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रविवार, 17 अगस्त 2025

⚜️️🔱'देहो हम से शिवोहम की यात्रा ' के चार साधन ⚜️️🔱 विवेकचूडामणि सार | Session 9 |⚜️️🔱

 परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं,

 निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।


यतो जायते पाल्यते येन विश्वं,

 तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥५॥

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः

       हे एकमात्र परमात्मा ! (शिव-आप जो नाम रख लीजिये ) आप ही जगत के मूल कारण है ! आप अहंकार एवं इच्छा रहित हैं,  आप समस्त बंधनों से परे हैं ! आप का कोई आकार नहीं है, आप निराकार रूप है आप का स्वरूप ॐकार के धयान मे जाना जाता है।  आप समस्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति करते है पालन करते हैं और इसे अपने मे लय कर लेते हैं। हे प्रभु ! मै सच्चे ह्रदय से आप का ही ध्यान स्मरण करता हुँ। 

[ वेदसार शिवस्तव स्तोत्र: - भगवान शिव की स्तुति है। जिसे भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु आदिगुरु शंकराचार्य ने लिखा है। इस स्तुति में भगवान शिव के द्वारा ही संसार की उत्पत्ति होना और फिर इस संसार के शिव में ही समाए जाने का वर्णन दिया गया है। शिव देवों के भी देव हैं,इसलिए महादेव हैं। जो देवताओं के भी दुःखों को दूर करें ऐसे हैं महादेव। महादेव होने के बाद भी जो बाघंबर लपेटे और भस्म रमाए फिरते हैं। तब भी देवी पार्वती के मन को मोहने वाले हैं,ऐसे शिव हैं। तीनों लोकों के हितों को ध्यान में रखते हुए न चखे जाने वाले विष को भी गले में रखे हुए हैं, ऐसे हमारे नीलकंठ हैं। प्रस्तुत हैं शिवस्तव जिसमे योगी के अनूठे रूपों का वर्णन दिया हुआ है।]

      मनुष्य जीवन के लक्ष्य - आत्मज्ञान को प्राप्त करना हो, तो हमें साधन चतुष्टय को अपने आचरण में उतारना पड़ेगा। आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने से ही मनुष्य बंधन से मुक्त होता है। यही हमारा लक्ष्य है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए चार साधनों की आवश्यकता है , इसके अभाव में वह सम्भव नहीं है। तो ये चार साधन कौन-कौन से हैं ? पहला -विवेक, दूसरा -वैराग्य , तीसरा -षट्सम्पत्ति , चौथा - मुमुक्षता।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः।
सोऽयं नित्यनित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः॥ 20 ॥

 20. मन की यह दृढ़ धारणा कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है, सत्य और मिथ्या के बीच विवेक कहलाती है।  

तद्वैराग्यं जिहासा या दर्शनश्रवणादिभिः।
देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि॥ 21 ॥  

 21.अवलोकन, उपदेश आदि से शरीर से लेकर ब्रह्मत्व तक के सभी क्षणभंगुर भोगों को, उनके दोषों को पहले से ही जानकर,  त्यागने की इच्छा को वैराग्य या त्याग कहा जाता है। 

षट्सम्पत्ति का पहला मुद्दा - शम - 

विरज्यविषयव्राताद्दोषदृष्टया मुहुर्मुहुः।
स्वलक्ष्ये नियतिस्थ मनसः शम् उच्यते ॥ 22 ॥  

 22. अनेक इन्द्रिय-विषयों से विरक्त होकर उनके दोषों का निरन्तर अवलोकन करते हुए मन का अपने लक्ष्य (अर्थात ब्रह्म) पर स्थिर रहना, शम या शांति कहलाता है। 

विषयेभ्यः परवर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके।
उभयेषामिन्द्रियानं स दमः परिकीर्तितः
॥ 23॥  

 23. दोनों प्रकार की इंद्रियों को इंद्रियविषयों से हटाकर उनके अपने-अपने केंद्रों में स्थापित करना, दम या आत्म-संयम कहलाता है। सर्वोत्तम उपरति या आत्म-संयम वह है जिसमें मन-कार्य बाह्य विषयों के माध्यम से कार्य करना बंद कर देता है।

लुबना लुम्बनं वृत्तेरेशोप्रतिरुत्तमा।। 24।।

24 .वृत्ति का (ब्रह्माकार वृत्ति ? पुनः अविवेकी मन की आयु वाले किसी व्यक्ति या वस्तु में आसक्ति को त्याग कर) बाह्य विषयों का आश्रय न लेना यही उत्तम 'उपरति' है।

सहनं सर्वदुःखानामप्रतिकारकम्।
चिंताविलापराहितं स तितिक्षा निगद्यते ॥ 25॥ 

 25. सभी क्लेशों को बिना उनके निवारण की चिंता किए सह लेना, तथा उनके कारण होने वाली चिंता या शोक से मुक्त रहना, तितिक्षा या सहनशीलता कहलाती है।         


तो पिछले क्लास में हमने विवेक-वैराग्य हो जाने के बाद; षट्सम्पत्ति में हमने - विवेक-वैराग्य, शम, दम, उपरति, तितीक्षा तक देखा था। अब मन का पाँचवाँ  महत्वपूर्ण गुण है - श्रद्धा। श्रद्धायुक्त मन। और मन कभी कभी अश्रद्धा-युक्त मन भी हो सकता है। श्रद्धायुक्त अन्तःकरण का व्यवहार अलग प्रकार का होगा। श्रद्धा की परिभाषा क्या है - 

शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य, सत्यबुद्धि अवधारणम्।
      सा श्रद्धा कथिता सदभिः, यया वस्तु उपलभ्यते ॥ 26 ॥      

 25. शास्त्र और गुरु जो कहते हैं, उसे दृढ़ निश्चय से सत्य मान लेना, उसी को ऋषियों द्वारा श्रद्धा या विश्वास कहा गया है, जिसके द्वारा परम् सत्य का साक्षात्कार होता है। 

श्रद्धा क्या है ? "सत्यबुद्धि अवधारणम्।"हमारे अन्तःकरण की निश्चयात्मिका बुद्धि का विषय क्या है ? 'शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य' - शास्त्र जो कह रही है , या गुरु जो कुछ भी कह रहे हैं - उसके विषय में - 'यह सत्य है !' ऐसी निश्चयातिमका बुद्धि ! अभी तक हमलोगों ने साधन-चतुष्टय के बारे में जितना पढ़ा - विवेक-वैराग्य से लेकर शम, दम, उपरति, तितीक्षा तक; वो क्या था ? सत्य था या सत्य के विपरीत था ? हर बात अक्षरशः 'Verifiable' है या - निरीक्षण करके देखने योग्य है कि नहीं ? शास्त्र और गुरु दो अलग अलग -चीजें नहीं हैं। गुरु के शब्द ही शास्त्र हैं।  जिन्होंने सत्य का स्वयं अनुभव किया है , उन्हीं के शब्द ही शास्त्र है। जिन्होंने सत्य को देखा है - हमने तो अभी तक देखा नहीं है। लेकिन जिन्होंने देखा है उनके शब्द ही शास्त्र हैं। उनके शब्दों के विषय में ऐसी जो स्वीकृति है , उनके शब्दों को निश्चय पूर्वक सत्य मान लेना, सा श्रद्धा कथिता  इसको हम श्रद्धा कहते हैं। लेकिन ये श्रद्धा कैसी है ? इस श्रद्धा के रहने से ही - 'यया 'वस्तु' उपलभ्यते' ! श्रद्धा के रहने पर ही आत्मवस्तु की उपलब्धि होती है। यदि गुरु वाक्यों में श्रद्धा ही नहीं हो , तो उस आत्मवस्तु को आप कभी उपलब्ध नहीं कर सकते हैं। 

     जरा सोंचकर देखिये - शास्त्र आपको कहते हैं- 'ब्रह्मसत्यं जगत मिथ्या !' अब जिसके अन्तःकरण में श्रद्धा है , वो इसको स्वीकार करेगा। और जिसको इस शास्त्र वाक्य में श्रद्धा है , वो इसको सिर्फ स्वीकार ही नहीं करेगा; वो उसको परख कर भी देखेगा। इसको Verify करके -परखकर के भी सत्यापित करेगा। और जिसके अंदर श्रद्धा नहीं है ,वो शास्त्र के वाक्यों को ही काटेगा। [कैंची बुद्धि] एक व्यक्ति जो गुरु के वाक्य को स्वीकार करेगा , वो गुरु के निर्देशानुसार अपनी बुद्धि को चलाएगा। बुद्धि या तो गुरु के निर्देशानुसार चलेगी, नहीं तो अहंकार के अनुसार चलेगी। अधिकतर अहंकार से ही चलती है। दूसरा व्यक्ति जो अहंकारवश -गुरु के वाक्य को काटेगा वो -गुरु के अनुसार बुद्धि को न चलाकर, अपने अहंकार के अनुसार चलायेगा। अहंकार तो मिथ्या है - मिथ्या अहंकार वाला व्यक्ति अपनी बुद्धि को कैसे चलाएगा ? वो अपनी बुद्धि से शास्त्र के वाक्यों को ही काटेगा, गुरु के वाक्य को ही काटेगा। वो कहेगा ये कैसे सम्भव है ? वो परखकर देखने की कोशिश भी नहीं करेगा। वह यह सोचने का प्रयास भी नहीं करेगा कि -आखिर गुरु क्या कह रहे हैं? काटने से पहले थोड़ा स्वीकार करके परख करके देख तो लो। जब आप गुरु और शास्त्रों की बात सुनते हो तो अहंकारी बुद्धि क्या करेगी ? गुरु के वाक्य को ही काट देगी , और वो उसको लगता है कि बहुत समझदारी का काम कर रहा है। असल में वह मूर्खता का ही परिचय देता है। 

        लेकिन दूसरा जो श्रद्धा युक्त व्यक्ति होगा , जो साधक होगा वो शास्त्र और गुरुवाक्यों पर विश्वास करेगा। स्वामी विवेकनन्द ही गुरु हैं - उनके ही शब्दों को काटोगे तो -आत्मज्ञान लेने कहाँ जाओगे ? यदि आप शंकराचार्यजी की बातों को काटोगे , तो प्रकाश कहाँ से मिलेगा ? हमारे अन्तःकरण में अभी तक अंधकार हो तो था , प्रकाश कहाँ था ? अब शास्त्र के वाक्यों के द्वारा गुरु के शब्दों के द्वारा, थोड़ा-थोड़ा प्रकाश आने लगा है , क्योंकि हम उसको श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर रहे हैं। अगर स्वामीजी के वोरोध में बुद्धि को चलाओ तो फिर कहाँ पहुँचने वाले हो ? गीता में भगवान कहते हैं - 

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्यु-संसार वर्त्मनि।।9.3।
।  

 हे परन्तप ! जो इस विवेक -वैराग्य रूपी साधन चतुष्टय पर या सनातन धर्मकी महिमापर श्रद्धारहित मनुष्य हैं , मुझे प्राप्त न होकर - मृत्युरूप संसार के -वर्त्मनि मार्ग में लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।।।9.3।।  

     तात्पर्य यह हुआ कि जिसके अन्दर अश्रद्धा रहती है वो तो अंधकार में ही पड़ा रहता है। उसके जीवन में कभी भी प्रकाश नहीं आ सकता। गीता कहती है - श्रद्धावान लभते ज्ञानं। जिसको श्रद्धा नहीं है , उसको कभी भी आत्मज्ञान हो ही नहीं सकता। अश्रद्धा क मतलब है वो गुरु के वाक्य को ही काट देता है।  गुरु जब कहते हैं कि बेटा -" तूँ बुलबुला नहीं है , वह समुद्र है।" शास्त्र को तो इतना ही कहना है। अब आप इसको थोड़ा समझ रहे होंगे। शास्त्रों को , उपनिषदों को ऋषियों को सिर्फ इतना कहना है कि भाई तुम ये बुलबुला (नश्वर-शरीर) नहीं हो। तुम वह समुद्र हो जिसमें ये बुलबुला उठ रहा है , और खत्म हो रहा है। लेकिन तुम कभी खत्म हो ही नहीं सकते हो। तुम अजर-अमर -अविनाशी आत्मा हो , सच्चिदानन्द ब्रह्म हो। सच्चिदान्द ब्रह्म रूप  सागर की सतह पर ये बुलबुले उठ रहे हैं। प्रकट हो रहे हैं , और अदृश्य हो रहे हैं। तुम ये नश्वर शरीर नहीं हो - बुलबुला नहीं हो , उस बुलबुला के अंदर झाँक करके देखो। तुम अपने-आपको समुद्र रूप में पाओगे। अगर आप इस बात को अपने 'अहंकार ' से यहीं पर काट दोगे , तो बताओ कहाँ पहुँचने वाले हो ? यदि अपने बुलबुला रूपी अस्तित्व में ही डूबे रहोगे , और दूसरे बुलबुलों को सत्य समझकर उनके साथ व्यवहार करते रहोगे - मेरा शरीर , मेरा सहोदर भाई -मेरी पत्नी, या मेरा पति कहते रहोगे तो परिणाम क्या होगा ? दूसरे बुलबुलों को सत्य समझकर उनके साथ व्यवहार कर रहे हो - अंधकार ही अंधकार होगा। तो श्रद्धा क्या है ? शास्त्र के जो वचन हैं , गुरु के जो शब्द हैं -उसके विषय में निश्चयात्मिका बुद्धि- यह सत्य है ! यह सत्य है ! यह सत्य है ! 

      गुरुवाक्य कभी गलत नहीं हो सकता , विवेकानन्द के शब्द कभी गलत नहीं हो सकते। रामकृष्ण परमहंस के शब्द कभी गलत नहीं हो सकते। शंकराचार्यजी के शब्द कभी गलत नहीं हो सकते। श्रीकृष्ण के जो शब्द गीता में कहे गए हैं -वो कभी गलत नहीं हो सकते। उपनिषदों के ऋषियों के जो शब्द हैं , वो कभी गलत नहीं हो सकते। इसलिए अपनी बुद्धि को उसके अनुसार चलाना है , उसके विरोध में नहीं। इसको श्रुति आधारित युक्ति कहते हैं। आपकी युक्ति कैसे चलेगी? श्रुति आधारित होगी। आपकी बुद्धि के व्यवहार में श्रुति आधार होगी। क्योंकि आपकी बुद्धि में श्रद्धा है , क्योंकि आपने श्रुति के महावाक्यों को स्वीकार किया है। यह सत्य है। तब आपकी बुद्धि गुरु और शास्त्र के अनुरूप चलने लगेगी। और उसीके द्वारा मैं कौन हूँ ? आप खुद इस रहस्य का उद्घाटन कर लेंगे।

       श्रद्धा वह चीज है जिसके रहने से- 'यया वस्तु उपलभ्यते' आप सत्य वस्तु  उपलब्ध कर लेंगे। श्रद्धा के विषय में एक उपनिषद है - कठोपनिषद। कितने लोगों ने पढ़ा है? कठोपनिषद में एक प्रसीद्ध पात्र है। आपने नचिकेता का नाम सुना होगा। नचिकेता श्रद्धा के प्रतिरूप हैं। कहानी लम्बी है -मैं इतना ही कहूंगा। लेकिन आप कभी कभी पढ़ लीजिये। नचिकेता एक श्रद्धावान बालक है। जो सत्य की खोज में निकल पड़ता है। और वो बालक यमराज के दरबार में पहुँच जाते हैं। यमराज का नाम सुनने से ही हमारे मन में नकारात्मक रूप , भयानक रूप आते हैं। जानलीजिये यमराज ब्रह्मज्ञानी हैं -वे तो गुरु हैं। ब्रह्म का ज्ञान प्रदान करने वाले ऐसे गुरु हैं। हमारे फिल्मों में यमराज को बड़ा निगेटिव रूप में दिखाते हैं। जबकि यमराज तो सबसे बड़े सन्त महात्मा हैं। तो बालक नचिकेता यमराज तक पहुँच जाते हैं। बड़ी लम्बी कहानी है। लेकिन अत्यंत ही रोचक है -हमारे पास उतना समय नहीं है। इस बक को यमराज विभिन्न प्रकार से प्रलोभित करते हैं। इस बालक के अंदर जो श्रद्धा , विवेक और वैराग्य है ; ये नचिकेता इन्हीं गुणों की प्रतिमूर्ति हैं। बालक यमराज के पास जाकर अतिसुंदर प्रश्न करते हैं। क्या प्रश्न है ? 

