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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

⚜️️🔱करावलम्बं मम देहि विष्णो, गोविन्द दामोदर माधवेति। ⚜️️🔱1. इष्टनिष्ठा :आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है। (The Chosen Ideal-vol 3) / ⚜️️🔱2. 'इष्ट' आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है। (भक्ति योग पर प्रवचन -खण्ड 9. P/51)⚜️️🔱 (THE ISHTA) (THE ISHTA :Volume 4, Addresses on Bhakti-Yoga)

(The Chosen Ideal-vol 3) 

इष्टनिष्ठा

आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है।

अब हम इष्ट-निष्ठा के सम्बन्ध में विचार करेंगे। जो भक्त बनना चाहता है, उसे यह जान लेना चाहिए कि "जितने मत हैं, उतने ही पथ" (so many opinions are so many ways)। उसे यह अवश्य जान लेना चाहिए कि विभिन्न धर्मों के विविध संप्रदाय उसी एक प्रभु (ठाकुर) की महिमा की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।  

'लोग तुम्हें कितने नामों से पुकारते हैं। लोगों ने विभिन्न नामों से तुम्हें विभाजित सा कर दिया है। परन्तु फिर भी प्रत्येक नाम (राम, कृष्ण, बुद्ध ,ईसा.....अल्ला, काली, बंदीमैया) में तुम्हारी पूर्ण शक्ति वर्तमान है। इन सभी नामों से तुम उपासक को प्राप्त हो जाते हो। यदि ह्रदय (आत्मा) में तुम्हारे प्रति अनन्य प्रेम रहे , तो तुम्हें पुकारने का कोई निर्दिष्ट समय (जप करने का special time) भी नहीं है। तुम्हें पाना इतना सहज होते हुए भी , मेरे प्रभु (ठाकुर) , यह मेरा दुर्भाग्य ही है, जो तुम्हारे प्रति मेरा अनुराग नहीं हुआ ! " 

इतना ही नहीं, भक्त को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह उन तेजस्वी संतों से नफ़रत न करे, न ही उनकी आलोचना करे, जो अलग-अलग संप्रदायों के संस्थापक हैं; उसे उनके बारे में बुरा बोलते हुए भी नहीं सुनना चाहिए। सच में, ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिनमें व्यापक सहानुभूति और सराहना की शक्ति के साथ-साथ प्रेम की तीव्रता भी होती है।

इतना ही नहीं, भक्त को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अन्य धर्म -सम्प्रदायों के तेजस्वी प्रवर्तकों के प्रति उसके मन में घृणा उत्पन्न न हो, वह उनकी निंदा न करे और न कभी उनकी निन्दा ही सुने ऐसे लोग वास्तव में बहुत कम होते हैं, जिनका ह्रदय इतना उदार हो जो दूसरों में सिर्फ महान गुणों को ही परखने में समर्थ हों , और साथ ही प्रगाढ़प्रेम- सम्पन्न भी हों। [ extensive sympathy and power of appreciation, as well as an intensity of love.' दादा कहते थे - 

मनसि वचसि काये पुण्य पीयूष पूर्णाः 

त्रिभुवनं उपकार श्रेणिभिः  प्रीणयन्तः 

परगुण परमाणून् पर्वती कृत्य नित्यं 

निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः  ।

(नीतिशतकम् (५३/२२१)

ऐसे मन में, वाणी में और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से भरे हुए, दूसरों के छोटे छोटे गुण को भी बड़ा गुण मानते हुए, अपने ह्रदय समुद्र जितना विशाल बनाते हुए;  -तीनों लोक में उपकार कर के उन्हें पर्वत के समान बढ़ा-चढ़ाकर कहते हुए उस की प्रसन्नता को बढाते हुए, अपने मन में प्रसन्न होते हुए सज्जन इस जगत में कितने हैं ? वे तो अतीव दुर्लभ होते हैं। 

.... फिर भी हम जानते हैं कि बहुत से लोगों को ऐसे आदर्श में शिक्षित कर सकना सम्भव है, जिसमें प्रेम की तीव्रता और ह्रदय की उदारता का अपूर्व सामजंस्य हो। और ऐसा करने का उपाय है यह - इष्टनिष्ठा। ( "steadfast devotion to the chosen ideal". 'प्रत्याहार के बाद ह्रदय में धारणा का अभ्यास करने हेतु निर्धारित आदर्श -(पवित्र त्रयी ) के प्रति पक्की भक्ति" को ही इष्टनिष्ठा कहा जाता है।) धर्मों के भिन्न भिन्न सम्प्रदाय मनुष्य-जाति के सम्मुख केवल एक एक आदर्श रखते हैं।  परन्तु हिन्दू सनातन वैदिक धर्म ( eternal Vedantic religion) ने तो भगवान के मन्दिर में प्रवेश करने के लिए अनेकानेक मार्ग खोल दिए हैं, और मनुष्य-जाती के सम्मुख असंख्य आदर्श उपस्थित कर दिये हैं। और इन आदर्शों में से प्रत्येक उस अनन्तस्वरुप ईश्वर की एक एक अभिव्यक्ति है।

अतः भक्तियोग हमें इस बात का आदेश देता है कि हम भगवत्प्राप्ति के विभिन्न मार्गों में से किसी के भी प्रति घृणा न करें, किसी को भी अस्वीकार न करें। फिर भी, जब तक पौधा छोटा रहे, जब तक वह बढ़कर एक बड़ा पेड़ न हो जाय, तब तक उसे चारों ओर से घेरकर रखना आवश्यक है।आध्यात्मिकता का यह छोटा पौधा यदि आरम्भिक , अपरिपक्व दशा में ही भावों और आदर्शों के सतत परिवर्तन के लिए खुला रहे, तो वह  मर जाएगा। (The tender plant of spirituality will die if exposed too early to the action of a constant change of ideas and ideals.) 

बहुत से बहुत से लोग, जिसे 'धार्मिक उदारता' (या धर्म-निरपेक्षता religious liberalism) के नाम पर अपने आदर्शों (पवित्र त्रयी) को अनवरत बदलते रहते हैं। सदा नयी नयी बातें सुनने के लिए लालायित रहना उनके लिए एक बीमारी सा , एक नशा के जैसा हो जाता है।  उनके लिए धर्म एक प्रकार से अफ़ीम के नशे के समान (intellectual opium-eating) है और बस , उसका वहीं अन्त हो जाता है।

    भगवान श्रीरामकृष्ण कहा करते थे - " एक मनुष्य दूसरे प्रकार का भी होता है, जिसकी उपमा 'मोती बनाने वाली सीपी' (pearl-oyster, पर्ल ऑयस्टर) के कहावत (Folklore) से दी जा सकती है। सीपी समुद्र की तह (bottom) छोड़कर स्वाति नक्षत्र के पानी की एक बून्द लेने के लिए ऊपर उठ आती है , और मुँह खोले हुए सतह (surface) पर तैरती रहती है। ज्यों ही उस नक्षत्र (लग्न) का एक बूँद पानी (बीजमंत्र) पड़ता है, त्यों ही वह मुँह बन्द करके एकदम समुद्र की तह में चली जाती है। और जब तक उस बूँद से एक सुन्दर मोती का निर्माण (जीवन-गठन) नहीं कर लेती , तब तक वहीं विश्राम करती रहती है। इष्टनिष्ठा का भाव प्रकट करने के लिए यह एक अत्यन्त काव्यात्मक और सशक्त उदाहरण है, और इतनी सुन्दर उपमा शायद ही पहले कभी दी गयी हो। साधक के लिए आरम्भिक दशा में यह एक-निष्ठा नितान्त आवश्यक है।  

( It floats about on the surface of the sea with its shell wide open, until it has succeeded in catching a drop of the rain-water, and then it dives deep down to its sea-bed, and there rests until it has succeeded in fashioning a beautiful pearl out of that rain-drop.")   

हनुमान जी के समान उसे भी यह भाव रखना चाहिए - 

"श्रीनाथे जानकीनाथे अभेदः परमात्मनि। 

तथापि मम सर्वस्वः रामः कमललोचनः॥" 

यद्यपि परमात्मदृष्टि से लक्ष्मीपति और सीतापति दोनों एक हैं , तथापि मेरे सर्वस्व तो वे ही कमललोचन श्री राम हैं। अथवा तुलसीदास ने भी जैसा कहा है - 

"सबसे रसिये सबसे बसिये, सबका लीजिए नाम। 

हाँ जी हाँ जी करते रहिए, बैठिए अपने ठाम॥"

" सब के साथ बैठो , सबके साथ मीठी बोली बोलो, सबका नाम लो और सबसे 'हाँ हाँ' कहते रहो, पर अपना स्थान मत छोड़ो - अर्थात अपना भाव दृढ़ रखो। ("Take the sweetness of all, sit with all, take the name of all, say yea, yea, but keep your seat firm.) 

सच्चे भक्त को भी ऐसा ही करना चाहिए। तब साधक यदि सच्चे , निष्कपट भाव से साधना करे, तो इस बीज से भारत के बटवृक्ष (Indian banyan) की तरह एक विशाल विटप उत्पन्न होकर , सब दिशाओं में अपनी शाखायें और जड़ें फैलाता हुआ धर्म के सम्पूर्ण क्षेत्र (entire field of religion) को आच्छादित कर लेगा।

 "Thus will the true devotee realise that He who was his own ideal in life is worshipped in all ideals by all sects, under all names, and through all forms."

