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सोमवार, 21 नवंबर 2016

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [2] ' अनुसरण ही सच्चा स्मरण है '

स्वामी जी ने ऐसा क्यों कहा था - 
'अशिक्षित लोगों को प्रकाश दो, किन्तु शिक्षित लोगों को और अधिक प्रकाश दो !'   
स्वामी विवेकानन्द ( नरेन्द्रनाथ दत्त ) का जन्म एक सौ पचास वर्ष पूर्व १२ जनवरी, १८६३ ई० को  हुआ था। और ४ जुलाई १९०२ को, मात्र ३९ वर्ष की आयु में ही, मानो किसी आँधी की सदृश्य उन्होंने सपूर्ण विश्व को ही झकझोर देने के बाद उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया था। जिस समय वे जीवित थे, पहले हमने उनके विचारों का विरोध किया था, उनकी निन्दा की थी, उनके उपर झूठे आरोप लगाये थे, और उन आरोपों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करने की चेष्टा भी की थी। फिर उनको प्यार भी किया था, प्रशस्ति-पत्र दिए थे, उनके स्वागत में तोरण-द्वार सजाये थे, उनके रथ को घोड़ों से खिंचवाने के बजाय मनुष्यों से खिंचवाया था, धन्यवाद कहा था, उनके प्रति श्रद्धा दिखलाये थे, उनकी पूजा की थी।
आज, उनके चले जाने के ९५ वर्ष बाद भी हमलोग उनके आविर्भूत होने को स्मरण करके ,उनके प्रति विभिन्न प्रकार से अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं। किन्तु हमलोगों के सामाजिक जीवन में आज मानो एक ऐसा संधि-क्षण उपस्थित हुआ है जब कुछ लोग, थमक कर यह सोचने को विवश हो जाते हैं कि हमलोग अभी जिस रूप में स्वामीजी की जन्मजयंती आदि मना, रहे हैं, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त  करने का वह तरीका ठीक भी है या नहीं? लगता है शायद नहीं ! क्योंकि, तब हमलोग सोचते, उनके विचार तो बहुत अच्छे और उपयोगी प्रतीत होते हैं, किन्तु उनके संदेशों को देख-सुनकर और समझ-बुझकर आगे बढ़ना श्रेयस्कर होगा। किन्तु हम वैसा नहीं कर रहे हैं।  ९५ वर्ष पहले के दिनों में विवेकानन्द के प्रति हमलोगों ने जो विरोधिता एवं उत्साही-आवेग दोनों ही भाव प्रदर्शित किये थे, वे बहुत हद तक हमारे मन की संकीर्णता एवं जड़ता तथा अतिशय भावुकता और परिणाम थे। अभी का यह उत्साह ('विवेकानन्द रथ ' के पीछे-पीछे चलने वाला अभी का यह आवेग) भी लगभग उसी प्रकार का है। 
किसी कार्य को करने के पहले हमलोग अक्सर  खूब सोच-बिचार  करने के बाद कदम नहीं बढ़ाते हैं। किसी व्यक्ति या भाव को ग्रहण करते समय केवल,अपने तात्क्षणिक-भावना या अपनी पसन्द या नापसन्द को ही अधिक महत्व देते हैं, विवेक-विचार करके यह देखने की चेष्टा नहीं करते कि जिस आदर्श या उद्देश्य को हम ग्रहण कर रहे हैं, या वहिष्कार कर रहे हैं, उसका अपना तात्विक मूल्य (intrinsic value) कितना है ?  बिना जाने समझे ही दल बनाकर किसी की भी पूजा करना, या अपनी अज्ञानता के कारण किसी उच्च आदर्श की उपेक्षा कर देने से अधिक श्रेयस्कर है, रुककर थोड़ा सोच-विचार करना। किसी के कहने पर नहीं, स्वयं एक व्यक्ति के रूप में विवेक-विचार से निर्णय करके देखूँगा कि जिस व्यक्ति को मैं अपना आदर्श मानने जा रहा हूँ, उसके कौन -कौन से भाव (चरित्र के गुण) सचमुच अच्छे हैं, और मेरे लिए अनुकरणीय हैं ? इस प्रकार विवेक-विचार करने के बाद ही उन भावों को या तो ग्रहण करूँगा या उनका वहिष्कार कर दूँगा। 
