इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
⚜️️प्रश्न : आपकी दृष्टि काम पर अटकी है या राम पर ? ⚜️️
(अपरोक्ष ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग 'Practical Application')
(- परम् पूज्य स्वामी शुद्धिदानन्दा जी महाराज, अध्यक्ष,
अद्वैत आश्रम, मायावती , हिमालय।)
The Essence of Vivekachudamani | Session 24|
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,
निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥५॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः
1. अज्ञान की निवृत्ति होने पर शिष्य की वेदांत दृष्टि : शिष्य जब वेदांत दृष्टि या अंतिम दृष्टि, से जीव और जगत को देखता है तो पाता है कि जितने नाम-रूप हैं सभी ईश्वर के ही नामरूप हैं ! (इसी वेदांत दृष्टि में माँ सारदा नेतेलोभेलो मैदान में अपने डकैत माता-पिता को प्राप्त किया था !)
विगत सत्र में हमने देखा कि शिष्य शास्त्र और गुरु के द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण करने के लिए एकान्त में जाता है (निर्जन में जाता है, कैम्प में जाता है) और वहाँ जाकर श्रवण और मनन करने से उसको परोक्ष ज्ञान तो हो गया। अब वह अपरोक्ष ज्ञान या आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के लिए निदिध्यासन में या ध्यान (आत्मचिंतन) में मग्न हो जाता है।साक्षात् अपरोक्ष अनुभूति के लिए वो निदिध्यासन में या ध्यान (साक्षी आत्मा मरेगा या स्थूल शरीर ? के चिंतन में) में मग्न हो जाता है। और इस प्रकार निदिध्यासन में साधन-चतुष्टय की ओर अग्रसर रहते हुए -ईश्वर और गुरु के अनुग्रह से वह एक दिन अपने सत्य स्वरुप को पहचान जाता है। (जो परमेश शक्ति महामाया माँ काली के रूप में -सृष्टि, स्थिति, प्रलय का खेल दिखाकर शिव जी ढँकती है अर्थात अपने आवरण शक्ति के द्वारा मनुष्य की विशिष्ट योग्यता नित्य-अनित्य विवेक को सुला देतीं हैं, वही जगतजननीमहामाया माँ काली कृपा करके समय -समय परज्ञानदायिनी माँ सारदा के रूप में अवतरित होकर गुरु रूप में वो ही फिर कृपा कर के अपनी संतानों के पापों को स्वयं ग्रहण कर विवेक का मार्ग दिखला देती है।) परमेश शक्ति, माँ सारदा और गुरु (श्रीरामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द) के अनुग्रह से उस शिष्य के अज्ञान की जब निवृत्ति हो जाती है, तो उसकी अनुभूति क्या होती है ?
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत् ।
अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महाद्भुतम् ॥ ४३८ ॥
जगत कहाँ गया ? किसके द्वारा हटाया गया ? कहाँ लीन हो गया ये जगत ? (किस प्रलय में?) थोड़ी देर पहले तक , जबतक मैं अज्ञान में था , मुझे 'जीव' और जगत दिखाई दे रहा था। अब जब मैंने सत्य का अनुभव कर लिया , तब देख रहा हूँ -कहाँ है जीव और जगत ? नास्ति! जिव और जगत दोनों नहीं हैं , क्या अद्भुत है ? क्या अद्भुत है ? अज्ञान में मैं जिसको जीव और जगत समझ रहा था (बिकुआनउआ -समझ रहा था), ज्ञान में मुझे ये अनुभूति हुई कि वह ईश्वर ही है ! ईश्वर से अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है। ये अनुभूति हुई किईश्वर से भिन्न न तो कोई जीव है, न तो कोई जगत है। तो जो भीं दिखाई दे रहा है , ये सब क्या है ? सिर्फ ईश्वर ही है , परब्रह्म परमात्मा ही है। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यह वेदांत -वेदों की अंतिम दृष्टि है। तो जितने नामरूप दिखाई दे रहे हैं , वो सब ईश्वर के ही नाम रूप हैं ! तो जितने नाम-रूप यहाँ दिखाई दे रहे हैं, किसके नाम रूप हैं ? ईश्वर के परमात्मा के ही नाम रूप हैं। (4:00)
2. प्रश्न है आपकी दृष्टि कहाँ अटकी है ? [M/F स्थूल शरीर 2mm की चर्म दृष्टि :कार्य अपने कारण से भिन्न नहीं है : Causality- The effect is not different from its cause !]
किसी गाँव में एक किसान था। उस किसान का अपना खेत था। खेत उसके घर थोड़ी दूरी पर था। हर रोज ये किसान अपने घर से सवेरे निकल पड़ता था। रास्ते में एक कुम्हार का घर था। कुम्हार घड़ा-सुराही आदि बनाता था। एक दिन सवेरे उसके घर के आंगन में उसको मिट्टी का ढेर दिखाई पड़ा। खेत से लौटा तो कुम्हार के आंगन में वो ढेर नहीं था। पूछा मिट्टी कहाँ गयी ? कुम्हार ने घड़ा दिखाते हुए कहा - देखो ये घड़े बन गए हैं। उसी दिन रात को जोरों की बारिश हुई। और सवेरे जब किसान अपने खेत की और जा रहा था , तो उसे घड़े दिखाई नहीं पड़े। पूछा घड़े कहाँ गए ? कुम्हार ने बताया कि बारिश में सारे घड़े टूट-गल कर फिर से मिट्टी का ढेर हो गया। मिट्टी ही घड़ा बनता है। घड़ा ही मिट्टी है।
कुछ लोगों की दृष्टि सिर्फ घड़े पर (नाम-रूप पर) ही अटकी हुई है। और घड़े की खूबसूरती से वो आकृष्ट भी होता है। ये घड़ा सुंदर है। ये इतना सुंदर नहीं है। घड़े के बाहरी रूप को देखकर आकृष्ट हो जाता है। सुंदर घड़े पर मोहित होता है। लेकिन घड़े की दृष्टि से देखो तो -सुंदर और बदसूरत दोनों घड़ा टूटने वाला है। घड़ा नित्य है क्या ? आपकी दृष्टि जब रूप पर टिकी होती है -तब आप मोहित हो जाते हो। और रूप से चिपक जाते हो।
लेकिन ज्ञानी भी उसी घड़े को देख रहा है -लेकिन उसको दीखता क्या है ? मिट्टी ! प्रश्न ये है कि आपकी दृष्टि कहाँ पर टिकी हुई है? अविवेकी में 2mm की चर्म को देखने वाली दृष्टि हो, तब आप किसी घड़े को सुंदर , किसी को बदसूरत कहोगे। ये पुरुष है ये स्त्री है !
3. नित्य-अनित्य विवेक नहीं है ? स्थूल शरीर से चिपकना प्रेम नहीं राग है !
शरीर घड़ा है मिट्टी सत्य है। लेकिन हम इस घड़े के रंगरूप से हम मोहित हो जाते है , फिर चिपकने वाली बीमारी। और उस चिपकने को लोग प्रेम समझते हैं। शरीर या रूप में आसक्ति तो मोह है , राग है। ये प्रेम नहीं है। अज्ञानी रूप को देखेगा और कहेगा -ये सुंदर है -ये कम सुंदर है! कोई भी रूप नित्य है क्या? ये शरीर बुलबुला के समान , घड़े के समान है कभी भी टूट सकता है। विवेकी या ज्ञानी की दृष्टि रूप में अटकी नहीं होती। उसकी दृष्टि ईश्वर पर ही होती है। उसे हर नाम-रूप के भीतर और पीछे ईश्वर ही दीख रहा है, जैसे मिट्टी ही घड़े के रूप में दिख रहा था। (10:05)
4. ईश्वर ही है - यह विश्व-प्रपंच अविवेक में होता हुआ सा दीखता है :
जीव जगत सब ईश्वर ही है, तो यहाँ होना क्या है ? परम् सत्य यह है कि विश्व प्रपंच में हम जो भी रूप देख रहे हैं , सब ईश्वर से ही बना हुआ है। अज्ञान में कहेंगे कि घड़ा , सुराही , कपटी है -लोटा है। ज्ञानी को सब मिट्टी ही दिखेगा। मिट्टी नित्य है -घड़ा , सुराही , लोटा अनित्य है। घड़ा-सुराही का रूप बनता है , टूटता है , लेकिन मिट्टी को कुछ होता है क्या ? मिट्टी ही उन रूपों को धारण करता है , और उसको नष्ट भी करता है। नाम-रूपों का बनना और टूट जाना ,बनना और टूट जाना, बनना और टूट जाना,नाम-रूपों का बनना और टूट जाना -ये महाद्भुतम् ! ईश्वर ही इन सारे बुलबुलों के रूपों में हमको दिख रहा है। रूप बन रहा है , टूट रहा है ,बन रहा है , टूट रहा है। सच्चाई ये है कि कुछ भी नहीं हो रहा है -यहांपर। परम् सत्य ये है कि कुछ भी नहीं हो रहा है। जब ईश्वर ही सब है -तो होना क्या है ? ईश्वर से अतिरिक्त कुछ हैं नहीं -तो होना क्या है ? कुछ भी नहीं हो रहा है। हमको अज्ञान में होता हुआ सा प्रतीत होता है।
5. 'काम' एक विकृति है, ये क्यों आती है ?
ईश्वर ही जीव और जगत बन गया है। अविवेक में दृष्टि शरीर (घड़े) पर होगी, विवेक में ईश्वर (मिट्टी) पर। जगत (नाम-रूपों) की शरीर-केंद्रित दृष्टि से नहीं, ईश्वर-केंद्रित दृष्टि से देखो। नाम-रूपों के प्रति हमारी दो दृष्टि हो सकती है। अज्ञान में हमारी दृष्टि स्थूल रूपों (घड़े) पर टिकी हुई है। ज्ञान में हमारी दृष्टि ईश्वर (मिट्टी) पर टिकी हुई होती है। जब दृष्टि स्थूल शरीरों पर टिकी हुई है , तब हमारा व्यवहार एक प्रकार का होता है। मन में सारी विकृतियां (राग-आसक्ति -मोह या घृणा) उसी से उत्पन्न होती हैं। जब हमारी दृष्टि शरीर केंद्रित होती हैं, मन में सारी विकृतियाँ उसी से उत्पन्न होती हैं। काम ,क्रोध, लोभ, मद-मोह -मात्सर्य ,सारी विकृतियाँ उसी से उतपन्न होती हैं। 'काम' एक विकृति है। ये क्यों आती है ? काम-लोभ -यश रूपी विकृति या ऐषणा तभी उत्पन्न होता है , जब हमारी दृष्टि शरीर-केंद्रित होती है। (12:24) क्योंकि जब शरीर केंद्रित दृष्टि होगी -तभी आप कहेंगे कि ये M/F है - ये पुरुष है ये स्त्री है। तब मन में सब प्रकार की विकृतियां आती हैं। जब हम ईश्वर को शरीर केंद्रित दृष्टि, स्त्री-पुरुष देखते हैं उस वक्त क्या हम अज्ञान में बंध नहीं जाते है ? [नारद का माया दर्शन नहीं हो रहस्य ?] और वही दृष्टि जब ईश्वर केंद्रित होती है- फिर विकृतियाँ आ सकती हैं क्या ? आप देख रहे हैं उसी रूप को , लेकिन अब आपकी दृष्टि उस बाह्य स्थूल शरीर को नहीं देख रही , कहीं और-आत्मा या ईश्वर में टिकी है। तब मन में कोई विकृति आ सकती है क्या ?
6. पाठचक्र- स्वाध्याय-शिविर का अंतिम उद्देश्य है 'राम-केन्द्रित दृष्टि' को जगाना :
जहाँ काम होगा वहाँ राम नहीं होगा : This is matter to be experienced !इसको practice करके देखिये। यह अनुभव करने योग्य बात है, पर चिपकियेगा नहीं !जहाँ दृष्टि ईश्वर (कारण-शरीर अव्यक्त नाम्नी परमेश शक्ति, ज्ञानदायिनी माँ सारदा) में टिकी हुई है; अथवा जहाँ दृष्टि राम में टिकी हुई है वहाँ काम नहीं आ सकता !यही मुक्ति है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -
जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम ।
तुलसी कबहूँ होत नहिं, रवि रजनी इक ठाम ।।
सभी महापुरुषों की वाणी एक समान होती है। प्रश्न ये है कि आपकी दृष्टि कहाँ पर टिकी हुई है ? जब तक आपकी दृष्टि शरीर केन्द्रित होगी , तब तक उस दृष्टि में काम ही होगा। आप उस शरीर में चिपकने से बच नहीं सकते हो। लेकिन आपकी दृष्टि यदि राम-केन्द्रित हो , तो काम रूपी विकृति से हमारा अन्तःकरण मुक्त होता है। यही मुक्ति का लक्षणहै !
इस विवेक-चर्चा का अंतिम निर्णय है इस 'राम केंद्रित दृष्टि' को जगाना, इस ईश्वर-दृष्टि को जगाना। इस पूरे विगत के 23 सत्रों में विवेक-चूड़ामणि शास्त्र चर्चा के माध्यम से उस ईश्वर दृष्टि को जगाने का ही यह प्रयास चल रहा था। लेकिन यह स्वाध्याय निरंतर चलता रहना चाहिए। (14:00) इस राम केन्द्रित दृष्टि को अपने जीवन में धारण करने के उद्देश्य से ही प्रतिदिन स्वाध्याय करना चाहिए। इसे केवल कुछ खास दिनों के लिए छोड़ना नहीं चाहिए। बल्कि आज से ही बहुत सावधानी पूर्वक दैनंदिन जीवन का सारा व्यवहार हमें अपने इस 'राम'-केन्द्रित दृष्टि या 'ईश्वर'-केंद्रित दृष्टि ('अल्ला' केंद्रित दृष्टि) को जाग्रत रखते हुएकरने का अभ्यास शुरू कर देना चाहिए।जब तक हम देह-दृष्टि में प्रतिष्ठित हैं, तब तक हमारा व्यवहार एक प्रकार का (चिपकने वाला ?) होगा। और यदि ईश्वर दृष्टि में प्रतिष्ठित हो तो आपका व्यवहार बिल्कुल ही भिन्न प्रकार का होगा। वो अलग प्रकार का व्यवहार ही है। यदि हम जीव-जगत को ईश्वर-दृष्टि ,अल्ला-दृष्टि' 'राम-दृष्टि से देखने के अभ्यास (आदत -प्रवृत्ति) में प्रतिष्ठित हैं तो हमारा व्यवहार दूसरे प्रकार का होगा। अर्थात हमारी आदत या प्रवृत्ति ही राम-ज्ञान सेईश्वर-ज्ञान से,अल्ला-ज्ञान से या शिव ज्ञान से जीव सेवा करने की हो जाएगी।
7.ईश्वर- केंद्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाना ही मुक्ति (अविचलता) है :
अब आप अपरोक्ष ज्ञान (विवेकज-ज्ञान) का 'Practical Application' (व्यावहारिक अनुप्रयोग)देख लीजिये। शिविर-समापन के बाद,या साप्ताहिक पाठचक्र के बाद अब यहाँ से आपको जाना कहाँ है ? आपको अपने उसी परिवार के बीच जाना है। अपने परिवार के सभी सदस्यों को, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री पत्नी, सबको शरीर-केंद्रित दृष्टि से नहीं देख कर ईश्वर -केंद्रित दृष्टि से देखने की आदत बना लेनी होगी, प्रवृत्ति बना लेनी है। अपनी देह-केंद्रित दृष्टि को राम-केन्द्रित दृष्टि में बदल लेने को ही त्याग कहते हैं।(14:29) यही त्याग है। त्याग का अर्थ दृष्टि को बदलना है -देह केंद्रित दृष्टि का त्याग करके ईश्वर केंद्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित होना है। यही मुक्ति है। सम्पूर्ण गीता में इसी त्याग की बात कही गयी है।
अब चलो इस त्याग और वैराग्य के तात्पर्य को समझने का प्रयास करते हैं ।त्याग का मतलब क्या आपको घर-गृहस्थी छोड़ देना है ? नहीं ! अपरोक्षानुभूति होने के बाद आपने क्या छोड़ दिया ? विवेक दृष्टि जाग जाने पर आपसे क्या छूट गया ? आपने उस देह-दृष्टि का त्याग कर दिया ! आपने अब मनुष्य को M/F की शरीर दृष्टि से देखना छोड़ दिया- देहदृष्टि को छोड़ देना ही त्याग है ! 'त्याग' शब्द सुनकर लोग डर जाते हैं। आपको घर-गृहस्थी से कहीं भागना नहीं है। ऐसा नहीं है कि आपको घर-गृहस्थी छोड़ के कहीं जंगल में भाग जाना हो। क्या छोड़ना है ? गलत दृष्टि को छोड़ना है। यह शरीर-केंद्रित जो दृष्टि है उसको छोड़कर के ईश्वर-केंद्रित दृष्टि का अवलम्बन करना है। पुनः-पुनः अभ्यास के द्वारा राम-दृष्टि में प्रतिष्ठित रहने की आदत बना लेनी है, उसकी प्रवृत्ति बना लेनी है।यही त्याग है। जब देह-केंद्रित दृष्टि को हम छोड़ देते हैं , तो उससे सम्बंधित जितनी विकृतियाँ हैं , जितनी बीमारियाँ है - वह सब अपने-आप ही छूट जाती हैं। और जब कोई मनुष्य स्वाभाविक रूप से ईश्वर-केन्द्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाता है , तो उससे सम्बन्धित उसके जितने व्यवहार होंगे -उसी में सुख है , उसी में परमानन्द है, उसी में मुक्ति है। उसी में तृप्ति है। उसी में पूर्णता (अविचलता ?) है। (15:31) और तब ईश्वर से सम्बन्धित जितने (24) गुण हैं , वो हम प्राप्त कर लेते हैं ! लेकिन शरीर केन्द्रित दृष्टि हो तब शरीर से सबंधित जितनी बीमारियाँ हैं, जितनी विकृतियाँ हैं , हम उस बीमारी में ही ग्रस्त रहते हैं। हम अपने -पराये के भ्रम में जलते रहते हैं। तो देखिये ये दो दृष्टि (नजर) से जगत को देखने की बात है।
इस प्रकार त्याग क्या है ? ये जो देह-केंद्रित हमारी जो दृष्टि है उससे ऊपर उठना, और ईश्वर-केंद्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित होना यही त्याग है। (ठाकुर कहते थे गीता को उलट कर तागी कर दो -त्याग ही गीता की शिक्षा है।) लेकिन प्रचलित शिक्षा-व्यवस्था में इस दृष्टि -परिवर्तन के अभ्यास द्वारा चिरत्र-निर्माण और जीवन गठन की शिक्षा नहीं दी जाती है। इसीलिए 'त्याग' की बात सुनकर लोग डर जाते हैं। सोंचने लगते हैं -अभी क्या मैं अपने माँ -बाप को छोड़ दूँ ? अब कोई पति है , तो वो अपनी पत्नी को छोड़ देगा ? त्याग का ऐसा अर्थ नहीं है। या कोई पत्नी है -तो क्या वो अपने पति को छोड़कर कहीं भाग जायेगी ? ऐसा नहीं करना है। त्याग का अर्थ दृष्टि को बदलना है। अब पति के लिए पत्नी को देखने की कोई देह-केन्द्रित दृष्टि नहीं होगी , ईश्वर-केंद्रित दृष्टि होगी। और पत्नी के लिए भी पति के प्रति राम-केंद्रित दृष्टि होगी। उसी प्रकार हमारे, माता-पिता , भाई-बहन और बच्चे। पुत्र -पुत्री, नाती-पोता, सगे-सम्बन्धी, सहकर्मी या सेवाकर्मी सभी के प्रति जब आपकी ईश्वर-दृष्टि होगी तो आपका व्यवहार कैसा होगा ? अब आपके व्यवहार में अब काम रूपी सभी विकृतियों का अभाव ही होगा। और उसमें परमानन्द होगा ! (16:42)
8. ईश्वर -केंद्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाने का मापदण्ड : राम या काम ?