तभी तो सच्चे भक्त को यह अनुभव होगा कि उसका अपना ही इष्टदेवता (पवित्र त्रयी) विविध सम्प्रदायों में विभिन्न नामों और विभिन्न रूपों में पूजित हो रहा है। (खण्ड -4 P, 35)   

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इष्ट 

(भक्ति योग पर प्रवचन -खण्ड 9. P/51) 

(THE ISHTA) 

(THE ISHTA :Volume 4, Addresses on Bhakti-Yoga)  

'इष्ट' के चयन का सिद्धांत के सम्बन्ध में मैं संक्षेप में कुछ पहले बतला चुका हूँ। उसे तुम लोग ध्यान देकर सुनो , क्योंकि उसे ठीक ठीक समझ लेने पर हम दुनिया के सभी धर्मों को समझ सकेंगे। 'इष्ट' शब्द 'इष' धातु से बना है, जिसका अर्थ है इच्छा करना, चाहना या चुन लेना। (The word Ishta is derived from the root Ish, to desire, choose. The ideal of all religions, all sects, is the same — the attaining of liberty and cessation of misery.सभी धर्मों, सभी संप्रदायों का आदर्श तथा मानवजाति का आदर्श एक ही है ; और वह है मुक्ति लाभ तथा दुःखों की निवृति। जहाँ कहीं भी धर्म देखोगे, वहाँ यही पाओगे कि यही आदर्श किसी न किसी रूप में कार्य कर रहा है। यही एक लक्ष्य (goal) है, जिसकी ओर हम सब अग्रसर हो रहे हैं। हम दुःखो से, प्रतिदिन के दुःख-कष्टों से मुक्त होना चाहते हैं, और मुक्ति पाने के लिए - भौतिक , मानसिक और आध्यात्मिक मुक्ति-लाभ के लिए छटपटा रहे हैं। संसार-चक्र इसी भावना को लेकर प्रवर्तित हो रहा है। लक्ष्य एक होते हुए भी, वहाँ तक पहुँचने के मार्ग भिन्न -भिन्न हो सकते हैं। ये मार्ग हमारी प्रकृति (स्वभाव) की विशेषताओं के अनुसार निर्धारित होते हैं। एक मनुष्य भावुक प्रकृति का होता है , दूसरा बौद्धिक तथा तीसरे की प्रकृति कर्मशीलता होती है, इत्यादि इत्यादि। 

पुनः एक ही प्रकृति में अनेक प्रभेद हो सकते हैं। उदाहरणार्थ 'प्रेम ' को लो , जिसका भक्ति के साथ विशेष सम्बन्ध है। एक मनुष्य  प्रकृति में बच्चे के लिए अधिक प्रेम हो सकता है, दूसरे की प्रकृति में पत्नी के लिए , किसी में माता , किसी में पिता तथा किसी में मित्रों के लिये। इसी प्रकार किसी में अपने देश के लिये प्रेम रहता है , और कुछ इने-गिने लोगों का प्रेम विशाल मानवता के प्रति हुआ करता है। पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम होती है , यद्यपि हर व्यक्ति इस प्रेम के विषय में इस प्रकार बात करता है , मानो वही उसके जीवन का मार्गदर्शक और प्रेरक (guiding motive power) हो। 'इस प्रकार के प्रेम' (ज्ञानमयी दृष्टि से universal love -ब्रह्ममय जगत) का अनुभव कुछ सन्तों ने ही किया है। इस वृहत मानवसमाज में केवल कुछ महापुरुषों (great soulsको ही इस सार्वभौमिक प्रेम का अनुभव हुआ करता है और हम आशा करते हैं कि यह संसार ऐसे महात्माओं से कभी शून्य न होगा।  [Some few sages have experienced it. A few great souls among mankind feel this universal love, and let us hope that this world will never be without such men.] 

हम देखते हैं कि एक ही विषय में साध्य की प्राप्ति के इतने भिन्न भिन्न मार्ग हैं। सभी ईसाई ईसा में विश्वास करते हैं; पर सोचो तो सही , उनके बारे में कितने भिन्न भिन्न विचार इन लोगों के होते हैं। हर एक चर्च (Each church) या ईसाई -सम्प्रदाय ईसा को भिन्न भिन्न रूप में देखता है , भिन्न भिन्न दृष्टिकोण से देखता है। 'Presbyterian' (पादरी-संघ) की दृष्टि (बुद्धि या मति) में ईसा के जीवन का वह दृश्य महत्वपूर्ण दीखता है , जब वे सिक्का बदलने वालों के पास गये ! उनकी दृष्टि में ईसा योद्धा (fighter) ही जँचते हैं। पर यदि तुम 'Quaker' (शांति-प्रचारक) से पूछो तो वह शायद यही कहेगा कि "He forgave his enemies." - ' उन्होंने अपने शत्रुओं को क्षमा प्रदान की। ' Quaker का यही मत है। इसी तरह और भी हैं। यदि 'Roman Catholic' से पूछो कि तुम्हें ईसा की जीवनी का कौन सा अंश विशेष प्रिय है , तो वह शायद यही कहेगा कि जब उन्होंने कुंजियाँ पीटर को दे दीं। इसी प्रकार प्रत्येक सम्प्रदाय ईसा को अपने ही तरीके से देखने के लिए बाध्य है। 

इससे यह सिद्ध होता है कि एक ही विषय में बहुत से भेद-प्रभेद होंगे। अज्ञानी लोग इनमें से किसी एक प्रभेद को ले लेते हैं और उसी को अपना आधार बना लेते हैं , और विश्व की व्याख्या अपनी दृष्टि (मति, बुद्धि) के अनुसार करके दूसरे के अधिकार का केवल निषेध ही नहीं करते , वरन यह कहने तक का साहस करते  हैं कि दूसरों का मार्ग बिल्कुल गलत है तथा केवल उन्हीं का सत्य है। यदि उनका विरोध किया जाता है, तो वे लड़ने लगते हैं। 

 [Ignorant persons (अविवेकी अर्थात अविद्या -अस्मिता -राग-द्वेष- अभिनिवेश आदि पंचक्लेश से ग्रस्त व्यक्ति ) take one of these subdivisions (समाज सेवा के अन्नदान , वस्त्रदान आदि) या कोई 'Be and Make ' का प्रचार कार्य)  and take their stand upon it, and they not only deny the right of every other man to interpret the universe according to his own light, but dare to say that others are entirely wrong, and they alone are right.  If they are opposed, they begin to fight.  They say that they will kill any man who does not believe as they believe, just as the Mohammedans doThese are people who think they are sincere, and who ignore all others. ]  

मुसलमानों की तरह वे कहते हैं कि जिस मनुष्य का धार्मिक विश्वास उन्हीं की तरह का नहीं है , उसे वे कत्ल कर डालेंगे ; जैसे कि कुछ धर्मान्धों ने अतीत में किया है और भिन्न -भिन्न देशों में आज भी कर रहे हैं। ये लोग अपने को ही सच्चा मानते हैं और शेष दूसरों को कुछ नहीं समझते। पर इस भक्तियोग में हम किस प्रकार की दृष्टि (जैसी बुद्धि या मति वैसी गति) से अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं? दूसरों से केवल इतना कहने से ही काम न बनेगा कि तुम्हारा मार्ग गलत नहीं है, बल्कि हमें उनसे यह कहना होगा कि तुम जिस मार्ग का अनुसरण कर रहे हो , वह ठीक है। तुम्हारी प्रकृति के अनुसार जो मार्ग तुम्हारे लिए अनिवार्य हो वही तुम्हारे लिए यथार्थ मार्ग है।[ That way, which your nature makes it absolutely necessary for you to take, is the right way.

हर मनुष्य अपने पूर्व-अस्तित्व ( past existence या पूर्व -जन्म) के कारण अपनी प्रकृति में विशेषता लेकर पैदा होता है। चाहे हम उसे अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल कहें अथवा पूर्वजों से प्राप्त संस्कार कहें। हम उसकी व्याख्या चाहे जैसी करें, पर हम हैं तो अतीत के ही परिणाम। यदि कुछ भी तय है (absolutely certain -पक्का विश्वास है) तो इतनी बात तो बिल्कुल सत्य है , चाहे वह अतीत हमारे पास किसी भी मार्ग से आया हो। इसका स्वाभाविक निष्कर्ष यह है कि पत्येक व्यक्ति की वर्तमान दशा , अपने भूतकालीन कारण का ही कार्य है। इस कारण हममें से प्रत्येक की एक विशेष गति , एक विशेष प्रवृत्ति होती है और इसीलिए प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करना पड़ता है। [whatever way we may put it, we are the result of the past - that is absolutely certain, through whatever channels that past may have come.  It naturally follows that each one of us is an effect, of which our past has been the cause; and as such, there is a peculiar movement, a peculiar train, in each one of us; and therefore each one will have to find way for himself.]

जो कोई भी मार्ग या पद्धति (प्रवृत्ति या निवृत्ति) हमारी स्वाभाविक प्रकृति के अनुकूल हो उसी को 'इष्ट मार्ग' (chosen way) कहते हैं। यही 'इष्ट ' का सिद्धान्त है और वही 'इष्टदेव' (पवित्र त्रयी) हमारा मार्ग भी है। 

[पवित्र त्रयी को अपने जीवन का आदर्श या 'ध्रुवतारा' बना लेने के पीछे का यही तत्व है This is the theory of Ishta, and that way which is ours we call our own Ishta.]

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की भगवान के विषय में यह धारणा हो कि वह सम्पूर्ण विश्व का सर्वशक्तिमान शासक है। सम्भवतः उस मनुष्य का अपना स्वभाव भी इसी प्रकार का है। वह स्वयं एक 'दबंग व्यक्ति' है (overbearing manहै, जो सब पर शासन करना करना चाहता है; अतः स्वाभाविक रूप से  भगवान को भी वह सर्वशक्तिमान शासक मानता है। [He is an overbearing man who wants to rule everyone; he naturally finds God an omnipotent Ruler.]