इस प्रकार विवेक-प्रयोग करने के बाद किसी भाव का वहिष्कार करने से भी क्षति नहीं होगी। और एक बार यदि कुछ भावों को आदर्श मान कर ग्रहण कर लिया, तो पूरी आस्था के साथ उन भावों को कार्यरूप देने की चेष्टा में लग जाना होगा। क्योंकि यदि उन उच्च भावों जीवन में नहीं अपनाया गया तो, उन भावों को ग्रहण करने का कुछ अर्थ ही नहीं है। स्वामी विवेकानन्द या अन्य किसी  (नवनी दा?)के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का तब तक कोई विशेष मूल्य नहीं है, जब तक हमलोग उनके भाव (सदगुणों को) को निष्ठा के साथ ग्रहण न कर सकें,तथा उन भावों को अपने जीवन में एवं समाज में रूपायित करने की चेष्टा न करें। इन दिनों हमलोग जिस प्रकार अश्रद्धा प्रकट करने के लिए भी समारोह आयोजित करते हैं, उसी प्रकार से कई लोगों के प्रति श्रद्धा-सुमन भी चढ़ा आते हैं। 
इस प्रकार, वर्ष भर  लगातार एक के बाद एक विभिन्न महानुभावों का शत-वार्षिक समारोहों को आयोजित होता देखने से आश्चर्य भी होता है, कि इस भारतवर्ष में पहले इतने सारे एक के बाद एक स्मरण करने योग्य व्यक्ति क्या सचमुच भारत में आविर्भूत भी हुए थे ! हमलोग प्रत्येक वर्ष बहुत से  महापुरुषों की जन्म-जयन्ती मनाते हैं, या स्मरण-सभाओं का आयोजन करते हैं। किन्तु  उसके साथ साथ यदि उनके भावों को आचरण में उतारने  की चेष्टा भी करते हों, तभी यह निर्धारित होगा कि ,हमलोग  उनका स्मरण कितनी आंतरिकता के साथ करते हैं और उसका मूल्य कितना है? अतः यदि हमलोग स्वामी विवेकानन्द का स्मरण करना चाहते हो, तो कम से कम उनका अनुसरण करने की चेष्टा तो हमें करनी ही चाहिये। क्योंकि यदि (या अब नवनी दा के लिये स्मरण-सभा का आयोजन तो करना चाहते हों, किन्तु ) उनका भी अनुसरण हमलोग नहीं कर सकें, तो उनके नाम पर आयोजित होने वाली समस्त स्मारक सभायें निरर्थक हो जायेंगी। इसलिये प्रश्न उठता है कि उनका (नवनी दा का) अनुसरण किस प्रकार किया जाय ?  कहाँ और किस क्षेत्र में हम लोग उनका (नवनी दा का ) अनुसरण कर सकते हैं ? यदि हम सचमुच उनका स्मरण करना चाहते हों, तो पहले यह विचार करना पड़ेगा कि उनका  (नवनी दा का ) मूल भाव (The main idea) क्या है
हमलोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य का सही रूप में 'मनुष्य बन जाना' (মানুষ হয়ে ওঠা); या मनुष्य को सही 'मनुष्य बना देना' (মানুষ করে তোলা) --यही उनका मौलिक विचार (brainchild या अपना विचार) है। 
यदि ऐसा है, तब तो मनुष्य के जीवन के समस्त क्षेत्रों में इस विचार-धारा को रूपायित कर देना सम्भव है; और समाज के सभी स्तर पर रहने वाले मनुष्यों के बीच इस कार्य को किया जा सकता है। इस विचार का उपयोग देश-काल की सीमारेखा  के परे (स्थानिक दूरी एवं सामयिक दूरी, या टाइम ऐंड स्पेस ) भी किया जा सकता है।  