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बुधवार, 20 अगस्त 2025

⚜️️🔱विद्वन् मा भैष्ट ! संसारसिन्धो: तरणे उपाय: अस्ति।⚜️️🔱| Session 11 |🔱 विवेकचूडामणि सार |⚜️️🔱 (स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज, अध्यक्ष, अद्वैताश्रम मायावती।) ⚜️️🔱 [https://www.sadhanapath.in/2025/07/51.html]

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,
 निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,
 तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥

(वेदसार शिवस्तव स्तोत्र) 

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ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः  

 

 (स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज, अध्यक्ष, अद्वैताश्रम मायावती।)
 

      (1.53मिनट)  पिछले सत्र में हमने देखा कि एक योग्य शिष्य कौन है ? और एक योग्य गुरु कौन है ? ये शिष्य अब गुरु  के पास आता है और गुरु के शरणापन्न होके, गुरु से वो याचना करते है कि उसे इस संसार सागर में डूबने से बचायें। शिष्य के शब्द बड़े सुंदर हैं - मैं भयभीत हूँ, इस संसार रूपी दावाग्नि से मैं तप्त हो रहा हूँ ,आपकी शरण में आया हूँ। कृपा करके मुझे इस बंधन से बचाइए।  

       ये शिष्य अपने गुरु से 7 प्रश्न करते हैं , और ये सम्पूर्ण विवेक-चूड़ामणि उन 7 प्रश्नों का उत्तर है। ये प्रश्न ऐसे गहन और गंभीर हैं , जो सामान्य किसी मनुष्य की बुद्धि में ही नहीं आएगी। क्योकि ये प्रश्न एक साधक के प्रश्न हैं , एक मुमुक्षु के प्रश्न हैं। ऐसा एक मनुष्य है -जो बंधन को महसूस कर रहा है , और बंधन से मुक्त होना छह रहा है। दिखिए वे कितना गंभीर प्रश्न उठा रहे हैं - [https://www.sadhanapath.in/2025/07/51.html] (3.56 मिनट )

को नाम बन्धः कथमेष आगतः
कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः ।
कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा
तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ ५१ ॥ 

  अर्थ:-बन्ध क्या है? यह कैसे हुआ? इसकी स्थिति कैसे है? और इससे मोक्ष कैसे मिल सकता है? अनात्मा क्या है? परमात्मा किसे कहते हैं? और उनका विवेक (पार्थक्य ज्ञान) कैसे होता है? कृपया यह सब कहिये।  

[ यह श्लोक विवेकचूडामणि का ५१वाँ श्लोक है, जिसमें शिष्य गुरु से अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता है। शिष्य जानना चाहता है कि यह बन्धन क्या है, जो जीव को संसार में बाँधे हुए है। यह बन्धन किस प्रकार उत्पन्न हुआ? इसकी सत्ता कैसे बनी रहती है? और इससे छूटकर मुक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? इसके अतिरिक्त, वह यह भी जानना चाहता है कि अनात्मा कौन है – वह क्या है जिसे हम ‘मैं’ समझ रहे हैं पर वास्तव में आत्मा नहीं है। फिर वह परमात्मा – जो साक्षात् आत्मा है – कौन है? और अनात्मा तथा परमात्मा के बीच भेदबुद्धि या विवेक कैसे किया जाता है? 

     शिष्य के ये प्रश्न आत्मज्ञान की प्राप्ति की दिशा में आवश्यक आधार तैयार करते हैं। क्योंकि जब तक साधक यह नहीं जानता कि किससे छुटकारा पाना है और किसका साक्षात्कार करना है, तब तक उसके प्रयास लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। 

     बन्धन का अर्थ है – जीवात्मा की असली स्वतंत्र, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, नित्य स्वरूप से विमुख होकर देह आदि उपाधियों से तादात्म्य। यह तादात्म्य ही बन्धन का मूल कारण है। यह कैसे उत्पन्न हुआ? शास्त्र कहते हैं कि यह अज्ञान या अविद्या के कारण ही हुआ। जैसे कोई व्यक्ति अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेता है, वैसे ही आत्मा को न जानने के कारण जीवात्मा अपने को शरीर, इन्द्रिय, मन, अहंकार से एक मान बैठता है। यह अज्ञान कालातीत है – अर्थात् प्रारम्भरहित है – परन्तु इसका अन्त ज्ञान के उदय से ही हो सकता है। अज्ञान से ही यह मिथ्या सत्ता प्रकट होती है और उसी से यह बन्धन टिकता है। इसीलिए इसकी प्रतिष्ठा केवल अज्ञान में ही है – जैसे स्वप्न केवल स्वप्नवस्था में ही यथार्थ प्रतीत होता है। 

     मोक्ष का अर्थ है – इस अज्ञान का पूर्ण नाश। जब यह अज्ञान मिट जाता है, तब आत्मा का स्वतः प्रकाश हो जाता है। तब यह भान होता है कि आत्मा सदा मुक्त ही थी, नित्य शुद्ध बुद्ध स्वरूप है। मोक्ष किसी कर्म से उत्पन्न होने वाली कोई नवीन अवस्था नहीं है। यह तो ज्ञान का प्रकट होना है – जैसे बादल हट जाने पर सूर्य का प्रकाश स्वयं ही दिखने लगता है। शास्त्र में कहा गया है – ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते – ज्ञान की अग्नि सब अज्ञानजन्य कर्मों को भस्म कर देती है। 

     यहाँ ‘अनात्मा’ से तात्पर्य है – वह सब जो आत्मा नहीं है। शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, सुख-दुःख आदि सब अनात्मा हैं। ये पंचकोशों में व्यवस्थित रहते हैं – अन्नमय कोश (भौतिक शरीर), प्राणमय कोश (जीवन-शक्ति), मनोमय कोश (मन), विज्ञानमय कोश (बुद्धि) और आनन्दमय कोश। यह सब आत्मा नहीं है, पर इनके कारण आत्मा सीमित और बन्धनयुक्त प्रतीत होता है। 

      ‘परमात्मा’ वह चैतन्य तत्व है, जो अनादि, अनन्त, नित्य, साक्षी स्वरूप, अकर्ता और सदा मुक्त है। वह अद्वितीय है – उसमें कोई भेद नहीं है। वही वस्तुत: जीवात्मा का असली स्वरूप है। उसका साक्षात्कार ही मोक्ष है। अनात्मा और आत्मा के विवेक का उपाय शास्त्र-श्रवण, मनन और निदिध्यास ही है। पहले शास्त्र के प्रमाण से सुनना, फिर तर्क से शंका निवारण करना और अन्त में ध्यानपूर्वक निरन्तर आत्मा में ही स्थित होना – यह क्रम विवेक उत्पन्न करता है। 

गुरु से यह सब पूछकर शिष्य यह दर्शाता है कि उसमें मुक्ति की तीव्र लालसा है। क्योंकि ये प्रश्न किसी साधारण जिज्ञासा से नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की उत्कट आकांक्षा से उपजे हैं। यही प्रश्न और उनका समाधान साधक को अज्ञान के तिमिर से परम ज्ञान के सूर्य की ओर ले जाते हैं।]

  पहला प्रश्न है 'को नाम बन्धः  ?' ये बंधन क्या है ? दूसरा प्रश्न है - 'कथमेष आगतः?' ये बंधन आया कहाँ से ? तीसरा प्रश्न है -कथं प्रतिष्ठास्य ?--यह कैसे हमारे जीवन में चल रहा है ? How is it Continuing ? यह हमारे जीवन में चल कैसे रहा है ? और चौथा प्रश्न है -कथं विमोक्षः  इस बंधन से हम मुक्त कैसे होंगे ? पाँचवा प्रश्न है -कोऽसावनात्मा ? - यह अनात्मा क्या है ? फिर छटवाँ प्रश्न है -परमः क आत्मा? परम का आत्मा  क्या है ? सातवाँ प्रश्न है - तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम्? इन दोनों का विवेक हम कैसे करें ? कृपा कर के मुझे बता दोजिये। तो ये सात प्रश्न हैं। 

        पहला प्रश्न - बंधन क्या है ? दूसरा प्रश्न है -ये बंधन आया कहाँ से ? तीसरा प्रश्न है -ये बंधन हमारे जीवन में चल कैसे रहा है ? चौथा प्रश्न है इस बंधन से हम मुक्त कैसे होंगे ? पंचम प्रश्न है -अनात्मा क्या है ? षष्ठ प्रश्न है -आत्मा क्या है ? सप्तम प्रश्न है - आत्मा और अनात्मा के बीच में विवेक कैसे करें ? ये प्रश्न पूरे मानव-समाज का प्रश्न है। ये सम्पूर्ण मानवजाति का प्रश्न है। इसलिए हिन्दू सनातन धर्म किसी एक जाति या राष्ट्र का धर्म नहीं है। किसी एक सम्प्रदाय या मजहब की बात नहीं है। किसी एक गुट की बात नहीं है। हम लोग यहाँ मनुष्य -जाति के सार्वभौमिक समस्याओं की बात कर रहे हैं।  Its relate to everybody - ये प्रश्न हर मनुष्य से जुड़े हुए हैं। कोई अमेरिका में रहने वाला (ट्रम्प) हो वह भी उतना ही बंधन में है , जितना यहाँ मायावती में रहने वाला है। जो यहाँ मायावती में रहता है , सब बंधन में ही हैं मुक्त यहाँ पर कोई नहीं है। लेकिन अगर मुक्ति का मार्ग हम खोजना शुरू करें - तो हमें यहीं (अद्वैत आश्रम प्रशिक्षण पद्धति) पर आना होगा ! 

       (7.51 मिनट) अब देखिये इन प्रश्नों को सुनने के पश्चात उस गुरु की प्रतिक्रिया क्या है ? किसी भी कक्षा में किसी अध्यापक को जब कोई योग्य विद्यार्थी मिल जाता है ; तो उसे बड़ी ख़ुशी होती है। यहाँ भी  कोई शिक्षक उपस्थित हैं क्या ? हमने अपने स्कूलों में देखा है - जब हम अंग्रेजी ग्रामर में 'Remove Too' कैसे होता है ? तो हमारे अंग्रेजी के शिक्षक बड़े खुश हो जाते थे। अच्छा विद्यार्थी मिलना बहुत मुश्किल है - वो भी दुर्लभ है। 

      तो यहाँ भी गुरु एक योग्य मोक्षार्थी (एथेंस का सत्यार्थी) को देख रहे हैं। ये कैसा विद्यार्थी है ? ये ऐसा मोक्षार्थी है जो ब्रह्म विद्या को प्राप्त करने का इच्छुक है।  ये सचमुच बंधन से मुक्त होना चाहता है। कितने लोग अपने समाज और परिवार में रहते हैं -उनमें से कितने लोग बंधन से मुक्त होना चाहते हैं ? कोई नहीं ! वैसे तो बहुत लोग गुरु के पास जाते हैं , आश्रमों में जाते हैं। लेकिन आश्रमों में जाने वाले कितने लोगों में से कितने लोग -इस योग्य शिष्य की मनोभूमिका को लेकर आने वाले है ? कोई नहीं आता। क्योंकि बंधन क्या है ? यह भी पता नहीं है कि हम बंधन में हैं। उनका दोष नहीं है। ये अलग ही योग्यता है। ऐसा कोई योग्य मोक्षार्थी मिलना विरल है। इसलिए गुरु जब ऐसे किसी मोक्षार्थी को देखते हैं -तो उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। आने वाले दो श्लोकों उनकी प्रतिक्रिया है- 

धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि, पावितं ते कुलं त्वया।

 यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ।॥ ५२ ॥  

(10.48 मिनट) अर्थ:-गुरु-तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझ से पवित्र हो गया, क्योंकि तू अविद्यारूपी बन्धन से छूट कर ब्रह्मभाव को प्राप्त होना चाहता है। 

   गुरु ऐसे शिष्य को देखकर बहुत खुश हो जाते हैं जो सत्य को जानने के लिए व्याकुल है। वह जानना चाहता है कि - मैं जिसको 'मैं' अपना 'मैं' समझ रहा हूँ , इस 'मैं ' का मतलब क्या है ? और वो यह भी जानना चाहता है कि यह विश्व-प्रपंच क्या है ? हम सब इसके बारे में भ्रमित हैं। इन्द्रियों जो कुछ दिखाई दे रहा है , उसके विषय में हमारी आज की जो धारणा (M/F) है , यह भ्रम है। तो सही वस्तु क्या है ? मैं कौन हूँ ? मेरा सत्य स्वरुप क्या है ? इसी विषय पर आगे चर्चा होगी। हम ईश्वर , भगवान आदि शब्द बोलते तो रहते हैं ; परन्तु ये भगवान कहाँ हैं ? हम उनको मन्दिरों में ढूँढ़ते रहते हैं। तीर्थों में ढूँढ़ते हैं ; ये सब खोज गलत नहीं है , ठीक है। लेकिन वास्तव में ईश्वर तत्व क्या है ? वो सत्य वस्तु क्या है? इस योग्य शिष्य को देखकर गुरु के मुख से जो शब्द निकलता है , वो है - धन्योऽसि ! बेटा तूँ धन्य है, तू धन्य है! -और  कृतकृत्योऽसि ! (12.38 मिनट)  

       जिसके पास धन हो, उसको हम क्या कहते हैं ? उसको आप धनी कहते हैं , और जो धनी है वो धन्य है। लेकिन गुरुदेव इस शिष्य को धन्य कह रहे हैं , क्योंकि इसके पास एक विशेष धन है। कौन सा धन है ? साधन चतुष्टय रूपी असली धन उसके पास है -केवल षट्सम्पत्ति नहीं। असली धन साधन-चतुष्टय रूपी धन इसके पास है। साधन-चतुष्टय सम्पन्न मोक्षार्थी , ऐसा सत्यार्थी है जो  सत्य को जानना चाहता है। ये मेरे ही समान एक साधारण मनुष्य है , लेकिन वो साधन-चतुष्टय सम्पन्न है और वो सत्य को जानना चाहता है 100 % साधन चतुष्टय तो नहीं है - लेकिन कुछ हद तक है। लेकिन उसके पास यदि ये धन 10 % भी है तो वो, धनी है और वह धन्य है। प्रश्न उठेगा अभी मेरे पास वो साधन चतुष्टय रूपी धन है क्या ? 100 % नहीं है - तो कोई बात नहीं जितना भी है क्रमशः वो जितना बढ़ेगा। उतना हम स्वभाव से ही सुखी हो जायेंगे। आनंदित हो जायेंगे। यही साधन-चतुष्टय सम्पन्न मनुष्य के आनंद का रहस्य है। जीवन में सुख -शांति, या तृप्ति बोलिये या पूर्णता बोलिये , यदि हम जीवन में यह पाना चाहते हैं , तो ये सब साधन-चतुष्टय से ही प्राप्त होता है। इन्द्रियों से जितनी भी भोग करने की वस्तुयें हैं , उसको भोग करने की कामना को त्याग करना ही वैराग्य कहा जाता है। (15.11 मिनट) वैराग्य की परिभाषा में हमने देखा था -  'तद्वैराग्यं जिहासा या दर्शनश्रवणादिभिः । देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि ॥ २१ ॥ ' कामिनी-कांचन आदि ऐषणाओं का त्याग क्यों करना है ? क्योंकि ये सब भोग वस्तु अनित्य  हैं। बुलबुलों के समान हैं। अभी दीखता है , अगले क्षण अदृश्य हो जायेगा। हमारा शरीर भी वैसा ही-अनित्य है। इसीलिए कामना या काम को वैरी कहा गया है। गीता में भगवान ने नरक के तीन द्वारा बताये हैं - काम, क्रोध और लोभ। (16.19 मिनट)  

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।

।।16.21।।काम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकार के नरक के दरवाजे हैं - (जो मनुष्य को बर्बाद कर देते हैं) जीवात्मा का पतन करने वाले हैं, इसलिये इन तीनों का त्याग कर देना चाहिये।

  काम और क्रोध को यदि देखा जाये तो एक ही है। जब आपकी कामना पूरी नहीं होती है , तब आप क्रोधित हो जाते है। तो दो द्वार हुए - काम और लोभ। इसलिए रामकृष्ण वचनामृत के हर पन्ने में आपको मिलेगा, अपने सत्य स्वरुप को जानना हो तो -'काम और कांचन',  'काम और कांचन',  'काम और कांचन', इसका त्याग करना ही पड़ता है ! 'कांचन' का मतलब है धन का लोभ, और काम है भोग। ये दोनों हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुश्मन है - वैरी है। लेकिन हमें यह समझ में नहीं आता है। सारा मानव-समाज तो इन्हीं को सुख का केंद्र समझ लेता है। पूरा मानवसमाज यही मान कर के बैठा है कि काम में ही सुख है। सारा विश्व उसके पीछे है , उसमें अपने को डुबो रहे हैं -पहुँचेंगे कहीं नहीं। 

        जो विवेकी है उसको तो यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि- काम,क्रोध और लोभ तो सचमुच नरक के द्वार हैं-'तस्मात् एतत् त्रयं त्यजेत्।' इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए। काम और धन का लोभ हमारे जीवन को सर्वनाश की ओर ले जाता है। देखिये समाज कैसे-कैसे अपराध की खबरें सुनाई देती हैं , जिसको देखसुन कर हमें ऐसा लगता है कि -ये क्राइम करने वाले मनुष्य हैं ? या पशु है ? अब यदि विश्लेषण करें तो पाएंगे कि जितने भी अपराध होते हैं -उनका मूल या काम है , या धन का लोभ है ! 99 % अपराध अनियंत्रित काम के कारण ही होते हैं। अविवेकी मनुष्य अपने काम की पूर्ति के लिए अक्सर लक्ष्मणरेखा का -अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर देते हैं। काम की पूर्ति के लिए आदमी क्या -क्या अपराध नहीं करता। यदि हर व्यक्ति आत्मसंयमी हो तो क्या कभी अपराध हो सकता है ?  काम ऐसा एक चीज है जो एक देवतुल्य मनुष्य को भी पशु बना देती है। जब मनुष्य अपनी सीमाओं को लाँघना शुरू कर देता है तो पशु ही नहीं राक्षस बन जाता है अतएव काम पर नियंत्रण रखना पहला सोपान है , फिर उस काम पर विजय प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में ब्रह्मचर्य का बहुत बड़ा महत्व है। काम का सीधा उल्टा शब्द है ब्रह्मचर्य। जितना आप काम पर नियत्रण प्राप्त करते हो , उतना आप शक्तिशाली होते हो। ब्रह्मचर्य से अनंत बल और वीर्य का लाभ होता है। हमारे आदर्श हैं -महावीर हनुमान , स्वामी विवेकानन्द कहते थे हर युवक -युवती के टेबल पर हनुमानजी की एक मूर्ति होनी ही चाहिए। आपके पूजा घरों में हनुमान जी का चित्र होना चाहिए। (21.43 मिनट

