इस ब्लॉग में व्यक्त कोई भी विचार किसी व्यक्ति विशेष के दिमाग में उठने वाले विचारों का बहिर्प्रवाह नहीं है! इस ब्लॉग में अभिव्यक्त प्रत्येक विचार स्वामी विवेकानन्द जी से उधार लिया गया है ! ब्लॉग में वर्णित विचारों को '' एप्लाइड विवेकानन्दा इन दी नेशनल कान्टेक्स्ट" कहा जा सकता है। एवं उनके शक्तिदायी विचारों को यहाँ उद्धृत करने का उद्देश्य- स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करने के लिए युवाओं को 'अनुप्राणित' करना है।
श्रीराम से कुटुम्बियों और अयोध्या- वासियों के मिलन का अद्भुत दृश्य
अयोध्या में चौदह वर्षों की लम्बी अवधि के बाद कुटुम्बियों तथा अयोध्या- वासियों से श्रीराम के मिलन का अद्भुत दृश्य उपस्थित है। माता कौशल्या एक टक पुत्र को निहार रही हैं। मन में गर्व युक्त सहज उतकण्ठा घुमड़ रही है कि उनके इस कोमल तन पुत्र ने किस प्रकार रावण तथा अन्य भीमकाय राक्षसों को मारा होगा ? श्रीराम , लक्ष्मण और सीता को संग लेकर जब उपस्थित जनसमुदाय महलों की ओर चला तो आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। तोरण द्वारों और वंदनवारों से सजी अयोध्या नगरी में सर्वत्र मंगल छा गया।
कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं॥2॥
भावार्थ:-सब माताएँ श्री रघुनाथजी का कमल सा मुखड़ा देख रही हैं। (नेत्रों से प्रेम के आँसू उमड़े आते हैं, परंतु) मंगल का समय जानकर वे आँसुओं के जल को नेत्रों में ही रोक रखती हैं। सोने के थाल से आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभु के श्री अंगों की ओर देखती हैं॥2॥
भावार्थ:-अनेकों प्रकार से निछावरें करती हैं और हृदय में परमानंद तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपा के समुद्र और रणधीर श्री रघुवीर को देख रही हैं॥3॥
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥4॥
भावार्थ:-वे बार-बार हृदय में विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावण को कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो ब़ड़े भारी योद्धा और महान् बली थे॥4॥
दोहा :
* लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु॥7॥
भावार्थ:-लक्ष्मणजी और सीताजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी को माता देख रही हैं। उनका मन परमानंद में मग्न है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है॥7॥
चौपाई :
* लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥1॥
भावार्थ:-लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमान्जी आदि सभी उत्तम स्वभाव वाले वीर वानरों ने मनुष्यों के मनोहर शरीर धारण कर लिए॥1॥
* भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥2॥
भावार्थ:-वे सब भरतजी के प्रेम, सुंदर, स्वभाव (त्याग के) व्रत और नियमों की अत्यंत प्रेम से आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं और नगर वासियों की (प्रेम, शील और विनय से पूर्ण) रीति देखकर वे सब प्रभु के चरणों में उनके प्रेम की सराहना कर रहे हैं॥2॥
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥3॥
भावार्थ:-फिर श्री रघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि के चरणों में लगो। ये गुरु वशिष्ठजी हमारे कुलभर के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गए हैं॥3॥
* ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥4॥
भावार्थ:-(फिर गुरुजी से कहा-) हे मुनि! सुनिए। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्राम रूपी समुद्र में मेरे लिए बेड़े (जहाज) के समान हुए। मेरे हित के लिए इन्होंने अपने जन्म तक हार दिए (अपने प्राणों तक को होम दिया) ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं॥4॥
भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर सब प्रेम और आनंद में मग्न हो गए। इस प्रकार पल-पल में उन्हें नए-नए सुख उत्पन्न हो रहे हैं॥5॥
दोहा :
* कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥8 क॥
भावार्थ:-फिर उन लोगों ने कौसल्याजी के चरणों में मस्तक नवाए। कौसल्याजी ने हर्षित होकर आशीषें दीं (और कहा-) तुम मुझे रघुनाथ के समान प्यारे हो॥8 (क)॥
*सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद॥8 ख॥
भावार्थ:-आनन्दकन्द श्री रामजी अपने महल को चले, आकाश फूलों की वृष्टि से छा गया। नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं॥8 (ख)॥
भावार्थ:-सोने के कलशों को विचित्र रीति से (मणि-रत्नादि से) अलंकृत कर और सजाकर सब लोगों ने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया। सब लोगों ने मंगल के लिए बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगाईं॥1॥
नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥2॥
भावार्थ:-सारी गलियाँ सुगंधित द्रवों से सिंचाई गईं। गजमुक्ताओं से रचकर बहुत सी चौकें पुराई गईं। अनेकों प्रकार के सुंदर मंगल साज सजाए गए और हर्षपूर्वक नगर में बहुत से डंके बजने लगे॥2॥
भावार्थ:-स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं और हृदय में हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत सी युवती (सौभाग्यवती) स्त्रियाँ सोने के थालों में अनेकों प्रकार की आरती सजाकर मंगलगान कर रही हैं॥3॥
भावार्थ:-वे आर्तिहर (दुःखों को हरने वाले) और सूर्यकुल रूपी कमलवन को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य श्री रामजी की आरती कर रही हैं। नगर की शोभा, संपत्ति और कल्याण का वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं-॥4॥
* तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥5॥
भावार्थ:-परंतु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं)। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणों को कैसे कह सकते हैं॥5॥
विमान से उतर कर श्रीराम ने गुरु अन्य मुनियों तथा पूजनीय व्यक्तियों के चरणों में शीश नवा कर, उनका आशीष पाया। भरत आकर अग्रज के चरणों से लग गए। दोनों भाइयों की आँखों से आँसुओं की धार बाह चली। श्रीराम भरत से बार बार कुशलक्षेम पूछते हैं। किन्तु भरत की वाणी जैसे मौन हो गयी है। सभी भाई एकदूसरे से गले मिल रहे हैं। उधर से मातायें इस प्रकार दौड़ी आ रही हैं , जैसे नवजात बछड़ों से दिन भर की बिछुड़ी गउएँ हुंकारती थनों से दूध की बुँदे टपकाती दौड़ती चली आ रही हैं। नगर निवासियों की मिलने की उत्कंठा देख श्रीराम ने एक ही समय में अनेक शरीर धारण कर सबको कृत्य-कृत्य कर दिया।
भावार्थ:-भरतजी के साथ सब लोग आए। श्री रघुवीर के वियोग से सबके शरीर दुबले हो रहे हैं। प्रभु ने वामदेव, वशिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठों को देखा, तो उन्होंने धनुष-बाण पृथ्वी पर रखकर-॥1॥
* धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥
भावार्थ:-छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित दौड़कर गुरुजी के चरणकमल पकड़ लिए, उनके रोम-रोम अत्यंत पुलकित हो रहे हैं। मुनिराज वशिष्ठजी ने (उठाकर) उन्हें गले लगाकर कुशल पूछी। (प्रभु ने कहा-) आप ही की दया में हमारी कुशल है॥2॥
* सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा॥
भावार्थ:-धर्म की धुरी धारण करने वाले रघुकुल के स्वामी श्री रामजी ने सब ब्राह्मणों से मिलकर उन्हें मस्तक नवाया। फिर भरतजी ने प्रभु के वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शंकरजी और ब्रह्माजी (भी) नमस्कार करते हैं॥3॥
भावार्थ:-भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाए उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्री रामजी ने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। (उनके) साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गए। नवीन कमल के समान नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं के) जल की बाढ़ आ गई॥4॥
छंद :
*राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी।
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥1॥