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः
॥     

 (नचिकेता तीसरा वर मांगते हुए कहता हैː 
"प्रयाण किये हुए मनुष्य (मरे हुए मनुष्य)  के विषय में यह जो संशयात्मक विवाद है, कोई तो यों कहते  हैं कि मरने के बाद आत्मा रहता है, और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता। आपके द्वारा उपदेश पाया हुआ मैं इसका निर्णय भलीभांति समझ लूं, यही तीनों वरों में से तीसरा वर है।।20।।अठदस वर्ष के बालक हैं - नचिकेता और यमराज जैसे गुरु के पास जाकर पूछ रहे हैं ! (15.33 मिनट) देखिये कितनी गहन जिज्ञासा है ! 

       कोई एक व्यक्ति अभी तक जीवित था , अब सामने उसका मृत शरीर पड़ा हुआ है।  अब प्रश्न ये है कि - इस मरे हुए शरीर  देखकरके लोगों के मन में भ्रान्ति है। क्या भ्रान्ति है ? कुछ लोग समझते है कि इस शरीर के मृत्यु से सबकुछ खत्म होगया। कुछ लोग समझते हैं कि नहीं ; शरीर मर गया लेकिन कुछ ऐसा है , जो इसके पीछे बचा हुआ है। शरीर के मरनेमात्र से क्या सबकुछ खत्म हो जाता है ? या इस मृत शरीर के पीछे अदृश्य रूप से कुछ बचा हुआ है ? मैं उस वस्तु के विषय में जानना चाहता हूँ , जो शरीर के नाश होने के बाद भी विद्यमान है। इस प्रश्न के उत्तर में यमराज जो आत्मज्ञान देते हैं - वही पूरा आत्मज्ञान है। शरीर बिल्कुल बुलबुला है - ये अभी प्रकट हुआ , अभी नष्ट हो गया। लेहै किन ये आता कहाँ से है ? इसके पीछे एक चैतन्य रूपी समुद्र है -the sea of consciousness है। और वास्तव में हम सभी लोग वही हैं। अभी हमको क्यों समझ में नहीं आ रहा है ? क्योंकि अभी हममें विवेक नहीं है , अज्ञान है। लेकिन जब शास्त्र की कृपा से गुरु की कृपा से जब इस अज्ञान की निवृत्ति होगी अविवेक की निवृत्ति होगी तब अआप अपने सत्यस्वरूप को जानोगे। आप जानोगे कि आप ये 'मनुष्य- शरीर' हो ही नहीं ! आप ये बुलबुले हो ही नहीं। आप इस बुलबुले के साक्षी हो। आप वो अजर , अमर , साक्षी है। सच्चिदानन्द रूपी साक्षी हो। यह ज्ञान उस व्यक्ति होगा। तो नचिकेता जब प्रश्न करते हैं - शरीर की मृत्यु के उपरांत भी जो बचा रहता है , उसको मैं जानना चाहता हूँ। तब यमराज तरह तरह से कोशिश करते हैं , इस बच्चे भटकाने की। विभिन्न प्रकार प्रलोभनों से प्रलोभित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे -ऐसे प्रलोभन जिसके लिए दुनिया पागल हो जाती है। वो प्रलोभन देकर कहते हैं वो सब लेलो पर यह प्रश्न मत पूछो। तुम्हें क्या चाहिए ? तुम खाली वह बता दो। मैं तुम्हें वह सब दे दूँगा। इस पूरी पृथ्वी का तुम्हें मैं राजा बना दूंगा। अप्सराओं के नृत्य-ज्ञान जिसके लिए लोग पागल हो जाते हैं , वो सब  मैं तुझे दे दूंगा। तुम्हारी सेवा के लिए सैंकड़ों दासियाँ देता हूँ। उनका सेवा ग्रहण करो, आनन्द में रहो , भोग में डूबे रहो। और तुम  जो माँगो देदूँगा -लेकिन आत्मा के संबन्ध में मत पूछो। तुम केवल भोग करो -मैंतुमको ऐसा शरीर दे दूंगा कि तुम कभी वृद्ध नहीं होंगे , बस केवल भोग करते रहो। ये कितना बड़ा प्रलोभन है , यही तो यही चाहते हैं। 

     हममें से कोई वृद्ध नहीं होना चाहते हैं , यदि हमें कोई यह वरदान तो हम झपट कर ले लेंगे। है न ? सर्वसाधारण व्यक्ति तो एकदम झपट पड़ेगा। लेकिन उस बालक का विवेक देखो ! वो जानता है कि ये सब नश्वर है , उसमें कुछ है ही नहीं। ये तो बुलबुला है कोई मूर्ख व्यक्ति ही इसको झपटेगा। यमराज कहते हैं -ये बालक अद्भुत बिवेकी है। ये बालक किसी भी चीज से प्रलोभित नहीं हो सकता। क्या उसकी श्रद्धा है , क्या उसका विवेक है , क्या उसका वैराग्य है ! पूरा ब्रह्माण्ड उसके लिए तुच्छ है। स्वामी विवेकानन्द कठोपनिषद को बहुत पसंद करते थे। हर सत्यान्वेषी - एथेंस का सत्यार्थी के लिए नचिकेता जो कठोपनिषद का एक पात्र है , वो हमारे जीवन का आदर्श होना चाहिए।  सत्यार्थी के लिए नचिकेता , महाबली हुनमानजी , विवेकानन्दजी जीवन का आदर्श होना चाहिए। इन सब पात्रों कहीं भी आपको दुर्बलता दिखाई देती है क्या ? वो बालक नचिकेता  किसी भी प्रलोभन के सामने दुर्बल पड़ा ? लेकिन हम तो थोड़ा से प्रलोभन से ही दुर्बल क्यों पड़ जाते हैं। क्यों ? अविवेक के कारण ! बालक नचिकेता - कोई दुर्बलता नहीं। ऐसा होना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। किसी भी प्रकार की दुर्बलता -कामिनिकांचन या नाम-यश को लेकर हमारे भीतर नहीं रहनी चाहिए। और ये तभी सम्भव होगा जब हममें विवेक होगा , इसलिए विवेक क्या है ? चूड़ामणि है ! कोई संदेह ? विवेक से बढ़कर कुछ नहीं है। पूरा ब्रह्माण्ड जैसा दीखता है , वैसा है ही नहीं। यहाँ सारे व्यक्ति और वस्तुएं बुदबुदा के समान प्रकट  हो रहे हैं , नष्ट हो रहे हैं। इसमें अपने आप को डूबा देना किस प्रकार है ? बिना तल के कुँए में गिरने के समान है। आप ऐसे गड्ढे में गिर रहे हो जहाँ  पहुँचोगे कहीं नहीं। जहाँ पर हो वहीँ रहोगे। treadmill exercise' करते हो न ? treadmill में चलते रहो -आप पहुँचते हो कहाँ ? आप 20 दौड़े , लेकिन जहाँ थे वहीँ पर हो। यही संसार है -आप एक treadmill -पाँवचक्की में हो ! विषयों के पीछे दौड़ना treadmill पर दौड़ने के समान है। विवेक और वैराग्य से क्या होता है ? हमारे अंदर की सारी दुर्बलायें खत्म हो जाती हैं। इससे बढ़कर क्या है ? हम  हर समय दुर्बल -दुर्बल होकर जी रहे हैं , बताओ इसमें क्या मेरिट है ? विवेक आनंद आने दीजिये फिर देखिये आपका चरित्र कितना बलवान बनता है ! सीताजी को कोई प्रलोभित कर सकता है ? रावण ने कितना प्रलोभित किया। पूरे इतिहास में सीताजी एक ही हैं। भारतीय संस्कृति की आदर्श हैं सीताजी। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं राम हजारों हो सकते हैं। लेकिन सीताजी की तुलना कोई है ही नहीं। इसीलिए हम उनको पूजते हैं। क्योंकि हमें वैसा बनना है। नचिकेता का किसी प्रकार  प्रलोभन से प्रलोभित न होना -इसके पीछे का कारण है विवेक। तो ये श्रद्धा हुआ।         

    (25 मिनट) श्रद्धा के पश्चात साधन-चतुष्टय के षट्सम्पत्ति में जो अंतिम गुण है वो है समाधान। समाधान क्या है ? उसकी परिभाषा में शंकराचार्य जी कहते हैं - 

सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्राह्मणि सर्वदा।
               तत्समाधानमित्युक्तं न तु चित्तस्य लालनम् ॥
27॥   

26. केवल विचार (जिज्ञासा) में लिप्त रहना नहीं, बल्कि बुद्धि (या पुष्टि क्षमता) का नित्य शुद्ध ब्रह्म पर निरंतर ध्यान केंद्रित करना ही समाधान या आत्म-स्थिरता कहलाता है। 

    हमारे दैनंदिन जीवन में हमारे घर में इस - समाधान शब्द का उपयोग होता है। समाधान कैसे आता है ? - सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्राह्मणि सर्वदा ।  परखकर देना होगा कि अपनी बुद्धि को यानि अन्तःकरण को वह हर समय --शुद्धे ब्राह्मणि सर्वथा।  शुद्ध ब्रह्म में, यानि साक्षी चेतना (ठाकुर देव) में लगाकर रखना होगा। कि हर समय समुद्र सत्य है -बुलबुला मिथ्या है। हर समय मन को समुद्र रूपी ब्रह्म में लगाकर रखना है। ऐसा नहीं होगा कि मन को सवेरे 5 मिनट ब्रह्म (ठाकुर) में लगा दिया फिर दिनभर संसार के भोगों में- मिथ्या बुलबुले हैं उसमें डुबो दिया -लगा दिया। उस सच्चिदानन्द आत्मा में ही अपने अन्तःकरण को रखना होगा। सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्राह्मणि सर्वदा अंतिम शब्द है -न तु चित्तस्य लालनम्। जैसे बच्चे को लाड़प्यार करते हैं - तो बिगड़ जाता है। Pampering- क्या है ? बच्चा जो डिमांड करे उसको देते रहना गलत है , उसको संयमित करना चाहिए।  हम अपने बच्चे से मोहित हो जाते हैं। बच्चा क्या है ? एक दूसरा बुलबुला है। माँ -बाप क्या है ? वो अपने-आप में एक बुलबुला हैएक बुलबुला दूसरे बुलबुले पे मोहित है।  उसको दुनिया में और कुछ दिखाई नहीं देता। मोह में हम अंधे हो जाते है। बच्चे की हर डिमांड पूरी करते रहते हैं। मोह को भी शंकराचार्यजी आगे परिभाषित करते हैं। मानलो जीवन में कुछ दुःखद घटना घट गयी - और जीवन में अधिकांशतः दुःखद ही घटता रहता है। खुश रहने के लिए - tv न्यूज़ या सिनेमा लगा दोगे। हम दुःख की समस्या का समाधान सिनेमा में ढूँढ रहे हैं। मन उस बिगड़े बच्चे के समान है जो सिर्फ डिमांड करता रहता है। शंकराचार्य जी -चेतावनी दे रहे हैं कि वो समाधान नहीं है। पर अक्सर हम इसी को समाधान समझ लेते हैं। सिनेमा देखकर मन को बहला लेना समाधान नहीं है। आप अपने आप को बेवकूफ बना रहे हो। चित्त का लाड़प्यार करना -ये समाधान नहीं है। समाधान क्या है ? सब समय मन को उस सत्यवस्तु में -(ब्रह्माकार वृत्ति में) प्रतिष्ठित रखना , यह समाधान है --न तु चित्तस्य लालनम् कोई भी समस्या आने पर , मनको भोग के विषयों में लगाकर रखना -ये समाधान नहीं है। क्योंकि भोग के वस्तु या व्यक्ति सब बुलबुले हैं , अभी दीखता है , अभी नहीं है। कितना सिनेमा देख लिया -कभी समाधान मिला ? कोई सिनेमा यदि अच्छा भी लगा - तो वो समाधान नहीं है। समाधान कैसे होगा ? सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्राह्मणि सर्वदा।  चित्त को ब्रह्म में लगाना है , जो कि सत्य है -मिथ्या में नहीं लगाना है। ये समाधान है। मिथ्या वस्तु में समाधान ढूँढना ये अविवेक-युक्त मन का स्वभाव है। विवेकयुक्त -मन कभी भी मिथ्या वस्तु में समाधान नहीं ढूंढेगा। अंतःकरण को सब समय सत्यवस्तु में लगाकर रखेगा। (34.45 मिनट

      अब देखिये साधन-चतुष्टय विवेक-चूड़ामणि के श्लोक संख्या - 17 से लेकर 27 तक में दिए गए परिभाषा अनुसार जितने भी अन्तःकरण के गुण (चरित्र के गुण) हैं - वे विवेक आधारित गुण हैं या नहीं ? एक तरफ सत्यवस्तु (सच्चिदानन्द) है दूसरी तरफ संसार की मिथ्या वस्तु -बुलबुले (व्यक्ति या भोग के विषय) हैं। जब हमारी बुद्धि में ये विवेक-जन्य स्पष्टता आ जाती है तो हमारे व्यवहार और सोंच में धीरे -धीरे परिवर्तन आने लगता है। ये परिवर्तन -या जीवन गठन एक दिन में नहीं होता -धीरे -धीरे ही होता है। हमारे चरित्र में बदलाव धीरे -धीरे ही होने वाला है। लेकिन बदलाव की शुरुआत कहाँ से हुई है ? विवेक से ! इसीलिए विवेक क्या है ? चूड़ामणि है !! कितना सुंदर नाम है -इस ग्रंथ का ? विवेक सभी शिक्षा का , सभी गुणों का , मुकुट मणि है। विवेक से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। विवेक आते ही हमारा सारा जीवन परिवर्तित होने लगता है। हम स्वतंत्र हो जाते है , सभी प्रकार की दुर्बलताओं से हम मुक्त हो जाते हैं। हम स्वाधीन हो जाते हैं। (36 मिनट स्वाधीनता -मुक्ति -मोक्ष

