कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

🔱विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ का सारांश 🔱||Session 25||The Essence of Vivekachudamani | 🔱 https://www.sadhanapath.in/search?updated-max=2025-09-07🔱🔱https://shlokam.org/texts/vivekachudamani-472-479/

🔱माँ काली का अनुग्रह- मैं नहीं हूँ ! ईश्वर  ही है !🔱 

 परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,

 निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।

यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,

 तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥५॥

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

ॐ शांति, शांति, शांतिः हरिः ॐ 

   अभी तक के विगत 24 सत्रों में विवेक चूड़ामणि के जो मुख्य श्लोक हैं उनके तात्पर्य को हमने देख लिया। हमलोग चुन करके पढ़ रहे हैं। पूरा ग्रंथ तो हमलोग नहीं पढ़ रहे हैं , कुछ Selected verses' कुछ चुने हुए श्लोकों को ही हमलोग पढ़ रहे हैं। तो उस ग्रंथ के एक -दो और भी विचारणीय श्लोकों को हमलोग पढ़ लेते हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले विगत 24 सत्रों में हमने जो पढ़ा है उसका सारांश देख लेते हैं,  summaries कर लेते हैं, या संक्षिप्त विवरण देख लेते हैं। शुरुआत से लेकर अबतक हमने जो पढ़ा है ,उसका एक total viewing कर लेते हैं। 


 The Essence of Vivekachudamani | Session 25


1. मनुष्य शरीर की महत्ता('खण्डन भव बन्धन की योग्यता' नित्य-अनित्य विवेक-प्रयोग करने की क्षमता केवल मनुष्य में है।) 

        इस ग्रन्थ के शुरुआत में ही शंकराचार्यजी हमें यह बता देते हैं कि इस मनुष्य शरीर का क्या महत्व है ? मनुष्य शरीर में जन्म लेना कितना बड़ा सौभाग्य है , ये हमें अब समझ में आ रहा है। क्योंकि कोई भी विशालकाय पशु वह काम नहीं कर सकता , जो कार्य केवल मनुष्य ही कर सकता है, और वह महान कार्य क्या है ? वह कार्य है -'खण्डन भव बन्धन' ! बन्धनों से मुक्त होना! इस कार्य को मनुष्य मात्र ही कर सकता है। इस सृष्टि में जितने भी जीव-जन्तु हैं वे सभी बद्ध हैं लेकिन वह बंधन क्या है ? इस पहेली (riddle-गोरखधन्धा, अविनाशी आत्मा होकर भी नश्वर शरीर में कैद क्यों हैं???) को समझने, और फिर इस बंधन से मुक्त होने का प्रयास सिर्फ मनुष्य ही कर सकता है। (स्थूल शरीर स्त्री-पुरुष देह के जन्म-मृत्यु को अपना जन्म-मृत्यु समझने के सम्मोहन  का भ्रम) बंधन से मुक्त होने का प्रयास, मनुष्य अतिरिक्त अन्य कोई जीव नहीं कर सकता है। भव-बंधन से मुक्त होने का प्रयास, मनुष्य के अतिरिक्त अन्य कोई जीव नहीं कर सकता है। उसकी योग्यता अन्य जीवों में नहीं होती, यह योग्यता सिर्फ मनुष्यों में ही होती है

    1A. मनुष्य मात्र की विशिष्ट योग्यता क्या है ? हमने इस पर विस्तार से चर्चा करके समझा कि विवेक प्रयोग करने की क्षमता और साहस केवल मनुष्यों में ही होती है। विवेक-प्रयोग करने की योग्यता सिर्फ मनुष्य शरीर मिलने से ही प्राप्त होती है। तो शंकराचार्यजी विवेक-चूड़ामणि ग्रन्थ के शुरुआत में ही, मंगला-चरण में ही इस अत्यन्त गंभीर विचारणीय-विषय (Issue) को हमारे सामने रखते हैं।  कहते हैं -"तम् अगोचरम्" — यह शब्द दर्शाता है कि वह परमात्मा या गुरु सामान्य ज्ञानेंद्रियों के द्वारा जानने योग्य नहीं हैं।  यद्यपि वे इन्द्रियातीत हैं, फिर भी वह वेदांत के सिद्धांतों (महावाक्यों) के माध्यम से जाने  जा सकते हैं

"तमगोचरं सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं। 

गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ १ ॥"

*****

जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता ,

 तस्माद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम् । 

आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थिति-

र्मुक्तिर्नो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते ॥ २ ॥ 

*****

"दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।

मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥3।।

*****

ये दुर्लभं शब्द बड़ा ही महत्वपूर्ण है। इस नरदेह की दुर्लभता क्या है ?  मनुष्य  नरदेह सुलभ नहीं है- ये आसानी से नहीं मिलता। अगर यह मिला है तो - यह ईश्वर के अनुग्रह से ही मिलता है। 

2. मुक्ति इस सृष्टि की सबसे दुर्लभ वस्तु :   

     फिर हमने देखा कि इस सृष्टि में सबसे दुर्लभ चीज तो मुक्ति है। लेकिन क्या नर शरीर प्राप्त करने मात्र से ही सब कुछ हो गया क्या ? इस पृथ्वी पर मनुष्यों की जनसंख्या 8 अरब है। उसमें से कितने मनुष्य मुक्ति के लिए प्रयत्न कर रहे हैं ? तो नर शरीर (3H) प्राप्त करने के पश्चात् भी बहुत से विचारणीय मुद्दे (issues या मामले) हैं जिन्हें हमें -'Cultivate' विकसित करना है। शरीर को व्यायाम और पौष्टिक आहार से स्वस्थ रखना पहला धर्म है। मन की  एकाग्रता और शक्ति को विकसित कर पौष्टिक आहार और अभ्यास द्वारा वश में लाने का प्रयास करना, ह्रदय के विकास के लिए व्यायाम और पौष्टिक आहार आदि कुछ अन्य प्रमुख मुद्दा है। जिसको विकसित करने की पद्धति हमें सीखनी होगी। क्योंकि   

इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति । 

दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम् ॥ ५ ॥

अर्थ:- दुर्लभ मनुष्य-देह और उसमें भी पुरुषत्व को पाकर जो स्वार्थ-साधन में प्रमाद करता है, उससे अधिक मूढ और कौन होगा ? 

3. ब्राह्मणों पाए जाने वाले 24 गुणों को विकसित करना : 

    तो हमने देखा शंकराचार्य जी कह रहे हैं - नर शरीर (3H) प्राप्त करने के पश्चात् भी बहुत से विचारणीय मुद्दे (issues या मामले) हैं जिन्हें हमें -'Cultivate' विकसित करना है। उन अच्छे गुणों को विकसित करना होगा जो ब्राह्मणों में पाए जाते हैं ! ब्राह्मणो का गुण अर्थात आत्मसंयम-केन्द्रित जीवन, यम-नियम-आसन आदि अष्टांग मार्ग में तपस्या केंद्रित वेद मार्गी जीवन। शुद्ध और पवित्र जीवन का गठन । (5:03) वैसा जीवन-गठन जो ईश्वर केंद्रित है , निःस्वार्थ है, जो अपरोक्ष ज्ञान केंद्रित जीवन गठन । ये सब है ब्राह्मणों का गुण। उन्हें विकसित करना और चरित्रवान मनुष्य बनना। वैसा जीवन गठन। 

4. वेद के बातये हुए मार्ग (Be and Make अष्टांग-मार्ग) पर निष्ठा : इस ग्रन्थ पर चर्चा करने से समझ में आया की अन्य कोई भी 'ism' या मार्ग हमारे वेद मार्ग -Be and Make मार्ग से श्रेष्ठ नहीं है। कौन सा ऐसा मार्ग है - जो आपको परमार्थ तक ले जा सकती है ? (परमार्थ दूसरों की निःस्वार्थ सेवा - मनुष्य का वह नैतिक लक्ष्य जो सर्वोच्च है, जिससे अधिक श्रेयस्कर कुछ हो नहीं सकता, जो मानवीय प्रयत्न का सबसे बड़ा साध्य है।) हमलोग जितने भी ism पढ़ते हैं -Marxism, Socialism, वो परमार्थ का (जन-सेवा का) कोई मार्ग है क्या ? मनुष्य की सच्ची उन्नति किस मार्ग पर चलने से होगी ? वेद के मार्ग पर जब हमारी निष्ठा होगी , तभी हमारी ठीक -ठीक उन्नति होगी। यदि वेद-निष्ठा हो भी जाये तो , उसके मूल शास्त्र (दशावतार और अवतार वरिष्ठ) का ज्ञान किसके पास है ? बहुत कम लोगों के पास है। शास्त्र का ज्ञान हो भी जाये तो उसका अनुशीलन कितने लोग कर रहे हैं ? 

5. वेदमार्ग का अनुशीलन अर्थात आत्मा-अनात्मा विवेचनं : कितने लोग कर रहे हैं ? अति दुर्लभ लोग कर रहे हैं।

6.अपरोक्ष ज्ञान की अनिभूति प्राप्त पुनः देह में लौटने वाले 'नेता' कितने हैं आत्मा-अनात्मा विवेचनं करके फिर अनुभूति कितनों की होती है ? अगर यह अनुभूति हो भी गयी , मैं आत्मा हूँ , 'शिवोहं' हूँ - तो अभी मरेगा कौन ? ऐसा साहस , समाधि, और माँ की कृपा से पुनः उसी शरीर में लौट आने की क्षमता कितनों को होती है ? और भी कम ! (6:21इसलिए इस सृष्टि में सबसे दुर्लभ उपलब्धि 'मुक्ति' या मोक्ष ही है। 

7.माँ काली का अनुग्रह  इसलिए यदि किसी व्यक्ति को मनुष्य शरीर , मुक्ति की इच्छा और किसी महापुरुष (अतीन्द्रिय दृष्टि प्राप्त गुरु) का आश्रय तीनो प्राप्त हो तो शंकराचार्य जी कहते हैं यह केवल ईश्वर के अनुग्रह से ही मिला हुआ है , अन्यथा यह संभव नहीं है। (अव्यक्त नाम वाली त्रिगुणमयी परमेश शक्ति -माँ काली , कात्यायनी,.. के अनुग्रह से ही संभव है।)  अगर हम आज मनुष्य शरीर में हैं , और हमारे अंदर थोड़ी सी भी 10 %भी इस बंधन से मुक्त होने की इच्छा है , किसी समर्थ गुरुदेव और विष्णु के सहस्रनाम में वर्णित नेता (अवतारी ब्राह्मण नेता और पूर्वजन्म के कैप्टन सेवियर) का मार्गदर्शन हमको मिलता है। या हमारे जीवन में ये अगर सब चल रहा है ? तो हमें समझ लेना चाहिए कि सब 'उस परमेश शक्ति काली की कृपा' से ही हो रहा है जो शिव को ही ढँक रही है, अन्यथा यह सम्भव नहीं है ! (7:24) 

8. आत्म या ब्रह्म जिज्ञासा के चार साधन : या 'मुक्ति रूपी लक्ष्य' तक पहुँचने के साधन : अब इस मुक्ति को प्राप्त करना हो , तो मुक्ति के कुछ साधनों की आवश्यकता है। उन साधनों के बगैर कोई भी व्यक्ति इस मुक्ति रूपी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। उन चार साधनों को साधन चतुष्टय कहते हैं। 

विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणशालिनः ।

मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मता ॥ १७॥

अर्थ:-जो सदसद्विवेकी, वैराग्यवान्, शम-दमादि षट्सम्पत्तियुक्त और मुमुक्षु हो उसी में ब्रह्मजिज्ञासा की योग्यता मानी गयी है।

साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः ।

येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिद्ध्यति ॥ १८ ॥

अर्थ:- यहाँ मनस्वियों ने आत्म या ब्रह्म जिज्ञासा के चार साधन बताये हैं, उनके होने से ही सत्य स्वरूप आत्मा में स्थिति हो सकती है, उनके बिना नहीं।

आदौ नित्यानित्यवस्तुविवेकः इहामुत्रफलभोगविरागस्तदनन्तरम् शमादिषट्‌कसम्पत्तिर्मुमुक्षुत्वमिति परिगण्यते । स्फुटम् ॥१९॥

अर्थ:-पहला साधन नित्यानित्य-वस्तु-विवेक गिना जाता है, दूसरा लौकिक एवं पारलौकिक सुख भोग में वैराग्य होना है, तीसरा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान- ये छः सम्पत्तियाँ हैं और चौथा साधन मुमुक्षुता है।

9.विवेक की परिभषा : फिर हमने शंकराचार्य जी के द्वारा प्रदत्त विवेक की परिभाषा को देखा। 

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः ।

सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः ॥ २० ॥

अर्थ:- 'ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है' ऐसा जो निश्चय है यही 'नित्यानित्यवस्तु-विवेक' कहलाता है।

10.  वैराग्य की परिभाषा क्या है ? 

तद्वैराग्यं जुगुप्सा या दर्शनश्रवणादिभिः 

देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि ॥ २१ ॥

अर्थ:-दर्शन और श्रवणादि के द्वारा देह से लेकर ब्रह्मलोक पर्यन्त सम्पूर्ण अनित्य भोग्य पदार्थों में जो घृणा बुद्धि है वही 'वैराग्य' है।

11. षट्सम्पत्ति की परिभाषा 

 विरज्य विषयव्राताद्दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः ।

स्वलक्ष्ये नियतावस्था मनसः शम उच्यते ॥ २२ ॥

अर्थ:-बारम्बार दोष-दृष्टि करने से विषय-समूह से विरक्त होकर चित्त का अपने लक्ष्य में स्थिर हो जाना ही 'शम' है।

विषयेभ्यः परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके ॥ २३ ॥ 

उभयेषामिन्द्रियाणां स दमः परिकीर्तितः । 

बाह्यानालम्बनं वृत्तेरेषोपरतिरुत्तमा ॥ २४॥

अर्थ:-कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दोनों को उनके विषयों से खींचकर अपने-अपने गोलकों में स्थित करना 'दम' कहलाता है। वृत्ति का बाह्य विषयों का आश्रय न लेना यही उत्तम 'उपरति' है।

सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्रह्मणि सर्वथा। 

तत्समाधानमित्युक्तं न तु चित्तस्य लालनम् ॥ २७ ॥

अर्थ:-अपनी बुद्धि को सब प्रकार शुद्ध ब्रह्म में ही सदा स्थिर रखना इसी को 'समाधान' कहा है। चित्त की इच्छापूर्ति का नाम समाधान नहीं है।

12. मुमुक्षुता क्या है ?  