   दूसरा मनुष्य, जो शायद स्कूलमास्टर है और कठोर स्वभाव का है, ईश्वर को न्यायधीश या दण्ड देनेवाला भगवान (God of punishment) समझता है। वह ईश्वर के बारे में अन्य भावना नहीं कर सकता। इस प्रकार हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ईश्वर का एक एक रूप मानता है। और अपनी अपनी प्रकृति (मति या बुद्धि) के अनुसार निर्माण किया हुआ यह रूप ही हमारा इष्ट होता है। 

... तुम कभी शायद किसी मनुष्य को  उपदेश देते हुए सुनकर यह सोचो कि यही उपदेश सर्वश्रेष्ठ है और तुम्हारे बिल्कुल अनुकूल है। दूसरे दिन तुम अपने एक मित्र के पास जाकर उसका उपदेश सुन आने को कहते हो। और वह यह विचार लेकर लौटता है कि आजतक उसने जितने उपदेश सुने , उनमें वह सबसे निकृष्ट है। उसका ऐसा कहना गलत नहीं है, और उसके साथ झगड़ा करना निरर्थक है। उपदेश तो ठीक था, पर उस मनुष्य के उपयुक्त नहीं था। थोड़ा और विस्तार से कहें तो , विभिन्न दृष्टिकोण (मूढ़बुद्धि- शुद्ध बुद्धि-मति) से देखने पर सत्य सत्य भी हो सकता है , और साथ ही सत्य नहीं भी। 

( He is not wrong, and it is useless to quarrel with him. The teaching was all right, but it was not fitted to that man. To extend it a little further, we must understand that truth seen from different standpoints can be truth, and yet not the same truth.

प्रारम्भ में यह विरोधाभासी जान पड़ेगा , पर याद रहे कि "निरपेक्ष सत्य एक ही है, सापेक्षिक सत्य अवश्य अनेक" हो सकते हैं।  (This would seem at first to be a contradiction in terms, but we must remember that an absolute truth is only one, while relative truths are necessarily various.) उदाहरण के लिए, इस विश्व -ब्रह्माण्ड के विषय में ही अपने विचारों पर गौर करो। 

-'This universe, as an absolute entity, is unchangeable, and unchanged, and the same throughout. But you and I and everybody else hear and see, each one his own universe.'

यह विश्व एक निरपेक्ष अखण्ड वस्तु है, जिसमें परिवर्तन नहीं हो सकता और न हुआ है। वह सदा एकरस ही है। पर तुम, हम और हर कोई इस विश्व को अलग अलग देखता सुनता है। सूर्य को ही लो। सूर्य एक है, पर जब तुम और हम और सौ अन्य मनुष्य भिन्न भिन्न स्थानों में खड़े होकर सूर्य की ओर देखते हैं , तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति सूर्य को अलग अलग देखता है। स्थान का थोड़ा सा ही अन्तर सूर्य के दृश्य को मनुष्य के लिए भिन्न बना देता है। वातावरण में थोड़ा सा हेरफेर हो जाये तो दृश्य में और भी भिन्नता आ जाएगी। इसी तरह सापेक्ष अनुभवों में सत्य सदा अनेक दिखाई देता है। पर निरपेक्ष सत्य तो एक ही है ! (So, in relative perception, truth always appears various. But the Absolute Truth is only oneआत्मा =  ईश्वर , भगवान, ब्रह्म, सच्चिदानन्द

अतः यदि दूसरे लोग धर्म के बारे में कुछ ऐसा कह रहे हैं जो, धर्म के प्रति हमारी भावना से बिल्कुल मेल नहीं खाता हो, तब भी हमें उनसे लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि परस्पर विपरीत दीखते हुए भी हमारे और उनके दोनों के विचार सत्य हो सकते हैं। (We ought to remember that both of us may be true, though apparently contradictors.)

सूर्य को ही केंद्र मानकर यदि एक वृत्त खींचा जाये , तो ऐसे करोडो अर्धव्यास (Radius-त्रिज्या) हो सकते हैं, जो उसी सूर्य में केन्द्रित हो विलीन हो जाते हैं। दो अर्धव्यास केन्द्र से जितनी दूरी पर होंगे, उन दोनों में उतना ही अधिक अन्तर होगा , परन्तु जब वे केन्द्र में जाकर एक साथ मिलेंगे , तब सारा भेद समाप्त हो जायेगा। ऐसा ही एक 'केन्द्र' है, जो मनुष्य मात्र का 'absolute goal' - परम ध्येय है। वह है ईश्वर (आत्मा, भगवान, ब्रह्म, सच्चिदानन्द)। हम सब अर्धव्यास हैं। इन अर्धव्यासों के बीच का अन्तर ही हमारी संवैधानिक सीमाएँ हैं, जिनमें से होकर ही हम ईश्वर के स्वरुप दर्शन कर सकते हैं। (The distances between the radii are the constitutional limitations through which alone we can catch the vision of God.अवतार-वरिष्ठ के या आत्मा और परमात्मा के सच्चिदानन्द स्वरुप , ब्रह्मस्वरूप का दर्शन कर सकते हैं।) जब तक हमारी अद्वैत-बुद्धि अपने को आत्मा (ईश्वर या भगवान से अभिन्न) नहीं समझ लेती , तब तक हममें से प्रत्येक को उस एक मात्र परमतत्व (Absolute Realityआत्मा , इष्टदेव , काली या अवतार वरिष्ठ) के भिन्न भिन्न दृश्य दिखाई पड़ना अनिवार्य है। अतः ये सभी दृश्य (सम्मोहित बुद्धि की दृष्टि -मति) सत्य हैं , और हमें आपस में झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है।  'The only solution lies in approaching the centre. ' हमारे मतभेदों को सुलझाने का एक मात्र उपाय उस केन्द्र के निकट पहुँचना ही है। बहस या लड़ाई द्वारा यदि हम अपने मतभेदों को दूर करना चाहें , तो सैकड़ों वर्ष तक प्रयत्न करने पर भी हम किसी निर्णय पर न पहुँचेंगे। 'History proves that.'  इतिहास इस बात का साक्षी है। आपसी मतभेदों को सुलझाने का एक मात्र उपाय है - आगे बढ़ना तथा केन्द्र की ओर जाना। और जितनी जल्दी हम ऐसा करेंगे, उतनी ही जल्दी हमारे मतभेद दूर हो जायेंगे। (The only solution is to march ahead and go towards the centre; and the sooner we do that the sooner our differences will vanish.)

अतः 'इष्ट' चयन के इस सिद्धान्त का अर्थ है, हर किसीको अपना धर्म (प्रवृत्ति या निवृत्ति मार्ग) स्वयं चुन लेने की स्वतंत्रता देना। जिसकी उपासना कोई स्वयं करता हो , दूसरे को भी उसी की उपासना करने के लिए विवश नहीं करना चाहिए। सभी प्रकार के मनुष्यों को एक ही झुण्ड में शामिल करने की चेष्टा करना , सभी को भेड़िया -धसान हाँक कर एक ही कोठरी में बन्द करने का प्रयत्न भूतकाल में तो निष्फल हुए ही हैं , भविष्य में भी निष्फल ही होंगे ; क्योंकि प्रकृति की भिन्नता के कारण ऐसा हो सकना या कर सकना असम्भव है। यही नहीं , बल्कि इससे मनुष्य की प्रगति के अवरुद्ध हो जाने की भी सम्भावना है।    

[This theory of Ishta, therefore, means allowing a man to choose his own religion. One man should not force another to worship what he worships. All attempts to herd together human beings by means of armies, force, or arguments, to drive them pell-mell into the same enclosure and make them worship the same God have failed and will fail always, because it is constitutionally impossible to do so.Not only so, there is the danger of arresting their growth. ]

शायद ही कोई ऐसा बिरला पुरुष या स्त्री ऐसी मिले जो किसी न किसी धर्म के पालन की चेष्टा में न लगी हो, पर सन्तोष कितनों को मिला है ? सन्तोष या कुछ पाने वालों की संख्या कितनी अल्प है! How few find anything! And why? Simply because most of them go after impossible tasks. They are forced into these by the dictation of others कितने कम लोगों को कुछ (ईश्वरलाभ)मिल पाता है। और ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि उनमें से बहुतेरे असम्भव कार्यों में हाथ डाल देते हैं। वे इन मार्गों में (प्रवृत्ति या निवृत्ति में) दूसरों के आदेश से जबरदस्ती डाल दिए गए हैं। उदाहरणार्थ, मेरे बचपन में ही मेरे पिता मेरे हाथ में एक छोटी सी पुस्तक दे देते हैं और कहते हैं , ईश्वर इस प्रकार का है और ऐसा ऐसा है। मेरे मन में इन बातों को भर देने का उनका क्या प्रयोजन ? मेरा विकास किस तरह होगा, यह उन्हें क्या मालूम ? मेरी प्रकृति का विकास कहाँ तक हुआ है, यह उन्हें विदित नहीं है, फिर भी वे अपने विचारों को मेरे दिमाग में घुसाना चाहते हैं। फल यह होता है कि मेरे मन का विकास रुक जाता है। 

