश्चोपसेवते ।
यादॄगिच्छेच्च भवितुं तादॄग्भवति पूरूष: ॥
मनुष्य , जिस प्रकारके लोगोंके साथ रहता है , जिस प्रकारके लोगोंकी सेवा करता है , जिनके जैसा बनने की इच्छा करता है , वैसा वह होता है ।
सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम् ।
सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम् ॥
जो व्यक्ती सुख के पीछे भागता है उसे ज्ञान नहीं मिलेगा ।तथा जिसे ज्ञान प्राप्त करना है वह व्यक्ति सुख का त्याग करता है । सुख के पीछे भागने वाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? तथा जिस को विद्या प्रप्त करनी है उसे सुख कैसे मिलेगा?
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।
Meaning:
An indiscriminate individual must be kept away in the interest of the family. If it is in the interest of the village, a family must be sacrificed. A village may be abandoned for the sake of a district. One must leave the world for self-realization.
आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया।
पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च।।
Meaning:
A pupil learns only a quarter from his teacher; acquires another quarter from self-study; receives another quarter from his classmates; and get the remaining quarter in course of time.
सदयं हृदयं यस्य भाषितं सत्यभूषितम्।
कायः परहिते यस्य कलिस्तस्य करोति किम्।।
Meaning:
What (harm) can Kalipuruṣa do to him, whose heart is full of kindness, whose speech is adorned with truth, and whose body is for the good of others.
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।
अपकारिषु यः साधुः स साधुरिति कीर्तितः।।
Meaning:
If one is good to those who do good to him, of what merit is one’s goodness? It is only he, who is good to even those who do harm to him, is called a saint.
वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैः
सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला
मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः
Meaning:
A Yogin says to a kind: “I am here (in the hermitage) content with garments made of bark, while you are happy with your silken ones. Our contentment is the same. There is no difference whatsoever. He who has abundant desire is poor. When there is contentment in the mind, who is rich and who is poor?
न कश्चिदपि जानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्।।
Meaning:
Nobody knows what will happen and to whom, tomorrow. Hence, a wise man should do today itself what is scheduled for tomorrow.
उद्यमेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
Meaning:
Success in life can be achieved only by hard work and not by merely wishing for it. No animal will enter into the mouth of a lion that is sleeping.
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् |
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ||
Meaning
जल्दबाजी में कोई कार्य नहीं करना चाहिए क्यूंकि बिना सोचे किया गया कार्य घर में विपत्तियों को आमंत्रण देता हैं |जो व्यक्ति सहजता से सोच समझ कर विचार करके अपना काम करते हैं लक्ष्मी स्वयम ही उनका चुनाव कर लेती हैं।
विद्या मित्रं प्रवासेषु ,भार्या मित्रं गृहेषु च |
व्याधितस्यौषधं मित्रं , धर्मो मित्रं मृतस्य च ||
Meaning
यात्रा के समय ज्ञान एक मित्र की तरह साथ देता हैं घर में पत्नी एक मित्र की तरह साथ देती हैं, बीमारी के समय दवाएँ साथ निभाती हैं अंत समय में धर्म सबसे बड़ा मित्र होता हैं |
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||
Meaning
मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसमे बसने वाला आलस्य हैं | मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र उसका परिश्रम हैं जो हमेशा उसके साथ रहता हैं इसलिए वह दुखी नहीं रहता |
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् |
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ||
Meaning
रथ कभी एक पहिये पर नहीं चल सकता हैं उसी प्रकार पुरुषार्थ विहीन व्यक्ति का भाग्य सिद्ध नहीं होता |
बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः |
श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः ||
Meaning