भावार्थ:-कमल के समान नेत्रों से जल बह रहा है। सुंदर शरीर में पुलकावली (अत्यंत) शोभा दे रही है। त्रिलोकी के स्वामी प्रभु श्री रामजी छोटे भाई भरतजी को अत्यंत प्रेम से हृदय से लगाकर मिले। भाई से मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं, उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। मानो प्रेम और श्रृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभा को प्राप्त हुए॥1॥
* बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई॥
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥2॥
भावार्थ:-कृपानिधान श्री रामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं, परंतु आनंदवश भरतजी के मुख से वचन शीघ्र नहीं निकलते। (शिवजी ने कहा-) हे पार्वती! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजी को मिल रहा था) वचन और मन से परे है, उसे वही जानता है जो उसे पाता है। (भरतजी ने कहा-) हे कोसलनाथ! आपने आर्त्त (दुःखी) जानकर दास को दर्शन दिए, इससे अब कुशल है। विरह समुद्र में डूबते हुए मुझको कृपानिधान ने हाथ पकड़कर बचा लिया!॥2॥
दोहा :
* पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥5॥
भावार्थ:-फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्नजी को हृदय से लगाकर उनसे मिले। तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेम से मिले॥।5॥
भावार्थ:-फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजी से गले लगकर मिले और इस प्रकार विरह से उत्पन्न दुःसह दुःख का नाश किया। फिर भाई शत्रुघ्नजी सहित भरतजी ने सीताजी के चरणों में सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया॥1॥
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥2॥
भावार्थ:-प्रभु को देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोग से उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गए। सब लोगों को प्रेम विह्नल (और मिलने के लिए अत्यंत आतुर) देखकर खर के शत्रु कृपालु श्री रामजी ने एक चमत्कार किया॥2॥
* अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला॥
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी॥3॥
भावार्थ:-उसी समय कृपालु श्री रामजी असंख्य रूपों में प्रकट हो गए और सबसे (एक ही साथ) यथायोग्य मिले। श्री रघुवीर ने कृपा की दृष्टि से देखकर सब नर-नारियों को शोक से रहित कर दिया॥3॥
* छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥
भावार्थ:-कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानों नई ब्यायी हुई गायें अपने बछड़ों को देखकर दौड़ी हों॥5॥
छंद :
* जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं।
दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं॥
अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।
गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥
भावार्थ:-मानो नई ब्यायी हुई गायें अपने छोटे बछड़ों को घर पर छोड़ परवश होकर वन में चरने गई हों और दिन का अंत होने पर (बछड़ों से मिलने के लिए) हुँकार करके थन से दूध गिराती हुईं नगर की ओर दौड़ी हों। प्रभु ने अत्यंत प्रेम से सब माताओं से मिलकर उनसे बहुत प्रकार के कोमल वचन कहे। वियोग से उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गई और सबने (भगवान् से मिलकर और उनके वचन सुनकर) अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किए।
दोहा :
*भेंटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि।
रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि॥6 क॥
भावार्थ:-सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजी की श्री रामजी के चरणों में प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्री रामजी से मिलते समय कैकेयीजी हृदय में बहुत सकुचाईं॥6 (क)॥
* लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।
कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥6 ख॥
भावार्थ:-लक्ष्मणजी भी सब माताओं से मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयीजी से बार-बार मिले, परंतु उनके मन का क्षोभ (रोष) नहीं जाता॥6 (ख)॥
कुलगुरु वशिष्ठ, कुटुम्बियों और ब्राह्मणों के साथ श्रीराम की अगुवाई करने के लिए भरत के प्रस्थान का वर्णन।
हनुमान के विदा हो जाने के बाद हर्षित भरत ने कुलगुरु को ये समाचार सुनाया कि श्रीराम नगर में पहुँचने वाले हैं। राजमहल से ये सन्देश तत्काल पूरी नगरी में फैल गया। चारों ओर कौशलपति के अगवानी की तैयारियाँ होने लगीं। दूब -दही आदि माँगलिक वस्तुएँ थाल में सजाकर नारियाँ श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की आरती को निकल पड़ीं। कुलगुरु वसिष्ठ म भाई शत्रुघ्न अन्य कुटुम्बियों तथा ब्राह्मणों को साथ लेकर , भरत जी श्रीराम की अगवानी के लिए निकल पड़ते हैं। सबकी आँखे आकाश की ओर लगी हैं, जहाँ किसी भी क्षण पुष्पक दिखाई देगा ! उधर पुष्पक में बैठे श्रीराम अपने सहयोगियों को पवित्र नगरी अयोध्या की महिमा सुना रहे हैं। वो अयोध्या जो उनकी जन्मभूमि है , जो उन्हें वैकुण्ठ से भी अधिक प्रिय है। इस सुन्दर नगरी के उत्तर में सरयू की पवित्र धारा बहती है। जिसके निर्मल जल में स्नान करने मात्र से , प्राणी मोक्ष प्राप्त कर लेता है। प्रभु का संकेत पाकर पुष्पक विमान अयोध्या नगरी के समीप उतर गया। लंका से अयोध्या तक की यात्रा पूरी हो गयी। श्रीराम ने जब विमान को अपने स्वामी कुबेर के पास लौट जाने को कहा ; तो एक बार उस जड़ पदार्थ को भी विषाद की अनुभूति होती है। अपने स्वामी के पास लौट जाने का हर्ष भी, श्रीराम से बिछुड़ जाने की उदासी को नहीं छिपा सका -
चौपाई :
* हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए॥
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥1॥
भावार्थ:-इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरी में आए और उन्होंने गुरुजी को सब समाचार सुनाया! फिर राजमहल में खबर जनाई कि श्री रघुनाथजी कुशलपूर्वक नगर को आ रहे हैं॥1॥
भावार्थ:-खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरतजी ने प्रभु की कुशल कहकर सबको समझाया। नगर निवासियों ने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े॥2॥
* दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला॥
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधुरगामिनी॥3॥
भावार्थ:-(श्री रामजी के स्वागत के लिए) दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मंगल के मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोने की थाली में भर-भरकर हथिनी की सी चाल वाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ (उन्हें लेकर) गाती हुई चलीं॥3॥
* जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥4॥
भावार्थ:-जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशा में हैं) वे वैसे ही (वहीं से उसी दशा में) उठ दौड़ते हैं। (देर हो जाने के डर से) बालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाते। एक-दूसरे से पूछते हैं- भाई! तुमने दयालु श्री रघुनाथजी को देखा है?॥4॥
* अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी॥
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा॥5॥
भावार्थ:-प्रभु को आते जानकर अवधपुरी संपूर्ण शोभाओं की खान हो गई। तीनों प्रकार की सुंदर वायु बहने लगी। सरयूजी अति निर्मल जल वाली हो गईं। (अर्थात् सरयूजी का जल अत्यंत निर्मल हो गया)॥5॥
दोहा :
* हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥3 क॥
भावार्थ:-गुरु वशिष्ठजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणों के समूह के साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यंत प्रेमपूर्ण मन से कृपाधाम श्री रामजी के सामने अर्थात् उनकी अगवानी के लिए चले॥3 (क)॥
* बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान॥3 ख॥
भावार्थ:-बहुत सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़ीं आकाश में विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वर से सुंदर मंगल गीत गा रही हैं॥3 (ख)॥
* राका ससि रघुपति पुर, सिंधु देखि हरषान।
बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥3 ग॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी पूर्णिमा के चंद्रमा हैं तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचंद्र को देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है (इधर-उधर दौड़ती हुई) स्त्रियाँ उसकी तरंगों के समान लगती हैं॥3 (ग)॥
चौपाई :
* इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥1॥
भावार्थ:-यहाँ (विमान पर से) सूर्य कुल रूपी कमल को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य श्री रामजी वानरों को मनोहर नगर दिखला रहे हैं। (वे कहते हैं-) हे सुग्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुंदर है॥1॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥
भावार्थ:-यद्यपि सबने वैकुण्ठ की बड़ाई की है- यह वेद-पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, परंतु अवधपुरी के समान मुझे वह भी प्रिय नहीं है। यह बात (भेद) कई-कोई (बिरले ही) जानते हैं॥2॥
* जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥3॥
भावार्थ:-यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में जीवों को पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं॥3॥
* अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥4॥
भावार्थ:-यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि और मेरे परमधाम को देने वाली है। प्रभु की वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए (और कहने लगे कि) जिस अवध की स्वयं श्री रामजी ने बड़ाई की, वह (अवश्य ही) धन्य है॥4॥
दोहा :
* आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान॥4 क॥
भावार्थ:-कृपा सागर भगवान् श्री रामचंद्रजी ने सब लोगों को आते देखा, तो प्रभु ने विमान को नगर के समीप उतरने की प्रेरणा की। तब वह पृथ्वी पर उतरा॥4 (क)॥
* उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु॥4 ख॥
भावार्थ:-विमान से उतरकर प्रभु ने पुष्पक विमान से कहा कि तुम अब कुबेर के पास जाओ। श्री रामचंद्रजी की प्रेरणा से वह चला, उसे (अपने स्वामी के पास जाने का) हर्ष है और प्रभु श्री रामचंद्रजी से अलग होने का अत्यंत दुःख भी॥4 (ख)॥
ब्रह्मचारी वेश में हनुमान का आगमन और भरत को श्रीराम का शुभ समाचार देकर वापस जाने का प्रसंग :
14 वर्षों की दीर्घ अवधि समाप्त हो चुकी है ! भरत का कृषकाय शरीर सिर पर जटायें , और नेत्रों में उमड़ते प्रेम के आँसू, एक दीर्घ प्रतीक्षा और भ्रातृ विरह में डूबते ह्रदय की कहानी कह रहे हैं। तभी ब्रह्मचारी वेश में श्रीराम का नाम स्मरण करते हुए हनुमान का आगमन होता है। जिनके वियोग में आप दिन-रात घुलते रहे हैं , जिनका गुणगान करते आप थकते नहीं हैं , वे रघुकुल शिरोमणि लौट आये हैं। ये वचन सुनकर भरत के शरीर में जैसे नवजीवन का संचार हो गया। जिज्ञासा प्रकट की, हे तात ! ऐसा शुभ समाचार देने वाले आप कौन हैं ? हनुमान ने अपना परिचय दिया। भरत को मानो राम ही मिल गए ! उन्होंने हनुमान को अंक में भर लिया। ऐसा शुभ सन्देश लाने वाले को क्या कुछ दे दें ? समझ नहीं पाते। हनुमान उनके चरणों में आ गिरे। ऐसे पवित्र और विनय वचन भरत के समर्पण और सद्गुणों की कहानी कहते हैं। 14 वर्षों की गाथा सुनाकर और अयोध्या का समाचार लेकर, हनुमान वापस चल पड़े -
दोहा :
* राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥1क॥
भावार्थ:-श्री रामजी के विरह समुद्र में भरतजी का मन डूब रहा था, उसी समय पवनपुत्र हनुमान्जी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गए, मानो (उन्हें डूबने से बचाने के लिए) नाव आ गई हो॥1 (क)॥
* बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात॥
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥1ख॥
भावार्थ:-हनुमान्जी ने दुर्बल शरीर भरतजी को जटाओं का मुकुट बनाए, राम! राम! रघुपति! जपते और कमल के समान नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं) का जल बहाते कुश के आसन पर बैठे देखा॥1 (ख)॥
चौपाई :
* देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ॥
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी॥1॥
भावार्थ:-उन्हें देखते ही हनुमान्जी अत्यंत हर्षित हुए। उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बरसने लगा। मन में बहुत प्रकार से सुख मानकर वे कानों के लिए अमृत के समान वाणी बोले-॥1॥
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥2॥
भावार्थ:-जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुण समूहों की पंक्तियों को आप निरंतर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक, सज्जनों को दुःख देने वाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक श्री रामजी सकुशल आ गए॥2॥
भावार्थ:-शत्रु को रण में जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु आ रहे हैं, देवता उनका सुंदर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही (भरतजी को) सारे दुःख भूल गए।जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास के दुःख को भूल जाए॥3॥
* को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥4॥
भावार्थ:-(भरतजी ने पूछा-) हे तात! तुम कौन हो? और कहाँ से आए हो? (जो) तुमने मुझको (ये) परम प्रिय (अत्यंत आनंद देने वाले) वचन सुनाए। (हनुमान्जी ने कहा) हे कृपानिधान! सुनिए, मैं पवन का पुत्र और जाति का वानर हूँ, मेरा नाम हनुमान् है॥4॥
* दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवतजल पुलकित गाता॥5॥
भावार्थ:-मैं दीनों के बंधु श्री रघुनाथजी का दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्जी से गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता। नेत्रों से (आनंद और प्रेम के आँसुओं का) जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया॥5॥
बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुन भ्राता॥6॥
भावार्थ:-(भरतजी ने कहा-) हे हनुमान्- तुम्हारे दर्शन से मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गए (दुःखों का अंत हो गया)। (तुम्हारे रूप में) आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गए। भरतजी ने बार-बार कुशल पूछी (और कहा-) हे भाई! सुनो, (इस शुभ संवाद के बदले में) तुम्हें क्या दूँ?॥6॥
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥7॥
भावार्थ:-इस संदेश के समान (इसके बदले में देने लायक पदार्थ) जगत् में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। (इसलिए) हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभु का चरित्र (हाल) सुनाओ॥7॥
* तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥8॥
भावार्थ:-तब हनुमान्जी ने भरतजी के चरणों में मस्तक नवाकर श्री रघुनाथजी की सारी गुणगाथा कही। (भरतजी ने पूछा-) हे हनुमान्! कहो, कृपालु स्वामी श्री रामचंद्रजी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं?॥8॥
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो॥
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
भावार्थ:-रघुवंश के भूषण श्री रामजी क्या कभी अपने दास की भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजी के अत्यंत नम्र वचन सुनकर हनुमान्जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणों पर गिर पड़े (और मन में विचारने लगे कि) जो चराचर के स्वामी हैं, वे श्री रघुवीर अपने श्रीमुख से जिनके गुणसमूहों का वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों?
दोहा :
* राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात॥2 क॥
भावार्थ:-(हनुमान्जी ने कहा-) हे नाथ! आप श्री रामजी को प्राणों के समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हृदय में हर्ष समाता नहीं है॥2 (क)॥
सोरठा :
* भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं।
कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥2 ख॥
भावार्थ:-फिर भरतजी के चरणों में सिर नवाकर हनुमान्जी तुरंत ही श्री रामजी के पास (लौट) गए और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमान पर चढ़कर चले॥2 (ख)॥