अहंकारादिदेहान्तान्बन्धानज्ञानकल्पितान् ,

स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तुमिच्छा मुमुक्षुता ॥ २८ ॥

अर्थ:-अहंकार से ले कर देह पर्यन्त जितने अज्ञान-कल्पित बन्धन हैं, उनको अपने स्वरूप के ज्ञान द्वारा त्यागने की इच्छा 'मुमुक्षुता' है(8:04

  ये सब हमने देखा तो, इस प्रकार जो व्यक्ति साधन-चतुष्टय सम्पन्न मुमुक्षु  होगा , उसको मुक्ति प्राप्त होगी -कहने का मतलब यह नहीं है कि उसमें 100 % विवेक-वैराग्य होना चाहिए ! (अवतार के अतिरिक्तहम जैसे सर्वसाधारण मनुष्यों में किसी का भी आध्यात्मिक जीवन 100 % विवेक-वैराग्य के साथ शुरू नहीं होता है। हम जैसे सर्वसाधारण मनुष्यों में कोई व्यक्ति 100 % वैरागी हो , ऐसा  सम्भव भी नहीं है। हम साधारण मनुष्य हैं हमारे अंदर -विवेक, वैराग्य, षट्- सम्पत्ति और मुमुक्षता विभिन्न मात्राओं में होती है। थोड़ी ज्यादा या कम -लेकिन कुछ मात्रा में ही होना अपेक्षित है। अगर बिल्कुल भी नहीं हो, तो मुक्ति की दिशा में हमारी जो यात्रा है , वो शुरू ही नहीं होगी। तो कमसेकम कुछ मात्रा में 5-10 % भी होना अपेक्षित है। और फिर मनःसंयोग की साधना से हम उसको बढ़ाते जाते हैं। साधना क्या है ? साधन चतुष्टय को धीरे -धीरे बढ़ाते जाना ही साधना है। इस पाठचक्र में महामण्डल के द्वारा निर्देशित जो 5 साधन बताये गए हैं, उसका अभ्यास करने वाले हम सभी लोग इस साधन-चतुष्टय मार्ग के ही साधक हैं। हमलोग अभी सिद्ध नहीं हुए हैं(9:18) हम सब अभी साधक है। तो हमें अभी focus करना है साधन चतुष्टय पर। यहाँ से जाने के बाद भी यदि आप जीवनगठन और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार -प्रसार करना चाहते हो ? तो आपको focus करना पड़ेगा साधन चतुष्टय पर उसमें भी विशेष कर विवेक और वैराग्य परThe main point is Viveka and Vairagya ! यदि ये दोनों चीजें -विवेक और वैराग्य अपने जगह पर हों - तो चरित्र के बाकि सारे गुण अपने आप जुड़ते चले जायेंगे। 

13. विवेक और वैराग्य यदि 50 % से ऊपर की दिशा बढ़ता गया , तो चरित्र के बाकि के सारे गुण खुद अभिव्यक्त होते जायेंगे। आपका जीवन ही बदल जायेगा। क्योंकि विवेक क्या है ? स्पष्टता है। यदि आपका विवेक अर्थात सत्य-मिथ्या स्पष्टता हर समय जाग्रत है, तब अपने आप ही अपनी जीवन नौका को बहुत सावधानी से वैराग्य पूर्वक (त्यागपूर्वक भोग करते हुए ) आगे ले जा पाओगे। यही है जीवन जीने की कला। 

14. पूर्णत्व प्राप्ति के लिए हमें focus करना है साधन चतुष्टय पर। उसमें भी विवेक और वैराग्य पर। 

15.सत्य द्रष्टा गुरु की खोज : और इस प्रकार जो साधक साधन-चतुष्टय की साधना में 60 % ऊपर उठ गया , वो मोक्षार्थी पहुँचता है गुरु के पास। उस मोक्षार्थी के मन की दशा ऐसी है कि वह अपने आपको इस संसार सागर में डूबता हुआ देख रहा है ! स्वयं को संसार की अग्नि में तपता हुआ पाता है। उसको अत्यंत पीड़ा है -वो जान रहा है , कि मैं डूब रहा हूँ। जिस बिना तली के अंधे कुँए में मैं गिरा हूँ , उसमें गिरता ही जा रहा हूँ। अब वह मुमुक्षु उस अन्धकूप से बाहर निकलने के लिए अत्यंत व्याकुल है (11:00) यह उसकी मनोदशा है। ऐसा जो मुमुक्षु है , जो सत्यार्थी है , जो सत्यान्वेषी है , वो उस गुरु के पास आता है। ये आदर्श शिष्य है जो साधन-चतुष्टय से युक्त है , और उसके साथ जिसके अंदर इतनी तीव्र व्याकुलता है ! आदर्श गुरु कौन है ? वो भी हमने देख लिया था। आदर्श गुरु वे हैं इन्द्रियातीत ब्रह्म के विषय में श्रोत्रिय  है ब्रह्मनिष्ठ है। जो निष्पाप है , निष्काम है! [इन्द्रियातीत सत्य या आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त वह श्रेष्ठ {श्रोत्रिय} ब्राह्मण श्रद्धेय और पूजा योग्य होता है। तथा जो धर्मग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त करके प्रवचन द्वारा वास्तविक सत्य को प्रकट करने वाला ब्राह्मण है श्रोत्रिय कहलाता है।]  

16. आदर्श शिष्य को देखकर आदर्श गुरु खिल उठते है ! उनका संवाद शुरू होता है। ऐसे योग्य शिष्य को पाकर के जो मुमुक्षु है , जो इन बंधनों से मुक्त होना चाहता है। वे ऐसे शिष्य को पाकर उसकी प्रसंशा करते हैं 

धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावितं ते कुलं त्वया।

 यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ।॥ ५२ ॥

अर्थ:-गुरु-तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझ से पवित्र हो गया, क्योंकि तू अविद्यारूपी बन्धन से छूट कर ब्रह्मभाव को प्राप्त होना चाहता है। तुम इस अविद्या रूपी बंधन से मुक्त होने की इच्छा कर रहे हो , तुम धन्य हो , तुम कृतकृत्य हो, तुम्हारे इस प्रयास कारण तुम्हारा पूरा कुल पवित्र हो गया। तो इस प्रकार ये शिष्य गुरु के पास आता है , और गुरु के समक्ष 7 मूल भूत प्रश्नों को रखता है -उसके प्रश्न कोई साधारण मनुष्य के प्रश्न नहीं हैं -कि मैं जीवन में शांति कैसे पाऊँ ? या मेरी नौकरी कब लगेगी ? हमलोग तो साधारणतः किसी योगी गुरु के पास जाते हैं , तो ऐसे ही प्रश्न करते हैं। गुरुदेव हमको बताओ मैं गेट की परीक्षा गेट की परीक्षा [The Graduate Aptitude Test in Engineering (GATE)] कैसे पास करूँगा ? लेकिन ऐसे प्रश्न (देवराहा बाबा से यह प्रश्न कि 1986 का बिहार और देश कैसे कैसे ठीक होगा? कौन करेगा ?] 

17. आदर्श शिष्य के मूलभूत 7 प्रश्न क्या हैं ?  

को नाम बन्धः, कथमेष आगतः,

 कथं प्रतिष्ठास्य, कथं विमोक्षः ।

कोऽसावनात्मा , परमः क आत्मा,

 तयोर्विवेकः कथम एतद उच्यताम् ॥ ५१ ॥

अर्थ:-बन्ध क्या है? यह कैसे हुआ? इसकी स्थिति कैसे है? और इससे मोक्ष कैसे मिल सकता है? अनात्मा क्या है? पर मात्मा किसे कहते हैं? और उनका विवेक (पार्थक्य ज्ञान) कैसे होता है? कृपया यह सब कहिये।

  ये सारे प्रश्न बंधन केन्द्रित हैं। सातो प्रश्न बंधन मूलक है। इस बंधन से हम मुक्त कैसे हों ? बंधन की जब बात करते हैं तब अनात्मा और आत्मा को समझने का प्रश्न उठ खड़ा होता है। क्योंकि इन दोनों के बीच हमने गड़बड़ कर दिया है। एक को दूसरा समझ लिया है। आज हमने अनात्मा को आत्मा समझ लिया है। हमने देह को ही आत्मा समझ लिया है, जिस प्रकार वो किसान मगरमच्छ को लट्ठा समझकर नदी पार करना चाहता था। उसी प्रकार हम अनात्मा को आत्मा समझकर बैठे हैं। ये अनात्मा कभी भी आत्मा नहीं हो सकती। आप किसी भी तरह से यह नश्वर शरीर नहीं हो सकते हो। यह तो एक बुलबुला है , जो अभी दिख रहा है , अभी अदृश्य हो जायेगा। बस खन भर की बात है। ये स्थूल शरीर जो है , एक बुलबुले के समान है। अभी प्रकट हुआ अभी अदृश्य हो जायेगा , क्षण भर की बात है। कब ये बुलबुला फूटेगा ? कोई नहीं जानता। लेकिन हम कभी यह नश्वर शरीर हो ही नहीं सकते। हम कभी नश्वर शरीर नहीं हो सकते , ये बात हमें तभी समझ में आएगा जब हम इस चीज की खोज करें कि ये अनात्मा , ये बुलबुला , ये स्थूल शरीर है क्या ? जब खोजोगे तो ये मिलेगा ही नहीं। कुछ और ही मिल जाते हैं। इसकी खोज करो तो ईश्वर मिल जाते हैं। इन सातों प्रश्नों को गुरु के समक्ष रखने के बाद गुरुदेव सबसे पहले चतुर्थ प्रश्न- कथं विमोक्षः । का उत्तर  देता हैं। इन दो श्लोकों में गुरुदेव ने हमारे आध्यात्मिक जीवन का जो मार्ग है , उसके विषय में बहुत विस्तारित और बहुत सुंदर उत्तर दिया है। 

मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु

ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ ७१ ॥

ततः श्रुतिस्तन्मननं सतत्त्व-ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं मुनेः ।

ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वा-निहैव निर्वाणसुखं समृच्छति ॥ ७२ ॥

अर्थ:-मोक्ष का प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओं में अत्यन्त वैराग्य होना कहा है, तदनन्तर शम, दम, तितिक्षा और सम्पूर्ण आसक्तियुक्त कर्मों का सर्वथा त्याग है। तदुपरान्त मुनि को श्रवण, मनन और चिरकाल तक नित्य-निरन्तर आत्म-तत्त्व का ध्यान करना चाहिये। तब वह विद्वान्  परम निर्विकल्पावस्था को प्राप्त होकर, इसी शरीर में जीवित रहकर निर्वाण-सुख को पाता है। 

अगर हम मोक्ष के प्रथम हेतु की बात करें तो वह वैराग्य है , किसके प्रति वैराग्य ? बुलबुलों के प्रति वैराग्य, अनित्य वस्तुओं के प्रति वैराग्य। अब अगर किसी मनुष्य को बुलबुलों के प्रति राग हो , बुलबुलों में आसक्ति हो , तो ये समझदारी है या मूर्खता है ? बुलबुलो के प्रति यदि हमारी राग हो, हमारी आसक्ति हो , हम अगर बुलबुलों से चिपक रहे हैं , तो ये हमारी मूर्खता है। तो उस अनित्य वस्तुओं के प्रति तीव्र वैराग्य। और जब तीव्र वैराग्य होता है तो शम -दम -उपरति-तितिक्षा -श्रद्धा -समाधान आदि षट सम्पत्ति स्वतः चली आती है। फिर वह व्यक्ति निष्काम कर्म करता है। वह कामना युक्त स्वार्थी कर्म नहीं कर सकता। और उस शुद्ध मन से जब वो श्रवण , मनन और निदिध्यासन करता है , तो इस शरीर में जीतेजी ही वह निर्वाण सुख को प्राप्त कर लेगा। इन दो श्लोकों में बंधन से मुक्ति कैसे प्राप्त करें ? ये बता दिया गया है। (16:57)अनित्य वस्तुओं से वैराग्य - that is the beautiful highway ! अनित्य बुलबुलों से वैराग्य - वह सुन्दर राजमार्ग है ! ये हुआ चतुर्थ प्रश्न का समाधान। फिर गुरुदेव पंचम प्रश्न को लेते हैं -वो है अनात्मा क्या है ? क्योंकि हमारे मन में जितनी भी भ्रान्तियाँ हैं , वे अनात्मा को लेकर के ही हैं। हमने अनात्मा को ही तो आत्मा समझ लिया है। तो अनात्मा पर विस्तार से विचार दिया गया है। जब हम अनात्मा की बात करते है तो प्रथम आता है स्थूल शरीर ! क्योंकि हम सब इसी में फँसे हुए हैं। इस स्त्री-पुरुष शरीर में ही हमारी 'मैं -बुद्धि' है। मैं तो ये हो ही नहीं सकता। और इसी शरीर में हमारी मैं -बुद्धि है। तप पहले स्थूल शरीर की ही खोज करते है कि स्थूल शरीर क्या है ?

18. स्थूल शरीर क्या है >

मज्जास्थिमेदः पलरक्तचर्म-त्वगाह्वयैर्धातुभिरेभिरन्वितम्

पादोरुवक्षोभुजपृष्ठमस्तकै -रङ्गैरुपाङ्गैरुपयुक्तमेतत्

अर्थ:-मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा-इन सात धातुओं से बने हुए तथा चरण, जंघा, वक्षःस्थल (छाती), भुजा, पीठ और मस्तक आदि अंगोपांगों से युक्त, 'मैं और मेरा' रूप से प्रसिद्ध इस मोह के आश्रय रूप देह को विद्वान् लोग 'स्थूल शरीर' कहते हैं।  

नभोनभस्वद्दहनाम्बुभूमयः सूक्ष्माणि भूतानि भवन्ति तानि ॥ ७५ ॥

परस्परांशैर्मिलितानि भूत्वा स्थूलानि च स्थूलशरीरहेतवः ।

मात्रास्तदीया विषया भवन्ति शब्दादयः पञ्च सुखाय भोक्तुः ॥ ७६ ॥

अर्थ:-आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी- ये सूक्ष्म भूत हैं। इनके अंश परस्पर मिलने से स्थूल होकर स्थूल शरीर के हेतु होते हैं और इन्हीं की तन्मात्राएँ भोक्ता जीव के भोग रूप सुख के लिये शब्दादि पाँच विषय हो जाती हैं। 

      ये स्थूल शरीर , जो एक बुलबुला मात्र है , कभी 'मैं ' हो सकता है क्या ? हम सब स्थूल शरीर से ही तो मोहित हैं। विशेषकर बाहर से सतह पर 2mm की चमड़ी -दृष्टि से ही तो भ्रमित हैं। सारा विश्व- प्रपंच 2mm की चर्म -दृष्टि में ही फँसा हुआ है। इसी में सुंदर-असुंदर , स्त्री -पुरुष ,काला - गोरा , सारा लैंगिक भेद और लैंगिक आकर्षण यह सब स्थूल शरीर -केंद्रित दृष्टि में है। सच्चाई में ये शरीर सतह पर जैसा दीखता है , वैसा है क्या ? उसमें मज्जा है , अस्थि है , मेद है , पल है , रक्त है , चर्म है। फिर उस शरीर के विभिन्न अंग हैं - हाथ है, पैर है ,जाँघे हैं , पीठ है , मस्तक है -वगैरह , वगैरह। स्थूल शरीर का वर्णन इस प्रकार से करने का तात्पर्य यह है कि ऊपर से सब शरीर अलग अलग दीखते हैं , भीतर से सब समान हैं। सतह पर सब अलग अलग दीखते हैं , थोड़ा सा भीतर चले जाइये -सब समान हैं। (19:34) कोई अन्तर नहीं है। शरीर के भीतर झाँकने से ही समदृष्टि आ जाती है, सारी भेद-दृष्टि उसी में चली जाती है -ब्रह्म में पहुँचने से पहले ही, थोड़ा सा भी हम सतह के भीतर प्रवेश कर जाएँ तो हमारी भेद -दृष्टि कम हो जाती है। हम देखते हैं -सब तो एक ही है। कहाँ अंतर है , बताइये ? केवल मनुष्य ही नहीं पशु को भी ले लीजिये। उसके भीतर भी वही अस्थि, चर्म , रक्त है। फिर ये लिंग जो है -Gender जो है, जिसका प्रभाव हमारे मन के ऊपर इतना dominant या प्रबल हो गया है। हमारे सम्पूर्ण जीवन का आचरण behaviour इसी Gender differentiation से लिंग भेद से Govern हो रहा है। मनुष्यों के दैनंदिन जीवन के आचरण को विशेष करके कौन संचालित कर रहा है ? ये लैंगिक भेद का प्रभाव द्वारा ही संचालित हो रहा है या नहीं ? सोंच कर दिखिए। ये एक कितना बड़ा बंधन है ? This gender ideas govern your behaviour .It makes you behave in a certain manner. It makes respond in a certain manner .It makes you react in a certain manner .  ये लिंग संबंधी विचार आपके व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। ये ये लिंग संबंधी विचार ही आपको एक विशेष तरीके से respond करने या प्रत्युत्तर देने  के लिए प्रेरित करते हैं। ये आपको एक निश्चित तरीके से परस्पर प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करते हैं।  ये gender है क्या चीज ? थोड़ा सा हम भीतर जाकर देखें तो पाएंगे कि यह कितना निरर्थक है , और निराधार है। जबकि सारा का सारा विश्व-प्रपंच वहीं पर अटका हुआ है। (21:22) ये सब स्थूल शरीर के वर्णन करने का, इस प्रकार कहने के पीछे का जो तात्पर्य है , वो यह कि ये सब कितना निरर्थक है ! हम कहाँ पर बँधे हुए हैं ?

18. इस सृष्टि की मोहास्पद चीज क्या है ? 