      अभी हमने छह सम्पत्तियों को देखा - पहला क्या था ? शम , दम , उपरति , तितिक्षा , श्रद्धा और समाधान। अब मुझे बताइये ये छह गुण सचमुच सम्पत्ति है या नहीं ? जीवन में असली सम्पति क्या है ? क्या हमारा बैंक बैलेंस असली सम्पत्ति है ? 'The Real Treasure' जो व्यक्ति को मुक्त बनाती है। शम क्या है ? मन का आपका निग्रहीत है - आपके वश में है ! कैसे ? मन आपका विषयों से हटा हुआ है। विषयों से कैसे हटा हुआ है ? विषयों में दोष देखते हुए , सारे बुलबुलों में दोष देखते हुए। ये जानते हुए कि ये मिथ्या बुलबुला है - इसमें पानी के सिवा कुछ है ही नहीं। सभी सुंदर-सुंदर भोग विषय युक्त बस्तु या व्यक्ति में दोष देखते हुए , मन को खींच लेना -पीछे हटा देना। और कहाँ रखना ? सत्यवस्तु में मन को रखना। कहाँ लगा हुआ है ? सही जगह में लगा हुआ है - सही जगह कहाँ है ? हृदय कमल पर विराजमान विवेकमूर्ति ठाकुर देव पर लगा हुआ है। इसको मन का निग्रह कहते हैं - जो दोचरणों का अभ्यास - प्रत्याहार और धारणा का अभ्यास से होता है। मन जितना निग्रहीत हो रहा होगा । उतना आप बंधन से मुक्त हो रहे हो या नहीं

       जब मन निग्रहीत रहता है , उतना ही इन्द्रियों पर निग्रह सम्भव होता है।इन्द्रियों पर निग्रह कैसे होता है ? ये पंच कर्म इन्द्रिय हैं और पंच ज्ञानेन्द्रिय हैं -इन दसों इन्द्रियों को-जंगली घोड़ों को विषयों से खींच करके अपने -अपने गोलकों में रखना। अपने स्थान से बाहर निकलर विषयों के पीछे दौड़ने की अनुमति नहीं देना। लेकिन इन्द्रियों का निग्रह तभी सम्भव होता है , जब पीछे मन का निग्रह सम्भव हो जाता है। जब दसों इन्द्रियाँ और मन आपके वश में है -तो आप पहले से अधिक स्वतंत्र हुए या नहीं ? पहले तो ये इन्द्रियाँ दौड़ रही थी और आप भी दौड़ रहे थे। अब यह दौड़ बंद हो गया। विषयों की गुलामी बंद हो गयी आप स्वतंत्र हो गए। जब आप इन्द्रियों के पीछे नहीं दौड़ेंगे तो आपका मन इस प्रकार का हो जायेगा कि वह बाह्य विषयों से प्रभावित होगा ही नहीं। यही उपरति है। देखिये क्या सुंदर development हो रहा है ? शम और दम सध जाने के बाद -उपरति , आप समाज के हर प्रकार के लोगों के बीच हो , किन्तु इसका कोई भी चीज आपको प्रभावित नहीं कर रहा है। आप बिचबजार में हो , ऐसी जगह में हो जहाँ पार्टी चल रहा है - प्रलोभन की सभी वस्तुयें वहाँ भरी हुई हैं -फिर भी आपका अंतःकरण किसी भी चीज से प्रलोभित नहीं हो रहा है ? सोचकर देखो -कितनी बड़ी स्वतन्त्रता है ? नहीं तो हम हर क्षण विषयों से प्रलोभित होक जी रहे हैं -क्या यह गुलामी नहीं है ? जब आप सारे उतार -चढ़ाव में आप निर्लिप्त रहने में समर्थ हो जाते हैं - तो बड़ी आसानी से सभी दुःख-कष्टों को सहन कर लेते हैं। अपनेआप तितिक्षा आती है कि नहीं ? अब आप -'चिन्ता विलाप रहितम ' हैं ! इस आदमी का अंतःकरण ऐसा हो जाता है।  और जब ऐसा उपरति है , तितिक्षा है तो फिर श्रद्धा आ जाती है - शास्त्र की बातें सब सत्य है ! ऐसा जी निश्चयात्मक बुद्धि है - ये श्रद्धा आने से, व्यक्ति फिर सत्य वस्तु के और भी निकट पहुँच जाता है। और अंतिम गुण है समाधान। जिसका मन सब समय सत्य वस्तु में ही लगा हुआ है -मिथ्या वस्तु में नहीं। इसको समाधान कहते हैं। तो उत्तरोत्तर प्राप्त होने वाले ये जो छह गुण हैं -इन्हींको षट्सम्पत्ति कहा गया है। यही सुख का रहस्य है। (39 मिनट)  

     (39 .52 मिनट) आपको याद होगा कैम्प में आने से पहले हमलोग सुख कहाँ है -जिन व्यक्ति या विषयों में सुख है सोच रहे थे - अब हमारी दृष्टि बदल गयी या नहीं ? हम सोच बैठे थे कि विषय भोगों में ही सुख है। विवेक-दृष्टि नहीं रहने के कारण जिसमें दुःख ही दुःख है , उसको हमने सुख समझ लिया। सर्वसाधारण मनुष्य की धारणा यही तो होती है कि विषयों में सुख है। इन बुलबुलों में कभी सुख मिलेगा ? ये तो अभी है अगले क्षण अदृश्य हो जायेगा। तो यही है मगरमच्छ को लक्क्ड़ समझकर पकड़ना। इसका परिणाम क्या होगा ? आप कहाँ पहुँचोगे ? मगरमच्छ के पेट में। यानि दुःख की चपेट में पहुंचोगे आप। दुःख में पिसते जाते है। मगरमच्छ के पेट में पहुँचने का मतलब है दुःख के पेट में पहुँचना। दुःख में आप पचते रहते हो यही हमारे जीवन की कहानी है। 

        (41.28 मिनट)  तो सुख किसमें है ? विवेक में, वैराग्य में और षट्सम्पत्ति में - यह सम्पत्ति जिसमें जितना होगा, वह उतना ही सुखी होगा। वो व्यक्ति स्वभाव से ही , कुछ न होते हुए भी सब समय आनंद में है - परमानन्द में है , सच्चिदानन्द में है -उसको इस ब्रह्माण्ड का कोई भी वस्तु प्रभावित नहीं कर सकता , उसको Derail नहीं कर सकता। पटरी से उतार नहीं सकता। अब आप किसी आदर्श व्यक्ति के जीवन को देखिये। जैसे स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन को ले लीजिये। अब उनके जीवन में यही दीखता है कि नहीं ? रामकृष्ण परमहंस जी को ले लीजिये , रमण महर्षि जी को ले लीजिये , शंकराचार्यजी को ले लीजिये। क्या है ? ये ऐसे ही मुक्त पुरुष हैं -जिनको ब्रह्माण्ड की कोई भी वस्तु प्रभावित या प्रलोभित नहीं कर सकती। ऐसा होना हमारे जीवन का आदर्श है -लक्ष्य है। (42 मिनट) तो अब अंतिम साधन जो है - वो है , मुमुक्षुत्वं ! तो मुमुक्षुता या मुक्ति की लालसा परिभाषा क्या है? 

अहंकारादि देहान्तान बंधान अज्ञान कल्पितान। 
    स्वस्वरूप अवबोधेन मोक्षुमिच्छा मुमुक्षुता ॥ 28 ॥
 

 28.अहंकार से लेकर देहपर्यन्त (अंतःकरण से लेकर शरीर तक) जितने अविवेक या अज्ञान द्वारा आरोपित बंधन हैं, उनको अपने वास्तविक स्वरूप के ज्ञान द्वारा (आत्मसाक्षात्कार द्वारा) जानकर,  जो अज्ञान द्वारा आरोपित बंधन हैं, उन बंधनों स्वयं को मुक्त करने की इच्छा'मुमुक्षुता' (या मुक्ति की लालसा) है।                     

  मुमुक्षुता का मतलब है, अपने वास्तविक स्वरूप को जानकर, सभी बंधनों से मुक्ति की इच्छा , या तीव्र इच्छा अथवा मुक्ति की लालसा, आप यदि यह समझ जाओ कि आपकी परिस्थिति अभी कैसी है? आप गड्ढे में गिरे हुए हैं-जिसका तल ही नहीं है । बंधन से मुक्ति की इच्छा तो तभी न होगी जब आप जानोगे कि आप बंधन में पड़े हुए हो। आप जान रहे हैं कि स्वयं को देह-मन संघात के M/F समझने कारण मैं पिछले चौरासी लाख जन्मों से जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसा हुआ था ? इस जन्म में विवेकानन्द मिले - तो क्या 'हम ???' साक्षी चैतन्य और उसकी मनुजलीला को अलग -अलग नहीं देख सकते ? इस बुलबुला रूप देहमन के साथ हमारा जो तादात्म्य हो गया है ,कि मैं आधारकार्ड वाला परिचय ही मेरा वास्तविक परिचय है। यह अहंकार इस बुलबुले में अपने को सीमित पाता है। मैं BKS, DKS, MKS, मैं अमुक पाण्डे, यादव , आदि हूँ - इस अहंकार को बुलबुले में डुबो देना उस गड्ढे में गिरने के समान है - जिसका तली ही नहीं है। ये बुलबुला तो टूटने वाला है , ये प्रति क्षण बदल रहा है। ये शरीर दीखता है- लेकिन वास्तव में नहीं है। 

       तो कहते हैं बंधन क्या है?  'अहंकारादि देहान्तान' सूक्ष्म अहंकार से लेकर के यह जो हमारा स्थूल देह है - इसके साथ हमारा एक तादात्म्य बन गया है। कि 'मैं' 'ये' हूँ ! मैं लक्षण जी का बड़ा भाई राम हूँ , या राम जी का छोटा भाई लक्ष्मण हूँ ! इस मनुजदेह को ही अपना असली स्वरूप मान लेना। यही तो बंधन हैं। सूक्ष्म अहंकार से लेके इस स्थूल शरीर तक - सिर्फ एक बुलबुला है। इस बुलबुले के प्रति आपकी 'मैं' बुद्धि हो गयी है ! इस देह के परिचय के साथ -आपकी जो 'मैं' -बुद्धि हो गयी है। यही बंधन है। इस बंधन से मुक्त होने की इच्छा -को मुमुक्षता कहते हैं। आप कैसे मुक्त होंगे ? जब आप अपने सत्य स्वरूप को जान जाओगे - 'स्वस्वरूप अवबोधेन'! स्वस्वरूप का अवबोध ! अच्छा बुलबुले का अपना स्वरुप क्या है ? बुलबुले का असली स्वरुप समुद्र है। उस बुलबुले का या लहर का समुद्र से भिन्न कोई अस्तित्व है क्या ? है ही नहीं। बुलबुले को जब अपने स्वरुप का ज्ञान होगा -तो क्या ज्ञान होगा ? 'मैं समुद्र हूँ ! ' यही ज्ञान तो होगा। (46.04 मिनट) तो उस बुलबुले को पता लगेगा ? यही उस सीमित बुलबुले में (व्यष्टि नाम-रूप में) जो उसका अहंकार अटका हुआ था , अब वो अहंकार समुद्र के साथ जुड़ गया। यही है 'स्वस्वरूप अवबोधेन'! का मतलब। इस प्रकार हम अपने बंधन से मुक्त होते हैं। इस प्रकार अपने 'समुद्र स्वरुप' को जानकर बुलबुले में जो मुक्त होने की इच्छा होती है -उसको मुमुक्षता कहते हैं। कितना सुंदर परिभाषा है -हम आसानी से क्षणभंगुर बुलबुले से मुक्त अवस्था में अपने अनंत समुद्र रूप में पहुँचने की कल्पना कर सकते हैं। हम सब छोटे-छोटे बुलबुले है -इसके नामरूप के साथ हमारा तादात्म्य हो गया है। हम सबका तादाम्य हो गया है। पर जब उस बुलबुले की गहराई में प्रवेश कर जाओगे , इस नामरूप के अंदर खोजोगे तो -नामरूप मिथ्या हो जायेगा , और 'अस्तिभाँति प्रिय ' स्वरूप की अनुभूति हो जाएगी। नश्वर बुलबुले के 'अहं' का असली अर्थ तो अविनाशी समुद्र है ! लेकिन अविवेक के कारण या अज्ञान के कारण हम इस देहमन संघात के बुलबुले अंदर हम अपने को सीमित  (M/F) के रूप में पाते हैं। यही हमारे बंधन की दशा है। इससे मुक्त होने की इच्छा को मुमुक्षता कहते हैं। हम मुक्त कैसे होंगे ? 'स्वस्वरूप अवबोधेन'! जब आप अपने स्वरुप को जानोगे तो क्या जानोगे ? अपनेआप को सच्चिदानन्द चैतन्य ब्रह्म ही जानोगे ! आप यह बुलबुला नहीं रह जायेंगे।

         (47 मिनट) तो आध्यात्मिक जीवन क्या है ? इस मनुष्य जीवन की जो असली यात्रा है , हमारी Actual journey- कहीं बाहर जाना नहीं है ,आप कहोगे मैं यहाँ नहीं , स्विट्जरलैंड -यूरोप की यात्रा कर आया हूँ ! भाई आप कहीं चले जाओ , जाने लायक कुछ है ही नहीं। पता है -असली यात्रा Actual journey-कहाँ से शुरू होती है ? हमारी आध्यात्मिक यात्रा -Actual journey' 'देहो अहं से लेकर शिवो अहं ' तक की यात्रा है। 'देहो हम से लेके शिवो हम ' तक की यात्रा है।  'देहो अहं से लेकर शिवो अहं ' तक की यात्रा है। आज हमारी धारणा क्या है? अभी हम अपने आप को क्या मान रहे हैं ? अभी हम स्वयं को 'देहो हम' मैं यह देह हूँ ! मैं यह बुलबुला हूँ। ये समझकरके बैठे हैं। अब यहाँ से - इस देह से शुरू करके ये यात्रा खत्म कहाँ होगी ? जिस दिन आपको यह अनुभव होगा कि ' मैं देह नहीं , मैं शिवोहम,शिवोहम, शिवोहम ! ये आपकी यात्रा का अंतिम स्थान है , हमें यहाँ पहुँचना है। यही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाती है। सार्थक = स +अर्थक - this is what makes human life meaningful ! दादा कहते थे -सबको बताओ! विवेक क्या है ? श्रद्धा क्या है ? मनुष्य जीवन सार्थक कैसे होता है ? सार्थक का मतलब क्या है ? अन्यथा मानव जीवन का क्या अर्थ है? सार्थक का मतलब है-meaningful ! Otherwise what is the meaning of human life ?  बताइये - आहार , निद्रा , भय , मैथुन यदि जीवन का यही अर्थ है - खाना, पीना , सन्तान उतपत्ति करना , और एकदिन मर जाना। यही तो होता है न ? नहीं तो इस मनुष्य शरीर को लेकरके हम क्या करते हैं ? ये तो पशु भी कर लेता है। लेकिन मनुष्य शरीर में हमारा उद्देश्य क्या है ? 'देहो अहं से लेकर शिवो अहं ' तक की यात्रा पूरी कर लेनी है। आप कहीं रहिये , दिल्ली रहिये , कि बनारस रहीये - या मुंबई रहिये ,बंगलुरु में रहिये , सिडनी में रहिये आपके भीतर की यात्रा वहीँ से चलती रह सकती है। आप कहाँ रह रहे हैं ? आपको रहना तो आत्मा में है। हमारा असली वासस्थान कहाँ है ? आत्मा ! समुद्र ही हमारा असली वासस्थान है। समुद्र के बाहर जो कुछ भी है न -वो सब मिथ्या है। शरीर दीखता है लेकिन ये तो बुलबुला है -वास्तव में ये है ही नहीं। हमारा जो असली वासस्थान है वो हमारी आत्मा या समुद्र रूपी जो आत्मा है , सच्चिदानन्द चैतन्य जो ब्रह्म है, परब्रह्म , परमेश्वर या ईश्वर -ये सभी शब्द हम आत्मा के लिए ही प्रयोग करते हैं। नहीं ईश्वर कहीं ऊपर है क्या ? बादलों के पार ये सब जो कल्पना है , ये जो ईश्वर है उसका हम अनुभव कर सकते हैं , और जो सातवें आसमान में बैठा है , वह केवल कल्पना है। उसका कोई Verification नहीं हो सकता। लेकिन सारी दुनिया उसी को पकड़कर चलती है। इसीलिए यह अद्वैत सनातन धर्म की श्रेष्ठता है। इसीलिए इसको सनातन कहते हैं। this is Expirinical this is verifiable, यह प्रयोग-सिद्ध है, यह सत्यापन योग्य है ! अभी तक हमने जितना कुछ पढ़ा है -उसमें कोई ऐसा मुद्दा है जो verifiable नहीं है ? एक भी चीज ? यह शुद्ध विज्ञान है, यह आत्म-खोज का विज्ञान है। 'It is pure science, it is a science of self-discovery !'  अपने स्वरुप को खोजने का एक विज्ञान है। ये एक science है। इसमें कुछ काल्पनिक नहीं है। ऐसे थे हमारे उपनिषदों के ऋषि। जिसने पूरे मानवसमाज को यह विज्ञान उपलब्ध करवा दिया।