        तो गुरुदेव कह रहे हैं , तुम तो धन्य हो, साधन-चतुष्टय रूपी धन है तुम्हारे पास। और तुम कृत-कृत्य हो अर्थात जीवन में एक मनुष्य को जो करना चाहिए, जो करणीय है -उसने यह कर लिया है। मनुष्य शरीर प्राप्त करने के बाद जो सबसे करणीय कार्य है - वो ये है ! सत्य की खोज - मैं कौन हूँ ? इसकी खोज ! मनुष्य जन्म का यही तो कृत्य है -करणीय है। और क्या - पावितं ते कुलं त्वया'- तेरा कुल तुझ से पवित्र हो गया। किसी एक व्यक्ति के सत-निश्चय से -सत्य की खोज करने के निश्चय से उसका पूरा कुल पवित्र हो जाता है। क्यों पूरा कुल पवित्र हो जाता है यद अविद्या बन्ध मुक्त्या ब्रह्मीभवितुम इच्छसि' -- क्योंकि तू अविद्यारूपी बन्धन को नष्ट करके अपने सत्यस्वरूप को जानने की इच्छा कर रहे हो !! तुम इस अविद्या रूपी बंन्धन से मुक्त होकर अपने सत्यस्वरूप में प्रतिष्ठित होने की कामना कर रहे हो। यह बहुत बड़ी बात है। तूँ अविद्या से छूट कर ब्रह्म भाव में प्रतिष्ठित होना चाहता है, इसके कारण तेरा पूरा कुल पवित्र हो गया , तुम कृत-कृत्य हो गए , तुम धन्य हो गए।  

[यह श्लोक विवेकचूडामणि में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें गुरु अपने शिष्य को आशीर्वाद स्वरूप कह रहे हैं कि हे शिष्य, तू वास्तव में धन्य है, तेरा जीवन सफल हो गया है। तूने अपने प्रयत्न से, अपने सत्संकल्प से न केवल स्वयं को गौरवशाली बनाया है, बल्कि अपने पूरे कुल को भी पवित्र कर दिया है। यह कथन केवल प्रशंसा नहीं है, बल्कि इस गहरे सत्य का संकेत है कि जब कोई व्यक्ति आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है, तो उसकी साधना का पुण्य उसकी कुल परम्परा को भी उच्चीकृत करता है। शिष्य की यह महत्त्वाकांक्षा कि वह अविद्या रूपी बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मरूप हो जाए, उसकी साधना की महानता को सिद्ध करती है।

यहाँ 'अविद्या-बन्ध' का अर्थ है अज्ञान का वह कठोर जाल, जिसमें जीव आत्मा अनादिकाल से फँसा हुआ है। अज्ञान ही संसार का मूल कारण है, जो आत्मा को अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप से विचलित करके अनेक जन्म-मरण के चक्र में डालता रहता है। शिष्य जब इस अज्ञान से मुक्ति पाने का संकल्प करता है और अपने जीवन का लक्ष्य ब्रह्मभाव की प्राप्ति बना लेता है, तभी उसका जीवन वास्तव में कृतकृत्य हो जाता है। संसार के असंख्य प्रलोभन और विकर्षणों से हटकर ऐसा पावन निर्णय लेना बहुत कठिन होता है। इसलिए गुरु उसे 'धन्य' कहकर उसके इस अभूतपूर्व पुरुषार्थ की प्रशंसा करते हैं।

'कृतकृत्य' शब्द यह बताता है कि जीवन में प्राप्त करने योग्य सबसे महत्वपूर्ण साध्य, आत्मज्ञान की प्राप्ति, ही है। भौतिक उपलब्धियां, मान-प्रतिष्ठा, और सुख सभी अल्पकालिक हैं। लेकिन अविद्या से मुक्ति और ब्रह्मभाव में स्थित होना स्थायी समाधान है, जो सारे दुःखों का नाश करता है। गुरु यह भी कहते हैं कि तेरे इस महान प्रयास से तेरा कुल पवित्र हो गया, क्योंकि परिवार में यदि कोई एक भी आत्मज्ञानी या आत्मसाधक हो जाता है, तो वह पूरे वंश का कल्याण कर देता है। ऐसी मान्यता है कि आत्मज्ञान प्राप्त करने वाला साधक अपने परिवार की सात पीढ़ियों तक का उद्धार कर देता है। इसलिए इस श्लोक में शिष्य की साधना के प्रभाव का व्यापक स्वरूप भी व्यक्त किया गया है। 

    यह भी ध्यान देने योग्य है कि गुरु इस वक्तव्य में शिष्य का उत्साहवर्धन कर रहे हैं। साधक का पथ कभी सरल नहीं होता। अज्ञान की जड़ें गहरी होती हैं और साधना के मार्ग में निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। गुरु के इस प्रकार के शब्द शिष्य में दृढ़ता और निष्ठा उत्पन्न करते हैं। आत्मज्ञान की तीव्र आकांक्षा ही मुक्ति की सर्वप्रथम सीढ़ी है। जब तक मनुष्य को ब्रह्मभाव को प्राप्त करने की उत्कट प्यास न हो, तब तक वह इस पथ पर चल ही नहीं सकता। इस श्लोक में गुरु ने उसी उत्कट इच्छा की प्रशंसा की है। उन्होंने शिष्य को यह भी अनुभव कराया कि उसका प्रयास व्यर्थ नहीं जाएगा, उसका जीवन सार्थक और सफल होगा।

अंततः यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मसाक्षात्कार की यात्रा केवल साधक का निजी प्रयास न होकर, सम्पूर्ण मानवता और वंश की उन्नति का कारण भी बनती है। गुरु का यह आशीर्वाद और प्रशंसा शिष्य के लिए एक अमूल्य प्रेरणा बन जाती है, जो उसे साधना के अंतिम सोपान तक ले जाती है।] 

       (24.35 मिनट)  अब देखिये, बहुत सुंदर - गुरुदेव शिष्य से क्या कहते हैं - 

मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः।
 संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः,
येनैव याता यतयोऽस्य पारं। 
तमेव मार्गं तव निर्दिशामि ॥ ४५ ॥

[अन्वय: - हे  विद्वन् मा भैष्ट ।  तव  अपाय: नास्ति । संसारसिन्धो: तरणे  उपाय: अस्ति। यतय: येन एव अस्य पारं याता: तं मार्गं  एव तव (तुभ्यं)  निर्दिशामि ।] 

अर्थ:-गुरु- हे विद्वन् ! तू डर मत, तेरा नाश नहीं होगा। संसार-सागर से तरने का उपाय है। जिस मार्ग से यतिजन इस के पार गये हैं, वही मार्ग मैं तुझे दिखाता हूँ। 

इन पवित्र शब्दों में सद्गुरु अपने शिष्य को प्रेमपूर्वक धैर्य और सांत्वना प्रदान कर रहे हैं। शिष्य के अंतःकरण में संसार के भयंकर बंधनों के प्रति गहन भय उत्पन्न हो गया है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि यह जन्म-मरण का चक्र कभी समाप्त नहीं होगा, और वह इस महासागर से पार नहीं जा सकेगा। ऐसे विषम क्षण में गुरु उसकी दुर्बलता और हताशा को देखकर अत्यंत करुणा से कह रहे हैं – “मा भैष्ट,” अर्थात् हे विद्वान! भय मत कर। तेरा कोई अपाय, कोई विनाश नहीं होगा। यह वचन शिष्य के चित्त में तुरंत आशा का संचार करता है। जैसे कोई बालक घोर अंधकार में भयभीत होकर रोता है और माता का हाथ पकड़ लेता है, उसी प्रकार गुरु का यह वचन शिष्य को भयमुक्त करता है।

    गुरु कहते हैं कि संसार-सागर से पार जाने का उपाय निश्चित रूप से है। यह संसार-दावानल जितना भी विकराल हो, इससे तरने के साधन पूर्व में भी साधकों ने अपनाए हैं और वे सफल हुए हैं। इसी  मार्ग से अतीत में अनेक महान यती, मुमुक्षु और सच्चे साधक इस भवसागर के पार गए हैंजब तक किसी कठिनाई से समाधान का उपाय अज्ञात होता है, तब तक उसका भय असह्य प्रतीत होता है। पर जैसे ही कोई सक्षम व्यक्ति समाधान बताता है, तत्काल मन में शांति और साहस का संचार होता है। गुरु इसी गहन करुणा से प्रेरित होकर कहते हैं – “जिस उपाय से यतीजन पार हुए हैं, वही उपाय मैं तुझे बताता हूँ।” यह आश्वासन मात्र उपदेश नहीं, अपितु अनुभवजन्य सत्य का प्रतिफलन है। गुरु स्वयं भी इसी मार्ग पर चले हैं, उसी अनुभव से उनके वचनों में इतनी दृढ़ता और करुणा प्रकट होती है।

       यह श्लोक गुरु-शिष्य परंपरा की मूलभूत आत्मीयता को उजागर करता है। गुरु केवल एक उपदेशक नहीं, बल्कि आत्मा की अंतरंग पीड़ा के साक्षी और उसे दूर करने वाले सखा होते हैं। वे शिष्य को आश्वस्त करते हैं कि यह भय निराधार है, क्योंकि उपाय न होता तो समस्त यतीजन कैसे पार जाते?  विवेक, वैराग्य, शम, दम आदि साधन -चतुष्टय  
आत्मबोध, के वही सुनिश्चित उपाय हैं, जो प्राचीन काल से परम अनुभूतिमूलक मार्ग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। यही मार्ग शिष्य को निर्दिष्ट किया जाता है।

     इस श्लोक में गुरु शिष्य को साहस देते हुए यह भी स्मरण कराते हैं कि जिस पथ पर साधक दृढ़ता से चलेंगे, उसमें कोई असफलता नहीं होगी। संसार सागर में नाश उन लोगों का होता है जो प्रयास से विमुख हो जाते हैं, किंतु जिन्हें गुरु का अनुग्रह प्राप्त होता है और जो दिखाए गए मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं, उनके लिए यह समुद्र सरल हो जाता है। यह श्लोक भक्त और साधक दोनों के लिए अमूल्य प्रेरणा है कि गुरु के वचनों पर अडिग श्रद्धा रखकर साधना में लगना ही मुक्ति का सुनिश्चित उपाय है।]  

   (25.19 मिनट) जब ये शिष्य गुरु के पास आया था , उस समय उसकी मनोभूमिका क्या थी ? उस समय वो कह रहा था हे गुरुदेव मैं भयभीत हूँ। (श्लोक संख्या -३८ देखें ) इस संसार सागर में मैं डूब रहा हूँ। इस संसार दावाग्नि में मैं तप रहा हूँ। आप कृपा करके मुझे इस बंधन से मुक्त कीजिये। मुझे मृत्यु से बचाइए , इस संसारसागर में डूबने से मुझे बचाइए। हम सब के अंदर -कहीं न कहीं मृत्यु का भय है , लेकिन हम उस भय को भुलाने के लिए सिनेमा चले जाते हैं , या गोवा-यूरोप घूमने चले जाते हैं। इसको कहते हैं - चित्तस्य लालनं ! हम मन को भुलावे में डालने की चेष्टा कर रहे हैं। यह एक प्रकार का, उबटन लगाने जैसा cosmetic treatment है , अंदर भय बना हुआ है। अंदर अतृप्ति है , अंदर अनिश्चितता है , उस को भुलाने के प्रयास में कोई -cosmetic Social Service, भी करते हैं , या यूरोप या अन्य किसी Foreign Trip में चल देते हैं। लेकिन वो भय जाता है क्या ? सिनेमा से लौटने के बाद फिर वही भय पकड़ लेता है। 

    अब गुरु की प्रतिक्रिया देखिये -  विद्वन् मा भैष्ट बेटा डरो मत ! ये केवल इस शिष्य के लिए नहीं है ये हम सबके लिए है। इसमें डरने की कोई बात नहीं है। 'There is nothing to be afraid of' -विद्वन् मा भैष्ट ! संसारसिन्धो: तरणे  उपाय: अस्ति।यह हम सबके लिए कितना बड़ा आश्वासन है ! पूरा मानवसमाज आज भयग्रस्त है , असुरक्षतता से ग्रस्त है। अतृप्ति से ग्रस्त हैं , अपूर्णता से ग्रस्त हैं , लेकिन तुम डरना मत ! इससे बाहर निकले का रास्ता है। सभी मनुष्यों के लिए ये कितना बड़ा आश्वासन है। 

    गुरुदेव यहाँ शिष्य को विद्वान् कह रहे है - मा भैष्ट विद्वन्' क्योंकि ये कोई साधारण मनुष्य नहीं है, यह विद्वान् है -क्योंकि यह सत्य की खोज कर रहा है। जो सत्य की खोज में है , वही विद्वान् है।  तव नास्ति अपायः - तेरा नाश नहीं हो सकता। तव अपाय: नास्ति । तूँ जो कह रहा है कि मैं इस कुँए में गिर रहा हूँ - ऐसा कुआँ जिसका तल ही नहीं है। तूँ जो यह कह रहा है कि मैं इस संसार दावाग्नि में जल कर राख हो रहा हूँ , तूँ डर मत तेरा नाश नहीं है। सभी महापुरुषों की यही वाणी है।भगवान कृष्ण भी गीता में इसी प्रकार के आश्वासन देते हैं - 

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।12.7।।

।।12.7।। हे पार्थ ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर हुआ है ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।। 

जन्म-मृत्यु के चक्र से या जाल से बाहर निकलने का एक रास्ता है। This is the positive message of our Sanatan Dharma! गीता में एक और सुंदर श्लोक है - जिसमें भगवान श्रीकृष्ण समस्त मानवजाति को आश्वासन देते हैं - 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

।।18.66।। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।। 'मा शुचः' डर मत , शोक मत कर! अर्जुन इस समस्या बाहर निकलने का एक रास्ता है। 

सभी महापुरुषों की वाणी एक समान है , यहाँ भी गुरु कह रहे हैं -' मा भैष्ट विद्वन् नास्ति तव  अपायः' हम सब -आप किसी का नाश नहीं है। कितना सकारात्मक उपदेश -Positive ! आज कितनी भी समस्या के बीच हम हों, हर समस्या से बाहर निकला जा सकता है। "संसारसिन्धो: तरणे  अस्ति उपाय:" संसार सागर को पार करने का एक उपाय है। शंकराचार्यजी की यह उक्ति कितनी सुंदर कविता जैसी लगती है-' मा भैष्ट विद्वन् नास्ति तव अपायः' -संसारसिन्धो: तरणे अस्ति उपायः । वो रास्ता क्या है ? अगली पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण है -येन एव याताः यतयोः अस्य पारं ! तं मार्गं  एव तव (तुभ्यं)  निर्दिशामि। मैं तुम्हें वही मार्ग दिखाने वाला हूँ , जिस मार्ग से अतीत में महापुरुषों ने गमन किया था। मैं वही मार्ग तुम्हें दिखानेवाला हूँ। कोई नया मार्ग नहीं दिखाने वाला हूँ। समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं - जो कहेंगे -"मैं तुम्हें एक नया मार्ग दिखाने वाला हूँ।" जो ऐसा कहे उनसे सावधान रहिये। सनातन में एक ही मार्ग है - कुछ अन्य मार्ग नहीं है ; इसलिए सनातन में परम्परा है। कोई shortcut नहीं होता - उस पर विश्वास न करें। आध्यात्मिक जीवन में कोई shortcut नहीं है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने जिस मार्ग का अवलंबन करके सत्य को देखा था , या अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचे थे।  ये वही मार्ग है। यति माने संन्यासी या सत्यान्वेषी लोग - येन एव अस्य याताः पारं  तं मार्गं  एव तव (तुभ्यं)  निर्दिशामि । भगवान कृष्ण भी गीता के-चौथे अध्याय में  बार बार कहते हैं -मैं वही पुरातनमार्ग तुम्हें बता रहा हूँ अर्जुन। 

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।4.3।।

।।4.3।। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है। परन्तु  जिनमें विवेक-वैराग्य षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता बिल्कुल भी नहीं थी- 10 % या 5 % भी नहीं थी, कुछ ऐसे ही अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्यों (ढोंगी कान फुँकवा गुरु) के हाथ में पड़कर- यह योग नष्ट हो गया था  यह देखकर और साथ ही लोगों को पुरुषार्थरहित हुए देखकर वही यह पुराना योग यह सोचकर कि तू मेरा भक्त और मित्र है अब मैंने तुझको सिखाया है क्योंकि साधन चतुष्टय से प्राप्त होने वाला आत्मज्ञान  रूप योग बड़ा ही उत्तम रहस्य है। सद्गुरु कबीर साहब एक साखी में कहते हैं....

कन फूका गुरु हद का ,बेहद का गुरु और ।
बेहद का गुरु जब मिले ,लहै ठिकाना ठौर ।।

अर्थात् कान फूंक देने वाले गुरु हद के हैं ।  केवल मंत्र दे देने से कुछ नहीं होता है । गुरु का अर्थ ही होता है ,साधन चतुष्टय में पारंगत गुरु जो अंधकार से हमें प्रकाश की ओर ले चले -- तमसो मा ज्योतिर्गमय । 

आचार्य शंकर -कुछ नया बताये हैं क्या ? स्वामी विवेकानन्द कोई नया मार्ग बताये हैं क्या ? सब वही पुरातन 'योग मार्ग ' है। 

(33.32 मिनट) अब यहाँ से गुरु-शिष्य संवाद शुरू होगा। अभी तक हमने देखा कि शिष्य गुरु के पास आकर सात प्रश्न करते हैं। पहला प्रश्न क्या था ? -1.बन्धन क्या है? 2. यह कैसे हुआ? 3.झमारे जीवन में ये Continue कैसे कर रहा है, या इसकी स्थिति कैसे है? 4. और इस बंधन से मोक्ष कैसे मिल सकता है? 5.अनात्मा क्या है? 6.परमात्मा किसे कहते हैं? और 7. उनका विवेक (पार्थक्य ज्ञान) कैसे होता है? अब पूरा विवेक- चूड़ामणि इन्हीं सात प्रश्नों का उत्तर है।हम लोग कुछ चुने हुए शल्कों को ही पढ़ेंगे। यहाँ गुरु क्या कर रहे हैं ? जिस क्रम से शिष्य ने प्रश्न किया था ; गुरु उसी क्रम से उत्तर नहीं देते हैं। गुरु पहले चौथे प्रश्न को उठाते हैं - और चौथे प्रश्न का उत्तर देते हैं। क्या था चौथा प्रश्न ? इस बंधन से मुक्त कैसे होंगे ? गुरु चाहते तो जिस क्रम से शिष्य ने प्रश्न किया था उसी क्रम से उत्तर देते। पहला प्रश्न था कि बंधन क्या है ? ये बंधन आया कहाँ से ? गुरुदेव ने प्रथम तीन प्रश्नों को छोड़ दिया और चतुर्थ प्रश्न को उठाया - इसके पीछे क्या कारण है ? इसके पीछे एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। गुरु तो गुरु ही हैं; उन्हें पता है कि क्या Most Important है ? 