जो व्यक्ति कर्मठ नहीं हैं अपना धर्म नहीं निभाता वो शक्तिशाली होते हुए भी निर्बल हैं, धनी होते हुए भी गरीब हैं और पढ़े लिखे होते हुये भी अज्ञानी हैं |
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं ,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति |
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं ,
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ||
Meaning
अच्छी संगति जीवन का आधार हैं अगर अच्छे मित्र साथ हैं तो मुर्ख भी ज्ञानी बन जाता हैं झूठ बोलने वाला सच बोलने लगता हैं, अच्छी संगति से मान प्रतिष्ठा बढ़ती हैं पापी दोषमुक्त हो जाता हैं| मिजाज खुश रहने लगता हैं और यश सभी दिशाओं में फैलता हैं | मनुष्य का कौनसा भला नहीं होता |
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् |
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |
Meaning
तेरा मेरा करने वाले लोगो की सोच उन्हें बहुत कम देती हैं उन्हें छोटा बना देती हैं जबकि जो व्यक्ति सभी का हित सोचते हैं उदार चरित्र के हैं पूरा संसार ही उसका परिवार होता हैं |
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||
Meaning
महर्षि वेदव्यास ने अपने पुराण में दो बाते कही हैं जिनमें पहली हैं दूसरों का भला करना पुण्य हैं और दुसरो को अपनी वजह से दुखी करना ही पाप है |
पुष्पक विमान से श्रीराम और सीता के लंका से विदा होने का प्रसंग
लंका से विदा की धड़ी है , पुष्पक विमान उत्तर दिशा में उड़ रहा है। ऊँचे सिंहासन पर सीता सहित श्रीराम विराजमान हैं। वे जनकनन्दिनी को वे स्थान दिखाते हैं , जहाँ मेघनाद , कुम्भकरण, रावण आदि का वध हुआ , वो स्थल जहाँ से सेतु बाँधा गया। वो भी जहाँ रामेश्वर महादेव की स्थापना की गयी।
दोहा:
* मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद।
कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद॥117 क॥
भावार्थ:-जिनको मुनि ध्यान में भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति-नेति कहते हैं, वे ही कृपा के समुद्र श्री रामजी वानरों के साथ अनेकों प्रकार के विनोद कर रहे हैं॥117 (क)॥
* उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥117 ख॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा! अनेकों प्रकार के योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करने पर भी श्री रामचंद्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होने पर करते हैं॥117 (ख)॥
नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा॥1॥
भावार्थ:-भालुओं और वानरों ने कपड़े-गहने पाए और उन्हें पहन-पहनकर वे श्री रघुनाथजी के पास आए। अनेकों जातियों के वानरों को देखकर कोसलपति श्री रामजी बार-बार हँस रहे हैं॥1॥
चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया॥
तुम्हरें बल मैं रावनु मार्यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्यो॥2॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी ने कृपा दृष्टि से देखकर सब पर दया की। फिर वे कोमल वचन बोले- हे भाइयो! तुम्हारे ही बल से मैंने रावण को मारा और फिर विभीषण का राजतिलक किया॥2॥
भावार्थ:-अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ। मेरा स्मरण करते रहना और किसी से डरना नहीं। ये वचन सुनते ही सब वानर प्रेम में विह्वल होकर हाथ जोड़कर आदरपूर्वक बोले-॥3॥
दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा॥4॥
भावार्थ:-प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है। पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है। हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकों के ईश्वर हैं। हम वानरों को दीन जानकर ही आपने सनाथ (कृतार्थ) किया है॥4॥
देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा॥5॥
भावार्थ:-प्रभु के (ऐसे) वचन सुनकर हम लाज के मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़ का हित कर सकते हैं? श्री रामजी का रुख देखकर रीछ-वानर प्रेम में मग्न हो गए। उनकी घर जाने की इच्छा नहीं है॥5॥
दोहा :
* प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि॥118 क॥
भावार्थ:-परन्तु प्रभु की प्रेरणा (आज्ञा) से सब वानर-भालू श्री रामजी के रूप को हृदय में रखकर और अनेकों प्रकार से विनती करके हर्ष और विषाद सहित घर को चले॥118 (क)॥
* कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।
सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान॥118 ख॥