तुम किसी पौधे को ऐसी जमीन पर नहीं ऊगा सकते , जो उसके उपयुक्त न हो। बालक अपने आप ही सीख लेता है। तुम तो उसे उसके ही मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सहायता मात्र दे सकते हो। तुम उसके मार्ग की कठिनाइयों को दूर कर सकते हो , पर ज्ञान तो उसके अपने स्वभाव से ही उत्पन्न होता है। बालक अपने को स्वयं ही शिक्षा देता है। तुम मेरी बातों को सुनने आये हो। घर जाकर , तुमने जो यहाँ सीखा है तथा यहाँ आने के पूर्व तुम्हारे मन में जो था , उन दोनों का मिलान करो। तब तुमको पता लगेगा कि यही बात तुमने भी सोची थी ; मैंने तो केवल उस बात को प्रकट मात्र किया है। मैं तुमको किसी बात की शिक्षा नहीं दे सकता। शिक्षा तो तुम स्वयं ही अपने को दोगे। मैं तो शायद तुमको अपने उस विचार के प्रकट करने में सहायता ही दे सकूँ। 

आदर्श बहुत से हैं। मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं तुमको बताऊँ कि तुम्हारा आदर्श क्या होना चाहिए ? या कि तुम्हारे गले में कोई आदर्श मढ़ दूँ। मेरा तो यह कर्तव्य होगा कि तुम्हारे सम्मुख मैं इन विभिन्न आदर्शों को रख दूँ , और तुमको अपनी प्रकृति के अनुसार जो आदर्श (नेता) सबसे अधिक अनुकूल जँचे, उसे ही तुम ग्रहण करो और उसी ओर अनवरत प्रयत्न करो।  This is your Ishta, your special ideal.वही तुम्हारा 'इष्ट' है, वही तुम्हारा विशेष आदर्श (नेता -'ध्रुवतारा'-पवित्र त्रयी) है। 

इस तरह हम देखते हैं की 'सामूहिक धर्म ' (congregational religion) कभी नहीं हो सकता। धर्म का यथार्थ कार्य क्या है , यह तो स्वयं सोचने का विषय है। (जब जैसा , तब तैसा , शान्ति चाहो तो दोष मत देखो -----) धर्म के बारे में मेरी अपनी एक भावना है। मुझे उसको पवित्र और गुप्त रखना चाहिए , क्योंकि मैं जानता हूँ कि वही भावना तुम्हारी भी हो , यह आवश्यक नहीं है। दूसरी बात यह कि हर किसी को मैं अपनी भावना के सम्बन्ध में बताकर क्षोभ क्यों फैलाऊँ ? दूसरे लोग आकर मुझसे लड़ेंगे। यदि मैं उन्हें अपने विचार न बताऊँ , तो वे मुझसे लड़ नहीं सकते। पर यदि मैं अपने विचार उन्हें बतलाता फिरूँगा , तो वे अवश्य मेरा विरोध करेंगे। अतः उनके विषय में चर्चा करते फिरने से क्या लाभ ? इस 'इष्ट ' को गुप्त ही रखना चाहिए , क्योंकि यह तो तुम्हारे और ईश्वर के बीच की बात है।    

" भले ही मुझे जीवन भर में केवल आधे दर्जन स्त्री-पुरुष ही अनुयायी मिलें , पर वे लोग सच्चे पुरुष और स्त्री हों , पवित्र और निष्ठावान हों। मुझे झुण्ड के झुण्ड अनुयायी नहीं चाहिए। झुण्डों से क्या लाभ ? संसार का इतिहास कुछ थोड़े दर्जन मनुष्यों से ही बना है। ऐसे मनुष्यों की गणना अँगुलियों पर की जा सकती है। बाकि लोग तो निकम्मे और शोरगुल मचाने वाले ही थे। गुप्त सभाओं और पाखण्डों से पुरुष और स्त्री अपवित्र , दुर्बल और संकुचित बन जाते हैं। दुर्बलों की कोई इच्छाशक्ति नहीं रहती और वे कभी काम नहीं कर सकते। अतः ऐसी चीजों से कोई वास्ता ही न रखो। सब गुप्त रूप में विषय-वासनाएं हैं , मिथ्या रहस्य-प्रेम हैं। "No one who is the least impure will ever become religious." रत्ती भर भी अपवित्रता के रहते मनुष्य धार्मिक नहीं बन सकता। पीब -भरे घावों को गुलाब के फूलों से ढाँकने का प्रयत्न मत करो।  Do you think you can cheat God? None can. क्या तुम समझते हो कि तुम ईश्वर को ठग सकते हो ? ईश्वर को कोई ठग नहीं सकता। Be common, everyday, nice people.तुम सीधे -साधे साधारण मनुष्य बनो। आजकल हर कोई आकर तुमसे अपने को प्रेरित कहता है, और आध्यात्मिकता का दावा करता है। प्रश्न है कि हम दिव्यज्ञान और धोखेबाजी (deception) को कैसे पहचाने ? यथार्थ अन्तःप्रेरणा (दिव्यज्ञान) कभी तर्कशक्ति की विरोधी नहीं होती। 

हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि आत्मा (पवित्र त्रयी) प्रेमस्वरूप है। 'गंगा किनारे बसकर जो पानी के लिए कुआँ खोदता है, वह मूर्ख नहीं तो क्या है ? हीरे की खान के समीप रहते हुए जो काँच की गोलियां ढूँढ़ने में ही सारी जिन्दगी व्यतीत कर देता है , वह सचमुच मूर्ख ही है।

 आत्मा (ईश्वर या ठाकुर) हीरों की खान है। हम सचमुच में मूर्ख हैं , जो भूत -प्रेतों और उसी तरह की अन्य निरर्थक गप्पों के लिये ईश्वर का परित्याग करते हैं। यह एक रोग है , विकृत कामना है। इससे मानव जाति का अधःपतन हो जाता है। ये सब उद्भ्रान्त कथायें स्नायुओं पर अप्राकृतिक रूप से अत्यधिक दबाव पहुँचाती हैं और धीरे धीरे परन्तु निश्चित रूप से इन विषयों से प्रेम रखने रखने वाली जाति को वीर्यहीन बना देती है। ईश्वर, शुद्धता , पवित्रता और धार्मिकता की बातों को छोड़कर इन निरर्थक मूर्खता भरी बातों के पीछे दौड़ना घोर पतन है। दूसरों के विचारों को जान लेने के लिए उत्कण्ठित रहना ! यदि मैं लगातार 5 मिनट दूसरों के विचारों को एक साथ जान लूँ , तो मैं पागल हो जाऊँगा।   अतः शक्तिशाली बनो, उठो और प्रेम रूपी ईश्वर की खोज करो। यही सर्वोच्च बल है। पवित्रता की शक्ति से बढ़कर कौन सी शक्ति श्रेष्ठ हो सकती है ? प्रेम और पवित्रता ही दुनिया के शासक हैं। ईश्वर का यह प्रेम बलहीनों द्वारा प्राप्य वस्तु नहीं है। अतः शारीरिक , मानसिक , नैतिक और आध्यात्मिक किसी प्रकार से दुर्बल मत बनो। केवल आत्मा ही सत्य है। अन्य सब कुछ असत्य है। अतएव आत्मा (इष्ट को चाहने) के लिए अन्य सभी वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए। सब कुछ व्यर्थ है, सब कुछ असारों का असार है। केवल ईश्वर और ईश्वर की ही सेवा करो ! [ प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, इस दृष्टि में निरन्तर प्रतिष्ठित रहते हुए - उस अन्तर्निहित ब्रह्मत्व (निःस्वार्थपरता) को अभिव्यक्त करते हुए तुम स्वयं पूर्ण निःस्वार्थी मनुष्य बनो और दूसरों को भी निःस्वार्थी मनुष्य बनने में सहायता करो -'Be and Make ' यही तुम्हारा ध्येय मंत्र रहे ! नेता को माँ के समान अमजद और शरत दोनों की माँ बनकर ह्रदय में विराजित आत्मा , इष्ट, अवतार वरिष्ठ सत्य (सारदा माँ) पवित्र त्रयी जैसी प्रेम की मूर्ति बनो और बनाओं ।[ The Lord alone is true. Everything else is untrue; everything else should be rejected for the salve of the Lord. Vanity of vanities, all is vanity.  ब्रह्मैव इदं सर्वं,आत्मैव इदं सर्वं। प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय में विराजित 'इष्ट' (पवित्र त्रयी) ही उसकी आत्मा हैं ! Serve the Lord and Him alone. ] 

We must always remember that God is Love.  Be strong and stand up and seek the God of Love. This is the highest strength. What power is higher than the power of purity? Love and purity govern the world. This love of God cannot be reached by the weak; therefore, be not weak, either physically, mentally, morally or spiritually. The Lord alone is true. Everything else is untrue; everything else should be rejected for the salve of the Lord. Vanity of vanities, all is vanity. Serve the Lord and Him alone.

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[https://ramanujramprapnna.blog/2018/02/27/praptti-sharanagai-nyaas/

अहं मुमुक्षु शरणं प्रपद्ये  ! 