           तो हमारी गुरु-परम्परा में - 'Hunter की  कहानी' बताई जाती है। Hunter को क्या कहते हैं ?  शिकारी या व्याध की कहानी -एक शिकारी जंगल में शिकार करने गया हुआ था। उसको जंगल की झाड़ियों में बहुत दूर कुछ दिखाई दिया। कुछ हलचल हुआ , उसको लगा कि वहाँ एक हिरण है। दूर से बहुत स्पष्ट नहीं था , उसने ऐसा अनुमान लगाया कि जरूर हिरण होगा। इस अनुमान से उसने तीर छोड़ा , तीर सीधे जाकरके अपने लक्ष्य को वेध दिया। और वो गिर गया। लेकिन शिकारी जब पास गया तो देखा (36.40 मिनट) ये हिरण नहीं है , ये तो एक मनुष्य है। बहुत गहरा घाव हो गया था और वो मनुष्य वेदना से बहुत रो रहा था , मदद के लिए चिल्ला रहा था। ये देखकर शिकारी तो बहुत भयभीत हो गया। शिकारी वहाँ से भाग गया , क्योंकि उसके सिर पर आरोप आ जायेगा। 

     वो घायल आदमी रो रहा है , लेकिन आसपास कोई सुनने वाला नहीं था। उसी समय उस रस्ते से जाने वाले कुछ लोग वहाँ पहुँच जाते हैं। और चार-पाँच लोग उस घायल मनुष्य के पास खड़े होकर चर्चा करना शुरू कर देते है। क्या चर्चा करते हैं ? एक आदमी पूछता है - भाई ये तीर किस दिशा से आया होगा ? दूसरा कहता है -मुझे लगता है उस दिशा से आया होगा। तीसरा कहता है -नहीं वहाँ झाड़ियाँ कम हैं उसी दिशा से आया होगा। चौथा पूछता है तीर बन हुआ है किस चीज से ? हमको पहले वह देखना चाहिए। सभी अपने- अपने अनुमान से चर्चा कर रहे हैं। एक व्यक्ति कहता है -पहले ये पता करो कि ये तीर कहीं विषाक्त तो नहीं है ? वो घायल आदमी क्रंदन कर रहा है , मदद की गुहार लगा रहा है , और ये लोग वहाँ बैठकर चर्चा कर रहे हैं। इतने में एक दूसरा व्यक्ति वहाँ पहुंचा - वो समझदार था। वो देखते ही समझ गया कि यहाँ पर क्या चल रहा है ? तो उसने उनलोगों को डाँटा , और कहा की महामूर्खों पहले उस तीर को निकालो और कुछ दवाइयाँ उसको दो। उसके दर्द को कम करने का उपाय सोंचो। ये तीर कहाँ से आया ? किसने मारा ? ये तीर किस चीज का बना हुआ है ? ये सब चर्चा हम बाद में भीम कर सकते हैं , तो अभी प्राथमिकता की बात की है ? पहले वो जिस कष्ट में है , दुःख में है , उसे दूर करो बाकि चर्चा हमलोग बाद में भी कर सकते हैं। ये पुलिस जैसे पंचनामा करती है - चोर किधर से आया ? वही काम कर रहे हैं ?   

          उसी प्रकार ये शिष्य जब गुरु के पास में आया था तब अत्यंत दर्द में आया था या नहीं ? भयभीत था , भयग्रस्त था , कष्ट में था , मैं संसार सागर में डूब रहा हूँ , दावाग्नि में जल रहा हूँ , इस ताप से मुझे बचाइए। ऐसी परिस्थिति में यह बंधन क्या है ? बंधन आया कहाँ से ? ये बंधन हमारे जीवन में Continue कैसे हो रहा है ? ये सब प्राथमिक प्रश्न नहीं था। प्राथमिक प्रश्न ये है कि इस बंधन से बाहर कैसे निकलें ? इस कष्ट से बाहर कैसे निकलें ? (40.34 मिनट) इसलिए गुरुदेव इस चतुर्थ प्रश्न का उत्तर पहले देते हैं। क्योंकि यदि मुख्य समस्या का समाधान निकल गया तो बाकि चर्चा हमलोग बाद में भी कर लेंगे। इसलिए तो उनको गुरु कहते हैं , उन्हें पता है कि हमारी प्राथमिकता क्या है ? Let's be focused- बहुत से प्रश्नों का उत्तर न देखकर मुख्य को अभी लेते हैं। आपका दिमाग भी इसी प्रश्न पर केंद्रित रहना चाहिए की सत्य क्या है ? मिथ्या क्या है ? मैं कौन हूँ ?... सत्य क्या है ? मिथ्या क्या है ? मैं कौन हूँ ? घूम-फिर कर हमारे मन में भी यही मंथन , यही प्रश्न चलना चाहिए। चतुर्थ प्रश्न है -कथं विमोक्षः ? इस बंधन से हम मुक्त कैसे होंगे ? 

       आने वाले दो श्लोकों में गुरुदेव हमारे लिए एकदम मुक्ति का मार्ग खोल देते हैं। सभी मनुष्यों के लिए यही एक मार्ग है। ये मनुष्य रूपी जो बुलबुला है , उस बुलबुला रूपी बंधन से अगर उसको बाहर निकलना हो , श्रीरामकृष्णदेव की आरती के पहले तीन शब्द क्या हैं ? कोई बता सकते हैं ?" खण्डन भव बंधन " (42.48 मिनट) श्रीरामकृष्ण किसकी प्रतिमूर्ति हैं ? भव बंधन को खण्डित करना या उस बंधन को नष्ट कर देना। इस बंधन को नष्ट करना ही मोक्ष है। श्रीरामकृष्ण इस मोक्ष रूपी अनुभूति के प्रतिमूर्ति हैं। उस बंधन को खंडित कैसे करें ? श्रीरामकृष्ण वही बताते हैं , और सभी महापुरुष की वाणी में यही मार्ग दिखाई देगा। अगले दो श्लोकों में गुरुदेव उसी मोक्षमार्ग का वर्णन करते हैं - 

मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते
वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु ।
ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा
               न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ ७१ ॥ 

ततः श्रुतिस्तन्मननं सतत्त्व-
ध्यानं चिरं चित्यनिरन्तरं मुनेः।
ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वा-
निहैव निर्वाणसुखं समृच्छति॥ 

(विवेक-चूडामणि - ७२) 

[अर्थ:- मोक्ष का प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओं में अत्यन्त वैराग्य का होना बताया गया है। तत्पश्चात शम, दम, तितिक्षा तथा समस्त आसक्ति युक्त कर्मों का सर्वथा त्याग कहा गया है।  तदुपरांत मुनि को श्रवण, मनन और चिर काल तक नित्य निरन्तर आत्म तत्व का ध्यान करना चाहिए। तब वह विद्वान परम निर्विकल्पावस्था को प्राप्त होकर निर्वाण सुख (मोक्ष) को प्राप्त कर पाता  है। 
 

मोक्ष की प्राप्ति मानव जीवन का परम लक्ष्य है, और इसके लिए आचार्य शंकराचार्य विवेकचूडामणि में अत्यंत स्पष्ट और क्रमबद्ध मार्ग प्रस्तुत करते हैं। श्लोक ७१ और ७२ में मोक्ष प्राप्ति के हेतु को विस्तार से बताया गया है। ये श्लोक न केवल आत्मा की स्वतंत्रता के साधन बताते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट करते हैं कि साधक को किस प्रकार की अन्तर्दृष्टि, मनोवृत्ति और आचरण अपनाना चाहिए ताकि वह ब्रह्म-तत्त्व को जान सके और संसार के बन्धनों से मुक्त हो सके।

     सबसे पहले आचार्य कहते हैं—मोक्ष का प्रथम कारण "वैराग्य" है। यह वैराग्य सामान्य नहीं, बल्कि "अत्यन्तमनित्यवस्तुषु" — अत्यन्त अनित्य वस्तुओं के प्रति तीव्र वैराग्य होना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि जो वस्तुएँ नश्वर हैं, क्षणिक हैं, जो सदा बदलती रहती हैं—जैसे शरीर, सुख-दुःख, भोग, सम्मान, पद, परिवार आदि—उन इन्द्रिय भोग की वस्तुओं से मन को पूर्णतया हटाकर आत्मा की ओर एकाग्र करना आवश्यक है। जब तक मन इन अनित्य वस्तुओं में आसक्त रहता है, तब तक वह शुद्ध नहीं होता और आत्मज्ञान के योग्य नहीं बनता। इसलिए वैराग्य को सभी साधनों में प्रथम बताया गया है। लेकिन यह वैराग्य थोपने की चीज नहीं है। सत्य -मिथ्या का स्पष्ट विवेक होने से स्वाभाविक रूप वैराग्य होता है। 
वैराग्य आने से षट्सम्पत्ति ( शम, दम, उपरति,तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान)  भी स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगती है -इसलिए विवेक क्या है ? चूड़ामणि है !!  शम का अर्थ है—मन को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करना। यह आन्तरिक शांति और एकाग्रता का अभ्यास है। दम का अर्थ है—इन्द्रियों को विषयों से हटाकर वश में रखना। जब इन्द्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं, तो मन भी चंचल हो जाता है और ध्यान नहीं लग पाता। तितिक्षा का अर्थ है—ताप, शीत, सुख, दुःख, अपमान आदि द्वन्द्वों को बिना क्षुब्ध हुए सहना। यह साधक की मानसिक दृढ़ता को दर्शाता है। 
इसके साथ ही "प्रसक्ताखिलकर्मणां न्यासः"जो समस्त कर्म नरक के द्वार तीनो ऐषणाओं की आसक्ति से किए जाते हैं, उनका पूर्ण त्याग भी आवश्यक है।  केवल ईश्वर को अर्पित भाव से कर्म करना चाहिए, जिससे कर्म बन्धन उत्पन्न न हो। जब यह सब अभ्यास में आता है, तब साधक आन्तरिक रूप से मुक्त होने लगता है।

इसके बाद अगले श्लोक में कहा गया है—इन साधनों के पश्चात साधक को श्रवण, मनन और ध्यान करना चाहिए। श्रवण का अर्थ है—वेदान्त शास्त्रों और गुरु के उपदेशों को श्रद्धा से सुनना। यह श्रवण केवल श्रुति के शब्द सुनना नहीं, बल्कि उन बातों को पूरी भावना, विवेक और लगन से समझना है। इसके बाद आता है "मनन"—जो सुना है, उस पर गम्भीरता से विचार करना, सभी शंकाओं का समाधान प्राप्त करना और स्पष्ट रूप से आत्मा-ब्रह्म का ज्ञान अर्जित करना। यह ज्ञान केवल शास्त्रीय या बौद्धिक न होकर अनुभव की ओर ले जाने वाला होना चाहिए।

   श्रवण और मनन के बाद अत्यंत आवश्यक है "सतत्त्व-ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं"—अर्थात आत्म-तत्त्व का निरन्तर, दीर्घकाल तक ध्यान। यह ध्यान केवल समय-समय पर किया गया ध्यान नहीं है, बल्कि यह निरन्तर, गम्भीर और अखण्ड भावना से किया गया अभ्यास है जिसमें साधक का मन विषयों से हटकर पूर्णतः आत्मा में लीन हो जाता है। इस प्रकार ध्यान के द्वारा साधक का चित्त शुद्ध और एकाग्र होता है, जिससे वह "अविकल्प अवस्था"—अर्थात द्वैत से रहित, निर्भेद ब्रह्मज्ञान की अवस्था को प्राप्त करता है।

     यह निर्विकल्प अवस्था वही स्थिति है जिसमें ज्ञानी जानता है कि वह शरीर, मन, बुद्धि नहीं है, बल्कि केवल आत्मा है—सद्, चित्, आनन्द स्वरूप। यह अविकल्प अवस्था साधक को संसार के समस्त दुःखों और बन्धनों से मुक्त कर देती है। तब वह विद्वान "निर्वाणसुखं समृच्छति"—अर्थात पूर्ण शान्ति, आनन्द और आत्मतृप्ति को प्राप्त करता है। यह सुख कोई इन्द्रियजन्य सुख नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप में स्थित होने से प्राप्त शाश्वत, अचल, अद्वितीय आनन्द है।

इस प्रकार शंकराचार्य ने इन दो श्लोकों में मोक्ष के सम्पूर्ण साधन-चक्र को संक्षेप में बताया हैवैराग्य से प्रारम्भ, फिर शम, दम, तितिक्षा आदि के द्वारा चित्तशुद्धि, फिर श्रवण, मनन, ध्यान के द्वारा आत्मज्ञान और अन्त में निर्विकल्प अवस्था में प्रतिष्ठित होकर मोक्ष की प्राप्ति। यह पथ स्पष्ट, विवेकपूर्ण और अनुभव-सिद्ध है, जिससे प्रत्येक मुमुक्षु को प्रेरणा मिलती है कि वह आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अपने जीवन को ले जा सके।]   

      इन दो श्लोकों में गुरुदेव शिष्य के चतुर्थ प्रश्न कथं विमोक्षः ? का उत्तर देते हैं। प्रश्न ये है कि कैसे हम इस बंधन से मुक्त हों ? कहते हैं -मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते ' इस भवबंधन से मुक्त होने का जो प्रथम चरण है - वो है "वैराग्यम् अत्यन्तम् अनित्य वस्तुषु।" इन्द्रियों से दिखने वाले जितने भी भोग के वस्तु हैं -उनसे प्राप्त होने वाला सुख क्षणिक है , दृष्ट -नष्ट स्वभाव है ; फिर भी  साधारण मनुष्य जिसके लिए पागल हो जाता है। such objects of enjoymentजिसके पीछे-पीछे साधारण मनुष्य दौड़ते रहते हैं। ऐसे जो भोग वस्तु हैं , उनके प्रति अत्यंत वैराग्य। वैराग्य के बगैर इस संसार -चक्र बाहर निकलना , एकदम असम्भव है;It is Impossible. -आप इस बंधन से बाहर नहीं निकल सकते हो। किसके प्रति वैराग्य ? जितने भी अनित्य भोग वस्तु- बुलबुलों के समान हैं, अभी दीखता है -फिर अदृश्य होता है। ऐसे अनित्य वस्तुओं के प्रति हमारे अंदर तीव्र वैराग्य की भावना होनी चाहिए। वैराग्य कोई थोपने से आने वाली चीज नहीं है।

      ये वैराग्य आती कैसे है ? विवेक से -भूल गए ? विवेक का स्वाभाविक फल है वैराग्य। जब ये स्पष्ट हो जाता है कि सत्य क्या है ? मिथ्या क्या है ?  जब आपके रोम रोम ये बस जाये कि संसार के भोग पदार्थ से प्राप्त होने वाला सुख (M/F प्रेमी-प्रेमिका का सुख) मिथ्या है, क्षणिक है। ये सिर्फ छाया है। आप जब धूप में खड़े होते हो , तो आपकी छाया होती है न ? आप छाया के पीछे -पीछे भागते रहोगे , तो क्या कभी छाया को पकड़ पाओगे ? या दूसरों की छाया को भी पकड़ने का प्रयास कीजिये। कुछ हाथ आने वाला है ?संसार कोई भी बुलबुला छाया मात्र है , आभास मात्र है। बुलबुलों के पीछे या व्यक्तियों के पीछे दौड़ने की कामना। क्यों ? इसको प्राप्त करूँ , तो मई सुखी हो जाऊँगा। इन सारे चीजों का त्याग स्वाभाविक थोपा नहीं। जब स्पष्ट रूप से जगत मिथ्या समझ में आ जायेगा। वैराग्य के बिना मुक्ति नहीं , और विवेक के बिना वैराग्य नहीं , इसलिए विवेक क्या है ? चूड़ामणि।  

"खण्डन भव बंधन " खंडन बड़ा मधुर शब्द नहीं है , लगता काटने की बात है। ऐसे ही हमारे उपनिषदों में कठोर सत्यों का वर्णन मिलता है - कठोपनिषद में है - मुक्ति में क्या होता है -सारी ग्रंथियाँ कट जाती हैं। 

भिद्यते हृदय ग्रन्थि छिद्यन्ते सर्व संशयाः।
क्शीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्‌ दृष्टे परावरे ॥

हृदय की सारी ग्रथियाँ खुल जाती हैं, समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, तथा मनुष्य के कर्मों का क्षय हो जाता है, जब उस 'परतत्त्व' का दर्शन हो जाता है, जो एक साथ ही अपरा सत्ता एवं 'परम सत्ता' है।       

इस भवबंधन का खंडन करना इस मनुष्य जीवन का परम् लक्ष्य है। भवबंधन का खंडन कैसे करोगे ? तो इसके बाद आता है - वंचन काम कांचन अति निन्दित इन्द्रिय राग ! वहाँ मुक्ति के लिए क्या- Prescription है ? क्या निर्धारित औषधि है ? क्या नुस्खा है ? काम भोग के प्रति जो राग है और धन- सम्पत्ति की ओर जो लोभ है -ये अति निन्दित है। विवेक-सम्पन्न मनुष्य के लिए अशोभनीय है। क्योंकि कोई मूर्ख व्यक्ति ही इन छाया समान वस्तुओं के पीछे दौड़ेगा। मुक्ति का प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओं से वैराग्य है।   

 वैराग्य होते ही क्या होता है ? ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा- वैराग्य होने से फिर क्या हुआ ? शम, आ गया , दम आ गया। उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा , समाधान आदि सबआ गया। वैराग्य आते ही व्यक्ति स्वतंत्र और आत्मसंयमित हो जाता है। जहाँ विवेक और वैराग्य होता है , वहाँ षट्सम्पत्ति आकर एकत्रित हो जाते हैं। जिस प्रकार जहाँ राजा होता है -सारे मंत्रीगण वहाँ इकट्ठे हो जाते हैं। तो विवेक राजा के आते ही सारे मंत्रीगण वहाँ आ जायेंगे। मोक्ष का प्रथम हेतु क्या है ? वैराग्य हुआ। जो कि विवेक से उत्पन्न होता है। और क्या मिला ? न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् सब प्रकार के सकाम कर्म का त्याग हो गया। सकाम कर्मों का त्याग होने का मतलब ये है कि , अब ये व्यक्ति स्वार्थी कार्यों को नहीं कर सकता। अपने स्वार्थ के लिए अब ये व्यक्ति काम नहीं कर सकता।  स्व के लिए या स्वार्थ के लिए काम करने का अर्थ क्या है ? 