जो व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी ईश्वर-केंद्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाता है, उसका तो गृहस्थ जीवन जो है-वही अपने आप में आश्रम बन जाता है। तो देखिये शंकराचार्य जी यहाँ गृहस्थाश्रम की बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फरामकृष्ण-आश्रम है , दृष्टि बदल जाने से अपना घर ही आश्रम बन जाता है। जब ईश्वर-केंद्रित हमारा जीवन होता है , तो हमारा घर ही आश्रम बन जाता है। वही है गृहस्थाश्रम ! त्याग की महिमा को समझ रहे हैं ? त्याग का मतलब कहीं भागना नहीं है। स्थूल शरीर के स्तर पर-वेशभूषा, आहार-विहार में कुछ परिवर्तन नहीं करना है , लेकिन जब आप ईश्वर-दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाओगे तो आपकी पहचान क्या होगी ?
ये प्रश्न उठ सकता है किहमारी दृष्टि ईश्वर-केंद्रीत हो गयी है नहीं ? -इसका मापदण्ड क्या हो सकता है ? वैसे तो मैं अपने मन ही मन में सोंच सकता हूँ कि हाँ मुझे तो अपरोक्षानुभूति हो गयी है, और मेरी दृष्टि तो हमेशा ईश्वर-केन्द्रित ही रहेगी। लेकिन आपकी ईश्वर-केंद्रित दृष्टि हुई या नहीं -इस बात को कैसे परखेंगे आप ? इस ईश्वर-केंद्रित दृष्टि का मापदण्ड क्या हो सकता है? (17:32) उसका माप दण्ड यह है कि उस व्यक्ति के अंदर अब काम रूपी विकृति जो है -वह कम होती जाएगी, और धीरे-धीरे घटती जाएगी। ये उसका मापदण्ड है। आपकी दृष्टि जितना ईश्वर केंद्रित होगा , वहाँ पर फिर कामरूपी विकृति जो है वो काम नहीं कर सकता। यही राम-केंद्रित दृष्टि का मापदण्ड है। क्योंकि जहाँ ईश्वर है , जहाँ राम है -ये काम असम्भव है। ये दोनों एक दूसरे को मार देते हैं। (चाहे राम रहेंगे या काम रहेगा !) और जहाँ कोई (साधक होकर भी) कामाग्नि में जल रहा है, आप यदि काम अग्नि में डूबे हुए हो, वहां राम दूर-दूर तक नजर नहीं आयेंगे -असम्भव ! इन दो चीजों का एक साथ रहना असम्भव है। समझ रहे हो ? क्यों ? हमारी संस्कृति में (जगतगुरु श्रीरामकृष्ण -नरेन्द्रनाथ दत्त परम्परा में) परमहंस रामकृष्ण देव के उपदेशों को (श्रीरामकृष्ण वचनामृत को) जब आप पढ़ेंगे तो देखेंगेपरमहंस रामकृष्णदेव हर पन्ने पर-काम का त्याग, काम का त्याग ,हर पन्ने पर कहते हैं,काम का त्याग- ही त्याग है। काम का त्याग ही त्याग है !
9. काम का त्याग ईश्वर की कृपा से ही होता है : लेकिन काम का त्याग क्या इतनी आसानी से होगा ? कौन कर सकता है ? (हाथ ऊपर करके) वो ईश्वर की कृपा से ही होता है। जब ईश्वर की कृपा से , इस पगली माई की कृपा से, (ज्ञानदायिनी माँ सारदाकुष्माण्डा माता की कृपा से) जब हमारी बुद्धि ईश्वर-दृष्टि में प्रतिष्ठित लगती है , तब धीरे धीरे हम काम से ऊपर उठना शुरू करते हैं। हो सकता है -हम कई बार गिर जाएँ ! पर कोई बात नहीं -ये एक दिन में सफल नहीं होने वाला है। हम कई बार विफल हो जाएँ -कोई बात नहीं। लेकिन ये प्रक्रिया चलनी चाहिए। कोई भी मनुष्य एक दिन में Perfect नहीं होता।
लेकिन काम से ऊपर उठने का मार्ग यही है - देह-केंद्रित दृष्टि को ईश्वर-केंद्रित दृष्टि में बदलने का अभ्यास करते रहना। कामाग्नि में गिरना यानि उस गड्ढे में गिरना , जिसका तल है ही नहीं। उस कामाग्नि में व्यक्ति जल जायेगा, उसका जीवन खत्म हो जायेगा। लेकिन कहीं भी हम पहुँचेंगे नहीं ! और इस शरीर दृष्टि से ऊपर उठने का मार्ग क्या है ? दृष्टि देह से हटाकर के ईश्वर-केंद्रित -दृष्टि को लाना। स्थूल शरीर के भीतर और पीछे अंदर झाँक कर देखिये , थोड़ा सा गहराई से देखने का अभ्यास कीजिये। तो आपको दिखाई देगा -इस स्थूल शरीर के अंदर -ईश्वर (त्रिगुणात्मिका माया के त्रिगुणों में से कोई एक गुण-रजोगुण ?) ही तो बैठे हुए है!
उस ईश्वर में दृष्टि को केन्द्रीभूत करके जब आप व्यवहार करोगे , तो आप सभी प्रकार की शारीरिक-मानसिक समस्याओं से आप बच जाओगे। उससे जो आनन्द होगा, आप अभी उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। स्वभाव से ही आप तृप्त रहोगे , स्वभाव से ही आप आनंदित रहोगे। हर समय अन्तःकरण में एक पूर्णता (अविचलता) की भाव होगी। आपको कुछ करना नहीं पड़ेगा। बड़ा अद्भुत दृष्टि है।
10. दो प्रकार की दृष्टि का फल या परिणाम -
सभी महापुरुष आपको पूर्ण सन्तुष्ट और आनन्द में क्यों दीखते हैं ? आप इन महापुरुषों के चित्र को ही देखो न ! इस विवेक-चूड़ामणि ग्रन्थ को पढ़ते वक्त इन महापुरुषों को सोंच लेना चाहिए। ये ऐसे क्यों हैं ? (20:02) सभी महापुरुषों की दृष्टि शरीर में नहीं, शरीर के भीतर और पीछे ईश्वर में प्रतिष्ठित रहती है।अच्छा हम ऐसे क्यों हैं ? समझ रहे हो? हम ऐसे क्यों हैं ? और ये महापुरुष ऐसे क्यों हैं ? क्या उनके दो हाथ दो पैर नहीं हैं ? हमारे भी तो दो हाथ दो पैर ही हैं ! है कि नहीं ? लेकिन क्या अन्तर है ? उनके अन्दर ये कोई भी विकृतियाँ (काम,क्रोध,लोभ,मोह, मद और मात्सर्य में से एक भी विकृति) नहीं हैं। क्यों नहीं है ? वे कहाँ प्रतिष्ठित हैं ? वे ईश्वर में प्रतिष्ठित हैं ! वे ईश्वर में (अपने सत्यस्वरूप में) प्रतिष्ठित हैं। हमारे अन्दर ये विकृतियाँ भरी हुई हैं। क्यों ? हम शरीर में प्रतिष्ठित हैं। हम उस शरीर में प्रतिष्ठित हैं जो अनित्य है मिथ्या है !
11. नेता के प्रेमस्वरुप होने का रहस्य :
तो इन दो प्रकार की दृष्टि के फल को समझ लेने के बाद अंतिम निर्णय यह है कि, ये जो भी नाम और रूप हमको दिखाई दे रहे हैं , इन सभी नाम-रूपों में एक ईश्वर ही है। जो इतने रूपों में खेल रही है। एक नारायण ही हैं -जो इतने रूपों में खेल रही है। ये नारायण का खेल चल रहा है -ऐसा देखिये। ये नारायण प्रभु परमेश्वर का खेल चल रहा है। जीवन-मृत्यु रूप खेल ,सृष्टि-स्थिति -प्रलय रूपी खेल, सुख-दुःख रूपी खेल , ईश्वर ही सभी रूपों में यहाँ पर है। कितनी सुन्दर दृष्टि है ये सभी भक्तों की और ज्ञानियों की दृष्टि है। वे महापुरुष इसी प्रकार की दृष्टि से जगत कोदेखते हैं। इस प्रकार की दृष्टि वाले किसी व्यक्ति मन जो है -या ह्रदय जो है वो प्रेम से भरा हुआ होता है। क्योंकि ज्ञानी और भक्त सर्वत्र एक ईश्वर को ही देख रहा है। यही प्रेम का रहस्य है! यही तो प्यार है! This is what is love ! you understand ? Which is completely based on the body ideas, the Gender ideas, is that love ? That is pure attachment! That is pure darkness ! समझ रहे हो?
12. देह-दृष्टि फिर न लौटे - इसलिए चिपकना सख्त मना है :
लेकिन जो दृष्टि पूरी तरह से शरीर-केंद्रित और लिंग के विचारों पर आधारित हो, क्या वो प्यार है? वो शुद्ध आसक्ति है! वो शुद्ध अंधकार है! उससे सावधान रहो। तुम्हें सावधान रहना ही होगा! Be careful about that .You have to Be Careful !(-and Make others Careful )! तो वो जो attachment है , वो आसक्ति है, उसी आसक्ति से बचना चाहिए। यह बात- "चिपकना मना है", इस समय सुनने में थोड़ा अच्छा लग रहा होगा। लेकिन इसको अपने चिंतन-और व्यवहार में अपना लेना -बहुत बड़ी बात है। सबसे बड़ी बात है।It has to be taken very seriously! इसे बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए ! तो Ultimately या अन्त में आप देखोगे ; व्यवहार में जब हम इस आचरण को उतारने का अभ्यास करेंगे , उस समय हमें इस बात की सावधानी बरतनी है , की चिपकना सख्त मना है-Sticking is strictly prohibited ! क्योंकि Sticking होती क्यों है ? जब हमारी दृष्टि शरीर केंद्रित होती है ,तभी इस Sticking के भँवर में हम फँस जाते हैं।ईश्वर केंद्रित हमारी दृष्टि होगी तो , आप इस Sticking रूपी बीमारी से ऊपर उठ जाते हो। तब आप Non stick हो जाते हो। Non stick pan होता है न ? जिसमें आप कुछ भी डालो कुछ नहीं चिपकता। तब हमलोग वैसा हो जायेंगे। ये कुछ व्यावहारिक बातें अपरोक्षानुभूति से जुड़ी हुई थीं !
13. ईश्वर -केंद्रित दृष्टि (आत्मा) में प्रतिष्ठित होने फल :
जैसे ये दृष्टि तब आती है जब आपको पता होता है कि आप आत्मा हो। अगर किसी Student को पता होता है कि वो आत्मा है ;तो और भी बेहतरीन Student बनेगा ! किसी डॉक्टर को यदि पता हो कि वो आत्मा है -तो वह और भी हजारगुना ज्यादा बेहतरीन डॉक्टर बनेगा। कोई लॉयर या इंजीनियर है , आप जिस किसी भी प्रोफेसन में हो और अगर आपको पता हो गया कि आप आत्मा हो , आप यदि एक बार ईश्वर-केंद्रित दृष्टि में प्रतिष्ठित हो गए, तो आपके अंदर जो क्षमतायें हैं , वो 1000 गुना और भी बढ़ जायेंगी। ऐसा क्यों होता है ? एक Student की ही बात लेते हैं। Student की दृष्टि अगर ईश्वर-केंद्रित हो , या फिर उसकी दृष्टि अगर देह -केंद्रित हो ? अगर Student अपने को सिर्फ एक शरीर बोलकर ही जानेगा , तो शरीर से सम्बन्धित जितनी काम की विकृतियाँ हैं , उसके मन में उठता ही रहेगा। उस छात्र की पढाई में सबसे बड़ी बाधा यह काम की विकृति ही है। कोई शक ? (23:52)
14. छात्रों का मन एकाग्र क्यों नहीं होता ?
क्या यह विचारणीय विषय नहीं है? बच्चे प्रश्न करते हैं - मन एकाग्र क्यों नहीं होता ? गार्जियन बता नहीं पाते कि पढाई की ओर ध्यान क्यों नहीं जाता है ? ध्यान पढ़ाई पर क्यों नहीं जाता ? इस काम-विकृति के कारण ही Student- छात्र-छात्रायें पढ़ नहीं पाते हैं अपने मन को पढाई पर focus नहीं कर पाते हैं , मन को एकाग्र नहीं कर पाते हैं। यह एक गहन मनोविज्ञान है। It is a profound psychology!Is this not a point to ponder ? (24:09) क्यों जायेगा ? क्योंकि मन का तो अपहरण हो गया।Because the mind has been kidnapped ! मन का अपहरण किसने किया है ? काम ने किया है ! ये सच्चाई है कि नहीं ? बताइये मुझे ? युवा पीढ़ी की कितनी बड़ी सच्चाई है ? काम रूपी राक्षस के द्वारा उसके मन का अपहरण हो गया है। और काम रूपी राक्षस तब तक काम करेगा , जब तक आपकी दृष्टि देह केंद्रित है। जब तक आप सिर्फ स्त्री-पुरुष,स्त्री-पुरुष ,स्त्री-पुरुष ,स्त्री-पुरुष , देखते रहते हैं ,तब तक तो आप इस काम रूपी राक्षस से बच नहीं सकते हो ! समझ रहे हो ? और वही Student उसके अंदर अगर यह बुद्धि आ जाती है कि मैं यह शरीर नहीं -वो आत्मा हूँ ? वो ईश्वर-दृष्टि आ जाती है , तब काम की विकृति या तो शुरुआत में कम होने लगेगी या धीरे-धीरे वो काम पूरी तरह से शांत हो जाएगी। अब बताओ उसके पढाई ने क्या बाधा आ सकती है ? (25 :00) Will there be any any obstacle in the study of that student ? क्या अब उस छात्र की पढ़ाई में कोई बाधा आएगी? उसका मन कितना एकाग्र होगा ? समझ रहे हो ?
इसी प्रकार अब कोई डॉक्टर है , उस डॉक्टर की दृष्टि अगर देह केंद्रित हो अपने आप को देह समझ रहा हो ? तो वह डॉक्टर कभी भी निःस्वार्थ नहीं हो सकता। वो डॉक्टरी कर क्यों रहा है ? वो डॉक्टरी कर रहा है तो सिर्फ धन अर्जन करने के लिए। वो लूटेगा रोगी को। वैसे बहुत से अच्छे -अच्छे डॉक्टर्स भी हैं। लेकिन Generally - जो Medical Professional होते हैं - हम जानते हैं , इस क्षेत्र में कितना लूट चलता है। निर्दय होकर के गरीबों का खून चूस लेते हैं। जरा सी भी दया नहीं है ? कि भाई सामने वाला मरीज के पास पैसा नहीं है ; उसको भी Exploit करते हैं , गरीबों का भी शोषण करते हैं। पैसा नहीं है - तो सोना-चाँदी का गहना रखवाकर ईलाज करेगा। उसको क्या क्या test करने बोलेगा ? क्यों ऐसा होता है ? मैं शरीर हूँ और ये सब कुछ मेरा स्वार्थ है। अब उसी डॉक्टर के अंदर अगर आत्मदृष्टि हो , ईश्वर दृष्टि हो तो वो रोगी के अंदर भी नारायण देखता है , ईश्वर देखता है। तब वह किस प्रकार डॉक्टर होगा ? He will be the best Doctor, He will be able to deliver the best .Is it not ? वह सबसे अच्छा डॉक्टर होगा, वह सबसे अच्छा इलाज करने में सक्षम होगा। क्या ऐसा नहीं है?