    आगे बढ़ने से पहले, हमने अभी तक क्या देखा , इसको थोड़ा Revise कर लेते हैं। इस ग्रन्थ के शुरू ही में भगवान शंकराचार्य जी हमें याद दिलाते हैं कि पहले यह समझलो की मनुष्य-शरीर आसानी से प्राप्त नहीं होता है। अनगिनत जीवजंतुओं में मनुष्यों की संख्या बहुत कम है। कितनी है 8 बिलियन -8 अरब, हमको बहुत बड़ी संख्या लग सकता है , किन्तु इस सृष्टि में कीड़ेमकोड़े -मच्छर कितने होंगे ? कितने ऐसे जीवजंतु जिनकी उतपत्ति होती और मरते जाते हैं। मनुष्य योनि में जन्म लेना बड़े सौभाग्य की बात है। मनुष्यों के परिवार में प्रवेश पाना बड़े ही सौभाग्य की बात है। क्यों ? क्योंकि इस मनुष्य शरीर में ही - मैं कौन हूँ ? इस सत्य की खोज सम्भव है। मनुष्य शरीर में जन्म लेने का मुख्य उद्देश्य मोक्षप्राप्ति या आत्मज्ञान की प्राप्ति है। हम जो अपनेआपको बुलबुला समझ रहे हैं -और दूसरे बुलबुले में अपने को डूबा रहे हैं यही बंधन में फंसना है। रात भर में कुछ भी हो सकता है -देह का कोई गारंटी नहीं है। हम खुद इस बुलबुले में डूबे हैं , और इस बुलबुले को सत्य समझकर दूसरे बुलबुले से सम्बन्ध बना लेते हैं। जो मिथ्या है उसको सत्य समझकर जीवन बिता रहे हैं। कोई मनुष्य बुलबुला दूसरे बुलबुले से सम्बन्ध बनाकर सुखी हो सकता है क्या ? इससे बाहर निकलना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है जिसको हमलोग मोक्ष कहते हैं। मोक्ष की प्राप्ति में कुछ साधनों की प्राथमिकता है। 'देहोंहम से शिवहं की यात्रा' में साधन-चतुष्टय आवश्यक है - चार साधन में विवेक है , वैराग्य है , षट्सम्पत्ति है , और मुमुक्षता है। जितना इन गुणों की वृद्धि होती है , उतना हमारा जीवन बदल जाता है। मनुष्य जीवन में इससे कोई अच्छा बदलाव संभव है क्या ? आप अरबपति हो सकते हो , किन्तु इन चार गुणों के आभाव में कुछ भी नहीं हो। हो सकता विष्णु या भास्कर अरबपति हो गया , या खरबपति हो गया , होना नहीं चाहता  ?  तो ख़ुशी की बात है। कल्पना कर लो थोड़ी देर के लिए कि तुम अरबपति हो ! कितने भी बड़े हो जाओ , यदि बुलबुले में डूबे हुए हो , तो कुछ भी नहीं हो। और दूसरा कोई लंगोटधारी रमणमहर्षि या श्रीरामकृष्ण परमहंस है , या विवेकानन्द के पास कुछ भी नहीं है , लेकिन जो इन गुणों से ओतप्रोत है , चित्त में कोई दुर्बलता ही नहीं है , कोई पारधीनता ही नहीं है।  कौन सा चित्र सुंदर है ? रामकृष्ण परमहंस या विवेकानन्द की अपने जीवनकाल में ही जो मुक्त अवस्था है, जीवनकाल में ही ये लोग मुक्त हैं। उस जीवनमुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना हो तो इन चार साधनों की आवश्यकता है। यह स्पष्ट रूप से समझलेना चाहिए कि आपके अंदर ये चारों साधन 100 % आ जायेंगे। शुरुआत ये योग्यता बहुत कम मात्रा में 5 % या 10 % भी हो तो आप अपनी यात्रा शुरू कर सकते हैं। षट्सम्पत्ति 0 % हो तब भी ये यात्रा शुरू नहीं हो सकती। 5 % भी हो तो यात्रा शुरू हो सकती है। परमसत्य की खोज में , मैं कौन हूँ की खोज में सच हमें बोलना पड़ता है - बहुत प्रामाणिक होना पड़ता है ?  कि नहीं मेरे अंदर उतना वैराग्य नहीं है , लेकिन थोड़ा सा है। वो जो थोड़ा सा है न वही आपका धन है। उस धन को यहीं से बढ़ाना है , आप धनी होने का मतलब समझ रहे हो न ? आपके व्यक्तित्व में ये चीजें जितना बढ़ती हैं , आप उतने धनी हो रहे हो। जितना आप विवेकी होंगे , जितना आप वैरग्य-सम्पन्न  होंगे , जितना अधिक आपके अंदर षट्सम्पत्ति होगी , आप सुखी हो जाओगे , व्यक्ति और विषयों की पारधीनता समाप्त हो जाएगी। इसके आगे कल।                        

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['राम जी' को हर समय यह होश रखना है कि राम जी, वास्तव में आत्मा हैं , या ब्रह्म हैं, जो  लक्ष्मणजी  के सहोदर बड़े भाई होने की मनुजलीला कर रहे हैं। रामजी मनुष्य शरीर धारण किये हैं , मनुष्य नहीं हैं -आत्मा हैं। हमलोग अपने को बड़े समझदार समझते हैं -पर असली भूमिका करते समय -असली बड़ा भाई , या असली मामा बन जाते हैं , मामा की लीला करना है -मनुज लीला और असली भूमिका को  मिक्सअप कर देते हैं।DNM -के यहाँ गए, लक्ष्मणजी की बाउण्ड्री देख आये , बलराम-स्वर्ग सिधारे , आशा-उषा -अजय-बबलू -कमलेश को मिलने आना है -फिर से मनुजलीला का मँजा हुआ कलाकार बनना है। स्कूटर से लुढ़कना नहीं है . 

https://shlokam-org.translate.goog/texts/Vivekachudamani-18-30/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc                      

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शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

⚜️️⚜️️उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥9॥⚜️️⚜️️घटना - 325⚜️️⚜️️मनुज लीला⚜️️⚜️️मूर्छित अनुज लक्ष्मण को लेकर श्रीराम का विलाप और लंका में कुम्भकरण को जगाने का प्रसंग ⚜️️⚜️️|| श्री रामचरितमानस गायन || भाग #325⚜️️⚜️️

 श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]
   
[ घटना - 325: दोहा -60,61]

उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥9॥

⚜️️⚜️️मनुज लीला⚜️️⚜️️

  उमा एक अखंड रघुराई। 

नर गति भगत कृपाल देखाई॥9

मूर्छित अनुज लक्ष्मण को लेकर श्रीराम का विलाप और लंका में कुम्भकरण को जगाने का प्रसंग -

        आधी रात बीत गयी है , शक्तिवाण लगने से लक्ष्मण मूर्छित अवस्था में पड़े हुए है। संजीवनी लेकर हनुमान अभी तक नहीं आये , लक्ष्मण को ह्रदय से लगाकर श्रीराम विलाप कर रहे हैं - (या विलाप करने का रियल ड्रामा कर रहे हैं ?) हे भाई ! तुम तो मुझे कभी भी दुःखी नहीं देख सकते थे, मेरे लिए तुमने माता-पिता तक को छोड़ दिया , वन-वन भटकते हुए शीत , घाम , वर्षा , आँधी सभी कष्ट सहे। अब तुम्हारे उस प्रेम को क्या हो गया ? तुम उठते क्यों नहीं ? यदि मैं जानता कि एक दिन मुझे अपने प्रिय भाई का वियोग सहना पड़ेगा , तो मैं पिता के वचन की मर्यादा को भी भुला देता। पुत्र, स्त्री , धन , घर-परिवार - इस जगत में सबकुछ मिल जाते हैं , नहीं मिलता तो वो है -सहोदर भाई ! स्त्री के लिए ऐसे भाई को खोकर , मैं कौन सा मुँह लेकर अयोध्या वापस जाऊँगा ? मुझे परम् हितकारी जानकर माता ने प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्र को मेरे हाथों में सौपा था। अब मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा ? श्रीराम के कमल सरीखे नयन से अश्रु प्रवाहित हो रहे हैं। पार्वती को ये कथा सुनाते हुए शिवजी कहते हैं - हे उमा ! श्री रघुनाथ तो अद्वितीय और वियोग रहित हैं (अखण्ड- अवतार) हैं , किन्तु अपने प्रिय भाई के लिए विलाप करते हुए मनुष्यों की दशा दिखा रहे हैं !(मनुष्य होने का स्वाभाविक अभिनय कर रहे हैं।) ये भी उनकी एक लीला है - [मनुज लीला है ?] तभी वहाँ संजीवनी लेकर हनुमान आ पहुँचते हैं। उधर अनेक उपाय करके अपने भाई कुम्भकरण को जगाकर रावण उसे सारी कथा सुना रहा है -

* जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥5॥

भावार्थ:- जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यंत दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा॥5॥

* जैहउँ अवध कौन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाई गँवाई॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥6॥

भावार्थ:- स्त्री के लिए प्यारे भाई को खोकर, मैं कौन सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? मैं जगत्‌ में बदनामी भले ही सह लेता (कि राम में कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्री को खो बैठे)। स्त्री की हानि से (इस हानि को देखते) कोई विशेष क्षति नहीं थी॥6॥

* अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥7॥

भावार्थ:- अब तो हे पुत्र! मेरे निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो॥7॥

* सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई॥8॥

भावार्थ:- सब प्रकार से सुख देने वाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं?॥8॥

* बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥9॥

भावार्थ:-सोच से छुड़ाने वाले श्री रामजी बहुत प्रकार से सोच कर रहे हैं। उनके कमल की पंखुड़ी के समान नेत्रों से (विषाद के आँसुओं का) जल बह रहा है। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रघुनाथजी एक (अद्वितीय) और अखंड (वियोगरहित) हैं। भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान्‌ ने (लीला करके) मनुष्य की दशा दिखलाई है॥9॥

सोरठा :
* प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥61॥

भावार्थ:-प्रभु के (लीला के लिए किए गए) प्रलाप को कानों से सुनकर वानरों के समूह व्याकुल हो गए। (इतने में ही) हनुमान्‌जी आ गए, जैसे करुणरस (के प्रसंग) में वीर रस (का प्रसंग) आ गया हो॥61॥
चौपाई :

* हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥1॥

भावार्थ:-श्री रामजी हर्षित होकर हनुमान्‌जी से गले मिले। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यंत ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य (सुषेण) ने तुरंत उपाय किया, (जिससे) लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे॥1॥

* हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥2॥

भावार्थ:-प्रभु भाई को हृदय से लगाकर मिले। भालू और वानरों के समूह सब हर्षित हो गए। फिर हनुमान्‌जी ने वैद्य को उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया, जिस प्रकार वे उस बार (पहले) उसे ले आए थे॥2॥

चौपाई :
* यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥3॥

भावार्थ:- यह समाचार जब रावण ने सुना, तब उसने अत्यंत विषाद से बार-बार सिर पीटा। वह व्याकुल होकर कुंभकर्ण के पास गया और बहुत से उपाय करके उसने उसको जगाया॥3॥

* जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥4॥

भावार्थ:- कुंभकर्ण जगा (उठ बैठा) वह कैसा दिखाई देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो। कुंभकर्ण ने पूछा- हे भाई! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं?॥4॥

* कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे॥5॥

भावार्थ:-उस अभिमानी (रावण) ने उससे जिस प्रकार से वह सीता को हर लाया था (तब से अब तक की) सारी कथा कही। (फिर कहा-) हे तात! वानरों ने सब राक्षस मार डाले। बड़े-बड़े योद्धाओं का भी संहार कर डाला॥5॥

* दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥6॥

भावार्थ:-दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्य भक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमि में मारे गए॥6॥

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गुरुवार, 14 अगस्त 2025

⚜️️⚜️️बोले बचन मनुज अनुसारी॥ मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥4॥⚜️️⚜️️घटना - 324⚜️️मनुज लीला ⚜️️भरतजी के बाण से हनुमान्‌ का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान्‌ संवाद ⚜️️श्री हनुमान और भरतजी के मिलने का प्रसंग : ⚜️️⚜️️

श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]
   
[ घटना - 324: दोहा -58, 59,60]

>>श्री हनुमान और भरतजी के मिलने का प्रसंग .... 