       अब ये बुलबुला जो है -अगर अपने स्वार्थ के लिए कोई काम करता है - तो उसी जगह में (किसी पुराने मित्र/मित्रणी में) अटका रहेगा या नहीं ? यदि वो बुलबुला अपने सकाम भोग के लिए कामना-वासना से प्रेरित होकर कोई काम कर रहा है , अपने स्वार्थपूर्ति के लिए , तो क्या वह कभी भी उस बुलबुला रूपी बंधन से बाहर निकल पायेगा ? मतलब अपने को वह M/F के देहाध्यास में फंसा रहकर - बुरे चरित्र वाला व्यक्ति ही बना रहेगा। उस बुलबुले को ये ज्ञान कभी होगा ? कि - मैं समुद्र हूँ ! कभी सम्भव नहीं है। इसलिए अगर मैं बुलबुला नहीं , यहाँ तक पहुँचना हो ; और अपने उसी ब्रह्म स्वरुप में प्रतिष्ठित रहना हो। तो वो अब 'स्व' मतलब आधारकार्ड वाले M/F पहचान के स्वार्थ के लिए काम नहीं कर पायेगा। अब उसका काम निःस्वार्थ होगा, निष्काम होगा। बहुत ही मत्वपूर्ण मुद्दा है। इसलिए कोई भी मोक्षार्थी है , या सत्यार्थी है , साधक है , वह निःस्वार्थ कर्म ही करेगा। स्वामी विवेकानन्द के जीवन में , रमण महर्षि के जीवन में - ये लोग क्या कभी अपने स्वार्थ के लिए कोई काम किये हैं क्या ?  इनके जीवन में कोई कामना कोई स्वार्थ दिखाई नहीं देता। व्यक्ति जितना निःस्वार्थ बनता है , वह उतना ही शक्तिशाली बनता है। स्वार्थ व्यक्ति को पराधीन बनाता है ,शक्तिशाली नहीं बनाता है। व्यक्ति जितना कामना मुक्त होता है , जितना निःस्वार्थ होता है, उतना वह स्वाधीन होता है , मुक्त होता है। मुक्ति के लिए बड़ी योग्यता है -निःस्वार्थता , निष्कामता। सभी लोग तो अपनी सुखभोग के लिए ही तो पागलों की तरह दौड़ रहे हैं। यही पराधीनता है , यही गुलामी है। स्वार्थी लोग ही , अगर कामना की पूर्ति न हो Depression में चले जाते हैं। फिर उनको Psychiatrist की जरूरत पड़ती है। व्यक्ति जितना निष्काम होगा, निःस्वार्थ होगा , वो भी महावीर हनुमान की तरह सारा कर्म किस लिए कर रहे हैं ? प्रभु श्री राम के लिए। देखो ये आदर्श हैं। उनका सारा काम जो राम के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते। और राम क्या है ? हमारा सत्यस्वरूप ! अब आप ये जान लीजिये राम जी कौन हैं ? आत्मा हैं ! परम् ब्रह्म हैं। राम जी और कुछ नहीं है -मनुजलीला करते हैं ! लक्ष्मण के बड़े भाई , और सीताजी के पति हैं ? हनुमान जी अपने सुखभोग के लिए कुछ भी करते हैं क्या ? वे सबकुछ राम के लिए करते हैं। तो देखो हनुमान जी कितने स्वाधीन हैं , कितने बलशाली हैं। उनके अंदर कोई पराधीनता है , कोई गुलामी है ? ये गुण हमारे अंदर भी आ सकती है , (58.43 मिनट) ये कोई सिद्धांत की बात या Theory नहीं है - इसको कोई भी परख कर देख सकता है। हम अपने जीवन में जितने भी निःस्वार्थ होंगे। जितना आप कामना मुक्त होते हैं , आप देखोगे आपका व्यक्तित्व ही बदल जायेगा। अद्भुत शक्तियाँ आपके अंदर आएंगी। वो वर्णन करने से परे है। वो इ अनुभूति है।  ये सब परख कर देखना होगा। अब देखना होगा आप कितना Interested हैं ? आपको त्याग -वैराग्य का रास्ता दिखाया जा रहा है। ये महापुरुष हमें रास्ता दिखा रहे हैं - बेटा तुम ऐसा कर के देखो , तुम दो साल ऐसे जी कर देखो। कैसा तुम्हारा व्यक्तित्व और जीवन ही बदल जाता है। 

तो यहाँ मोक्ष का पहला हेतु है , वह अनित्य वस्तुओं के प्रति तीव्र वैराग्य। और जब वैराग्य आ जाती है तो षट्सम्पत्ति भी अपने आप आ जाती है। फिर ऐसा व्यक्ति निष्काम कर्म ही कर पायेगा , सकाम कर्म वो नहीं कर पायेगा। इस दशा में वो गुरु के चरणों में बैठकर श्रवण करेगा , मनन करेगा और निदिध्यासन करके वो , अपने सत्यस्वरूप को जानेगा। और मुक्त हो जायेगा। वो दूसरे पैराग्राफ में कहा है - ततः श्रुतिस्तन्मननं सतत्त्व-ध्यानं ' श्रुति मतलब गुरुमुख से श्रवण , मनन फिर तत्व-ध्यानं ! और निदिध्यासन जो हमलोग कर रहे हैं। ये श्रवण-मनन -निदिध्यासन तब सार्थक होगा -जब इसके पीछे विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति , मुमुक्षता या साधन चतुष्टय, यदि 100 % कम से कम 10 % तो होगा। साधन चतुष्टय युक्त होकर के जब हम श्रवण, मनन , निदिध्यासन करते है , वही वह मार्ग है इस बंधन से मुक्त होने का।  अब कोई एथेंस का सत्यार्थी है , सत्यान्वेषी है ,जो सत्य को जानना चाहता है। उसके अंदर कुछ हद तक विवेक-वैराग्य - षट्सम्पत्ति अवश्य होगा। नहीं तो वो अपने गुरु के पास जाकर ऐसे सात प्रश्न कर ही नहीं सकता था। साधन-चतुष्टय युक्त व्यक्ति अगर गुरु के सानिध्य में बैठकर श्रवण करता है ,मनन करता है और निदिध्यासन करता है, तो क्या होता है - ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वान' वो विद्वान् श्रवण करेगा तो श्रवण में क्या सुनेगा ? वो शास्त्र और गुरु के मुख से यही सुनेगा कि तेरा असली स्वरुप क्या है ? और इस जगत का स्वरुप क्या है ? फिर उसपर वो मनन करेगा। मन में जितने भी विपरीत या प्रतिकूल चिंताएं जो पहले चल रही थीं। वो सब दूर हो जाएँगी। अब मन की दशा ऐसी हो जाएगी। कि बिल्कुल शास्त्र के सुने हुए शब्द के अनुकूल उसके मन का व्यापर चलेगा। ऐसी दशा में श्रवण , मनन करके फिर ध्यान करेगा तब वो अपने सत्य स्वरुप को अनुभव करेगा। ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वान' ये विद्वान् फिर अपने सत्यस्वरुप का अनुभव करेगा। और फिर - इहैव निर्वाणसुखं समृच्छति ' वो विद्वान् यहीं पर -इसी शरीर में रहते हुए , मरणोपरान्त नहीं ; यहीं पर मरने के बाद - वेदांत यहाँ वहाँ जाने की बात नहीं है। जो भी अपना हिसाब-किताब है सब यही पर क्लियर करना है। मरने के बाद यहाँ जाना , वहाँ जाना ये भी है ,लेकिन प्राथमिकता इसी जीवनमुक्ति की है। जीवनमुक्ति में क्या होता है ? इस जीवित अवस्था में ही हमलोग, अपने सत्य स्वरुप को जानकर उस मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। तो  यह है भवबंधन से मुक्त होने का मार्ग। तो शिष्य का जो चतुर्थ प्रश्न था -उसका उत्तर यही है। सभी मनुष्यो के लिए यही मार्ग है। तल रहित गड्ढे से बाहर निकलने का रास्ता यह है। अगर आपको उस गड्ढे में दिखाई देने वाले वस्तुओं के बारे में आसक्ति हो जाये , तो आप कभी उस गड्ढे से कभी बाहर निकल पाएंगे ? गड्ढे में बहुत सी प्रलोभित करने वाली वस्तुएं दिखाई देती हैं। और उससे आपका लगाव हो जाये , विपरीत लिंग के शरीर में आप आसक्त हो जाओं - क्या आप उस गड्ढे से बाहर निकल पाएंगे ? तो पहले    तीव्र वैराग्य की आवश्यकता है। वैराग्य कैसे आता है ? विवेक से आता है। जब आप यह जानते हो कि यह सिर्फ बुलबुला मात्र है। इसमें कुछ मिलना नहीं है। इसके पीछे जाना नहीं है। उसके पीछे जाना माने उस तलरहित गड्ढे में गिरते रहना है। बस गिरते ही रहना है -पहुँचोगे कहीं नहीं। जब व्यक्ति को यह समझ में आ जायेगा तो वह अपने आप सावधान हो जायेगा। और उस गड्ढे से बाहर निकलने का प्रयास करेगा। तब षट्सम्पत्ति आ जाएगी। उस अवस्था में जब वह गुरु से श्रवण करेगा कि बेटा तूँ यह शरीर नहीं है। ये तो सिर्फ एक बुलबुला है।  तू यह शरीर नहीं है - अगला प्रश्न वही आने वाला है - तूँ क्या है ?  से वह सुनेगा , उसके अनुकूल मनन करेगा , फिर उसके द्वारा यहीं पर जीतेजी निर्वाण सुख का अनुभव करेगा। हमलोग यहाँ रुक जाते हैं -!! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !! 

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मंगलवार, 19 अगस्त 2025

⚜️️⚜️️ छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥⚜️️⚜️️घटना - 329⚜️️⚜️️कुम्भकरण वध का दृश्य ⚜️️⚜️️Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #329 ||⚜️️⚜️️

 श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]


  [ घटना - 329: दोहा -70,71,72 ]

कुम्भकरण वध का दृश्य 


>>युद्धरत कुम्भकरण का घोर गर्जन सुनकर देवता भी भयभीत हो गए हैं। कन्दरा की भाँति खुले उसको मुख को श्रीराम ने अपने वाणों से भर दिया। फिरभी वो धराशायी नहीं हुआ। वो श्रीराम पर प्रहार करने दौड़ा ही था कि उन्होंने एक तीखे वान से उसका सिर काट दिया। कुम्भकरण का कटा सिर जाकर रावण के सामने गिरा। जिसे देख वो व्याकुल हो गया। इधर कुम्भकरण के रुण्ड को इधर से उधर दौड़ते छटपटाते देख राक्षस सेना में हाहाकार मच गया। और धरती डोलने लगी। श्रीराम ने उसके धड़ को दो टुकड़ों में काट दिया। पर्वत खण्डों की तरह दोनों टुकड़े धरती पर आ गिरे। ये दृश्य देख देवताओं ने हर्ष ध्वनि की, और प्रभु का गुणगान करने लगे। ये कथा सुनाते हुए भगवान शिव बोले , हे गिरिजे ! इस प्रकार कुम्भकरण जैसे अधम पापी राक्षस को भी प्रभु ने अपने हाथों सद्गति प्रदान की।   

दोहा :
* करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥70॥

भावार्थ:- वह बड़े जोर से चिग्घाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाश में सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे॥70॥

चौपाई :
* सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासुन तान्यो॥
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥1॥

भावार्थ:- करुणानिधान भगवान्‌ ने देवताओं को भयभीत जाना। तब उन्होंने धनुष को कान तक तानकर राक्षस के मुख को बाणों के समूह से भर दिया। तो भी वह महाबली पृथ्वी पर न गिरा॥1॥

* सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥2॥

भावार्थ:-मुख में बाण भरे हुए वह (प्रभु के) सामने दौड़ा। मानो काल रूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभु ने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया॥2॥

* सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥3॥

भावार्थ:- वह सिर रावण के आगे जा गिरा उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि के छूट जाने पर सर्प। कुंभकर्ण का प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभु ने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिए॥3॥

* परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥
तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥4॥

भावार्थ:-वानर-भालू और निशाचरों को अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वी पर ऐसे पड़े जैसे आकाश से दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्री रामचंद्रजी के मुख में समा गया। (यह देखकर) देवता और मुनि सभी ने आश्चर्य माना॥4॥

* सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥
करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥5॥

भावार्थ:- देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत से फूल बरसा रहे हैं। विनती करके सब देवता चले गए। उसी समय देवर्षि नारद आए॥5॥

* गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए॥
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए॥6॥

भावार्थ:-आकाश के ऊपर से उन्होंने श्री हरि के सुंदर वीर रसयुक्त गुण समूह का गान किया, जो प्रभु के मन को बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गए कि अब दुष्ट रावण को शीघ्र मारिए। (उस समय) श्री रामचंद्रजी रणभूमि में आकर (अत्यंत) सुशोभित हुए॥6॥

छंद :
* संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी।
श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥
भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने।
कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥

भावार्थ:- अतुलनीय बल वाले कोसलपति श्री रघुनाथजी रणभूमि में सुशोभित हैं। मुख पर पसीने की बूँदें हैं, कमल समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीर पर रक्त के कण हैं, दोनों हाथों से धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु की इस छबि का वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते, जिनके बहुत से (हजार) मुख हैं।

दोहा :
* निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥71॥

भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे गिरिजे! कुंभकर्ण, जो नीच राक्षस और पाप की खान था, उसे भी श्री रामजी ने अपना परमधाम दे दिया। अतः वे मनुष्य (निश्चय ही) मंदबुद्धि हैं, जो उन श्री रामजी को नहीं भजते॥71॥

चौपाई :
*दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥1॥

भावार्थ:- दिन का अन्त होने पर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। (आज के युद्ध में) योद्धाओं को बड़ी थकावट हुई, परन्तु श्री रामजी की कृपा से वानर सेना का बल उसी प्रकार बढ़ गया, जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है॥1॥(घ)॥

* छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥
बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥2॥

भावार्थ:-उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं, जिस प्रकार अपने ही मुख से कहने पर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुंभकर्ण) का सिर कलेजे से लगाता है॥2॥

* रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥
मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ॥3॥

भावार्थ:-स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बल को बखान करके हाथों से छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत सी कथाएँ कहकर पिता को समझाया॥3॥

* देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥4॥

भावार्थ:- (और कहा-) कल मेरा पुरुषार्थ देखिएगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेव से जो बल और रथ पाया था, वह बल (और रथ) अब तक आपको नहीं दिखलाया था॥4॥

* एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना॥
इति कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥5॥

भावार्थ:-इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। लंका के चारों दरवाजों पर बहुत से वानर आ डटे। इधर काल के समान वीर वानर-भालू हैं और उधर अत्यंत रणधीर राक्षस॥5॥

* लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥6॥

भावार्थ:-दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी जय के लिए लड़ रहे हैं। हे गरुड़ उनके युद्ध का वर्णन नहीं किया जा सकता॥6॥

मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना
दोहा :

* मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥72॥

भावार्थ:-मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरों की सेना में भय छा गया॥72॥ 

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⚜️️⚜️️कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥⚜️️⚜️️घटना - 328⚜️️⚜️️Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #328 ||⚜️️⚜️️ >>सारंग धनुष से शत्रु सेना पर श्रीराम का प्रहार और कुम्भकरण के साथ भयानक युद्ध का दृश्य ⚜️️⚜️️

श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]

  [ घटना - 328 : दोहा -67,68, 69 ]


 

>>सारंग धनुष से शत्रु सेना पर श्रीराम का प्रहार और कुम्भकरण के साथ भयानक युद्ध का दृश्य -

               कुम्भकरण ने युद्धभूमि में भयानक विनाशलीला मचा रखी है , ये देख श्रीराम ने सुग्रीव विभीषण और लक्ष्मण को सेना का भार सौंपा। और सारङ्गधनुष सम्भाल कर शत्रुसेना का मानमर्दन करने चले। धनुष की एक टंकार मारने से शत्रुओं के कानों के पर्दे फट पड़ने की नौबत आ गयी ,फिर उन्होंने एक लाख वाण छोड़े जिनसे महाबली राक्षस योद्धाओं के हाथ-पैर और सिर कटने लगे।लेकिन मायावी राक्षस, फिर सम्भल कर उठते हैं और युद्ध के लिए तत्पर हो जाते हैं। श्रीराम के वाण असुरिसेना का संहार करके तरकस में वापस लौट आते हैं। कुम्भकरण ने भयानक सिंहनाद किया , विशाल पर्वत उखाड़कर वो वानरसेना पर फेंकने लगा, श्रीराम के वाण उसका शरीर वेधकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। उसके भीमकाय काले शरीर से बहता रक्त ऐसा दिख रहा है , जैसे काजल के पर्वत से गेरुए रंग की धारायें प्रवाहित हो रही हों। कुपित कुम्भकरण दुगने वेग से वानरभालुओं को मारता काटता, एक पर्वत लेकर श्रीराम की ओर दौड़ा ही था कि उन्होंने उसकी भुजा ही काट डाली। ... 