भावार्थ:-वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा विभीषण सहित और जो बलवान् वानर सेनापति हैं,॥118 (ख)॥
* कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि॥
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥118 ग॥
भावार्थ:-वे कुछ कह नहीं सकते, प्रेमवश नेत्रों में जल भर-भरकर, नेत्रों का पलक मारना छोड़कर (टकटकी लगाए) सम्मुख होकर श्री रामजी की ओर देख रहे हैं॥118 (ग)॥
चौपाई :
* अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई॥
मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो॥1॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी ने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमान पर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन ही मन विप्रचरणों में सिर नवाकर उत्तर दिशा की ओर विमान चलाया॥1॥
* चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥2॥
भावार्थ:-विमान के चलते समय बड़ा शोर हो रहा है। सब कोई श्री रघुवीर की जय कह रहे हैं। विमान में एक अत्यंत ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उस पर सीताजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी विराजमान हो गए॥2॥
राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥3॥
भावार्थ:-पत्नी सहित श्री रामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरु के शिखर पर बिजली सहित श्याम मेघ हो। सुंदर विमान बड़ी शीघ्रता से चला। देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलों की वर्षा की॥3॥
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥
सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥4॥
भावार्थ:-अत्यंत सुख देने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंधित) वायु चलने लगी। समुद्र, तालाब और नदियों का जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुंदर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं॥4॥
भावार्थ:-श्री रघुवीरजी ने कहा- हे सीते! रणभूमि देखो। लक्ष्मण ने यहाँ इंद्र को जीतने वाले मेघनाद को मारा था। हनुमान् और अंगद के मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर रणभूमि में पड़े हैं॥5॥
भावार्थ:-देवताओं और मुनियों को दुःख देने वाले कुंभकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गए॥6॥
दोहा :
* इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥119 क॥
भावार्थ:-मैंने यहाँ पुल बाँधा (बँधवाया) और सुखधाम श्री शिवजी की स्थापना की। तदनन्तर कृपानिधान श्री रामजी ने सीताजी सहित श्री रामेश्वर महादेव को प्रणाम किया॥119 (क)॥
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥119 ख॥
भावार्थ:-वन में जहाँ-तहाँ करुणा सागर श्री रामचंद्रजी ने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभु ने जानकीजी को दिखलाए और सबके नाम बतलाए॥119 (ख)॥
भावार्थ:-हे रघुकुल के स्वामी! सुंदर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुंदर बाण धारण किए हुए आप मेरी रक्षा कीजिए। आप महामोहरूपी मेघसमूह के (उड़ाने के) लिए प्रचंड पवन हैं, संशयरूपी वन के (भस्म करने के) लिए अग्नि हैं और देवताओं को आनंद देने वाले हैं।।1।।
काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन।।2।।
भावार्थ:-आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणों के धाम और परम सुंदर हैं। भ्रमरूपी अंधकार के (नाश के) लिए प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियों के (वध के) लिए सिंह के समान आप इस सेवक के मनरूपी वन में निरंतर वास कीजिए।।2।।* मामभिरक्षय रघुकुल नायक।
भावार्थ:-विषयकामनाओं के समूह रूपी कमलवन के (नाश के) लिए आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मन से परे हैं। भवसागर (को मथने) के लिए आप मंदराचल पर्वत हैं। आप हमारे परम भय को दूर कीजिए और हमें दुस्तर संसार सागर से पार कीजिए।।3।।
* स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन।।
अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर।।
मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन।। 4-5।।
भावार्थ:-हे श्यामसुंदर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबंधु! हे शरणागत को दु:ख से छुड़ाने वाले! हे राजा रामचंद्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित निरंतर मेरे हृदय के अंदर निवास कीजिए। आप मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वीमंडल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु और भय का नाश करने वाले हैं।। 4-5।।