  
⚜️️⚜️️मनुज लीला⚜️️⚜️️
  
 * तात कुसल कहु सुखनिधान की। 
सहित अनुज अरु मातु जानकी॥

          सुमेरु पर्वत को हाथों में लिए अयोध्या नगरी के ऊपर से जाते हुए हनुमान का विशाल रूप देखकर, भरत ने अनुमान किया कि ये कोई राक्षस है। उन्होंने धनुष की प्रत्यञ्चा को कान तक खींचकर बिना फल वाला वाण मारा। वाण लगते ही हे राम -राम, हे रघुनाथ ! कहते हुए हनुमान पृथ्वी पर आ गिरे। हे राम ! हे रघुनाथ ! की ध्वनि सुनकर , भरत दौड़ कर उनके पास आ पहुँचे। हतप्रभ होकर वो हनुमानजी से सबकुछ जान लेना चाहते हैं। किन्तु उनकी मूर्छा न टूटते देख उदास हो , उन्हें छाती से लगा लेते हैं। वो श्रीराम के प्रति अपने प्रेम और समर्पण की दुहाई देते हुए , कहते हैं - यदि श्रीराम के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो , और श्री रघुनाथ मुझपर प्रसन्न हों तो , ये वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाये !! कौशलपति श्रीरामचन्द्र की जय ! कहते हुए हनुमान उठ बैठते हैं। श्रीराम , सीता और लक्षण के कुशल की जिज्ञासा के उत्तर में हनुमान उन्हें सारी कथा संक्षेप में सुना देते हैं --  

दोहा :
*देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ, चाप श्रवन लगि तानि॥58॥

भावार्थ:- भरतजी ने आकाश में अत्यंत विशाल स्वरूप देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा॥58॥ 

चौपाई :
* परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक॥
सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥1॥

भावार्थ:- बाण लगते ही हनुमान्‌जी 'राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावली से हनुमान्‌जी के पास आये॥1॥

* बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥
मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥2॥

भावार्थ:-हनुमान्‌जी को व्याकुल देखकर उन्होंने हृदय से लगा लिया। बहुत तरह से जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजी का मुख उदास हो गया। वे मन में बड़े दुःखी हुए और नेत्रों में (विषाद के आँसुओं का) जल भरकर ये वचन बोले-॥2॥ 

* जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥
जौं मोरें मन बच अरु काया॥ प्रीति राम पद कमल अमाया॥3॥

भावार्थ:- जिस विधाता ने मुझे श्री राम से विमुख किया, उसी ने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीर से श्री रामजी के चरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो,॥3॥ 

* तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥4॥

भावार्थ:- और यदि श्री रघुनाथजी मुझ पर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए। यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमान्‌जी 'कोसलपति श्री रामचंद्रजी की जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे॥4॥

सोरठा :
* लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल।
प्रीति न हृदय समाइ
सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥59॥

भावार्थ:- भरतजी ने वानर (हनुमान्‌जी) को हृदय से लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में (आनंद तथा प्रेम के आँसुओं का) जल भर आया। रघुकुलतिलक श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके भरतजी के हृदय में प्रीति समाती न थी॥59॥

चौपाई :
* तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥
लकपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने॥1॥

भावार्थ:- (भरतजी बोले-) हे तात (=पूज्य ,पिता ,आदरणीय व्यक्ति)! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकी सहित सुखनिधान श्री रामजी की कुशल कहो। वानर (हनुमान्‌जी) ने संक्षेप में (समास) सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुःखी हुए और मन में पछताने लगे॥1॥

* अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ॥
जानि कुअवसरु मन धरि धीरा।
पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥2॥

भावार्थ:- हा दैव! मैं जगत्‌ में क्यों जन्मा? प्रभु के एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मन में धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्‌जी से बोले-॥2॥

* तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥
चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥3॥

भावार्थ:-हे तात! तुमको जाने में देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जाएगा। (अतः) तुम पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपा के धाम श्री रामजी हैं॥3॥

* सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥
राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥4॥

भावार्थ:-भरतजी की यह बात सुनकर (एक बार तो) हनुमान्‌जी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? (किन्तु) फिर श्री रामचंद्रजी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर बोले-॥4॥

दोहा :
* तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥60 क॥ 

भावार्थ:- हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजी के चरणों की वंदना करके हनुमान्‌जी चले॥60 (क)॥

* भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥60 ख॥

भावार्थ:-भरतजी के बाहुबल, शील (सुंदर स्वभाव), गुण और प्रभु के चरणों में अपार प्रेम की मन ही मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्री हनुमान्‌जी चले जा रहे हैं॥60 (ख)॥ 

चौपाई :
* उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥1॥

भावार्थ:- वहाँ लक्ष्मणजी को देखकर श्री रामजी साधारण मनुष्यों के अनुसार (समान) वचन बोले- आधी रात बीत चुकी है, हनुमान्‌ नहीं आए। यह कहकर श्री रामजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को उठाकर हृदय से लगा लिया॥1॥

* सकहु न दुखित देखि मोहि काउ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥2॥

भावार्थ:- (और बोले-) हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदा से ही कोमल था। मेरे हित के लिए तुमने माता-पिता को भी छोड़ दिया और वन में जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया॥2॥ 

*सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू।
पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥3॥

भावार्थ:-हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्वक वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वन में भाई का विछोह होगा तो मैं पिता का वचन (जिसका मानना मेरे लिए परम कर्तव्य था) उसे भी न मानता॥3॥

* सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥4॥

भावार्थ:-पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार- ये जगत्‌ में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्‌ में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदय में ऐसा विचार कर हे तात! जागो॥4॥ 

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⚜️️🔱आत्मज्ञान प्राप्त करने के साधन (उपरति और तितिक्षा) !⚜️️🔱 विवेकचूडामणि सार | Session 8 |⚜️️🔱

आत्मज्ञान प्राप्त करने के चार साधन 

 (स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज, अध्यक्ष, अद्वैत आश्रम, मायावती।)

      हमारा लक्ष्य है - मैं कौन हूँ ? यह जान लेना या आत्मज्ञान प्राप्त कर लेना। जिसके प्राप्ति मात्र से ही मनुष्य बंधन से मुक्त हो जाता है। चार साधनों के अभाव में लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। तो ये चार साधन हुए -विवेक, वैराग्य , षट्सम्पत्ति और मुमुक्षता। विरज्य विषय व्राता :साधन चार हैं-विवेक, वैराग्य, षट-सम्पति और मुमुक्षता। 

१. विवेक.

सत्य-असत्य और नित्य-अनित्य वस्तु के विवेचन का नाम विवेक हैं| विवेक इसका भलीभांति पृथ्थकरण कर देता हैं| विवेक का अर्थ हैं, तत्व का यथार्थ अनुभव करना।  सव अवस्थाओं में और प्रत्येक वस्तु में प्रतिक्षण आत्मा-आनात्मा का विश्लेषण करते करते, यह सिद्धि प्राप्त होती हैं। 

२. वैराग्य.

विवेक के द्वारा सत-असत और नित्य-अनित्य का पृथ्थकरण हो जाने पर असत और अनित्य से सहज ही राग हट जाता हैं, इसी का नाम वैराग्य हैं।  मन में भोगो की अभिलाषायें बनी हुई हैं और वाह्य रूप में संसार से द्वेष और घृणा कर रहे हैं, इसका नाम वैराग्य नहीं हैं| वैराग्य में राग का सर्वथा आभाव होता हैं| वैराग्य यथार्थ में आभ्यंतरिक अनासक्ति का नाम हैं|

३. षट्-सम्पति.

इस विवेक और वैराग्य के फलस्वरूप साधक को छह विभागों वाली एक परिसंपति मिलती हैं, वह जब तक यह षट्सम्पत्ति पूरी (10 % से बढ़कर 100%) न मिले तब यह समझना चाहिए कि विवेक और वैराग्य में कसर हैं।  विवेक और वैराग्य से संपन्न हो जाने पर ही साधक को इस सम्पति का प्राप्त होना सहज हैं।  इस सम्पति का नाम षट-सम्पति हैं और इसके छह विभाग हैं:-

(१)-शम.
मन का पूर्ण रूप से निगृहीत, निश्चल और शांत हो जाना ही “शम” हैं। 

(२)-दम.
इन्द्रियों का पूर्णरूप से निगृहीत और विषयों के रसास्वाद से रहित हो जाना ही “दम” हैं। 

(३)-उपरति.
विषयों से चित्त का उपरत हो जाना ही “उपरति” हैं|

(४)-तितिक्षा.
तितिक्षा का अर्थ होता हैं “सहन-शक्ति”| द्वंदों का सहन करने का नाम तितिक्षा हैं| सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, मान-अपमान आदि का सहन करना भी तितिक्षा हैं परन्तु विवेक, वैराग्य और शम, दम. उपरति के अनन्तर प्राप्त होने वाली तितिक्षा तो इससे विलक्षण ही होनी चाहिए।  संसार में न तो द्वंदों का नाश हो सकता हैं और न ही कोई इससे बच सकता हैं।  किसी तरह इनको सह लेना ही उत्तम हैं, परन्तु सर्वोत्तम तो हैं-द्वंदों जगत से उपर उठकर साक्षी भाव होकर द्वंदों को देखना।  यही वास्तविक “तितिक्षा” हैं। 

(५-) श्रद्धा.
आस्तिक्यबुद्धि - अर्थात आत्मसत्ता में प्रत्यक्ष की भांति अखंड विश्वास का नाम श्रद्धा हैं।  पहले शास्त्र, गुरु और साधन में श्रद्धा होती हैं, उससे आत्म-श्रद्धा बढती हैं।  परन्तु जब तक आत्म-स्वरूप में पूर्ण श्रद्धा नहीं होती, तब तक एक मात्र निष्कलंक, निरंजन, निराकार, निर्गुण ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर, उसमें बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती। 

(६)-समाधान.
मन और बुद्धि का परमात्मा में पूर्णतया समाहित हो जाना- जैसे अर्जुन को गुरु द्रोण के सामने परीक्षा देते समय वृक्ष पर रखे हुए नकली पक्षी का केवल गला ही दिख पड़ता था-वैसे ही मन और बुद्धि  को निरंतर एक मात्र लक्ष-वस्तु ब्रह्म के ही दर्शन होते रहना, यही “समाधान” हैं।  
 
४. मुमुक्षता -

इस प्रकार जब विवेक, वैराग्य और षट-सम्पति की प्राप्ति हो जाती हैं, तब साधक स्वाभाविक ही अविद्या के बंधन से सर्वथा मुक्त होना चाहता हैं और वह सभी विषयों की ओर से चित्त हटाकर किसी ओर भी न ताककर, एक मात्र परमात्मा की ओर ही दौड़ता हैं।  उसका यह अत्यंत वेग से दौड़ना अर्थात तीव्र साधन ही उसकी परमात्मा को पाने की तीव्रतम लालसा का परिचय देता हैं, यही “मुमुक्षत्व” हैं। 

 विवेक है सत्य और मिथ्या को mixup नहीं करना -स्पष्टतः अलग अलग देखना। आज हम अपने शरीर को ही सत्य समझकर , उसके साथ व्यवहार कर रहे हैं। यही हमारी समस्या है। हमारे जीवन में जितनी भी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं -सब इसके कारण ही उत्पन्न हो रही हैं। समस्या ये है कि हमने मगरमच्छ को लक्क्ड़ समझ लिया है।  यही सभी मनुष्यों के दैनन्दिन जीवन की वास्तविकता है। कुछ इने-गिने लोगों के अंदर ही, ईश्वर की कृपा से - माँ सारदा देवी की कृपा से ये  विवेक जो है -वो जग जाती है। सत्य-मिथ्या का विवेक जगजाने पर आपका व्यवहार स्वतः बदल जाता है। सभी इन्द्रियगोचर वस्तु नश्वर है। दृष्ट-नष्ट स्वभाव है ! जिस वस्तु से आप मोहित हो रहे हो , वो तो नष्ट हो रहा है। अविवेकी मनुष्य सुंदर सुंदर रूपों को देखकर मोहित हो जाता है। 

       विवेकी दृष्टि रहने से इन्द्रियगोचर विषयों के प्रति वैराग्य उत्पन्न होगा। It is a natural outcome-  It is a Natural blossoming of flowers- विवेकी जीवन-पुष्प का स्वाभाविक प्रस्फुटन - विवेकरूपी कली से जो खिलने वाला फूल है , वो है वैराग्य ! वैराग्य जोर- जबरदस्ती करके नहीं आता , ये इन्द्रिय विषयों का प्रचुर भोग करने से भी नहीं आता। विवेक का स्वाभाविक प्रतिफलन है वैराग्य। आप जोर-जबरदस्ती करके , ये गेरुआ वस्त्र पहना करके किसी को वैरागी नहीं बना सकते।  When Viveka Blossoms , it Blossoms in the form of Vairagya ! जब आप जानते हो कि मैं क्या देख रहा हूँ ? तब इस व्यक्ति को ब्रह्माण्ड का कोई भी चीज प्रभावित नहीं कर सकता। तो वैराग्य क्या है ? हमारे आचरण में एक अद्भुत बदलाव है। तद्वैराग्यं जिहसा य दर्शनश्रवनादिभिः | देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यानित्ये भोगवस्तुनि।।' अविवेक की दशा में इन्द्रिय विषयों को भोग करने की इच्छा होती है। इन्द्रिय विषयों को भोग करने की वासना कभी खत्म नहीं होगी। इन्द्रिय-भोगों प्रवृत्त रहने तक इसका कोई अंत नहीं है। वैराग्य होने से व्यक्ति भोग करने की लालसा छोड़ देता है , या लालसा ही उसको छोड़ देती है। भोग करने की Tendency को छोड़ देता है। वैराग्य होने षट्सम्पत्ति प्राप्त होती है। वैराग्य होने पहली सम्पत्ति शम -मन का निग्रह, वैराग्य होने से मन तो वश में ही रहेगा, लालसा ही नहीं हो क्या भोग करेगा ? ये सनातन सत्य है , 10,000 वर्ष पहले इकलाख वर्ष पहले भी यही सत्य था। दस लाख वर्ष पहले और बाद में भी यही सत्य होगा। विवेक होने से वैराग्य प्रस्फुटित हो जायेगा। इसीको सनातन धर्म कहते हैं। यह किसी व्यक्ति या ग्रन्थ पर निर्भर नहीं करता। ये सनातन सत्य किसी एक राष्ट्र या किसी एक मजहब के लिए नहीं है , यह सार्वभौमिक सत्य है। आप कोई भी भाषा बोलिये -ये सबके लिए लागु होता है। सभी ऋषियों की यही वाणी है। पूरे विश्व में सनातन जैसा दूसरा कोई सिस्टम नहीं है। मन की चंचलता को धनसम्पत्ति शांत कर सकती है क्या ? मन का निग्रह ही सुख है। हमारे साथ धोखा हो रहा है। वैराग्य के बाद शम को परिभाषित करते हैं - 

विरज्यविषयव्राताद्दोषदृष्टया मुहुर्मुहुः।
स्वलक्ष्ये नियस्थ मनसः शम् उच्यते
॥ 22 ॥  

 22. पाँचो इन्द्रिय-विषय भोगों बारम्बार दोषदृष्टि करने से, विषय-समूह से विरक्त होकर चित्त का अपने लक्ष्य - आत्मा, (अपने लक्ष्य -ब्रह्म या ह्रदय में विद्यमान ठाकुर देव की भक्ति में) में स्थिर हो जाना ही शम या शांति कहलाता है।  