See the practical application of this truth ! इस सत्य का व्यावहारिक अनुप्रयोग देखें। सत्य दृष्टि में , आत्मदृष्टि में , ईश्वर दृष्टि में केंद्रित रहने से आपका Profession जो भी हो , You will be the best , you will be excellent in that field .आप सर्वश्रेष्ठ होंगे, आप उस क्षेत्र में सबसे उत्कृष्ट होंगे। और मिथ्या दृष्टि में आपकी शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं। सीमित हो जाती है। आप स्वार्थी हो जाते हो। सबकुछ संकुचित हो जाता है। और जब आत्मदृष्टि आती है , उस दृष्टि में आपकी सम्भावनाओं और योग्यताओं की कोई सीमा नहीं है। ये इस अपरोक्षानुभिति का, वेदांत का व्यवहारिक उपयोग है। Is this not the point to ponder ? क्या यह विचारणीय बिन्दु नहीं है? ये सब आपको अपने दैनन्दिन जीवन में परख कर के देखना होगा। ऐसी आत्मदृष्टि रहने से मेरा अपना जीवन कितना सुंदर हो जायेगा ! और क्या ? अब आप जा सकते हो। सब शिक्षा तो पूरी हो गयी न ?(27:00)
15.सनातन हिन्दू जीवन-पद्धति का वर्णाश्रम धर्म :
अच्छा शरीर-केंद्रित दृष्टि के परिणाम स्वरुप उत्पन्न आसक्ति या राग के विषय में एक कहानी बाकि है। 'चिपकना मना है' के चेतावनी वाक्य के ऊपर ही पुराणों की यह कहानी आधारित है। Sticking is strictly prohibited! चिपकना सख्त मना है ! क्योंकि Sticking is that what kills us . क्योंकि चिपकना ही वह चीज है जो हमें (सत्य दृष्टि को राम -दृष्टि को) मार देती है। तो आदमी जब चिपक जाता है , तो कैसे बंध जाता है। ये हमने समझा कि एक बुलबुला जब दूसरे बुलबुले से चिपक जाता है -तो उसका अंजाम क्या क्या हो सकता है। और इस चिपकने की बीमारी के जड़ में सिर्फ अज्ञान ही है , अविवेक ही है और कुछ नहीं है।
तो अब हमारे हिन्दू सनातन धर्म की संस्कृति में -( वर्णाश्रम धर्म में )आप लोग जानते हो कि जीवन को चार भागों में विभाजित कर दिया है। यही हमारा आदर्श जीवन था। ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम , वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम। ये परम्परा हमारे देश में अनादिकाल से चल रहा है। अभी पिछले 100 -150 सालों में ही यह बंद हुआ है। जब से पाश्चात्य संस्कृति यहाँ घुस गयी है, तब से ये सब विचार हमसे छूट गयी हैं। हमारी जो एक आदर्श जीवनशैली थी , उसको हमने हटा दिया और पाश्चात्य संस्कृति हमने अपना लिया। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति को हमने अपना लिया, इसलिए आज के बच्चों को ये सब आदर्श-जीवनशैली के बारे में कुछ भी पता नहीं है। इसमें उनका दोष नहीं है , हमने एक ऐसे system को अपना लिया है, इसीलिए भावी पीढ़ी को अपनी आदर्श संस्कृति के विषय में कुछ पता ही नहीं है। (29:00)
हम सिर्फ नाम के हिन्दू ही रह गए हैं। This is another big irony. ये एक दूसरी बड़ी विडंबना (irony) याअदृष्टविधानहै। आप देखोगे 99 % हिन्दुओं को ये पता ही नहीं है कि हिन्दू धर्म क्या है ? हमें अपने धर्म के सिद्धान्तों के विषय में कुछ भी पता नहीं है, यही इसका सबसे दुखद पहलू है। ये सच्चाई है कि नहीं ? We have no idea , that is the saddest part of it . और आज के बच्चे ऐसे बड़े हो रहे हैं , कि वे लोग हिन्दू विरोधी हो रहे हैं। ये सबसे खतरनाक चीज है , क्योंकि पाश्चात्य शिक्षा ने उनका Brainwash कर दिया है, उनकी बुद्धि भ्र्ष्ट कर दी है। उनको पट्टी पढ़ा दी है। उनको अपने ग्रंथों के बारे में कुछ भी पता नहीं है , क्योंकि उनका जबरदस्ती मतपरिवर्तन कर दिया है। अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति और पाश्चात्य विचारधारा से बच्चों का इस प्रकार से Brainwash कर दिया है , वे हिन्दू विचारधारा से , हिन्दू सिद्धांतों से विद्वेष करने लगे हैं। अपने ही धर्म को तुच्छ नजरों से देखने लगते हैं। ये विडंबना है।
जो भी हो , लेकिन अनादि काल से हमारे देश की संस्कृति की जीवनशैली इस प्रकार की थी कि जीवन का चार विभाग है ! ब्रह्मचर्य आश्रम में जो प्रथम 25 वर्ष होते हैं -जीवन का वह भाग विद्या ग्रहण के लिए होता है। जिस भाग में लड़का और लड़की दोनों ही जो विद्यार्थी हैं ,वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन आप समझ रहे हैं ?काम-भोग से ऊपर। क्योंकि वह समय कामभोग के लिए नहीं है , जीवन का वो कालखण्ड सिर्फ विद्यार्जन के लिए है। एकाग्रता का अभ्यास सीखकर , एकाग्रचित्त से शिक्षण ग्रहण करे , और
हमारे यहाँ पर शिक्षण का पाठ्यक्रम कैसा होता था ? A blend of physics and spiritual science !उस प्रशिक्षण पद्धति का curriculumभौतिक-विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान का मिश्रण होता था। क्योंकि यही श्रीरामकृष्ण -नरेन्द्रनाथ हिन्दू गुरु-शिष्य परम्परा की आदर्श शिक्षण पद्धति है ! और उसमे अध्यात्मविद्या (spiritual science ,अष्टांगयोग या राजयोग का प्रशिक्षण) ही प्रधान होती थी। और भौतिक विज्ञान भी पढ़ाया जाता था। हमारे देश में ही तो सबकुछ आविष्कृत होता था। खगोल विज्ञान, भौतिकी, ज्यामिति, बीजगणित - Astronomy, Physics, Geometry, Algebra -सब तो यही से गया हुआ है ! पता है न आपको ? यह भारत ही सब ज्ञान-विज्ञान की जन्मभूमि है। The birthplace of all knowledge and science is here. बड़ा अद्भुत है भारत भूमि! इसलिए सभी युवाओं को स्वामी विवेकानन्द के 'भारतीय व्याख्यान' पुस्तक या अंग्रेजी में Lectures from Colombo to Almora' पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए। उस पुस्तक में महान भारतीय हिन्दू संस्कृति की महिमा के विषय में स्वामी विवेकानन्द इतना भावा -आवेश में आकर, इतना Passionately कहते है - ये भारतवर्ष अद्भुत है ! ये सभी ज्ञान-विज्ञान की जन्मभूमि है ! ये पुण्यभूमि है -तुम जानलो ! इस भूमि से कोई भी श्रेष्ठ भूमि इस पृथ्वी पर नहीं है। This is the greatest land and the Hindu dharma is the greatest Religion ! यह भारतवर्ष महानतम भूमि है और हिन्दू धर्म महानतम धर्म है! बाकि जितने भी धर्म हैं , वे सब केवल "distant echo, reflection of this greatest religion called Hindu Dharma" स्वामी विवेकानन्द हिन्दू धर्म को सभी धर्मों की जननी कहते हैं। Hindu Dharma is the mother of all religions ! All other religions are just distant reflections ! अन्य सभी धर्म केवल इसके दूर के प्रतिबिंब हैं। We should be proud about it !हमें इस पर गर्व होना चाहिए! भारत राष्ट्र , हिन्दू राष्ट्र , हिन्दू धर्म ! यह सर्वश्रेष्ठ है -इस पर हमें गर्व होना चाहिए। (31 :34)
जो हो , तो ये है हमारी जीवन शैली जिसमें प्रथम 25 वर्ष तक विद्या-ग्रहण (अध्यन नहीं ग्रहण) के लिए है और उसमें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। वहाँ पर बच्चों भैतिक ज्ञान के साथ आध्यात्मिक विज्ञान भी सिखाया जाता है कि देखो मनुष्य जीवन का लक्ष्य है -आत्मलाभ अर्थात ईश्वरलाभ ! विगत के 23 सत्रों में हमने जो अध्यन किया - पढ़ा ? इस बंधन से मुक्ति को प्राप्त करना परम् पुरुषार्थ है ! भवबंधन के खण्डन को परम् पुरुषार्थ क्यों कहा गया ?सभी लोग वहाँ - आत्मज्ञान तक Directly नहीं पहुँच सकते हैं !! (32:03) क्यों ? क्योंकि सभी लोग -काम से (या कामुकता Passion से) suddenly मुक्त नहीं हो सकते हैं। तो धीरे -धीरे 3H विकास की एक process है ; जिसे बता दिया गया है ; एक जीवन-गठन और चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया है -जिसका प्रशिक्षण लेना पड़ता है। (ऐषणाओं से मुक्त होने का अष्टांग मार्ग है ! जिसको स्वामी विवेकानन्द -कैप्टन सेवियर Be and Make वेदांत शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा में सीखना पड़ता है।)
16.गृहस्थ आश्रम का दर्शन क्या है?
लेकिन विद्या-अध्यन के बाद भी सभी लोग तो संन्यासी नहीं हो सकते ? संन्यासी कोई एक-दो ऐसे विरल लड़के या लड़की हो सकती है जिसके अन्दर तीव्र वैराग्य है और उतना विवेक भी है - तो हो सकता है कि वह गृहस्थ आश्रम को न अपनाकर सीधा संन्यास आश्रम में चला जाये , या चली जाये। लेकिन ये बहुत ही विरल है। तो बाकि के 99 % जो बच्चे हैं , उनको तो गृहस्थ आश्रम में जाना ही है। लेकिन गृहस्थ आश्रम में जाते समय - (बारात में दूल्हा बनते समय?) उनको भी सब कुछ पता है कि गृहस्थ आश्रम का असली Philosophy क्या है ? (32:31) गृहस्थ आश्रम कोई भोग करने का स्थान नहीं है ; लेकिन वहाँ भोग के लिए भी स्थान है। वहाँ पर भोग परम् लक्ष्य नहीं है। लेकिन भोग के लिए भी भी स्थान है। गृहस्थ आश्रम Very fine system-बहुत बढ़िया प्रणाली है, सभी भोगों के अंदर से व्यक्ति ऊपर उठ रहा है। भोग से ऊपर उठने का प्रयत्न कर रहा है। स्त्री-पुरुष एक साथ आकर के वो एक दूसरे के मददगार हैं। They are helpers of each other ! So beautiful ! स्त्री-पुरुष दोनों में मनुष्य के प्रति विवाह से पहलेदोनों की दृष्टि क्या है ?ईश्वर दृष्टि है। ना कि शरीर दृष्टि। ईश्वर को केंद्र बनाकर के, वे विवाह करते है, और एक गृहस्थी में वे प्रवेश कर जाते हैं। विवाह करके उनके सन्तान हो जाते हैं। और फिर जब संतान बड़े हो जाते हैं , अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं , तब वो जो पतिपत्नी थे -उन्होंने काम को समझ लिया। इसमें कुछ नहीं है। अब वे उस कामभोग से ऊपर उठ गए हैं। लेकिन विवाह का लक्ष्य काम से ऊपर उठना है। न की कामभोग में डूबे रहना। हमारे संस्कृति में यही सबसे बड़ा सीख है। समझ लीजिये कि पतिपत्नी का उम्र 50 -55 का होगया। बच्चे बड़े हो गए हैं। तब पुराने जमाने में वे घर को छोड़कर चले जाते थे। अभी तो वैसा करना सम्भव नहीं है। पुराने जमाने में जब पति-पत्नी की 50 -55 की हो जाती थी , बच्चे बड़े होकर अपने पैर पर खड़े हो जाते थे ; तब ये पति -पत्नी अपने घर को त्याग करके , वन में प्रस्थान कर जाते थे। ताकि पूरे समय को वे ईश्वर के ध्यान में लगा सके। देखिये ऐसा पुराने जमाने में होता था। 150-200 साल पहले तक भी ऐसा होता था। और वहाँ पतिपत्नी एक ऐसा जीवन जीते हैं , जो की पूरीतरह से ईश्वर-केंद्रित है। देह-केंद्रित जीवन से ऊपर उठकरके ईश्वर-केंद्रित उनका जीवन चल रहा है। और अगर ऐसे जीवन जीते हुए इतना ऊपर उठ जाएँ कि वे संन्यास ले लें। पर होगा अंत में। तो देखिए हमारे ऋषियों ने ऐसी एक जीवन शैली बनाई है कि जिससे स्त्री और पुरुष दोनों धीरे -धीरे इन काम बंधनों से ऊपर उठ जाएँ। हमारी वर्णाश्रम व्यवस्था धीरे-धीरे इन कामादि बंधनों से ऊपर उठने की ब्यवस्था थी। कितना सुंदर। This is the philosophy of life ! यही उस जीवन का दर्शन है, जो अपने को अपने को , अपनी अव्यक्त सम्भावनाओं को अभिव्यक्त कर लेती है। पूरे पृथ्वी में कहीं ऐसी व्यवस्था है? पूरे पृथ्वी में कहीं है ? कहीं नहीं है ! यह सिर्फ इस भारत वर्ष में ही, हिन्दू समाज में ही, इस प्रकार होता है और कहीं नहीं होता। (35:10)
17. जड़ भरत की कहानी :
अब उस पौराणिक कहानी पर आते हैं। एक राजा था , उसका नाम भरत था। उनके नाम से ही इस देश का नाम भारत है। राजा भरत पूरे साम्राज्य के राजा थे। और एक आदर्श गृहस्थ के समान उसने गृहस्थ आश्रम का पालन किया है। पतिपत्नी के साथ जब बच्चे बड़े होगये हैं। राजा भरत जब 50 -55 के हो गए तो उनके मन में आता है कि -बस ! सबकुछ देख लिया ! जो भोग था वो भी देख लिया। वो बिल्कुल निस्सार है। भोग में क्या है ? तब एक दिन ये राजा ये निश्चय कर लेते हैं -बस मैं अब अपने इस राज्य को छोड़कर के वानप्रस्थ आश्रम को स्वीकार कर रहा हूँ। सोंच कर देखिये - बड़े बड़े राजा गृहस्थ आश्रम का त्याग किया करते थे। इस देश के बड़े बड़े राजा एक समय आने पर ऐसा ही किया करते थे। अपने राज्य को त्याग करके वन में चले जाते थे। ऐसा करने के लिए कितनी बड़ी साहस की आवश्यकता है ? (36:30) Is it not ? कितना guts होना चाहिए ! जाने में कितना साहस चाहिए ? वह राजा जो महलों में रहता था , जो ऐसे मोटे -मोठे मखमली गद्दों पर सोता था ; जो सोने -चाँदी की थाली में खाता था , छप्पन भोग के पकवान खाता था , और सब प्रकार के भोगों में डूबे रहने वाले एक राजा सबकुछ छोड़कर सिर्फ एक वस्त्र में महल से निकल कर जंगल में प्रस्थान कर जाता है। What a strong resolution ! कितना दृढ़ संकल्प है! मतलब उस राजा में राज्य-भोग के प्रति कोई आसक्ति नहीं है। हमारे चर्चा का मुख्य विषय इस आसक्ति को समझना ही है। किसी व्यक्ति के अंदरअविद्या के बंधन से (स्मिता -राग-द्वेष-अभि-निवेश के बंधन से ) मुक्ति पाने के लिए कितनी दृढ़ अनासक्ति होनी चाहिए ? (37:12) हम साधारण गृहस्थों में अपने छोटे से धन-सम्पत्ति के प्रति कितनी आसक्ति होती है , कितना राग होता है ? (या षड्यंत्रकारी नाते-रिश्तेदार घर में घुस कर दो भाइयों में फूट करवा देते हैं !) इस राजा के अंदर वो आसक्ति बिल्कुल भी नहीं थी। इतने बड़े साम्राज्य को भी छोड़करके वो वन की ओर प्रस्थान कर जाता है। एक वस्त्र में ! अब राज्य से बहुत दूर एक वन में जाकर के , अब तो दूरी का कोई अर्थ ही नहीं है। उस जमाने में घर छोड़ कर वन में जाना -मतलब फिर कभी देखना होगा या नहीं ? पता नहीं ! ऐसा ही होता था। उस समय का भारत तो और भी कितना विशाल राष्ट्र था। लेकिन आज तो इसकी चौहद्दी छोटी हो गयी है। वे वन में जाकर अपने हाथों से मिट्टी की एक छोटी सी कुटिया बना लेते हैं। वह राजा जो एक राजमहल में रहता था , अब अपने हाथों से एक छोटा सा मिट्टी की कुटिया बनाता है। उस कुटिया में रहने लगता है। और खाता क्या है ? फल खाता है , कन्दमूल खाता है , शायद एक गाय है। उसके दूध से उसका काम चल जाता है। ऐसा क्यों कर रहा है ? क्योंकि सारा समय उसको अब अपने मन को ईश्वर में लगाना है। वन में जाने का जो मुख्य उद्देश्य है - 'मन को अनात्मा में जाने से खींचकर आत्मवस्तु में लगाना' (अष्टांग मार्ग से आत्मानुभूति करना?) वानप्रस्थी को वन में जाने का मुख्य उद्देश्य क्या है ? वह उद्देश्य हर समय स्पष्ट होना चाहिए। (38:27) राज्य को छोड़ा क्यों ? मन को ईश्वर में लगाने के लिए राज्य छोड़कर गया ? वन में क्यों गया ? मन को शरीर से हटाकर उस ईश्वर (आत्मा या ब्रह्म) में लगाने के लिए जो सभी के भीतर है। सभी के भीतर ईश्वर ही है न ? उस ईश्वर -दृष्टि में प्रतिष्ठित होने के लिए ही तो वानप्रस्थ आश्रम है। नहीं तो फिर हम निर्जन में कोई मौज मस्ती करने के लिए नहीं जा रहे हैं। निर्जन में जाने का मुख्य उद्देश्य है - अब सारा समय ईश्वर की उपासना करने के लिए है। अपने मन को ईश्वर में (अवतार वरिष्ठ में) केन्द्रीभूत करने के उद्देश्य से ये राजा अब अधिकतर समय , ध्यान में उपासना में मग्न रहता है , बस कन्दमूल , दूध-फल खाता है। उसी से उसके शरीर का निर्वाह होता है। अब सारा दिन ईश्वर में ध्यान लगा रहा है , देखिये संसार से कितना अनासक्त होना चाहिए ? वह राजा भरत नाम-रूपी बुलबुला दुनिया के बाकि सभी बुलबुलों से कितना अनासक्त हो गया ? वह सिर्फ समुद्र रूपी ईश्वर (या अवतारवरिष्ठ) के नाम-रूप-लीला-धाम में ही मन लगा रहा है। वह राजा रूपी बुलबुला वानप्रस्थ में जाकर दूसरे बुलबुलों से कितना अनासक्त हो गया ? राज्य (बिजनेस) भी तो एक बुलबुला है - उससे भी अनासक्त हो गया। अब उसमें कोई आसक्ति नहीं है। सारी आसक्ति सारा राग छोड़ करके ये बुलबुला अब सिर्फ समुद्र रूपी उस ईश्वर (सच्चिदानन्द , ब्रह्म , आत्मा) में ही अपने अंतःकरण को लगा रहा है। क्या सुंदर ? यही तो जीवन का लक्ष्य है। उस राजा की कुटिया के सामने से एक नदी बहती थी। उसी नदी के किनारे एकांत में बैठकर वो ध्यान करता था। एक दिन जब वो ध्यान कर रहा था , थोड़ी देर के लिए आंख खुल गयी। अचानक उसने देखा, उस नफ़ी में किसी हिरण का एक नवजात बच्चा , बह रहा है और छटपटा रहा है। अभी अभी माँ की कोख से बाहर निकला है , वैसा नवजात हिरण का बच्चा , उस नदी के प्रवाह रहा है। देखते ही राजा भरत ने पानी में छलांग लगाया , और हिरण को बचाकर बाहर निकाल लिया। और उस नवजात हिरण के बच्चे की सेवा - सुश्रुषा। करते हैं। दूध पिलाते हैं। ऐसा करके उसे बचा लेते हैं। अब हिरण की तो कोई माँ नहीं है , राजा भरत ही उसके माँ बन गए हैं। उसी हिरण के बच्चे की देखरेख में लगे रहते हैं। बहुत प्यार से उसका पालन-पोषण करते हैं। आप कल्पना कर सकते हैं -हिरण कितना आकर्षक प्राणी है। उसका चेहरा इतना सुंदर होता है कि अगर आप रूप में ही प्रतिष्ठित हो , तो आप मोहित हो जाओगे। (42:05) आप चिपक जाओगे , कहानी यही है ! आपकी दृष्टि कहाँ पर है ? इतना सुंदर निर्दोष, मासूम प्राणी दिखने वाला हिरण की ऑंखें सबसे अधिक मोहित करनेवाली हैं। हिरणी जैसी ऑंखें - उससे कोई भी मनुष्य मोहित हो जायेगा। जो भरत इतना अनासक्त हो गया था कि अपने साम्राज्य को भी छोड़ दिया था -और ईश्वर में मन को लगाने के लिए वन में चला गया था; अब उसका मन रातदिन उस हिरण के ऊपर लगा हुआ है ! ईश्वर के ऊपर नहीं , अब दृष्टि हिरण के ऊपर है। देखो कहानी बड़ा महत्वपूर्ण है -ये राजा जो अपने साम्राज्य को भी छोड़ दिया था। मतलब उसकी अनासक्ति कितनी होनी चाहिए थी ? वानप्रस्थ गमन का उसका उद्देश्य था -सारा समय ईश्वर में मन को लगाऊँगा। लेकिन अब ये दूसरा बुलबुला जो हिरण रूप बुलबुला है , उस बुलबुले में ही उसका मन अब अटका हुआ है। भरत स्वयं एक बुलबुला है , और हिरण रूपी दूसरे बुलबुले में ही उसका मन अब अटका हुआ है। देखते देखते हिरण अब बड़ा हो गया। और भी सुंदर लगता है। भरत का मन अब हिरण में ही लगा रहता है। जब भी हिरण जंगल में चला जाता है , और आने में अगर देर हो जाती है तो भरत एकदम छटपटाने लगता है। क्या हुआ हिरण को ? पता नहीं जंगल है शेर खा गया , किसी ने मार दिया ? हर समय उसके मन में अब हिरण को लेकर ही चिंता चलती है। जो भरत पहले सारा दिन ईश्वर की उपासना में लगा रहता था , अब उसके मन से ईश्वर चला गया , अब सिर्फ हिरण ही रह गया है। कुछ वर्षों बाद हिरण और बड़ा हो गया , भरत बूढ़ा हो गया। अब भरत का शरीर त्यागने का समय आ गया। उसका अंतिम समय आ गया। दृश्य बड़ा सुंदर है। भरत अपनी शैया पर सोया हुआ है , और अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है। भरत को पता है , बस मेरी कुछ सांसें ही बची हैं ! अब ये शरीर छूटने वाला है। अंतिम काल है , और उस शैया के पास हिरण भी खड़ी है। भरत हिरण की तरफ देख रहा है , हिरण भरत की तरफ देख रहा है। भरत की आँखों में आँसू है , हिरण की आँखों में भी आँसू है। हिरण भी भरत में उतना ही आसक्त है। भरत भी पूरी तरह उस हिरण में आसक्त है। भरत सोंच रहा है , मेरे मृत्यु के बाद कौन इसको देखेगा ? (44:56) इसका क्या होगा ? मैं चला जाऊँगा तो इसको कौन देखेगा ? [मेरे नाती-पोतों को कौन देखेगा ?] उसके मन में सिर्फ हिरण -चिंतन ही चल रहा है। मृत्युकाल में जहाँ पर ईश्वर चिंतन चलना चाहिए था , वहाँ इसके मन में सिर्फ हिरण चिंतन ही चल रहा है। और इस प्रकार हिरण-चिंतन करते करते वह अपने स्थूल शरीर को त्याग देता है। (45:21) अब सिद्धांत ये है कि - 'मृत्युकाल में अंतिम सोंच होगा, आपका अगला जन्म उसी प्रकार का होगा। ' मरण काल के अंतिम क्षणों में आपका जो सोंच होगा (शिवोहं-या देहो अहं ?) आपके अन्तःकरण में जैसा विचार होता है , आपका अगला जन्म वह विचार ही निर्धारित करती है। और मरते वक्त भरत हिरण-चिंतन कर रहा था। अंतःकरण में सिर्फ हिरण , हिरण ,हिरण ,हिरण ,हिरण ही था। तो क्या हुआ ? अगला जन्म उसका हिरण के शरीर में हुआ। हिरण के शरीर में उसका जन्म हुआ , ये बहुत बड़ा सिद्धान्त है। This is what happens at the end !यदि ईश्वर का नाम जिह्वा पर नहीं चल रहा हो तो ? अंत में यही होता है! इसीलिए शंकराचार्य जी कहते हैं -जन्तूनां नरजन्म दुर्लभं !