विगत सत्र में हमने देखा कि बाह्य जगत में स्थूल स्तर पर हमें जो भी दिखाई देता है, अगर हम उसकी खोज करें, उसके भीतर प्रवेश करें , तो दूसरा ही कुछ प्रकट हो जाता है। ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। बाहर स्थूल दृष्टि से देखो तो हमको पुरुष दिखाई देता है ,स्त्री दिखाई देती है। (२:१०) लेकिन अगर हम भीतर प्रवेश करें , तो पुरुष भी नहीं है, स्त्री भी नहीं है , एक प्रभु परमेश्वर की परमेश शक्ति ही है। ये हमको विवेक-दृष्टि मिलने के बाद दिखाई देता है।
अब देखिये ये "मैं" और "मेरा" ही बन्धन है। यह मैं और मेरा ,"I" and "Mine"अब इस "I"का मतलब हमने आज क्या लगा लिया है ? बस ये स्थूल शरीर ! है न ? मैं मतलब हम स्थूल शरीर ही समझते हैं। और जन्म के साथ ही एक नाम भी हमको दे दिया गया है। जैसे दुकान में वस्तुओं पर 'tag' (लेबल) लगा होता है। यदि कपड़ा लेने जाओ तो उस पर एक लेबल लगा रहता है। वैसे ही हमारा नाम भी सिर्फ एक tag मात्र है , लेकिन ये हमको और भी भ्रमित कर देता है। सबके साथ एक-एक टैग लगा हुआ है। इस वस्तु का एक टैग है - BJK, ये एक वस्तु मात्र है ; बड़ा विचित्र है। ये एक Bubble मात्र है। अब इस 'मैं' को जब हम खोजना शुरू करते हैं , तो खोजते -खोजते देखते हैं कि अब 'मैं' है ही नहीं ईश्वर ही हैं। हमलोग 'मैं ' का मतलब निर्धारित करने निकले थे। तो इस मैं के खोज का परिणाम क्या निकला ? मैं नाम की कोई चीज है ही नहीं। ईश्वर ही है। (3:43) तो इसी प्रकार अब देखा जाय कि 'मेरा' का क्या मतलब हुआ ? आप उन सभी चीजों को, उन सभी व्यक्तियों को "मेरा" शब्द से सम्बोधित कर रहे हैं, उस "मेरा" का मतलब क्या है ? -जरा पता लगाइये। तो "मेरा" कुछ मिलेगा ? अपने स्थूल श्रोर की दृष्टि से हम अपने को 'मैं' मानते है और उससे जुड़े संबंधों को 'मेरा' कहते हैं। आप जिस व्यक्ति को कहते हैं - ये 'मेरी' पत्नी है। ये 'मेरा' पति है ? उस "मेरा" शब्द के तह तक जाओगे तो क्या मिलेगा आपको ? ईश्वर ही दिखाई देगा।तो ये "मैं "और "मेरा" दोनों भी क्या है ? महा अद्भुतं , अनिर्वचनीयं ! है कि नहीं ? आप किस चीज को "मेरा" कह रहे हो ? आप जिस चीज को "मेरा" कह रहे हो, उसके तह तक आप जाइये तो वहां वह वस्तु ही नहीं है। तो क्या है ? ईश्वर है ! -है कि नहीं ? मानलीजिए कोई पत्नी -पति को कहती है कि ये मेरा पति है। अब पति को खोजिये ? कहाँ है पति ? 'पति' नामक जीव को खोजेंगे, तो पहले आपको दिखाई देगा कि स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर है, कारण शरीर है - पति कोई है ही नहीं। वहाँ ईश्वर ही हैं। तो देखिये मैं का मतलब हुआ ईश्वर , वैसे ही मेरा का मतलब भी हुआ ईश्वर। मैं और मेरा है ही नहीं, ईश्वर ही हैं। तो यह जो "मैं " और "मेरा" की ग्रंथि (भ्रम) है -यहीं पर हम बंधे हुए हैं।जब तक विवेक-दृष्टि से "मैं" और "मेरा" का अर्थ निर्धारित नहीं हुआ है, तब तक तो हमको यही लगता है कि "मैं " माने यही BJK , और "मेरा " का तो पता नहीं कितने हैं ? हम वस्तुओं से और व्यक्तियों से, इस प्रकार "मैं" और "मेरा" का सम्बन्ध बना लेते हैं। और फिर पूरी तरह से मैं -मेरा से मोहग्रस्त होकर ये जो 'मैं' और 'मेरा' ही वो दायरा है जिसके बीच हम पिसते रहते हैं ,पिसते रहते हैं। पीस कर बिल्कुल खत्म हो जाते हैं।सच्चाई ये है कि यहाँ पर न तो "मैं" है , न "मेरा" है। ईश्वर ही है।(6:03) हैकि नहीं ? क्या अद्भुत दर्शन है ! इसीलिए "मैं" और "मेरा" रूपी मोह इस शरीर से जुड़ा हुआ है। इसीलिए इस स्थूल शरीर को विवेक-चूड़ामणि के 74,75,76 वें श्लोकमें स्थूल शरीर एवं भोग विषयों को मोहास्पद #कहा गया है- लेकिन खोजो तो आपको "मैं" भी नहीं मिलेगा, "मेरा" भी नहीं मिलेगा। ईश्वर ही मिलेगा।
>>राग और प्रेम का अन्तर: अब ये "मैं" और "मेरा" समस्त प्रकार की आसक्ति का रूप ले लेता है। राग का रूप ले लेता है। मैं पति हूँ , ये मेरी पत्नी है। यह प्रेम नहीं है - प्रेम जैसा दीखता है। ये सिर्फ राग है , एक शारीरिक आकर्षण है। क्योंकि यह सीमित है , प्रेम सीमाहीन है। जो सीमित होगा वह राग ही होगा। और वो शरीर केंद्रित होगा। क्योंकि अभी तक तो आपने मैं का सच्चा अर्थ निर्धारित नहीं किया था ? मैं को अपना स्थूल शरीर ही मानते हो , और दूसरे बुलबुले को शरीर की दृष्टि से स्त्री कहते हैं , उसको पत्नी कहते हो। इसमें से राग ही निकलेगा इस प्रकार से पति-पत्नी दोनों बंध जाते हैं। दोनों बुलबुले जैसे कि आसक्ति की बेड़ियों में जकड़ जाते हैं। यही 'मैं' और 'मेरा ' ही मोह का बंधन है, भयानक बंधन है। तो ये है 'मैं' 'मेरा' का स्वरुप-अगर ढूँढ़ो तो वो है ही नहीं। और अगर नहीं ढूँढ़ो तो वह राग हमें पीस कर रख देती है। जब तक हम "मैं " और "मेरा" क्या है ? इसके निष्कर्ष पर पहुँचने की खोज नहीं करते , तब तक वो हमें पिस कर रख देती है। पीसते रहती है , खोजो तो है ही नहीं ! मैं भी नहीं मेरा भी नहीं है। ईश्वर ही है।
इसलिए भक्ति की भाषा में 'मैं' और 'मेरा' को क्या कहते हैं ? (7:49) हे प्रभु यहाँ कुछ भी मैं नहीं , और मेरा भी नहीं , सबकुछ 'तूँ' और 'तेरा' है। देखिये विवेक-दृष्टि होने पर भक्ति भी आ गयी ! मैं'- मेरा' नहीं प्रभु यह सब कुछ 'तूँ' और 'तेरा' ही है, एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। लेकिन 'मैं' और 'मेरा' ही आसक्ति का रूप ले लेती है। हम चिपक जाते हैं , व्यक्तियों से चिपक जाते हैं और वस्तुओं से चिपक जाते हैं। हम सभी लोग तो आसक्ति -ग्रस्त हैं , राग ग्रस्त हैं। राग रूपी अदृश्य रस्सी से हम वस्तुओं के साथ और व्यक्तियों के साथ बंधे हुए हैं। छूटता नहीं है , क्योंकि हम छोड़ना नहीं चाहते हैं। जैसे ही किसी वस्तु या व्यक्ति पर मेरा भाव आ जाता है, उस सबको पकड़ कर रखना चाहते हैं। उस मोह जन्य आसक्ति के बारे में अंग्रेजी में कहते हैं - "That's terrible , instinctual, sense of possessiveness ! यह तो शासन करने की, पाने या हावी होने की जन्मजात भयानकभावना है! We want to possess the other person, is it not ? हम दूसरे व्यक्ति पर अधिकार रखना चाहते हैं, है न?You see in society, in our day to day life , you see to persons who are coming to-gather . आप समाज में, हमारे दैनन्दिन जीवन में, ऐसे लोगों को-स्त्री और पुरुष को देखते हैं जो एक गँठजोड़ में बँधते हैं हैं। But they want to possess each other ! लेकिन वे एक दूसरे पर अधिकार जमाना चाहते हैं ! We don't want to leave the other, we don't want to give any freedom to the other . हम दूसरे को, अपने अधिकार में आये हुए व्यक्ति या वस्तु को छोड़ना नहीं चाहते, हम दूसरे को कोई स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। यह जितना भी स्त्री-पुरुष सम्बन्ध में वे एक दूसरे कब्जा करना चाहते हैं। लेकिन यह प्रेम नहीं है। Love and freedom go hand in hand ! प्रेम में स्वाधीनता होती है ; प्रेम और स्वतंत्रता साथ-साथ चलते हैं ! In attachment it's pure blind possessiveness ! आप दूसरे को पाना चाहते हो , छोड़ना नहीं चाहते। आप दूसरे को कोई आजादी भी नहीं देना चाहते। आप चाहते हो कि आपका पति, पत्नी , भाई , बहन , मित्र आपके अनुसार उठे, बैठे, चले-फिरे। यहाँ स्थूल शरीर आधारित सम्बन्ध में ऐसा ही होता है। आप चाहते कि सब आपके हिसाब से उठे-बैठे चले फिरे। ये प्रेम नहीं है, पत्नी-पति में परस्पर - गुलाम बनाने और समझने की भावना है। प्रेम में अधिकार जमाने की भावना नहीं होती। क्योंकि प्रेम में 'मैं' और 'मेरा' का विचार ही नहीं होता , सबकुछ 'तुम' और 'तुम्हारा' है , सबकुछ ईश्वर है , ईश्वर का है न ? तो आप यहाँ की-जगत की किस वस्तु को पकड़ कर रख पाओगे ? तो देखोगे आसक्ति में हम दूसरे को possess करना चाहते हैं ,अधिकार में रखना चाहते हैं। परिवारों में हम देखते हैं न , यह मेरा- मेरा का विचार कितना भयंकर रूप धारण कर लेता है ? ये हमें बिल्कुल शरीर भाव में गिरा देती है , हम मेरा है, मेरा है करके भेंड़ बन जाते हैं। मेरा नाम का तो यहाँ कुछ नहीं है। आप किसी बुलबुले को कहोगे ये मेरा है , तो इससे बड़ी मूर्खता क्या होगी ? वो बुलबुला तो वैसे ही फूटने वाला है। इस सृष्टि में कुछ भी मेरा नहीं हो सकता। लेकिन यह समझ में कितने लोगों को आता है ?