विरज्य विषय व्राता  मनसः शम उच्यते

     'मनसः शम् उच्यते ' अपने मनुष्य जीवन के लक्ष्य में स्थिर हो जाने को ही मन का 'शम' कहते हैं। मन को वश में करने का कार्य दो चरण में होगा। पहला चरण है मन को विषयों से पीछे हटा लेना। दूसरा स्टेप है मन को सही स्थान में लगा देना। दो steps हैं। इस प्रकार मन निग्रहीत हो जाता है।  फिर 'विरज्य विषय व्राता'- विरज्य माने जितने भी भोग के विषय हैं, उससे मन को पीछे खींच लेना।  इन्द्रियों से दिखने वाले जितने भी भोग के विषय हैं , जिसके पीछे सर्वसाधारण अविवेकी मनुष्य दौड़ता रहता है। अविवेक का आचरण और विवेकी का आचरण अलग अलग होगा। विवेकी जानता है कि सत्य क्या है , मिथ्या क्या है ? (19 मिनट) पता हो ने पर  मिथ्या वस्तु से उसका मन अपने-आप हट जाता है। स्वाभाविक रूप से आता है। यही मनोविज्ञान है - सारे विषय रूप,रस आदि तो हमारे मन को खींच रहे हैं। यही Human behavior है , ऐसा सब के साथ होता है। यही खेल चल रहा है , हमें पता नहीं है - मन को विषयों में जाने से खींचे ? समाज में सुंदर -सुंदर वस्तु हैं, विषय हैं , और व्यक्ति हैं - सुंदर, सुंदर व्यक्ति हमारे मन को आकृष्ट कर लेते हैं। जब तक हम अविवेकी हैं , मन उस विषय में जाकर चिपक जाता है। अभी हम स्वतंत्र हैं , या मन के गुलाम हैं ?यही बंधन है।  और मोक्ष क्या है ? अपने ऊपर , या मन के ऊपर विजय प्राप्त कर लेना -यही मोक्ष है। जो मनुष्य 'विवेकी' हो जाता है, उसको तो सत्य-मिथ्या का भेद पता है - वो बड़ी आसानी से अपने मन को नश्वर विषयों से खींचकर, शाश्वत आत्मा में बैठा देता है ! मन को विषयों से पीछे खींचने - प्रत्याहार होता है -दोष दृष्टया मुहुर्मुहुः।' बार बार विषय-भोगों के परिणाम में दोष देखने से। जो विषय-भोग अगले ही क्षण नहीं रहेगा , यह जानकर मन को विषयों से खींच सकते हो। मानलो किसी व्यक्ति से आपका मन लगा हुआ है - पर उसका स्वाभाव तो प्रतिक्षण बदल रहा है ? लेकिन उन विषयों और व्यक्तियों से मन को खींचकर जब हम अपने अन्तर्निहित आत्मा में बैठाने का प्रयास या धारणा का अभ्यास करते रहेंगे हम में से प्रत्येक व्यक्ति को एक न एक दिन अपने स्वरुप का ज्ञान हो जायेगा। कितना सुंदर रूप है , अगर इसको मैं प्राप्त कर लूँ तो मैं सुखी हो जाऊँगा। 

      ज्ञानमयी दृष्टि : अविवेकी में सभी इन्द्रिय-विषयों के प्रति गुण दृष्टि होती है , दोषदृष्टि नहीं होती। विवेकी के लिए हर भोग विषयों के प्रति दोषदृष्टि रहता है। दोष देखना माने - प्रत्येक इन्द्रियविषय क्या है ? वस्तु या व्यक्ति मिथ्या है - क्षणभंगुर है , वो बदल रहा है ,यह स्थायी समझ हो जाना। जैसे कोई जादू की चीज है , जादूगर ही सत्य है - वो जिन चीजों को बना रहा है - वो दीखता है , पर वो होता नहीं है। विषयों के पीछे दौड़ना -उस गढ़े में गिरने के समान है ,जिसकी कोई तली है ही नहीं। वैरागी व्यक्ति का मन हर समय शांत ही होगा।  क्योंकि अब कोई चीज उसको प्रलोभित नहीं कर सकता। उसकी दृष्टि बदल गयी है , वह अब लहरें नहीं देखता , समुद्र देखता है। प्रत्येक मनुष्य में यह योग्यता है। इसलिए 'जंतुनाम नर जन्म दुर्लभं' ! मनुष्य शरीर में जन्म लेने पर इस ज्ञानमयी दृष्टि को प्राप्त करना ही दुर्लभ है। 'शम' सिद्ध होने पर जब मन विषयों के पीछे दौड़ना छोड़ देता है , तब उसकी इन्द्रियाँ भी अपने-आप निग्रहीत हो जाती हैं। इसीको 'दम' कहते हैं। 

         इन्द्रियों का मूल स्वभाव क्या है ? सब समय बाहर देखना। इन्द्रियों का प्रोग्रामिंग ही उस प्रकार का है। जिस प्रकार कोई मशीन प्रोग्राम किया होगा , वो उसी प्रकार काम करेगा। कठोपनिषद में इन्द्रियों का स्वभाव बताया गया है - 

पराञ्चिखानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्‌।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैषदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्‌ ॥

'स्वयंभू' ने- अर्थात स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने  देह के द्वारों को बहिर्मुखी बनाया है, इसीलिए मनुष्य की आत्मा इंद्रियों के द्वारा बाहर की ओर देखती है, 'अन्तरात्मा' को नहीं ː यत्र-तत्र कोई विरला (माँ की कृपा से) ज्ञानी पुरुष (धीर पुरुष) होता है जो अमृतत्व की इच्छा (अमरपद को पाने की इच्छा) करते हुए,  दृष्टि को अन्तर्मुखी करके या अपनी  चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर, 'अन्तरात्मा' को देखता है। 

[ The Self-born hath set the doors of the body to face outward, therefore the soul of a man gazeth outward and not at the Self within; hardly a wise man here and there desiring immortality turneth his eyes inward and seeth the Self within him.] 

उपनिषदों में ज्ञान का खजाना है -प्रत्येक युवक-युवतियों को पढ़ना चाहिए। हमारा शरीर एक अद्भुत मशीन है -इसके चेहरे पर दो गड्ढों में दो बटन को फिट कर दिया गया है, यह दैवी इंजीनियरिंग है। इन दो आँखों का प्रोग्राम ही ऐसा हुआ है कि बाहर के इन्द्रियविषयों को ही देखेंगी। कान में भी दो गड्ढे हैं , उसके अन्दर कर्णेन्द्रिय फिट है। नसिकाएँ भी दो गड्ढे हैं -उसके अंदर घ्राण इन्द्रिय फिट हैं। हमारे शरीर में 9 गड्ढे है - उपनिषद या गीता में उसको 9 द्वारा कहते हैं।

 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।

(गीता 5.13)  

जिसकी सब इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी संयमी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी 'पुर' में या 'नगरी' में सुखपूर्वक रहता हुआ - 'नैव कुर्वन् न कारयन्' न कर्म करता है , न करवाता है। 

       लेकिन हमलोग अभी इन 9 द्वारों के अंदर से सब समय बाहर ही जा रहे हैं। हमारी सारी शक्ति या चेतना जो है वो कैसी है - बहिर्मुखी है। हमलोग हमेशा वाह्य इन्द्रियवस्तुओं के पीछे दौड़ते रहते हैं या नहीं ? आँखों से रूपों के पीछे भागना है , कानों से वेज -नॉनवेज गाने सुनना है, स्पर्श इन्द्रियाँ हैं तो मुलायम -गर्म छू कर देखना है , इन इन्द्रियों को चंचल कौन बनाता है ? विषय। जिन विषयों को हम सत्य मान रहे हैं - वही तो अविवेक है। और हमारी ऐसी धारणा है कि इन विषयों का उपभोग करके हम सुखी हो जायेंगे। जैसे ही कोई विषय दिखेगा -हमारी इन्द्रियों में खलबली शुरू हो जाएगी। सभी मानव-मशीनों को ऐसे ही प्रोग्राम किया गया है। हमारी 5 ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और 5 कर्मेन्द्रियाँ हैं। 5 ज्ञानेन्द्रियाँ कौन कौन हैं ? आँख, कान , नाक, जिह्वा , और त्वचा। रूप-रास-शब्द-गंध और स्पर्श इन पांच विषयों को हम पाँच इन्द्रियों से हम अनुभव कर रहे हैं। 5 कर्मेन्द्रिय कौन कौन से है ? हाथ है , पैर हैं , फिर ये जो वाणी है - जो हम बोल रहे हैं , ये भी कर्म इन्द्रिय है। और जो हमारा उपस्थ Sexsual organ है , और जो मलत्याग करने organ है। हमारे ऋषियों इन इन्द्रियों की तुलना अश्वों के साथ घोड़ों के साथ की है। ऐसे बड़े-बड़े जंगली घोड़े जिसपर काबू नहीं पाया जा सकता। Untamed (अदम्य) wild Horses ! हमारे दसों इन्द्रियों की तुलना जंगली घोड़ों से की गयी है। छह छह फिट के अरेबियन घोड़े , उसको कोई काबू नहीं कर सकता। इन्द्रियों पर वश प्राप्त करना उतना ही कठिन कार्य है , जितना जंगली घोड़ों को वश में करना कठिन कार्य है। हमसभी इन्द्रियों के गुलाम हैं , और इन्द्रियाँ मन के माध्यम से विषयों की गुलाम हैं। हम समझ रहे हैं कि विषयों के पीछे पीछे घूम करके हम सुखी होने वाले हैं। ये उस गड्ढे में गिरने के समान है -जिसमें तली है ही नहीं।  ये इद्रियाँ  रूपी घोड़े दौड़ते रहते हैं , दौड़ते रहते हैं - लेकिन पहुँचते कहाँ हैं ? कहीं पहुँचते हैं क्या ?आप किसी 70-80 साल के वयोवृद्ध व्यक्ति से पूछिए - कहाँ पहुँचे हैं ? कहीं नहीं पहुँचे। 60 -70-80 वर्ष इस शरीर में रहकर जी लिए - पहुँचे कहाँ ? बाहर क्या मिला हमको ? बहुत बड़ा प्रश्न है। तो जगत मिथ्या है या सत्य ? इन सब प्रश्नों पर आपको मनन करके सच्चाई को समझना होगा। इन्द्रिय विषयों पर विजय कैसे प्राप्त करेंगे ? दम को परिभाषित करते हुए शंकराचार्यजी कहते हैं - 

विषयेभ्यः परावर्त्य  स्थापनं स्व-स्वगोलके |
उभयेषामिन्द्रियाणां स दमः परिकीर्तितः। 
बाह्यानालम्बनं वृत्तेरेशोपरतिरुत्तमा || 23 ||

23. दोनों प्रकार की इंद्रियों को इंद्रियविषयों से हटाकर उनके अपने-अपने केंद्रों में स्थापित करना, दम या आत्म-संयम कहलाता है। सर्वोत्तम उपरति या आत्म-संयम वह है जिसमें मन बाह्य विषयों के माध्यम से कार्य करना बंद कर देता है। (नोट: दोनों प्रकार की इन्द्रियाँ - अर्थात् ज्ञान इन्द्रियाँ और कर्म इन्द्रियाँ। )

      आचार्य शंकर कहते हैं -विषयेभ्यः परावर्त्य' -इन्द्रियों को विषयों से पीछे खींच करके परावर्तन करके। जैसे घोड़े दौड़ते हैं , वैसे इन्द्रियां भी विषयों के पीछे दौड़ती रहती हैं। जैसे आप लगाम को खींच करके, लगाम के द्वारा घोड़ों को रोक लेते हैं। उसी प्रकार इन इन्द्रियों को विषयों में जाने से खींच करके रोकना। और अपनी जगह पर ही उसको खड़ा करना - उस घोड़ों को आगे बढ़ने नहीं देना। 'विषयेभ्यः परावर्त्य  स्थापनं स्व-स्वगोलके।' उन इन्द्रियों को अपने अपने गोलक में ही स्थापित रखना। उभयेषामिन्द्रियाणां - दोनों प्रकार के इन्द्रियों को इस प्रकार उनके गोलकों में स्थापित रखने को ही दम कहते हैं। एक प्रश्न विचारणीय है -अगर आपका मन निग्रहीत नहीं हों , क्या इन्द्रियाँ निग्रहीत हो सकती हैं ? और वैराग्य के अभाव में मन निग्रहीत हो सकता है क्या ? और विवेक के अभाव में वैराग्य आ सकती है क्या ? दम या इन्द्रियों का निग्रह निर्भर है शम के ऊपर। और शम निर्भर करता है वैराग्य पर। और वैराग्य किस पर निर्भर करता है ? वैराग्य निर्भर करता है - विवेक पर। इसीलिए विवेक क्या है ? चूड़ामणि !! समझ रहे हैं ? विवेक से बढ़ कर कोई शिक्षा नहीं है ! विवेक जब आ जायेगा , तो हमारे व्यक्तित्व में ये सभी बदलाव आना शुरू हो जायेगा। चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा की शुरुआत विवेक से होती है। विवेक आ गया तो अपने-आप वैराग्य आ जायेगा। आपको यह समझ में आ जाता है की ये मिथ्या जगत है -इसके पीछे दौड़ना सबसे बड़ी बेवकूफी है।   

     जब वैराग्य आ गया तो , तो आप बहुत आसानी से मन को विषयों में जाने से पीछे खींच सकते हो , और सही जगह पर -आत्मा में बैठा सकते हो। मन शांत हो गया तो अब इन्द्रियाँ भी विचलित नहीं होंगी। इन्द्रियां भी बिल्कुल अपने अपने गोलकों में रहेंगी। देखो बच्चों व्यक्तित्व में कैसा सुंदर बदलाव आ रहा है? आपलोगों ने 'Personality Development'  (44.04 मिनट) के बारे में सुना होगा। Motivational Speaker ' लोग बड़ी लम्बी लम्बी लेक्चर देते है - चूड़ामणि की बात कोई नहीं करता। ये छोड़कर सब बातें करते हैं , असली चीज कोई नहीं बताता। ऐसा चरित्र गठन करने से ही सुंदर व्यक्तित्व बनता है। जो अविवेकी है -वो गुलाम है , जो विवेकी है वो स्वाधीन है। है की नहीं ? जैसे जैसे उत्तरोत्तर हम जो भी षट्सम्पत्ति पाते जाते हैं - वो हमको अधिक से अधिक स्वाधीन बनाता जा रहा या नहीं ? इसका उल्टा क्या - पूरा गुलामी है , पारधीनता है।  

     उदाहरण के लिए आप विवेकानन्द के व्यक्तित्व को ले लीजिये। उनके अंदर ये सारी चीजें दिखाई देतीं है या नहीं ? हम इन महापुरुषों का अनुसरण क्यों कर कर रहे हैं ? उनका जीवन देखिये। वे अमेरिका में कितने सुंदर -सुंदर रूपों के निकट सम्पर्क में रहते थे , पर किसी भी रूपसे प्रलोभित क्यों नहीं होते थे ? रमणमहर्षि को क्या कोई प्रलोभित कर सकता है ? रामकृष्ण परमहंस को क्या आप कोई सुंदर रूप दिखाकर प्रलोभित कर सकते हैं ? वो तो कामिनी-कांचन का स्पर्श भी नहीं करेंगे। क्यों - उनकी दृष्टि ही अलग है। हम तो प्रलोभन में पड़कर बिल्कुल इन विषयों के गुलाम हो जाते हैं। यही दो व्यक्तित्व का अंतर् है। यह किसी व्यक्ति को पूजा करने की बात नहीं है -हमलोग रामकृष्ण-विवेकानन्द की पूजा करने में लग जाते हैं। पूजा करने की बात नहीं है उन महापुरुषों के जीवन में जो गुण हैं , उन गुणों को अर्जित करना है। विवेकानन्द के नाम में ही विवेक है। विवेक से, विवेकदर्शन के अभ्यास से ,या विवेकज- ज्ञान से उत्पन्न होने वाला आनंद ही सही आनंद हैइस दृष्टि हम सबको विवेकानन्द होना है। उनका नकल करने की चेष्टा मत कीजिये -कालनेमि बनके रह जाइएगा। वो हम कभी नहीं हो पाएंगे। गुण की दृष्टि से विवेक तो हम सभी कर सकते हैं। इन गुणों को अर्जन करने से आपके अंदर भी विवेकानन्द की अनुभूति होगी - तो ये है विवेकानन्द। समझते हो भाई ? चूँकि विवेकानन्द ऐसे थे इसलिए हम उनको पूजते हैं। शंकराचार्य जो कुछ कह रहे है -वे उसके प्रतिमूर्ति हैं। रामकृष्ण के जीवन को आपलोग अवश्य पढ़िए -ऐसा एक अद्भुत जीवन था उनका। कोई श्रेष्ठ- कनिष्ठ की बात नहीं है - इनके जीवन में ये सब दीखता है। विवेक-वैराग्य -शम -दम षटसंम्पति वे उसमें पारंगत हैं। हमारे जीवन में अब तक ये शुरू नहीं हुआ है। होना चाहिए। इस साधन चतुष्टय में विकसित होना ही  'Personality Development' है। एक बलवान पुरुष एक बलवान स्त्री - गुलाम नहीं। महान जीवन गठन का यही रहस्य है। इसी से एक महान चरित्र बनता है - कोई शक ? उसीके लिए हमलोग इस शिविर में आये हैं। अब विवेक, वैराग्य , शम , दम हो गया तब और एक सुंदर विकास होगा - उपरति। उसकी परिभाषा है - 