अब देखिये राजा भरत का जन्म अब हिरण के शरीर में हो गया। लेकिन भरत तो बहुत अच्छा साधक भी था न ? ऐसे जो बहुत उच्च कोटि के साधक होते हैं ; लेकिन अंतिम समय में इस प्रकार की कुछ गलती हो जाती है। इसीलिए उनको पुनर्जन्म लेना पड़ता है। और वे लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाते हैं। [महामाया का राज्य में उसकी कृपा का ही सहारा है ! आत्मबुद्ध्या शिवोहं लेकिन देह बुद्ध्या तव दासो अहं] लेकिन भरत चूँकि बहुत उच्चकोटि के साधक थे , और उन उच्च कोटि के साधकों में यह सम्भव है कि उस दूसरे शरीर में रहते हुए , भी पिछले शरीर में वे क्या थे , इसका स्मरण उन उच्च कोटि के साधकों को होता है। इसको योग की भषा में जाति-स्मरण कहते हैं। (46:46 ) जातिस्मरण माने पिछले जन्म का स्मरण होना, ये सबको नहीं होता है , लेकिन कुछ उच्च कोटि के साधकों में ये होता है। तो भरत जब हिरण के शरीर में था , तो उसको ये स्मरण था कि मैं तो भरत था , पिछले जन्म में ! मैं राजा था, सबकुछ छोड़ कर ईश्वर की खोज में , ईश्वर का चिंतन -मनन करने के लिए मैं वन में गया था। लेकिन अंतकाल में उस हिरण के साथ आसक्त होने के कारण - राग के कारण आज मैं इस हिरण की शरीर में जन्म लिया हूँ। और अब भरत को भंयकर पश्चाताप होता है - यह मैं क्या कर बैठा ? अब उसकी समस्या ये है कि हिरण के शरीर में वो कोई साधना नहीं कर सकता। इसलिए शंकराचार्यजी का सिद्धांत है -जन्तूनां नरजन्म दुर्लभं ! क्योंकि नर जन्म में ही ये साधना सम्भव है। नर जन्म में सत्य का खोज सम्भव है। (47:38) अन्य किसी दूसरे शरीर में विवेक करने की योग्यता नहीं है। हिरण के शरीर में रहकर भी भरत को पता है कि -मैं तो भरत हूँ ! लेकिन शरीर अब हिरण का है , अंदर की चेतना तो भरत की है , और उसको स्मरण है कि मैंने पिछले जन्म में ये साधना की थी। मैं ईश्वर की खोज में , सत्य की खोज में निकल पड़ा था , लेकिन एक गलती के कारण मैं अब इस हिरण रूपी शरीर के अंदर कैद हूँ ! लेकिन अभी वो साधना नहीं कर सकता क्योंकि सत्य को देखने के लिए जिस साधन की आवश्यकता है , वह उस हिरण शरीर में नहीं है। उस हिरण (पशु) के शरीर में भरत क्या करेगा ? वह प्रतीक्षा करता है। कब यह हिरण का शरीर गिरेगा ? बाहर से शरीर हिरण का है , लेकिन भीतर तो भरत है। तो अब भरत अपना समय कैसे बीतता था ? वो तो पिछले जन्म का साधक था न ? अभी भी साधक ही है , लेकिन शरीर हिरण का होने के कारण वो कुछ नहीं कर सकता। तो भरत उस हिरण के शरीर में भी जहाँ -जहाँ ऐसे आश्रम होते थे , जहाँ साधु-संन्यासी बैठकरके ईश्वर की बातें , वेदांत की बातें करते थे , वहाँ जाकर बैठकर वो उन बातों को श्रवण करता था। उन साधुओं को तो हिरण लगेगा , लेकिन ये तो भरत है। और अच्छा साधक है , तो उसकी आदत -प्रवृत्ति यही है कि ईश्वर की बातें सुनने की। तो वो आश्रमों में जाकर साधुओं के पास बैठकर वेदांत-ब्रह्म और आत्मा का श्रवण करता है। हिरण शरीर की आयु वो आश्रमों में रहकर बिता देता है। और हिरण शरीर भी गिर जाता है। अब दुबारा उसका जन्म होता है -ब्राह्मण मनुष्य के शरीर में। अच्छे परिवार में जन्म होता है। इस जन्म में वो बचपन से ही अपना मुख नहीं खोलता है। बचपन से ही बात नहीं करता है। उसके मातापिता समझते हैं कि शायद ये गूँगा है ? साधारणतया बच्चे दो-तीन वर्ष में बोलना शुरू कर देते हैं। जबकि 4-5 साल का होकर भी ये बच्चा बोलता नहीं है ? उसके माता पिता सोचते हैं जरूर गूँगा है। लेकिन भरत ऐसा क्यों है ? पता है ?भरत इस जन्म में बहुत ही सतर्क है। (50:22) कि मैं फिर किसी बुलबुले से चिपक न जाऊँ ! कहानी ऐसी है, लेकिन विषय गम्भीर है। इस कहानी के माध्यम से हमें एक बहुत बड़ा सिद्धांत बताया जा रहा है। तो भरत इस जन्म में इतना सतर्क है कि अब इस जन्म में वो कहीं फँसना नहीं चाहता। (अविद्या -अस्मिता -राग-द्वेष -अभिनिवेश में किसी भी जाल में फँसना नहीं चाहता।) एक बार फँस गया था तो उसका नतीजा देख लिया। एक गलती के कारण , पूरा एक जन्म हिरण के शरीर में बिताना पड़ा ! कहाँ तो ऐसा राजा भरत इतना अनासक्त था कि, ईश्वर (आत्मा, भगवान या सत्य) में मग्न रहने के लिए वो अपना साम्राज्य छोड़कर वन में चला गया था। लेकिन एक गलती के कारण देखिये -पूरा एक जन्म बिताना पड़ा। और कितनी यातनाओं से गुजरने के बाद उसे दुनारा ये मनुष्य शरीर मिलता है। लेकिन उस शरीर अब वो बहुत ही सचेतनता पूर्वक अपने समय को बीता रहा है , मुँह से एक शब्द नहीं बोलता चुप रहता है। तो उसके मातापिता समझते हैं कि ये मूढ़ बच्चा है -जड़ है। (practical नहीं है ?) इसलिए अब उसका नाम पड़ता है -जड़ भरत ! ये जड़ है माने ये मंद-बुद्धि है - Mentally retarded है ! लेकिन सच्चाई एक दम उल्टा है। वो परम् ज्ञानी है। लेकिन वो जान-बूझ करके अपने आप को मूढ़ की तरह प्रस्तुत कर रहा है। उसके और भी दो-तीन भाई हैं , परिवार के सभी लोग समझते हैं कि ये मूढ़ है ! किसी से बात ही नहीं करता , बस चुप्प रहता है ! बच्चा भरत बड़ा हो गया , उसके मातापिता चल बसे। उसके बड़े भाइयों का विवाह हो गया। ये जड़ भरत भी युवा हो गया देखने में बहुत सुंदर और मजबूत कदकाठी का है। सबकुछ ठीक है लेकिन बात नहीं करता है। इसलिए इससे विवाह कौन करेगा ? और वैसे इसको विवाह करना भी नहीं है। लेकिन जैसा संसार में होता है , उसके बड़े भाई और उनकी पत्नियाँ इसको बहुत यातनाएं देती हैं। घर का सारा काम उससे करवाते हैं। तो एकदिन उसके साथ बहुत बुरा सलूक करते हैं , उस दिन वो तंग होकर घर छोड़कर चला जाता है। मुँह से कोई विरोध नहीं किया। लेकिन घर से निकल जाता है और किसी पेड़ के नीचे बैठा रहता है। अब कहानी ऐसी है कि उस प्रान्त का जो राजा था , वो पालकी में आ रहा था। लकिन चौथा कहार बीमार पड़ गया। तो एक आदमी और चाहिए था। और राजा को कहीं जाना जरुरी था , तो मंत्री ने इस हट्ठे -कट्ठे युवक को वहां बैठा देखा। वो आ गया लेकिन बचपने से 20 -25 वर्ष का युवा हो जाने पर भी मुंह नहीं खोला। अब वो जड़ भरत पालकी उठाकर सीधा नहीं चल रहा है , लेकिन वो कूद कूद कर जा रहा है। तो जो पालकी में अंदर बैठा राजा को कष्ट होने लगा। भरत कूद कूद कर इसलिए जा रहा था कि पैर के नीचे जो प्राणी है -सब में उसको ईश्वर दिखाई दे रहा है। इस जन्म उसने परम् ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। सबके भीतर उसको ईश्वर दिखाई दे रहा है। अब जड़ भरत की दृष्टि कहाँ टिकी हुई है ? ईश्वर में टिकी हुई है। परम् सत्य में टिकी हुई है , इसलिए वो कूद रहा है। भीतर जो राजा बैठा था , गुस्सा होकर बोलै कौन है मूर्ख ? इसको ठीक से चलना भी नहीं आता है ? वो उससे प्रश्न करता है कि तू कौन है ? क्या तुमको चलना नहीं आता है ? बता तू कौन है ? तब उसके मुख से पहली बार उसके शब्द निकलते हैं -कि मैं कौन हूँ ? और जो वह कहता है -वह पूरा शुद्ध वेदांत है।
18. दृष्टि शरीर में नहीं ईश्वर में होनी चाहिए :
इस कहानी से हमको सीखना क्या है ? आप लोगों के सामने यही प्रश्न है। (56:46) वो राजा जब वन में गया था तब राज्य के प्रति उसके मन में कोई आसक्ति नहीं थी। कोई राग नहीं था। उतने बड़े साम्राज्य से मोह को छोड़ देना इतना आसान है ? ऐशो आराम की जिंदगी छोड़ने के लिए उसके अंदर कितना साहस रहा होगा ? वन में गया था सिर्फ ईश्वर चिंतन करने के लिए। लेकिन प्रश्न ये है -कि उस हिरण के बच्चे को बचाने लिए जड़भरत जो तुरंत नदी में छलाँग लगा दिया - वो उसने जो किया वो सही था या गलत था ? 100 % सही था। आपके सामने कोई कष्ट में है , और आप कुछ नहीं करोगे ? तबतो आप मनुष्य भी नहीं हो। उसने हिरण को बचाया यह गलती नहीं थी। गलती कहीं और थी। हिरण को बचाना , उसकी देखभाल करना , इसमें कोई गलती नहीं है। ये तो करना ही चाहिए। लेकिन गलती क्या हुई ? जब हमारी दृष्टि देह-केंद्रित हो जाती है , तो हम उस देह में आसक्त हो जाते हैं ! हम उस देह से चिपक जाते हैं। भरत ने उस हिरण के साथ जो भी किया वो सब कर सकते थे , लेकिन ईश्वर-दृष्टि से भी कर सकते थे। पूजा दृष्टि से भी कर सकते थे , तब वो फँसते नहीं। तो गलती कहाँ हुई ? वे हिरण के स्थूल शरीर से आसक्त हो गए। हिरण से चिपक गए। हिरण शरीर के बाहरी रूप को देखकर के एक बुलबुला दूसरे बुलबुले से चिपक गया। उसका परिणाम हमको देखने को मिला -अगला जन्म हिरण में हुआ। लेकिन भरत की दृष्टि अगर हिरण के प्रति ईश्वर-दृष्टि होती तो न]बाहर से उसी प्रकार सेवा -देखभाल चलता , सबकुछ और भी अच्छी तरह से कर पाता , और वो जो भी करता वो ईश्वर की पूजा होती। ये बहुत बड़ी सीख है -जीवन में हम जो भी कर रहे हैं -हम जहाँ पर हो, परिवार में हों। पति हों पत्नी हो , बच्चे हो मातापिता हो , भाई-बहन हो ? इनके प्रति हमारी दृष्टि क्या होनी चाहिए ? अगर हमलोग उनके शरीर में राग के द्वारा आसक्त हैं , तो हम चिपक जाते हैं। और अगर चिपक गए तो उसका परिणाम यही होगा। वही जन्म-मृत्यु का चक्र हमारा चलता रहेगा , आप उससे बाहर नहीं निकल सकते। वही दृष्टि अगर शरीर -केंद्रित न होकर ईश्वर केंद्रित होता है , तो आप जो भी करते हो। अपने परिवार वालों को सेवा -देखभाल सबकुछ वैसे ही करोगे , तो उसमें अब आसक्ति-राग नहीं होगी , उसमें अब प्रेम होता है। और जो सेवा प्रेम भाव से की जाती है -वो सेवा पूजा बन जाती है। वही ईश्वर की पूजा बन जाती है। ( 1:00:01) - इस कहानी से हम यह ही सीख सकते हैं। तो अंतिम निष्कर्ष क्या हुआ ? चिपकना सख्त मना है। क्योंकि एक जन्म का काम तीन जन्मों में करना पड़ा। चिपकने की वजह से तीन जन्म लग गया। नहीं तो वो पहले ही जन्म में ही हो जाता !
पहले ही जन्म में ही राजा भरत साधना में काफी आगे चले जा चुके थे। लेकिन अंत में हमलोग गलती कर बैठते हैं। तो ये सावधानी बरतने की बात है। अब इस जन्म में (दुबारा जीवन मिलने के बाद ?) हमलोग अब जो कुछ करेंगे , सब कुछ देह-दृष्टि से नहीं ईश्वर दृष्टि से , पूजा दृष्टि से भी किया जा सकता है। यही बात श्रीरामकृष्ण परम् हंस देव बहुत सुंदर ढंग से कहते हैं -शिव ज्ञान से ही सबकुछ करना। शिव ज्ञान (आत्मा -ब्रह्म ज्ञान) से ही सबकुछ कीजिये , क्योंकि वही सत्य है , बाकि सब कल्पना है। सब में आत्मा (ईश्वर) देखकरके दृष्टि शरीर में नहीं ईश्वर में होनी चाहिए। तब आप देखिएगा की काम रूपी कोई भी विकृति हमारे मन में नहीं होगी। तो आप जो भी करोगे वो ईश्वर की पूजा हो जाती है । पाठचक्र में भी क्या चल रहा है ? ये ईश्वर की पूजा ही चल रहा है। अब पूजा की भी परिभाषा बदल जाती है। यही सर्वोच्च प्रकार की पूजा है। अभी हम पूजा का मतलब क्या समझते हैं ? कुछ कर्मकाण्डी अनुष्ठान। मैं उसकी निंदा नहीं कर रहा हूँ। वो भी ठीक है। लेकिन सही पूजा है- शिव दृष्टि से जीव सेवा ! जो व्यक्ति इस दृष्टि से पूजा कर रहा है , मनुष्य बनो बनाओ आंदोलन से जुड़ा हुआ है उसे किसी और पूजा की आवश्यकता नहीं है , वो ऐसे ही मुक्त हो जायेगा।(1:01:41 ) जो व्यक्ति यह पूजा नहीं कर पाता है , उसी केलिए है कर्मकाण्डी अनुष्ठानिक पूजा। घंटा -दिया -चंवर यह पूजा भी ठीक है। वह भी एक प्रयास है -किसी प्रकार ईश्वर में मन को लगा तो रहा है ! मैं उसकी निंदा नहीं कर रहा हूँ। लेकिन सब मनुष्यों में ईश्वर को देख करके उस व्यक्ति के लिए जो कुछ भी सेवा करोगे वो फिर पूजा हो जाती है। This Is the real worship which Advaita Vedanta teaches us .(1:02:18)यही वह वास्तविक उपासना है जो अद्वैत वेदांत हमें सिखाता है।
19. अद्वैत दृष्टि या ईश्वर केंद्रित दृष्टि से जीने की कला : यत् यत् कर्म करोमि तत् तत् अखिलं हे शम्भो तव आराधनाम् - अपने दैनन्दिन जीवन की हर गतिविधि के माध्यम से ईश्वर की आराधना करें, इसी The art of living विषय पर शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक अति सुंदर श्लोक है-
जब हम ईश्वर -केन्द्रित दृष्टि से जीने की कला को सीख जाते हैं, तब क्या होता है ?-यत् यत् कर्म करोमि तत् तत्अखिलं हे शम्भो तव आराधनाम्। इस ईश्वर-केंद्रित दृष्टि से जब हम जीते हैं , तो -'यत् यत् कर्म करोमि' मैं जो कुछ भी कर्म करता हूँ -हे शम्भू ! शिवजी सब तेरी आराधना हो जाती है। यही अद्वैत दृष्टि है ! हमको दो चीजें सीखनी होंगी। जब अद्वैत दृष्टि आए जाती है, तो परम् भक्ति भी साथ-साथ आ जाती है। अद्वैत में ही परम् भक्ति होती है। अद्वैत का मतलब क्या है? ईश्वर से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। (इस ईश्वर-केंद्रित दृष्टि - या अद्वैत दृष्टि के प्राप्त हो जाने के बाद) बताइये आपके पास भक्त होने के अलावा और क्या विकल्प है ? (1:03:20) आप सहज रूप में , Naturally -भक्त हो जाओगे कि नहीं ? जब आप इस दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाते हो कि ईश्वर से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं , तो आप मुझे बताइये कि आपके पास भक्त होने के अलावा क्या विकल्प है ? कोई विकल्प है क्या ? आप भक्त ही होंगे।
इसीलिए जितने भी महापुरुष हुए हैं -सभी, अच्छा शंकराचार्यजी इतिहास के सबसे बड़े अद्वैत ज्ञानी माने जाते हैं। लेकिन वे उतने ही बड़े भक्त थे ! आप उनकी सारी रचनाओं को देखिये , सबसे बड़े अद्वैत ज्ञानी, इतिहास के सर्वश्रेष्ठ अद्वैत ज्ञानी, लेकिन सबसे बड़े भक्त हैं ! उनके द्वारा रचित -'श्री गंगा-अष्टकम', शिवा अष्टकं , अन्नपूर्णा स्त्रोत्रं, भवानी अष्टकं , एक ही ईश्वर की स्तुति वे कितने रूपों में कर रहे हैं। क्योंकि ईश्वर से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं ; वो गंगा हो -तो वो ईश्वर का रूप है। यमुना भी ईश्वर का रूप है। सबकुछ ईश्वर का रूप है , सबकी स्तुति हो रही है। परम् अद्वैत -परम भक्त। श्री रामकृष्ण परमहंस -अद्वैत , परम् अद्वैतिन हैं , परम् भक्त हैं। स्वामी विवेकानन्द परम अद्वैतिन , परम भक्त ! ये जितने ऐसे अद्वैतिन थे , उन सबकी पराकाष्ठा भक्ति में होती है। क्यों ? ईश्वर से अतिरिक्त तो कुछ है ही नहीं ! तो यह ईश्वर-केंद्रित दृष्टि वाला साधक सहज रूप से भक्त हो जाता है। उसका अन्तस्थ भाव सब समय भक्ति वाला ही होता है। वो सब समय सबको नमन करता रहता है। क्योंकि यहाँ पर ईश्वर से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। यही है सहज भक्ति।
सिर्फ मंदिर में जाने वाला भक्ति ही पर्याप्त नहीं है। अभी हमारी भक्ति कैसी है ? जब मैं मंदिर में जाता हूँ - उस समय लगता है कि मैं भक्त हूँ। मंदिर के परिसर बाहर निकलते ही हम कुछ और हो जाते हैं। तब हमको ईश्वर नहीं जगत दिखाई पड़ता है - हमको लगता है ये जगत है! समस्या क्या है ? आज की हमारी विडंबना क्या है ? हम जब मंदिर जाते हैं , तब हमको लगता है कि मैं भक्त हूँ। मैं भक्ति करने लिए मंदिर जा रहा हूँ। मंदिर में हमको भगवान दिखाई दे रहा है। तो क्या बाहर में भगवान नहीं हैं ? (1:05:20) बाहर क्या है ? आज हमारी दृष्टि उतनी विकसित नहीं हुई है। इसीलिए बाहर में नानत्व दिखाई देता है। मंदिर में भगवान दीखता है , और मंदिर से बाहर आते ही हमको पूरा जगत दीखता है। बाहर जो नाम-रूप दिखाई दे रहा है -वो सब ईश्वर का ही तो रूप है। ये हमको अभी समझ में नहीं आ रहा है। प्रारम्भिक अवस्था में हमारी धारणा मन्दिर केन्द्रित होती है। सर्वसाधारण व्यक्ति की ईश्वर सम्बन्धी धारणा यही है। ईश्वर के सम्बन्ध में हमारी धारणा शुरुआत में कितनी संकुचित होती है ?