दोहा
* नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।
कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार ।।115।।
भावार्थ:-हे नाथ! जब अयोध्यापुरी में आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा ।।115।
चौपाई :
* करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥
भावार्थ:-जब शिवजी विनती करके चले गए, तब विभीषणजी प्रभु के पास आए और चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोले- हे शार्गं धनुष के धारण करने वाले प्रभो! मेरी विनती सुनिए-॥1॥
* सकुल सदल प्रभु रावन मार्यो। पावन जस त्रिभुवन विस्तार्यो॥
भावार्थ:-आपने कुल और सेना सहित रावण का वध किया, त्रिभुवन में अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीन पर बहुत प्रकार से कृपा की॥2॥
* अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जन करिअ समर श्रम छीजे॥
देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥3॥
भावार्थ:-अब हे प्रभु! इस दास के घर को पवित्र कीजिए और वहाँ चलकर स्नान कीजिए, जिससे युद्ध की थकावट दूर हो जाए। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति का निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरों को दीजिए॥3॥
भावार्थ:-हे नाथ! मुझे सब प्रकार से अपना लीजिए और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरी को पधारिए। विभीषणजी के कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभु के दोनों विशाल नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥4॥
दोहा :
* तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।
भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥116 क॥
भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह सच बात है।पर भरत की दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है॥116 (क)॥
तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।
देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥116 ख॥
भावार्थ:-तपस्वी के वेष में कृश (दुबले) शरीर से निरंतर मेरा नाम जप कर रहे हैं। हे सखा! वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी से जल्दी उन्हें देख सकूँ। मैं तुमसे निहोरा (अनुरोध) करता हूँ॥116
भावार्थ:-यदि अवधि बीत जाने पर जाता हूँ तो भाई को जीता न पाऊँगा। छोटे भाई भरतजी की प्रीति का स्मरण करके प्रभु का शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है॥166 (ग)॥
करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।
पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं॥116 घ॥
भावार्थ:-(श्री रामजी ने फिर कहा-) हे विभीषण! तुम कल्पभर राज्य करना, मन में मेरा निरंतर स्मरण करते रहना। फिर तुम मेरे उस धाम को पा जाओगे, जहाँ सब संत जाते हैं॥116 (घ)॥
चौपाई :
* सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के॥
बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने॥1॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के वचन सुनते ही विभीषणजी ने हर्षित होकर कृपा के धाम श्री रामजी के चरण पकड़ लिए। सभी वानर-भालू हर्षित हो गए और प्रभु के चरण पकड़कर उनके निर्मल गुणों का बखान करने लगे॥1॥
लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥2॥
भावार्थ:-फिर विभीषणजी महल को गए और उन्होंने मणियों के समूहों (रत्नों) से और वस्त्रों से विमान को भर लिया। फिर उस पुष्पक विमान को लाकर प्रभु के सामने रखा। तब कृपासागर श्री रामजी ने हँसकर कहा-॥2॥
भावार्थ:-हे सखा विभीषण! सुनो, विमान पर चढ़कर, आकाश में जाकर वस्त्रों और गहनों को बरसा दो। तब (आज्ञा सुनते) ही विभीषणजी ने आकाश में जाकर सब मणियों और वस्त्रों को बरसा दिया॥3॥
हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता॥4॥
भावार्थ:-जिसके मन को जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है। मणियों को मुँह में लेकर वानर फिर उन्हें खाने की चीज न समझकर उगल देते हैं। यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपा के धाम श्री रामजी, सीताजी और लक्ष्मणजी सहित हँसने लगे॥4॥
ब्रह्मा तथा दशरथ प्रभुचरणों की वन्दना करके सुरलोक के लिए प्रस्थान कर चुके हैं।अब स्वयं देवराज इंद्र शोभाधाम, शरणागतों को अनंत विश्राम देने वाले जगदीश्वर की स्तुति कर रहे हैं -..... (बहुत सुंदर ढंग से संगीत बद्ध किया गया है, और बहुत मधुर स्वर में गाया गया है , विविध-भारती को बहुत बहुत धन्यवाद !)