प्रेमी की अनासक्ति या रागशून्यता कैसी होती है ? उसका एक उदाहरण देखिये। (11:32) एक बून्द आसक्ति का न होना , सभी महापुरुषों (अवतारों) के जीवन में हमें दीखता है। जिसको भी विवेक आ गया ज्ञान (विवेकज ज्ञान)-आ गया; विवेक-श्रोत उद्घाटित हो गया ; उनको फिर किसी चीज के प्रति राग (ऐषणाओं के प्रति आसक्ति) नहीं होता है। उनके भीतर 'मैं' 'मेरा' रूपी बीमारी नहीं होती। उन सभी महापुरुषों के जीवन में ये दिखाई देता है। हमलोग प्रभु राम के जीवन के एक घटना के देखते हैं। रामजी अयोध्या के राजकुमार (युवराज) होने जा रहे हैं। अयोध्या में सारी तैयारियाँ चल रही हैं। पूरी अयोध्या नगरी जगमग कर रही है। और वहाँ के लोग, अयोध्या की प्रजा (नागरिक) रामजी के व्यक्तित्व के प्रति इतना अद्भुत प्रेम है, उनसे इतना स्नेह करते हैं कि वे उनके दीवाने हैं। क्यों ? ये जो हमलोग विवेक-चूड़ामणि हमलोग पढ़ रहे हैं ,उस 'नर में नारायण ' देखने की विवेक-दृष्टि में प्रतिष्ठित महापुरुषश्रीराम के व्यक्तित्व में राग नहीं था , रामजी का व्यक्तित्व प्रेम स्वरुप था। रामजी कैसे हैं ? प्रेमी हैं कि रागी हैं ? राम जी भी ठाकुर देव के समान प्रेम के मूर्त रूप हैं। सभी महापुरुष (अवतार वरिष्ठ -या उनके पास जाकर वहाँ वापस लौटे नेता-विवेकानन्द) Love personified, प्रेम का साकार रूप या मूर्तमान प्रेम ही होते हैं। रामजी रागी नहीं प्रेमी थे इसीलिए अयोध्या की प्रजा उनको इतना चाहती थी। प्रेमी से सभी लोग प्रेम करेंगे , रागी से सभी लोग प्रेम नहीं कर सकते हैं। समझ रहे हो, क्यों ? रामजी-सभी के इतनेप्रिय क्यों हैं ? (12:57) क्योंकि उनके अन्दर प्रेम है। सबके प्रति सम-प्रेम है -एक समान प्रेम है। उनके प्रेम की कोई सीमा है ही नहीं। सिर्फ -एक, दो , चार लोगों तक हमारी जो संवेदनायें और भावनायें जो सीमित रहती हैं , वह प्रेम नहीं है। रामजी का प्रेम कैसा है ? समुद्र के समान है , उस समुद्र में मिलकर सभी नदियाँ समान हो जाती है। This Love is what we want to cultivate in our life. यह वही निःस्वार्थ प्रेम ही है जिसे हम अपने जीवन में भी विकसित करना चाहते हैं। हमलोग इस ग्रन्थ विवेक-चूड़ामणि का अध्यन क्यों कर रहे हैं ? इसीलिए तो हम रामजी की पूजा करते हैं। अब रामजी ऐसे प्रेमी हैं , इसीलिए अयोध्या के सारे नागरिक चाहते हैं कि रामजी ही युवराज बनें (अर्थात रामजी ही राजकुमार-भावी नेता बने Would be Leader बनें !) अगले दिन सवेरे रामजी का राज्याभिषेक होनेवाला है। लेकिन उसके एक दिन पहले वाली रात में क्या घटना घटती है ? आप सबको पता है। यहाँ उसके details देने की आवश्यकता नहीं है , आप सभीलोग जानते हैं। रात में मंथरा है , कैकई हैं, दशरथ जी हैं। और क्या-क्या होता है। रामजी भी तैयार हो रहे हैं अगले दिन होने वाले राज्या-भिषेक के लिए। अगले दिन भोर में सवेरे राज्याभिषेक होगा , सभी उसकी तैयारी में लगे हैं। रामजी प्रसन्न हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि अगले दिन राज्याभिषेक होने वाला है , इसलिए प्रसन्न हैं। हमलोगों को तो कुछ अच्छा होने वाला हो , यदि सरकारी नौकरी मिलने वाली हो तो बहुत ख़ुशी होती है। लेकिन रामजी की प्रसन्नता राज्याभिषेक में आधारित नहीं है। अगले दिन राज्याभिषेक होने वाला है , इसलिए रामजी प्रसन्न हैं - वैसा नहीं है। रामजी तो स्वभाव से ही प्रसन्न हैं ! क्योंकि वे स्वभाव से सत्य में प्रतिष्ठित हैं ! (14:38) [ अर्थात रामजी त्रिकाल अबाधित सत्य में प्रतिष्ठित हैं।] रात में ही दशरथ जी आकर रामजी से सारी कहानी कहते हैं। वे भारी असमंजस में हैं कि मैं अपने पुत्र से यह बात कहूं कैसे ? दशरथ जी राम से यह कहना है कि "हे राम , तुझे 14 वर्ष के लिए वनवास में जाना होगा !" मुँह निकालते ही उनका सीना फट रहा है - उनको ये समझ नहीं आ रहा कि उनके सबसे प्रिय पुत्र को मैं कैसे कहूं कि -' तुम्हें अयोध्या छोड़करके अब 14 वर्ष वन में जाना होगा' - कैसे कहें ? कोई पिता अपने पुत्र से यह बात कैसे कहेगा ? बहुत ही गंभीर परस्थिति है। दशरथ जी बहुत दुविधा की अवस्था में हैं , और रामजी उनकी पीड़ा को देख रहे हैं।वे दशरथ जी से पूछते हैं - क्या बात है पिताश्री ? आप खुल के बोलिये आप किस असमंजस में फंसे हुए हैं ? दसरथ जी बहुत प्रयास करके अंत में कह देते हैं कि बेटा -रात में ऐसा -ऐसा हुआ है। तुझे अयोध्या छोड़करके 14 वर्ष के लिए वनवास में जाना होगा। अब रामजी की प्रतिक्रिया क्या है ? (15:49) वे जैसे पहले प्रसन्न थे , उसी प्रसन्नता के साथ, रामजी के चेहरे पर वही पहले जैसी अत्यंत मीठी मुस्कान है। मुस्कान के साथ रामजी कहते हैं - " बस इतनी सी बात है ? इसके लिए आप इतने चिंतित और दुःखी हो रहे थे ? इतना ही , इसमें क्या है -मैं अभी चला। " देखिये राम जी की दृष्टि सत्य में प्रतिष्ठित दृष्टि है।एक बून्द भी आसक्ति नहीं है अपने राज्य के प्रति। (रामजी में 'मैं' और 'मेरा' की प्रति एक बून्द भी आसक्ति नहीं है।) किसी भी सुखभोग के प्रति एक बून्द भी आसक्ति नहीं है।क्योंकि यह सब मिथ्या है। (जगत जैसा दीखता है , वैसा तीन काल में भी नहीं है।) रामजी के जीवन में राजपाट के प्रति ऐसी अनासक्ति क्या दर्शा रही है?