 शरणागति :

 जब व्यक्ति यह समझता है कि वो खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ है (क्योंकि कर्म, ज्ञान एवं भक्ति से हीन) है और भगवान के अलावा कोई और उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं। तब वह (विवेकी सम्पन्न बुद्धि, दृष्टि या शुद्ध मति से युक्त होकर) असहाय भाव से भगवान को (अर्थात अपने ही हृदय में विराजित आत्मा, ईश्वर या अवतार वरिष्ठ ठाकुर, माँ और स्वामी जी रूपी 'पवित्र त्रयी' को एकमात्र अपना सहारा समझकर) रक्षा करने को पुकारता है। मन या अन्तःकरण कि इस अवस्था को (और देह -इन्द्रियों को ही 'real I' या स्वयं M/F समझने वाली तृष्णा से सम्मोहित और त्रस्त मूढ़/ बुद्धि या मति की इस शुद्ध पवित्र बुद्धि बनने की इस इच्छा) को शरणागति (शरणं आगति) कहते हैं।

   अपनी हार स्वीकार कर भगवान से उपाय बनने की विनती करना ही उपाय है ['अहं बुद्धि' - खुद तो जड़ है, अपनी हार स्वीकार कर आत्मा से या पवित्र त्रयी से  उपाय बनने की विनती करना ही उपाय है।) ‘उप समीपे अयते इति उपायः’। जो कर्म लक्ष्य के करीब ले जाए उसे उपाय कहते हैं। शरणागति में तत्त्व 'नारायण' हैं (अवतार वरिष्ठ ठाकुर, माँ , स्वामीजी हैं) , पुरुषार्थ (करने वाला) भी नारायण (ठाकुर, माँ , स्वामीजी का दास और अंश) हैं और हित (उपाय) भी नारायण (मानवता के कल्याण के लिए अवतरित ठाकुर, माँ , स्वामीजी) ही हैं। 

प्रपत्ति शब्द दो मूल धातु से बना है- ‘प्र’ और ‘पद’। ‘प्र’ का अर्थ है ऊँचा और ‘पद’ यानि कदम। अर्थात सर्वोच्च की ओर कदम बढ़ाना ही प्रपत्ति है।

अपनी आत्मा को परमात्मा को सौंप देना ही शरणागति (आत्म-निक्षेप) है। 

[आत्मा आत्मीय भरण्यासो हि आत्मनिक्षेप उच्यते।। (लक्ष्मी तंत्र 17.29) 

अपनी आत्मा अर्थात छः इन्द्रिय रूपी घोड़ों की लगाम वाले नश्वर-देह रूपी रथ की सारथि शुद्ध बुद्धि को रथ में सवार  रथी -अविनाशी आत्मा (ईश्वर , भगवान पवित्र त्रयी को) सौंप देना ही शरणागति (आत्म-निक्षेप) है।] 

प्रमाण

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन।

        यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥

{मुण्डक उपनिषद (3.2.3) और कठोपनिषद (1.2.23)}

श्री रामानुजाचार्य जी , इस श्लोक की व्याख्या करते हुए, अपने लघु सिद्धांत में लिखते हैं:  यथा अयं प्रियतमः आत्मानम् प्राप्नोति, तथा भगवान स्वमेव प्रयतत इति भगवतैव उक्तं।"

अर्थ: जैसे हम अपने प्रियतम को स्वयं प्रयत्न कर प्राप्त करते हैं, वैसे ही भगवान स्वयं, अपनी निर्हैतुक कृपा से, शरणागत जीवात्मा को अपना लेते हैं।  एक शरणागत को भगवत-प्राप्ति हेतु अपनी ओर से कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना भगवान की निर्हैतुक कृपा में बाधा होगा।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

      तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।

 (गीता 8.14)

जो पुरुष मुझ में अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, जो मेरे साथ निरंतर संपर्क चाहता है, उसे मैं सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।

उस नित्ययुक्त योगी के लिए आत्मप्राप्ति सहज साध्य होती है जो मुझ चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनन्यभाव से नित्यप्रतिदिन स्मरण करता है। अनन्यचित्तवाला अर्थात् जिसका चित्त अन्य किसी भी विषयका चिन्तन नहीं करता ऐसा जो योगी सर्वदा निरन्तर प्रतिदिन मुझ परमेश्वर का (अवतार वरिष्ठ का)  स्मरण किया करता है। यहाँ सततम् इस शब्द से निरन्तरता का कथन है और नित्यशः इस शब्द से दीर्घकाल का कथन है अतः यह समझना चाहिये कि छः महीने या एक वर्ष ही नहीं किंतु जीवन-पर्यन्त जो निरन्तर मेरा स्मरण करता है। हे पार्थ उस नित्यसमाधिस्थ योगी के लिये मैं सुलभ हूँ। अर्थात् उसको मैं अनायास प्राप्त हो जाता हूँ। जब कि यह बात है इसलिये ( मनुष्यको ) अनन्य चित्त वाला होकर सदा ही मुझमें समाहितचित्त रहना चाहिये। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अत्यन्त सावधानी से विशेष बल देकर आग्रह करते हैं कि यह आत्मानुसंधान या ईश्वर स्मरण नित्य निरन्तर और अखण्ड होना चाहिये। उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न योगी को हे अर्जुन मैं सुलभ हूँ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

।।18.66।। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।। 

इसमें सन्देह नहीं है कि गीता के कतिपय श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण ने साधकों को किसी निश्चित जीवन पद्धति का अवलम्बन करने का आदेश दिया है,  और यह भी आश्वासन दिया है कि वे स्वयं उनका उद्धार करेंगे। उद्धार का अर्थ ही भगवत्स्वरूप की प्राप्ति है। परन्तु इस श्लोक के समान कहीं भी उन्होंने इतने सीधे और स्पष्ट रूप में अपने भक्त के मोक्ष (अर्थात भगवत्स्वरूप की प्राप्ति)  के उत्तरदायित्व को स्वीकार करने की अपनी तत्परता व्यक्त नहीं की हैं।  

 श्री रामानुजाचार्य के अनुसार सम्पूर्ण गीता का यह चरम श्लोक है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में प्रयुक्त धर्म शब्द की सरल और संक्षिप्त परिभाषा है अस्तित्व का नियम। किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण वस्तु का वस्तुत्व सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ,  वह गुण उस वस्तु का धर्म कहलाता है। उष्णता के कारण अग्नि का अग्नित्व सिद्ध होता है,  उष्णता के अभाव में नहीं,  इसलिए अग्नि का धर्म उष्णता है। 

जगत् की प्रत्येक वस्तु के दो धर्म होते हैं (1) मुख्य धर्म और (2) गौण धर्म।  गौण धर्मों के परिवर्तन अथवा अभाव में भी पदार्थ यथावत् बना रह सकता है, परन्तु अपने मुख्य (स्वाभाविक) धर्म का परित्याग करके क्षण-मात्र भी वह नहीं रह सकता। अग्नि की ज्वाला का वर्ण या आकार अग्नि का गौण धर्म है, जबकि उष्णता इसका मुख्य धर्म है। किसी पदार्थ का मुख्य धर्म ही उसका धर्म होता है।

सर्वधर्मान् परित्यज्य (सब धर्मों का परित्याग करके) हम देख चुके हैं कि अस्तित्व का नियम धर्म है और कोई भी वस्तु अपने धर्म का त्याग करके बनी नहीं रह सकती। और फिर भी यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को समस्त धर्मों का परित्याग करने का उपदेश दे रहे हैं। क्या इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म की हमारी परिभाषा त्रुटिपूर्ण हैं ? अथवा क्या इस श्लोक में ही परस्पर विरोधी कथन है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। 

(विवेकज-ज्ञान या ) आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण ही मनुष्य अपने नश्वर शरीर मन और बुद्धि से तादात्म्य करके एक परिच्छिन्न,  र्मत्य जीव का जीवन जीता है।  इन उपाधियों से तादात्म्य के फलस्वरूप उत्पन्न कर्ता , भोक्ता रूप जीव (M/F) नाम-रूप धारी व्यक्ति ही संसार के दुखों को भोगता है।  वह शरीरादि उपाधियों के जन्म-मरणादि धर्मों को अपने ही धर्म समझता है। परन्तु वस्तुत ये हमारे शुद्ध स्वरूप के धर्म नहीं हैं। वे गौण धर्म होने के कारण उनका परित्याग करने का यहाँ उपदेश दिया गया है। 

इनके परित्याग का अर्थ अहंकार (मिथ्या M/F अहं से सम्मोहित मूढ़ बुद्धि) का नाश ही है। इसलिए समस्त धर्मों का त्याग करने का अर्थ हुआ कि शरीर, इन्द्रिय , मन और बुद्धि की जड़ उपाधियों के साथ हमने जो आत्मभाव से तादात्म्य किया है अर्थात् उन्हें ही अपना स्वरूप समझा है,  उस मिथ्या तादात्म्य का त्याग करना। अपने एकमेव अद्वितीय सच्चिदानन्द आत्मा (इष्टदेव-अवतार वरिष्ठ) के ध्यान के द्वारा हम अनात्म उपाधियों से अपना तादात्म्य त्याग सकते हैं।

 संक्षेप में कोई भी कर्म मनुष्य के अन्तकरण में वासनाओं को अंकित करते जाते हैं  जिन से प्रेरित होकर मनुष्य बारम्बार कर्म में प्रवृत्त होता है। शुभ वासनाएं शुभ विचारों को जन्म देती हैं,  तो अशुभ वासनाओं से अशुभ विचार ही उत्पन्न होते हैं। वृत्ति रूप मन है अतः जब तक शुभ या अशुभ वृत्तियों का प्रवाह बना रहता है , तब तक मन का भी अस्तित्व यथावत् बना रहता है। इसलिए वासनाक्षय का अर्थ ही वृत्तिशून्यता है, और यही मनोनाश (मिथ्या अहं M/F जड़ बुद्धि का नाश) भी है। मन और बुद्धि के अतीत हो जाने (इन्द्रियातीत सत्य का साक्षात्कार करने)  का अर्थ ही शुद्ध चैतन्य स्वरूप कृष्णतत्व (अवतारवरिष्ठ तत्व - त्रयी का सारदा तत्व प्रेम तत्व का शुद्ध बुद्धि) क्षात्कार करना है। जिस मात्रा में एक साधक अनात्मा से तादात्म्य का त्याग करने और आत्मानुसंधान करने में सफल होता है,  उसी मात्रा में वह इस आत्मदर्शन (विवेकदर्शन अभ्यासेन  -विवेक-श्रोत उद्घाटित अवस्था ) को प्राप्त करता है। 