दोहा :
* सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥67॥

भावार्थ:- तब कमलनयन श्री रामजी बोले- हे सुग्रीव! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेना को संभालना। मैं इस दुष्ट के बल और सेना को देखता हूँ॥67॥

चौपाई :
* कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥
प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टंकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥1

भावार्थ:- हाथ में शार्गंधनुष और कमर में तरकस सजाकर श्री रघुनाथजी शत्रु सेना को दलन करने चले। प्रभु ने पहले तो धनुष का टंकार किया, जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रु दल बहरा हो गया॥1॥

* सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥2॥

भावार्थ:- फिर सत्यप्रतिज्ञ श्री रामजी ने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे॥2॥

* कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥3॥

भावार्थ:- उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वी पर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर संभलकर उठते और लड़ते हैं॥3॥

* लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं॥4॥

भावार्थ:-बाण लगते ही वे मेघ की तरह गरजते हैं। बहुत से तो कठिन बाणों को देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और 'पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो' का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं॥4॥

दोहा :
* छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच॥68॥

भावार्थ:- प्रभु के बाणों ने क्षण मात्र में भयानक राक्षसों को काटकर रख दिया। फिर वे सब बाण लौटकर श्री रघुनाथजी के तरकस में घुस गए॥68॥

चौपाई :
* कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति छन माझ निसाचर धारी॥
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥1॥

भावार्थ:-कुंभकर्ण ने मन में विचार कर देखा कि श्री रामजी ने क्षण मात्र में राक्षसी सेना का संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने गंभीर सिंहनाद किया॥1॥

* कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी॥
आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥2॥

भावार्थ:-वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतों को आते देखकर प्रभु ने उनको बाणों से काटकर धूल के समान (चूर-चूर) कर डाला॥2॥

* पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥
तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥3॥

भावार्थ:-फिर श्री रघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष को तानकर बहुत से अत्यंत भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुंभकर्ण के शरीर में घुसकर (पीछे से इस प्रकार) निकल जाते हैं (कि उनका पता नहीं चलता), जैसे बिजलियाँ बादल में समा जाती हैं॥3॥

* सोनित स्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥
बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥4॥

भावार्थ:- उसके काले शरीर से रुधिर बहता हुआ ऐसे शोभा देता है, मानो काजल के पर्वत से गेरु के पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आए, त्यों ही वह हँसा,॥4॥
दोहा :

* महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥69॥

भावार्थ:- और बड़ा घोर शब्द करके गरजा तथा करोड़-करोड़ वानरों को पकड़कर वह गजराज की तरह उन्हें पृथ्वी पर पटकने लगा और रावण की दुहाई देने लगा॥69॥

चौपाई :
* भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा॥
चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥1॥

भावार्थ:-यह देखकर रीछ-वानरों के झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़िये को देखकर भेड़ों के झुंड! (शिवजी कहते हैं-) हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणी से पुकारते हुए भाग चले॥1॥

* यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥
कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥2॥

भावार्थ:-(वे कहने लगे-) यह राक्षस दुर्भिक्ष के समान है, जो अब वानर कुल रूपी देश में पड़ना चाहता है। हे कृपा रूपी जल के धारण करने वाले मेघ रूप श्री राम! हे खर के शत्रु! हे शरणागत के दुःख हरने वाले! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए!॥2॥।

* सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥
राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली॥3॥

भावार्थ:- करुणा भरे वचन सुनते ही भगवान्‌ धनुष-बाण सुधारकर चले। महाबलशाली श्री रामजी ने सेना को अपने पीछे कर लिया और वे (अकेले) क्रोधपूर्वक चले (आगे बढ़े)॥3॥

* खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥
लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥4॥

भावार्थ:- उन्होंने धनुष को खींचकर सौ बाण संधान किए। बाण छूटे और उसके शरीर में समा गए। बाणों के लगते ही वह क्रोध में भरकर दौड़ा। उसके दौड़ने से पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी॥4॥

* लीन्ह एक तेंहि सैल उपाटी। रघुकुलतिलक भुजा सोइ काटी॥
धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥5॥

भावार्थ:-उसने एक पर्वत उखाड़ लिया। रघुकुल तिलक श्री रामजी ने उसकी वह भुजा ही काट दी। तब वह बाएँ हाथ में पर्वत को लेकर दौड़ा। प्रभु ने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दी॥5॥

* काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका॥6॥

भावार्थ:-भुजाओं के कट जाने पर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंख का मंदराचल पहाड़ हो। उसने उग्र दृष्टि से प्रभु को देखा। मानो तीनों लोकों को निगल जाना चाहता हो॥6॥

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⚜️️🔱भ्रांतियों का निर्मूलन केवल शास्त्र और गुरु के माध्यम से ही सम्भव है !⚜️️ | Session 10 |🔱 विवेकचूडामणि सार |⚜️️🔱

       भ्रांतियों का निर्मूलन  केवल शास्त्र और गुरु के माध्यम से ही सम्भव है !

(स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज, अध्यक्ष, अद्वैताश्रम मायावती।)  

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,
 निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,
 तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥

(वेदसार शिवस्तव स्तोत्र) 

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ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः     

          यह सिद्धान्त है कि जितना हमारा अंतःकरण विवेक-वैराग्य-सम्पन्न होगा न, उतना आप आनन्द से रहोगे। स्वाभाविक आनंद से ! आपके पास चीजें हों , या न हों ; आपका जो आनंद और सुख है न , बाह्य किसी भी वस्तुपर निर्भर नहीं करता। यह सिद्धान्त है - इसी सिद्धान्त को हमलोग समझने का प्रयास कर रहे हैं। आपका सुख और आनंद बाह्य किसी व्यक्ति पर या वस्तु पर निर्भर नहीं करता। आपका सुख और आनंद 'वस्तु' और 'व्यक्ति' दोनों में से किसी के ऊपर भी निर्भर नहीं करता। हमलोग अपने सुख के लिए और आनंद के लिए कभी कभी व्यक्तियों पर बहुत ज्यादा निर्भर करने लगते हैं। है न ? यह एक बहुत बड़ी गलती हैं। आपका आनंद और सुख  निरपेक्ष है,और इसको किसी की भी आवश्यकता नहीं है। कितनी बड़ी बात है -इस लिए जितना हम विवेक-वैराग्य सम्पन्न होते हैं , उतना हम स्वाभाविक रूप से आनंद में रहेंगे। जीवनको आनंद से बिताना है , स्वाभाविक आनंद से बिताना है। साधन चतुष्टय ही वो विद्या है जिसको सीखकर हम अपना जीवन आनंद से बिता सकते हैं। आपको तो अभी त्याग-वैराग्य की बात सुनने से ही डर लगता है। पर यही सबसे सुंदर और मूलयवान चीज है। मनुष्यजीवन में त्याग-वैराग्य रूपी जो Development' है यह जो विवेक का फल है , सबसे सुंदर Development है ! 

        विवेकचूड़ामणि ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही शंकराचार्य जी हमें मनुष्य-शरीर में जन्म लेने का महत्व बता देते हैं। साधारण व्यक्ति इससे प्रायः अनभिज्ञ ही है। हम तो अपने आधारकार्ड वाले परिचय से अपने को M/F मानकर ही चल रहे हैं। और किसी ने अभी बताया भी नहीं कि वास्तव में हम क्या हैं ? हमको लगरहा है कि संसार के विषयों के पीछे दौड़ने से हम सुखी हो जायेंगे। या और अधिक भोग करके हम तृप्त हो जायेंगे। ये सारी भ्रांतियाँ हमारे अंदर हैं। इन भ्रांतियों का निर्मूलन किया जा सकता है - शास्त्र और गुरु के माध्यम से। 

 

         तो पहला यह कहा गया मनुष्य शरीर में जन्म लेना ही दुर्लभ है , चाहे पुरुष शरीर हो या स्त्री शरीर हो। सब समान हैं इसमें कोई भेद नहीं है। मनुष्य शरीर का परम् उद्देश्य है , इस बंधन से मुक्त होना। या मनुष्य जीवन का परम् उद्देश्य है - आनंद में रहना ! साधन चतुष्टय आनंद में रहने की विद्या है। आनंद में आप तभी रह पाओगे जब आप अपने सत्यस्वरूप को जान लोगे। 'मैं आत्मा हूँ !' जब ऐसा जानोगे तभी आप बंधन से मुक्त होंगे; और तब आप स्वाभाविक रूप से आनंद में रहोगे। सभी सन्तों में यही गुण दिखाई देता है न ? उनके पास कौन सी आर्थिक सम्पत्ति है ? कोई भी आर्थिक सम्पत्ति नहीं है। कोई भी इन्द्रियभोग नहीं , फिरभी वो परमानन्द में हैं। दुःख उनको स्पर्श क्यों नहीं करता ? कारण क्या है ? 

            ये आत्मानुभूति ही वह चीज है , जो हमें हर हाल में आनंद उपलब्ध कराते रहती है। मनुष्य जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है - 'मोक्ष लाभ' करना जो आत्मज्ञान के माध्यम से प्राप्त होता है। आत्मज्ञान के द्वारा जब हम मोक्ष लाभ की बात करते हैं , तो कुछ साधनों की आवश्यकता होती है। इसके चार प्रधान साधन हैं , जिसको साधनचतुष्टय कहते हैं। चार साधन क्या क्या है ? विवेक, वैराग्य , शमदमादि षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता। षट्सम्पत्ति में क्या -क्या हैं ? शम, दम, उपरति , तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान। हमारे सुख का रहस्य भी यही है -ये सब सम्पत्ति हमारे पास जितनी अधिक मात्रा में विद्यमान होगा , हमारा जीवन भी उतना सुखमय होगा। और उतना ही हम स्वाधीन होते हैं। साधन चतुष्टय के अभाव में हम पराधीन हैं , हम गुलामों की तरह जीवन को जीते हैं। और गुलामी में कभी भी सुख नहीं हो सकता। स्वाधीनता में ही सुख है , पराधीनता में सिर्फ दुःख ही दुःख है। मनु स्मृति में कहा गया है -

"सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥


अर्थात - "जो कुछ अन्यों के वश में होता है, वह दुःख है । परवशता ही दुःख है , परवशता कितने प्रकार की है ? हम परिस्थितियों के परवश हैं , वस्तुओं के परवश हैं , व्यक्तियों के परवश हैं , कितने प्रकार की परवशता है। 
सर्वमात्मवशं सुखम्। मन को आत्मा के वश में रखना यही सुख का रहस्य है। जब तक हम पारधीन हैं , मन के गुलाम हैं दुःख होगा। जब मन और इन्द्रियां  अपने वश में होता है, वह सुख है। यही संक्षेप में सुख एवं दुःख के लक्षण हैं ।" स्वाधीन होना ही सुख का रहस्य है। 

        वेदांत मनुष्य को स्वाधीन होने का मार्ग दिखाती है। जिससे हर मनुष्य स्वाधीन हो जाये , उसकी सब प्रकार की पराधीनता ,का अंत हो जाये। उसके ही ये चार साधन हैं। इन साधनों के रहने से ही कोई सत्यान्वेषी -अपने सत्यस्वरूप को जान सकता है ! हमसभी लोग सत्य को जानने के लिए ही यहाँ बैठे हैं। हमसब सत्य को जानना चाहते हैं। जो सत्य को नहीं जानना चाहते हैं , उनके लिए ये सारी चीजें लागु नहीं होतीं। जिन्हे उस तरफ जाना है - जाने दीजिये। लेकिन कभी न कभी जब उसका भी विवेक जगेगा , तो उसको भी यहीं पर आना पड़ेगा। हम सबोंकी मनोभूमिका यही होनी चाहिए कि मैं सत्यान्वेषी हूँ। मैं सत्य को जानना चाहता हूँ। मेरा अपना सत्य क्या है ? इस जगत का सत्य क्या है ? मैं कौन हूँ ? और जो जगत मुझे दिखाई दे रहा है , ये क्या है ? मुझे इस प्रश्न का समाधान प्राप्त करना है। ये हमारी Mental State ' है, मैं एथेंस का सत्यार्थी हूँ - मैं उस सत्य को जानना चाहता हूँ। जिसको देखकर देवकुलिश अँधा हो गया था। एक आदर्श सत्यान्वेषी या योग्य साधक की मानसिक अवस्था क्या है ? साधक वो है जो इस भव-बंधन से मुक्त होना चाहता है। सत्य को जानकर वह मोक्ष को प्राप्त करना चाहता है। उसके मन की स्थिति कैसी है ? आने वाले दो श्लोकों में सत्यान्वेषी की मनोभूमिका कैसी हो ? इसके बारे में बताया जा रहा है। योग्य शिष्य कैसा हो यह बताने के बाद बताया जायेगा की योग्य गुरु कैसा होना चाहिए। (11.34 मिनट-https://shlokam-org.translate.goog/texts/Vivekachudamani-32-40/)

स्वामिन्नमस्ते नतलोकबन्धो
कारुण्यसिन्धो पतितं भवाब्धौ।
मामुद्धरात्मीयकटाक्षदृष्ट्या
ऋज्व्यातिकारुण्यसुधाभिवृष्ट्या॥

(॥ श्रीशङ्कराचार्यकृतं विवेकचूडामणि ३७॥) 

अर्थ:- हे शरणागतवत्सल, करुणासागर, प्रभो! आपको नमस्कार है। संसार-सागर में पड़े हुए मेरा आप अपनी सरल तथा अतिशय कारुण्यामृतवर्षिणी कृपा कटाक्ष से उद्धार कीजिये।

दुर्वारसंसार दावाग्नि  तप्तं
दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः ।
भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः
शरण्यमन्यद्यदहं न जाने ॥ ३८॥

जिससे छुटकारा पाना अति कठिन है उस संसार -दावानल से दग्ध तथा दुर्भाग्यरूपी प्रबल आँधी से अत्यंत कम्पित और भयभीत हुए मुझ शरणागत की आप मृत्यु से रक्षा कीजिये। क्योंकि इस समय मैं और किसी शरण देनेवाले को नहीं जानता। 

इन दो श्लोकों में साधक की भूमिका हमारे सामने रखी जा रही है। इसकी मनःस्थिति देखिये। आप अपने मन में ऐसी कल्पना करके देखिये कि कोई योग्य साधक , जो आत्मज्ञान के माध्यम से मोक्ष को प्राप्त करना चाहता है , इस भवबंधन से मुक्त होना चाहता है। वो भवबंधन से पीड़ित है। एक बार अगर हमारे समझ में आ जाये कि हम बंधन में हैं। तो आप बंधन में रहना पसंद करोगे क्या ? कोई भी जीवजन्तु बंधन में रहना पसंद नहीं करेगा। 

अर्थात यह समझ में आने लगे कि मैं स्वयं को एक बुलबुला समझकर दूसरे बलबूलों में कैसे फँस गया हूँ ? यह देह-इन्द्रिय संघात अपनेआप में एक बुलबुला है। मैं ये समझके बैठा हूँ कि मैं ये हूँ और मैं दूसरे बुलबुलों के साथ ऐसा संबन्ध बना लिया है - जैसे वो सब कोई ऐसा मोहजाल हो, जिसमें मैं डूबता ही जा रहा हूँ ? जब सत्यान्वेषी इस बंधन को देखने लगता है , तब उसका दम घुटने लगता है। यह छटपटाहट भले आज हमारे अंदर नहीं है , लेकिन एक न एक दिन आएगा। वो व्यक्ति व्याकुल होकर इस बंधन से छूटने का प्रयास करेगा। जो योग्य मुमुक्षु है , जो मुक्ति को प्राप्त करना चाहता है , तो वह जायेगा कहाँ ? इस बंधन से मुक्त होने का मार्ग कौन दिखला सकता है ? गुरु ही दिखा सकता है , शास्त्र ही दिखा सकता है। हमारे स्वयं मातापिता भी हमें मुक्त होने का मार्ग नहीं दिखा सकते हैं। हमारे जो स्कूल के शिक्षक हैं वे भी नहीं कर सकते। हमारे शास्त्र और गुरु ही हमारी भ्रान्तियों का उन्मूलन कर सकते हैं। ऐसे कोई योग्य साधक गुरु के पास जाकर नतमस्तक -दण्डवत गिरकर याचना करता है। इन दो श्लोकों में मुमुक्षु की याचना है। 

       आप कल्पना कर सकते हैं कि ऐसे कोई आदर्श गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस हैं , और योग्य साधक शिष्य नरेन है, यानि विवेकानन्द। वे भी बिल्कुल इसी प्रकार आये थे। गुरु के पास जाकर कह रहे हैं - स्वामिन नमस्ते ! नत लोकबन्धो! हे गुरुदेव , आप तो उन सभी लोगों के बँधु हैं जो आपके सामने नतमस्तक होते हैं। फिर आप कारुण्यसिन्धो -करुणा के सागर हो। जो भी आदर्श गुरु होगा वो अत्यंत करुणामय ही होगा। फिर कहते हैं - पतितं भवाब्धौ माम उद्धर' मैं इस संसार-सागर में गिरा हुआ हूँ। अर्थात मैं उस कुएं में गिरा हुआ हुआ हूँ जिसका कोई तल है नहीं। साधक को ये पता है कि वो भवसागर में गिर गया है ; किन्तु सर्वसधारण आदमी को ये पता होता है क्या ? अंत में बुढ़ापा आ गया , वो खाली का खाली ही रहा। विषयों , वस्तुओं , व्यक्तियों के पीछे सिर्फ दौड़ते ही रहे , मिला कुछ नहीं। जिसको ये साँझ में आ गया कि मेरे दौड़ की दिशा गलत है - बहिर्मुखी है ?? हमलोग अथाह संसार सागर में गिरते जा रहे हैं। पतितं भवाब्धौ - अब्धि मतलब भव समुद्र में गिरते जा रहे हैं। माम उद्धर ! मेरा उद्धार कीजिये। मुझे इस संसार-सागर से बाहर निकलने का मार्ग दिखाइए। कैसे ? 'आत्मीय कटाक्ष दष्टया' - आपकी जो स्नेहपूर्ण कृपादृष्टि है , इन महापुरुषों की एक दृष्टि मात्र ही पर्याप्त है। रमणमहर्षि की दृष्टि , स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि ? उनकी आँखों में कैसा तेज भरा हुआ है ! क्योंकि वे स्वयं सत्य में प्रतिष्ठित हैं। आप जितना सत्य के नजदीक पहुँचियेगा आपका चेहरा बदल जायेगा। ब्रह्मबोध से निकलने वालो दृष्टि का तेज है - विवेकानंद की आँखों में।   शिष्य कह रहे हैं - आपकी 12 जनवरी 1985 वाली कृपादृष्टि मुझपर पड़े। क्योंकि सत्यान्वेषी पर यदि स्वामी जी की दृष्टि पड़ गयी तो उतने से ही उसका काम हो गया ?!! अब वो शिष्य उस अंधे कुँए से बाहर निकलने ही वाला है। वो दृष्टि कैसी है - ऋज्व्यातिक- रिजु , रिजु बिल्कुल सीधी दृष्टि है!  कारुण्य सुधाभिवृष्टि' -सुधा यानि अमृत , अमृत रूपी करुणा से भरी है -उनकी दृष्टि। ऐसे करुणा की वर्षा करके मुझे संसार -चक्र  बाहर निकालिये ! 