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।
अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥
(ब्रह्म ज्ञानावली माला - श्लोक: 20 :https://
shlokam.org/texts/brahma-jnanavali-20/)
" ब्रह्म वास्तविक है, ब्रह्मांड मिथ्या है (इसे वास्तविक या असत्य के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है)। जीव ही ब्रह्म है और भिन्न नहीं। इसे सही शास्त्र के रूप में समझा जाना चाहिए। यह वेदांत द्वारा घोषित किया गया है।] हमारे शास्त्रों में रामायण या महाभारत सभी जगह उसी का एक परम् सत्य सिद्धान्त या महावाक्य: "पर्दा सत्यं सिनेमा मिथ्या" का निरूपण प्रमाणीकरण (demonstration) किया गया है। रामजी के अंदर यदि राज्य और राजा के पद के प्रति थोड़ी सी भी सत्यत्व बुद्धि होती, या थोड़ी सी भी आसक्ति होती तो प्रतिक्रिया कुछ और ही होती। सोंच के देखिये यदि हमको हमारे पिता कहें कि- " तुमको घर छोड़कर 10 दिन के लिए भी गाँव में जाना होगा " तो हमारी क्या प्रतिक्रिया होगी ? घर में ही युद्ध हो जायेगा। लेकिन रामजी के चेहरे पर जो प्रसन्नता , जो मुस्कान वनवास की खबर मिलने से पहले थी -वही मुस्कान अब भी है। और वे अपने पिताश्री से कह रहे हैं - बस इतनी सी बात कहने के लिए आप इतना दुःख उठा रहे थे ? आप तो बड़े आराम से कह सकते थे -तुम्हें वन में जाना है। हम जायेंगे इसमें चिंता की क्या बात है ? रामजी में वन को जाना हो या राज्याभिषेक के लिए जाना हो - दोनों के प्रति समदृष्टि है ! क्यों ? क्योंकि रामजी सत्य में प्रतिष्ठित हैं और वे जानते हैं किकेवल ईश्वर (पर्दा) ही सत्य है -बाकि सब (सिनेमा) सत्य सा दीखता है ! (17:36) और रामजी सत्य में प्रतिष्ठित हैं इसलिए उनकी दृष्टि में सब समान है।
अब वन में जाते समय रामजी नहीं चाहते थे कि सीता जी भी उनके साथ जाएँ ,लेकिन सीताजी तो माँ जानकी स्वयं है ; इस कहानी में वे एक दूसरी अद्भुत चरित्र है , जिसकी कोई तुलना ही नहीं है। सीताजी कहती हैं , आपके साथ मैं भी जाऊँगी -वे भी चल पड़ती हैं। फिर ऐसा अद्भुत भाई है -लक्ष्मण जैसा। लक्ष्मण जी कहते हैं , मैं भी जाऊँगा। रामायण या रामचरितमानस जैसी कोई कहानी आज तक हुई नहीं, और आगे भी कभी नहीं होगी। हम जानते नहीं हैं इस रामकथा का मोल क्या है ! पूरे मानव इतिहास में ये एक ही कहानी है। जिसकी कोई तुलना है ही नहीं। छोटा भी अपने बड़े भाई और भाभी के साथ चल पड़ता है। तीनों वनवास के लिए निकल पड़ते हैं।
अब भरतजी का चरित्र भी अद्भुत है - यह समझ में नहीं आता कि राम श्रेष्ठ हैं या भरत श्रेष्ठ हैं ? इस कथा में एक से एक व्यक्तित्व हैं - उनकी कोई तुलना नहीं है। राम की अनुपस्थिति में -भरत की माँ कैकई ने भरत के लिए ही तो सब कुछ किया। अब रामजी , सीताजी और लक्ष्मणजी वनवास के लिए निकल पड़े हैं। नैमिषारण्य पहुँच गए हैं। इधर भरतजी को अयोध्या का भार सौंपा गया है। लेकिन भरत जी उससे संतुष्ट नहीं हैं। भरतजी के मन एक ही बात चल रहा है, कैसे बड़े भईया को वापस ले आयें ? बड़े भईया , भाभी और लक्ष्मण जी को वापस ले आना है , यह सोंचकर के भरत जी पूरे मंत्रिमण्डल के साथ अयोध्या से नैमिषारण्य की तरफ चल पड़ते हैं। रामजी, सीताजी और लक्ष्मण जी जंगल में हैं। और काफी दिनों के प्रवास के बाद भरत जी पूरे मंत्रिमण्डल समेत , अयोध्या के जितने बड़े-बड़े पंडित विद्वान् लोग थे उन सबके समेत, लक्ष्मण जी जंगल पहुँचते हैं। जहाँ एक कुटिया में राम-सीता और लक्षणजी वास कर रहे हैं। कहानी ऐसी है है कि वहाँ उस दिन शाम को सभा बैठती है। भरत जी आये हैं , रामजी को वापस ले जाने के लिए। उस सभा में एक ओर रामजी और लक्ष्मणजी बैठे है , दूसरी और भरत जी के साथ सारा मंत्रिमण्डल और अयोध्या के सभी विद्वान् लोग बैठे हैं। और रामजी और भरतजी के बीच में एक ऐसा विवाद शुरू हो जाता है, एकदम झगड़ा शुरू हो जाता है। (20:40) literally they are fighting a legal battle, वस्तुतः वे कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। दोनों उस समय के समाज में स्थापित कानूनी बिन्दुओं - legal points को लेकर जैसे कोर्ट में बहस होता है , जैसे दो पक्ष कोर्ट में अपना -अपना क़ानूनी पक्ष रखते हैं ; उसी प्रकार भरत जी और राम जी, अपना अपना पक्ष रख रहे हैं। literally legal argument - वस्तुतः क़ानूनी तर्क दे रहे हैं। Very strong verbal argument, बहुत मजबूत मौखिक तर्क दिया जा रहा है। बहस घण्टों चलता है , और दोनों क्या prove करना छह रहे हैं ? एक दूसरे के साथ तर्क करके वे लोग क्या सिद्ध करना छह रहे हैं ? रामजी यह फ्रूफ करना चाह रहे हैं कि भाई अयोध्या मेरी नहीं है , अयोध्या तेरी है। भरतजी यह प्रूफ करना चाह रहे हैं कि अयोध्या मेरी नहीं है , भईया ये तेरी है। कभी दुनिया में ऐसा कोई केस देखा है ? जहाँ दोनों भाई ये साबित करने के लिए लड़ रहे हैं कि ये प्रॉपर्टी मेरी नहीं है ये तेरी है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह प्रसंग ऐसा है जो रोंगटे खड़े कर देता है। आज हमारे समाज में दो भाइयों के बीच क्या होता है ? प्रॉपर्टी के लिए एक दूसरे का हम गला काट देते हैं। क्यों ? आसक्ति ! राग ! क्यों - "मैं" और "मेरा" में आसक्ति -घोर राग ! और यहाँ देखिये - राम और भरत जी में देखिये ? मैं भी नहीं , मेरा भी नहीं। पूरा अयोध्या साम्राज्य सामने पड़ा है , लेकिन दोनों भाई लड़ रहे हैं , यह प्रमाणित करने के लिए भैया ये मेरी नहीं है ये तेरी है। तूँ ले ले इसको मुझे नहीं चाहिए। अब समझ में नहीं आता कि रामजी श्रेष्ठ हैं या भरत जी श्रेष्ठ हैं ? ये आदर्श है - भाइयों के बीच जरा सा भी राग का नहीं होना। ये अद्भुत है। अब जब हमलोग विवेक-चूड़ामणि का मंथन कर रहे हैं , और इसके बाद जब हम रामायण या महाभारत के कृष्ण का चरित्र देखेंगे , तो और भी स्पष्ट हो जायेगा की इस जगत में क्या हो रहा है ? ये सब ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या का प्रमाण आपको इनके जीवन में दिखाई देगा। सत्य तो यहाँ पर ईश्वर ही है , बाकि सब सत्य सा प्रतीत हो रहा है। और जो सत्य में प्रतिष्ठित हो जाते हैं , उनके अंदर जगत के 'मैं' और 'मेरा' को लेकर जरा सा भी राग नहीं होता। जरा सा भी attachment या आसक्ति नहीं है। क्या सुंदर घटना है। हमारे सभी पुराणों और इतिहासों में है - रामायण और महाभारत तो इतिहास है न ? हमारी संस्कृति इतनी समृद्ध है , हमारे सभी पुराणों में हमारी सनातन हिन्दू संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकते हैं। हमने अपनी प्राचीन संस्कृति को हटा कर रख दिया। हम अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं। कितना दुर्भाग्य है कि नहीं ? असली चीज हम नहीं पढ़ाते हैं। (23:40) हमारा जो असली धन है , अपने पूर्वज ऋषियों से प्राप्त जो सम्पत्ति है , उसे हम अपने बच्चों को नहीं देते हैं। ये आज के भारत का दुर्भाग्य है। इसे हमें बदलना होगा। आप लोग भी सोचिये आप अपनी भावी पीढ़ी के लिए क्या करेंगे ?