इस दृष्टि से मनुष्य का  मुख्य धर्म क्या है ? सिद्धान्त है की जो वस्तु जितना सूक्ष्म होता है, उसकी शक्ति उतनी अधिक होती है।  देह से सूक्ष्म है (अन्तःकरण) इन्द्रिय , मन , बुद्धि  - किन्तु नश्वर होने के कारण ये सब मनुष्य के गौण धर्म है ;  जबकि उसका वास्तविक धर्म (केवल मनुष्य की विशिष्ट योग्यता) है चैतन्य-स्वरूप अविनाशी आत्मतत्त्व का (विवेकज) ज्ञान है। यही आत्मा समस्त जड़ उपाधियों को (जड़ बुद्धि तक को) सत्ता और चेतनता प्रदान करता है। इस आत्मा के बिना मनुष्य का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। इसलिए मनुष्य का वास्तविक धर्म है सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म जो कुछ नाम से पुकारें) जिसके बिना उसका अस्तित्व नहीं रहता।

यद्यपि भारत कल्याण की इच्छा द्वारा प्रेरित जीवन के समस्त कर्तव्य जीवन -गठन , चरित्र-निर्माण , नैतिकता, सदाचार, श्रद्धा, दान, सेवापरायणता आदि चरित्र के गुणों  को सूचित करने के लिए भी धर्म शब्द का प्रयोग किया जाता है;  तथापि मुख्य धर्म (आत्मा या ईश्वर लाभ) की उपयुक्त परिभाषा को समझ लेने पर इन दोनों का भेद स्पष्ट हो जाता है। सदाचार आदि को भी धर्म कहने का अभिप्राय यह है कि उनका पालन हमें अपने शुद्ध धर्म का बोध कराने में सहायक होता है। उसी प्रकार सदाचार या चरित्र के गुणों (निःस्वार्थपरता आदि) के माध्यम से ही मनुष्य का शुद्ध स्वरूप-  (Inherent Divinity ) उसका अन्तर्निहित ब्रह्मत्व अभिव्यक्त होता है। इसलिए हमारे धर्मशास्त्रों में ऐसे सभी शारीरिक, मानसिक एवं ह्रदय विकास- (3H विकास के 5 अभ्यास) या चरित्र के गुणों को (शुद्धता , सभ्यता , सहनशीलता) आदि को जीवन और आचरण में व्यक्त करनेके 'चार योग' को भी धर्म की संज्ञा दी गयी है, जो आत्मसाक्षात्कार में सहायक होते हैं।

राज योग (मनःसंयोग) के साधकों को तीन गुणों को सम्पादित करना चाहिए। वे हैं (1) ज्ञानपूर्वक ध्यान के द्वारा सब धर्मों (कर्तव्यों) का त्याग (या अनासक्ति।) (2) मेरी शरण में आना यानि आत्मा (ईश्वर या इष्टदेव या अवतार वरिष्ठ की ही शरण में आना) और (3) चिन्ता व शोक का परित्याग करना। इस साधना का पुरस्कार है - मोक्ष ! मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा।  

   भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा यह आश्वासन मानव-मात्र के लिये दिया गया है। [और स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण ही पहले राम और कृष्ण बनकर अवतरित हुए थे, और इस अवतार वरिष्ठ अवतार में उन्होंने राधापति , सीतापति होने की साधना करने के साथ-साथ इस्लाम और ईसाई मार्ग से भी साधना =Be and Make की थी। ] इसीलिए गीता एक सार्वभौमिक धर्मशास्त्र है यह मनुष्य की बाइबिल है,  मानवता का कुरान और हिन्दुओं का शक्तिशाली धर्मग्रन्थ भी है। 

         कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ 

(रामचरितमानस) 

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। 

यहाँ सन्मुख होने का अर्थ शरणागति है। 

उपाय को दो भागों में वर्गीकरण किया गया है:

१) साध्योपाय: (बांदरी का बच्चा ) वह उपाय जो हमारे द्वारा स्थापित किया जाये और हमारे द्वारा क्रियाशील हो। इसे स्वगत स्वीकारा भी कहते हैं क्योंकि इस उपाय में हम अपने प्रयत्नों द्वारा भगवान तक पहुँचने का प्रयत्न करते है। उदाहरण स्वरुप बांदरी का बच्चा जो स्वयं उछलकर अपने माँ को पकड़ता है। कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग साध्योपाय है।

२) सिद्धोपाय: (बिल्ली का बच्चा ) 

वह उपाय जो पहले से स्थापित है और हमें सिर्फ उसका चुनाव करना है। इस उपाय में हमारे भगवान तक पहुँचने का उत्तरदायित्व भगवान पर ही होता है और भगवान ‘सत्य-संकल्प’ हैं, कभी भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं चूकते। उदाहरण स्वरुप बिल्ली का बच्चा जिसे पकड़कर ले जाने की जिम्मेदारी स्वयं बिल्ली की है। शरणागति सिद्धोपाय है। शरणागति भी भक्ति ही है पर भक्ति योग में भक्ति उपाय है और शरणागति में स्वयं भगवान ही उपाय हैं। एक शरणागत कर्म, ज्ञान, भक्ति सबका अनुशीलन करता है पर उपाय के तौर पर नहीं बल्कि सिर्फ भगवान के मुखोल्लाष के लिये। इस मार्ग में सफलता कि 100 %  गारंटी है क्योंकि बांदरी का बच्चा शायद चूक भी जाए अपनी माँ को पकड़ने में, पर बिल्ली अपने बच्चे को सुरक्षित उस पार करने में कभी नहीं चुकती। 

 कर्म और ज्ञान योग भक्ति योग के ही दो अंग हैं। ज्ञानयुक्त कर्म ही भक्ति की ओर ले जाता है। भक्ति योग में मन, बुद्धि और शरीर निर्बाध भगवान की ओर होने चाहिए (अनन्य चिंतयतो माम; सततं कीर्तयन्तो माम)। प्रपत्ति शरणागति मार्ग की सबसे बड़ी परेशानी यह है की मानसिक रूप से एक शरणागत के ढाँचे में ढलना मुश्किल है; और दूसरा यह की हमें शरण्य (भगवान) के प्रति यह अटूट श्रद्धा होनी चाहिए की वो (1992 में ऊँच बनारस पुलिया पर पहले के समान) अवश्य हमारी रक्षा करेंगे। लेकिन एक बार शरणागत होने के बाद आगे का मार्ग अत्यंत सुगम हो जाता है।

उदाहरणस्वरुप छत पर जाने के दो उपाय हैं। एक तो सीढियों के द्वारा और दूसरा लिफ्ट से। सीढ़ी से चढ़ना साध्योपाय है क्योंकि व्यक्ति को अपने सामर्थ्य पर भरोसा है। लिफ्ट के द्वारा जाना सिद्धोपाय है क्योंकि लिफ्ट का उपयोग करने का अर्थ ही है की हमने अपनी हार स्वीकार कर ली है कि हम अपने स्वयं के प्रयास से छत पे चढ़ने में असमर्थ हैं।  और दूसरा की हम जल्दी से जल्दी छत पे जाना चाहते हैं। इस उदाहरण में लिफ्ट भगवान हैं और लिफ्टमैन गुरु। हमें लिफ्ट और लिफ्टमैन पर पूर्ण विश्वास होने की जरुरत है।

विष्णु स्तुति

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

तस्मात्कारुण्यभावेन रक्षस्व परमेश्वर ।।

अर्थ : आपके सिवा मेरे और कोई आधार नहीं , हम आपके शरणागत हैं । अतः हे परमेश्वर अपनी करुणा बरसा कर मेरी रक्षा करें !

शरणागत होने के लिये पूर्वापेक्षा (Prerequisites for Surrender) 

यूँ तो प्रपत्ति में सभी तरह से अयोग्य होना ही सबसे बड़ी योग्यता है, फिर भी आचार्य कुछ पूर्वापेक्षा बताते हैं। ये पूर्वापेक्षा को उपाय मान लेना भारी भूल होगी। भगवान को (अवतार वरिष्ठ को) अपना रक्षक/उपाय स्वीकार करना चेतन (आत्मा) का चैतन्य -कार्य (सारथि -शुद्ध बुद्धि)  है इसके बिना भगवान रक्षा नहीं करते। 

1) स्वाधिष्ठे अनन्यसार्थे (निराश्रयता):- आकिंचन्यम: शरणागति ‘अहंकार, ममत्व और स्वातंत्र्य’ का त्याग है। 

इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हर व्यक्ति अपने-अपने अलग अलग प्रकार के अभिमान के साथ जी रहा है। अहंकार त्याग (M/F सम्मोहित मूढ़बुद्धि)  करने की मुश्किल के कारण ही शरणागति मुश्किल दृष्टिगोचर होती है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए की सर्वोत्तम तत्त्व क्या है, सर्वोत्तम पुरुषार्थ क्या है और उसका उपाय क्या है। 