फिर कहते हैं इस स्थूल शरीर के निस्सारता को समझना इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? क्योंकि यह स्थूल शरीर ही मोह का आस्पद है मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः । और ये मोह कैसे काम करता है ? अहंममेति प्रथितं शरीरं- 'मैं' यह M/F शरीर हूँ और ये 'मेरा /मेरी' चीज है ? अहंममेति प्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः । इस स्थूल शरीर के प्रति ही हमारी ऐसी धारणा है कि मैं यह हूँ और ये मेरा है। और जब दूसरे बुलबुलों या बुलबुली के साथ ऐसा सम्बन्ध बना लेते हैं कि यह मेरी पत्नी है ! ये मेरा पति है। ये मेरे बच्चे हैं। ये मेरा , ये मेरी। एक बुलबुला दूसरे बुलबुलों के साथ चिपक कर सुरक्षित होना चाहता है। लेकिन वे भी तो बुलबुले ही हैं। अभी प्रकट होगा , अभी अदृश्य हो जायेगा। उसी बुलबुले के साथ मैं और मेरा रूपी -एक मोह ग्रस्त सम्बन्ध हमने बना लिया है। ये स्थूल शरीर ही सारे मोह का आस्पद है। मोह वह चीज है जो बड़े -बड़े ऋषि-मुनि को भी अँधा बना देता हैं। मोह वह चीज है -जो सत्य को ढँक देती है। और वो व्यक्ति फिर सत्य को देख नहीं पाता है। इसीलिए हम सत्य को देख नहीं पा रहे हैं। जब तक हमारे अन्तःकरण में यह लैङ्गिक मोह रहेगा , हम सत्य को देख नहीं पाएंगे। इसलिए शंकराचार्यजी कहते हैं , यह स्थूल शरीर ही मोह का आस्पद है। हमलोगों ने उदाहरण से भी समझा था, पुत्र मोह होता है , स्त्री-पुरुष मोह होता है। धन का मोह होता है। नामयश -पद से मोह होता है। और ये मोह काटते नहीं कटता है। (23:18 )

19. राग और प्रेम भिन्न भिन्न हैं। विषयों से आबद्ध होने का परिणाम : फिर एक श्लोक में बहुत बड़ा मुद्दा शंकराचार्यजी उठाते हैं -हम सारे विषयों से आबद्ध कैसे हो जाते हैं ?

अहंममेति प्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः ।

अर्थ:-मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा-इन सात धातुओं से बने हुए तथा चरण, जंघा, वक्षःस्थल (छाती), भुजा, पीठ और मस्तक आदि अंगोपांगों से युक्त, 'मैं और मेरा' रूप से प्रसिद्ध इस मोह के आस्पद रूप देह को विद्वान् लोग 'स्थूल शरीर' कहते हैं। वो क्या चीज है जो हमें संसार के सारे विषयों से बाँध देती है ? हम सब के लिए बहुत बड़ी challenging समस्या , युवाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौतीपूर्ण समस्या यह राग या आसक्ति ही है । शंकराचार्यजी कहते हैं राग वह अत्यंत मजबूत किन्तु एक अदृश्य रस्सी है, जिसको काटना बड़ा कठिन है। इस राग रूपी रस्सी के द्वारा हर मनुष्य दूसरे बुलबुला से बँधा हुआ है। दूसरे वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ बंधा हुआ है। यही हर मनुष्य की परिस्थिति है , वस्तुस्थिति है। है कि नहीं ? व्यावहारिक स्तर पर यही हमारी वस्तु स्थिति है , हम सभी दूसरे वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ हमलोग इस राग-द्वेष रूपी अदृश्य रस्सी से बँधे हुए हैं। इसीको राग attachment आसक्ति या ममता से बंधे हुए हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस राग को ही सारी दुनिया प्रेम समझती है। इस attachment को ही सभी लोग Love समझते हैं।  attachment और Love दोनों बिल्कुल भिन्न-भिन्न चीजें हैं। हमारे दैनंदिन जीवन में इस अन्तर को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। अपने परिवार के ही प्रति, भाई, पत्नी , बच्चों के प्रति आपको विचार करना पड़ेगा कि ये आसक्ति या प्रेम है ? जाँच करके देखो। attachment होगा तो उसका परिणाम सिर्फ पीड़ा ,बंधन और दुःख ही होगा। प्रेम इससे भिन्न चीज है। attachment वह है जो सिर्फ अपना पराया के आधार पर दो -चार लोगों के साथ ही होता है। आपकी भावनाएं , आपके Concerns या सहानुभूति सिर्फ दो चार लोगों के साथ रहेंगी। दूसरे प्रति आप लापरवाह रहते हैं। ये आसक्ति है। प्रेम कैसा होता है ? वो अनंत है , सीमा हीन है , उसके लिए सब समान हैं , वह लगाव सिर्फ दो चार अपने लोगों के प्रति नहीं होता। उसके लिए सभी समान हैं। उसकी सहानुभूति सबके लिए समान होती है। प्रेम कभी भी शरीर केंद्रित नहीं हो सकता।  प्रेम का आधार लैङ्गिक नहीं हो सकता। लैङ्गिक आकर्षण प्रेम नहीं है।  लैङ्गिक आकर्षण सिर्फ मोह है , अंधापन है। attachment है राग है ! प्रेम का लैङ्गिक आकर्षण के साथ कुछ लेना-देना है ही नहीं। शरीर के साथ कुछ लेना देना नहीं है।  न रक्त के संबंध और सम्बन्धियों से कुछ लेना देना है। Love has got nothing to do with blood relation . प्रेम का रक्त सम्बन्धियों से कोई सम्बन्ध नहीं हैThe real person who has got Love , you can take the example of Swami Vivekananda .

     20.प्रेम आपको मुक्त करेगा , प्रेम कभी भी कड़वा नहीं होता:   स्वामी जी का जीवन राग और प्रेम के अंतर का आदर्श उदाहरण है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देखना हो, जिसके ह्रदय में सच्चा प्रेम है, तो आप स्वामी विवेकानंद का उदाहरण ले सकते हैं। क्या उनका प्रेम सिर्फ रक्त के सम्बन्धियों के लिए था ? सबों के प्रति समान प्रेम था। क्या उनका प्रेम लैङ्गिक आकर्षण पर आधारित था? उनका प्रेम शरीर के विचार पर आधारित नहीं था। प्रेम की उत्पत्ति कहाँ से होती है ? ईश्वर दृष्टि से होती है। राग की उत्पत्ति कहाँ से होती है ? देहदृष्टि से होती हैआपके दैनंदिन जीवन में ये पॉइंट बहुत ही स्पष्ट होनी चाहिए। क्योंकि अपने घर-परिवार -समाज में आपको इसी प्रेम /राग के अंतर को समझकर उसे व्यवहार में लाना होगा। हम किस दृष्टि से दूसरे व्यक्ति के साथ आकृष्ट हो रहे हैं ? हर समय इस विवेक-दृष्टि को जाग्रत रखना होगा। अगर आपकी दृष्टि देह-केन्द्रित होगी तो उसमें से राग ही उत्पन्न होगा। और अगर आपकी दृष्टि ईश्वर केंद्रित होगी तो उससे प्रेम उत्पन्न होगा। प्रेम आपको मुक्त करेगा : प्रेम कभी भी कड़वा नहीं होता ! (27:50) राग शुरुआत में मीठा लगेगा , लेकिन आगे चलकर वो कड़वाहट में बदल जायेगा। 

21.इंद्रिय-वस्तुओं से आसक्ति कितनी विषैली है ? (How toxic is attachment to Sense-objects ? ) जिन विषयों में हम राग के द्वारा बँध जाते हैं, वे विषय कितने विषाक्त हैं?

शब्दादिभिः पञ्चभिरेव पंच पञ्चत्वमापुः स्वगुणेन बद्धाः ।

कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन-भृङ्गा नरः पञ्चभिरञ्चितः किम् ॥ ७८ ॥

अर्थ:-अपने-अपने स्वभाव के अनुसार शब्दादि पाँच विषयों में से केवल एक-एक से बँधे हुए हरिण, हाथी, पतंग, मछली और भौर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, फिर इन पाँचों से जकड़ा हुआ मनुष्य कैसे बच सकता है?

दोषेण तीव्रो विषयः कृष्णसर्पविषादपि। 

विषं निहन्ति भोक्तारं द्रष्टारं चक्षुषाप्ययम् ॥ ७९ ॥

अर्थ:-दोष में विषय काले सर्प के विष से भी अधिक तीव्र है, क्योंकि विष तो खाने वाले को ही मारता है, परन्तु विषय तो आँख से देखने वाले को भी नहीं छोड़ते। उसके विष की तुलना काले नाग के विष के साथ की गयी है -इस महत्वपूर्ण चेतावनी को हमेशा याद रखना है ! लेकिन काले नाग का विष से आपकी मृत्यु तब होगी , जब कोबरा आपको काटे और उसका विष आपके रक्त में संचारित हो , तभी मृत्यु होगी। कोबरा नाग को देखने मात्र से कोई आदमी नहीं मरता। शंकराचार्य जी कहते हैं , जितने विषय हमको इन्द्रियों से दिखाई देते हैं , वे काले नाग के विष से भी अधिक विषाक्त हैं। ये हमें दूर से ही मार देते हैं। (29:29तो यह विवेक-प्रयोग हमें अपने दैनंदिन जीवन में हर समय करना होगा -नहीं तो पानी पिलाने वाली M/F को देह-दृष्टि से दूर से देखकर ही ज्ञानी -भक्त देवर्षि नारद जी 12 वर्ष तक माया में फँसे रहे थे। तोयहाँ भी  यह प्रश्न उठता है न, हम यहाँ निर्जन में 6 दिनों तक जिस विवेक-वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय का अभ्यास कर रहे हैं , यहाँ से वापस लौटकर कैसे जीवन जियेंगे ?  तो इसी उदाहरण से अब हर चीज को विवेक पूर्वक अपने आचरण में उतारेंगे। विशेष कर ये अनात्मा -आत्मा में विवेक-दृष्टि अगर साफ होगी तो आप , बीच-बाजार में रहकर भी कभी किसी बुलबुलों से चिपकोगे नहीं। कोई भी चीज कामनी-कांचन , या नाम-यश और पद आपपर प्रभाव नहीं डाल सकेंगे। यही मुक्ति है। 

22.The art of living : ईश्वर दृष्टि जगत को देखकर व्यवहार करना नहीं तो हम, कामिनी -कांचन में नाम पद में, या विपरीत लिंग के आकर्षण को प्रेम समझकर उससे आसक्त हो जाते हैं, प्रभावित हो जाते हैं (30:00) हमारे मन का अपहरण हो जाता है। फिर कैसे आप मन को एकाग्र रखकर ध्यान कर पाओगे ? पढाई कैसे कर पाओगे ? आप संसार के चल-धमक और चकाचौंध के मध्य रहकर भी मन को विचलती नहीं होने दे सकते हो। मन किसी के रूप-सौंदर्य को देखकर आकर्षित -मोहित से रोकना बहुत बड़ी चुनौती है। कभी निकट जाकर चिपकना मत तभी अविचलित रह सकते हो। मन को किसी भी राग की वस्तु से प्रभावित नहीं होने देना। मन रूप-धन-यश  से आकृष्ट नहीं हो रहा है, प्रलोभित नहीं हो रहा है। यह तभी सम्भव होगा जब ब्रह्म सत्य-जगत मिथ्या विवेक हमेशा  जाग्रत रहेगा। सभी के साथ, घर के निकटतम सगे -सम्बन्धियों के साथ भी  देह-दृष्टि नहीं इसी ईश्वर-दृष्टि रखकर विवेक-जाग्रत दृष्टि से व्यवहार -आचरण करना प्रैक्टिकल लाइफ है , जीने की यही कला है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए आप दैनंदिन जीवन को कैसे जिओगे ? उसका यह सही जीवन का Road-map है इसको आप जीवन के हर व्यवहार में अपनाकर के देखियेमाँ सारदा देवी की कृपा से किसी को पराया दृष्टि से नहीं देखकर जिव -जगत को ईश्वर-दृष्टि से देखते हुए व्यवहार करने की आदत जब प्रवृति बन जाती है , तब किसी भी निकट सम्बन्धी के प्रति राग -द्वेष कभी मन का अपहरण नहीं कर सकेगा। नामरूप वाला स्थूल -जगत तो सम्मोहक वस्तु है ही , लेकिन जगत को माँ काली की दृष्टि से देखने पर, हमारी इन्द्रियों को उत्तेजित करने वाले कोई  आर्केस्ट्रा , थियेटर आपके मन को प्रभावित नहीं कर सकेगा। हमारे मन और इन्द्रियों को उत्तेजित करने वाले सारी चीजों के बीच रहते हुए भी, ईश्वर-दृष्टि लाभ रूपी हम अपना उद्देश्य प्राप्त कर सकते हैं। तीनों ऐषणाओं से निर्लिप्त कैसे रहोगे ? विवेक के द्वारा हर जीव में ईश्वर-लाभ या माँ काली-दृष्टि लाभ से आप जीवनमुक्त होकर रहोगे। जब आपको आसक्ति और प्रेम का अंतर पता रहेगा, जब आपको यह याद रहेगा , कि विषय कितने घातक हैं , और कैसे हम इसमें बंध जाते है ? यह विवेक जाग्रत रहेगा तो जीवन अच्छी तरह जी सकोगे। इस प्रकार स्थूल -शरीर का विवरण वहाँ हो गया। (31:48

23. सूक्ष्म शरीर क्या है ? सूक्ष्म शरीर आठ चीजों से बनी हुई है।  

वागादिपञ्च श्रवणादिपञ्च प्राणादिपञ्चाश्रमुखानि पञ्च ।

बुद्ध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः ॥ ९८ ॥

अर्थ:-वागादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणादि पाँच प्राण, आकाशादि पाँच भूत, बुद्धि आदि अन्तःकरण-चतुष्टय, अविद्या तथा काम और कर्म यह पुर्यष्टक अथवा- सूक्ष्म शरीर कहलाता है। 

8 चीजें क्या हैं ? ज्ञानइन्द्रिय, कर्मइन्द्रिय, प्राण, आकाश आदि पंचभूत तन्मात्रा,और पांचवा है अन्तःकरण चतुष्टय। इसके अतिरिक्त अविद्या, काम और कर्मये तीन भी सूक्ष्म शरीर का अंग माने गए हैं। अविद्या जीव को उसकी वास्तविक आत्मस्वरूप से दूर रखती है। काम जीव को इन्द्रियों और विषयों की ओर खींचता है और कर्म उस कामना की पूर्ति के लिए कार्य करवाता है। यही कारण है कि जीव संसार में बंधा रहता है और पुनः–पुनः जन्म लेता है। 

स्थूल शरीर जो बाहर दिखाई देता है , उसके पीछे और उसके भीतर और एक शरीर है जिसको सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। यह स्थूल शरीर सिर्फ इसका बाहर से एक मशीन है। स्थूल शरीर का पूरा संचालन सूक्ष्म शरीर से हो रहा है। सूक्ष्म शरीर के बगैर यह स्थूल शरीर कुछ नहीं कर सकता। और वह सूक्ष्म शरीर भी बुलबुला ही है -अनित्य है। वहाँ भी सबकुछ बदल रहा है। प्रति क्षण अन्यथा स्वभाव है। ये सूक्ष्म शरीर भी अनित्य है नश्वर है। (32:57)

24. सूक्ष्म शरीर के भीतर कारण शरीर: अब इस सूक्ष्म शरीर को भी संचालित करने वाली शक्ति का नाम क्या है ? सूक्ष्म शरीर के भी भीतर और पीछे एक कारण शरीर है।जो शक्ति सूक्ष्म और स्थूल दोनों शरीरों को संचालित कर रही है। वह शक्ति सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को भी संचालित कर रही है। इसीलिए उसको हम कारण शरीर (माया?) कहते हैं। जैसे ही हम कारण शरीर में प्रवेश कर जाते हैं , हम सृष्टि (-स्थिति -प्रलय) के मूल में ही पहुँच जाते हैं। तो आपका स्थूल शरीर संचालित हो रहा है , सूक्ष्म शरीर से, और सूक्ष्म शरीर किससे संचालित हो रहा है ? कारण शरीर से। 

25. और कारण शरीर क्या है(33:32) प्रभु परमेश्वर है , परमेश शक्ति है। तो सबको संचालित करने वाला है कौन ? हमको लगता है कि हम कुछ कर पायेंगे क्या ? ईश्वर की उपस्थिति के बगैर यहाँ एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। इस पूरे सृष्टि के मूल में वह परमेश शक्ति है। वह माया शक्ति है। विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ में हम वहाँ माया का विवरण देखते हैं। दो श्लोकों में माया अतुलनीय विवरण भगवान शंकराचार्य जी हमें बताते हैं कि यह जगत क्या है ? माया ! माया क्या है ? जगत ! जगत क्या है ? माया ! माया क्या है ? जगत ! और माया (माँ सारदा है !) परमेशशक्ति है, परमात्मा की (अवतार वरिष्ठ की) अपनी ही शक्ति  [जो राम अवतार में माँ सीता बनी थी। कृष्ण अवतार में राधा बनी थी !]     

अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति-रनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा।

कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते ॥ ११० ॥

अर्थ:-जो अव्यक्त नाम वाली त्रिगुणात्मिका अनादि अविद्या परमेश्वर की परा शक्ति है (श्रीश्री माँ सारदा) , वही माया (जगतजननी-ज्ञानदायिनी) है; जिससे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है। बुद्धिमान् जन इसके कार्य से ही इसका अनुमान करते हैं।

सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो। नो

साङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो  महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा ॥ १११ ॥

अर्थ:- वह न सत् है, न असत् है और न [ सदसत् ] उभयरूप है; न भिन्न है, न अभिन्न है और न [ भिन्नाभिन्न] उभयरूप है; न अंगसहित है, न अंगरहित है और न [ सांगानंग] उभयात्मिका ही है; किन्तु अत्यन्त अद्भुत और अनिर्वचनीय रूपा (जो कही न जा सके ऐसी) है

        हमने देखा था इस माया की जो वस्तुस्थिति होगी , वही इस जीव -जगत (pda-gp-rnn-dp) की वस्तुस्थिति भी होगी। क्योंकि जगत और माया एक ही हैं ! (34:26) तो इसकी वस्तुस्थिति क्या है ? हम इस माया के बारे में इतना ही कह सकते हैं - " महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं !" और कुछ नहीं कह सकते। इस जगत के बारे में भी हम इतना ही कह सकते हैं - " महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं !" क्योंकि ये  (pda-gp-rnn-dp) है , ऐसा  हम नहीं कह सकते। यह  (pda-gp-rnn-dp) नहीं है , हम ऐसा भी नहीं कह सकते। ये माया क्या ब्रह्म से भिन्न है ? हम ऐसा नहीं कह सकते। तो क्या ये माया ब्रह्म से अभिन्न है ? ऐसा भी नहीं कह सकते। हम इसको सिर्फ  " महा अद्भुतं अनिर्वचनीयं !" ही कह सकते हैं। ईश्वर की अपनी ही शक्ति इस रूप में प्रकट हो रही है , ईश्वर स्वयं इतने रूपों में प्रकट हो रहे हैं। क्या कहोगे ? यहाँ पर वह काली -उसका नृत्य चल रहा है। सृष्टि-स्थिति-प्रलय रूपी उस परमेश शक्ति काली का नृत्य अनादि -अनंत काल से चल रहा है देखिये चारों ओर क्या चल रहा है ? बुलबुले बन रहे हैं , टूट रहे हैं। सृष्टि-स्थिति -प्रलय रूपी उस परमेश शक्ति काली का नृत्य चल रहा है। 

  26. काली -शिव को ढँकती भी है दिखाती भी है !  तो हमने देखा शिव और काली ब्रह्म और शक्ति का अत्यंत सुन्दर प्रतीक है ! कैसे ? ये काली सत्य को ढँक रही है ! जब तक ये माया हटती नहीं है , तब तक शिव (अविनाशी आत्मा) का ज्ञान किसी को होना सम्भव नहीं है। (सत्य और शक्ति) तो माया अज्ञान का एक ऐसा पर्दा है , जिसके कारण सत्य (अविनाशी आत्मा) क्या है, इसको हम जान नहीं पाते हैं। लेकिन ये माया शक्ति ऐसी है , जो सत्य को ढँकती भी है और सत्य को दिखाती भी है। और वह जब सत्य को दिखाती है - शिवोहं का अनुभव करा देती है , तो उसीको हमलोग ईश्वर का अनुग्रह कहते हैं। तो यदि अनात्मा और आत्मा के विषय में यदि थोड़ी सी भी स्पष्टता आयी है ,तो यह वही परमेश शक्ति माँ काली करवा रही है , यह उन्हीं का अनुग्रह है। 

27. वेदान्त की परिणति भक्ति में : (36:30) वेदान्त सिद्धान्त बाद में परम् भक्ति में परिणत हो जाते है। अब हमारा दृष्टिकोण अब क्या होता है ? अगर हम जीव को खोजने जाते हैं -(स्त्री-पुरुष शरीर के भीतर और पीछे बैठे जीव को खोजने जाते हैं) तो जीव अदृश्य हो जाता है, और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। और जगत को खोजने जाओ , तो जगत अदृश्य हो जाता है, ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। घड़े को खोजने जाओ तो मिट्टी मिल जाती है ! अंगूठी, कंगन, बाली का अगर विश्लेषण करने जाओ , तो नामरूप खो गया स्वर्ण प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार सतह पर बैठकर जीव -जगत,जीव -जगत,जीव -जगत, करते हैं उसको खोजो तो इसके मूल में ईश्वर ही है। ईश्वर ही जिव जगत के रूप में दिख रहा है। यहाँ पर ईश्वर ही है। एक ब्रह्म से अतिरिक्त यहाँ पर कुछ भी नहीं है। तो जो भी हम देख रहे हैं , सब उसी ब्रह्म का ही रूप है। ईश्वर का ही रूप है। यही वेदान्त है ! यही सब उपनिषदों का अंतिम निर्णय है। इन्द्रियों के द्वारा भी हम जो कुछ देख रहे हैं , यह सब क्या है ? ईश्वर के ही विभिन्न रूप हैं। आत्मानुभूति के बाद, या अपरोक्ष ज्ञान के बाद अब हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल जाता है , या नहीं ? एक -दूसरे को देखने के प्रति पहले जो दृष्टि थी , उसमें आमूल परिवर्तन हो जाता है। पहले हम स्त्री-पुरुष, स्त्री-पुरुष, स्त्री-पुरुष, ऐसा भेद करके देखते थे। अब उसी दृष्टि ईश्वर के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं। सम दृष्टि आती है कि नहीं ? कोई बड़ा -छोटा, सुंदर-असुंदर इन चीजों का कोई अर्थ ही नहीं रहता। सम दृष्टि आ जाती है , सब में आप ईश्वर देखते हो। इस दृष्टि से आप जो भी करोगे , वो सब ईश्वर की पूजा बन जाती है। आप क्या किसी की मदत कर सकते हो ? हम क्या किसी की मदत कर सकते हैं ? हम सिर्फ पूजा कर सकते हैं। आप यदि अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा कर रहे हो , तो आप कुछ अहसान नहीं कर रहे हो , उस वृद्ध व्यक्ति के ऊपर। वो तो ईश्वर का रूप है -आप ईश्वर की पूजा कर रहे हो। इसी दृष्टिकोण से आप अपने सारे रिश्ते-नातों को देख लीजिये ? ऐसे देखने से जीवन धन्य हो जाता है। पति पत्नी के लिए जो करता है , या पत्नी पति के लिए जो करता है , भाई -भाई के लिए जो करता है ? माता-पिता बच्चों के लिए जो करते हैं , पति, पत्नी बच्चे सब ईश्वर का रूप हैं। आप जो भी कर रहे हो -वो सब पूजा में परिणत हो जाता है। यही जीवन आदर्श गृहस्थ जीवन बन जाता है। दृष्टि बदलने से कर्म पूजा हो जाता है। आपका आचरण भी बदल जायेगा, एक दूसरे के प्रति कितना सम्मान का भाव पूजनीय भाव आ जाती है। अब आप किसी को छोटा करके नहीं देख पाओगे। सबके भीतर ईश्वर को देखने से सबके प्रति एक पूजनीय भाव आएगा। ईश्वर ही इतने विभिन्न रूपों में हमारे सामने खड़े हैं। 

28. आत्मा- अनात्मा का परोक्ष ज्ञान:  जान लेने के बाद बाकी के तीन प्रश्नों का उत्तर भी जान लिया। बंधन क्या है ? कथमेष आगतः,कथं प्रतिष्ठास्य, कथं विमोक्षः । आदि प्रश्नों का उत्तर भी देख लिया। गुरु उस शिष्य को सब उपदेश देने के बाद कहते हैं -अब तू जा ध्यान कर ! अभी तो सिर्फ ये परोक्ष ज्ञान हुआ है। तुमने तो अभी तक सिर्फ बुद्धि से समझा है। केवल बुद्धि से समझना से शिक्षा खत्म नहीं हुई है। जा अब साधना कर और वेदान्त सिद्धान्तों का साक्षात् अनुभव करना है। इसको अपरोक्ष अनुभूति में परिणत करना है। इसके लिए जा साधन कर। और वो शिष्य दीर्घकाल तक साधना करता है। और जो हमने सुना कि सब कुछ ईश्वर है - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है , एक ही अनेक बन गया है। उसको जब इसकी अपरोक्ष अनुभूति हो जाती है। और अपरोक्ष अनुभूति हो जाने के पश्चात् दुबारा गुरु के पास आता है। और इस बार जब गुरु के पास आता है, तो स्वयं कहता है। उसकी अनुभूति कितनी सुंदर हैं -

क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत् । 

अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ (484)  

आत्मा के ब्रह्मानन्द में लीन होने पर जगत संसार विलुप्त हो जाता है। ऐसा लगता है कि अचानक दुनिया कहाँ गायब हो गई अभी तो यही थी बड़ा ही अद्भुत नजारा है। 

   शब्द बड़े सुंदर हैं। कोई चीज सामने है। (40:57) अभी नहीं है ? अभी तक मैं देख रहा था। अभी नहीं है ? कहाँ गया ? किसके द्वारा हटाया गया ? और कहाँ लीन हो गया ? थोड़ी देर पहले तक तो मैं जीव-जगत , जीव-जगत , जीव-जगत ,कर रहा था , अब देख रहा हूँ। जीव भी नहीं है जगत भी नहीं है ? एक ईश्वर ही है , क्या अद्भुत नजारा है ? क्या आश्चर्य है ? क्या आश्चर्य है ? हम सबों को भी ठीक यही अनुभूति होने वाली है ! ये शिष्य कोई अलग प्राणी नहीं है। ये सबके लिए है। कभी न कहि हमारी अनुभूति भी ठीक यही होने वाली है। 

      साधन चतुष्टय मार्ग से हम जब आगे बढ़ेंगे तो ये अपरोक्ष अनुभूति हर किसी को एक दिन होने वाली है। लेकिन शर्त है आपको गुरु-शिष्य परम्परा के निर्देशों का पालन करना होगा। जो करणीय है उसको नहीं करोगे , तो इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं करोगे। उस प्रकार का जीवन जीना होगा। इस प्रकार वो शिष्य लक्ष्य तक पहुँच जाता है। और वह खुद कहता है -मैं धन्य हूँ मैं कृतकृत्य हूँ ! मैं इस संसार के बंधन से मुक्त हो गया हूँ ! कैसे मुक्त हुआ ? तो आपके अनुग्रह से ! शास्त्र के अनुग्रह से। जिस शिष्य ने सत्य का अनुभव किया है , ऐसा जो व्यक्ति है जो आत्मज्ञानी है , जिसने सत्य को जान लिया है , जिसने मैं कौन हूँ ? के मैं के अर्थ का निर्धारण कर लिया है ; मतलब क्या ? मैं नहीं हूँ ! ईश्वर ही है। यह अंतिम बात ! (43:00)

29. सन्तोष धन : गोविन्द का है -उसको मेरा कहना ही भाव के घर में चोरी है  जिस व्यक्ति ने इस प्रकार जान लिया है कि घर-परिवार, धनदौलत सब गोविन्द का है -मेरा नहीं है , अब वो व्यक्ति कैसा होगा ? आप उस व्यक्ति की कल्पना रमण महर्षि , रामकृष्ण परमहंस देव हों , ऐसे किसी महापुरुष के चित्र को आप सामने रखकर देखिये। उसकी वर्णना कितनी सुंदर है।    

निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ।

नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानो,ऽप्यसमः समदर्शनः ॥ ५४३ ॥ 

543. Though without riches, yet ever content; though helpless, yet very powerful, though not enjoying the sense-objects, yet eternally satisfied; though without an exemplar, yet looking upon all with an eye of equality.

Notes: Powerful: The Atman is his wealth, power, and everything.

     लंगोटधारी रमण महर्षि के चित्र को देख लीजिये। उनके कितने बैंक एकाऊंट्स होंगे ? बैंक बैलेंस कितना है ? हमारे तो कई बैंको में अकाउंट रहता है। हम गृहस्थ हैं , हमें अपने बैंक अकाउंट्स बंद करने की जरूरत नहीं है। उस अकॉउन्ट को रहने दीजिये सिर्फ उसमें आसक्ति -राग नहीं होना चाहिए। उसके प्रति मैं और मेरा बुद्धि नहीं रहनी चाहिए। जो है वो प्रारब्ध से आ रहा है। उस आत्मज्ञानी व्यक्ति का वर्णन इस प्रकार है। उसके पास कुछ भी नहीं है , एकदम निर्धन हैं। धन माने लौकिक जमीन -जायदाद उसके पास कुछ भी नहीं है; लेकिन सदा तृप्त है !-निर्धनोऽपि सदा तुष्टः/ यह वेदान्ती हर समय सन्तुष्ट है। सन्तुष्टि के साथ धन का कुछ लेना देना है क्या? इसको इसी समय निर्धारित कर लेना चाहिए। हमारे पास इतना धन होते हुए भी कोई सन्तुष्ट है क्या ? हम तो धनी होकरके भी सदा असंतुष्ट हैं। किसी भी धनी व्यक्ति को नजदीक से देखिये उसकी तुष्टि हो गयी है ? वो तो धन के प्रति उसका लोभ और बढ़ गया है। और और भी अशांत है। और ये व्यक्ति उसके पास - कामिनी, कंचन , पदनाम यश कुछ भी नहीं है , वो सदा तुष्ट है। सब समय संतुष्ट है। आप रमण महर्षि को देख लीजिये , रामकृष्ण परमहंस को देख लोजिये। लौकिक धन कुछ भी नहीं है। स्वामी विवेकानन्द को लीजिये जेब में एक पैसा नहीं है। लेकिन सदा संतुष्ट ! उनकी संतुष्टि कहाँ से आती है ? ईश्वर से। ईश्वर में (60 तो 100 % निःस्वार्थपरता ?) में   प्रतिष्ठित होने पर , आप पूर्ण हो जाते हो। 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

                                              -वृहदारण्यक उपनिषद    

हम सब स्वभावतः पूर्ण ही हैं। लेकिन अज्ञान के कारण (अविद्या -देहबुद्धि से ?) हमको लग रहा है कि हम अपूर्ण हैं। तो जब अपरोक्ष ज्ञान होगा , तो क्या ज्ञान होगा ? ईश्वर ही है। जब आत्मज्ञान होगा तो परम् संतुष्ट हो जायेंगे। वह सन्तुष्टि लौकिक धन केंद्रित नहीं होता है। एक प्रसिद्द भजन है -पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु ।