बाह्यानालम्बनं वृत्तेरेषोपरतिरुत्तमा। 

वृत्ति का बाह्य विषयों का आश्रय न लेना यही उत्तम 'उपरति ' है। अब इस व्यक्ति के मन को कोई भी बाहरी व्यक्ति , विषय प्रभावित नहीं कर सकता । क्या सुंदर विकास है ! आज हमारा मन हर चीज से प्रभावित है - These Objects are ruling our mind -हमरा मन विभिन्न वस्तुओं का गुलाम है। गुलाम बने रहने का एकमात्र कारण है - अविवेक ! हर विषय हमारे मन को प्रभावित कर रहा है। चित्त पर छाप छोड़ रही है -आप मोबाईल में कोई वीडियो देख रहे हो , वो दृश्य चला गया, पर आपके मन पर उसका छाप पड़ गया या नहीं ? रूप चला गया लेकिन मन के अंदर वो वस्तु घुस गया। आपके मन को प्रभावित कर रहा है -दुबारा देखने को प्रलोभित कर रहा है। ये सत्य है कि नहीं ? अपने उस वस्तु को केवल दूर से देखा -किन्तु वो वस्तु आपके मन में प्रवेश कर गया। आपका मन तभी प्रभावित होगा जब उसमें अविवेक होगा। विवेकी मन को कुछ भी प्रभावित नहीं कर सकता। क्योंकि उसकी दृष्टि ही अलग है। क्या सुंदर चरित्र विकसित हुआ है ? आप और भी अधिक स्वतंत्र होते जा रहे हो। सारी गुलामी खत्म हो रही है। जब शम और दम होगा , तब अपने आप ही उपरति आ जाती है। ये मन की वैसी दशा है , जिसमें बाह्य किसी भी वस्तु वह प्रभावित नहीं होगा। बाह्य वस्तु की तरफ आसक्त हो जाने की जो एक पारधीनता थी -उस पराधीनता से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। यह मन अब स्वाधीन हो गया - बाह्यानालम्बनं किसी भी बाह्य विषय पर आश्रित नहीं है। ये विवेकानन्द है - विवेकानन्द के जीवन में कभी अपने देखा है किसी चीज से प्रलोभित होते हुए ? विवेकग्नि में कुछ भी डालो वो भष्म हो जाता है। ऐसा हम बनें -यही जीवन का लक्ष्य है। इस स्वतंत्रता को प्राप्त करना है। बाह्य वस्तुएं हर कदम पर हमको प्रलोभित कर रही हैं और उस प्रलोभन में हम गिर भी जाते हैं। हमलोग हर समय विषयों के गुलाम हैं। इसके पीछे कारण सिर्फ अविवेक है - 1986 का हरिद्वार कुम्भ में सबसुखदास को बाबा रामसुखदास ने यही समझाया था , आज समझ में आया ? जब इन्द्रियाँ विषयों के संपर्क में आती हैं तो हमको उसमें से कुछ रस मिलता है। जो रस मिला था - वो क्या शाश्वत है ? विषयरस तो क्षणिक ही है। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाला रस नश्वर है -खत्म हो जाता है। जब तक हम कामिनी -कांचन में आसक्त हैं , ऊँट बबूल के काँटें को चबा रहा है - यही स्थिति है हमारी। इन्द्रियों के द्वारा विषयों से जुड़ने से जिस रस की अनुभूति होती है , उसका एक शुरुआत है और उसका एक अंत है। Human system का हम अध्यन कर रहे हैं - हर व्यक्ति को इन्द्रिय विषयों से जुड़ने पर एक रस की अनुभूति होती है। लेकिन वह रस शाश्वत नहीं है क्षणिक है। इन्द्रियों के विषय से जुड़ने पर रस का आभास होता है , फॉर जैसे ही इन्द्रियाँ विषय से  अलग होते ही खत्म हो जाती है। ये सिर्फ रस का आभास है , ये सही सुख नहीं है। सारे जीवजंतु प्राणी इसी क्षणभंगुर रस को भोगने के पीछे दौड़ रहे हैं। विषयरस (56 मिनट) मनुष्य को कभी भी तृप्त नहीं कर सकता। मनुष्य को पूर्णता नहीं दे सकता। आप इन्द्रियों को विषयों के साथ कितनी देर तक जुड़े रह सकते हो ? आपकी इन्द्रियां थक जाएँगी। आप एक सिनेमा को कितनी देर देखोगे ? 2 घंटा ? चलो एक साथ दो सिनेमा देख लोगे।  पर तीसरा सिनेमा में आपके सर में दर्द शुरू हो जायेगा। चौथे में आप भाग जाओगे। तो फिर उस सिनेमा में आनंद है क्या ?  प्रश्न है ? सिनेमा देखने में भी रस तो मिलता ही है। अगर उसमें सचमुच रस है - तो हम उससे चिपके ही रहते ? 6 घंटे देख लिए तो आपकी इन्द्रियाँ थक जाएँगी।  (मल्लेपुर का) पहला रसगुल्ला जब खाये थे तो आपको उसमें रस का आभास हुआ था। दूसरे में भी मिलेगा। 10 रसगुल्ला खा लो तो उल्टी हो जायेगा।  रसगुल्ला खाना एक Very Innocent joy है। रोज खाना। इसको नहीं छोड़ना है। शरीर strong होना चाहिए , हमारी बेटियों के लिए भी और हमारे बेटों के लिए भी। शरीर को मजबूत होना चाहिए। पौष्टिक अहार कीजिये , व्यायाम कीजिये और इस शरीर रूपी आश्चर्यजनक मशीन का सदुपयोग कीजिये। इसको गड्ढे में मत धकेलिए। आप कहीं नहीं पहुंचोगे।  इतना ही। इसका सदुपयोग करके परमानन्द ' जो हमारा गन्तव्यस्थान है , हम वहाँ तक पहुँच जायेंगे। पहला रसगुल्ला जब खाये थे तो आपको उसमें रस का आभास हुआ था। दूसरे में भी मिलेगा। 10 रसगुल्ला खा लो तो उल्टी हो जायेगा। इन्द्रियों से जिस ये रस की अनुभूति होती है , उसकी सीमा है। ये क्षणिक है , हमें रस का आभास होता है। इस आभासी रस पाने के चक्कर में ही हम इस गड्ढे में गिरते रहते हैं, जिसका अंत नहीं है।  असली रस तो इसमें है ही नहीं। ये एक प्रकार की वंचना है , हमें धोखा दिया जा रहा है। असली रस तो ह्रदय में है। रमणमहर्षि, विवेकानन्द जैसे महापुरुष भी रसगुल्ला खाते हैं -लेकिन उसके गुलाम नहीं हैं। देंगे तो एक खा लेंगे। लेकिन रसगुल्ला के बैगर भोजन होगा ही नहीं - ऐसा नहीं है। जगत में ऐसा कुछ नहीं है -जिसके बिना हमारा चलेगा नहीं। जिसके आप गुलाम हो जिसके बगैर आप रह नहीं सकते हो। "There should be nothing in this world without which you can not live and exist ." --इस दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं होनी चाहिए जिसके बिना आप जीवित न रह सकें। इस सृष्टि में ऐसा कोई चीज नहीं है , जिसके आप गुलाम हो, जिसके बिना आप रह नहीं सको। आप नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वतंत्र वस्तु हो - वो क्या है? उसकी ही खोज है।  आप किसी के भी इन्द्रिय-विषय के अधीन नहीं हो यही अब समझना है। 

       तो हमने देखा -विवेक होता है तो वैराग्य होता है। वैराग्य होता है तो क्या होता है ? मन निग्रहीत हो जाता है - शम होता है। मन निग्रहीत हो जाने पर इन्द्रियाँ निग्रहीत हो जाती हैं। 'दम' या इन्द्रियाँ हो जाने पर मन इस प्रकार का हो जाता है कि अब वह साधक बाहर की किसी भी वस्तु से प्रभावित नहीं होता। उसको कितनी स्वतन्त्रता हो जाती है ? अद्भुत स्वतन्त्रता है कि नहीं ? अगर आप समाज में - परिवार में , घूमफिर रहे हो पर किसी की बोली का , किसी भी दृश्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है ! बात और दृश्य से बिल्कुल अछूता रह जाते हो। वो व्यक्ति बाहर से देखने पर वो भी एक पुरुष है ,या एक स्त्री है -लेकिन उसका मन ऐसा बन गया है कि वो अब कालनेमियों से दूर रहने की कला सीख गया है। अपने किसी निकटम रिश्तेदार , या अन्य निकम्मे बुड्ढों द्वारा ईर्ष्या पूर्वक देखने से, जो कहीं भी नहीं पहुँचे - जिंदगी भर यूरोप-गोवा , चारधाम की यात्रा भी कर ली -पर पहुँचे कहीं नहीं- वैसे किसी निकम्मे अविवेकी के ताने ताने से भी , बचकर निकल जाते है , और अप्रभावित रहते हैं। किंतना सुंदर चरित्र बन गया ? यही असली व्यक्तित्व है।  Absolutely uninfluenced and untempted by the so called attractive objects  आप इस तथाकथित उच्च सोसाइटी में घूमिये पर बिल्कुल अप्रभावित और संसार के तथाकथित आकर्षक वस्तुओं से - तीनों ऐषणाओं से अप्रभावित रहिये। What a great Freedom it is - इसीको फ्रीडम या अनासक्ति कहते हैं। इसीको स्वतंत्रता कहते हैं , इसीको मोक्ष कहते हैं।  [अप्रलोभित रहिये,  लेकिन किसी प्रलुब्ध अविवेकी रिश्तेदार या कालनेमि गुरुगिरी करने वाले  स्त्री या पुरुष को- मंच पर खड़े होकर लेक्चर देते समय हिराकत से बेचारा समझकर मत देखिये-.' बल्कि अपनी निर्लिप्त पवित्रता में स्थित रहिये। ] आपके व्यक्तित्व में यह कितना सुंदर बदलाव है , कितना उत्तम विकास है !!What beautiful development it is ? इसी को व्यक्तित्व विकास कहते हैं।  उपरति वाली स्वतंत्रता ही असली व्यक्तित्व है। इसीको मोक्ष कहते हैं। व्यक्तित्व विकास आप जहाँ हो वहीँ से शुरू कर सकते हो। बाहर की परिस्थिति तो वही है -बदलाव सब हमारे भीतर होता है। 

   जब उपरति होगयी यो  उस व्यक्ति का मन इतना निर्लिप्त हो गया कि बाहर की परिस्थितियों से वो अछूता है। परिस्थिति अनुकूल हो या प्रतिकूल हो उससे जब व्यक्ति प्रभावित नहीं होता।   बाहर के अनुकूलता या प्रतिकूलता से जब आप प्रभावित नहीं होते हो , ऐसा होने के कारण अब वो सबकुछ आसानी से सहन कर सकेगा। इसी गुण को ,उसीको तितिक्षा कहते हैं। हमारे जीवन में यदि विवेक नहीं हो , और परिस्थिति प्रतिकूल हो जाये तो क्या होता है ? आप उत्तेजित हो जाते हैं, परेशान हो जाते हैं, आप पूरी तरह से पटरी से उतर जाते हैं,  जब परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाती हैं - जिसको महान ऋषि समझ रहे थे , जब वो कालनेमि निकलता है तो आप सहन नहीं कर पाते हो। परिस्थितियाँ अनुकूल हों तो हम बड़े प्रसन्न हो जाते हैं। If the situation is not favorable to you ? You get agitated, disturbed, you are totally derailed, आप सहन नहीं कर पाते हो।जब परिस्थिति अनुकूल होती है तो हम बहुत खुश हो जाते हैं, और जब परिस्थिति अनुकूल नहीं होती तो हम उदास, दुखी और  हताश हो जाते हैं। When the situation is favourable we become eleted , and when it is not favorable we become depressed, moros, रोना धोना शुरू कर देते हैं।  जिसका मन उपरत है , बाहर की चीजों से प्रभावित नहीं होता है - वो सब उतार चढ़ाव को आसानी से सहन कर सकता है। सब परिस्थिति में समान रह सकता है। अब तितिक्षा की परिभाषा देखें - 

सहनं सर्वदुःखानाम, अप्रतिकारपूर्वकम् |
चिंताविलापरहितं स तितिक्षा निगद्यते || 24 ||

24. सभी दुःखों को बिना उनके निवारण की चिंता किए सह लेना, तथा उनके कारण होने वाली चिंता या शोक से मुक्त रहना, तितिक्षा या सहनशीलता कहलाती है। 

    जीवन में तो दुःख आते ही हैं।  कोई संदेह है ? है थोड़ा ? आप कहोगे जीवन में सुख भी तो है न ? लेकिन जीवन में सुख की मात्रा अगर 1 है तो दुःख की मात्रा 10 होती है। सुख कैसा है ? वो सुख का आभास भर है। जीव हमेशा दुखी ही है, अतृप्त ही है , क्योंकि वो तो सुख प्राप्त करने के चक्कर में हैं न ? अंदर से खाली है , तभी तो सुख प्राप्त करने के पीछे भाग रहा है। सुख प्राप्त करने की दिशा उसको ज्ञात ही नहीं है। विषयों के पीछे भाग करके उसको सुख प्राप्त होगा क्या  ? ये उसकी गलत धारणा है।

       दुःख हमारे अविवेकी जीवन का अभिन्न अंग है। कदम कदम पर देखोगे परिस्थिति प्रतिकूल होगी। कुछ लोग आपके पक्ष में होंगे , कुछ विरोध में होंगे। गुट बना लेंगे।  ये जीवन में चलता ही रहता है। जीवन में जितने भी दुःख आते हैं -उन सभी दुःखों को सहन करना तितिक्षा है।-सहनं सर्वदुःखानाम, सर्व कहने से सभी प्रकार के दुःख उसमें आ गया।  त्रिताप कहा गया है - सभी प्रकार के दुःख। वो हम सबको पता है। आधि भौतिक, माने दूसरे व्यक्तियों से आने वाला दुःख , सिर्फ मनुष्य से ही नहीं दूसरे प्राणियों से भी आ सकता है। कुत्ते के काटने का दुःख। अपने परिवार के व्यक्तियों से ही आने वाला दुःख तो चलता ही रहता है। 