  अगर मैं अपने प्रयासों से मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम होता तो कई हजार वर्ष पहले ही कर चूका होता। आकिंचन्यम का अर्थ है अपने आप को कर्म, ज्ञान और भक्ति से हीन समझना और पछताते हुए भगवान से उपाय बनने की प्रार्थना करना। “हे श्रीमन नारायण! मैं सभी साधनों से हीन हूँ पर मैं आपके दिव्य धाम में आपके नित्य कैंकर्य की प्रार्थना करता हूँ कृपया अपने अहैतुकी कृपा से मुझे मोक्ष प्रदान करें।

 अनन्य-गतित्वं : इस बात का पूर्ण विश्वास की भगवान के अलावा कोई और हमारी मदद नहीं कर सकता। लोकाचार्य स्वामी बताते हैं की यदि पिता रक्षक होते तो हिरण्यकशिपू ने प्रह्लाद की रक्षा की होती। यदि माता रक्षक होती तो कैकेयी ने भरत की रक्षा की होती, यदि भाई रक्षक होता तो रावण ने विभीषण की रक्षा की होती। यदि पति रक्षक होते तो द्रौपदी के पाँच महाबली पतियों ने उनकी रक्षा की होती।

यदि हम स्वयं अपने रक्षक होते तो गजराज ने ग्राह से स्वयं की रक्षा की होती। इन सभी की रक्षा श्रीमन नारायण ने ही की इसलिए श्रीमन नारायण ही एकमात्र रक्षक हैं। (अवतार वरिष्ठ के अतिरिक्त) अन्य देवताओं के पास इस भाव से जाना की वो हमारी रक्षा करेंगे, यह शरणागति के प्रतिकूल है। शिव, इंद्र आदि देवता स्वयं संसार-मंडल में फंसे हैं अपनी रक्षा के लिये श्रीमन नारायण पर आश्रित हैं।

2) महाविश्वास : श्रीमन नारायण पर यह पूर्ण विश्वास की वो अवश्य ही हमारी रक्षा करेंगे। अगर महाविश्वास न हो तो फिर शरणागति का अर्थ ही क्या है।

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥5॥

भावार्थ- तथा श्री राम जी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाता है॥5॥

संसारकूपे पतितोऽत्यागाधे, मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते।

करावलम्बं मम देहि विष्णो, गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे गोविन्द! दामोदर! माधव! मैं मोह रूपी अंधकार से व्याप्त और समस्त विषयों की ज्वाला (दावाग्नि) से संतप्त इस संसार रूपी गहरे अंधे कुएँ में (बिना पेंदी के कुएं में) पड़ा हूँ। हे विष्णो! आप मेरा हाथ पकड़कर इस कुएँ से बाहर निकालिए। मुझे अपने हाथ का सहारा दीजिये, मैं अपने प्रयत्न से बाहर नहीं निकल सकता

प्रश्न ) : भगवान हमारे ‘उपाय’ (solution) बनने को क्यों तैयार होंगे?

उत्तर): जीवात्मा एवं भगवान के मध्य स्वं-स्वामी सम्बन्ध है। भगवान मालिक (Owner) हैं एवं जीव उनका माल (property-सोना आँख की पुतली) है। मालिक का कर्तव्य है अपने माल के दोषों को दूर कर (rectify-शुद्ध करके, सुधार) उसे प्राप्त करना। किन्तु भगवान तब तक हमें प्राप्त करने में विलम्ब करते हैं, जबतक हम स्वयं उन्हें उपाय न स्वीकार कर लें।  यही हमारे ज्ञान का उपयोग है। वस्तुतः, शरणागति भी भगवद-कृत है।  अनादि काल से भगवान के प्रयत्नों का ही फल है कि जीव के ह्रदय में भगवान के प्रति अद्वेष उत्पन्न हो जाता है| फिर धीरे धीरे जीव भगवान के अभिमुख होता है।  जीव के अभिमुख होने पर भगवान उसे साधू-समागम प्रदान करते हैं।  ऐसे जीवात्मा को जब भगवान गर्भकाल में जायमान-कटाक्ष (divine glance) प्रदान कर देते हैं, तब वो मुमुक्षु हो जाता है।  ऐसे मुमुक्षु को आचार्य के शरण में शरणागति करवा कर भगवान उस जीव को मोक्ष प्रदान करते हैं। 

भगवान हमेशा ही हमारे उपाय बनने को उत्सुक रहते हैं पर हमें अपने (अनित्य नाम-रूप ??) बल, बुद्धि और सामर्थ्य पर विश्वास होता है। हम भगवान से पृथक हो इस संसार का आनंद लेना चाहते हैं, इसलिए भगवान हमारे ‘उपाय’ नहीं बनते। जबतक हम अपनी  हार स्वीकार कर भगवान से असहाय अवस्था में प्रार्थना नहीं करेंगे तबतक भगवान हमारे उपाय कैसे बन सकते हैं। (गजेन्द्र और द्रौपदी का उदाहरण )

कोई कंजूष से महा-कंजूष व्यक्ति ही क्यों ना हो, यदि कोई भिखारी उसका चरण पकड़ ले तो वह कुछ न कुछ भीख अवश्य देगा तो फिर अपार-वात्सल्यमय भगवान हमारे उपाय बनने को तैयार क्यों नहीं होंगे। एक मालिक अपने कर्मचारियों को उनके योग्यता के अनुसार ही वेतन देता है पर यदि कोई उसके आगे दंडवत हो जाये और अपनी लाचारी जताए तो मालिक बिना किसी योग्यता के कुछ रुपये अवश्य देगा। इसी तरह हमारे कर्म, ज्ञान और भक्ति हीन होने के वावजूद भी हमें मोक्ष अवश्य प्रदान करेंगे अगर हम उनके चरणों का आश्रय लें। ऐसा स्वयं भगवान की प्रतिज्ञा है। जिस तरह एक बछड़ा के धूल में लिपटे होने के वावजूद गाय उसे चाट-चाटकर साफ करती है, उसी प्रकार भगवान भी अपने शरणागतों के दोष और पूर्व के संचित पाप नहीं देखते।

1. प्रश्न :  क्या शरणागति उपाय है?[Question: Is surrender a means to salvation?]  

उत्तर) वास्तव में शरणागति उपाय नहीं योग्यता (व्याज-Interest-सूद) है। उपाय तो केवल श्रीमन्नारायण की अहैतुकी कृपा (unconditional grace) है। चेतन प्राणी (conscious beings- विवेकशील मनुष्य) होने के कारण हमसे यह अपेक्षा है कि हम भगवान को उपाय (means) एवं उपेय (end-अमरत्व) मान अपनी रक्षण का भार उन्हें सौंप दें। 

[Question: Is surrender a means to salvationअर्थात क्या शरणागति 'मोक्ष' (चौथा पुरुषार्थ) प्राप्त करने का एक साधन (उपाय-a means to salvation) है ? यदि है तो फिर उद्धरेत आत्मा आत्मानं - क्या है? बुद्धि को आत्मा में समर्पित करना ही शरणागति है। Answer) In reality, surrender is not a means to an end, but rather a qualification (or prerequisite). असल में शरणागति जीवन का मुख्य लक्ष्य आत्मा (इन्द्रियातीत सत्य, ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) को प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक योग्यता (या ज़रूरी शर्त) है(अर्थात M/F रूपी सम्मोहित अहंबुद्धि या मूढ़बुद्धि का देह-इन्द्रियों के पीछे न जाकर का 'सारथि बुद्धि' ईश्वर-प्रेरित बुद्धि बनकर शरीर रूपी रथ में बैठे रथी आत्मा के प्रति समर्पण है) मनुष्य जीवन का लक्ष्य (इन्द्रियातीत सत्य) को पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक योग्यता (या ज़रूरी शर्त) है। 'सचेत प्राणी'  विवेकी मनुष्य होने के नाते, हमसे यह उम्मीद की जाती है कि हम भगवान को साधन (माध्यम) और लक्ष्य (अमरत्व) दोनों मानें, और अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दें। ]

सवाल-2.) क्या कोई भी शरण्य बन सकता है? [Question: Can anyone become a refuge सहारा, आश्रय (गुरु) ? sanctuary-शरण स्थान, refuge 

उत्तर) एक आदर्श शरण्य के पास निम्न दो गुण होने चाहिए:

१) परत्वं : जिसके जोड़ का दूसरा कोई न हो। 

[1) सर्वश्रेष्ठ - अनित्य /नश्वर देह, इन्द्रिय , मन , बुद्धि से परे है - नित्य /अविनाशी आत्मा (सत्य, ईश्वर , ब्रह्म, सच्चिदानन्द) Supremacy: That which has no equal.अनुपम ] 

२) सौलभ्यम: जो सर्व-सुलभ हो [ भगवान (=आत्मा, ईश्वर, अवतार वरिष्ठ की मूर्ति या पवित्र त्रयी) अन्तर्यामी (indwelling spirit)अर्चा (प्रेम-मूर्ति- the idol) और आचार्य (spiritual teacher) के रूप में सर्व-सुलभ हैं)

सवाल-3.) क्या शरणागति कोई भी कर सकता है? [Question: Can anyone surrender to God? सवाल: क्या भगवान के सामने कोई भी आत्मसमर्पण कर सकता है?]