20. ईश्वर, जीव और जगत का अद्वैत :
आपको याद होगा ये पूरा सत्र कहाँ से शुरू हुआ था ? मैंने कहा था तीन महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। मैं कौन हूँ ? ये सामने जो दिखाई दे रहा है -विश्वब्रह्माण्ड, ये जगत क्या है ? और तीसरा है ईश्वर क्या है ? इन तीनों मुद्दों के प्रति हमारे मन में सिर्फ कल्पनायें ही हैं ! (1:06:08) अब तीनों के विषय में हमारी धारणा स्पष्ट हो गयी। मैं का मतलब क्या है ? ये जगत का मतलब क्या है ? और ईश्वर क्या है ? पहले हमारे लिए ईश्वर कहाँ है ? मंदिरों में है ! जब मंदिर में जाते हो तो आपको लगता है आप भक्त हो , भक्ति कर रहे हो। मंदिर से बाहर आते ही , आपको ये पूरा जगत, जगत,जगत,जगत, ही आपको सत्य लगता है। लेकिन जैसे ही आपकी दृष्टि बदलती है , फिर मंदिर हो या बाहर हो ? जीव -जगत भी ईश्वर ही है , ईश्वर से अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पहले जिस व्यक्ति को मंदिर में जाते वक्त भक्ति भाव दीखता है , बाहर में भक्ति भाव नहीं दीखता ? अब जिस व्यक्ति में अद्वैत दृष्टि जग गयी , वो मंदिर में हो बीच बाजार में हो ?या युद्ध क्षेत्र में हो, उसका भक्ति भाव अखण्ड रहता है। उसको सर्वत्र ईश्वर ही दिखाई देता है। इसप्रकार भक्ति की पराकाष्ठा परा भक्ति में होती है। सभी महापुरुषों में हमें यही भाव देखने को मिलता है। अपरोक्ष ज्ञान (अद्वैत दृष्टि) का यही तो व्यावहारिक अनुप्रयोग है ! यह अपरोक्षानुभूति या अद्वैत दृष्टि अब हमारे जीवन में कैसे उतरने वाला है ? It is going to change our entire view of what we are seeing ? यह जो जगत हम देख रहे हैं उसके प्रति हमारा पूरा नजरिया बदल देगा।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे -God is not only limited to temple ! भगवान केवल मंदिर तक ही सीमित नहीं है! these are the kindergarten of religion. ये धर्म की बालवाड़ी हैं। यानि मंदिर में भगवान देखने जाना' ये हमारे आध्यात्मिक जीवन की शिशु अवस्था है। आध्यात्मिक जीवन के बचपन में, भक्ति करने के लिए मन्दिर जाना ठीक है ,लेकिन जब बड़े होते हैं , समझ परिपक्व होती है , तो आपकी दृष्टि बदलनी चाहिए। भगवान सिर्फ किसी मंदिर में सीमित नहीं हैं। ईश्वर ही है , ईश्वर से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। लेकिन इसको यदि समझ नहीं पा रहे हैं, तो फिर मंदिर की आवश्यकता है। हम लोग कभी मंदिर या मूर्तिपूजा को कम नहीं समझ रहे हैं। मंदिर का बहुत बड़ा स्थान है। सभी मनुष्य सीधा अद्वैत दृष्टि में प्रतिष्ठित तो नहीं हो सकते हैं न ? सर्व साधारण व्यक्ति के लिए , वो मंदिर , पूजा , आरती आदि सारी चीजें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आप कृपया ऐसा न समझ लेना कि अद्वैत आश्रम मायावती , मूर्ति और मंदिर को छोटा समझता है ? मंदिर का बहुत प्रथम स्थान है। सर्व साधारण मनुष्यों के लिए मूर्ति और मंदिर की प्राथमिकता है। लेकिन जब आप स्थूल- देह दृष्टि से अद्वैत दृष्टि में प्रतिष्ठित हो जाते हो -तब सब ईश्वर है ! सब ईश्वर का ही रूप है -आप समझ जाते हो। तब आपके लिए ईश्वर सिर्फ मंदिर -केंद्रित नहीं रह जायेंगे। आप सब में ईश्वर को देखोगे। ईश्वर ही इतने रूपों में यहाँ बैठे हुए हुए हैं। भक्ति अद्वैत ज्ञान की पराकाष्ठा है !! ॐ शांति
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[नवरात्र-पूजन के चौथे दिनबाघ पर सवार माँ कूष्माण्डा के अष्टभुजा देवी स्वरूप की उपासना की जाती है। अष्टभुजा देवी की कृपा से पुनः मानव शरीर प्राप्त करके भरत इस जन्म में बहुत सतर्क है। अर्थात काम-कांचन से पूर्णतः अनासक्त है। उसे अब किसी भी मनुष्य को इस गलत दृष्टि से देखना छोड़ना है। (सभी में ईश्वर को देखर किसी भी व्यक्ति में दोष नहीं देखना। यही माँ सारदा देवी का वेदान्त है !) मनुष्य को स्त्री-पुरुष की स्थूल-शरीर की दृष्टि से देखने की गलत आदत को बार बार बदलने के अभ्यास से , जगत को काम -दृष्टि से नहीं राम-दृष्टि से देखने की आदत बना कर, ईश्वर से सम्बंधित चरित्र के चौबीसो गुण निर्माणकारी शिक्षा- या स्वामी विवेकानन्द-कैप्टन सेवियर शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा Be and Make' की पुस्तिकाओं में आप देखेंगे, Be and Make' का प्रचार -प्रसार करने में लगे रहने से प्राप्त हो जाता है। दादा ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था जो भी गृहस्थ देह- केंद्रित दृष्टि या काम केंद्रित दृष्टि को त्यागकर ,राम केंद्रित दृष्टि पाने के लिए इस जीवन-गठन और चरित्र-निर्माणकारी आंदोलन 'Be and Make'के प्रचार -प्रसार में लगा रहेगा वो ऐसे ही मुक्त हो जायेगा, उसको अलग से अन्य कोई साधना नहीं करनी पड़ेगी यह सत्य सिद्ध होती है। वह भविष्यवाणी आज -दुर्गा पूजा के चौथे दिन कोबाघ पर सवार अष्टभुजाकूष्माण्डा देवी की पूजा 25 सितम्बर, 2025 के दिन भक्त की रक्षा करने की घटित घटना से सत्य सिद्ध हुई है, क्या इसीलिए कूष्माण्डा देवी की पूजा को 26 सितम्बर, 2025 तक मनाया जायेगा? दशभुजा दुर्गा देवी शेर पर सवार हैं क्यों ? शेर प्रतीक है -माँ काली की कृपा से अपरोक्षानुभूति प्राप्त करने वाले भेंड़ की झुण्ड में पला -बढ़ा सिंहशावक की कथा कहने वालेदेशभक्त स्वामी विवेकानन्द को जब माँ काली का दर्शन प्राप्त होता है , तब वे मूर्तिपूजा करने वाले भक्त बन जाते हैं। भेंड़ों की झुण्ड में पले -बढे बाघ-शावक की कथा कहने वाले- बाघ पर सवार अष्टभुजा कूष्माण्डा देवी श्रीरामकृष्ण देव स्वयं काली हैं -अद्वैत हैं ! बाहर से दिखाने के लिए श्रीरामकृष्ण काली के पुजारी हैं, सच्चाई में वे स्वयं काली हैं ! ब्रह्म और शक्ति का अभेद है? यह विचारणीय प्रश्न है ?(चिड़ियों का जान जाये , बच्चो का खेल है। Play, it was all play. Why was Christ crucified? It was mere play. And so of life. Just play with the Lord. Say, "It is all play, it is all play .Volume 8, Sayings and Utterances . (लेकिन क्या हिन्दू मूर्तिपूजा के विरोधी हो सकते हैं ??? पहलेजहाँपटना कुर्थौल-निवासी हिन्दू धर्म के जितने विरोधी थे कुलदेवी के पूजाघर में बकरी बाँध देते थे। आज उसी कुर्थौल का दुर्गा पूजा पण्डाल 33 लाख खर्चकर उसका उतना ही भव्य बनता है !)
शुक्रवार 26 सितम्बर ,20025 कूष्माण्डा पूजा -का इस बार दूसरा दिन और नवनीदा का 10 वां तिरोधान दिवस। जो इसके पूर्वजन्म में कैप्टन सेवियर थे ! [पुराणों और महाकाव्यों के अनुसार राजा भरत की कई कथाएँ मिलती हैं, जिनमें सबसे प्रमुख कथा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की है, जिनके नाम पर देश का नाम भारत पड़ा। इसके अलावा श्रीमद्भागवत पुराण में जड़ भरत की कथा भी है, जो एक राजा के तीन जन्मों (एक राजा, फिर हिरण, और फिर ब्राह्मण) की कहानी है और आत्मज्ञान का संदेश देती है। एक अन्य प्रसंग अनुसार, राजा ऋषभदेव के पुत्र भरत भी थे, जिनके नाम पर देश का नाम भारत पड़ा है।( राज्य छोड़कर मनःसंयोग का अभ्यास करने के लिए-ऑफिस या निर्जन में जाना-या TMCकरके पेट भरने के लिए।)
[आज शनिवार, 27 सितम्बर,2005 : आज स्कन्दमाता स्वरुप देवी शक्ति (मेरे लिए माँ सारदा देवी) की आराधना की पंचमी तिथि पर स्वयं माँ ने कृपा करके उनका अंतिम उपदेश जो नवनीदा के अनुसार अद्वैत वेदान्त का सार है, के मर्म को मुझे समझा दिया। वह है-ईश्वर-केन्द्रित दृष्टि से जगत को देखना, देह-केंद्रित से जगत को कभी मत देखना, तभी सुख-शांति आती हैं। " यदि शांति चाहती हो, बेटी , तो किसी का दोष मत देखना। दोष केवल अपना ही देखना। संसार को अपना बनाना सीखो। कोई पराया नहीं , बेटी , संसार तुम्हारा अपना है। "
[जब हम शरीर-केन्द्रित दृष्टि से जगत को न देखकर ईश्वर -केन्द्रित दृष्टि से जीने की कला को सीख जाते हैं, तब माँ सारदा देवी का अंतिम उपदेश - " यदि शांति चाहती हो, बेटी , तो किसी का दोष मत देखना। दोष केवल अपना ही देखना। संसार को अपना बनाना सीखो। कोई पराया नहीं , बेटी , संसार तुम्हारा अपना है। " का मर्म समझ में आ जाता है। पूज्य नवनीदा के अनुसार यही उपदेश अद्वैत वेदान्त का सार है। (श्री नवनी हरण मुखोपध्याय-महामण्डल के संस्थापक सचिव।), क्योंकि ईश्वर-केन्द्रित दृष्टि से जगत को देखने पर हमारा हर कार्य ईश्वर की पूजा बन जाती है ! अतएव देह-केंद्रित दृष्टि से जगत को कभी नहीं देखना चाहिए, अपरोक्ष ज्ञान या वेदांत के इसी जीवन की कला का प्रयोग करने से जीवन में सुख-शांति आती हैं।
[आज रविवार, 28 सितम्बर , 2025 : षष्ठं कात्यायनी माता ! मनुष्य का भाग्य उसके पूर्वजन्मों के कर्मों से संचालित होता है। वह मनो जगत जो अदृश्य है , हमारी इन्द्रियाँ जिस सूक्ष्म जगत का अनुभव नहीं कर सकतीं , वही जगत माँ कात्यायनी के प्रताप से सबंधित है। षष्ठी तिथि में माँ के कात्यायनी रूप का ध्यान, पूजन करने से भक्त का आंतरिक सूक्ष्म जगत या मनोजगत में चल रही नकारात्मकता का नाश होकर सकारत्मकता का विकास होता है। सुनहरे और चमकीले वर्णों वाली चार-भुजाओं वाली रत्नाभूषणों से अलंकृत कात्यायनी देवी आक्रमक मुद्रा में रहने वाले सिंह पर सवार रहती हैं। प्राणियों में इनका वास 'आज्ञाचक्र ' में होता है। माँ की कृपा से भक्तों को चारों पुरूषर्थों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव को प्राप्त करता है। उसके रोग, शोक , संताप , भय के साथ साथ जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। -कशी विद्वत परिषद। ]
श्रीरामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास ने राम राज्य की महिमा का बखान करते हुए , लव-कुश के जन्म तथा उनके पराक्रम का उल्लेख किया है। भारतीय जीवन में राम राज्य प्रजा की सुख शांति तथा नियम-संयम के आदर्शों का प्रतीक माना जाता है। श्रीराम के राज्य में चन्द्रमा अमृत वर्षा करता है , सूर्य उतना ही तपता जितने की आवश्यकता होती है। तथा मेघ माँगने से जब जितना जल चाहिए , उतना ही देते हैं। भगवान शिव जगजननी उमा को राम राज्य की महिमा बताते हुए कहते हैं -सीताजी ब्रह्मा आदि देवताओं से वन्दित और सदा आनंदित हैं। श्रीराम सभी भाइयों पर प्रेम की वर्षा करते हुए ,उन्हें नाना प्रकार की नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित रहते हैं। उन्हें वे सभी सुख और भोग प्राप्त हैं जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं।
दोहा :
*बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥23॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के राज्य में चंद्रमा अपनी (अमृतमयी) किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से (जब जहाँ जितना चाहिए उतना ही) जल देते हैं॥23॥
चौपाई :
* कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥1॥
भावार्थ:-प्रभु श्री रामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को अनेकों दान दिए। श्री रामचंद्रजी वेदमार्ग के पालने वाले, धर्म की धुरी को धारण करने वाले, (प्रकृतिजन्य सत्व, रज और तम) तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्र के समान हैं॥1॥
* पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई॥ सेवति चरन कमल मन लाई॥2॥
भावार्थ:-शोभा की खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पति के अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्री रामजी की प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं॥2॥
* जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥3॥
भावार्थ:-यद्यपि घर में बहुत से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि (स्वामी की सेवा का महत्व जानने वाली) श्री सीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्री रामचंद्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं॥3॥
* जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥4॥
भावार्थ:-कृपासागर श्री रामचंद्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्री जी वही करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि को जानने वाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है॥4॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओं से वंदित और सदा अनिंदित (सर्वगुण संपन्न) हैं॥5॥
दोहा :
* जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥24॥
भावार्थ:-देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परंतु वे उनकी ओर देखती भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने (महामहिम) स्वभाव को छोड़कर श्री रामचंद्रजी के चरणारविन्द में प्रीति करती हैं॥24॥
भावार्थ:-सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्री रामजी के चरणों में उनकी अत्यंत अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभु का मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्री रामजी कभी हमें कुछ सेवा करने को कहें॥1॥
* राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥2॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकार की नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकार के देवदुर्लभ (देवताओं को भी कठिनता से प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं॥2॥
* अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्री रघुबीर चरन रति चहहीं॥
दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥3॥
भावार्थ:-वे दिन-रात ब्रह्माजी को मनाते रहते हैं और (उनसे) श्री रघुवीर के चरणों में प्रीति चाहते हैं। सीताजी के लव और कुश ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणों ने वर्णन किया है॥3॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥4॥
भावार्थ:-वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणों के धाम हैं और अत्यंत सुंदर हैं, मानो श्री हरि के प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयों के हुए, जो बड़े ही सुंदर, गुणवान् और सुशील थे॥4॥
दोहा :
* ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार॥25॥
भावार्थ:-जो (बौद्धिक) ज्ञान, वाणी और इंद्रियों से परे और अजन्मा है तथा माया, मन और गुणों के परे है, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं॥25॥
चौपाई :
* प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥1॥
भावार्थ:-प्रातःकाल सरयूजी में स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभा में बैठते हैं। वशिष्ठजी वेद और पुराणों की कथाएँ वर्णन करते हैं और श्री रामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं॥1॥
* अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं॥
भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई॥2॥
भावार्थ:-वे भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनंद से भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान्जी सहित उपवनों में जाकर,॥2॥
* बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥
भावार्थ:-वहाँ बैठकर श्री रामजी के गुणों की कथाएँ पूछते हैं और हनुमान्जी अपनी सुंदर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्री रामचंद्रजी के निर्मल गुणों को सुनकर दोनों भाई अत्यंत सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं॥3॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥4॥