क्योंकि मनुष्य की सत्ता (पूर्णता या आत्मा ) सभी देशों और सभी युग में एक ही रहती है। उस सत्ता (पूर्णता) की अभिव्यक्ति विभिन्न देशों या विभिन्न युगों में अलग अलग हो सकती है। (देश-काल -पात्र के अनुसार पूर्णता ही  अपने को ईसा, बुद्ध, मोहम्मद, नानक, कबीर, राम-कृष्ण, श्रीरामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, नवनी दा के रूप में अपने को अभिव्यक्त करती है !) इसीलिये कोई भी अवरोध, चाहे समस्त प्रकार की संकीर्णता हो, या विशिष्ट आदर्श की सीमा हो,इसे सीमित नहीं कर सकते। स्वामी जी (और नवनी दा भी) सभी देशों के सभी मनुष्यों को उसकी पूर्णता को अभिव्यक्त करने की दिशा में अग्रसर होने में सहायता करना चाहते थे
इसीलिये,जिन मनुष्यों में संभावनाओं की अभिव्यक्ति सबसे कम हो सकी है,उनकी दृष्टि विशेष रूप से उनके उपर आकृष्ट हुई थी। जो लोग मूर्ख हैं, दरिद्र हैं, जो समाज में सबसे अधिक उपेक्षित और पददलित हैं, उनके प्रति स्वामी विवेकानन्द की संवेदना (compassion) सबसे अधिक थी। किन्तु इसके बावजूद, उनहोंने अपने क्रमानुयायियों (Successor, उत्तराधिकारी भावी नेताओं) के सामने एक अभूतपूर्व अनुरोध (appeal) रखा था। उन्होंने कहा था- गरीबों को प्रकाश दो। किन्तु धनी लोगों को और अधिक प्रकाश दो, क्योंकि वे लोग उनकी अपेक्षा अधिक गहरे अंधकार में गिरे हुए हैं। अशिक्षित लोगों को प्रकाश दो, किन्तु शिक्षित लोगों को और भी अधिक प्रकाश दो, क्योंकि वर्तमान समय में उच्च शिक्षा (डॉक्टरेट की डिग्री) का अहंकार बहुत अधिक बढ़ गया है। इसीलिये, जो लोग धन या विद्या के अहंकार (arrogance) में चूर हैं, वे भी कम करुणा के पात्र नहीं हैं। क्योंकि वे लोग समाज के उपेक्षित मनुष्यों (देवताओं) की सेवा करने का अवसर पा कर भी उसका सदुपयोग नहीं करते। जो लोग गरीबों के शोषण से प्राप्त धन को खर्च करके शिक्षित हुए हैं, किन्तु पढ़-लिख लेने के बाद उनके सम्बन्ध में कुछ नहीं सोचते, उनको ही स्वामीजी ने देशद्रोही के रूप में चिन्हित किया था। उन्होंने कहा था कि जब तक उनके देश का एक कुत्ता भी भूखा है, उसको रोटी देना ही मेरा धर्म है। 
इसीलिये आज यदि हम उनका अनुसरण करना चाहते हों, तो हमलोगों के लिये इस बात को ठीक तरीके से समझ लेना आवश्यक है कि स्वामी विवेकानन्द (नवनी दा) अपने सक्सेसर्स (उत्तराधिकारियों) से क्या चाहते थे ? जब उनको पहली बार देखा, तो वे कैसे लगे -(नवनी दा या स्वामीजी को देखा तो ऐसा लगा जैसे शायर का ख्वाब, जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया, हो!) या देखने से- वे हमें कैसे लगते हैं, उसी को लेकर बैठे रहना भावुकता का लक्ष्ण है। 
विवेकानन्द के प्रभावशाली मुखमण्डल या गेरुआ वस्त्र (या नवनी दा की पेनीट्रेटिंग दृष्टि) को देखकर, विवेक-रहित तरीके से अभिभूत न होकर, हमें यह उपलब्धी करनी होगी कि उनका गेरुआ वस्त्र (और नवनी दा के चश्मा के भीतर से भेदनकारी दृष्टि) उनके अनन्त-जीवन के संग्राम का प्रतिक है। उनको स्मरण करना तभी सार्थक होगा जब हमलोग उनके मौलिक भाव (प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है)- को समझने की चेष्टा करें तथा स्वयं,भले ही वह कितने ही छोटे पैमाने पर क्यों न हो-  उस मौलिक भाव का अनुसरण भी करें। 