कृपा कर अपनायो ॥

जन्म जन्म की पूंजी पाई ।

जग में सबी खुमायो ॥

खर्च ना खूटे, चोर ना लूटे।

दिन दिन बढ़त सवायो॥

सत की नाव खेवटिया सतगुरु।

भवसागर तरवयो॥

मीरा के प्रभु गिरिधर नगर।

हर्ष हर्ष जस गायो॥

राम रतन धन ही असली धन है। वो धन मीरा जी को कहाँ से मिला ? गुरु की कृपा से , शास्त्र की कृपा से। शास्त्र की कृपा से गुरु की कृपा से ये धन मिलता है। और ये धन जिसके पास है , वही सच्चा धनी व्यक्ति है। सांसारिक धन व्यक्ति को और भी असंतुष्ट बना देती है। देखिये वर्णाश्रम धर्म के अनुसार गृहस्थ को धन उपार्जन करना है। लेकिन सीखना ये है कि, यह मत समझिये कि धन आपको सन्तुष्ट बना देगा। Don't think that money is going to make you happy ! आपको गृहस्थ आश्रम में धन का उपार्जन करना है , पर अपने को उसका मालिक नहीं समझना है , trusty समझो। धन समस्या नहीं है , समस्या राग का है। गृहस्थों के पास लौकिक धन पर्याप्त होना चाहिए। आप  गरीब क्यों रहोगे ? गरीबी तो अभिशाप है। You should have sufficient wealth. Earn sufficiently! Lead a decent and dignified life. आपके पास पर्याप्त धन होना चाहिए। पर्याप्त कमाएँ! एक सभ्य और सम्मानजनक जीवन जिएँ। किन्तु धन सम्पत्ति में राग Attachment नहीं होना चाहिए। और आपके पास जो भी संसाधन हैं, उसे दूसरों के कल्याण के लिए सदुपयोग करने के लिए तत्परता चाहिए। विश्व ब्रह्माण्ड की समस्या का समाधान करने वाले हम कौन हैं ? लेकिन कोई मुश्किल में पड़ा व्यक्ति आपके पास आता है, तो उसकी सेवा करने लिए तैयार रहना चाहिए। हमारे पास जो अधिक है उसे देने में संकोच नहीं करना चाहिए। मेरा धन है -ऐसा नहीं सोचकर ये तो भगवान का धन है , ऐसा सोचना चाहिए। हमारे देश ऐसी प्रथा रही है कि -जो भी अवतार वरिष्ठ के भक्त हैं , वे कुलदेवता या , वे कुलदेवी को ही घर का मालिक समझते हैं। हम सिर्फ इस घर के caretaker हैं -दरवान हैं। वो देवी जीवंत है। उस घर का सारा कार्यक्रम कुलदेवी के सलाह से ही होता है। यदि घर के दरवान को कुछ खरीदना होगा तो कुलदेवी की कृपा से होगा। उनसे सम्मति लेंगे , प्रार्थना करेंगे। जो भी घर में आएगा वो गोविन्द के लिए ही आएगा। घर का रसोई घर भी कुलदेवी का है। भोजन गोविन्द के लिए बन रहा है , हम सिर्फ प्रसाद खा रहे हैं। घर में नया मेम्बर आता है - तो गोविन्द का है। मैं मेरा बेटा का दृष्टिकोण नहीं रहना चाहिए। आपका बेटा कहाँ से हुआ ? (51:11) आपने उसकी हड्डी बनाई ? अपने उसका रक्त बनाया ? हड्डी -रक्त जो भी है ये किसका है ? मूल में कौन है ? स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - जब आप कह रहे हो ये मेरा बेटा है , तब आप झूठ बोल रहे हो। किसी और के समान को अगर मैं कहूं कि ये मेरा है , तो फिर ये चोरी हो गया। हमलोग सतत ये चोरी कर थे हैं। जब हम मेरा मकान , दुकान , बिजनेस, कहते हैं, तो हम चोरी कर रहे हैं। सबकुछ ईश्वर का यह जानकर भी आप कहते हैं ये मेरा है। यहाँ पर कोई भी ऐसा चीज है जो ईश्वर का नहीं है ? उसको जो मेरा कहेगा -वो कभी संतुष्ट नहीं होगा। घर-परिवार सब तेरा मैं सिर्फ उसका देखभाल करने वाला हूँ। तू जगन्नाथ है ! पूरे परिवार का मालिक है। इस प्रकार एक आदर्श जीवन जिया जाता है। जहाँ पर किसी भी चीज के लिए 'मैं' और 'मेरा' का भाव नहीं सब गोविन्द का है - अर्थात इन्द्रियातीत सत्य -ईश्वर का है ! नवनी दा का परिवार 300 साल तक ऐसा ही था !कुछ परिवार आज भी है। श्री नवनीहरण मुखोपध्याय के पितामह श्री श्रीषचन्द्र मुखोपाध्याय की तंत्र गुरु उनकी माता जी थीं, नवनी दा के पितामह आशुतोष मुखोपाध्य को दीक्षा के लिए तैयार थे।  जो काशीपुर निवासी श्री महिमाचरण चक्रवर्ती (श्रीरामकृष्ण वचनामृत/श्री श्री रामकृष्ण महिमा : अक्षय कुमार सेन :/mahamandal blog  शनिवार, 7 जुलाई 2018) की कन्या थीं। स्वामी विवेकानन्द ने उनको गुड़िया दी थी।)] अर्थात उनका पूरा परिवार  गोविन्द  केंद्रित चलता है , वे सिर्फ caretaker ' देखभाल करने वाले हैं । धन को गोविन्द का धन समझकर धन को आने दो। तुम जगन्नाथ के दास हो सिर्फ caretaker हो। धन समस्या नहीं है , उसके प्रति जो मेरा भाव है -वही भाव के घर में चोरी है। (52:56) धन मेरा कहाँ से हुआ? वो धन गोविन्द का है , और गोविन्द के काम (भारत माता काम)  के लिए खर्च करना है। अर्जित धन को भारत माता के कल्याण के लिए लगाना है। तो ऐसा जो महापुरुष है श्रीरामकृष्ण परमहंस की तरह, या रमण महर्षि की तरह , का जो व्यक्ति है -इनके पास कोई भी लौकिक धन नहीं है , किन्तु सदा संतुष्ट हैं ! ये संतुष्टि क्या अद्भुत है ! कितना अद्भुत है ! रमण महर्षि या स्वामी विवेकानन्द की संतुष्टि विचारणीय है।  

गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।

 जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान ॥६॥ 

(सन्त तुलसी दास )

सभी महापुरुषों की ऐसी अद्भुत संतुष्टि अगर विचारणीय नहीं है तो इन सभी को ऐसी सन्तुष्टि आती कहाँ से है ? कहाँ से आती है ? ईश्वर से गई आती है। लौकिक धन में आसक्ति के साथ इन महापुरुषों का कोई लेनादेना नहीं है। 

30. जो ब्रह्माण्ड को पार कर गया वो महाबली: 

      आप रमण महर्षि को बाहर से देखोगे तो आपको लगेगा कि ये व्यक्ति कितना असहाय है ? असहायो अपि महाबलः - जिसको अपरोक्ष अनुभूति वो महाबली है जो ब्रह्माण्ड को पार कर गया : फिर  क्योंकि उसके पास कोई सामाजिक बल -ऊँचा पद नहीं है। इनके पास न तो धनबल है, न तो बाहुबल है , अकेले रहते हैं। कोई बड़ा राजनितिक दल उनके पीछे नहीं है। असहाय दीखते हैं। लेकिन महाबली हैं। उनसे बढ़कर भी कोई बली है क्या ? वो तो ब्रह्माण्ड को ही पार कर गए हैं ! हम तो ब्रह्माण्ड में फँसे हुए हैं। दुर्बल हैं। हम सब गुलाम है (ऐषणाओं के गुलाम हैं) वो तो राजा है ! (अष्टमी पूजा 30 सितम्बर , 2025 ) रमण महर्षि को बाहर से देखो तो असहाय लगते हैं। लेकिन सच्चाई में राजा है कि नहीं ? रामकृष्ण परमहंस -क्या हैं ? महबली है ! बाहर से देखो तो असहाय लगेगा , लेकिन महाबली है। 

31.विषयभोग नहीं करते पर नित्य तृप्त हैं  फिर क्या ? ये लोग कोई भी विषयभोग नहीं करते। नित्य तृप्तो अपि अभुञ्जानो अपि: -कोई भोग न करके भी सदा नित्य -तृप्त हैं ! और हमलोग सारे विषयभोगों में डूबकर भी सदा अतृप्त हैं। अन्तर देख रहे हैं ? हमलोग सारे इन्द्रियों का भोग करके भी सदा अतृप्त हैं।  ये लोग इन्द्रियों के विषयों का भोग न करके भी सदा तृप्त हैं। क्या अद्भुत है -इसलिए विचारणीय है। कि इन्द्रिय भोगों में कुछ नहीं रखा है। भोगों में डूबे रहना उस कुँए में गिरने के समान है , जिसका तल ही नहीं हो। हमें पहुँचना है ईश्वर में -आत्मलाभ या ईश्वरलाभ में ही सारी समस्यायों का समाधान है। फिर क्या हैं ? 

32. नेता (गुरु) मनुष्य जैसे दीखते हैं पर वे असम-वे असाधारण  हैं : असमः समदर्शनः -महापुरुष लोग बाहर से आपके और मेरे तरह ही दीखते हैं। बाहर से गुरु भी हमारे जैसे दो पैर -दो हाथ के साधारण मनुष्य ही दीखते हैं। लेकिन ये लोग असम हैं-का मतलब चार हाथ नहीं होने पर भी ये अपरोक्ष ज्ञानी -They are extraordinary ! बाहर से देखो तो बहुत ordinary लगता है , हमारी तरह। भूख लगने पर वे भी रसोई में जाकर खाना खाएंगे। बीमार पड़ेंगे तो दवा लेने डॉक्टर के पास जायेंगे। सचपूछो तो ऐसे लोगों को पहचानना मुश्किल है। बाहर से देखकर आप उनको पहचान नहीं सकते हो। बाहर ऐ आपकी -हमारी तरह ही खातेपीते सोते हैं , बीमार पड़ते हैं , दवाई खाते हैं। लेकिन भीतर ईश्वर ज्ञान , ब्रह्मानन्द में डूबे  हुए हैं। नेता (वेदांती) लोग असम हैं -They are not like the common people . बाहर से उनको पहचनना कठिन है। तो इस श्लोक आत्मज्ञानी महापुरुषों की सुंदर वर्णना है। 

भगवान शंकराचार्य जी आध्यात्मिक विज्ञान सर्वश्रेष्ठ गुरु माने जाते हैं , विशेषकर के वे अद्वैत दर्शन के ज्ञानी माने जाते हैं। लेकिन यहाँ देखिये वे क्या कह रहे हैं ? बहुत रोचक बात कहते हैं , हमलोग भगवान शंकरायाचार्यजी को ज्ञानी ही कहते हैं , पर वे क्या कहते हैं > कहते हैं कि इस मोक्ष प्राप्ति में सबसे उत्तम साधन भक्ति है। हमने अभी जो वेदांत चर्चा किया वो परम भक्ति में समाप्त हुई।  अब आप सही अर्थों में भक्त होंगे। भक्त किसे कहेंगे , उस विषय में हमारी समझ अभी बहुत मोटी है। दिया,घंटी , शंख फूंकना प्रारंभिक है , वास्तविक भक्त वो है जो सर्वत्र भगवान को ही देखता है। और वह समझ अद्वैत ज्ञान से ही आता है। अद्वैत ज्ञान और भक्ति एक  ही है। जब आपको यह समझ में आ गया कि -ब्रह्माण्ड पर करके लौटने के बाद जगत ईश्वर से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं , तब क्या होगा ? आप सब समय भक्ति भाव में ही रहोगे। आप भक्त हो जाओगे। 

33. मोक्ष-प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन है सत्य की खोज : और मुक्ति प्राप्ति के लिए वह स्वरुप अनुसन्धान रूपी भक्ति सर्वश्रेष्ठ साधन है। (59:21)  

मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी ।

स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ ३१ ॥ 

-अरे भाई , मोक्ष का जो कारण का जो सामग्री है, उसमें सबसे श्रेष्ठ भक्ति ही है। और भक्ति क्या है ? कर्मकाण्डी अनुष्ठान करके भी भक्ति होती है ,वो प्रारम्भिक अवस्था में ठीक है। अपने वास्तविक स्वरुप का अनुसन्धान करना -हमारा स्वस्वरूप तो ईश्वर है , तो इसका अर्थ हुआ ईश्वर का (परम् सत्य) का अनुसन्धान करना ही 'भक्ति' कहलाता है। आपका स्वरुप क्या है? ईश्वर ही है न ?  स्वस्वरूप अनुनुसन्धानं - माने अपने स्वरुप की खोज

     हमलोगों ने वही खोज किया - सामने जो दीखता है - वो स्थूल शरीर है। स्थूल शरीर के भीतर और पीछे सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म के भीतर कारण शरीर है। यही तो अनुसन्धान है। सत्य का अनुसन्धान , ईश्वर ही सत्य है , स्व-स्वरुप तो ईश्वर ही है। उस ईश्वर का अनुसन्धान करना -यही भक्ति है। बाहर प्रकट रूप की पूजा करना भी ठीक है। वो भी भक्ति है। बाहरी पूजा शुरुआत में ठीक है। वास्तविक भक्ति है अपने स्वरुप की खोज करना। यही ईश्वर की जो खोज है , यह जो सत्य को देखने की जो जिद है , ईश्वर की जो खोज है यही मोक्ष की सर्वश्रेष्ठ सामग्री है। नरेन्द्रनाथ की खोज का प्रश्न -महाशय क्या आपने ईश्वर को देखा है ? हमलोग भी यही खोज कर रहे थे , तो हमलोग भी भक्ति ही कर रहे थे। हमलोग ईश्वर का अनुसन्धान कर रहे थे -तो देखो भक्ति भाव आ गया। जब हृदय के भक्ति का भाव जग गया तो ईश्वर को आप किसी भी रूप में देख सकते हैं। जिसको राम के रूप में देखना हो , राम के रूप में देख लीजिये। कृष्ण के रूप में देखना हो तो कृष्ण के रूप में। शिव , काली -दुर्गा रूप को देख लीजिये। जिसको निराकार ईश्वर देखना हो -निराकार देख लीजिये। ईश्वर निराकार भी है वो साकार भी है(1:01:11)  

34:  ध्यान का मनोभाव -(Attitude in Meditation) 

    अब कुछ ध्यान श्लोक हैं उसको हम पढ़ लेते हैं। Verses on meditation बहुत सुंदर हैं -254 से 264 तक के श्लोक और इसका अर्थ हमलोग यहाँ देख लेते हैं। ये हमलोग प्रतिदिन पाठ कर सकते हैं। हर छंद की अंतिम पंक्ति है - ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ हर समय यह चिंतन करो कि जो कुछ है -ईश्वर ही है !(1:06:10)  

जातिनीतिकुलगोत्रदूरगं

नामरूपगुणदोषवर्जितम् ।

देशकालविषयातिवर्ति यद्

           ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५४ ॥

सब उपदेश देने के बाद गुरुदेव आदेश दे रहे हैं -  जो जाति-पाँति, कुल-वंश से परे है; नाम-रूप, पुण्य-पाप से रहित है; देश, काल और निमत्त से परे है - वही ब्रह्म तू है, इसका मन में ध्यान कर।

जो ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जातियों से परे हैं , ब्राह्मण-क्षत्रिय -वैश्य -शूद्र ये सब तो देह केन्द्रित बातें हैं। स्थूल शरीर या देह को लेकर ही ये सब विभाजन हैं , वर्गीकरण हैं। ईश्वर क्या हैं ? ईश्वर तो उससे परे हैं।  जाति के बाद नीति - जो समाज नीति, राजनीति , आदि नीतियों से भी परे हैं। जो कुल-गोत्र -भी देह केंद्रित है , लेकिन ईश्वर कुल-गोत्र से भी परे हैं। जो नाम-रूप, गुण -दोष, देश-काल, तथा सभी विषयों से भी परे हैं।   ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि-ऐसा जो ब्रह्म -सच्चिदानन्द है , वह तुम ही हो ! अपने मन में ऐसा चिंतन करो !अपने अन्तःकरण में ऐसा ध्यान करो ! कैसा ध्यान करें ? यही कि वह जो ब्रह्म है -वह तुम्हीं हो। मतलब तुम नहीं हो, ब्रह्म ही है -ऐसा ध्यान करो ! तुम ब्रह्म हो का मतलब क्या है ? तुम नहीं हो ; ब्रह्म ही है ! तुम अजय नहीं है - ब्रह्म ही है , ईश्वर ही है। ऐसा ध्यान करो। इन 10 श्लोकों का अंतिम पंक्ति यही है कि तुम अजय नहीं है - ब्रह्म ही है , ईश्वर ही है। ऐसा ध्यान करो की तुम नहीं हो , ईश्वर ही है ! मैं नहीं हूँ ! ईश्वर ही है!  मैं नहीं हूँ ! ईश्वर ही है! मैं नहीं हूँ, ईश्वर ही है! तुम ऐसा ध्यान करो।  

यत्परं सकलवागगोचरं

गोचरं विमलबोधचक्षुषः ।

शुद्धचिद्घनमनादि वस्तु यद्

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५५ ॥

  वह परम ब्रह्म जो समस्त वाणी से परे है, जो सब विषयों से परे है। सकल वाक अगोचरं - वाणी से गोचर होने वाला नहीं है। कहने का मतलब ईश्वर इन्द्रियों का विषय नहीं है। गोचरं विमल बोधचक्षुषः - ये गोचर कैसे होता है ? बोध चक्षु के द्वारा ईश्वर गोचर होता है। चर्म -चक्षु से ईश्वर गोचर नहीं होता है। बोध चक्षु का अर्थ है -विवेक और ज्ञान , दृष्टिं ज्ञानमयी कृत्वा पश्येत ब्रह्ममय जगत ! (1:08:39हमने अभी यही चर्चा किया न ? साधन-चतुष्टय का अभ्यास करते -करते जब हमारे अंदर विवेक जग गया , 10 % भी जग गया ? श्रेय-प्रेय भी समझ गए। सत्य-मिथ्या की समझ न भी हुई , यह समझ गया कि ईश्वर ही जीव और जगत बन गया है। हमारी बोध चक्षु जब बंद थी, हमको समझ में नहीं आ रहा था। शास्त्र और गुरु की कृपा से बोध-चक्षु जब थोड़ी सी खुलने लग गयी ; तो हम यह आकलन कर पा रहे हैं कि ईश्वर ही जगत बन गया है !  