और एक घटना बहुत सुंदर है। ये जो सबके भीतर ईश्वर है , हमने यही तो देखा कि जब किसी मनुष्य के भीतर खोज करते हैं , मनुष्य क्या है? इसकी जाँच करते हैं , तो क्या होता है ? मनुष्य गायब हो जाता है , ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। What is a human being ? If you investigate a human being, Human being is gone, God emerges ! उसी प्रकार जब आप जगत क्या है ? यह जानना चाहते हैं , तब जगत गायब हो जाता है -माने मिथ्या सिद्ध होता है , ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। आप किसी भी व्यक्ति के भीतर देखो तो व्यक्ति चला गया ईश्वर प्रकट हो गया। जगत के भीतर देखो तो जगत चला गया ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। वास्तव में हम जीव और जगत के रूप में ईश्वर को ही देख रहे हैं ; इसीलिए स्वामी विवेकानन्द अक्सर एक गजल गाते थे - "तुझसे (माने ईश्वर से) हमने दिल को लगाया, जो कुछ है सो तू ही है । एक तुझको अपना पाया , जो कुछ है सो तू ही है। "
(गजल-ताल कहरवा )
तुझसे (ईश्वर से-अवतार वरिष्ठ से ?) हमने दिल को लगाया, जो कुछ है सो तू ही है ।
एक तुझको अपना पाया, जो कुछ है सो तू ही है ।।
सबके मकां दिल का मकीं तू, कौन सा दिल है जिसमें नहीं तू ।
हरेक दिल में तू ही समाया, जो कुछ है सो तू ही है ।।
क्या मलायक क्या इन्सान, क्या हिन्दू क्या मुसलमान ।
जैसे चाहा तूने बनाया, जो कुछ है सो तू ही है ।।
काबा में क्या, देवालय में क्या, तेरी परस्तिश होगी सब जाँ ।
आगे तेरे सिर सबने झुकाया, जो कुछ है सो तू ही है ।।
अर्श से लेकर फर्श जमीं तक और जमीं से अर्श वरी तक ।
जहाँ मैं देखा तू ही नजर आया जो कुछ है सो तू ही है ।।
सोचा समझा देखा-भाला, तुम जैसा कोई न ढूंढ़ निकाला ।
अब ये समझ में ' जफर ' के आया, जो कुछ है सो तू ही है ।।
ये गाना स्वामीजी को बहुत प्रिय था , श्री रामकृष्ण परमहंस के सामने वे इस गाने को अक्सर गाते थे।किससे हमने दिल को लगाया ? ईश्वर से ! जीव -जगत के रूप में जो भी भास रहा है , वो तू ही है। एक तुझको अपना पाया , जो कुछ है सो तू ही है। " (25 :21) हमारा अपना कहने के लिए ईश्वर से अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। हम अविवेक में अपने को स्थूल शरीर मानकर - एक बुलबुला अविवेक में समझता है कि दूसरा बुलबुला अपना है। वो बुलबुला कभी अपना हो सकता है क्या ? अगर आप बुलबुले को अपना समझोगे तो दुःख ही पाओगे। सच्चाई में बुलबुला क्या है ? यदि कोई बुलबुला अपने को जानेगा , तो क्या जानेगा ? समुद्र ही तो है। समुद्र में जो कुछ बुलबुला, तरंग या लहर दिखाई दे रही है -वो समुद्र ही तो है। समुद्र भिन्न कुछ है क्या ? तो- 'जब जो कुछ है, सो तू ही है !' तब दिल लगाना किससे है ? ईश्वर से ही लगाना है। और यदि ईश्वर से अतरिक्त कहीं और हम चिपकते हैं , तो अपने सत्य स्वरुप में प्रतिष्ठित नहीं रह सकते हैं। हम फिर से 'मैं' और 'मेरा' की आसक्ति , राग में फंसते हैं। इसीलिए चिपकना या स्पर्श सुख लेना मना है -नहीं , सख्त मना है !! चिपकाना सख्त वर्जित है !Sticking is strictly prohibited ! तो देखिये सभी में ईश्वर ही हैं।
अब पुराणों की एक कहानी और बता देता हूँ। (26:13) आप सबोंको प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कहानी आप सभी को पता है। पूरा detail बताने की जरूरत नहीं है। प्रह्लाद तो विष्णु के भक्त थे। वे नारायण की ही उपासना करते थे, विष्णु की ही उपासना करते थे। लेकिन हिरण्यकशिपु दैत्य वंश के थे। असुर वंश के थे। वो तो नारायण और विष्णु को नहीं मानते थे। तो प्रह्लाद जब विष्णु की उपासना करना नहीं छोड़ता है , तो उस छोटे से बालक को पीड़ा देते हैं। तरह -तरह से उसको मारने का प्रयास करते हैं। लेकिन उनको मारना सम्भव नहीं होता है। पूरी कहानी में जाने का समय नहीं है। सबसे अंत में जब हिरण्यकशिपु के महल (सिम्हाचलम-विषखापट्नम के पहले का स्टेशन) में जब यही चर्चा चल रहा था। प्रह्लाद को विष्णु से हटाने के लिए हिरण्यकशिपु तरह -तरह के प्रयास करता है। लेकिन प्रह्लाद हट ही नहीं रहा है , प्रह्लाद तो बिल्कुल विष्णु का ही भक्त है। अंत में हिरण्यकशिपु अपने महल में चर्चा करते समय पूछते हैं -तेरा नारायण कहाँ है ? तेरा नारायण विष्णु सर्वत्र है क्या ? प्रह्लाद कहते हैं -वे बिल्कुल सर्वत्र हैं। ये प्रह्लाद का दर्शन था। वो ईश्वर को सर्वत्र देखते थे। अच्छा बताओ ये सामने जो स्तम्भ दिख रहा है -इसमें भी है ? इस खंभे में है ? प्रह्लाद बोले -जी बिल्कुल है। " तुममें-हममें, खड़ग-खंभ में सबमें है भगवान ! की अनुभूति करने वाले भक्त पह्लाद को नरसिंह भगवान ने बता दिया कि वे हर जगह विराजमान हैं । प्रह्लाद बोले की हाँ मेरे अंदर भी है , आपके अंदर भी है और प्रत्येक जीव मात्र के अंदर वो विष्णु ही बैठा है। हिरण्यकशिपु बोले की मेरे हाथ में जो तलवार है क्या इसमें भी तेरा विष्णु बैठा हुआ है? प्रह्लाद जी बोले की हाँ इस तलवार में भी विष्णु बैठा हुआ है। ये विश्वास है भक्त का। अच्छा प्रल्हाद तो क्या इस खम्बे में भी तेरा विष्णु बैठा हुआ है? प्रह्लाद जी बोले की मो में , तो में, खडग खम्भ में, जहाँ देखो तहाँ राम। मुझमे, आपमें, इस तलवार में, और इस खम्बे में भी भगवान विष्णु बैठे हुए है। जैसे ही इतना सुना तो हिरण्यकशिपु दौड़कर खम्बे के पास गया और जाकर के घुसा मारा। और खम्बे के 2 टुकड़े हो गए। और उसमें से कौन निकलते हैं ? जैसे ही खम्भे के 2 टुकड़े हुए उसमे से भगवान नृसिंह प्रकट हो गए। जिनका मुख तो सिंह जैसा और शरीर मानव जैसा।" तुममें-हममें, खड़ग-खंभ में सबमें है भगवान ! की अनुभूति करने वाले भक्त पह्लाद को नरसिंह भगवान ने बता दिया कि वे हर जगह विराजमान हैं ।
कहने का मतलब है आप जीव और जगत के सभी स्थूल और सूक्ष्म के भीतर कारण तक चले जाएँ , तो नारायण ही है। उस कहानी के माध्यम से हमें यही समझाया जाता है। समझ रहे हो ? अब इसमें living non-living' सजीव' 'निर्जीव' की बात भी नहीं है। आप किसी भी निर्जीव पदार्थ non- living पदार्थ को ले लीजिये। उसका भी स्थूल स्तर है , उसका भी सूक्ष्म स्तर है , उसके भी मूल या कारण में जाओगे तो -ईश्वर हो मिलेगा। matter गायब हो जायेगा शक्ति ही मिलेगी। यही ईश्वर तत्व हमारे सभी पुराणों और इतिहासों में तरह -तरह से , विभिन्न प्रकार से , इसको व्यक्त किया गया है। सभी लोग उपनिषद नहीं पढ़ सकते हैं , इसलिए पुराण में सर्वसधारण व्यक्ति के लिए कहा गया है। यह समझाने के लिए कि कारण शरीर के रूप में सबके भीतर ईश्वर ही है। हनुमानजी छाती खोलकरके दिखाते हैं , वो क्या है ? ईश्वर ही है। सर्वत्र है। यहाँ तक हमने सदख लिया कि सबके मूल में ईश्वर ही हैं। और वहां से देखो तो सब हमको ईश्वरमय ही दिखाई देता है। ईश्वर से अतिरिक्त यह जीव -जगत कुछ भी नहीं है। 21 सत्रों में हम यहाँ तक पहुंचे। ॐ शांति। ....
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[(हे ईश्वर ! तेरी इच्छा पूर्ण हो ! आपकी इच्छा स्वर्ग में जैसी पूरी होती है, वैसी ही पृथ्वी पर भी हो!) और इस विश्व-प्रपंच पर गहराई से विचार करने पर निष्कर्ष क्या निकलता है ? यही कि - अपने भ्रमों -भूलों को त्यागता हुआ प्रत्येक मनुष्य पूर्णत्व की ओर अग्रसर है। ]
"A man can attain to perfection, the highest goal, sitting on a throne, commanding armies, working out big plans for nations .(Krishna –Volume 1:page-439 Swami Vivekananda :)
"मैं' और 'मेरा' की बीमारी से मुक्त, कोई भी अनासक्त मनुष्य राजसिंहासन पर बैठे रहकर, सेनाओं का संचालन करते रहकर, राष्ट्र के लिए विराट योजनाओं को कार्यान्वित करते रहकर-मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य- पूर्णत्व (100 %निःस्वार्थपरता) में प्रतिष्ठित रह सकता है !(कृष्ण पर व्याख्यान ७/२७६)
" And what becomes of a man when he attains perfection? He lives a life of bliss infinite. He enjoys infinite and perfect bliss, having obtained the only thing in which man ought to have pleasure, namely God, and enjoys the bliss with God. (Paper on Hinduism-page :13)
और जब कोई मनुष्य पूर्णत्व को प्राप्त कर लेता है, तब उसका क्या होता है?वह असीम आनंद का जीवन व्यतीत करता है। मनुष्य को जिस एकमात्र वस्तु ईश्वर (या अव्यक्त नाम वाली परमेश शक्ति) में आनंद मिलना चाहिए, उसे अर्थात ईश्वर को प्राप्त कर ( अपने सत्य स्वरुप या -कारणशरीर में प्रतिष्ठित रहते हुए) वह परम् आनंद का उपभोग करता है और ईश्वर के साथ एकत्व की अनुभूति कर परमानन्द का आस्वादन करता है। (हिंदू धर्म पर निबन्ध-1:पृष्ठ :15)
The Hindu religion does not consist in struggles and attempts to believe a certain doctrine or dogma, but in realising — not in believing, but in being and becoming.