      शिष्य आगे कहते हैं -  दुर्वारसंसारदावाग्नितप्तं' हे गुरुदेव मैं इस संसार दावाग्नि में   तप रहा हूँ जल रहा हूँ। यहाँ संसार को दावाग्नि कह रहे हैं- जिसको हमलोग 'Forest Fire' कहते हैं - एक बार कोडरमा रेंजर के ऑफिस में मैंने देखा था !! उसको बुझाना बहुत कठिन काम है। उस आग के फैलाव को रोकना बड़ा कठिन है। ऊपर से अगर हवा भी बहने लगे , तबतो हमारे नियंत्रण से बिल्कुल बाहर चली जाती है। उसी संसारसागर को अगले श्लोक में दावाग्नि कह रहे हैं। कहने का मतलब है कि बंधन की परिस्थिति ऐसी ही है। दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः। माने मैं दुःख रूपी हवा से काँप रहा हूँ। बंधन, ये मोह-जाल  कितना दुःखदायी है एक बार यदि आप समझ जाओ, तो आप चुप नहीं बैठोगे।  भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः शरण्यमन्यं यदहं न जाने॥  भितं माने भयभीत हूँ।-मैं आपके चरणों में शरणागत हूँ , मुझे मृत्यु से बचाइए। शरण्यमन्यं यदहं न जाने- आपके आलावा कोई दूसरा स्थान मैं नहीं जानता , जहाँ मुझे शरण मिल सकती हो। इस संसारसागर से बाहर निकलने का जो मार्ग है मुझे बचाइए। योग्य मुमुक्षु की मानसिक दशा यही है। 

      इसीको ठाकुर व्याकुलता कहते थे। हमारी परम्परा में एक कहानी है। कोई शिष्य अपने गुरु के पास जाकर पूछता है , भगवान मुझे भगवान का दर्शन कब होगा ? गुरुदेव उसको हाथ पकड़ कर आश्रम के बाहर एक तालाब के पास ले जाते हैं। डुबकी लगाने पर गुरुदेव उसकी गर्दन को पानी के भीतर दबाये रखते हैं।  फिर थोड़ी देर बाद जब सिर ऊपर निकालते हैं , तब शिष्य से पूछा - अभी तुम्हें कैसा लग रहा था ? मेरे तो प्राण निकलने वाले हों -इतना व्याकुल हो रहा था। तब गुरुदेव कहते है जब तुम्हारे अंदर ईश्वर को देखने, या सत्य को देखने  के लिए इस प्रकार की छटपटाहट होगी , व्याकुलता होगी, उस दिन तुम सत्य को जान पाओगे। हम इसको स्वीकार करें कि हमारे अंदर वो व्याकुलता नहीं है। अगर व्याकुलता शुरू हो जाएगी -आपका जीवन परिवर्तित हो जायेगा। ये तीव्र व्याकुलता ही मुमुक्षता हैऐसी मुमुक्षता भी दुर्लभ है - विवेकचूड़ामणि के शुरुआत में ही शंकराचार्य तीन चीजों को दुर्लभ कहे हैं। तीसरी बात महापुरुष की शरणागति दुर्लभ है। यदि किसी के जीवन में ये तीनों हों -तो ऐसा ईश्वर के अनुग्रह से ही होता है। 

    ॐ  !! वंदे  गुरु परंपराम् !! ॐ आदर्श गुरु कैसे होते हैं ? उसकी परिभाषा क्या है - 

अयं स्वभावः स्वत एव यत्पर-

श्रमापनोदप्रवणं महात्मनाम् ।


सुधांशुरेष स्वयमर्ककर्कश-

प्रभाभितप्तामवति क्षितिं किल ॥ ४० ॥

अर्थ:-महात्माओं का यह स्वभाव ही है कि वे स्वतः ही दूसरों का श्रम दूर करने में प्रवृत्त होते हैं। सूर्य के प्रचण्ड तेज से सन्तप्त पृथ्वीतल को चन्द्रदेव स्वयं ही शान्त कर देते हैं।  

          महामण्डल के 'नेता ' का स्वभाव (नवनीदा का स्वभाव या, महात्माओं का स्वभाव) इस श्लोक में अत्यंत सुंदर उपमा के माध्यम से स्पष्ट किया गया है। जैसे चन्द्रमा की शीतल किरणें सूर्य के प्रचंड ताप से तप्त पृथ्वी को स्वतः ही शांति प्रदान करती हैं, वैसे ही महापुरुष अपने सहज स्वभाव से दूसरों के कष्ट और श्रम को हरने में संलग्न रहते हैं। उनका यह आचरण किसी बाहरी प्रेरणा या स्वार्थ से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उनकी अंतःकरण की करुणा और अहेतुक दया का स्वाभाविक परिणाम होता है। 

         जो व्यक्ति आत्मज्ञान को प्राप्त कर चुका होता है, उसकी दृष्टि में समस्त प्राणी अपने ही स्वरूप में अभिन्न प्रतीत होते हैं। विवेकचूडामणि में बार-बार इस बात पर बल दिया गया है कि  इस अभिन्नता की अनुभूति से उनमें स्वार्थ का लेशमात्र भी नहीं रहता और वे अनायास ही लोककल्याण में प्रवृत्त हो जाते हैं।
       श्लोक में “अयं स्वभावः स्वत एव” कह कर स्पष्ट किया गया है कि यह प्रवृत्ति किसी बाहरी कारण या प्रलोभन से नहीं होती। जैसे सूर्य का ताप देना उसका स्वभाव है, वैसे ही चन्द्रमा का शीतल करना भी उसका सहज स्वभाव है। इसी प्रकार महात्माओं की करुणा, उनकी सेवा भावना और दूसरों की पीड़ा को देखकर उनके हृदय में उत्पन्न होने वाला द्रवित भाव उनके आध्यात्मिक विकास और आत्मज्ञान का सहज प्रसाद होता है। उन्हें किसी से प्रशंसा या प्रतिफल की अपेक्षा नहीं होती। वे संसार में वसन्त ऋतु के समान अमृतवर्षा करने के लिए अवतरित होते हैं।
      यहाँ सूर्य और चन्द्रमा की उपमा अत्यंत सार्थक है। सूर्य अपने तेज से संसार को ऊर्जा देता है, किंतु कभी-कभी उसकी अधिकता से कष्ट भी होता है। चन्द्रमा उस कष्ट को दूर करता है। इसी प्रकार संसार में अनेक प्रकार की पीड़ाएं, संघर्ष और श्रम हैं, जिन्हें महात्मा अपनी सहज उपस्थिति से शमन करते हैं। उनके समागम से ही जीवन में शांति, स्थैर्य और संतोष की भावना उत्पन्न होती है।
विवेकचूडामणि में महात्माओं की भूमिका एक पथ-प्रदर्शक दीपक के रूप में भी बताई गई है। वे स्वयं संसार-सागर से पार उतर चुके होते हैं और दूसरों को भी पार लगाने में तत्पर रहते हैं।

      उनके आचरण में किसी प्रकार की बनावट या दंभ नहीं होता। वे अनायास ही प्रेम और करूणा के स्रोत होते हैं। उनकी उपस्थिति से ही व्यक्ति के अंतर्मन में आत्मज्ञान के बीज अंकुरित होते हैं।
यह श्लोक हमें यह भी स्मरण कराता है कि यदि हम भी अपने भीतर करुणा और निस्वार्थ सेवा का भाव विकसित करें, तो हम अपने जीवन में महात्माओं के गुणों की कुछ झलक प्राप्त कर सकते हैं। संसार की पीड़ा को कम करना, दूसरों को सुकून देना और बिना किसी स्वार्थ के उनके श्रम का बोझ हल्का करना ही सच्ची आध्यात्मिकता का परिचायक है। इस प्रकार यह श्लोक केवल महात्माओं की महिमा ही नहीं, बल्कि हमारे लिए भी प्रेरणा का स्रोत है कि हम अपने हृदय को निर्मल कर दूसरों के हित में स्वतः प्रवृत्त हों। 

शांता महान्तो निवसन्ती संतो
वसंतवल्लोकहितं चरन्त:।
तीर्णा: स्वयं भीमभवार्णवं जना-
नहेतुनान्यानपि तारयन्त:।।39।

भयंकर संसार-सागर से स्वयं उत्तीर्ण हुए और अन्य जनों को भी बिना कारण ही तारते तथा लोकहित का आचरण करते अति शांत महापुरुष ऋतुराज वसंत के समान निवास करते हैं।

श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकाम हतो यो ब्रह्मवित्तमः ।
ब्रह्मण्युपरतः शान्तो निरिन्धन इवानलः
अहेतुकदयासिन्धुर्बन्धुरानमतां सताम् ॥ (33)

        इन तीन श्लोकों में आदर्श गुरु का चरित्र हमारे सामने रखा गया है। स्वामी विवेकानन्द अपने व्याख्यानों में शंकराचार्य के विचारों को उद्धृत करते रहते हैं। इसी श्लोक को पहले लेते हैं कि आदर्श गुरु कैसे होते हैं ? श्रोत्रिय का अर्थ है -श्रुतियों में बताये गए जो सिद्धान्त हैं - चार महावाक्य हैं -उनमें प्रतिष्ठित ! श्रुति यानि उपनिषद।  उपनिषदों में जो सिद्धान्त हैं -उनमें प्रतिष्ठित। उपनिषद का मूल सिद्धांत क्या है ? " सर्वं खल्विदं ब्रह्म" ये ऋषियों की अनुभूति है। भले ही आज हम जगत को ब्रह्ममय नहीं देख रहे हों , लेकिन सच्चाई यही है। एकमेवाद्वितीय ब्रह्म से भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है। सच्चिदानंद ब्रह्म से भिन्न द्वितीय वस्तु और गुरु नहीं है। ये सिद्धान्त है।  और गुरु वे हैं जो इस सिद्धांत में प्रतिष्ठित हैं। गुरु का बोध इसमें प्रतिष्ठित है। आप उन्हें नींद से भी उठाके पूछो -तो नींद में भी वे यही बोलेंगे। फिर क्या ?  

      'अवृजिनो'- यानि गुरु निष्पाप हैं। वो चरित्र में प्रतिष्ठित है कि वो कोई भी गलत काम नहीं कर सकता। उनके अंदर पाप करने की प्रवत्ति पूरी तरह से क्यों खत्म हो गयी ? क्यों ? क्योंकि वे - अकाम हतो ! क्योंकि वे कामना शून्य हैं। उनके अंदर कामनायें नहीं हैं। हम पाप करते क्यों हैं ?  सारे अनैतिक काम -कामना के वश में होकर ही किये जाते हैं। जो करना नहीं है , हम उसको कर बैठते हैं। पापाचरण के मूल में अनियंत्रित काम है। गुरु के अंदर कोई कामना ही नहीं -तो पाप वे कर ही नहीं सकते। क्योंकि उनकी दृष्टि में संसार कहाँ है - वो तो ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित हैं। आप कल्पना कर सकते हैं , रमणमहर्षि या रामकृष्ण परमहंस -उनके अंदर कोई कामना ही नहीं है। सत्य में प्रतिष्ठित गुरु के लिए -संसार नाम की कोई चीज है ही नहीं। और गुरु क्या हैं ? वो  ब्रह्मवित्तमः हैं - जितने ब्रह्मविद हैं , ब्रह्म को जानने वाले हैं, उनमें से उत्तम ब्रह्म वेत्ता हैं। फिर क्या ? ब्रह्मणि उपरतः ' ब्रह्म में ही उनका वासस्थान बन गया है। वे सब समय ब्रह्म में ही रहते हैं। हम संसार में रहते हैं , गुरु सब समय ब्रह्म में रहते हैं। इसीलिए शान्त हैं , हमलोग सब समय संसार में डूबे हुए हैं , इसलिए अशांत हैं। उनकी शांति कैसी है ? निरिन्ध्न इवा अनल ' जिस प्रकार ईंधनरहित अग्नि है। संसार रूपी अग्नि अब इनके अंतःकरण में नहीं है। फिर 'अहेतुक दया सिन्धु', उनकी दया अहेतुकी है। उनकी कृपा सब पर है। बंधू अनाम सतां - जो भी अच्छे लोग उनके शरण में आते हैं , उनके लिए वे बंधु के समान हैं। वैसे तो हमारे बहुत से मित्र बंधु हैं , लेकिन हमारे असली बंधु गुरु हैं। जिसको हम बंधु या दोस्त समझते हैं -वो पारमार्थिक दृष्टि से दुश्मन का कार्य देता है।  अनजाने में ? जो व्यक्ति आपको संसार में और भी डुबोने का कार्य करेगा , वो जानबूझकर नहीं कर रहा है। (42.29 मिनट) वो उसको पता नहीं है -इसलिए आपको संसार में डूबने की सलाह देता रहता है। हमारे परिवार वाले भी उसमें आ जाते हैं। सही हित किसमें है ? ये किसको पता है ? आप कह सकते हो हमारा असली मित्र विवेकानन्द है। हमारे असली मित्र शंकराचार्यजी हैं। जो हमारे Role Model हैं -या जो हमारे प्रेरणा-श्रोत हैं वही हमारे असली बंधु हैं। जो विवेकानंद के शरण में आते हैं - वे उसके बंधु हैं। गुरु माँ के समान जिससे आप सबकुछ बात कर सकते हैं। ऐसे गुरुओं का स्वभाव क्या है ? यत्पर- श्रम अपनोद प्रवणं !            

 नेता के स्वभाव की प्रवणता - inclination है 'पर श्रम आपनोदनं' दूसरों के दुःख कष्ट को हरना इनकी प्रवणता है। जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता है। नेता का एक सुंदर उदाहरण दिए हैं शंकराचार्य जी - सुधांशुरेष स्वयम अर्क कर्कश -सूर्य के प्रचण्ड तेज से संतप्त पृथ्वीतल को चन्द्रदेव स्वयं ही शांत कर देते हैं। मई के महीने में पृथ्वी तप्त हो रही है। हमारे गाँव पटना में - गर्मीं में केवाल मिट्टी फट जाती है ! सारा दिन सूरज इस पृथ्वी को तप्त करता रहता है , सूर्यास्त के बाद जब पूर्ण चन्द्रोदय हो जाता है - तो क्या होता है ? पृथ्वी चन्द्रमा से याचना नहीं कर रही है , फिर भी चन्द्रमा स्वयं अपने शीतल किरणों को पृथ्वी पर बिखेर देती है। जली हुई पृथ्वी को शांति प्रदान करती है -क्या सुंदर उदाहरण है। चन्द्रमा का स्वभाव है -शीतलता प्रदान करना। गुरु ऐसे ही होते हैं। तप्त जीवों के अन्तःकरण में शांति प्रदान करते हैं। ऐसे महापुरुष के सानिध्य में बैठने से ही हमारा अंतःकरण शांत हो जाता है। काम. क्रोध, मद ,मोह,लोभ और मात्सर्य से -या  षडरिपुओं के प्रभाव से जीव का अंतःकरण जो तप रहा था, वहाँ जाते ही शांत हो जाता है। स्वामी जी को गुरु की ये परिभाषा बहुत पसंद थी- शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो वसन्तवल्लोकहितं चरन्त:। तिरानाः स्वयं भीमभावार्णवं जनान अहेतुनां यानापि तारयन्तः। ऐसे नेता लोग हैं - जो सब समय शांत हैं ! पतझड़ के बाद जब वसंत ऋतू आती है तो क्या होता है ? सब पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। हरियाली छ जाती है , बगीचे में फूल खिलने लगते हैं। संत, नेता 'नवनीदा' के आते ही सबके हृदयकमल में अध्यात्म का फूल खिलने लगता है। उनके सानिध्य में जो भी आते हैं -उनके जीवन में आध्यात्म का फूल खिलने लगता है। हमारा हृदय जो अभी तक बंजर था , वहाँ पर आध्यात्म अर्थात आत्मान्द रूपी फूल धीरे से अंकुरित होने लगता है , ये लोग बस लोकहित करने के लिए चलते रहते हैं , चलते रहते हैं। पुराने जमाने की बात है -अब संन्यासी पैदल नहीं चलते। पर दादा गाँव -गाँव जाते थे। वे जिस किसी गाँव में जाते थे वहाँ आध्यात्मिकता का फूल खिलने लगता था। ये उनका स्वभाव था। और क्या ? तिरानाः स्वयं भीमभावार्णवं जनान अहेतुनां यानापि तारयन्तः। जो स्वयं इस संसार सागर से पार कर चुके हैं -वे बिना हेतु अब दूसरों को भी पार करने -कराने का मार्ग बता देते हैं। इन तीन श्लोकों में एक आदर्श गुरु का चित्र हमारे सामने रखा गया, उसके पहले योग्य शिष्य का चित्र रखा गया। जो संसार सागर को पार करने के लिए व्याकुल है , गुरु का स्वभाव ही है उसके कष्ट को दूर करना। 

     हमारी गुरु-शिष्य  परम्परा का एक सुंदर उदाहरण - श्री रामकृष्ण -नरेन् वेदांत शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा -Be and Make ! (57.21 मिनट) कितने लोगों ने विवेकानन्द की जीवनी को पढ़ा है ? लगभग सभी लोगों ने पढ़ा है। नरेन् जो परवर्ती काल में स्वामी विवेकानन्द बनते हैं। नरेंद्र का जन्म एक अत्यंत ही धार्मिक परिवार में हुआ था। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी अत्यंत ही धार्मिक महिला थीं। जैसा अक्सर हमलोग अपने घरों माँ या फुआ आदि को देखते हैं। वे रामायण , भागवत , पुराणों में अत्यंत ही पारंगत थीं। उनका जीवन धर्मकेन्द्रित जीवन था व्रतों से भरा हुआ था। बचपन से ही वे रामायण -महाभारत की कहानियाँ सुनकर बड़े हुए थे। राम , सीता ,हनुमान, राधा -कृष्ण , शिव-पार्वती पुराणों की कहानियाँ सब कुछ सुना था। बड़ा होकर नरेन् स्कूल जाने लगा , फिर कॉलेज में प्रवेश किया। जैसे ही कॉलज में प्रवेश किया - कॉलेज में प्रवेश करते ही जैसे ही वे पाश्चात्य विचार धारा से परिचित हुए। आज की विडंबना यही है - पाश्चात्य विचारधारा से अवगत होते ही - Western philosophy, Western psychology, Western History ,Western Logic , Western Science, Physical Science, आदि क्या है ? पूरा भौतिक वाद है। पाश्चत्य जगत की दृष्टि में सबकुछ matter ही है ! देखिये यह जानकर बहुत बड़ी समस्या आ जाती है , बहुत बड़ी चुनौती आती है। दो विभिन्न संस्कृतियाँ हैं - भारत की संस्कृति आध्यात्ममूलक है। इसमें सिद्धांत क्या है ? सबकुछ चैतन्य ही है , और पाश्चात्य संस्कृति भौतिकवाद मूलक है -जिसका सिद्धांत ये है - ये सबकुछ matter है। ये दो 'Paradigm' प्रतिमान या आदर्श हैं। Two world Views - दो विश्व दृष्टिकोण हैं। विडंबना ये है कि हमारे बच्चों को आध्यात्मिक दृष्टिकोण तो मिलता ही नहीं है। बचपन से ही उनको स्कुल -कॉलेज में केवल भौतिक दृष्टिकोण ही दिया जाता है। इसके चलते उसमें आध्यात्मिक दृष्टिकोण- 'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या' के प्रति संदेह पैदा होता है। होता है कि नहीं ? ये आज भारतवर्ष की नई पीढ़ी की बहुत भयानक समस्या है।  अंग्रेजी शिक्षापद्धति शुरू होने के पहले ये समस्या हमारे देश में नहीं थी। स्वामी विवेकानन्द कहते थे हमें हमारी पुरानी गुरुगृह वास वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण पद्धति -Be and Make ! को फिर से लाना होगाआज की हमारी जो शिक्षा पद्धति है , यह अपूर्ण है। स्वामी विवेकानन्द पाश्चात्य-शिक्षा पद्धति को गलत नहीं कहते हैं - भौतिक विज्ञान तो होना ही चाहिए , गलत नहीं है। लेकिन अपूर्ण है। (1:00:56 मिनट ) ये पूर्ण शिक्षण नहीं है। ये शिक्षण पूर्ण तब होगा , जब इस 'भौतिक विज्ञान' को 'आध्यात्मिक -विज्ञान'  का आधार प्रदान किया जायेगा। इस पाश्चात्य शिक्षा रूपी भौतिक-विज्ञान का मूलभूत आधार आध्यात्मिक विज्ञान का होना अनिवार्य है। 