शुद्ध चित्त घनं अनादि वस्तु- ईश्वर शुद्ध, चित्त घन है। चैतन्य घन है -शाश्वत चैतन्य है , और अनादि वस्तु है । ऐसा जो ब्रह्म या ईश्वर चैतन्य घन है , वही है। मैं नहीं हूँ। ऐसा ध्यान कर ! मैं वही ईश्वर हूँ ! मैं ब्रह्म हूँ -कहने का क्या मतलब है ? मैं नहीं हूँ , ब्रह्म ही हैं ! मैं ईश्वर हूँ -अर्थात मैं नहीं हूँ , ईश्वर ही है ! ऐसा ध्यान कर ! ईश्वर से भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है। न तो जीव है न जगत है। जैसा दिख रहा है -वैसा नहीं है , ईश्वर ही है। ऐसा ध्यान कर। 

36. ईश्वर कैसा है :  

षड्भिरूर्मिभिरयोगि योगिहृद्

भावितं न करणैर्विभावितम् ।

बुद्ध्यवेद्यमनवद्यमस्ति यद्

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५६ ॥

ईश्वर छह तरंगों से अतीत है।  षड्भिः उर्मि -उर्मि का अर्थ है तरंग। अस्तित्व की छह तरंगें। वह ब्रह्म या आत्मा 1.भूख, 2.प्यास, 3. शोक (दुःख), 4.मोह (भ्रम) , 5.वार्धक्य, तथा 6. मृत्यु  इन छः तरंगों से अतीत है। हमारे जीवन में ये छह तरंग दिखाई देता है। लेकिन ईश्वर कैसा है इन छः तरंगों से परे है। जिसका चिन्तन योगी लोग अपने ह्रदय में चिंतन करते हैं -जो इन्द्रियातीत है। ईश्वर में ये छह तरंगे नहीं हैं। जो बुद्धि के परे है , ऐसा जो निर्दोष ब्रह्म है , वह तुम्ही हो। ऐसा चिंतन अपने अन्तःकरण में करो। ईश्वर में कोई दोष नहीं है , ऐसा जो निर्दोष ईश्वर है -वही है , मैं नहीं हूँ ! ऐसा तू ध्यान कर।  

37. जगत भ्रान्ति द्वारा कल्पित है :

भ्रान्तिकल्पितजगत्कलाश्रयं

स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम् ।

निष्कलं निरुपमानवद्धि यद्

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५७ ॥      

जो भ्रान्ति द्वारा कल्पित इस जगत का तथा इसके अंशों का आश्रय है। जो स्वयं ही अपना आश्रय है। जो कारण तथा कार्य अर्थात सूक्ष्म तथा स्थूल से भिन्न है। अवयव रहित अर्थात अखण्ड है। जिसकी कोई उपमा नहीं हो सकती। ऐसा जो ईश्वर ब्रह्म है , वह तुम ही हो। ऐसा अपने अन्तःकरण में ध्यान कर।  (1:12:56) जगत तो भ्रान्ति द्वारा ही कल्पित है। जगत कहाँ है ? हम भ्रान्ति में ही जगत को देखते हैं। जब भ्रान्ति चली जाती है , तब देखते हैं कि ये तो ईश्वर ही है। ईश्वर (अवतार-वरिष्ठ) कैसे हैं ? ईश्वर स्वाश्रयं - उनका कोई आश्रय नहीं है ! लेकिन जगत भ्रान्ति कल्पित है। जगत अज्ञान पर खड़ी है। माया पर खड़ी है। वो सत् असत् विलक्षणं 'स्थूल और सूक्ष्म शरीर के भी परे है। ऐसा जो ईश्वर है वही है, तू नहीं है। 

38. ईश्वर छः तरंगों से अतीत है

जन्मवृद्धिपरिणत्यपक्षय

व्याधिनाशनविहीनमव्ययम् ।

विश्वसृष्ट्यवविघातकारणं

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५८ ॥  

उनका न तो जन्म है , न वृद्धि है , न व्याधि है, न तो नाश होता है। क्योंकि ये सब देह केंद्रित है।   घड़ा टूट सकता है , खराब हो सकता है , परिवर्तन घड़े का है। मिट्टी को क्या होना है ? तरंगे शरीर में है -ईश्वर में नहीं है।  ईश्वर ही विश्व के सृष्टि अविघात कारणं -जो इस जगत की सृष्टि, स्थिति और विनाश का कारण है। वही ईश्वर ,महामाया, ब्रह्म अपने माया शक्ति के द्वारा सृष्टि-स्थिति और विनाश कर रहे हैं। सब उसी परमेश शक्ति का ही खेल चल रहा है। ऐसा जो ईश्वर है -वही है , तू नहीं है। ऐसा ध्यान कर। (1:15:27)

39. ईश्वर में अपना -पराया भेद नहीं है

अस्तभेदमनपास्तलक्षणं

निस्तरङ्गजलराशिनिश्चलम् ।

नित्यमुक्तमविभक्तमूर्ति यद्

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५९ ॥

ईश्वर में सारे भेद अस्त हो जाते हैं। स्तर-पुरुष, सुंदर -असुंदर जो सतह पर भेद करते हैं। ईश्वर दृष्टि आ गयी तो भेद समाप्त हो जाता है। अब हम सब में ईश्वर को देख रहे हैं। ईश्वर वो है जिसमें सारा भेद नष्ट हो जाता है। जो अस्ति या सत्ता मात्र लक्षण वाला है। सत्ता तो एकमात्र ईश्वर का ही है। जीव और जगत अस्तित्व में है - ऐसा हमको प्रतीत हो रहा है ! अस्तित्व में तो सिर्फ ईश्वर ही है। जो सत्ता मात्र लक्षण वाला है, जो तरंग रहित समुद्र की भांति निश्चल है। ऐसा जो ब्रह्म है ईश्वर है वही है , तू नहीं है। ऐसा तू ध्यान कर। (1:16:54

40. सारे कारणों का कारण ईश्वर है  

एकमेव सदनेककारणं

कारणान्तरनिरास्यकारणम् ।

कार्यकारणविलक्षणं स्वयं

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६0 ॥ 

 जो एक मात्र सत्ता होकर भी अनेक का कारण है , ईश्वर एक ही है, लेकिन सारी विचित्रतायेँ वो ही खड़ी करती है। वो एक काली ही है -लेकिन हमको अनेक दीखता है। ब्रह्म एक ही है लेकिन वो अपने माया शक्ति के द्वारा अनेकत्व की सृष्टि कर रहे हैं। सारे कारणों का कारण ईश्वर है !  अब यहाँ भी Physics आ गया न ? लौकिक विज्ञान हम हम युक्ति लगाते है-किसका कारण क्या है ? Logic and reasoning, सभी प्रकार का causality क्या है ? सारे कारणों का मूल कारण कौन है ? ईश्वर है ! लेकिन जो स्वयं कार्य तथा कारण से भिन्न है। ईश्वर में कार्य-कारण कुछ नहीं है। ईश्वर क्या ऐसा सोचते हैं कि जगत मेरा कार्य है , मैं इसका कारण हूँ ? ईश्वर ही तो है कार्य-कारण कहाँ है ? लहरे भी समुद्र ही हैं। बुलबुले भी समुद्र ही हैं -अब इसमें कारण क्या कार्य क्या है ? ऐसा जो ईश्वर है , वही है -तू नहीं है। ऐसा ध्यानकर। (1:18:52

41. क्षर और अक्षर क्या है ? 

निर्विकल्पकमनल्पमक्षरं

यत्क्षराक्षरविलक्षणं परम् ।

नित्यमव्ययसुखं निरञ्जनं

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६१ ॥  

जो निर्विकल्प ,असीम, तथा अविनाशी आत्मा है , वह क्षर-अक्षर माया से भी ऊपर है। क्षर माने यहाँ जो कुछ भी इन्द्रियों से दिख रहा है , सब बदल रहा हैऔर अक्षर क्या है ? अक्षर का मतलब है माया (परमेश शक्ति)। जो बदलता हुआ दिख रहा है, उसके मूल में तो माया है। तो माया और माया का कार्य - ये है क्षर -अक्षर ! जो माया से भी ऊपर है , सर्वश्रेष्ठ , चिरंतन , नित्यानंद स्वरुप निरंजन निष्पाप है, वह ब्रह्म , ईश्वर वही हैं, तुम नहीं हो। ऐसा तू ध्यान कर। (1:20:08) 

42. दृष्टि कहाँ टिकी है - स्वर्ण में या आभूषण में ? (Where is the focus – on gold or on jewellery?)

यद्विभाति सदनेकधा भ्रमान्

नामरूपगुणविक्रियात्मना ।

हेमवत्स्वयमविक्रियं सदा

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६२ ॥   

गढ़े हुए गहनों में जो हर समय निर्विकार है -वो स्वर्ण (आत्मा) है। सारे आभूषण  अंगूठी, कान की बाली , कंगन आदि के नाम-रूप अलग अलग हैं, बनते तो स्वर्ण से ही हैं।  वास्तव में सब स्वर्ण ही है। ये जो स्वर्ण के विभिन्न आभूषण हैं, आपकी दृष्टि अगर उसके रूप में ही अटकी हुई होगी, तो आप कहोगे -ये कान की बाली है , ये नथ है। लेकिन आपकी दृष्टि अगर स्वर्ण में टिकी हो, तो फिर आभूषण कहाँ है , सब स्वर्ण ही तो है। आभूषण को पिघला तो स्वर्ण ही रहेगा। आभूषण स्वर्ण से अतिरिक्त कुछ है क्या ? स्वर्ण सभी समय निर्विकार है , उसके नाम-रूप बनेंगे -बिगड़ेंगे। रूप चला गया तो आभूषण फिर स्वर्ण हो गया। स्वर्ण सब समय है। लेकिन रूप बनते हैं , बिगड़ते हैं। जो ईश्वर हर समय निर्विकार है परन्तु भ्रमवश , नाम, रूप , गुण तथा क्रिया की सत्ता से अनेक रूपों में प्रकट होता है। एक ही मिट्टी नाम-रूप और क्रिया में अलग अलग रूपों प्रकट हो रही है। मिट्टी को नाम रूप दे दिया तो घड़ा हो गया। घड़े में क्रिया है , घड़े का प्रयोजन है -उसमें जल रहेगा इसलिए वो विभिन्न नमरूपों में प्रकट हो रहा है।  नाम रूप, गुण , क्रिया सब भ्रमवश चलता है। है तो मिट्टी ही न ? मिट्टी से अतिरिक्त घड़े का कोई अस्तित्व है क्या ? सभी आभूषणों का स्वर्ण से अतिरिक्त कोई अस्तित्व है क्या ? उसको एक नाम रूप दे दिया तो -वो बाली हो गया, क्रिया हो गयी तो उसको कान में पहन लेते हैं। नाम-रूप क्रिया सब भ्रमवश चलता है। है  तो स्वर्ण ही। लकिन वही भ्रमित होकर नाम-रूप- गुण  तथा सत्ता की क्रिया से प्रकट होता है। वह ब्रह्म ईश्वर वही है , तुम नहीं होऐसा तुम ध्यान करो आपकी  दृष्टि कहाँ टिकी है ? स्वर्ण में या आभूषण में ? (1:22:31

43. जा 'अब', तू खुली आँखों से ध्यान कर :(दुर्गा पूजा ,नवमी तिथि, दिन- बुधवार, समय प्रातः 6:55, तानुसार 1 अक्टूबर, 2025)    

यच्चकास्त्यनपरं परात्परं

प्रत्यगेकरसमात्मलक्षणम् ।

सत्यचित्सुखमनन्तमव्ययं

ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६३ ॥

 263. 'That'  beyond 'which' there is nothing; which shines even above Māyā, which again is superior to its effect, the universe; the inmost Self of all, free from differentiation; the Real Self, the Existence-Knowledge-Bliss Absolute; infinite and immutable 'that Brahman art thou', meditate on this in thy mind.

263. जिसके परे कुछ भी नहीं है; जो माया से भी ऊपर प्रकाशित है, जो उसके प्रभाव से भी श्रेष्ठ है, जो जगत् है; जो सबका अंतरतम आत्मा है, जो भेद से रहित है; जो सत्-ज्ञान-आनंद है, वह अनंत और अक्षर है - वह ब्रह्म तू ही है, इसका मन में ध्यान कर।

जिससे भिन्न कुछ भी नहीं है देखो, हमलोग इसी पर तो चर्चा कर रहे हैं न? ईश्वर से भिन्न कुछ है क्या ? सब ईश्वर ही है।  जो बुद्धि के भी परे हैं। जो सभी की एक रस अन्तरात्मा हैं। ईश्वर हमारी अंतरात्मा है। प्रत्यक आत्मा है। भीतर झांककर के देखो तो सब में प्रभु राम बैठे है। ईश्वर सब की अन्तरात्मा है , सब के भीतर बैठे हैं। जो सच्चिदानंद स्वरुप हैं , और वो राम क्या है ? ब्रह्म ही है, और कुछ नहीं है। सच्चिदानंद ब्रह्म ही हैं। जो सच्चिदानन्द स्वरुप है , अनंत और अव्यय के रूप में प्रकाशित हो रहा है। वह ब्रह्म, वह ईश्वर ही है, तुम नहीं हो। ऐसा तू ध्यानकर। ये बहुत सुंदर है। इसकी जो अंतिम पंक्ति है -ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ,ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ,ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि -ये आपके लिए अब आदेश है - इस प्रकार तुम ध्यान करो। आप जब घर जाओगे तो आपके ध्यान का विषय क्या होगा ? ईश्वर से अतिरिक्त कुछ है ही नहींये ध्यान का विषय होगा। ईश्वर से भिन्न न तो कोई जीव है , न तो कोई जगत है। यह  ध्यान का विषय है ! मैं नहीं हूँ ! ईश्वर ही है ! इस प्रकार से ध्यान करो, इस प्रकार से ध्यान करो, इस प्रकार से ध्यान करो !! मैं नहीं हूँ , ईश्वर ही है।इस प्रकार से ध्यान करो , इस प्रकार से ध्यान करो,इस प्रकार से ध्यान करो! ये अब हमारे दिमाग में यही बात चलनी चाहिए -ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि,ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि,ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।  समझते हो भाई ?जीव और जगत जैसा कुछ नहीं है , यहाँ ईश्वर ही है। मन को इसी भाव में डुबो देना चाहिए। और उस दृष्टि का अवलंबन करना चाहिए , आचरण के समय ईश्वर दृष्टि का अवलंबन करना चाहिए। ईश्वर दृष्टि से देखते हुए हम सभी से व्यवहार करेंगे। तो हमारा जीवन अतिसुंदर होगा। ॐ 

=======

 [मनुष्य केवल एक Homo erectus प्राणी (चिम्पांजी) ही नहीं है, मनुष्य ( होमो सेपियन्स ) प्राणी है जिसकी विशेषता है -नित्यानित्य विवेक करने की क्षमता या उच्च बुद्धि , द्विपादता और बालहीनता। और  मनुष्य रीढ़की हड्डी सीधी रख कर खड़ा हो सकता है।  गर्दन उठाकर आसमान देख सकता है, पशु ऊपर नहीं देख सकते, इसीलिए शास्त्र और गुरु की कृपा नित्य-अनित्य विवेक को जाग्रत नहीं कर सकते, जीव और जगत भी ईश्वर ही है इस परमसत्य को नहीं समझ सकता है। 