" हिंदू धर्म भिन्न भिन्न मत-मतान्तरों या सिद्धान्तों (4 महावाक्यों) पर विश्वास करने के लिए संघर्ष और प्रयत्न करने में निहित नहीं है, वरन वह आत्मसाक्षात्कार है, वह केवल विश्वास कर लेना नहीं है, वह होना और बनना है !" (ईश्वर बन जाना है या महावाक्यों में प्रतिष्ठित होना है) [हिंदू धर्म पर निबन्ध-1:पृष्ठ :14)
" And this bondage can only fall off through the mercy of God, and this mercy comes on the pure. So purity is the condition of His mercy. How does that mercy act? He reveals Himself to the pure heart; the pure and the stainless see God, yea, even in this life; then and then only all the crookedness of the heart is made straight. Then all doubt ceases. He is no more the freak of a terrible law of causation. This is the very centre, the very vital conception of Hinduism. "
" और यह बन्धन केवल ईश्वर की कृपा से ही टूट सकता है और यह कृपा पवित्र लोगों को ही प्राप्त होती है। अतः पवित्रता ही ईश्वर के अनुग्रह प्राप्ति की शर्त है। माँ काली की यह कृपा कैसे कार्य करती है? वह पवित्र ह्रदय में अपने को प्रकाशित करती है। पवित्र चरित्र का मनुष्य इसी जीवन में ईश्वर -दर्शन प्राप्त कर कृतार्थ हो जाता है। "तब उसकी समस्त कुटिलता नष्ट हो जाती है, सारे सन्देह दूर हो जाते हैं। " तब वह फिर कार्य-कारण के भयावह -नियम के हाथ का खिलौना नहीं रह जाता। यही हिंदू धर्म का मूलभूत सिद्धान्त है - अत्यंत प्राणवान सिद्धांत है।
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
- मुण्डकोपनिषद् २.२.८
आत्मा का “परावरे दृष्टि” जब जड़ और चेतन, हीन और परा, सकल और निष्कल ब्रह्म का एकत्व प्रत्यक्ष होता है - तब साधक के जीवन में ऐसा भीतरी क्रान्तिकारी रूपान्तरण होता है, जो सम्पूर्ण बन्धनों को काट देता है।“भिद्यते हृदयग्रन्थिः” — भगवत्पाद शंकराचार्य ‘हृदयग्रंथि’ को अविद्या, अहंता, ममता और देहाभिमान का गाँठ कहते हैं। यह वही गाँठ है, जो आत्मा को देह, मन, कर्तृत्व और संसार से बाँधती है। आत्मदर्शन से यह गाँठ स्वतः भस्म हो जाती है।
आपकी इच्छा स्वर्ग में जैसी पूरी होती है, वैसी ही पृथ्वी पर भी हो!O God! May your wish be fulfilled! " Thy will be done, as in the heaven so on the earth !“अत: तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो: ‘हे हमारे पिता, तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो। ‘और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर। ‘और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; (क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं।’ आमीन।) “इसलिये यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा। (मत्ती :6) ]
The people are doing all right to the best of their ability and means and knowledge. Woe unto me that I cannot lift them to where I am!
लोग अपनी क्षमता, साधन और ज्ञान के अनुसार सब ठीक कर रहे हैं। धिक्कार है मुझ पर कि मैं उन्हें वहाँ तक नहीं पहुँचा सकता जहाँ मैं हूँ!
First, believe in this world — that there is meaning behind everything. Everything in the world is good, is holy and beautiful. If you see something evil, think that you are not understanding it in the right light.
सबसे पहले, इस दुनिया में विश्वास करो — कि हर चीज़ के पीछे एक अर्थ है। दुनिया में सब कुछ अच्छा, पवित्र और सुंदर है। अगर तुम कुछ बुरा देखते हो, तो सोचो कि तुम उसे सही नज़रिए से नहीं समझ रहे हो।
अर्थ:-मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा-इन सात धातुओं से बने हुए तथा चरण, जंघा, वक्षःस्थल (छाती), भुजा, पीठ और मस्तक आदि अंगोपांगों से युक्त, 'मैं और मेरा' रूप से प्रसिद्ध इस मोह के आश्रय रूप देह को विद्वान् लोग 'स्थूल शरीर' कहते हैं।]
पीताम्बरधारी रघुकुलमणि की वन्दना का पद और भक्त कवि द्वारा भगवान शंकर का वन्दन:
आज से आरम्भ होता है , श्रीरामचरितमानस के सातवें तथा अन्तिम सोपान उत्तरकाण्ड का संगीतबद्ध पाठ। मयूरकंठ की हरित आभा वाले नीलवर्ण शोभाधाम पीताम्बरधारी धनुषवाण धारण करने वाले रघुकुलमणि श्रीराम की वन्दना का पद से प्रारम्भिक श्लोक।श्रीराम भक्त कवि ने भगवान शंकर का वन्दन भी किया है, जो भक्तों को वांछित फल देते हैं। जिनकी कृपा से जीव को विषय-वासनाओं से मुक्ति मिलती है।चौदह वर्षों की अवधि समाप्त होने में मात्र एक दिन शेष है। अयोध्या निवासी नर-नारी , महलों में मातायें , सभी उत्कण्ठित हैं कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अब तक क्यों नहीं आये ?
भावार्थ:-मोर के कण्ठ की आभा के समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमल नेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथों में बाण और धनुष धारण किए हुए, वानर समूह से युक्त भाई लक्ष्मणजी से सेवित, स्तुति किए जाने योग्य, श्री जानकीजी के पति, रघुकुल श्रेष्ठ, पुष्पक विमान पर सवार श्री रामचंद्रजी को मैं निरंतर नमस्कार करता हूँ॥1॥
* कोसलेन्द्रपदकन्जमंजुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृंगसंगिनौ॥2॥
भावार्थ:-कोसलपुरी के स्वामी श्री रामचंद्रजी के सुंदर और कोमल दोनों चरणकमलब्रह्माजी और शिवजी द्वारा वन्दित हैं, श्री जानकीजी के करकमलों से दुलराए हुए हैं और चिन्तन करने वाले के मन रूपी भौंरे के नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करने वालों का मन रूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलों में बसा रहता है॥2॥
भावार्थ:-कुन्द के फूल, चंद्रमा और शंख के समान सुंदर गौरवर्ण, जगज्जननी श्री पार्वतीजी के पति, वान्छित फल के देने वाले, (दुखियों पर सदा), दया करने वाले, सुंदर कमल के समान नेत्र वाले, कामदेव से छुड़ाने वाले (कल्याणकारी) श्री शंकरजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥3॥
दोहा :
* रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥
भावार्थ:-श्री रामजी के लौटने की अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगर के लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे हैं। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं (कि क्या बात है श्री रामजी क्यों नहीं आए)।
* सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर॥
भावार्थ:-इतने में सब सुंदर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गए। नगर भी चारों ओर से रमणीक हो गया। मानो ये सब के सब चिह्न प्रभु के (शुभ) आगमन को जना रहे हैं।
* कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।
आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ॥
भावार्थ:-कौसल्या आदि सब माताओं के मन में ऐसा आनंद हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी आ गए।
* भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥
भावार्थ:-भरतजी की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मन में अत्यंत हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे-
भावार्थ:-प्राणों की आधार रूप अवधि का एक ही दिन शेष रह गया। यह सोचते ही भरतजी के मन में अपार दुःख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आए? प्रभु ने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया?॥1॥
* अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥2॥
भावार्थ:-अहा हा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं, जो श्री रामचंद्रजी के चरणारविन्द के प्रेमी हैं (अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए)। मुझे तो प्रभु ने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसी से नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया॥2॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥3॥
भावार्थ:-(बात भी ठीक ही है, क्योंकि) यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पों तक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता (परंतु आशा इतनी ही है कि), प्रभु सेवक का अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबंधु हैं और अत्यंत ही कोमल स्वभाव के हैं॥3॥
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥4॥
भावार्थ:-अतएव मेरे हृदय में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्री रामजी अवश्य मिलेंगे, (क्योंकि) मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं, किंतु अवधि बीत जाने पर यदि मेरे प्राण रह गए तो जगत् में मेरे समान नीच कौन होगा? ॥4॥