         आप अगर अपने 'स्व ' को न जानकर , मैं कौन हूँ ? मेरा सत्य-स्वरुप क्या है ? यह न जानकर यदि सारे भौतिक विज्ञान को प्राप्त भी कर लो - रॉकेट विज्ञान, परमाणु विज्ञान'Rocket science , Atomic Science में पारंगत भी हो जाओ ; तब भी आपने कुछ भी नहीं जाना ! लेकिन हमारे भारत की जो 'गुरुगृहवास शिक्षा-पद्धति' है, वो इस प्रकार की थी जहाँ बाह्य-विज्ञान और अन्तर्विज्ञान (outer science and inner science) दोनों पढ़ाये जाते थे। हमारी गुरु-परम्परा में आध्यात्मिक विज्ञान भी होता था , और भौतिक विज्ञान भी होता था। (*श्री रामकृष्ण जी का उदाहण देखिये वे दूरबीन से खगोल-विज्ञान, ज्वार -भाटा , म्यूजियम के जीवन को भी समझने जाते थे।) यही पूर्ण शिक्षण पद्धति है। लेकिन वर्तमान युग या  आधुनिक युग में, फिर से गुरुकुल पद्धति की शिक्षा में लौटना उचित नहीं होगा, या सम्भव भी नहीं होगा। इसलिए अन्तर्विज्ञान या आध्यात्मिक विज्ञान की शिक्षा द्वारा भैतिक-विज्ञान शिक्षा को पूर्ण करने के लिए- स्वामीजी की (पूर्ण ) मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी  शिक्षा-पद्धति Be and Make' का प्रचार-प्रसार करने के लिए 1967 ई ० में महामण्डल को भी बंगाल में ही आविर्भूत होना पड़ा।  (या नवनीदा की आत्मकथा - " जीवन नदी के हर मोड़ पर " के अनुसार स्वामी विवेकानन्द- कैप्टन सेवियर परम्परा में प्रशिक्षित नवनीदा को- महिमाचरण चक्रवर्ती के घर में जन्म लेकर अन्दुल मौरी स्कूल में विद्या-अध्यन करने के लिए आविर्भूत होना पड़ा।)  

      तो जैसे ही बालक नरेन् कॉलेज में गया और पाश्चात्य जगत की भसौतिकवादी विचारधारा से वो अवगत हुआ , समस्या शुरू हो गयी। उसके मन में सन्देह उत्पन्न होने लगा। ये लोग तो कहते हैं -सबकुछ पदार्थ ही है - ये भौतिक जगत ही सत्य है। क्योंकि हमलोग इसको छूकर देख सकते हैं , या इन्द्रियों से अनुभव कर सकते हैं। लेकिन इसमें भगवान कहाँ हैं ? ईश्वर कहाँ है ? ये सारे प्रश्न उनके मन में उठने लगे और उनके मन एक प्रकार का द्वंद्व चलने लगा। ये एक Conflict बन गया और ये संघर्ष इतना तीव्र हो गया कि वे शंकराचार्य की के शिष्य परिभाषा के अनुसार बिल्कुल ब्याकुल हो गए , और उनके कॉलेज के जमाने में ये नरेन् एक आदर्श शिष्य में रूपांतरित हो गए। कैसे ? अब ये आदर्श शिष्य सत्य को जानने के लिए अत्यंत व्याकुल रहने लगे। सत्य को जानने की ऐसी व्याकुलता - जिसने विवेकानन्द चरित पढ़ा है , वो देखा होगा कि यह समय उनके जीवन का एक ऐसा कालखण्ड था , मानो हर समय उनके मन में केवल एक ही विचार चल रहा हो = सत्य क्या है ? (वो सत्य क्या है -जिसको देखकर एथेंस का सत्यार्थी देवकुलिश अँधा हो गया था ? यही प्रश्न मेरे मन में क्लास 9 से, (1966 से) लेकर 14 अप्रैल, 1992 तक चलता रहा ?) बचपन से वे अपनी माँ से ईश्वर की बात सुनते आये हैं , रामायण, बालक ध्रुव , प्रह्लाद , कृष्ण-कंस ये सब सुनते आये हैं। लेकिन ईश्वर सच में है क्या ? या सिर्फ एक कल्पना मात्र है ? यह प्रश्न किसी भी युवक या युवती के मन में आ सकती है , विशेषकर आज के परिपेक्ष्य में। हमारी शिक्षण-पद्धति ही ऐसी है -जिसमें आध्यात्म के लिए कोई स्थान ही नहीं है। इसलिए अधिकतर वर्तमान पीढ़ी के युवाओं में आध्यात्मिकता और भारतीय संस्कृति के ऊपर एक सन्देह है। वे चलते हैं एकदम पाश्चात्य दृष्टिकोण से , है ना ? वर्तमान पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति और विचारधारा से इतना प्रभावित है - कि उनको अपने राष्ट्र की प्राचीन सनातन संस्कृति के ऊपर संदेह होता है। अपने धर्म और मूर्ति-पूजक संस्कृति को एक प्रकार से तुच्छ नजर से देखते हैं। [ऐसे  'आंग्ल वैदिक विद्यालय' या भा जिसे DAV (Dayanand Anglo-Vedic) एंग्लो-वैदिक स्कूलों के रूप में जाना जाता है,  भी हैं जो पाश्चात्य शिक्षा का नकल करते हुए बचपन से ही बच्चों को ईश्वर का निराकार स्वरुप समझाने में पिल कर पड़े हुए हैं। वहाँ के छात्र और शिक्षक मूर्तिपूजक श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं।  क्षद्म मूर्ति पूजक पाश्चत्य शिक्षण पद्धति को Superior मानते हैं , जबकि सच्चाई ठीक इसके उल्टा है। यही विडंबना है , सच्चाई सीधा उल्टा है। भारतीय संस्क्रृति की शिक्षण-पद्धति के सामने वो कुछ भी नहीं है। आज वहाँ के लोग आध्यात्मिक शिक्षा लेने हमारे यहाँ आ रहे हैं , हमारे लोग वहाँ जा रहे हैं। ये ऐसा सम्मोहन (hypnotism) हैं , कि इससे हम सभी लोग सम्मोहित हो गए हैं। पाश्चात्य देशों के भौतिक विचारधारा से हमलोग बिल्कुल सम्मोहित हो गए हैं। We have become Hypnotized  ! इस हिप्नोटिज्म को पहला तोड़ने वाले व्यक्ति थे स्वामी विवेकानंद !(या उनके गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस ?) पूरे विश्व के सामने उन्होंने यह उद्घाटित कर दिया कि सर्वश्रेष्घ्ठ धर्म है सनातन धर्म - क्योंकि यही सनातन शिक्षा भी है !! सनातनधर्म ही पूरे मानवसमाज को बचा सकती है।  और भारतवर्ष कितना अपनी धर्म पूर्णता देता है और इस लिए पूर्णता देने वाली शिक्षा को अभिन्न मानने के शिक्षा-पद्धति के बलपर गौरवशाली राष्ट्र है - यह बात पूरे विश्व के सामने रखते हैं। दुनिया की सबसे महान भूमि, पुण्य भूमि  यह देश है, हमारी मातृभूमि, हर भारतीय को गर्व होना चाहिए कि, हम भारतीय हैं और हम सनातनी हैं!Greatest Land in the world is this country , our Motherland , every Indian should be proud that, We are Indians and We are Sanatani! इस गर्व की भावना प्रत्येक युवक और युवतियों में होनी चाहिए। इस कार्य को करने वाले - सनातनी होने के गर्व को विश्व में उजागर करने वाले महापुरुष, युगनायक , युगाचार्य हैं स्वामी विवेकानन्द। 

     जो आज के शंकराचार्य हैं। इस युगाचार्य के जीवन में वह भी एक दौर रहा, जब उनके मन भी संदेह , या द्वंद्व उतपन्न हुआ कि क्या ईश्वर है ? या सिर्फ एक कल्पना है ? पाश्चात्य विचारधारा का जो दुष्प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है कि हम भी भटक जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में नरेंद्र कलकत्ते के हर जो बुद्धिजीवी थे उस जमाने के , बड़े -बड़े शिक्षाविद, बुद्धिजीवी, Academicians, Intellectuals , उनके पास जाकर पूछते हैं। आज भी हमलोग Academicians, और Intellectuals , को ही बहुत ज्ञानी मान लेते हैं। वे जानते कुछ नहीं हैं - कोई Intellectual क्या जनता है ? जानने वाला तो ऋषि है। आज भी अगर कोई यह कहे कि शंकराचार्य जी ने यह कहा है-तो हम उसकी ओर ध्यान नहीं देंगे। लेकिन कोई यह कहे कि Elon Musk ने ,Steve Jobs पुतिन या ट्रम्प ने ऐसा कहा है , तो तुरंत हमलोग उस पर विश्वास कर लेंगे। क्योंकि अंग्रेजी के गुलाम हमलोग अंग्रेजों से आज भी सम्मोहित हैं। अगर आप कहें कि भगवान कृष्ण ने ये कहा तो हमको लगता है कि चलो ये कहा होगा। ऐसे हमलोग भ्रमित हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है - तो हमको लगता है इसमें क्या है ? पाश्चात्य देश के किसी बिद्धिजीवी ने कुछ कहा तो हम तुरंत उसको कोट करना शुरू कर देते हैं। वे बुद्धिजीवी लोग कुछ भी नहीं जानते हैं। बुद्धिजीवी क्या जानता है ? सत्य को जानने वाला तो ऋषि है। तो पहले हमें ऋषि और बुद्धिजीवी की श्रेष्ठता के बारे में जो भरम है , पहले हमको इस भ्रम से बाहर निकलना होगा। 

     जो हो बालक नरेन् तत्कालीन कलकत्ते के जो भी बड़े बड़े बुद्धिजीवी थे , Academicians, और Intellectuals थे उनके पास जाकर पूछते हैं - क्या आपने ईश्वर को देखा है ? बिल्कुल व्याकुलता - आपने क्या देखा ? पागलों की तरह घूमघूम कर पूछ रहे हैं। उस समय के नरेन का जो चित्रीकरण है ,वो ऐसा ही था।  बाल बढ़ गए हैं , दाढ़ी बढ़ गयी है , जैसे की व्यक्ति कभी कभी दुर्लक्ष्य कर लेता है न ? जब मन में कोई द्वंद्व उछलता रहता है , तब वह उहापोह की स्थिति में पड़ जाता है ; न छोड़ते बनता है , न पकड़ते बनता है। नींद में भी बड़बड़ाने लगता है। पर यह उद्वेलित चित्त की अवस्था है। मन को तुरंत विवेक-वैराग्य समझने की जरूरत पड़ जाती हैं। जब आप किसी दुर्लभ वस्तु की खोज में जुट जाते हो , तब आपनेआप के ऊपर से ही ध्यान हट जाता है। कपड़े ठीक नहीं है , रहन -सहन ठीक नहीं है ; बिल्कुल पागलों जैसे दशा हो गयी थी। तो विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ के ३८ वें श्लोक में शिष्य की जैसी मनोदशा को देखा था न हमने - 

 दुर्वारसंसार दावाग्नि  तप्तं , दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः ।  

भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः, शरण्यमन्यद्यदहं न जाने ॥ ३६॥  

    मैं तप रहा हूँ , मैं सत्य को जानना चाहता हूँ , मैं इस बंधन से मुक्त होना चाहता हूँ। ऐसा सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति - उसका जीवन शुरू में ऐसा ही हो जाता है। वो फिर किसी भौतिक चीज या इन्द्रियभोग से वो तृप्त नहीं होता। वो सत्य को जानना चाहता है , इस प्रकार नरेन जो है , कलकत्ते के बड़े विद्वान् माने हुए लोगों के घरों में जा जाकर उनके दरवाजों पर दस्तक दे रहे हैं , उनसे पूछ रहे हैं कि महाशय क्या आपने ईश्वर को देखा है ? तो उनको कहीं से भी उत्तर नहीं मिलता। क्योंकि राजाराम मोहन से लेकर , ईश्वरचंद्र विद्यासागर या देवेन्द्रनाथ टैगोर , या आचार्य केशवसेन तात्कालीन सभी प्रसिद्द विद्वान् पुस्तकीय विद्या को जानते थे , किताबों को पढ़ पढ़ कर भाषण देते रहते थे। किताबों को रटने से क्या मिलने वाला है ? अंत में उनके कॉलेज के एक प्राध्यापक प्रो ० हेस्टी ने कहा भाई नरेन् दक्षिणेश्वर का जो मंदिर है न ; वहाँ पर एक पागल रहता है।दुनिया में ऐसा ही होता है -जो महापुरुष हैं , उनको तो हम पागल कहते हैं। और जो कामीनि-कांचन, नाम-यश , के पीछे पूरे पागल हैं, माटी -टाका का अर्थ नहीं समझने वाले ;अर्थात असली पैसा जमीन की खरीद-बिक्री में है - वैसे जमीन के दलालों को तो हम महात्मा मानते हैं। सब जगह देखिये उल्टा हो रहा है। मगरमच्छ को हमने ? लकड़ा समझ लिया है। जो सचमुच ही विद्वान् है यानि ब्रह्मविद या आत्मज्ञानी हैं -उनको तो हम पागल बोल देते हैं। और जो कुछ भी नहीं जानते उनको हम बहुत बड़ा विद्वान् बोल देते हैं।

      विवेक की उपयोगिता सर्वत्र आ जाती है। सर्वत्र हम एक चीज को दूसरा समझ रहे हैं। मगरमच्छ को हम लकड़ा समझ रहे हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस देव विख्यात थे - कि वे पागल हैं। क्योंकि उनको तो मुहुर्मुहुः समाधि होती थी। बिल्कुल उनका अद्भुत जीवन है -क्योंकि अधिकांश मनुष्य तो योग -समाधि के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। कहते थे एक ऐसा अद्भुत पगला है , जो हर समय मर कर फिर जी उठता है ! लेकिन एक व्यक्ति मिलते हैं - जो बोलते हैं यदि तुमको कवि कहाँ खो गया ? समझना है तो दक्षिणेश्वर जाओ। तो देखिये ये नरेन जो एक आदर्श शिष्य है , आदर्श गुरु के पास पहुँच जाता है। वे रामकृष्ण के पास आकर पहला प्रश्न यही करते हैं -महाशय आपने क्या ईश्वर को देखा है ? और तुरंत उत्तर आता है - हाँ बेटा , मैंने देखा है ! जैसे मैं तुमको देख रहा हूँ , उससे भी 1000 गुना अधिक स्पष्ट रूप से उसको मैंने देखा है ! "

      यह बड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। जिस प्रकार मैं तुम्हें देख रहा हूँ ! यानि तुम्हें मैं इन्द्रियों से देख रहा हूँ ! और वो जो सच्चिदानन्द वस्तु है , या परम् सत्य है -वो इन्द्रियों से दिखने वाली चीज नहीं है। उसकी जब अनुभूति होती है तो इससे भी  1000 गुना intense, तीव्र होती है। ' I am seeing Ishwar thousand times more Intense than I am seeing you !' मैं ईश्वर को तुमको जैसे देख रहा हूँ उससे भी हजार गुना अधिक तीव्रता से देख रहा हूँ! विवेक चूड़ामणि के मंगलाचरण एवं ब्रह्मनिष्ठा का महत्त्व ( श्लोक 1 एवं 2) में ठीक यही उत्तर है, जैसा  श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव का भी। इसलिए कहते हैं -  ॐ  !! वंदे  गुरु परंपराम् !! ॐ विवेकचूड़ामणि ग्रंथ की मंगलाचरण की पहली और दूसरी पंक्ति क्या है ? तम् अगोचरं! 

       "तमगोचरं सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं। 

 गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ १ ॥" 

    "तमगोचरम्" — यह शब्द दर्शाता है कि वह परमात्मा या गुरु सामान्य ज्ञानेंद्रियों द्वारा जानने योग्य नहीं हैं। "तम" का अर्थ है अंधकार या अज्ञान, और "गोचर" का अर्थ है जो ज्ञेय हो। अर्थात, वह परम तत्व ऐसा है जिसे इंद्रियों, मन या बुद्धि के माध्यम से जाना नहीं जा सकता। वह हमारे लौकिक अनुभवों की सीमा से परे है। इस संसार में जो कुछ भी हम देखते, सुनते, छूते, सूंघते या स्वाद लेते हैं, वह सब इंद्रियगोचर है, परंतु परमात्मा उन सबसे परे है। इसलिए वह "तमगोचर" — अज्ञेय है।  

     "सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरम्" यद्यपि वह अज्ञेय है, फिर भी वह वेदांत के सिद्धांतों के माध्यम से जाना जा सकता है। इसका अर्थ है कि वेदांत, विशेषतः उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता जैसे ग्रंथों द्वारा जिस परम ब्रह्म का निरूपण किया गया है, वही तत्व है जिसे गुरु के माध्यम से जाना जा सकता है। उपनिषदों में, महावाक्यों में बताया गया "सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म", "नेति नेति", "अहं ब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि" आदि महावाक्य उसी ब्रह्म की ओर संकेत करते हैं।  

      "गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं" — आदि शंकराचार्य यहाँ अपने गुरु गोविन्दपाद की स्तुति करते हैं, जो उस परमानन्द स्वरूप ब्रह्म के साक्षात् प्रतिनिधि हैं। "परमानन्द" का तात्पर्य उस आनन्द से है जो आत्मा के ज्ञान में स्थायी रूप से स्थित होता है, जो किसी बाह्य वस्तु पर निर्भर नहीं करता। गुरु न केवल उपदेशक हैं, बल्कि वे स्वयं उस परमानन्द के मूर्तिमान स्वरूप हैं। वे स्वयं ब्रह्मनिष्ठ होकर शिष्य को उस ज्ञान की ओर ले जाते हैं।

"प्रणतोऽस्म्यहम्" — इस वाक्य में श्रद्धा, समर्पण और विनम्रता की चरम अभिव्यक्ति है। आदि शंकराचार्य कहते हैं कि मैं उन गुरु को प्रणाम करता हूँ। यह प्रणाम केवल शारीरिक नहीं, बल्कि अंतरात्मा से किया गया आत्मसमर्पण है। गुरु के प्रति यह कृतज्ञता उस परंपरा का भी स्मरण कराती है, जिसके माध्यम से ब्रह्मविद्या जीवित रही है।  

    निष्कर्षतः, यह श्लोक न केवल एक असाधारण स्तुति है, बल्कि यह दर्शाता है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति में गुरु का क्या स्थान है। गुरु वही हैं जो शास्त्रों के गूढ़ अर्थ को जानते हैं और अपने अनुभव द्वारा शिष्य को भी उसी आत्मबोध में स्थित करते हैं। ऐसे सद्गुरु को प्रणाम कर शिष्य ज्ञान-मार्ग पर आगे बढ़ता है — यह वेदांत की परंपरा की मूल भावना है। 