इस सृष्टि में जितने भी जीव-जन्तु हैं (चतुष्पाद, द्विपाद, निष्पाद) वे सभी बद्ध हैं ! लेकिन नित्य-अनित्य विवेक -प्रयोग द्वारा इस नश्वर स्थूल शरीर रूपी मानसिकता को अविनाशी आत्मा का बंधन को समझना , और इस बंधन से मुक्त होने का प्रयास सिर्फ मनुष्य ही कर सकता है। (स्वयं को मात्र स्त्री-पुरुष देह समझकर जन्म-मृत्यु के) बंधन से मुक्त होने का प्रयास, मनुष्य के अतिरिक्त अन्य कोई जीव नहीं कर सकता है।

              







   


रविवार, 28 सितंबर 2025

⚜️️संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥4॥⚜️️घटना - 369⚜️️भगवान श्रीराम द्वारा संत-असंत के लक्षणों की व्याख्या⚜️️ Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #369 ||⚜️️https://www.shriramcharitmanas.in/p/uttar-kand_75.html⚜️️

 श्रीरामचरितमानस 

सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

[दोहा -38, 39,40]



भगवान श्रीराम द्वारा संत-असंत के लक्षणों की व्याख्या -

        संत-असंत लक्षण की व्याख्या करते हुए श्रीराम भरत से कहते हैं -संतों के मन में कोई कामना नहीं होती , उनका ह्रदय शांति, वैराग्य, विवेक और सरलता का आगार होता है। उनमें सब के लिए प्रेम भाव और धर्म के लिए प्रेरक शक्ति होती है। वे कभी इन्द्रियों के निग्रह , नियम तथा नीति के मार्ग से विचलित नहीं होते। संतों के विपरीत असंतों के ह्रदय में सदा संताप का निवास होता है। उन्हें दूसरों की सुख-समृद्धि से ईर्ष्या होती है। परनिन्दा में उन्हें अपार सुख मिलता है। काम, क्रोध , लोभ तथा मोह उनके विशेष लक्षण होते हैं। उनका तन और मन निर्दयता , कपट, कुटिलता और पाप के घर होते हैं। जो उनकी भलाई करता है , वे उसे भी क्षति पहुँचाते हैं। अतः भूलकर भी उनकी संगति में नहीं पड़ना चाहिए। झूठ ही उनका लेना-देना, झूठ ही उनका भोजन, ओढ़ना और बिछौना होता है। माता-पिता गुरु-जन तथा पूजनीय व्यक्तियों के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं होता। हे भाई ! इसीलिए मैं असंतों के लिए कालरूप, और उनके कार्य-कलाप का उचित फलाफल देता हूँ।  

दोहा :
*निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।
ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज॥38॥

भावार्थ:-जिन्हें निंदा और स्तुति (बड़ाई) दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलों में जिनकी ममता है,
 वे गुणों के धाम और सुख की राशि संतजन मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं॥38॥

चौपाई :
* सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई॥1॥

भावार्थ:-अब असंतों दुष्टों का स्वभाव सुनो, कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिए। उनका संग सदा दुःख देने वाला होता है। जैसे हरहाई (बुरी जाति की) गाय कपिला (सीधी और दुधार) गाय को अपने संग से नष्ट कर डालती है॥1॥

*खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥2॥

भावार्थ:-बदुष्टों के हृदय में बहुत अधिक संताप रहता है। वे पराई संपत्ति (सुख) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरे की निंदा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्ते में पड़ी निधि (खजाना) पा ली हो॥2॥

* काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥3॥

भावार्थ:-वे काम, क्रोध, मद और लोभ के परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापों के घर होते हैं। वे बिना ही कारण सब किसी से वैर किया करते हैं। जो भलाई करता है उसके साथ बुराई भी करते हैं॥3॥
*झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥4॥

भावार्थ:-उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है। झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है। (अर्थात्‌ वे लेने-देने के व्यवहार में झूठ का आश्रय लेकर दूसरों का हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपए ले लिए, करोड़ों का दान कर दिया। इसी प्रकार खाते हैं चने की रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आए। अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजन से वैराग्य है, इत्यादि। मतलब यह कि वे सभी बातों में झूठ ही बोला करते हैं।) जैसे मोर साँपों को भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपर से मीठे वचन बोलते हैं। (परंतु हृदय के बड़े ही निर्दयी होते हैं)॥4॥

दोहा :
* पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥39॥

भावार्थ:-वे दूसरों से द्रोह करते हैं और पराई स्त्री, पराए धन तथा पराई निंदा में आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर शरीर धारण किए हुए राक्षस ही हैं॥39॥

चौपाई :

*लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥1॥

भावार्थ:-लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है (अर्थात्‌ लोभ ही से वे सदा घिरे हुए रहते हैं)। वे पशुओं के समान आहार और मैथुन के ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुर का भय नहीं लगता। यदि किसी की बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी (दुःखभरी) साँस लेते हैं मानों उन्हें जूड़ी आ गई हो॥1
* जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥2॥

भावार्थ:-और जब किसी की विपत्ति देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत्‌भर के राजा हो गए हों। वे स्वार्थपरायण, परिवार वालों के विरोधी, काम और लोभ के कारण लंपट और अत्यंत क्रोधी होते हैं॥2॥
* मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥3॥

भावार्थ:-वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसी को नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, (साथ ही अपने संग से) दूसरों को भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरों से द्रोह करते हैं। उन्हें न संतों का संग अच्छा लगता है, न भगवान्‌ की कथा ही सुहाती है॥3॥

* अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥4॥

भावार्थ:-वे अवगुणों के समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी (रागयुक्त), वेदों के निंदक और जबर्दस्ती पराए धन के स्वामी (लूटने वाले) होते हैं। वे दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं, परंतु ब्राह्मण द्रोह विशेषता से करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, परंतु वे ऊपर से सुंदर वेष धारण किए रहते हैं॥4॥  

दोहा :
* ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥40॥

भावार्थ:-ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेता में नहीं होते। द्वापर में थोड़े से होंगे और कलियुग में तो इनके झुंड के झुंड होंगे॥40॥

चौपाई :
* पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥1॥

भावार्थ:-हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदों का यह निर्णय (निश्चित सिद्धांत) मैंने तुमसे कहा है, इस बात को पण्डित लोग जानते हैं॥1॥

* नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥
लकरहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥2॥

भावार्थ:-मनुष्य का शरीर धारण करके जो लोग दूसरों को दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्यु के महान्‌ संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसी से उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है॥2॥

* कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फलदाता॥
अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥3॥

भावार्थ:-हे भाई! मैं उनके लिए कालरूप (भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मों का (यथायोग्य) फल देने वाला हूँ! ऐसा विचार कर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार (के प्रवाह) को दुःख रूप जानकर मुझे ही भजते हैं॥3॥

*त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥
संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥4॥

भावार्थ:-इसी से वे शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्मों को त्यागकर देवता, मनुष्य और मुनियों के नायक मुझको भजते हैं। (इस प्रकार) मैंने संतों और असंतों के गुण कहे। जिन लोगों ने इन गुणों को समझ रखा है, वे जन्म-मरण के चक्कर में नहीं पड़ते॥4॥

========      
     











⚜️️सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥4॥⚜️️घटना - 368⚜️️सन्त असन्त के लक्षण जानने की भरत की इच्छा का श्रीराम द्वारा समाधान ⚜️️ Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #368 ||⚜️️https://www.shriramcharitmanas.in/p/uttar-kand_75.html#google_vignette⚜️️

 श्रीरामचरितमानस 

सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

[दोहा -35,36,37]


सन्त असन्त के लक्षण जानने की भरत की इच्छा का श्रीराम द्वारा समाधान   
        सुन्दर उपवन में रमण करते हुए भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न ने श्रीराम के सम्मुख सिर नवाया। भरत श्रीराम से कुछ जिज्ञासा करना चाहते हैं , किन्तु उन्हें संकोच हो रहा है। हनुमान उनके संकोच की बात बताकर उसे दूर कर देते हैं। भरत के मन में सन्त और असन्त के लक्षण सुनने की जिज्ञासा है। श्रीराम उनकी शंका का समाधान करते हैं। सन्तों और असंतों की करनी चंदन और कुल्हाड़ी के आचरण जैसी होती हैकुल्हाड़ी का काम है , वृक्ष को काटना। किन्तु चंदन उसके प्रहार सह कर भी उसे अपनी सुगंध देता है। इसी गुण के कारण चंदन देवताओं के मस्तक पर सुशोभित होता है। जबकि कुल्हाड़ी को आग में तपाकर, घन से पीटा जाता है। सन्त विष-वासना में लिप्त नहीं होते। उन्हें दूसरों को दुःखी देखकर दुःख , और सुखी देखकर सुख प्राप्त होता है। कोई उनका शत्रु नहीं होता। वे काम, क्रोध, लोभ और मोह रहित होते हैं। उनका चित्त अत्यन्त कोमल होता है , वे सबको आदर और सम्मान देते हैं , और स्वयं मान -अपमान रहित होते हैं। इसीलिए वे मुझे प्राणो के समान प्रिय होते हैं। 

दोहा :

* बार-बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥35॥ 

भावार्थ:-प्रेम सहित बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यंत मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोक को गए॥35॥
चौपाई :
* सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥1॥ 

भावार्थ:-सनकादि मुनि ब्रह्मलोक को चले गए। तब भाइयों ने श्री रामजी के चरणों में सिर नवाया। सब भाई प्रभु से पूछते सकुचाते हैं। (इसलिए) सब हनुमान्‌जी की ओर देख रहे हैं॥1॥

* सुनी चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥
अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥2॥

भावार्थ:-वे प्रभु के श्रीमुख की वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमों का नाश हो जाता है। अंतरयामी प्रभु सब जान गए और पूछने लगे- कहो हनुमान्‌! क्या बात है?॥2॥

* जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥3॥

भावार्थ:-तब हनुमान्‌जी हाथ जोड़कर बोले- हे दीनदयालु भगवान्‌! सुनिए। हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मन में सकुचा रहे हैं॥3॥

* तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥4॥ 

भावार्थ:-(भगवान्‌ ने कहा-) हनुमान्‌! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरत के और मेरे बीच में कभी भी कोई अंतर (भेद) है? प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने उनके चरण पकड़ लिए (और कहा-) हे नाथ! हे शरणागत के दुःखों को हरने वाले! सुनिए॥4॥

दोहा :
* नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥36॥

भावार्थ:-हे नाथ! न तो मुझे कुछ संदेह है और न स्वप्न में भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनंद के समूह! यह केवल आपकी ही कृपा का फल है॥36॥

चौपाई :

* करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥
संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥1॥

भावार्थ:-तथापि हे कृपानिधान! मैं आप से एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवक को सुख देने वाले हैं (इससे मेरी दृष्टता को क्षमा कीजिए और मेरे प्रश्न का उत्तर देकर सुख दीजिए)। हे रघुनाथजी वेद-पुराणों ने संतों की महिमा बहुत प्रकार से गाई है॥1॥

*श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥2॥

भावार्थ:-आपने भी अपने श्रीमुख से उनकी बड़ाई की है और उन पर प्रभु (आप) का प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपा के समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञान में अत्यंत निपुण हैं॥2॥

*संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥
संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥3॥

भावार्थ:-हे शरणागत का पालन करने वाले! संत और असंत के भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिए। (श्री रामजी ने कहा-) हे भाई! संतों के लक्षण (गुण) असंख्य हैं, जो वेद और पुराणों में प्रसिद्ध हैं॥3॥

* संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥4॥

भावार्थ:-संत और असंतों की करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चंदन का आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चंदन को काटती है (क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षों को काटना है), किंतु चंदन अपने स्वभाववश अपना गुण देकर उसे (काटने वाली कुल्हाड़ी को) सुगंध से सुवासित कर देता है॥4॥
दोहा :

* ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड॥37॥

भावार्थ:-इसी गुण के कारण चंदन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत्‌ का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ी के मुख को यह दंड मिलता है कि उसको आग में जलाकर फिर घन से पीटते हैं॥37॥
चौपाई :
* बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥1॥

भावार्थ:-संत विषयों में लंपट (लिप्त) नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं, उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता है वे (सबमें, सर्वत्र, सब समय) समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है। वे मद से रहित और वैराग्यवान्‌ होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भय का त्याग किए हुए रहते हैं॥1॥

* कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥
सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥2॥

भावार्थ:-उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनों पर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्म से मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सबको सम्मान देते हैं, पर स्वयं मानरहित होते हैं। हे भरत! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणों के समान हैं॥2॥

* बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन॥
सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री॥3॥

भावार्थ:-उनको कोई कामना नहीं होती। वे मेरे नाम के परायण होते है। शांति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नता के घर होते हैं। उनमें शीलता, सरलता, सबके प्रति मित्र भाव और ब्राह्मण के चरणों में प्रीति होती है, जो धर्मों को उत्पन्न करने वाली है॥3॥

* ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर॥
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥4॥

भावार्थ:-हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदय में बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना। जो शम (मन के निग्रह), दम (इंद्रियों के निग्रह), नियम और नीति से कभी विचलित नहीं होते और मुख से कभी कठोर वचन नहीं बोलते,॥4॥
==============

     


















 

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

⚜️️संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि श्रुति पुरान सदग्रंथ॥ ⚜️️घटना - 367⚜️️Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #367 || ⚜️️अयोध्या पधारे मुनियों का भगवान श्रीराम द्वारा सादर सत्कार ⚜️️⚜️https://www.shriramcharitmanas.in/p/uttar-kand_47.html

 श्रीरामचरितमानस 

सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

[दोहा -32,33,34] 


अयोध्या पधारे मुनियों का भगवान श्रीराम द्वारा सादर सत्कार :

जहाँ कहीं भी रामचरित का गान होता है , ब्रह्म में सदैव तल्लीन रहने वाले मुनिगण वहाँ खिंचे चले आते हैं। राम के राज्य काल में अवधपुरी में चारों ओर सुख और शान्ति व्याप्त है , और इसी कारण सनकादि मुनि वहाँ पधारे हैं। इनके रूपों में मानो चारो वेदों ने बालरूप धारण कर लिया है। अगस्त्य मुनि के आश्रम से आये इन पुण्यात्माओं का श्रीराम ने सादर सत्कार किया। दण्डवत प्रणाम निवेदित कर अपना पीताम्बर बिछाकर , उन्हें आसन दिया। प्रभु की इस विनम्र भंगिमा और अद्भुत रूप ने उनका मन मोह लिया। वे प्रेम विह्वल हो गए , स्वयं श्रीराम इस अवस्था में भाव-विभोर हो बोले -" बड़े भाग्य से सत्संग प्राप्त होता है। साधु-संगति से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत विषय वासना में रत लोगों का संग जन्म और मृत्यु अर्थात आवागमन के कुचक्र में डालने वाला होता है। ये वचन सुनकर मुनिगण उनसे अखण्ड और अचल भक्ति की याचना करते हैं !  
दोहा :

* देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह॥32॥

भावार्थ:-सनकादि मुनियों को आते देखकर श्री रामचंद्रजी ने हर्षित होकर दंडवत्‌ किया और स्वागत (कुशल) पूछकर प्रभु ने (उनके) बैठने के लिए अपना पीताम्बर बिछा दिया॥32॥

चौपाई :

* कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥1॥

भावार्थ:-फिर हनुमान्‌जी सहित तीनों भाइयों ने दंडवत्‌ की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्री रघुनाथजी की अतुलनीय छबि देखकर उसी में मग्न हो गए। वे मन को रोक न सके॥1॥

* स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥
एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥2॥ 

भावार्थ:-वे जन्म-मृत्यु (के चक्र) से छुड़ाने वाले, श्याम शरीर, कमलनयन, सुंदरता के धाम श्री रामजी को टकटकी लगाए देखते ही रह गए, पलक नहीं मारते और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं॥2॥
* तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥3॥ 