दोहा-
* अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।
सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस।।112।।
भावार्थ:-छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीश की शोभा देखकर देवराज इंद्र मन में हर्षित होकर स्तुति करने लगे- ।।112।।
छंद -
* जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।।
धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप।।1।।
भावार्थ:-शोभा के धाम, शरणागत को विश्राम देने वाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किए हुए, प्रबल प्रतापी भुज दंडों वाले श्रीरामचंद्रजी की जय हो! ।।1।।
* जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि।।
यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल नाथ।।2।।
भावार्थ:-हे खरदूषण के शत्रु और राक्षसों की सेना के मर्दन करने वाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्ट को मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गए।।2।।
* जय राम सोभा धाम।
* जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार।।
जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल।।3।।
भावार्थ:-हे भूमि का भार हरने वाले! हे अपार श्रेष्ठ महिमावाले! आपकी जय हो। हे रावण के शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो। आपने राक्षसों को बेहाल (तहस-नहस) कर दिया।।3।।
* लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब।।
मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पं सब कें लाग।।4।।
भावार्थ:-लंकापति रावण को अपने बल का बहुत घमंड था। उसने देवता और गंधर्व सभी को अपने वश में कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभी के हठपूर्वक (हाथ धोकर) पीछे पड़ गया था।।4।।
* परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट।।
अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल।।5।।
भावार्थ:-वह दूसरों से द्रोह करने में तत्पर और अत्यंत दुष्ट था। उस पापी ने वैसा ही फल पाया। अब हे दीनों पर दया करने वाले! हे कमल के समान विशाल नेत्रों वाले! सुनिए।।5।।
* मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान।।
अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज।।6।।
भावार्थ:-मुझे अत्यंत अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु (आप) के चरण कमलों के दर्शन करने से दु:ख समूह का देने वाला मेरा वह अभिमान जाता रहा।।6।।
भावार्थ:-कोई उन निर्गुन ब्रह्म का ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त (निराकार) कहते हैं। परंतु हे रामजी! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है।।7।।
* बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत।।
मोहि जानिऐ निज दास। दे भक्ति रमानिवास।।8।।
भावार्थ:-श्रीजानकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मेरे हृदय में अपना घर बनाइए। हे रमानिवास! मुझे अपना दास समझिए और अपनी भक्ति दीजिए।।8।।
छंद -
* दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं।
सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं।।
सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं।
ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं।।
भावार्थ:-हे रमानिवास! हे शरणागत के भय को हरने वाले और उसे सब प्रकार का सुख देने वाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिए। हे सुख के धाम! हे अनेकों कामदेवों की छबिवाले रघुकुल के स्वामी श्रीरामचंद्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देवसमूह को आनंद देने वाले, (जन्म-मृत्यु, हर्ष-विषाद, सुख-दु:ख आदि) द्वंद्वों के नाश करने वाले, मनुष्य शरीरधारी, अतुलनीय बलवाले, ब्रह्मा और शिव आदि से सेवनीय, करुणा से कोमल श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
दोहा -
* अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल।
काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल।।113।।
भावार्थ:-हे कृपालु! अब मेरी ओर कृपा करके (कृपा दृष्टि से) देखकर आज्ञा दीजिए कि मैं क्या (सेवा) करूँ! इंद्र के ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीरामजी बोले ।।113।।
चौपाई
* सुन सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे।।
मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना।।1।।
भावार्थ:-हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरों ने मार डाला है, पृथ्वी पर पड़े हैं। इन्होंने मेरे हित के लिए अपने प्राण त्याग दिए। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो।।1।।
* सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी।।
प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई।।2।।
भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं -) हे गरुड़! सुनिए प्रभु के ये वचन अत्यंत गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकी को मारकर जिला सकते हैं। यहाँ तो उन्होंने केवल इंद्र को बड़ाई दी है।।2।।
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।।3।।
भावार्थ:-इंद्र ने अमृत बरसाकर वानर-भालुओं को जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभु के पास आए। अमृत की वर्षा दोनों ही दलों पर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं।।3।।
भावार्थ:-क्योंकि राक्षस के मन तो मरते समय रामाकार हो गए थे। अत: वे मुक्त हो गए, उनके भवबंधन छूट गए। किंतु वानर और भालू तो सब देवांश (भगवान् की लीला के परिकर) थे। इसलिए वे सब श्रीरघुनाथजी की इच्छा से जीवित हो गए।।4।।
* राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।।
खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न।।5।।
भावार्थ:-श्रीरामचंद्रजी के समान दीनों का हित करने वाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसों को मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापों के घर और कामी रावण ने भी वह गति पाई जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते।।5।।
दोहा -
* सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।
देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान।।114।। (क) ।।
भावार्थ:-फूलों की वर्षा करके सब देवता सुंदर विमानों पर चढ़-चढ़कर चले। तब सुअवसर जानकार सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचंद्रजी के पास आए- ।।114 (क)।।
* परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि।। 114 (ख)।।
भावार्थ:-और परम प्रेम से दोनों हाथ जोड़कर, कमल के समान नेत्रों में जल भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद् वाणी से त्रिपुरारी शिवजी विनती करने लगे - ।।114 (ख) ।।