भावार्थ:-सबके यहाँ घर-घर में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र रामचरित्रों की कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्री रामचंद्रजी का गुणगान करते हैं और इस आनंद में दिन-रात का बीतना भी नहीं जान पाते॥4॥
* अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥26॥
भावार्थ:-जहाँ भगवान् श्री रामचंद्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरी के निवासियों के सुख-संपत्ति के समुदाय का वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते॥26॥
(- परम् पूज्य स्वामी शुद्धिदानन्दा जी महाराज, अध्यक्ष,
अद्वैत आश्रम, मायावती , हिमालय।)
Session 23| The Essence of Vivekachudamani |
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,
निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥५॥
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः
अब तक (22 सत्रों में) हमने शिष्य द्वारा पूछे गए सातों प्रश्नों का उत्तर हमने देख लिया। शिष्य ने गुरु और शास्त्र के उपदेशों को यथोचित भाव से -श्रद्धा और भक्ति के साथ ग्रहण किया है। गुरु ने उसकी मन की शंकाओं को दूर किया है। उसके मन में पहले विवेक की ज्योति अगर होगी भी तो कम मात्रा में होगी , लेकिन अब गुरु और शास्त्र की कृपा से विवेक की ज्योति प्रखर रूप जलने लगी है। अब गुरु शिष्य को कहते हैं -
अर्थ:-तू इस आत्मा को संयतचित्त होकर बुद्धि के प्रसन्न होने पर 'यह मैं हूँ'- ऐसा अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव कर। और [ इस प्रकार ] जन्म-मरणरूपी तरंगों वाले इस अपार संसार-सागर को पार कर तथा ब्रह्मरूप से स्थित होकर कृतार्थ हो जा।
सारा उपदेश देने के बाद गुरु अब शिष्य को आदेश दे रहे हैं। पहले तो सब उपदेश दिया -आत्मा क्या है , अनात्मा क्या है ? बंधन क्या है ? बंधन कैसे होता है ? हमारे जीवन में ये बंधन चलता कैसे है ? बंधन से मुक्त कैसे होते हैं ? ये सारी चीजें बता देने के बाद अब उसे आदेश दे रहे हैं कि -अब तू ये कर ! अब तू मन को वश में कर मनःसंयोग का अभ्यास कर -नियमितमनसामुं त्वं स्वमात्मानमात्मन्य् अयमहमिति,साक्षाद्विद्धि बुद्धिप्रसादात् ।-मन को वश में कर औरअपने अंतःकरण में यही मनन कर की मैं वही आत्मा हूँ , मैं यह देह-मन का समुच्चय नहीं हूँ, मैं वो आत्मा हूँ -ऐसा साक्षात् या अपरोक्ष रूप से इसको अनुभव कर ।स्वम आत्मनं आत्मनि अहं इति साक्षात् विद्धि बुद्धि प्रसादात्। (6:17) जा अब तू ये कर -ऐसा ही आदेश है।
गुरु शिष्य को आदेश दे रहे हैं। अब 'बुद्धि प्रसादात्' अर्थात शुद्ध अन्तःकरण मन को निग्रहीत करके जिसका मन शुद्ध हो गया है - उस शुद्ध अन्तःकरण के माध्यम से तू अब -'साक्षात् विद्धि' साक्षात् इस सत्य का अनुभव कर कि 'मैं' का मतलब यह 'देह-इन्द्रिय समुच्य' (स्थूल शरीर M/F) नहीं है ; 'मैं' का मतलब वह 'आत्मा' है -जो जगत का आत्मा भगवान इन्द्रियातीत है -और उसका नाम गुरु मुख से श्रवण करके मनन-निदिध्यासन करने से वह अनुभवगम्य होता है! तू उसको ऐसा अनुभव कर ! यह अब अपरोक्ष अनुभूति है ; यह बुद्धि से समझने वाली जो धारणा है, इस आत्मा को भी वैसे ही बुद्धि से समझने वाली हमारी जो धारणा है ; ये वैसा नहीं है। (6:55) अभीतक हम सिर्फ बुद्धि से समझते आ रहे हैं। आत्मा के बारे में अभी तक हमारा जो ज्ञान है - उसमें हमें अभी तक उसकी अनुभूति नहीं हुई है। ये ज्ञान परोक्ष गया है।
दो प्रकार का ज्ञान होता है। एक परोक्ष एक अपरोक्ष ! अपरोक्ष अनुभूति ही ठीक ठीक अनुभूति होती है। सिर्फ बुद्धि से भी कोई व्यक्ति यदि आत्मा को समझले तो ये बहुत बड़ी बात है। ये कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन नेति-नेति विचार -बुद्धि से कितने लोग समझ पाते हैं ? अगर कोई समझ भी ले तो , उतने मात्र से हमारी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।साक्षात् अपरोक्ष ज्ञान जो है , अब तू उसके लिए प्रयास कर। गुरु शिष्य से कह रहे हैं - " अब देख, मन को निग्रहीत कर और एक शुद्ध अन्तःकरण के द्वारा -साक्षात् अपरोक्ष रूप से 'मैं वही हूँ !' I Am He, I Am He, 'मैं वही हूँ' I Am He- का मतलब : शिवोऽहम्, शिवोऽहम्, शिवोऽहम् -उसको इस प्रकार अनुभव कर। उस प्रकार अनुभव करके -जनिमरणतरङ्गा पारसंसार सिन्धुं प्रतर! 'जनि मरण तरङ्ग अपार संसार सिन्धु प्रतर !' - और इस संसार रूपी समुद्र में जो जन्म-मरण रूपी तरङ्गे हैं; ये जो जन्म -मरण तरङ्गो वाली संसार-सिन्धु है, इसको पार कर !'मैं वही आत्मा हूँ' ~ शिवोऽहम् ! इस प्रकार साक्षात् रूप से अनुभव करके, इस जन्म-मृत्यु रूपी इस संसार सागर को तू पार कर ! और इस संसार-सिन्धु को पार करके - भव कृतार्थो ! अपने जीवन को तू कृतार्थ बना ले और 'ब्रह्मरूपेण संस्थः' और तू ब्रह्मरूप में प्रतिष्ठित हो जा।" ये गुरु का आदेश है।
सब उपदेश देने के पश्चात्, गुरु शिष्य को यह आदेश दे रहे है कि देखो; अब मन को नियंत्रित करके शुद्ध अन्तःकरण के द्वारा 'मैं वही हूँ -शिवोऽहम् !' ऐसे साक्षात् रूप से उसको अनुभव कर। (इन्द्रियातीत सत्य वस्तु) आत्मा को अनुभव कर ! अनुभव करके यह जो भवसागर यानि संसार सागर है, उसमें जन्म और मृत्यु दो लहरों के समान हैं। ऐसी जन्म-मृत्यु रूपी जो लहरें उठने वाले इस संसार-सागर को पार करके तू कृतार्थ हो जा, ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जा। ये आदेश है, अब ये आदेश हम सबके लिए है। जैसे यहाँ पर कोई गुरु किसी शिष्य से कह रहे हैं, उसी प्रकार हमको यह समझ लेना चाहिए कि ये आदेश हम सबके लिए है। अब कोशिश करो ! अब आप आत्मा की अनुभूति करके ब्रह्म में प्रतिष्ठित होने की कोशिश करो ! ये काम एक दिन में नहीं होगा।
अब- प्रत्याहार -धारणा (पूरा अष्टांग योग) बता देने के बाद; अब आप हर रोज साधन-चतुष्टय पर ध्यान देते हुए -आप नियमित रूप से मनन और निदिध्यासन करोगे ! हम लोगों ने श्रवण किया और मनन किया है ! 22 सत्रों में हमने इस विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ पर सही रूप में चर्चा किया , यह भी एक तरह से मनन ही हुआ। अब यह श्रवण-मनन चलते रहना चाहिए। और साथ में निदिध्यासन भी होना चाहिए। जब साधन-चतुष्टय परम्परा में हमारा श्रवण-मनन -निदिध्यासन चलता रहेगा , तो हमें एक दिन यह हमे यह ज्ञान हो कि स्वरूपतः हम क्या है ? हम कौन है ? ये ज्ञान होगा , और तभी हमारा जीवन कृतार्थ होगा। (10:28)
अब इसके बाद गुरु आदेश देते हैं,अब तुम विवेक (प्रयोग) करो ! भवान् अपि इदं परतत्वं आत्मनः स्वरूपं आनंद घनं विचार्य। क्या विवेक-करना है ? 'भवान् अपि' - गुरु शिष्य रूपी शिशु से कह रहे हैं, अभी तुम भी ऐसा कर!(भवानपीदं परतत्त्वमात्मनः स्वरूपमानन्दघनं विचार्य ।)
'परतत्वं' आत्मनः स्वरूपं आनन्द घनं विचार्य ! वो जो (मैं -प्रलय के बाद भी अनुभूति में आने वाला) सच्चिदानन्द स्वरुप ब्रह्म -परमात्मा है, जो कि आनंदघन है- आनंदस्वरूप है ! हमारा जो असली स्वरुप है,आनंद स्वरुप है; अनात्मा से उसका विवेक करके,अनात्मा से (आधारकार्ड वाले अहं से) उसको पृथक करके - विधूय मोहं स्वमनःप्रकल्पितं ! स्व मन प्रकल्पितं - मन के द्वारा कल्पित जितना भी मोह है (नाते-रिश्तों से राग है -विपरीत लिंग के शरीर में मोह है न?), उस मोह या आसक्ति को दूर करके। हमारे अंदर जितना भी मोह- है ये सारा 'मोह' शरीर केंद्रित है। (तीनों ऐषणाओं में राग है) (11:22)
स्थूल शरीर के विवरण में हमने पढ़ा था - मोहास्पदं ! ये स्थूल शरीर कैसा है ?स्थूल शरीर ही मोह का आस्पद है। हमने 74 वें श्लोक में पढ़ा था - अहं ममेति प्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलं इति ऋते बुधैः । इस स्थूल शरीर को लेकर ही, आईने में जो चेहरा दीखता है , उसीको लेकर हमारी यह धारणा होती है , कि ये 'मैं' हूँ और ये 'मेरा' है ! और यह स्थूल शरीर ही मोह का आस्पद है। शरीर से ही तो मोह होता है ? आईने में दिखने वाले अपने चेहरे के प्रति - आधारकार्ड में छपे फोटो के प्रति हमारा जो मोह होता है , उस मोह को ही हमारा मन कल्पित मोह - स्व मनः कल्पित मोह' , इस मोह को मूलतः -परिपूर्णतः उसको दूर करके -"विधूय" क्या करना है ? मुक्तः कृतार्थो भवतु प्रबुद्धः ! तू मुक्त हो जा, कृतार्थ हो जा, और भवतु प्रबुद्धः, अब तू प्रबुद्ध होजा , माने ज्ञानी हो जा। प्रबुद्ध होना यानि परम ज्ञान को प्राप्त कर लेना। उस बोध को प्राप्त कर लेना। आत्मबोध को प्राप्त कर लेना। (Enlightened from within-भीतर से प्रबुद्ध-आत्मज्ञानी हो जाना) शंकराचार्य जी की एक किताब का नाम है - आत्मबोध ! (12:31) आत्मबोध का मतलब है -आत्मज्ञान ! उस आत्मज्ञान को तू प्राप्त कर। (तू उस आत्मज्ञान को तू प्राप्त कर, जिस आत्मज्ञान को प्राप्त करके सिद्धार्थ गौतम , गौतम बुद्ध बन गया था ?)
इन दो श्लोकों में गुरुदेव अपने शिष्य को ये आदेश दे रहे हैं कि बेटा देख , अब तू ऐसा कर , और ऐसा करके तू अपने जीवन को धन्य (सार्थक) बना ले। गुरु का ये आदेश हम सभी लोगों के लिए है। गुरु से शास्त्र से इस शिष्य को जो भी समझना था , उसे समझने के पश्चात् , श्रवण कर लिया , मनन भी अच्छी तरह से कर लिया ? मनन यानि शास्त्र से और गुरु से जो सुना -उसी के अनुसार और अनुकूल युक्ति को लगाकर हम किस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं ? हमारा अंतिम निर्णय यह होता है कि एकमेवाद्वितीय आत्मा ही है, ब्रह्म ही है, ईश्वर ही है। ईश्वर से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
ये अनात्मा (नाम-रूप?) जो दिख रहा है न (जीव और जगत) -ये सिर्फ दिख रहा है। वास्तव में है ही नहीं। वास्तव में क्या है ? वास्तव में ईश्वर ही है ! यह विवेक है। अब यह विवेक को समझने की परिसमाप्ति हो रही है- कि एकमात्र ब्रह्मतत्व ही है। ईश्वर ही है। ईश्वर से पृथक ना तो कोई जगत है , ईश्वर से पृथक ना तो कोई जीव है। हम जिसको जीव या जगत कह रहे हैं , ये मूलतः ईश्वर ही है। हम अज्ञान में हैं , (हमारे शिवत्व को अर्थात विवेक को माँ काली ने ढँक लिया है?)इसीलिए हमको अज्ञान में लगता है कि यह कोई जीव है , सामने कोई जगत है ! इस प्रकार अच्छी तरह से विवेक करके , यह समझ जो तुम्हें शास्त्रों से , परोक्ष रूप में जो तुमने ग्रहण किया है, वह तुमने परोक्ष रूप में ग्रहण किया है , अभी उसको तुमने केवल बुद्धि से समझा है। अब तुम्हें तीन बिन्दुओं - जीव, जगत और ईश्वर को इन तीनों के एकत्व को (Oneness of existence) अपने अनुभव से समझना है। अब तू उसके लिए प्रयास कर। यानि अब तुम्हे निदिध्यासन करने की आवश्यकता है। श्रवण (प्रत्याहार और धारणा का श्रवण) हो गया , मनन हो गया , अब ध्यान करो- ध्यान में लग जाओ। अब गुरु ध्यान में लग जाने का आदेश दे रहे हैं। (14:34)
अब आप ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि ऐसा आदेश पाने के बाद शिष्य गुरु के आश्रम से अपने घर की और चल पड़ा है। गुरु का काम यहीं तक है -अब गुरु का काम खत्म हो गया। अब आगे की कोशिश साधन-चतुष्टय पर दृष्टि केंद्रित रखकर शिष्य को खुद करना है। गुरु बता देंगे भाई दिल्ली जाने का रास्ता ये है। उसके बीच में ये सारे 'चक्करदार मार्ग' (diversion) आएंगे , उन रास्तों में नहीं जाना ! इस सीधे रास्ते को ही पकड़ना। कौन सा रास्ता स्वीकार नहीं करना है?
और कौन सा रास्ता स्वीकार्य है ? ये सब चेतावनी बता देते हैं। लेकिन अब साधन-चतुष्टय के अनुसार चलने का काम तो शिष्य का ही है। उसको स्वयं चलना पड़ेगा। गुरु का काम है सिर्फ रास्ता दिखा देना। सब कुछ स्पष्ट करके direction दे देना , सबकुछ स्पष्ट करके दिखा देना। शास्त्र का काम यहीं तक है , अब शास्त्रोक्त मार्ग पर चलना, शास्त्र निसिद्ध मार्ग से बचना तो शिष्य को स्वयं ही पड़ेगा। अब वह शिष्य गुरु के आश्रम से चला जाता है , और हो सकता है छः महीना , या छः साल या 10 साल 12 साल ; पता नहीं। लेकिन जब गुरु के सानिध्य से शिष्य लौट जाता है , एकांत स्थान में (अपने पूजा घर में -और निर्जन में कैम्प में) जाता है , और भरपूर साधना करता है। गुरु के बताये हुए मार्ग -Be and Make ! पर वो भरपूर साधना करता है। और साधना करके उसको अंत में 'परम् आत्मज्ञान' उसको हो जाता है। ये आत्मलाभ- ईश्वरलाभ उसको हो जाता है ! (15:54) उस आत्मज्ञान, आत्मबोध या ईश्वरलाभ को प्राप्त करना - अब ये साक्षात् अपरोक्ष अनुभूति की बात है ! हाँ अब ये 'ईश्वरलाभ या आत्मबोध' के एकत्व को बुद्धि से समझने की बात नहीं है। जब हम गंभीर निदिध्यासन करते हैं , ध्यान में डूब जाते हैं - 'शिवोऽहम्, शिवोऽहम्, शिवोऽहम्' के ध्यान में - तो अभी मरेगा कौन? की सीमा से परे चले जाते हैं ; तो एक अतीन्द्रिय दशा में जीव को (आधारकार्ड के अहं को नहीं आत्मा को?) अपने सत्य स्वरुप का ज्ञान होता है। यह अनुभूति अतीन्द्रिय अनुभूति होती है। हमने पहले ही देखा था ईश्वर को या आत्मा को देखने का वेदांती सिद्धांत क्या है ? तं अगोचरं -है न ? तो इस प्रकार उस अतीन्द्रिय या अपरोक्षानुभूति प्राप्त करता है -साधना में सफल होता है। उसका जीवन धन्य होता है। इस प्रकार अपरोक्षानुभूति प्राप्त करके वो शिष्य पुनः अपने गुरु के पास आता है।
तो दो चित्र है यहाँ -तुलना करके देखना होगा। शिष्य जब पहली बार गुरु के पास आया था , तो कैसे आया था ? वह अत्यंत व्याकुल , भयभीत था -कह रहा था कि मैं इस संसार-सागर में डूब रहा हूँ। इस संसार की अग्नि में मैं तप रहा हूँ। भयभीत हूँ , मैं प्रपन्न हूँ -आपके चरणों में मैं शरणागत हूँ। आपकी कृपाकटाक्ष मुझपर हो , आप मेरा मार्गदर्शन करें। मुझे इस अंधकूप में गिरने की समस्या से बाहर निकालिये। ऐसी अत्यंत ही वेदनायुक्त मानसिक दशा में ये शिष्य अपने गुरु के पास आया था। और शास्त्र और गुरु के वाक्य और मुख से निसृत शब्दों (बीजमंत्रों) से अवगत होने के पश्चात् जब उसकी सारी भ्रांतियाँ दूर हो गयीं। और गुरु निर्दिष्ट मार्ग पर चलकरके जब उसे अपरोक्ष अनुभूति होती है ; जब उसको 'स्व ' का मतलब समझ में आता है। ये सब 'स्व' का अर्थ निर्धारण ही चल रहा है न ? इस 'स्व' का मतलब क्या है ? इस 'मैं' मतलब क्या है? इस 'मैं' शब्द का क्या अर्थ है ? 'मैं' का अर्थ यह स्थूल-शरीर हो सकता है क्या ? ये प्रश्न है। तो इस शिष्य को अंत में इस 'अहं' का ज्ञान होता है। अहं का अर्थ वो आत्मा है, देह-इन्द्रिय का समुच्य नहीं हो सकता। आत्मा या हमारा सत्य स्वरुप देहात्मा का संघात नहीं है। अब वो जब दुबारा अपने गुरु के पास आता है - तो यह बताने के लिए , अपनी कृतज्ञता दर्शाने के लिए आ रहा है। उसके मुँह में शब्द नहीं है। गुरुदेव को कैसे मैं बताऊँ ? गुरुदेव ने मुझको क्या दिया है !! गुरु से जो नाम मिला है - उसका कोई मोल है ? ये अनमोल चीज है ! (18:35) इसकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती है। तो इस प्रकार जो शिष्य है -इस परम् अनुभूति को प्राप्त करने के पश्चात्, वे सफल शिष्य जब अपने गुरु के पास आते हैं , तो अब उनके शब्दों को देखो। वो पहले तो अपनी अनुभूति को बताता है। बहुत सुंदर शब्द हैं - स्वामी विवेकानंद अपनी व्याख्यानों में कई जगहों पर इसका उदाहरण देते हैं। वो अतिसुंदर शब्द क्या हैं -
क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत् ।
अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ॥ ४८३ ॥
483. Where is the universe gone, by whom is it removed, and where is it merged? It was just now seen by me, and has it ceased to exist? It is passing strange!