भावार्थ:-उनकी (प्रेम विह्लल) दशा देखकर (उन्हीं की भाँति) श्री रघुनाथजी के नेत्रों से भी (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। दतनन्तर प्रभु ने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियों को बैठाया और परम मनोहर वचन कहे-॥3॥

* आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा॥4॥ 

भावार्थ:-हे मुनीश्वरो! सुनिए, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनों ही से (सारे) पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्य से सत्संग की प्राप्ति होती है, जिससे बिन ही परिश्रम जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है॥4॥
दोहा :
* संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥33॥ 

भावार्थ:-संत का संग मोक्ष (भव बंधन से छूटने) का और कामी का संग जन्म-मृत्यु के बंधन में पड़ने का मार्ग है। संत, कवि और पंडित तथा वेद, पुराण (आदि) सभी सद्ग्रंथ ऐसा कहते हैं॥33॥

चौपाई :

* सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥1॥

भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीर से स्तुति करने लगे- हे भगवन्‌! आपकी जय हो। आप अंतरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपों में प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं॥1॥

* जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥2॥

भावार्थ:-हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुण के समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुख के धाम, (अत्यंत) सुंदर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वी के धारण करने वाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मे, अनादि और शोभा की खान हैं॥2॥

* ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥3॥

भावार्थ:-आप ज्ञान के भंडार, (स्वयं) मानरहित और (दूसरों को) मान देने वाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुंदर यश गाते हैं। आप तत्त्व के जानने वाले, की हुई सेवा को मानने वाले और अज्ञान का नाश करने वाले हैं। हे निरंजन (मायारहित)! आपके अनेकों (अनंत) नाम हैं और कोई नाम नहीं है (अर्थात्‌ आप सब नामों के परे हैं)॥3॥

* सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय॥4॥ 

भावार्थ:-आप सर्वरूप हैं, सब में व्याप्त हैं और सबके हृदय रूपी घर में सदा निवास करते हैं, (अतः) आप हमारा परिपालन कीजिए(राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि) द्वंद्व, विपत्ति और जन्म-मत्यु के जाल को काट दीजिए। हे रामजी! आप हमारे हृदय में बसकर काम और मद का नाश कर दीजिए॥4॥

दोहा :
* परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥34॥ 

भावार्थ:-आप परमानंद स्वरूप, कृपा के धाम और मन की कामनाओं को परिपूर्ण करने वाले हैं। हे श्री रामजी! हमको अपनी अविचल प्रेमाभक्ति दीजिए॥34॥

चौपाई :

* देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि॥
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥1॥ 

भावार्थ:-हे रघुनाथजी! आप हमें अपनी अत्यंत पवित्र करने वाली और तीनों प्रकार के तापों और जन्म-मरण के क्लेशों का नाश करने वाली भक्ति दीजिए। हे शरणागतों की कामना पूर्ण करने के लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष रूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिए॥1॥

* भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥
मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥2॥ 

भावार्थ:-हे रघुनाथजी! आप जन्म-मृत्यु रूप समुद्र को सोखने के लिए अगस्त्य मुनि के समान हैं। आप सेवा करने में सुलभ हैं तथा सब सुखों के देने वाले हैं। हे दीनबंधो! मन से उत्पन्न दारुण दुःखों का नाश कीजिए और (हम में) समदृष्टि का विस्तार कीजिए॥2॥

* आस त्रास इरिषाद निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥
भूप मौलि मनि मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥3॥ 

भावार्थ:-आप (विषयों की) आशा, भय और ईर्षा आदि के निवारण करने वाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्य के विस्तार करने वाले हैं। हे राजाओं के शिरोमणि एवं पृथ्वी के भूषण श्री रामजी! संसृति (जन्म-मृत्यु के प्रवाह) रूपी नदी के लिए नौका रूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिए॥3॥
* मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥4॥ 

भावार्थ:-हे मुनियों के मन रूपी मानसरोवर में निरंतर निवास करने वाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वंदित हैं। आप रघुकुल के केतु, वेदमर्यादा के रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण (रूप बंधनों) के भक्षक (नाशक) हैं॥4॥

* तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥5॥

भावार्थ:-आप तरन-तारन (स्वयं तरे हुए और दूसरों को तारने वाले) तथा सब दोषों को हरने वाले हैं। तीनों लोकों के विभूषण आप ही तुलसीदास के स्वामी हैं॥5॥
=================











 

⚜️️"ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥ ~ रामनाम की महिमा !"⚜️️घटना - 366⚜️️'Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #366 || ⚜️️https://www.shriramcharitmanas.in/p/uttar-kand_47.html

 श्रीरामचरितमानस 

सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

[दोहा -29,30,31]  

'रामनाम की महिमा'

(ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥)


⚜️️राम राज्य की महिमा और आकर्षण का वर्णन⚜️️

     श्रीराम के राज्य काल में अयोध्या की सुख सम्पदा तथा प्राकृतिक छटा को मात्र अनुपम की संज्ञा दे देना पर्याप्त नहीं है। पक्षीराज गरुड़ को 'रामनाम की महिमा' सुनाते हुए काकभुशुण्डि कहते हैं जब से अवधपुरी में राजा रामचन्द्र के प्रताप का सूर्य उदित हुआ है - 'तीनों लोकों से अज्ञान (अविद्या ?) का नाश हो गया है'मद, मान , मोह और ईर्ष्या का लोप और सुख,  सन्तोष और वैराग्य और विवेक का उदय ' ये है राम राज्य की विशेषता। जिसका आकर्षण सनकादि मुनि तक को खींचकर अयोध्या ले आता है।  
  

छंद :

* बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं।

सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥

बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।

आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥

भावार्थ:-अनुपम बावलियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुंदर (रत्नों की) सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। (तालाबों में) अनेक रंगों के कमल खिल रहे हैं, अनेकों पक्षी कूज रहे हैं और भौंरे गुंजार कर रहे हैं। (परम) रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियों की (सुंदर बोली से) मानो राह चलने वालों को बुला रहे हैं।

दोहा :

* रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।

अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥29॥

भावार्थ:-स्वयं लक्ष्मीपति भगवान्‌ जहाँ राजा हों, उस नगर का कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-संपत्तियाँ अयोध्या में छा रही हैं॥29॥

चौपाई :

* जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥

भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥1॥

भावार्थ:-लोग जहाँ-तहाँ श्री रघुनाथजी के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागत का पालन करने वाले श्री रामजी को भजो, शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम श्री रघुनाथजी को भजो॥1॥

* जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥

धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥2॥

भावार्थ:-कमलनयन और साँवले शरीर वाले को भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रों की रक्षा करती हैं उसी प्रकार अपने सेवकों की रक्षा करने वाले को भजो। सुंदर बाण, धनुष और तरकस धारण करने वाले को भजो। संत रूपी कमलवन के (खिलाने के) सूर्य रूप रणधीर श्री रामजी को भजो॥2॥

* काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥

लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥3॥

भावार्थ:-कालरूपी भयानक सर्प के भक्षण करने वाले श्री राम रूप गरुड़जी को भजो। निष्कामभाव से प्रणाम करते ही ममता का नाश कर देने वाले श्री रामजी को भजो। लोभ-मोह रूपी हरिनों के समूह के नाश करने वाले श्री राम किरात को भजो। कामदेव रूपी हाथी के लिए सिंह रूप तथा सेवकों को सुख देने वाले श्री राम को भजो॥3॥

* संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥

जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥4॥

भावार्थ:-संशय और शोक रूपी घने अंधकार का नाश करने वाले श्री राम रूप सूर्य को भजो। राक्षस रूपी घने वन को जलाने वाले श्री राम रूप अग्नि को भजो। जन्म-मृत्यु के भय को नाश करने वाले श्री जानकी समेत श्री रघुवीर को क्यों नहीं भजते?॥4॥

*बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥

मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥5॥

भावार्थ:-बहुत सी वासनाओं रूपी मच्छरों को नाश करने वाले श्री राम रूप हिमराशि (बर्फ के ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्री रघुनाथजी को भजो। मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्री रामजी को भजो॥5॥

दोहा :

* एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।

सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥30॥

भावार्थ:-इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष श्री रामजी का गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्री रामजी सदा सब पर अत्यंत प्रसन्न रहते हैं॥30॥

चौपाई :

* जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥

पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥1॥

भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गरुड़जी! जब से रामप्रताप रूपी अत्यंत प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तब से तीनों लोकों में पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतों को सुख और बहुतों के मन में शोक हुआ॥1॥

* जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥

अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥2॥ `

भावार्थ:-जिन-जिन को शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ (सर्वत्र प्रकाश छा जाने से) पहले तो अविद्या रूपी रात्रि नष्ट हो गई। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गए और काम-क्रोध रूपी कुमुद मुँद गए॥2॥

* बिबिध कर्म गुन काल सुभाउ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥

मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥3॥

भावार्थ:-भाँति-भाँति के (बंधनकारक) कर्म, गुण, काल और स्वभाव- ये चकोर हैं, जो (रामप्रताप रूपी सूर्य के प्रकाश में) कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मद रूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता॥3॥

* धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥

सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥4॥

भावार्थ:-धर्म रूपी तालाब में ज्ञान, विज्ञान- ये अनेकों प्रकार के कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक- ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गए॥4॥

दोहा :

* यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।

पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥31॥

भावार्थ:-यह श्री रामप्रताप रूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे से किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाश को प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं31॥

चौपाई :

* भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥

सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥1॥ 

भावार्थ:-एक बार भाइयों सहित श्री रामचंद्रजी परम प्रिय हनुमान्‌जी को साथ लेकर सुंदर उपवन देखने गए। वहाँ के सब वृक्ष फूले हुए और नए पत्तों से युक्त थे॥1॥

* जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥

ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥2॥

भावार्थ:-सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आए, जो तेज के पुंज, सुंदर गुण और शील से युक्त तथा सदा ब्रह्मानंद में लवलीन रहते हैं। देखने में तो वे बालक लगते हैं, परंतु हैं बहुत समय के॥2॥

*रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥

आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥3॥

भावार्थ:-मानो चारों वेद ही बालक रूप धारण किए हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्री रघुनाथजी की चरित्र कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं॥3॥

* तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥

राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥4॥

भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गए थे (वहीं से चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्री अगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनि ने श्री रामजी की बहुत सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करने में उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ी से अग्नि उत्पन्न होती है॥4॥

==========

⚜️️*नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥⚜️️घटना - 365⚜️️⚜️️Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #365|⚜️️⚜️️https://www.shriramcharitmanas.in/p/uttar-kand_47.html

 श्रीरामचरितमानस 

सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

[दोहा -27,28] 


अयोध्या नगरी की भव्यता का वर्णन - 

       अवधपुरी में स्वयं भगवान राजा रामचंद्र के रूप में विराजमान हैं। नारद सनकादि मुनीश्वर नित्य प्रति उनके दर्शनों के लिए अयोध्या आते हैं। और नगरी की शोभा देख अपना वैराग्य भूल जाते हैं। घरों में जब मणियों के दीप प्रज्ज्वलित होते हैं , तो मूंगों से निर्मित वेदियाँ चमक उठती हैं।पन्नों से जड़ी सोने की दीवारों को मानो ब्रह्मा ने स्वयं अपने हाथों से बनाया है। नगरनिवासियों ने सुंदर उद्यान लगाए हैं , जिनमें अनेक प्रकार की लतायें वसंत ऋतू की सुषमा बिखेरती रहती है। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा के रूप में विद्यमान हों , वहाँ के हाटबाजार के शोभा का वर्णन क्या शब्दों में किया जा सकता है

चौपाई :

*नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥1॥

भावार्थ:-नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्री रामजी के दर्शन के लिए प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस (दिव्य) नगर को देखकर वैराग्य भुला देते हैं॥1॥

* जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥2॥

भावार्थ:-(दिव्य) स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अटारियाँ हैं। उनमें (मणि-रत्नों की) अनेक रंगों की सुंदर ढली हुई फर्शें हैं। नगर के चारों ओर अत्यंत सुंदर परकोटा बना है, जिस पर सुंदर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं॥2॥
* नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥
लमहि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥3॥

भावार्थ:-मानो नवग्रहों ने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावती को आकर घेर लिया हो। पृथ्वी (सड़कों) पर अनेकों रंगों के (दिव्य) काँचों (रत्नों) की गच बनाई (ढाली) गई है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियों के भी मन नाच उठते हैं॥3॥

* धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥4॥

भावार्थ:-उज्ज्वल महल ऊपर आकाश को चूम (छू) रहे हैं। महलों पर के कलश (अपने दिव्य प्रकाश से) मानो सूर्य, चंद्रमा के प्रकाश की भी निंदा (तिरस्कार) करते हैं। (महलों में) बहुत सी मणियों से रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं॥4॥
छंद :
* मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची।
मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥
सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।
प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥

भावार्थ:-घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगों की बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों (रत्नों) के खम्भे हैं। मरकतमणियों (पन्नों) से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुंदर हैं मानो ब्रह्मा ने खास तौर से बनाई हों। महल सुंदर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुंदर स्फटिक के आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत से खरादे हुए हीरों से जड़े हुए सोने के किंवाड़ हैं॥
दोहा :

* चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥27॥

भावार्थ:-घर-घर में सुंदर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्री रामचंद्रजी के चरित्र बड़ी सुंदरता के साथ सँवारकर अंकित किए हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्त को चुरा लेते हैं॥27॥

चौपाई :

* सुमन बाटिका सबहिं लगाईं। बिबिध भाँति करि जतन बनाईं॥
लता ललित बहु जाति सुहाईं। फूलहिं सदा बसंत कि नाईं॥1॥

भावार्थ:-सभी लोगों ने भिन्न-भिन्न प्रकार की पुष्पों की वाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियों की सुंदर और ललित लताएँ सदा वसंत की तरह फूलती रहती हैं॥1॥

*गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर।
नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए॥2॥

भावार्थ:-भौंरे मनोहर स्वर से गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकार की सुंदर वायु बहती रहती है। बालकों ने बहुत से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़ने में सुंदर लगते हैं॥2॥

* मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥3॥

भावार्थ:-मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों के ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी (मणियों की दीवारों में और छत में) जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर (वहाँ दूसरे पक्षी समझकर) बहुत प्रकार से मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं॥3॥

*सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥
राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रुचिर बजारू॥4॥

भावार्थ:-बालक तोता-मैना को पढ़ाते हैं कि कहो- 'राम' 'रघुपति' 'जनपालक'। राजद्वार सब प्रकार से सुंदर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुंदर हैं॥4॥

छंद :
* बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।
सब सुखी सब सच्चरि सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥

भावार्थ:-सुंदर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता, वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ की संपत्ति का वर्णन कैसे किया जाए? बजाज (कपड़े का व्यापार करने वाले), सराफ (रुपए-पैसे का लेन-देन करने वाले) आदि वणिक्‌ (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान प़ड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों, स्त्री, पुरुष बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुंदर हैं॥ 

दोहा :
* उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥28॥

भावार्थ:-नगर के उत्तर दिशा में सरयूजी बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है। मनोहर घाट बँधे हुए हैं, किनारे पर जरा भी कीचड़ नहीं है॥28॥

चौपाई :

* दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥
पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥1॥

भावार्थ:-अलग कुछ दूरी पर वह सुंदर घाट है, जहाँ घोड़ों और हाथियों के ठट्ट के ठट्ट जल पिया करते हैं। पानी भरने के लिए बहुत से (जनाने) घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं। वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते॥1

* राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥
तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥2॥

भावार्थ:-राजघाट सब प्रकार से सुंदर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्णों के पुरुष स्नान करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे देवताओं के मंदिर हैं, जिनके चारों ओर सुंदर उपवन (बगीचे) हैं॥2॥

* कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥
तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई॥3॥

भावार्थ:-नदी के किनारे कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे सुंदर तुलसीजी के झुंड के झुंड बहुत से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं॥3॥

* पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥
देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥4॥

भावार्थ:-नगर की शोभा तो कुछ कही नहीं जाती। नगर के बाहर भी परम सुंदरता है। श्री अयोध्यापुरी के दर्शन करते ही संपूर्ण पाप भाग जाते हैं। (वहाँ) वन, उपवन, बावलिया और तालाब सुशोभित हैं॥4॥
=============