उत्तर): हाँ। शरणागति में जाति, कुल, रंग, जन्म आदि का कोई भेद नहीं है। शबरी (शूद्र वर्ण में जन्म); निषाद, सुग्रीव (बन्दर), विभीषण (राक्षस), विदूर (दासीपुत्र) इत्यादि उदाहरण हैं।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।9.32।।

“हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डाल आदि, जो कोई भी हो; वे भी मेरी शरण में आकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं”।

इस श्लोक के द्वारा भगवान् वचन देते हैं कि अनन्य भक्ति तथा आत्मस्वरूप के सतत् निदिध्यासन से न केवल दुराचारी लोग वरन् जन्म से ही किसी प्रकार की मानसिक और बौद्धिक हीनता के शिकार हुए लोग भी सफलतापूर्वक आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। 

स्त्रियों, वैश्यों और शूद्रों को पापयोनि में जन्मे हुए कहकर उनकी निन्दा करने का अर्थ यह होगा कि धर्म का इष्ट प्रभाव समाज के केवल कुछ मुट्ठी भर लोगों पर ही है।  ऐसा समझना माने प्रारम्भ से भगवान् श्रीकृष्ण जिस सिद्धांत का प्रतिपादन बारम्बार बल देकर कर रहे हैं, उस सबको नकारना हैं। इसलिए यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के शब्दों के वास्तविक अभिप्राय को हमें समझना होगा।

ऐसी सभी साधनाओं में सबसे अधिक प्रभावशाली साधना है उपासना अर्थात् भक्तिपूर्ण हृदय से आत्मा (ईश्वर, भगवान, पवित्र त्रयी) का अखण्ड स्मरण करना। वेदान्त का यह घोषणा है कि उपासना के द्वारा बुद्धि की शुद्धि होती है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

विकास की जिस उन्नति को धर्म लक्ष्य के रूप में इंगित करता है उसमें शरीर के लिंग जाति आदि से किञ्चिन्मात्र प्रयोजन नहीं है। आध्यात्मिक साधनाओं का प्रयोजन शरीर, इन्द्रिय मन और बुद्धि को सुगठित करना है जो विकास की अपनी परिपक्व अवस्था में स्वयं स्थिर हो जाती है (मूढ़बुद्धि स्वयं शुद्धबुद्धि बन जाती हैऔर फिर आत्मा सर्वोपाधिविनिर्मुक्त होकर स्वमहिमा में प्रतिष्ठित रहता है। 

भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने युग में सर्वपरिचित शब्दों के उपयोग के द्वारा अन्तकरण के विशेष गुणों को इंगित किया है। यहाँ स्त्रियों से तात्पर्य स्त्री के समान मन से है। ऐसे मन के लोग अत्यन्त भावुक प्रवृत्ति के होते हैं तथा जगत् की वस्तुओं में उनकी अत्यधिक आसक्ति होती है। इसी प्रकार समाज में अनेक लोग अपने विचारों एवं कर्मों में व्यापारिक वृत्ति के होते हैं। ऐसी गणना करने वाला और सदा अधिका-धिक लाभ की आशा लगाये रहने वाला मन ध्यानयोग के द्वारा विकसित होने योग्य नहीं होता है। वैश्यों की निन्दा की जाती है?  मन की वैश्य वृत्ति की निन्दा समझनी चाहिए। अन्त में शूद्र शब्द के द्वारा आलस्य,  निद्रा और प्रमाद जैसी मन की वृत्तियों को दर्शाया गया है। 

मन को स्थिर करके क्षणभर के लिए सारभूत अनन्तस्वरूप में जीवन्त रहने का एकमात्र उपाय है सब कर्मों को ईश्वरार्पण कर देना। 

हरि भक्तिविलास में (११.६७६) कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि का वर्णन हुआ है-

शरणागति के 6 अंग

आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् ।

रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा ।

आत्मनिक्षेप कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः ॥

१) भगवान के अनुकूल कर्म करना 

(1) Performing actions that are pleasing to God.

२) भगवान के प्रतिकूल कर्म का परित्याग

2) Abandoning actions that are contrary to God's will.

३) यह विश्वास की भगवान अवश्य हमारी रक्षा करेंगे

3) This is the belief that God will surely protect us.

४) भगवान से शरणागति की प्रार्थना करना, दैन्यभाव (गोप्तृत्वे वरणं)

4) Praying for surrender to God, devotion (goptritve varanam-'गोप्तृत्वे' का अर्थ है रक्षा करने वाला/संरक्षक, और 'वरणं' का अर्थ है स्वीकार करना।यह प्रपत्ति (आत्मसमर्पण) का एक प्रमुख अंग है, जहाँ भक्त पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के संरक्षण में सौंप देता है, यह मानते हुए कि वे ही रक्षा करेंगे। )

५) स्वयं को कर्म, ज्ञान और भक्ति से हीन समझना (कार्पण्यं)

5) Considering oneself inferior in action, knowledge and devotion (karpanyam)

६) आत्मा (शुद्धबुद्धि)  जो की आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) की सम्पत्ति है, भगवान को वापस सौंप देना। आत्मनिक्षेप (Aatmanikshep) 

आत्मनिक्षेप - का अर्थ है अपनी बुद्धि को आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म -सच्चिदानन्द)  की धरोहर (trust -अमानत) मानकर उन्हें पूरी तरह सौंप देना।

Aatmanikshep means considering one's intellect as a trust from the Self (God, Lord, or Brahman - the absolute reality) and completely surrendering it to Him.]

कहानी: परकाल सूरी आलवार एक बार जब शालिग्राम गए थे, जहाँ विश्व का सबसे गहरा दर्रा है, उन्होंने देखा की दो कीड़े आपस में बात कर रहें हैं। पहले कीड़े ने कहा मैं दर्रे के उस पार सामने वाली पहाड़ी पे जाउँगा। दुसरे कीड़े ने मानने से इनकार कर दिया। एक कीड़े की आयु ही कितनी होती एक पहाड़ से उतरकर दूसरे पहाड़ पर चढ़ने में तो उसके कई जन्म बीत जायेंगे। दोनों में शर्त लगी। पास ही एक शेर छलाँग लगाने को था। उस कीड़े ने अपने को उसके पैरों के सामने कर लिया और वो शेर के पैर से चिपका हुआ उस पार चला गया। यही शरणागति है। सभी प्रकार से मोक्ष के अयोग्य होने के वावजूद भी अगर हम श्रीमन नारायण (अवतार वरिष्ठ) के चरणों का आश्रय लें तो श्रीमन नारायण अवश्य ही हमें परमपद देंगे।

टिप्पणी:- नारायण के प्रति कोई भी शरणागति बिना श्री (महालक्ष्मी माता) के पूर्ववर्ती शरणागति के सफल नहीं होती।

[Note: No surrender to Narayana is successful without prior surrender to Shri (Goddess Mahalakshmi -ज्ञानदायिनी माँ सारदा, राधा , सीता ।).] 

‘श्री’ शब्द महालक्ष्मी मैया (जगतजननी माँ श्री सारदा देवी) को सूचित करता है, यह श्री सूक्तं से स्पस्ट है| हम माता महालक्ष्मी के माध्यम से भगवान नारायण की शरणागति करते हैं| वात्सल्यमयी माता (लक्ष्म्या सह हृषिकेश: देव्या कारुण्यरुपया) जगतजननी माँ अपने पुत्रों को उसके दोषों समेत अपनाती हैं और हमारे अनर्थों को नष्ट कर, भगवान के समक्ष हमारे शरणागति कि सिफारिश करती हैं| माता के इस गुण को ‘पुरुषकारत्वं’ भी कहते हैं|

श्री शब्द का निम्न ३ अर्थ बताये गए हैं: (श्रिञ्- सेवायाम्, श्रृ-श्रवणे, शृ-हिंसायाम्, शृ-विस्तारे’)

[The following 3 meanings of the word Shri have been given: (Shree-Sevayam, Shri-Shravane, Shri-Hinsayam, Shri-Vistaare')] 

१) श्रयते श्रीयते इति श्रियः 

जो भगवान का आश्रय लेती हैं एवं जीवात्माओं को आश्रय प्रदान करती ।

["श्रयते श्रीयते इति श्रियः" "Shrayate Shriyate Iti Shriyah" का अर्थ है कि माता लक्ष्मी (श्री) स्वयं भगवान विष्णु का आश्रय लेती हैं और भक्तों को भी भगवान का आश्रय (शरण) प्रदान करती हैं। यह सूक्ति लक्ष्मीजी की कृपा और भगवान से उनके गहरे संबंध को दर्शाती है, जहाँ वे भक्तों की प्रार्थना भगवान तक पहुँचाती हैं और उनके दुखों का नाश करती हैं। 

२) श्रृणोति श्रावयति इति श्रिय

जो जीवात्माओं के प्रार्थनाओं को सुनती हैं एवं भगवान को सुनाती हैं (बढ़ा -चढ़ा कर)

३)शृणाति शृृणाति इति श्रियः

जो हमारे पापों सहित संचित कर्मों को नष्ट करके हमें निर्मल बनाती हैं एवं हमारे गुणों का वर्धन करती हैं ।

आकर चार लाख चौरासी। जोनि भ्रमत यह जीव अविनाशी।।

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥

कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

भगवान अपनी अपार करुणा से आत्मा को देह, इन्द्रियां, बुद्धि प्रदान करते हैं ताकि हम मोक्ष के पथ में अग्रसर हों|

हम अपने शुभ-अशुभ संस्कार से अनंत काल से इस संसार में भटक रहे हैं। कितनी बार आम के पेड़ से फल बने, फल से फिर गुठली और गुठली से फिर से आम। यह कब से हो रहा है इसका कोई दिन या तारीख बताने वाला नहीं है।

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25 जनवरी, 2026 मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य क्या है ?

 3H में 'मैं ' क्या है ? मैं कौन हूँ ? "प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है" यह जानना ही मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य है !  (अर्थात प्रत्येक आत्मा ईश्वर , परमात्मा, ब्रह्म , भगवान विष्णु से -पवित्र त्रैयी से अभिन्न-और उनकी सन्तान है; यह जान लेना ही मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य है !)