" क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनं इदं जगत "- अज्ञान में हमको जीव और जगत ही दिखाई देता है। हमारी दशा अभी यही है , जब तक हमको ज्ञान नहीं हुआ, हमको तो सिर्फ जीव और विश्व-प्रपंच ही दिखाई देता है। और इन्द्रियों के माध्यम से दिखने वाले जीव और जगत प्रपंच के विषय में हमारे अंदर निःसंदिग्ध सत्यत्व बुद्धि है। निःसंदिग्ध मतलब 'Without any doubt' बिना किसी शक के -' not a grain of doubt'-जीव जगत तो है है - इसमें रत्ती भर शक की भी गुंजाईश नहीं है !is it not? ? सर्वसाधारण मनुष्य की बुद्धि में क्या है ? यही सत्य है ! जो विश्व-प्रपंच इन्द्रियगोचर हो रहा है - यही तो सत्य है ! प्रपंच ही है। जीव और जगत ही है। सपने में दिखने वाला जो पूरा विश्व-ब्रह्माण्ड है , उसके प्रति उस सपने के अंदर जो जीव है, उसकी क्या बुद्धि होती है ? यह अपनेआप में पूरा सत्य है। is it not? ? उसी प्रकार हमारी आज की स्थिति क्या है? सर्वसाधारण को , जिसको अभी ज्ञान नहीं हुआ , जो सत्य को नहीं जानता ; उसकी धारणा यही है कि , ये जो इन्द्रियों से दिखने वाला जगत प्रपंच जो है , इसमें हमको जीव दिख रहा है ,अनगिनत प्रकार के जीव दिख रहे हैं। और सारा जो ये ब्रह्माण्ड दिख रहा है - (निश्चित तारीख को सूर्यग्रहण -चंद्रग्रहण हो रहा है) यह सब देखकर हमको लगता है कि यह सब सत्य है। जीव और जगत है , इसको सत्य समझना ही हमारी आज की दशा है। जब तक ज्ञान नहीं होता, यही चलता रहता है। अब जब जिस किसी को ज्ञान होता है , चलो इसमें आप सभी ज्ञानियों को ले लो। चाहे वो विवेकानन्द जी हों, या शंकराचार्यजी हों, रमण महर्षि जी हों , रामकृष्ण परमहंसदेव जी हों - जो भी हों ; किसी को भी ले लीजिये आप। उनको स्वामी विवेकानन्द जी को जब यह अपरोक्ष अनुभूति होती है, तब उनकी अनुभूति में क्या आती है ? (21:25)
" क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनं इदं जगत "
अब वो जगत प्रपंच कहाँ चला गया ? उद्गार कितने सुंदर है ? कहते हैं - कहाँ चला गया ? क्या कहाँ चला गया ? जीव और जगत ! जीव और जगत के विषय में जब अपरोक्ष अनुभूति होती है, तब लगता है (प्रलय जैसी तेजी से घूमता हुआ -सूर्य ,चंद्र , पृथ्वी देखने वाला अहं) ये सब , उसे यह अनुभूति होती है कि ये पूरा ब्रह्माण्ड कहाँ चला गया भाई ? तो ये प्रश्न अज्ञान में पूछे गए प्रश्न का सीधा उल्टा है न ? (21:49) दो प्रकार का फल है - ज्ञान का फल एक प्रकार का है , अज्ञान का फल सीधा उल्टा है। ज्ञानी पुरुष के मुंह से निकलने वाले जो अत्यंत ही सुंदर ज्ञानवर्धक जो उद्गार है, वो है-" क्व गतं ?" कहाँ चला गया ? क्या ? जीव और जगत -कहाँ चला गया ?-'केन वा नीतं ?' किसके द्वारा ये हटा दिया गया ? जैसे कि किसी ने इसको हटा दिया ? 'केन वा नीतं ?' किसको द्वारा ये निकाल दिया गया ? जैसे कि किसी ने उसको गायब कर दिया ? अभी तक दिखाई दे रहा था ? अब नहीं है !" क्व गतं ?" कहाँ चला गया ? 'केन वा नीतं ?' कुत्र लीनं इदं जगत ? ये जगत कहाँ लीन हो गया ? कितना सुंदर उद्गार है ! शिष्य के उद्गार में पूरा आश्चर्य का भाव है ! शिष्य के मुख से निकलने वाले इन शब्दों के पीछे का जो भाव है , वो पूरा विस्म्यकारी भाव है। किसी को भी ऐसा ही विस्म्यकारी होगा !! - जिस दिन हमें भी अपरोक्ष अनुभूति होगी, उस दिन हमें भी ऐसा ही विस्मय होगा ! क्योंकि हम अभी तक समझ रहे थे जीव-जगत , जीव-जगत , जीव-जगत , जिसको हमलोग जीव-जगत बोल रहे थे ; जिस दिन अपरोक्ष अनुभूति होगी, आपको भी यही समझ में आयेगा कि जीव-जगत को है ही नहीं !! जो नहीं है , हमको लग रहा था कि वो है ! कहाँ गया ? कौन ले गया ? किसके द्वारा ये हटाया गया है ? (23:13) कहाँ लीन हो गया ये जगत ? हमारे अंदर भी यही एक विस्मयकारी भाव होगी। क्या अद्भुत है !! दूसरी पंक्ति में कहते हैं- अधुनैव मया दृष्टं ! अधुना माने अभी -कुछ देर पहले तक मैं जीव और जगत को देख रहा था। अब क्या है ? नास्ति ! अभी न तो जीव है न जगत है। 'किं महदद्भुतम् ! किं महदद्भुतम् ! किं महदद्भुतम् !!!'क्या आश्चर्य है ? क्या आश्चर्य है ? क्या आश्चर्य है ? आश्चर्य है -विस्मयकारी है ! हम क्या समझके बैठे थे ? आप स्वप्न-सृष्टि के उदाहरण को देखिये। स्वप्न-सृष्टि में आज हमारी सत्यत्व बुद्धि है। है न ? हमको ये निःसंदिग्ध धारणा है कि यह सृष्टि सत्य है ; उसी प्रकार यहाँ भी हो रहा है ! किसी के भी मन में ये संदेह है ही नहीं कि -ये सृष्टि तो है ही नहीं ! यहाँ सिर्फ ईश्वर है - ऐसी धारणा किसी भी हम जैसे साधारण (अज्ञानी) मनुष्य की नहीं है। लेकिन जिस दिन हमें ये अपरोक्ष अनुभूति होगी , उस दिन हम देखेंगे कि , कहाँ है जीव और जगत ? यहाँ तो ईश्वर मात्र ही है। ईश्वर से अतिरिक्त यहाँ पर कुछ भी नहीं है! ईश्वर से भिन्न , ईश्वर से अतिरिक्त द्वितीय कोई वस्तु यहाँ है ही नहीं ! जीव भी नहीं है , जगत भी नहीं है। श्रवण और मनन करते समय भी ये थोड़ा सा चित्र हमको मिल गया था ! (24:43) लेकिन अभी भी अनुभूति नहीं हुई है। है ना ? श्रवण-मनन करके भी हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। is it not ? हमने कहा था - When you dig into the Jiva , what emerges ? God ! जब आप जीव में खोज करते हैं, तो क्या उभरता है? ईश्वर! And, When you dig into the world , what emerges ? God ! और जब आप संसार में खोजबीन करते हैं, तो क्या सामने आता है? ईश्वर! Where has the world and Jiva gone ? संसार और जीव कहाँ चले गए ? वे जीव -जगत चले गए - सिर्फ ईश्वर का ही अस्तित्व है। श्रवण और मनन करके भी हम यहाँ पहुँच जाते हैं। लेकिन हम पहुँचे नहीं हैं। ये अपरोक्ष अनुभूति होनी चाहिए। अभी हमने बुद्धि से कुछ कुछ समझा - वो भी छोटी बात नहीं है। वह भी ईश्वर के अनुग्रह से ही हो रहा है। उस 'अव्यक्त नाम वाली'? परमेश शक्ति (काली) के अनुग्रह से ही सबकुछ हो रहा है।लेकिन अब इस साधन चतुष्टय को आगे ले जाना है , और जब हमको भी अपरोक्ष अनुभूति होगी , तब -वो लक्ष्य प्राप्त हो गया। 'मैं कौन हूँ ?'- को खोजने का काम पूरा हो गया ! तब हमारे अंदर भी इसी प्रकार से विस्मय का भाव होगा। आश्चर्य का भाव होगा कि क्या अद्भुत है ! अबतक मुझे दिखाई दे रहा था।
ज्ञान होने से थोड़े देर पहले तक मुझको जीव और जगत दिखाई दे रहा था ! अब -नास्ति , अब न तो जीव है न जगत है ! एक ईश्वर से अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है- ये अनुभूति होती है ! सपना जब टूट जाता है , तब क्या होता है ? और रोज हो रहा है। कहाँ गया वो स्वप्न सृष्टि ? कौन ले गया उस स्वप्न ब्रह्माण्ड को ? कहाँ लीन हो गयी वो स्वप्न सृष्टि ? है कि नहीं ? जब तक सपना चल रहा , तब तक जिस सपने के प्रति हमारे अंदर निःसंदिग्ध सत्यत्व बुद्धि थी कि नहीं ? जब वो सपना टूटता है -तो बताओ कहाँ चला गया वो ब्रह्माण्ड ? कौन ले गया वो ब्रह्माण्ड ? कहाँ लीन हो गया वो ब्रह्माण्ड ? थोड़ी देर पहले तक मैं देख रहा था ,अब है कहाँ वो स्वप्न सृष्टि ? उस स्वप्न सृष्टि के बारे में हम क्या कहेंगे ? क्या हम कह सकते हैं कि वो है? ऐसा हम नहीं कह सकते। क्या आप कह सकते हो -वो नहीं है ? ऐसा भी नहीं कह सकते। तो क्या कहोगे आप ? महदद्भुतम् , अनिर्वचनीयं ! तो सच्चाई ये है कि अज्ञान में भी सबकुछ विस्मयकारी है , और ज्ञान में भी सबकुछ विस्मयकारी है। ये बुद्धि से समझने वाली बात नहीं है। हमारे अंदर यहाँ पहुँचकर समर्पण का भाव आ जाता है। (27:00) बुद्धि जैसे कि झुक जाती है। अद्भुत चीज है। अभी भी देखो , जब हमको ये दिखाई दे रहा है। ये सबकुछ तो सचमुच विस्मयकारी है ! महाद्भुत अनिर्वचनीय है , और जब ज्ञान होगा ; उस वक्त हमको दिखाई देगा -जिसको मैं सत्य समझ रहा था , कहाँ गया वो ? कौन ले गया ? कहाँ लीन हो गया ? थोड़ी देर पहले मैं देख रहा था। लेकिन अब देख रहा हूँ , नहीं है ? क्या अद्भुत चीज है ! क्या अद्भुत चीज है ! क्या अद्भुत अनुभूति है ? This is the climax ! यह पराकाष्ठा है। कभी न कभी हर मनुष्य इस अपरोक्ष अनुभूति तक जरूर पहुंचेगा ! हो सकता है 10 साल बाद, इस जन्म में , अगले जन्म में? 10 जन्मों के बाद - लेकिन देहोअहं से शिवोहम तक मनुष्य की जो यात्रा है -यही उसकी दिशा है ! कभी न कभी हमको यह अनुभूति होने ही वाली है। अगर शास्त्र ने जैसा कहा है , वैसा हम करें , साधन-चतुष्टय के साथ यदि निदिध्यासन में लगे रहें तो यह अनुभूति होने ही वाली है।
अज्ञान में रेगिस्तान में जो पानी दिख रहा था , ज्ञान होते ही क्या हो गया ? कहाँ गया वो पानी ? कौन ले गया वो पानी ? कहाँ विलीन हो गया वो पानी ? थोड़ी देर पहले मैं सोंच रहा था कि वहां पानी है। लेकिन अब मैं देखरहा हूँ , वहाँ एक बून्द भी पानी नहीं है। वहाँ रेत ही है। क्या आश्चर्य है? रज्जु में मुझे सर्प दिखाई देता है। जब तक अज्ञान में हैं , तब तक मुझे सर्प दिखाई देता है। सर्प के विषय में सत्यत्व बुद्धि है। लेकिन जैसे ही ज्ञान होता है , तो वो सर्प कहाँ गया ? कौन ले गया ? कहाँ विलीन हो गया ? थोड़ी देर पहले मुझे लग रहा था कि वहाँ सर्प है , अब मैं देख रहा हूँ रज्जु है ! तो क्या आश्चर्य ! तो बीच में मैं जो सचमुच अनुभव हो रहा था उसको क्या कहेंगे? महद्भुतम अनिर्वचनीयं ! ऐसी किसी वस्तु की अनुभूति होना जो वास्तविक रूप में विद्यमान नहीं है ;उसका सबसे सुंदर उदाहरण हमारा स्वप्न जो है , उसको हम रोज अनुभव करते हैं। समस्या यह है कि अभी जिसको हम जाग्रत में जीव -जगत कह रहे हैं - यह भी सपना है। अभी केवल हमको यह समझ में नहीं आ रहा है। उसी के लिए है, शास्त्र -विचार , विवेक-विचार, वैराग्य आदि साधन-चतुष्टय आदि इसे समझने के लिए ही है। जैसे जैसे हम साधन चतुष्टय में और भी सम्पन्न होंगे , षटसंम्पति और मुमुक्षत्व की वृद्धि जितनी होते जाएगी -तब धीरे धीरे यह भी स्पष्ट होगा कि ये भी एक सपना है , और यह सपना एक दिन अवश्य टूटेगा। ये सपना भी टूटेगा।
अभी देखिये हम दो प्रकार के जीवन को जी सकते हैं। या तो इस प्रकार के जीवन को जियोगे जिससे हम इस सपना को और भी मजबूत कर रहे हों। अगर आप काम भोग में, विषय-भोग में डूब कर जिओगे , सब प्रकार के भोगों में अपनेआप को डुबोते हो , तो क्या होगा ? ये सपना टूटेगा क्या ? ये सपना और भी मजबूत होता रहेगा। इसी प्रकार ये बंधन चलता रहता है। दूसरा विकल्प क्या है ? आप साधन-चतुष्टय संपन्न होकर के कहीं भी न चिपकते हुए ! बहुत ही बुद्धिपूर्वक -यही जीवन जीने की कला है। कहीं भी न चिपकते हुए , विवेक-वैराग्य के द्वारा सबको Intelligently handle करते करते , सभी परिस्थितियों को बुद्धिमानी के साथ सँभालते हुए , ईश्वर के अनुग्रह से ये देह , धन या प्रसिद्धि में आसक्ति और राग का सपना भी एक दिन टूटेगा। यह जो बंधन है वह कमजोर होते -होते जायेगा। लेकिन योग और त्याग के विपरीत जो भोग में डूबने का पथ है उसमें यह बंधन और भी मजबूत होता जायेगा। (30:42) ये दो मार्ग हैं -अविवेक में जब हम अपनेआप को विषयों में डुबो देते हैं , सबसे चिपकते है -आसक्त होते हैं ; विपरीत लिंग के देह में attached हो जाते हैं, और उसको प्रेम समझते हैं। अविवेक में हम विभिन्न विषयों और व्यक्तियों से चिपकते हैं, आसक्त होते हैं -और उसको हम love समझते हैं ; ऐसा जीवन जिओगे तो क्या होगा ? ये जो सपना है , वो और भी मजबूत होता जाता है।
विवेक-वैराग्य साधन चतुष्टय सम्पन्न होकर आप जिओगे , जिस जीवन में आप किसी के साथ चिपकते नहीं हो , सबके साथ रहते हो।सबके भलाई के लिए काम कर रहे हो। लेकिन जानते हो -गुरु ने बताया है, कि ये (महामण्डल का पद-प्रतिष्ठा भी) एक सपना है। यहाँ किसी से चिपको मत। मन को निग्रहीत करके, इन्द्रियों को निग्रहीत करके , षट्सम्पत्ति सम्पन्न होकरके जब हम ऐसा जीवन जीते है - काम, क्रोध , लोभ , मद , मोह मात्सर्य -इन षडरिपुओं से ऊपर उठ करके जब हम जीवनको जियेंगे ; तब धीरे -धीरे इस सपने के प्रति हमारे अंदर जो सत्यत्व बुद्धि है वह कमजोर होने लगती है। वो कमजोर होते होते एक दिन ऐसा आएगा , जब यह सपना टूटेगा। और जिस दिन टूटेगा उस दिन आपके मुख से भी यही उद्गार निकलेगी - कहाँ चला गया ? कौन ले गया ? कहाँ विलीन हो गया ? जिसको मैं अबतक सत्य समझ रहा था, अब देख रहा हूँ वो है ही नहीं। यहाँ ईश्वर ही हैं , ईश्वर से अतिरिक्त न तो कोई जीव है , नतो कोई जगत है। ये परम् अनुभूति है। ये सम्भावना हम सबके अंदर छिपी हुई है, ये कभी न कभी होने वाला है। आज , 10 साल बाद , 10 जन्मों बाद लेकिन जैसा गुरु ने बताया , जैसा शास्त्र ने बताया यदि मनुष्य वैसा यथोचित जीवन जीता है। तो कभी न कभी इस लक्ष्य तक वो पहुँचने वाला है।
तो इस प्रकार वो शिष्य भी अपने लक्ष्य पर पहुंच गया है। अब उस शिष्य के मुँह से जो उद्गार निकल रहे हैं वो क्या सुंदर है ! क्या कह रहे हैं -
क्या सुंदर है ! पहलीबार जब ये शिष्य गुरु के पास आया था -तो हमने देखा उसकी मनःस्थिति क्या थी ? अत्यंत ही पीड़ा में , तप रहा है , डूब रहा है। मैं मर रहा हूँ। भयभीत हूँ। मैं आपके शरणापन्न हो गया हूँ। मुझपर कृपा करें , मुझे इस संसारसागर से ऊपर उठायें। ऐसी परिस्थिति थी , और इस प्रकार के योग्य शिष्य को देखकर के गुरु अत्यंत ही संतुष्ट हुए थे। याद है न ? गुरु संतुष्ट होकरके गुरु के मुख क्या शब्द निकला था ? (⚜️️🔱| Session 11 |🔱 विवेकचूडामणि सार |⚜️️🔱) कि बेटा तू धन्य है !