इस प्रथम श्लोक को उन्होंने अपने गुरु भगवान गोविन्दपाद को समर्पित किया है। इस श्लोक के माध्यम से वे केवल अपने गुरु को प्रणाम नहीं करते, बल्कि उस परम सत्य के स्वरूप का भी वर्णन करते हैं, जिसे वेदांत शास्त्रों के मर्म के रूप में जाना जाता है।  

ब्रह्मनिष्ठा का महत्त्व:
श्लोक:-

जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता

 तस्माद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम् । 

आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थिति-

र्मुक्तिर्नो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते ॥ २ ॥

     'ब्रह्मनिष्ठा' अर्थात् ब्रह्म में दृढ़ स्थिति—आध्यात्मिक साधना की चरम अवस्था मानी जाती है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक आत्मा और ब्रह्म की एकता को केवल शास्त्रों और गुरुवाक्य से नहीं, अपितु प्रत्यक्ष अनुभव से जान लेता है और उसी में स्थिर हो जाता है। ऊपर दिए गए श्लोक में शंकराचार्यजी इस ब्रह्मनिष्ठा की प्राप्ति को अत्यंत दुर्लभ बताते हैं और इसकी ओर पहुँचने के क्रमिक सोपानों को दर्शाते हैं। 

    श्लोक के अनुसार सबसे पहले नरजन्म ही दुर्लभ है। 84 लाख योनियों में भटकने के बाद जब जीव को मानव शरीर प्राप्त होता है, तब वह धर्म, ज्ञान और मोक्ष की दिशा में अग्रसर हो सकता है। पशु, पक्षी, कीट-पतंगों में ऐसा विवेक या साधना संभव नहीं। इसलिए मनुष्य जन्म को एक अत्यंत दुर्लभ अवसर माना गया है।
       इसके पश्चात मनुष्य में भी पुंस्त्व अर्थात पुरुषत्व प्राप्त करना विशेष माना गया है, क्योंकि प्राचीन भारत में पुरुषों को वेदाध्ययन और तपस्या की अधिक सुविधा प्राप्त थी। इसके बाद आता है विप्रता अर्थात ब्राह्मणत्व। यहाँ ब्राह्मणत्व का आशय केवल जाति से नहीं, अपितु उस शुद्ध, सात्त्विक, धर्मनिष्ठ जीवनशैली से है जो वैदिक धर्म के पालन और आत्मकल्याण की ओर प्रवृत्त करती है। ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाने के बाद भी वैदिक धर्म में श्रद्धा और निष्ठा होना आवश्यक है। केवल जन्म से ब्राह्मण होना पर्याप्त नहीं, बल्कि शास्त्रों का पालन, यज्ञ, तप, जप, और स्वाध्याय में तत्परता आवश्यक है। फिर भी यह सब कुछ होना भी केवल प्रारंभिक योग्यता है। 

       अगला चरण है विद्वत्ता—शास्त्रों का गहरा ज्ञान, विवेकशील चिंतन और गुरुसेवा के द्वारा आत्मज्ञान की तैयारी। किन्तु श्लोक यह स्पष्ट करता है कि इतना सब कुछ भी हो जाए तो भी आत्मा और अनात्मा का विवेक, स्वानुभव, ब्रह्म में स्थित रहना और मोक्ष प्राप्त करना सहज नहीं है। यह तो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैः—असंख्य जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरूप ही संभव होता है। यहाँ शंकराचार्यजी हमें यह समझाते हैं कि ब्रह्मनिष्ठा केवल बाह्य आचरण से नहीं, अपितु गहन तपस्या, पूर्ण वैराग्य, गुरु की कृपा और भगवत्कृपा से ही प्राप्त होती है।
      ब्रह्मनिष्ठ साधक उस परम तत्त्व में स्थित हो जाता है जहाँ से कोई भ्रम नहीं रहता, कोई द्वैत नहीं रहता। वह जानता है कि "अहं ब्रह्मास्मि" — मैं ही ब्रह्म हूँ। इस स्थिति में वह न केवल संसार के दुःख-सुखों से परे हो जाता है, अपितु शुद्ध साक्षीभाव में स्थित होकर पूर्ण तृप्ति को प्राप्त करता है।
अतः यह स्पष्ट है कि ब्रह्मनिष्ठा की प्राप्ति एक अत्यंत दुर्लभ, किन्तु सर्वोत्तम उपलब्धि है। यह मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है, जिसके लिए हमें निरंतर साधना, आत्मविचार और गुरुसेवा में लगे रहना चाहिए। यही वास्तविक मोक्ष का द्वार है। 

       इसके बाद की बाकि कहानी आप विवेकानन्द चरित या श्रीरामकृष्ण लीला प्रसंग में पढ़ सकते हैं। यहाँ यह बतलाया गया कि कैसे एक योग्य शिष्य या आदर्श शिष्य -विवेकानन्द अपने आदर्श गुरु श्रीरामकृष्ण के पास आते हैं। सत्य को जानने के लिए उनकी व्याकुलता कितनी तीव्र थी ? आज हमारे अंदर नरेंद्र जितनी व्याकुलता भले ही न हों। लेकिन आदर्श शिष्य और आदर्श गुरु कैसा होता है इसे जान लेना चाहिए क्योंकि आप सभी, जीव के जीवन में कभी न कभी एक पड़ाव ऐसा आएगा -जब यह व्याकुलता उतपन्न होगी। आज नहीं , कल नहीं , 10 वर्षों के पश्चात , 50 वर्षों के पश्चात् , अगले जन्म में ! कभी न कभी ऐसी व्याकुलता आएगी , अभी इसको केवल सुनके रख लेना भी अच्छा है। अभी हमने भ्रान्ति निर्मूल करने में आदर्श गुरु और आदर्श शिष्य कैसे होते हैं ? अब इसके बाद बहुत सुंदर गुरु-शिष्य संवाद के माध्यम से Real Investigation ' शुरू होने वाला है। अभी तक वास्तविक अन्वेषण या Investigation, सत्य की खोज शुरू नहीं हुई है। ये सब सिर्फ प्राथमिक बातें हैं - Basics -बुनियादी बातें हैं। अब यहाँ से गुरु-शिष्य संवाद शुरू होगा। शिष्य कुछ गहन प्रश्न करेंगे , गुरु के सामने प्रश्न रखेंगे , और गुरु उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। वही पूरा विवेक-चूड़ामणि है। अब  Real Investigation शुरू होने वाला है। Penetrating Investigation ' शुरू होता है जो हमें बिल्कुल सत्य के दरवाजे तक लाके छोड़ देती है। ऐसी गहन परख मानो माँ अपने बच्चों का हाथ पकड़ कर ले जाती है न ? चल बेटा चल , ऐसे चल, तूँ गिर मत। माँ कितने प्यार से बच्चे की ऊँगली पकड़के ले जाती है। चल ! उसी प्रकार गुरु किसी शिष्य को हाथ पकड़कर ले जाते हैं। और सत्य के दरवाजे तक  छोड़ देते हैं। यह अगले सत्र में आने वाला है।   ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः !!

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रविवार, 17 अगस्त 2025

⚜️️⚜️️* उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥⚜️️⚜️️घटना - 327⚜️️⚜️️>> वानर सेना , हनुमान, सुग्रीव तथा कुम्भकरण के बीच घमासान युद्ध का दृश्य ⚜️️⚜️️Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #327 ||⚜️️⚜️️

श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]

[ घटना - 327 : दोहा -65,66,67 ]


>> वानर सेना , हनुमान, सुग्रीव तथा कुम्भकरण के बीच घमासान युद्ध का दृश्य  

           विभीषण से कुम्भकरण के युद्धभूमि में आने का समाचार ने वानरसेना को उत्तेजित कर दिया। दाँत किटकिटाते हुए वानरों ने शिलाखण्ड और वृक्ष उखाड़कर उसपर प्रहार करना शुरू कर दिया। पर इसका कोई प्रभाव होता न देख , हुनमान ने उसपर घूँसे जो प्रहार किया , तो कुम्भकरण धरती पर आ गिरा। उठकर उसने जो घूँसा मारा तो हनुमान धरती पर गिरे। फिर तो नील-नल समेत कई अन्य योद्धाओं को उसने धूल चटा दिया। वानरसेना को भागते देख उसने अंगद , सुग्रीव आदि को उसने अपने काँख में दबा लिया। पार्वती को युद्ध वर्णन सुनाते गए भगवान शिव कहते हैं - हनुमान संभल करके एकबार फिर उठे और सुग्रीव को खोजने लगे। सुग्रीव की मूर्छा भी टूटी और मृतक का स्वांग करके कुम्भकरण की काँख से निकल निकले। फिसल कर निकलते समय उन्होंने अपने दाँतो से कुम्भकरण के नाक -कान काट दिए। घोर गर्जन करते हुए सुग्रीव जैसे ही आकाश की ओर उड़े , कि कुम्भकरण ने उनके पैर पकड़ कर उन्हें धरती पर दे मारा। सुग्रीव सम्भल कर उठे। और कुम्भकरण पर फिर प्रहार किया। नाक -कान कट जाने का बोध होते ही , कुम्भकरण का मन क्रोध और ग्लानि से भर गया। कानों और नाक के बिना उसका अत्यंत भयकारी रूप देखकर वानरसेना आतंकित हो गयी। काल के समान बढ़ते आ रहे कुम्भकरण ने करोड़ों वानरों को अपना ग्रास बना लिया। और उतनी ही संख्या में उन्हें कुचल-मसल डाला। 

चौपाई :
* बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन॥
नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥1॥॥

भावार्थ:- भाई के वचन सुनकर विभीषण लौट गए और वहाँ आए, जहाँ त्रिलोकी के भूषण श्री रामजी थे। (विभीषण ने कहा-) हे नाथ! पर्वत के समान (विशाल) देह वाला रणधीर कुंभकर्ण आ रहा है॥1॥

* एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥2॥

भावार्थ:- वानरों ने जब कानों से इतना सुना, तब वे बलवान्‌ किलकिलाकर (हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत (उखाड़कर) उठा लिए और (क्रोध से) दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे॥2॥

* कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥
मुर्‌यो न मनु तनु टर्‌यो न टार्‌यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्‌यो॥3॥

भावार्थ:- रीछ-वानर एक-एक बार में ही करोड़ों पहाड़ों के शिखरों से उस पर प्रहार करते हैं, परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदार के फलों की मार से हाथी पर कुछ भी असर नहीं होता!॥3॥

* तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। परयो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥4॥

भावार्थ:- तब हनुमान्‌जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमान्‌जी को मारा। वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वी पर गिर पड़े॥4॥

* पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥
चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥5॥

भावार्थ:-फिर उसने नल-नील को पृथ्वी पर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओं को भी जहाँ-तहाँ पटककर डाल दिया। वानर सेना भाग चली। सब अत्यंत भयभीत हो गए, कोई सामने नहीं आता॥5॥

दोहा :
*अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव।
काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव॥65॥

भावार्थ:-सुग्रीव समेत अंगदादि वानरों को मूर्छित करके फिर वह अपरिमित बल की सीमा कुंभकर्ण वानरराज सुग्रीव को काँख में दाबकर चला॥65॥

चौपाई :
* उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥
भृकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥1॥

भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं, जैसे गरुड़ सर्पों के समूह में मिलकर खेलता हो। जो भौंह के इशारे मात्र से (बिना परिश्रम के) काल को भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है?॥1॥

* जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं॥
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥2॥

भावार्थ:-भगवान्‌ (इसके द्वारा) जगत्‌ को पवित्र करने वाली वह कीर्ति फैलाएँगे, जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागर से तर जाएँगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्‌जी जागे और फिर वे सुग्रीव को खोजने लगे॥2॥

* सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥3॥

भावार्थ:- सुग्रीव की भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे (मुर्दे से होकर) खिसक गए (काँख से नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्ण ने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्ण के नाक-कान दाँतों से काट लिए और फिर गरज कर आकाश की ओर चले, तब कुम्भकर्ण ने जाना॥3॥

* गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥
पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥4॥

भावार्थ:-उसने सुग्रीव का पैर पकड़कर उनको पृथ्वी पर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीव ने बड़ी फुर्ती से उठकर उसको मारा और तब बलवान्‌ सुग्रीव प्रभु के पास आए और बोले- कृपानिधान प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो॥4॥

* नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥5॥

भावार्थ:- नाक-कान काटे गए, ऐसा मन में जानकर बड़ी ग्लानि हुई और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव (आकृति) से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कान का होने से और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरों की सेना में भय उत्पन्न हो गया॥5॥
दोहा :

* जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥66॥

भावार्थ:-'रघुवंशमणि की जय हो, जय हो' ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उस पर पहाड़ और वृक्षों के समूह छोड़े॥66॥

चौपाई :
* कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥1॥

भावार्थ:-रण के उत्साह में कुंभकर्ण विरुद्ध होकर (उनके) सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरों को एक साथ पकड़कर खाने लगा! (वे उसके मुँह में इस तरह घुसने लगे) मानो पर्वत की गुफा में टिड्डियाँ समा रही हों॥1॥

* कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥
मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा॥2॥

भावार्थ:- करोड़ों (वानरों) को पकड़कर उसने शरीर से मसल डाला। करोड़ों को हाथों से मलकर पृथ्वी की धूल में मिला दिया। (पेट में गए हुए) भालू और वानरों के ठट्ट के ठट्ट उसके मुख, नाक और कानों की राह से निकल-निकलकर भाग रहे हैं॥2॥

* रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु ऐहि बिधि अर्पा॥
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥3॥

भावार्थ:-रण के मद में मत्त राक्षस कुंभकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाता ने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो और उसे वह ग्रास कर जाएगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाए भी नहीं लौटते। आँखों से उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारने से सुनते नहीं!॥3॥

* कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥
देखी राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥4॥

भावार्थ:- कुंभकर्ण ने वानर सेना को तितर-बितर कर दिया। यह सुनकर राक्षस सेना भी दौड़ी। श्री रामचंद्रजी ने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रु की नाना प्रकार की सेना आ गई है॥4॥

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https://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/LankaKand/19.htm 



 

    

              

⚜️️⚜️️* बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥5॥⚜️️⚜️️घटना - 326⚜️️⚜️️⚜️️⚜️️|| श्री रामचरितमानस गायन || भाग #326⚜️️⚜️️>>रावण-कुम्भकरण संवाद और विभीषण-कुम्भकरण मिलन का प्रसंग⚜️️⚜️️>

श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]
   
[ घटना - 326 : दोहा -62,63,64]

* कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥ 


 नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबाहा॥3॥

>>रावण-कुम्भकरण संवाद  और विभीषण-कुम्भकरण मिलन का प्रसंग 

          रावण के मुख से सीताहरण तथा युद्ध का वृत्तांत सुनकर कुम्भकरण अत्यंत दुःखी हो गया। वो रावण को धिक्कारता है , जो जगतजननी का अपहरण करके अब अपना कल्याण चाहता है ? अब भी अगर अपना अभिमान त्याग कर श्रीराम की शरण में आये तो उसका कल्याण हो सकता है। नारदमुनि से मिला ज्ञान वो रावण को दे देता है। किन्तु अब बहुत देर हो चुकी है , अतः वो भाई से गले मिलकर युद्ध में जाने को तैयार हो जाता है , जहाँ उसके समस्त पापों का हरण करने वाले कमलनयन श्रीराम के दर्शन होंगे। असंख्य घड़े मदिरापान और भैसों का भोजन करके वज्रगर्जना करता हुआ कुम्भकरण युद्धभूमि में आ पहुँचा। वहाँ विभीषण उसके पैरों पर गिर पड़ा और अपने अपमान और निष्कासन की कथा कह सुनाता है। कुम्भकरण ने छोटे भाई विभीषण का साधुवाद किया फिर बोला -'रावण पर काल सवार है ,अब भला वो सदुपदेश क्या सुनेगा ? धन्य है तूँ जो अपने सत्कर्म से राक्षस कुल का भूषण हो गया। किन्तु अब मैं भी काल के वश में हूँ , मुझे अब अपना-पराया कुछ नहीं सूझ रहा, अतः तूँ प्रभु के पास वापस लौट जा।  

दोहा :
* सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥62॥

भावार्थ:- तब रावण के वचन सुनकर कुंभकर्ण बिलखकर (दुःखी होकर) बोला- अरे मूर्ख! जगज्जननी जानकी को हर लाकर अब कल्याण चाहता है?॥62॥

चौपाई :
* भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥1॥

भावार्थ:- हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्यों जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्री रामजी को भजो तो कल्याण होगा॥1॥

* हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥2॥

भावार्थ:- हे रावण! जिनके हनुमान्‌ सरीखे सेवक हैं, वे श्री रघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया॥2॥

* कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबाहा॥3॥

भावार्थ:- हे स्वामी! तुमने उस परम देवता का विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता, पर अब तो समय जाता रहा॥3॥

* अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई॥
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥4॥

भावार्थ:-हे भाई! अब तो (अन्तिम बार) अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापों को छुड़ाने वाले श्याम शरीर, कमल नेत्र श्री रामजी के जाकर दर्शन करूँ॥4॥

दोहा :
* राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक।
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥63॥

भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के रूप और गुणों को स्मरण करके वह एक क्षण के लिए प्रेम में मग्न हो गया। फिर रावण से करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाए॥63॥

चौपाई :
* महिषखाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥1॥

भावार्थ:-भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्रघात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मद से चूर रण के उत्साह से पूर्ण कुंभकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली॥1॥

* देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥2॥

भावार्थ:-उसे देखकर विभीषण आगे आए और उसके चरणों पर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाई को उठाकर उसने हृदय से लगा लिया और श्री रघुनाथजी का भक्त जानकर वे उसके मन को प्रिय लगे॥2॥

* तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥3॥

भावार्थ:-(विभीषण ने कहा-) हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार करने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं श्री रघुनाथजी के पास चला आया। दीन देखकर प्रभु के मन को मैं (बहुत) प्रिय लगा॥3॥

* सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥
धन्य धन्य तैं धन्य विभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥4॥

भावार्थ:-(कुंभकर्ण ने कहा-) हे पुत्र! सुन, रावण तो काल के वश हो गया है (उसके सिर पर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षस कुल का भूषण हो गया॥4॥

* बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥5॥

भावार्थ:-हे भाई! तूने अपने कुल को दैदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुख के समुद्र श्री रामजी को भजा॥5॥

दोहा :
* बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥64॥

भावार्थ:-मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्री रामजी का भजन करना। हे भाई! मैं काल (मृत्यु) के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता, इसलिए अब तुम जाओ॥64॥

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