 हमलोगों ने सामाजिक दृष्टि से -व्यापक रूप में यह समाज क्या है, या प्रत्येक मनुष्य वास्तव में क्या है ; इस दृष्टि से हमने उनके मौलिक भाव को (नवनी दा के ब्रेन्चाइल्ड -अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल कोसमझने की चेष्टा ही नहीं की है। उनका अनुसरण करना तो अभी भी बड़े दूर की बात है।
 इसलिये आज स्वामीजी की १५० वीं जयन्ती  '१२ जनवरी ' के अवसर पर (और नवनी दा के आगामी ८५ वीं जयन्ती १५ अगस्त २०१७ मनाते हुए) उनको स्मरण करते समय, इन बातों को हमें भूलना नहीं चाहिये। 
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[अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के संस्थापक, सचिव और बाद में अध्यक्ष श्री नवनीहरन मुखोपाध्याय (हमलोगों के नवनी दा) ने २६ सितंबर २०१६ को कोन्नगर स्थित महामण्डल भवन में अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया, और श्रीरामकृष्ण लोक चले गये। उनका  जन्म १५ अगस्त १९३१ को श्री रामकृष्ण परमहंस के पार्षद महिमाचरण चक्रवर्ती के काशीपुर स्थित निवासस्थान में हुआ था। महिमाचरण चक्रवर्ती की पुत्री तुषारवासिनी देवी के साथ नवनी दा के पितामह शिरीषचन्द्र मुखोपाध्याय का विवाह हुआ था, और उन्हीं की सन्तान थे नवनीहरन के पिता डॉ. इन्दीवर मुखोपाध्याय। नवनी दा की पूजनीया माता जी का नाम था, उषारानी देवी। नवनीहरन मुखोपाध्याय के पितामह शिरीषचन्द्र मुखोपाध्याय तथा उनके अग्रज यतीषचन्द्र मुखोपाध्याय दोनों प्रेसिडेंसी कॉलेज के मेधावी छात्र थे, तथा श्रीरामकृष्ण के पार्षद नाटककार महाकवि गिरीशचन्द्र घोष के अंतरंग मित्र थे। नवनी दा की संक्षिप्त जीवनी बंगला और अंग्रेजी में महामण्डल द्वारा प्रकाशित हुई है, अगले अंक में उसका हिन्दी अनुवाद देने की चेष्टा करूँगा। ....... तब तक 
'Inter State Be and Make ' ग्रूप से जुड़े सभी भाइयों के लिये एक निवेदन :स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना ' नामक महामण्डल पुस्तक में 'स्वामी विवेकानन्द -व्यक्ति और मन', के अन्तर्गत ९ निबन्धों को रखा गया है। पूज्य नवनी दा के शरीर त्याग देने के बाद यदि हम इस शीर्षक को ऐसे पढ़ें - 'श्री नवनीहरन मुखोपाध्याय और हमारी सम्भावना ' तथा प्रथम विचार बिन्दु -'को ऐसे पढ़ें -'श्री नवनीहरन मुखोपाध्याय-व्यक्ति और मन '। और उनके शरीर त्याग के बाद जो 'स्मरण सभा', उनकी जीवनी और वीडियो प्रकाशन आदि तो प्रकाशित हुए हैं; उसी क्रम में इस लेख का शीर्षक - 'नवनी दा अनुसरण ही सच्चा स्मरण है !' के आलोक में इन निबन्धों को फिर से पढ़ा जाय तो महामण्डल कर्मियों को लाभ होगा -ऐसा मेरा विचार है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, ' स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना ' के सभी ७३ लेखों को फिर से अनुवादित किया जा रहा है।] 
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुंदर सर । इसीलिए मैं कहता हूँ कि पूज्य नवनी दा को आपने सबसे अच्छी तरह समझा है। और सबने भी उनके पितृवत मातृवत और भातृवत स्नेह की अनुभूति की है लेकिन कोई उसे आपकी तरह अभिव्यक्त करने में समर्थ नहीं है। आपको शतश नमन

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