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि, पावितं ते कुलं त्वया।
यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ।॥ ५२ ॥
-गुरु कहते हैं -तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझ से पवित्र हो गया, क्योंकि तू अविद्यारूपी बन्धन से छूट कर ब्रह्मभाव को प्राप्त होना चाहता है। गुरु ऐसे शिष्य को देखकर बहुत खुश हो जाते हैं जो सत्य को जानने के लिए व्याकुल है। वह जानना चाहता है कि - मैं जिसको 'मैं' अपना 'मैं' समझ रहा हूँ , इस 'मैं ' का मतलब क्या है ? और वो यह भी जानना चाहता है कि यह विश्व-प्रपंच क्या है ? हम सब इसके बारे में भ्रमित हैं। इन्द्रियों जो कुछ दिखाई दे रहा है , उसके विषय में हमारी आज की जो धारणा (M/F) है , यह भ्रम है। तो सही वस्तु क्या है ? मैं कौन हूँ ? मेरा सत्य स्वरुप क्या है ? इसी विषय पर आगे चर्चा होगी। हम ईश्वर , भगवान आदि शब्द बोलते तो रहते हैं ; परन्तु ये भगवान कहाँ हैं ? हम उनको मन्दिरों में ढूँढ़ते रहते हैं। तीर्थों में ढूँढ़ते हैं ; ये सब खोज गलत नहीं है , ठीक है। लेकिन वास्तव में ईश्वर तत्व क्या है ? वो सत्य वस्तु क्या है? इस योग्य शिष्य को देखकर गुरु के मुख से जो शब्द निकलता है , वो है - धन्योऽसि ! बेटा तूँ धन्य है, तू धन्य है! -और कृतकृत्योऽसि।
गुरु ऐसे एक योग्य मोक्षार्थी को देखकर के बहुत संतुष्ट है - जो इस बंधन से मुक्त होना चाहता है ! कहाँ मिलते हैं ऐसे मोक्षार्थी ? संसार में ऐसे मोक्षार्थी तो दुर्लभ हैं , क्योंकि मोक्ष तो दुर्लभ है न। शुरुआत में ही शंकराचार्यजी क्या बताते हैं -ये मोक्षार्थी तो दुर्लभ हैं नं ? कहाँ हैं सृष्टि में मोक्षार्थी ? आप उँगलियों पर गिन सकते हैं। बंधन से मुक्ति चाहने वाला -सत्यान्वेषी कहाँ है ? (34:35) दुर्लभ है , तो इसप्रकार जब एक योग्य मोक्षार्थी को पाकर के गुरु अत्यंत ही प्रसन्न होकरके -गुरु के मुख से ये उद्गार निकलता है कि बेटा तू धन्य है ! तू कृतकृत्य है- क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा कार्य तू कर रहा है ! मनुष्य जन्म का सबसे बड़ा कार्य क्या है ? इस बंधन से मुक्त होने का प्रयास करना। वो तू कर रहा है , इसलिए तूँ कृतकृत्य है। और तेरे इस अविद्या-बंधन से मुक्त होने की कामना के कारण तेरा सारा कुल पवित्र होगया --पावितं ते कुलं त्वया। तेरा पूरा कुल पवित्र हो गया ! ऐसे उद्गार गुरु के मुख निकले थे।
अब जब शिष्य सारा उपदेश ग्रहण करने के पश्चात् -गुरु के बताये हुए मार्ग पर चलकरके जब खुद आत्मबोध , आत्मलाभ , ईश्वरलाभ कर लेता है , तब वही शिष्य आकर के वो क्या कहता है ? पहले तो गुरु ने शिष्य को कहा था कि तूँ धन्य है। अब शिष्य स्वयं कह रहा है कि मैं धन्य हूँ- मैं कृत-कृत्य हूँ ! धन्य हो गया मेरा जीवन , कृत-कृत्य हो गया मेरा जीवन। पहले तो गुरु उस शिष्य के प्रति कह रहे थे। अब शिष्य स्वयं कह रहा है - कि धन्य हो गया मेरा जीवन , कृत-कृत्य हो गया मेरा जीवन। धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं/ विमुक्तोऽहं - मैं मुक्त हो गया ! (36:12 ) वो पहले अज्ञान-अविद्या की बंधन दशा में आ गया था। अब कह रहा है कि मैं मुक्त हो गया !!
सारे बंधनों से Liberated हो जाता है ? आजाद होगया ! Can you imagine ? क्या आप कल्पना कर सकते हैं ?-यह 'अपरोक्ष अनुभूति ' एक अद्भुत अनुभव है! क्या यह केवल एक सिद्धांत मात्र है? आप यहाँ कहे गए प्रत्येक बात को खुद सत्यापित करके देख सकते हैं! हमलोग केवल श्रवण मनन करके कितना मुक्त होने का अनुभव कर रहे हैं कि नहीं ? सिर्फ श्रवण और मनन मात्र से ही मन कितना मुक्त हो रहा है देखिये ! It Is an amazing experience ! is it a theory? You can verify everything !जब अपरोक्ष अनुभूति होगी तो क्या होगा ? हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। सिर्फ श्रवण मनन मात्र से मन कितने प्रकार की बेड़ियों से मानों खुल रहा है कि नहीं ? आप शास्त्र का श्रवण पूरे भक्ति और श्रद्धा के साथ करोगे , आप देखोगे मन कैसे इन बंधनों से मुक्त होने लगता है। हमारा मन खुल रहा है। Is not an experience ? You can verify for yourself. तो फिर जब अपरोक्ष अनुभूति होगी तो -क्या होगा ? (कितना आनंद होगा !)
तो अब शिष्य कह रहा है -विमुक्तोऽहं! विमुक्तोऽहं भवग्रहात् । मैं मुक्त हो गया , मैं इस भवबंधन से मुक्त हो गया ! फिर आगे क्या -नित्यानन्दस्वरूपोऽहं ! मैं ये जान गया -मैं यह देह-इन्द्रिय का समुच्चय- मैं ये स्थूल शरीर या अनात्मा नहीं हूँ। मैं तो वो नित्यानन्द स्वरुप आत्मा हूँ। "शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम् (14 -4 -1992, बनारस के पहले पास ऊँच पुलिया) " 'वो' मेरा सत्यस्वरूप है ! मैं जन्म-मृत्यु रहित , अजन्मा , नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध , नित्यमुक्त आत्मा हूँ ! ऐसा मैं अनुभव कर रहा हूँ ! नित्यानन्दस्वरूपोऽहं !पूर्णोऽहं ! हर शब्द महत्वपूर्ण है - मैं पूर्ण हूँ ! मेरे अंदर कोई अपूर्णता है ही नहीं ! अच्छा तो ये सब हुआ कैसे ? त्वदनुग्रहात् - "त्वद अनुग्रहात् !" आपके अनुग्रह से , गुरु के अनुग्रह से, ईश्वर के अनुग्रह से , उस पगली माता काली के अनुग्रह से ! (परमानंद -सच्चिदानन्द के आनंद को त्याग कर फिर से शरीर में लौटना -क्या है, कैसे हुआ, महा-अद्भुतम ?) वो सब अपरोक्ष अनुभूति केवल उसी का अनुग्रह है ! नित्यानन्दस्वरूपोऽहं पूर्णोऽहं त्वदनुग्रहात् वो जो पगली है न ? जो सत्य को ढँकती भी है , और सत्य को दिखा भी देती है ! (38:19) वो चाबी केवल उसी के पास है -उसी के अनुग्रह से किसी को अपरोक्ष अनुभूति होती है। देखिये बिना अनुग्रह के यह नहीं होता -देखिये शुरुआत में भी अनुग्रह है। अंत में भी अनुग्रह है। सबकुछ अनुग्रह है - कृपा है ! उस अव्यक्त नाम वाली परमेश शक्ति की कृपा के बगैर , यहाँ पर कुछ भी नहीं होता। क्या सुंदर अनुभव है।
तो इसमें जो एक शब्द व्यवहार में आया है -पूर्णोऽहं !(38:47) तो देखिए जीव /मनुष्य जब तक अज्ञान में है , जीव जब तक अविद्या-ग्रस्त है, तब तक हम सब इस अपूर्णता से ग्रस्त हैं। है कि नहीं ? हम सबके अंदर अपूर्णता है , अतृप्ति का भाव है। तथा इस अपूर्णता और अतृप्त होने के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति मनुष्य अपने आप को पूर्ण करने का प्रयास कर रहा है। Man is marching towards perfection ! प्रत्येक जीव/मनुष्य पूर्णता की ओर अग्रसर होने का ही प्रयास कर रहा है ! लेकिन पूर्णता पाने का प्रयास वो गलत दिशा में कर रहा है ,और सोच रहा है कि संसार की वस्तुओं को -कामिनी कांचन या कीर्ति को प्राप्त करके वो पूर्ण हो जायेगा। वो समझता है कि विषयों को प्राप्त करके , एक बुलबुला दूसरे बुलबुले में डूबकर उसको लगता है कि मैं पूर्ण हो जाऊँगा ! कभी भी नहीं होने वाला है।
इस पूर्णता के मनोविज्ञान Psychology को समझ रहे हो? (39:19) एक बुलबुला दूसरे बुलबुले में चिपक कर सोचता है कि मैं पूर्ण हो जाऊँगा। यह कभी भी नहीं होने वाला है। वो बुलबुला जिस दिन अपनेआप को समुद्र जानेगा , तब जा के पूर्ण होगा। तो हमारा पूर्णत्व कहाँ है ? अपने सत्यस्वरूप को जानने में ही हमारा पूर्णत्व या ब्रह्मत्व अंतर्निहित है ! विषयों का उपभोग करके कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं हो सकता ! कोई भी व्यक्ति लैङ्गिक आकर्षण को प्रेम समझकर कितना भी भोग कर ले , वो कभी तृप्त नहीं होगा। मनुष्य चाहे जितना भी भोग कर ले हमलोग अतृप्त ही बने रहते हैं। इसीलिए हम कहते हैं - संसार को पकड़ने के लिए दौड़ना एक ऐसा दौड़ है , जिसमें हम पहुँचते कहीं नहीं हैं। (39:52) बस दौड़ते रहते हैं , और दौड़ते दौड़ते थक जाते हैं। शरीर तक जायेगा , शरीर एक दिन मर जायेगा। और दुबारा दूसरे शरीर में दौड़ शुरू होगा। यह दौड़ उस अंधकूप में गिरने के समान है जिसकी कोई तली है ही नहीं। हम बस गिरते जा रहे हैं , गिरते जा रहे हैं, पहुँचेंगे कहीं भी नहीं। यह जीवन समाप्त हो जायेगा , और फिर एक दूसरे शरीर में नया जीवन शुरू हो जायेगा। (पूर्णता perfection/divinity बुलबुले में ही अंतर्निहित है , बाहरी किसी दूसरे बुलबुले से चिपककर पूर्ण होने की कोई सम्भावना ही नहीं है।) यही पुनरपि जननं पुनरपि मरणं,पुनरपि जननी जठरे शयनम्। यही संसारी आवागमन चलता रहता है।
लेकिन ये शिष्य अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच चुके हैं। इनका अज्ञान , अविवेक , अविद्या चली गयी है। अब ऐसा जो ब्रह्मज्ञानी है , उसकी अनुभूति क्या होती है ? कुछ अन्य श्लोकों को भी ले लेते हैं। जब इस अपरोक्षानुभूति होगी और हम सत्य को जान लेंगे ,तो उसको क्या दिखाई देता है ? आज हम अज्ञान में हैं , और हमको क्या दिखाई देता है ? देखो ये दो चित्र हैं -शंकराचार्यजी को क्या दिखाई देता है ? हमको क्या दिखाई देता है ? विवेकानन्द को क्या दिखाई देता है ? हमको क्या दिखाई देता है ? रामकृष्ण परमहंस को क्या दिखाई देता है ? रमणमहर्षि को क्या दिखाई देता है ? हमको क्या दिखाई देता है ? ये दो बिल्कुल ही अलग चित्र हैं -देखो
कितनी सुंदर बात कहते हैं - अज्ञान -अविवेक, (महामाया माँ काली) ने हमारे शिवत्व को अर्थात विवेक-प्रयोग क्षमता को ढँक दिया था -इस लिए मैं एक ही ईश्वर को अनेक नाम-रूपों में देख रहा था -- यदिदं सकलं विश्वं, नानारूपं प्रतीतं अज्ञानात् ! जब तक हम अज्ञान में हैं-जब तक हमको पता नहीं है कि रेगिस्तान में जो पानी दिखाई दे रहा है , वहां एक बून्द पानी नहीं है। ये मरुमरीचिका है हमको पता नहीं है। तब तक तो हम पानी ही देख रहे है। और लगता है कि पानी ही सत्य है। अज्ञान में हमको लगता है कि वहाँ पानी है। इसीलिए कहते हैं -यदिदं सकलं विश्वं,नानारूपं प्रतीतं अज्ञानात् ! अज्ञान (अविद्या) के बंधन से ग्रस्त होकर मैं जो पूरा विश्व-प्रपंच देख रहा था , नाना रूप का है जगत। यहाँ पर विचित्रतायें भरी हुई है ! पेड़-पौधे , कीड़े-मकोड़े , पसु-पक्षी, मनुष्य में नाना रूपों के मनुष्य हैं। अज्ञान में अद्भुत विस्मयकारी विश्व-प्रपंच हमको दिखाई देता है ! और हमको लगता है कि यही सत्य है ? 'प्रतीतं अज्ञानात्' अज्ञान में मैं विचित्रताओं से भरा जो ये विश्व-प्रपंच देख रहा था, और जिसके प्रति मेरे अंदर में पहले सत्यत्व बुद्धि हुआ करती थी।
जब ज्ञान हुआ तब क्या देखता हूँ ? तत् सर्वंब्रह्मैव!! ये जो भी दिखाई दे रहा है -ब्रह्म ही है! यह ईश्वर ही है। जीव और जगत प्रपंच अलग से कुछ नहीं है-ये ब्रह्म ही है। (43:02) 'तत् सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्त अशेष भावना दोषं ' - जब हमारे अंतःकरण का भावना दोष प्रत्यस्त हो जाता है , मतलब चला है , अर्थात अज्ञान की जब निवृत्ति होती है , तब उस व्यक्ति की अनुभूति क्या होती है ? मैं जिसको जीव और जगत समझ रहा था - वो सब क्या है ? ईश्वर ही है , ईश्वर से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यहाँ ईश्वर ही विद्यमान हैं। रेगिस्तान में रेत ही विद्यमान है, तालाब नहीं है ! इसी प्रकार यहाँ पर जो भी मैं देख रहा हूँ , यह जीव-जगत नहीं है। जिसको मैं अज्ञान में जीव-जगत समझ रहा हूँ , वह ज्ञानी के लिए ब्रह्म ही है। ब्रह्म ही इस रूप में प्रकट हो रहा है। ईश्वर ही इस जीव-जगत के रूप में प्रकट हो रहा है।
उस महावाक्य को फिर से याद रखना - " किसी व्यक्ति अंदर अगर ढूँढ़ो, तो वो व्यक्ति चला जाता है; ईश्वर प्रकट हो जाता है।" व्यक्ति कहाँ गया ? ईश्वर ही है , जो इन सब व्यक्तियों के रूप में है। मेरे सम्मुख बैठे इन सभी युवक -युवतियों के रूप में ईश्वर ही विद्यमान है ! इन सभी व्यक्तियों के रूप में ईश्वर ही विद्यमान है। जगत को खोजो तो जगत अदृश्य हो जाता है , जीव जगत के रूप में ईश्वर ही है। जीव-जगत के रूप में ईश्वर प्रकट हो रहा है। ईश्वर से अतिरिक्त , ब्रह्म से अतिरिक्त यहाँ पर कुछ भी नहीं है। यही वेदांत है - यही वेदों का अंतिम सत्य है!
स्थूणा-खनन न्याय (हथौड़े से खूँटा गाड़ना) : हमलोग हर रोज नारायण सूक्त को क्यों -chant करते हैं ? आप लोग सोंच रहे होंगे -हमलोग रोज एक ही chant क्यों करते हैं ? ताकि वो मंत्र हमारे अंदर बैठ जाये। हमलोग अन्य बहुत से श्लोक का मंत्रोच्चार कर सकते थे। किन्तु यह एक मुख्य विचार को हमारे ह्रदय में प्रविष्ट कराने के लिए है। हर रोज हम - शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम् ही chant क्यों कर रहे हैं ? हर रोज अलग-अलग chant क्यों न करें ? कर सकते हैं। निर्वाण-षट्कम का पाठ या मंत्रोच्चार करने की बात यहाँ पाण्डित्य दिखाने की नहीं है , सत्य को हमारे हृदय के अंदर प्रविष्ट कराने की है ! इसलिए हर रोज ये hammeringकरने जैसा प्रयास है, लोहा तपाकर गढ़ना या जीवन गढ़ना जैसी बात है। Life Building :जीवन-गठन करने का प्रयास है। वेदांत में एक स्थूणा-खनन न्याय (45:20)एक दृष्टांत-वाक्य या न्याय है। लोहे का खूँटा गाड़ने में उसे दृढ़ करने के लिये hammering की युक्ति की जाती है, अपने पक्ष-समर्थन में वैसा करना । जैसे आपको अगर पिच रोड परलोहे का कील या खूँटा अगर गाड़ना हो तो एक बार ठोकने से तो नहीं घुसेगा। हथोड़ा से आपको बार बार मारना पड़ता है। एक बार मारते हो तो थोड़ा घुसता है। फिर इस कीले को निकाल कर दुबारा उसी स्थान पर रखकर मारते हो। फिर दोबारा मारो , फिर निकालो। फिर दोबारा मारो। तब दोबारा थोड़ा अंदर जाता है। फिर निकालो , फिर मारो , ऐसा मर मार कर उसको घुसाना पड़ता है। इसको स्थूणा- खनन न्याय कहते हैं। तो हर रोज हमलोग निर्वाण-षट्कम पाठ कर रहे है , तो क्या कर रहे हैं? हर रोज हमलोग एक ही बात को ठोक रहे हैं ! उसको दिमाग में घुसा रहे हैं , हमारी बुद्धि इतनी मोटी बुद्धि है न ? अपना सत्य स्वरुप इसमें घुसता नहीं है। प्लास्टर का जमीन अगर मोटा होता है, तो उसमें कीला घुसता है क्या ? हमारी बुद्धि तो मोटी बुद्धि है , इसके अंदर ये विचार -
घुसता है क्या ? नहीं घुसता है। इसीलिए हमलोग रोज नारायण सूक्तं पाठ करते हैं। एक चीज आपके दिमाग में बैठ जाना चाहिए -
यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा
अन्तर्बहिश्र्च तत्सर्वं व्याप्य नारायण: स्थित:||
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
हम नारायण के साथ संवाद करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं, वह विष्णु हमें (महान लक्ष्य की ओर) निर्देशित करें।
यहाँ जो भी है , सब एक नारायण ही है , नारायण से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। ये वेदों की अंतिम उद्घोषणा है। यही वेदांत है - इस जगत में जो कुछ भी देखा जाता है,सुना जाता है, जो कुछ भी ( शरीर के ) अन्दर और ( शरीर के बाहर ) बाहर व्याप्त ( स्थित ) है, वह सब स्वयं भगवान नारायण में ही स्थित हैं।
वेदों की अंतिम उद्घोषणा है -शिवोऽहम् शिवोऽहम् ! और आप वह हो ! आप यह नश्वर शरीर नहीं हो , आप तो अजर-अमर -अविनाशी आत्मा हो ! शिवोऽहम् शिवोऽहम्, शिवोऽहम् शिवोऽहम् ! 'सत्यं वद'- सब समय सत्य बोलिये ! शिवोऽहम् शिवोऽहम् यही सत्य वचन है !अंतिम सत्य यही है कि ईश्वर से अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।शिवोऽहम् से अतिरिक्त यहाँ पर कुछ भी नहीं है।
मनोबुद्ध्यहङकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥॥
बाकि सब जो दिखाई दे रहा है -वो क्या है ? बाकि सब हम केवल कल्पना कर रहे हैं। यही अंतिम सत्य है। आज भले हम उस अंतिम सत्य की अनुभूति से कोसों दूर हैं , या दूर हो सकते हैं। लेकिन गुरु के बताये हुए मार्ग पर (अष्टांग मार्ग,साधन-चतुष्टय पर) जब हम चलेंगे , तो धीरे धीरे ये जो सत्य है , उसकी प्रतीति हमें धीरे -धीरे होने लगेगी। धीरे धीरे ; ये एक दिन में होने वाली बात नहीं है। आप दो-एक दिन मनःसंयोग करके छोड़ देंगे -तब ये नहीं होगा। अभी आप कैम्प में हो घर वापस जाने के बाद यदि 5 अभ्यास नहीं करेंगे ? तो फिर वैसा ही रहेगा। 'But if you continue ' यदि आप नियमित अभ्यास जारी रखोगे , तो आप उसका फल देखोगे। धीरे धीरे एकत्व की अनुभूति आपके अन्तःकरण में भी होने लगेगी।
ॐ शांति शांति शांतिः ॥ ओम. शांति, शांति, शांति हो
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[जब आदि गुरु शन्कराचार्य जी की अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय माँगा । बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है… यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।("मनोबुद्धयहंकार- चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।") 14 -4-1992 बनारस के निकट ऊँच की अनुभूति। 1992 में महामण्डल का सचिव - संदीप मुखर्जी था ! जिसने दादा को खबर दिया था।]