    फिर आधि दैविक - यानि जो प्राकृतिक है , बाढ़ आना , भूकंप आना , जगत सत्य है या मिथ्या है ? धराली में पूरा गाँव ही बाह गया। आप इमारत बनाते हो प्रकृति उसको तोड़ देती है। फिर आध्यात्मिक दुःख - हमारे मन के अंदर जो काम, क्रोध , लोभ ,मद,  मोह , मात्सर्य- ईर्ष्या रूपी जो सबसे भयानक विष है , आदि षडरिपु रहते हैं - सबसे भयानक आध्यात्मिक दुःख है। उनसे मिलने वाला दुःख। हमारी जो मन और इन्द्रियाँ अगर निग्रहीत नहीं हैं - तो उससे मिलने वाला दुःख। 

       सब प्रकार के दुःखों को सहन करो - कैसे ? दुःखों को सहन करने की एक विधि है। कैसे सहन करोगे ? अप्रतिकारपूर्वकम् | ये विवेकी मनुष्य को कहा जा रहा है - जो विवेकी होगा वह दुःख के कारण को ठीक करने का प्रयास नहीं करेगा।  अप्रतिकारपूर्वकम्- उसके मन में कोई खीझ या प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं होगी। मूल कारण को सामने रखेगा - क्योंकि जगत तो उसके लिए मिथ्या ही है। जिसके लिए जगत मिथ्या है , उसके लिए दुःख की ओर देखने की दृष्टि ही अलग है। वो तो चिंताविलापरहितं' हो गया है। न तो चिंता करता है , विलाप करता है। यही है तितिक्षा। 

       सर्वोत्तम तो हैं-द्वंदों जगत से उपर उठकर साक्षी भाव होकर द्वंदों को देखना। ऐसी मन की स्थिति - इसको तितिक्षा कहते हैं। तितिक्षा का आभाव होने से क्या होता है ? एक उदाहरण लें -किसीने आकर अजय को खरीखोटी सुना दिया। हमने एक का नाम लिया पर , ये सबके साथ होता है। किसी ने डाँट दिया पर अजय ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, चुप रहा। उसने सहन कर लिया। उसने किसी महापुरुष के उपदेश को सुना था की - श, स, ष होता है , इसलिए भाई सब सहन कर लो , सहन करो।  तो ठीक है, वो सहन कर रहा है , कुछ React नहीं कर रहा है। लेकिन भले ही वो React नहीं कर रहा हो , पर जिस व्यक्ति ने उसको डांट लगाई थी , वो चला भी गया पर उसके दिमाग में उसी की बात चल रही है। अरे उसने मुझे गाली दिया ? वो चिंता कर रहा है। और विलाप कर रहा है। तो ये सहन नहीं हुआ। आचार्य शंकर कह रहे हैं- सही तितिक्षा वो है जिसमें ये Process भी न हो - यह चिंता भी नहीं हो और विलाप भी नहीं हो। क्या अद्भुत होगी वैसे मन की दशा ? ये एक उच्च कोटि के नेता (विवेकानन्द) की मन दशा है ! जिसमें आप सभी प्रकार के अनुकूल -प्रतिकूल अनुभूतियों को लेकर के आप चिंता भी नहीं करते हो और विलाप भी नहीं करते हो। उस व्यक्ति का मन कितना कितना मुक्त हो जाता है ! ऐसे 'निहाई' जैसे  मन वाला व्यक्ति रात को आराम से सो जायेगा।  उसको कोई चिंता भी नहीं है -चाहे परिस्थिति प्रतिकूल हो या अनुकूल हो ? होगी ?  उसको कोई भी derail नहीं कर सकता। क्या अद्भुत गुण है ये तितिक्षा। ये सहन करने की विधि है। सहन करने की विधि क्या है ? अप्रतिकारपूर्वकम् | चिन्ताविलापरहितं - 

  तो हमने आज क्या क्या देखा ? विवेक , विवेक से उत्पन्न वैराग्य , वैराग्य हो तो फिर शम-मन का निग्रह। शम हो तो फिर दम इन्द्रियों का निग्रह , इन्द्रियों का निग्रह हो तो फिर उपरति , याने मन अब आकर्षण-विकर्षण की वस्तुओं से प्रभावित नहीं हो रहा है। अब वो मन और भी मुक्त हो गया। ऐसा मन जो परिस्थितियों से प्रभावित नहीं हो रहा है , उस व्यक्ति को तो सबकुछ सहन करना बड़ा आसान है। जब मन द्वन्दों से पभावित ही नहीं होरहा है , तब वो न चिंता करेगा न विलाप करेंगे -नारद का मन अब संतुलन में रहेगा ? जिसको विलाप करने के लिए कुछ है ही नहीं , इस व्यक्ति को कोई disturb नहीं कर सकता। सोचिये यह मुक्ति है -आप मुक्त हो रहे हो या नहीं ? नहीं तो हम कितने बँधे हुए हैं - जब परिस्थितियाँ कालनेमि को नहीं पहचानने के कारण कुछ प्रतिकूल हो जाती हैं , तो हम रात को सो नहीं पाते हैं, रात में ही B.P. इतना बढ़ जाता है कि सुबह 5 बजे ICU में भर्ती होना पड़ता है। तो हम सब बंधन में हैं ? हम बंधन में हैं या मुक्त हैं ? मुक्त कौन है यहाँ पर ? आप समझ रहे हो ? सृष्टि में सबकुछ बंधा हुआ है , सबकुछ प्रकृति के अधीन है। सब बंधन में हैं इस बंधन से मुक्त होना , ये सब मनुष्य मात्र ही कर सकता है। और वह कैसे करें ? इस प्रकार साधन चतुष्टय से। और अगर मनुष्य शरीर प्राप्त करके भी यदि किसी व्यक्ति ने इस प्रकार जीवनगठन का प्रयास नहीं किया , तो वो एक बहुत बड़ी गलती कर रहा है , एक बहुत बड़ा अवसर खो रहा है। अभी हमलोग यहीं पर रुक जाते हैं।  ॐ शांति ! शांति ! शांति: हरिओम तत्सत

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बुधवार, 13 अगस्त 2025

⚜️️⚜️️कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू॥2॥⚜️️⚜️️घटना - 323⚜️️Operation Kalnemi⚜️️🔱शक्तिवाण लगने से लक्ष्मणजी के मूर्छित होने का प्रसंग>> >> हनुमानजी का सुषेण वैद्य को लाना एवं संजीवनी के लिए जाना, कालनेमि-रावण संवाद, मकरी उद्धार, कालनेमि उद्धार ⚜️️🔱Shri Ramcharitmanas Gayan || Episode #323||

श्रीरामचरितमानस 

षष्ठ सोपान

[ लंका  काण्ड]
   
[ घटना - 323: दोहा -55,56,57] 


>>>⚜️️Operation Kalnemi⚜️️🔱लक्ष्मणजी और मेघनाद के बीच भीषण युद्ध का प्रसंग - 


      >> हनुमानजी का सुषेण वैद्य को लाना एवं संजीवनी के लिए जाना, कालनेमि-रावण संवाद, मकरी उद्धार, कालनेमि उद्धार 

        शक्तिवाण लगने से मूर्छित लक्ष्मण के उपचार के लिए हनुमान लंका के वैद्य सुषेण को उनके घर समेत उठा लाये हैं। औषधि है संजीवनी बूटी , पर्वत का नाम सुनकर जहाँ वो मिलेगी पवनपुत्र हनुमान श्रीराम का स्मरण कर प्रस्थान करते हैं। गुप्तचरों से ये संवाद सुनकर रावण चिंतित हो जाता है , और कालनेमि नामक राक्षस को हनुमान के मार्ग में बाधा डालने के लिए भेजना चाहता है। कालनेमि पहले तो रावण को सद्बुद्धि देने का प्रयास करता है , मदान्धता त्याग कर महामोह निद्रा त्यागने की बात कहता है , किन्तु फिर रावण के हाथों मरने की अपेक्षा , श्रीराम के दूत द्वारा मरना श्रेयस्कर जान , मुनिरुप धारण कर पवनपुत्र के मार्ग में माया रचना करता है। प्यास बुझाने के लिए हनुमान मुनि के संकेत पर सरोवर पहुँचते हैं , जहाँ मगरी के रूप में उपस्थित अप्सरा उनके पैर पकड़ लेती है। हनुमान उसका वध कर देते हैं , स्वर्गारोहण से पूर्व वो मुनिरूपी कालनेमि की वास्तविकता उन्हें बता देती है। कालनेमि का वध करके हनुमान पर्वत पर जड़ी-बुट्टी न पहचान सकने की स्थिति में पूरा पर्वत ही उठाकर लंका जाते हुए , अयोध्या के आकाश में पहुँचते हैं.... 

दोहा :
* राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥55॥

भावार्थ:- सुषेण ने आकर श्री रामजी के चरणारविन्दों में सिर नवाया। उसने पर्वत और औषध का नाम बताया, (और कहा कि) हे पवनपुत्र! औषधि लेने जाओ॥55॥

चौपाई :
* राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥
उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥1॥

भावार्थ:-श्री रामजी के चरणकमलों को हृदय में रखकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी अपना बल बखानकर (अर्थात्‌ मैं अभी लिए आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचर ने रावण को इस रहस्य की खबर दी। तब रावण कालनेमि के घर आया॥1॥

* दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥2॥

भावार्थ:-रावण ने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमि ने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। (उसने कहा-) तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है?॥2॥

* भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥3॥

भावार्थ:- श्री रघुनाथजी का भजन करके तुम अपना कल्याण करो! हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रों को आनंद देने वाले नीलकमल के समान सुंदर श्याम शरीर को अपने हृदय में रखो॥3॥

* मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥
काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥4॥

भावार्थ:- मैं-तू (भेद-भाव) और ममता रूपी मूढ़ता को त्याग दो। महामोह (अज्ञान) रूपी रात्रि में सो रहे हो, सो जाग उठो, जो काल रूपी सर्प का भी भक्षक है, कहीं स्वप्न में भी वह रण में जीता जा सकता है?॥4॥

दोहा :
* सुनि दसकंठ रिसान अति, तेहिं मन कीन्ह बिचार।
राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥56॥

भावार्थ:- उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमि ने मन में विचार किया कि (इसके हाथ से मरने की अपेक्षा) श्री रामजी के दूत के हाथ से ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पाप समूह में रत है॥56॥

चौपाई :
* अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥
मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम॥1॥

भावार्थ:- वह मन ही मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्ग में माया रची। तालाब, मंदिर और सुंदर बाग बनाया। हनुमान्‌जी ने सुंदर आश्रम देखकर सोचा कि मुनि से पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाए॥1॥

* राच्छस कपट बेष तहँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥
जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥2॥

भावार्थ:-राक्षस वहाँ कपट (से मुनि) का वेष बनाए विराजमान था। वह मूर्ख अपनी माया से मायापति के दूत को मोहित करना चाहता था। मारुति ने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्री रामजी के गुणों की कथा कहने लगा॥2॥

* होत महा रन रावन रामहिं। जितिहहिं राम न संसय या महिं॥
इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई॥3॥

भावार्थ:-(वह बोला-) रावण और राम में महान्‌ युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे, इसमें संदेह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टि का बहुत बड़ा बल है॥3

* मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल॥
सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥4॥

भावार्थ:- हनुमान्‌जी ने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमान्‌जी ने कहा- थोड़े जल से मैं तृप्त नहीं होने का। तब वह बोला- तालाब में स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हे दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो॥4॥

दोहा :
* सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान।
मारी सो धरि दिब्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥57॥

भावार्थ:- तालाब में प्रवेश करते ही एक मगरी ने अकुलाकर उसी समय हनुमान्‌जी का पैर पकड़ लिया। हनुमान्‌जी ने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़कर आकाश को चली॥57॥

चौपाई :
* कपि तव दरस भइउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य बचन कपि मोरा॥1॥

भावार्थ:- (उसने कहा-) हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शन से पापरहित हो गई। हे तात! श्रेष्ठ मुनि का शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानो॥1॥

* अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू॥2॥

भावार्थ:- ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गई, त्यों ही हनुमान्‌जी निशाचर के पास गए। हनुमान्‌जी ने कहा- हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिए। पीछे आप मुझे मंत्र दीजिएगा2॥

* सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना॥3॥

भावार्थ:- हनुमान्‌जी ने उसके सिर को पूँछ में लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँह से राम-राम का उच्चारण) सुनकर हनुमान्‌जी मन में हर्षित होकर चले॥3॥

* देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥
गहि गिरि निसि नभ धावक भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥4॥

भावार्थ:- उन्होंने पर्वत को देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमान्‌जी ने एकदम से पर्वत को ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्‌जी रात ही में आकाश मार्ग से दौड़ चले और अयोध्यापुरी के ऊपर पहुँच गए॥4॥ 

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>>ऑपरेशन कालनेमि :  सोमवार को एक्स पर पोस्ट में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जानकारी देते हुए बताया कि ऑपरेशन कालनेमि के अंतर्गत 100 से अधिक पाखंडी अब कानून की गिरफ्त में हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की पुण्यभूमि पर किसी भी प्रकार का ढोंग, छल या धार्मिक आवरण में छिपा अपराध सहन नहीं किया जाएगा। पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि ऑपरेशन कालनेमि केवल सुरक्षा अभियान नहीं, बल्कि आस्था, सनातन संस्कृति और देवभूमि की दिव्यता की रक्षा का संकल्प है। राज्य सरकार देवभूमि की पवित्रता और सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सावन मास और चारधाम यात्रा के दौरान यह अभियान और अधिक सतर्कता व गंभीरता के साथ जारी रहेगा

 वहीं, एक निजी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में सीएम धामी ने कहा कि रामायण का प्रसंग आपके सामने आया उस समय भी कालनेमि था। सही उद्देश्य के लिए काम करने वाले भगवान राम के भक्त हनुमान जब संजीवनी बूटी लेने के लिए जा रहे थे, तो भेष बदलकर, छद्म रूप बनाकर के गुमराह करने की कोशिश कर रहा था। उसी समय भगवान हनुमान को पता लग गया कि यह कालनेमि है और उन्होंने उसका अंत कर दिया उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी बहुत सारे कालनेमि छद्म भेष बनाकर अनेक स्थानों पर (म) अपनी पहचान छुपाकर के धार्मिक भावनाओं को आहत करने का काम कर रहे हैं। जो सच्चे धर्म की खोज में, पुण्य की खोज में और अपने आप को प्राप्त करने के लिए भगवान की शरण में जाते हैं, देवभूमि जाते हैं या अन्य स्थानों पर जाते हैं। उनको किसी न किसी रूप में मार्ग भटकाने का काम करते हैं। उनको कहीं रोकने का काम करते हैं और सनातन का नुकसान करते हैं।  यह अभियान ऐसे लोगों की पहचान कर उन सभी लोगों को रोकने और उजागर करने का काम कर रहे हैं। वहीं, 'ऑपरेशन कालनेमि’ पर ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन आश्रम के अध्यक्ष एवं आध्यात्मिक प्रमुख स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा, “मैं ‘ऑपरेशन कालनेमि’ शुरू करने के लिए राज्य सरकार को धन्यवाद देता हूं ऑपरेशन कालनेमि किसी बाबा या संत के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जो समाज को ठग रहे हैं और लूट रहे हैं, यह ऑपरेशन बहुत महत्वपूर्ण है। सभी को इस ऑपरेशन का समर्थन करना चाहिए। (इनपुट-एएनआई)

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https://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/LankaKand/15.htm 

https://www.shriramcharitmanas.in/p/lanka-kand_50.html 

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